पहेलियाँ
1
पुद्गल धर्म अधर्म तो देख वस्तु थक जाय।
आकाश नाप ना कर सके कालचक्र चकराय॥
2
एक योजन मेरा गला, पेट नाप है चार।
गहराई में आठ है, सुनकर करो विचार॥
3
एक फिल्म ऐसी चले, क्रमशः चौबीस बार॥
दृश्य वही बदले नहीं माँ से पूछ बताय॥
4
रहट पुराना ना नया, कब से थाह न पाय।
छह पलने ऊपर चढ़े, फिर नीचे को जाय॥
5
ऐसी क्या रचना करी, बन्धन में मुनिराज।
टूट टूट ताले गिरे, नृपति बुद्धि चकराया॥
6
तीन युद्ध विजयी हुए, प्यारे लाल सुनन्द।
तन पर बेलें चढ़ गयीं, उर आतम आनन्द॥
7
पुण्योदय का पार ना, पर ना कण की चाह।
अन्तर मुद्रित काल में, लोकालोक जगाय॥
8
तीर्थंकर खुद बन गये, तीर्थंकर के पौत्र।
चक्रवर्ती पद पा लिया, चक्रवर्ती के पुत्र॥ - कौन
9
अरे पुरस्स्या खा करे, तू आतम को भल।
मांसादिक का त्याग कर, धोबी दिसा भूल॥ - किसने कहा
10
सरिता तट तपसी खड़े, शुद्ध ज्ञान उपयोग।
मोह कर्म जर के भजो ले, केवल ज्ञान महायोग॥ - नदी का नाम
11
हाथ कटोरा ले खड़ी, किन्तु बँधे है पाँव।
महावीर आगे बढ़े, अंखियन जल भर जाय॥ - कौन
12
एक महाविदित विलोकी मन भंजे जवे
भक्तिन भयो चहो तो नयो फल सो
प्रभु की त्रिलोकी मुद्रा उर बंद मन भयो
अन्तर मूहूर्त्त पाही भाव लिगी है
विध्यध्वनि सुनी द्वादशांगी को उचो भयो
मनवर भयो कौन प्रथम नाम पायो है
13
एक महाविशाल मन्दिर बन्ध्यो नगर में
प्रगट भयु परसरे भारत विश्व के
अद्भुत पुज्य पदपद्म वीर परम पारस
लाखों नर नारी नहीं आवे दरश के
प्रवचन अमृत धारा तल की तरंग जहाँ
घर के उमंग हिये सुखे भव्य अधिक के
14
बिना एक क्षण आठ है मनुष्य पंच शत काय।
तेरह में गुण चार कर अर्थ कहो बतलाय॥
15
सुनने उपेक्षा होत है करे वो कर्ता नाहीं।
ज्ञाता दृष्टा ही रहे अंश विषय है नाहीं॥
16
ज्ञानमृत जिह्वर भरे, कंचन विषय कषाय।
बिछु भिन्न दिखता रहे संयम नहीं कर पाय॥
17
बोले बोल असंख्य है पूजे के आकार।
आदि में बूढ़े अन्त में बूढ़े केवली को साकार॥
18
प्रथम मिटे तो भाव है अन्त मिटे तो पंच।
द्रव्य एक धारण करे जो सबका सरपंच॥
19
सदा रहे आनन्द में भोग अनन्तानन्त।
एक एक कैसे शिशु ऐसे जीव अनन्त॥
20
चतुर्मुखी के भवन में भवने योग्य ही आय।
यत्र तत्र अन्यत्र फिरे ऐसे कौन बताय॥
21
स्वर्ग में देवी संग में नरक सहे घनघात।
दोष परिणति से हटे हटे आप में आय॥
22
जग में ऐसे स्थान दो हमें बताओ अनन्त।
एक घटे ना एक बढ़े कहते श्री अरिहन्त॥
23
अकृत्रिम ऐसा दिव्या नहीं खुले कोई दरवाजा
अनादि सर्वज्ञों ने देखा इसमें बैठे छह बाबा।
24
महापद्मेश्वर राज शिरोमणि नीतिज्ञ सम्यक् ज्ञानी है।
कोटि अंह कहलाते राजा कहलाते फिर भी निर अभिमानी है॥
25
सीधी अनुश्रेणी चढ़ जाता, तोड़ गया तिर्यक् से जाता।
द्रव्य भाव और जो कर्मों की धूल उन निज पद दर्शाता॥
26
सहस नाम तो इन्द्र पुकारे गणधर गुण गा-गाकर हारे।
ऐसे जीव भी हुए अनन्त, अरे बताओ ओ गुणवन्त॥
27
