श्रीमती रूपवती ‘किरण’ द्वारा रचित मंचन-योग्य जैन एकांकी नाटकों का संग्रह — जीवन-मूल्यों, वैराग्य व आत्म-सुधार के प्रसंगों को नाट्य-रूप में प्रस्तुत करता है। इस अंश में सुबाला, श्रीमाली आदि पात्रों के पूरे संवाद व मंच-निर्देश सहित एक एकांकी का दृश्य सम्मिलित है — वासना बनाम विवेक, अनुराग की विवशता व आत्म-बोध का मर्म।
यह ग्रन्थ लगभग ६५ पृष्ठों का व स्कैन रूप में है — यहाँ केवल प्रारंभिक भाग का अंश प्रस्तुत है।
An excerpt from ‘Paavan-Man’, a staged Jain one-act (ekanki) play collection by Smt. Rupvati ‘Kiran’ — dramatizing life-values, vairagya and self-reform. This excerpt reproduces an ekanki scene with full character dialogue (Subala, Shrimali, etc.) and stage directions on desire vs. discernment and self-awakening. The source is a ~65-page scan; only the opening portion is reproduced here.
पावन-मन
(एकांकी संग्रह)
‘श्रीमती रूपवती ‘किरण’’
सामाजिक पदाधिकारियों, ट्रस्टी/न्यासी की (योग्यता) अर्हतायें -
- वीतरागी देव-गुरु-धर्म के श्रद्धालु। उनकी अवधारणा होने पर शांतिपूर्ण ढंग से असंकोचता से मन से मानने पर हट न जाना।
- दैनिक (हिंसक) त्याज्य।
- भारतीय संस्कृति व अनेकांतवाद का पोषक।
- अष्ट मूलगुणों का धारी। सप्त व्यसन का त्यागी।
- लोभ निंद कार्य। निजी जीवन में हो या ऐसे कार्यक्रमों में भी शामिल नहीं होवे।
- निजी व्यवहारों, सुविधाओं पर सर्वाधिक हित से अपने वाले धन का उपयोग निषिद्ध।
- PHYSICALLY (फिजीकल) सेवाओं में भी सावधान।
- स्वयं भी शांतिपूर्ण तरीके से द्वेष से रहना। अधिकारों का लड़ाई नहीं लड़ना। परिस्थिति बनने पर त्याग वृत्ति को जीवन दे देना।
- आने वाले सुझाव या नवीन योजनाओं पर आग्रह से प्रतिपक्ष में विचार को ही लागू करना।
- भविष्य में परिवारवाद का भार न रखकर, अपरिग्रह आधार से निष्पक्ष चयन करें। स्वकीय से निर्वृति लेकर भावना के भक्ति करें।
अब लहरों से खेलना है
हम बहुत दिनों से बंधे बंधाए जीवन में रहे, बहुत विस्तार से सब कुछ बँधा था जीवन नीरस, मधुर रस की तरंग में प्रगति का वेग कहीं रूक गया है। पत्थर से बंधे रहते कितने ही प्रांत गये। मधुरस की यह परम्परा अनमोल निन्द का रूप ले ले, लहरों से अब खेलना है। और मूलगुणों, सहकारों लहरों से अब खेलना है।
हम वर्षों उस परम्परा की जहाँ ढूँढेंगे। कितने विद्वत् मेधाओं का सम्मान भारतीयों ने जिन्हें विद्वत वेत्ताओं के विचारों स्वरूप को कड़वे घूंट से सींचा। अंतिम तो यही अब छोड़ो मानना कसक तौर पर राय बहुत, अंतस्थलों अब खेलना है।
हम श्याम हैं नंद-मौलिक, हरि ईश्वर, स्वेच्छा भी हमें हो उसे पुरुषार्थ कहिय, तीर हमें, पयस्सर भी हम हैं। अज्ञानी हो अणुव्रत, कोटि हो पाप का डर हो।। निर्भय भर में अन्तराल के दुःखों को भी पार कर दे।। हम अभय, दिगंत बंधु वे तेरे लिये अनंत, प्रेरणा हैं।।
विषय-सूची
क्र. नाटक पृष्ठ सं.