जीवीस के दूजे सब खुल जात, भक्त अमर सब होकर भाते।
पुण्य बँधे पापों का नाश, पाठ करो कर के विश्वास॥
28
हाथी घोड़े सेना वैभव, राजराजियों अपरम्पार।
अपने में रह कर जो भोगे कौन कहो आखीर उदार॥
29
जलदेवों ने एक दुष्ट को पकड़ जकड़ कर बाँध दिया।
शीलवती वह ‘रचना’ पूछे क्या तुमने पहचान लिया॥
काव्य
30
दो हजार वर्ष पहले कौन महर्षि आया था।
श्रुत स्कन्ध दूजे की रचना करके जो हरषाया था ॥
31
अनबद्ध स्पष्ट अनन्य नियत और जो अविशेषे से।
असंयुक्त जो देख ओ भैया कौन लय कहते उसे ॥
32
सराग संयम संयम अकाम अकाम निर्जर बाल तप।
वैराग्य क्रम वह कौन आयु न्याय से बदला सतत ॥
33
शब्दार्थ आगम अर्थ अरथ मत अर्थ नय भावार्थ ये।
आवे अरे क्या काम धोता को सही उत्तर मुझे ॥
34
रोके रखे जो जीव को विधि कही पाँच प्रकार है।
होने न दे कुछ लाभ उसको कौन नाम बता अरे ॥
35
सुख दुःख बैरी कन्ध बीच हो, समता रस ही पीता हो।
हिरन खाज खुजावे फिर भी अचल उपल सम रहता हो ॥
36
सब मन्त्रों में एक मन्त्र जो निज पद को दर्शाता है।
सर्व आगमों मूल मन्त्र कर मुक्ति वधू विलखाता है ॥
37
सात तत्त्व और नौ पदार्थ में रह कर भी नहीं रहता है।
अनादि निधन वह स्वयं सिद्ध जो नित्य प्रकाशित रहता है ॥
38
दो कदमों से नापा जिसने सारा मानुषोत्तर द्वीप।
रखा तीसरा कदम पीठ पर थरथर काँपे अधमी नीच ॥
39
वस्तु अनेकों भाव बदलती रहती प्रति समय तैयार।
हमें जीव के भाव बताओ जो होते हैं पाँच प्रकार ॥
40
आदि अन्त में ऐसे है मध्य विराजे सब।
बाल सूर्य को ले चले श्वेत चन्द्र हंसराज ॥
41
अठ दश अँगों को मार कर केसर जिसे पहाड़।
चार चोर हत कर किये चार मैले हैं आन ॥
42
काम देव सा रूप है पुरुष दूर तक जाय।
अंजन वायु सूत कहो पदम दूत कहलाय ॥
43
दीक्षा ले वन वन फिरे स्वानुभूति फल खाय।
मुख रागा बोले नहीं कुल कर नन्द कहाय ॥
44
गुलदस्ता फूलों भरा उभरे रंग है तीन।
तीन मिलन और कौन है जिससे वह संगीन ॥
45
पहली में तो तीस है, दूजी में पचीस।
पन्द्रह दश त्रय पंच कहे एक लाख क्रम से उपविष्ट ॥
46
पाँच सुभट बलवान है डाले सोकर पाँव।
शिवानन्द को पीठ दे उल्टी चाल चलाय ॥
47
शुद्धात्म साधन कहे रहे आत्म लवलीन।
दीक्षा दे उपदेश दे सुख सुन होय प्रवीण ॥
48
समलक्षण लक्ष्मी सकल, निकल लोक के अन्त।
नाम बताओ कौन वे उत्तम हैं गुणवन्त ॥
49
भूत सरवर में जोते खाते, निर्मल हंस कहते हैं।
जिनध्वनि में से घूमते मोती, जोरों को घुमवाते हैं ॥
50
परमर्द्धी पाँचों खडे निज आगम भवदीन।
उत्तम मंगल कौन है निश्चय कहो प्रवीण ॥
51
साठ महीनों में जो आता मधुवन मधुर बन जाता।
तत्त्व ज्ञान को गूँज सुनाकर फिर अन्यत्र चला जाता ॥
52
जैनी में जो युवा कहाता अध्यात्म की धूम मचाता है।
धुँधले नहीं है रेशो जिनके उच्च जैन कहलाता है ॥
53
मुक्ति वधू जो दर्पण देखे वचन सुनावे अमृत जैसे।
रत्नत्रय का मुकुट सजाये भेद ज्ञान परिणति करवाये ॥
54
विशती कर गये गगन विहार और अनन्तों हो गये पार।
पार्श्वचन्द्र की दो मीनार कौन बताओ अर्ध विचार ॥
55
भूत धारा निर्झर सहज कलश चार भरवाय।
ज्ञान नीर पीते सुजन परम्परा से आय ॥
56
तीन शतक रत्नत्रय मोती हार पिरोये निरखो ज्योति।
मूरख हो वह पास न आवे ज्ञानी जन को बहुत लुभावे ॥
57
पाप पुण्य के जोर से प्राणी स्वर्ग नरक को जावे।
कौन बताओ काला कुबड़ा जो निर्दोष से जावे ॥
58
कौन रत्न रहा वह भाई सब गति में मिल जाता।
पुण्य पाप बनचोर राज्य हो ज्ञानमय ज्योति जगाता ॥
59
वर्ण गन्धमय स्वना जिसकी रूप नजर जा आवे।
षट्द्रव्यों का भोग करे ना हाथ मले रह जावे ॥
60
दो नामों के पीछे आता एक नाम पीछे की ओर।
भारत भूमि पावन करता मंजीषियों का जो सिरमौर ॥
61
प्रथम तत्त्व की बात बतावे दिन ही दिन में सबको भावे।
परम भाव का लाभ कराकर, सर से भव का बोझ उतारे ॥
62
जम कर बैठा थाली जैसा तीन लोक का पेट हो ऐसा।
गर्भ विराजे तीर्थंकर है उनमें पहले सीमन्धर है ॥
63
दस भागों में बँटा हुआ है जैनी जन का रहा हुआ है।
संस्कृत का यह पहला वीर करण शास्त्र का जो सिरमौर ॥
64
सरवर जल कमलों से भरा जिसमें भव्य जिनालय खड़ा।
अन्तिम आये जिनका नाम हाथ जोड़ कर करें प्रणाम ॥
65
छह कमरों से सजा हुआ है उन पर पोषित सुन्दर लाल।
सम्पत से कीमत नहीं होती सोचो करो जोष पड़ताल ॥
काव्य
जो दरवाजे भव्य बन गये, आगे बनता महल विशाल।
कारीगर वह कौन था, जिसके लिए प्राण तत्काल॥
66
पाँच खण्ड के महल में रहे नर रमणीज।
कैसे जाने सुखी सुखे हुए घर धीर॥
67
एक पेढ़ी है महाविशाल जड़ चेतन रहते खुशहाल।
लोक लगे है सुन्दर बिन्दु पेटी कौन बताओं बन्धु॥
68
नीचे सात घोर हैं काले, ऊपर बैठे सुन्दर चाँद।
बीच सुरेन्द्रर द्वीप समन्दर बीच बनी है नदिया बाँध॥
69
दो नव अरु दस अष्ट है इक्कीस उदय विकार।
परिणाम त्रय विधि कहा उत्तर खुशी राय॥
70
सात शतक मुनि जब करे रहे अकम्पा वन माँही।
कौन भूमि लागन भये घर वरसाल उर माँही॥
71
शुरूआत अमृत पीने पत्र लिये हैं ताड़।
पैना काँटा हाथ ले लिखी जिनागम सार॥
72
पाँच महा मुनिवर खड़े शत्रुंजय के शीश।
कौन पधारे मुक्ति में कौन रहे जग बीश॥
73
अष्ट महाभाषा सहित लघु भाषा शत सात।
चार चतुष्ट्य मय रमें भव्य जीव के ताल॥
74
गुण अनन्त जिसमें रहे पर पदार्थ है एक।
पर जाने पर ना कहे रहे सदा एकत्व॥
75
दो को देह धरे सदा पर महाराजा एक।
संसार दशा जब तक रहे, नहीं छाड़ेगा टेक॥
76
तीन शतक सतावन मोती झर पिरोया जगमग ज्योति।
पंडित है वह अर्थ बतावे भोला समझ न पावे॥
77
एक भूतनी हमने देखी बाहर पाचक उसका काम।
एक इन्दी फिर भी नाशक है करे प्रगट पर को और आप॥
78
कौन हितोपदेश है जो बैठे तो जड़ हो जाय।
पूर्ण उदय में लोकालोक निखरे अर्थ बताओ जय हो जय॥
79
एक पुरुष नितम्बर से देखा पाँच परदा खड़ा हुआ।
कदम पे बोझे हाथ है उसके काल अनन्तों अड़ा हुआ॥
80
अणु अणु जिससे देखा जाना सत्य सदा बरसाती है।
द्वादश अंगों से सजी हुई केवली कन्या कहलाती है॥
81
नव नाली जिस नगर में बहे सदा निःसार।
गली गली में गन्दगी सड़े गले बिन रात॥
82
बीपावे से जो नहीं डरता वो पावे से बचता हो।
अपने में छिपने के कारण गिरि गुफा में रहता हो॥
83
बहुदलिया बन कर फिरें विविध स्वांग रचाय।
कभी मास कभी सुख लगे भोलाराम ठगाय॥
84
चार मेरे वपु उपजे अमर विराजे जाय।
अमर इन्द्र चकी नव चतुर्मुखी कहलाय॥
85
एक डंडा है इतना बड़ा मध्य लोक माहि में गढ़ा।
दो को आजु बाजू गहे देव देवियाँ पूजा करें॥
86
वह पृथ्वी है कहाँ बताओ चौदह नदियाँ बहती हो।
पूरब पश्चिम सादा बराबर यह पर्वत की धरती हो॥
87
जैन धर्म तत्वधन साधु कह मुखड़ा जिसका दमका हो।
मिथ्यातम के सघन निबिड़ में जुगनू बन कर चमका हो॥
88
परमेष्ठी में नाम है जिनका उपसर्ग के अनुसार।
अमृतचन्द्र और पद्मनिंदि की नज़रे जिनके चरणों पर॥
89
एक वाटिका इतनी गहरी स्वर्ण रत्न से बनी हुई।
मुख मंडल पर श्रीफल जिसके मालाओं से सजी हुई॥
90
चार भुजाओं का चक्कर है चार चतुष्ट्य बतलावे।
सम्यग्दर्शन अवधि तम में छिप कर भी वह इठलावे॥
91
एक नई ऐसा देखा है जिसके सिर पर पाँच सितारे।
शुभम उद्घाटन वह कर्ता है विख्याति भी उसे पुकारे॥
92
कौन है वो जो मंदिर नावे, सात और संग में हो जावे।
ग्राहक उसके अनगिनती है, हाथ जोड़ करते विनती है॥
93
जनम के जमुना पार गये।
वन में जीवन हार गये॥
94
श्वेत श्वेत है तीन शिखर, स्वर्णिम कलश हैं जिन पर।
अभिनाथ और श्री महावीर समवशरण सोहे अधीर॥
95
जिन राजा है श्वेत चन्द से पूर से जय जय आई है।
चार चार ये पाँच लगावे, जनता उमड़ के आई है॥
96
तीन तीन तो तीन है, पाँच यतीशिर राय।
पाँच नाम का एक है वो दो का समुदाय॥
97
सति शिरोमणि कौन थी सिद्धचक्र नवाय।
जिन प्रक्षालन और से महाकुष्ठ मिट जाय॥
98
अवगाहना में योजन बड़ा अन्त समन्दर रहता पड़ा।
कौन है वो धर्मक्रिया या पापी भाई मेरी समझ न आती॥
99
भरा समन्दर अपरम्पार बूंद में रत्न अपार।
चन्द क्षणों में होता पार अर्थ बताओ वह होशियार॥
100
दो पुत्री का पिता था वो तो इक शत इक का तात।
एक पौत्र ऐसा आया जो कल आया मिथ्यात॥
101
पहला गया तो दूजा आया यह तो अनादि का चक्कर।
राज धज कर राजा आया तो दोनों हुए मुखचक्कर॥
102
काव्य
103
ग्रंथधारिणी ईश्वरी झुरझुर झरता क्षीर।
अपरज गोपाला करे कौन यहाँ अति धीर ॥
104
तीन रत्नों की निधि कछुए पैठ मास में फूल खिलावे।
चन्द्रकला निरखती अवनी पर इन्द्र का आसन कँपावे ॥
105
केसरी अनुभव रस चाख्यो, गरीब गाये भव हार।
चेतन ही में नित रम्यो, किया कर्म संहार ॥
106
लोहे की जंजीर में क्षीण चित्तमणि नार।
हाथ कटोरा बन गया है, बहु अबुलधार ॥
107
गोल मोल है धरा सरोवर, गगन में सब गया शोर।
रंगबिरंगी बायरे बहे चतुर हँसे बैठे चहुँ ओर ॥
108
पाँच इन्द्रियाँ मन वचन काय न आवे काम।
पाँच नाम को क्या करूँ, सहस्र भी अंश कहाय ॥
109
तेईस सरिताएँ बही निर्मल नीर पवित्र।
विपुल हिमालय से गिरी धारा चित्र विचित्र ॥
110
शुक्ल यामिनी पाद की पक्की निशा के दृश्य।
पंचावट सेवा करे आठ मनोहर दृश्य ॥
111
अन्तर्दृष्टि निहारते देखे स्व पर पवित्र।
विविध ज्ञान आकार धर दिखता आत्म पवित्र ॥
112
समकितरागी सती महान्, सिद्धचक्र का दिया विधान।
गंधोदक पिंजरेके वसुदिन, कुष्ठ रोग हो दिन दिन छीन ॥
113
घड़ा रखा आँगन बिचे, भरा नाम विकराल।
सास बहू से यूँ कहे, बेटी हरा निकाल ॥
114
हाथ उखड़ का बाछला, जकड़ उतारे बाल।
महावीर पग धोवती, बंधन सब खुल जाय ॥
115
घर से तो दई निकाली, माँ बाप सुने ना भाई।
थी साथ में सखी बसन्ती, एक पुत्र शुका मैं जननी ॥
116
परपुरुष न नजर उठाई, वनवास भोग कर आई।
आज्ञा सुन कर रघुराई, जा अग्निकुण्ड समाई ॥
पहेलियों के उत्तर
- आत्मा के अनन्त गुण
- तीर्थंकर बालक
- माँ के सोलह स्वप्न
- उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल
- भक्तामर स्तोत्र
- मुनिराज बाहुबली
- भरत चक्रवर्ती
- भगवान् महावीर
- मुनिराज
- ऋजुकुला
- सती चन्दनबाला
- गौतम गणधर
- हस्तिनागर मन्दिर
- नन्दीश्वर द्वीप के बावन जिनालय
- भगवान् आदिनाथ
- अविनाशी सम्यक् दृष्टि
- जम्बूद्वीप स्वयम्भू
- जीव के असाधारण भाव
- सिद्ध परमेष्ठी
- अक्षय्य जीव
- सम्यक् दृष्टि
- मोक्ष, निगोद
- तीन लोक
- श्रीपाल राजा
- जीव का ऊर्ध्वगमन
- तीर्थंकर
- भक्तामर
- चक्रवर्ती
- श्वेत सेठ
- आचार्य कुन्दकुन्द
- उच्चार्यिक नय
- नामकर्म देहगति
- जिनवाणी समझने की पद्धति
- अन्तराय कर्म
- निर्ग्रन्थ मुनिराज
- णमोकार मंत्र
- जीव तत्व
- सिद्धकुन्द मुनि
- जीव भाव
- परमाणु धर्मी
- अरहन्त भगवान्
- हनुमान् जी
- मुनिराज आदिनाथ
-
- सम्यक् दर्शन ज्ञान चारित्र,
- द्रव्य गुण, पर्याय,
- उत्पाद व्यय ध्रौव्य
- नरकों के बिलों की संख्या
- मिथ्यात्व के पाँच भेद
- आचार्य परमेष्ठी
- अरहन्त सिद्ध
पहेलियों के उत्तर
- तेजस शरीर कार्माण शरीर
- तत्वार्थ सूत्र
- अग्नि
- ज्ञान का पूर्ण उपशम पूर्ण उदय
- तीन लोक
- जिनवाणी
- औदारिक शरीर
- मुनिराज
- पुण्य-पाप
- अरहन्त भगवान्
- पंचमेरु
- जम्बूद्वीप
- गुरुदेव
- कुन्दकुन्दाचार्य
- कलश
- स्वस्तिक
- ॐ
- दर्शन मोहनीय कर्म
- श्रीकृष्ण
- नियमगंड़ी मंदीर
- श्रीरंगनगर मंदिर के आदिनाथ भगवान्
- पंच बाल यति
- मैना सुन्दरी
- स्वयम्भू रमण का मरघ
- भगवान् आत्मा
- राजा श्रभदेव और मारीच
- पुण्य पाप
- ढीले वाले महावीर
- श्वेत सूदी तेरस
- महावीर भगवान्
- सती चन्दनबाला
- समवशरण
- महावीर भगवान्
- दिव्यध्वनि
- भगवान् महावीर का गर्भ कल्याणक
- केवल ज्ञान
- मैना सुन्दरी
- सती सीता
- सती चन्दनबाला
- अंजना सती
- सती सीता
Samkit
(11-2-17)
स्रोत: Gyata संग्रह।
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