- पावन-मन 5
- पत्थर 30
- स्वाभिमान 53
- शर्मिदा 81
- अनंत पंचमी चतुर्दाई 100
पावन-मन
पात्र-गुणिकाः
नरेन्द्रसेन – नवाभिवाहित युवक
श्रीबाला – नरेन्द्रसेन की पत्नी
सुबाला – सुबाला का अपरिपक्व युवक
श्रीमाली – सुबाला का प्रधान
सुलहराज – पिल्ली का प्रधान
पुण्य शर्मा – नरेन्द्रसेन की माँ
सावित्रा – नरेन्द्रसेन के पिता
समेरा चोइक, बन्धु एवं जनसमूह
दृश्य-प्रथम
स्थान – रात्रि प्रथम प्रहर
स्थान – वन में पर्णकुटी
(रेल संस्थापुर के निकट नन में पहुँचती है। सब ठीक दिग-दिखाता रहा है। एक नवयुवक धाती पर मूर्छित पड़ा है। निकट बैंच पर श्रीमाली प्रसन्न मन बैठा है, आज उसकी मनोकामना पूर्ण हुई है। सुबाला उसे मिल गई है, घाट का प्रधान शहर समाप्त होने को है। भिन्न-प्रभृत कुल्हराहट आता है।)
(हर्षपूर्वक स्वागत करते हुए) आओ सुलहराज। रात्रि को आने का कष्ट क्यों किया?
सुलहराज– आप मेरे अतिथि हैं श्रीमाली। आपकी कुशल क्षेम का ध्यान रखना मेरा कर्त्तव्य है।
श्रीमाली– मैं आपके उपकार को कभी विस्मृत नहीं कर सकता सुलहराज। आपने मेरी मनोकामना पूर्ण की है।
सुलहराज– श्रीमाली। मैं तुमसे वचनबद्ध था, तद्नुसार राष्ट्र में मिली यह सुंदरी तुम्हें दे दी। बस तुम भी पुरुष हो।
श्रीमाली– हम्मं…।
सुलहराज– जानता हूँ, चिल्लाओगे। मैं आपका चित्र ऋणी रहूँगा। श्रीमाली तुमने भी हमारी सहायता की हो। तुम्हारी योजना तुम्हारा सुझाव था तुम्हारे ही नेतृत्व में हमें मार्गदर्शन मिला वरन् अपने बल से मैं सीमा लाँघकर नगर लूटने की हमने कल्पना भी नहीं की थी। सफलता का श्रेय तुम्हारी को है।
श्रीमाली– आपकी आत्मीयता को। प्रशासनिक अधिकारियों की दक्षिणा स्वरूप प्राथमिक भेंट चाही दो तो कार्यसिद्धि निश्चित हो जाती है।
सुलहराज– आप यह क्या मूर्खों का-सा औचित्य है। श्रीमाली।
श्रीमाली– उसके पूछने की नहीं होती श्रीमाली।
(अंगुलियों से संकेत 1. रिक्षा)
करते हुए स्वर्ण भूषणों को वैशालिका के आभ्रम से क्यों भी पहुंच जा सकते हैं।
सुलहराज– सत्य कह रहे हो श्रीमाली। क्या नगरों में ऐसा भी होता है? जय भ्रष्टाचार।
(सुलहराज के सेवक का एक बड़ा मञ्जूषा लिए प्रवेश। वह मञ्जूषा सुलहराज को देता है)
श्रीमाली– ये क्या है?
सुलहराज– हमारी ओर से तुच्छ भेंट है श्रीमाली। स्वीकार करो।
श्रीमाली– आप केवल इस युवती को देने के लिए वचनबद्ध थे। यह आभूषण हमें क्यों? इसकी क्या आवश्यकता?
सुलहराज– इसमें तुम्हारा भी भाग है श्रीमाली। न्यायसंगत तुम भी इस सम्पत्ति के अधिकारी हो। तुम्हारी ही कारण आयातित संपत्ति विपुल हुई है।
श्रीमाली– यह आपकी उदारता है किन्तु…
सुलहराज– संकोच की आवश्यकता नहीं। आप उन पुरुषों के साथ नवीन गृहस्थी बसाओगे। आपको आभूषणओं की पूर्ति यह स्वर्ण करेगा। तभी तुम्हारी प्रेयसी भी प्रसन्न रहेगी। (विनोद करते हुए हँसते हैं।)
श्रीमाली– (हँसकर) जब आप मेरा मार्गदर्शन कर रहे हैं।
सुलहराज– बुद्धजनों को अपने अनुभव का लाभ युवकों में वितरित करना ही चाहिए। किसी गाड़ी नाव पर और क्यों नाव गाड़ी पर।
श्रीमाली– आप निःसंकोच इस सम्पत्ति को स्वीकार करें श्रीमाली। एक बात बता दूँ, हम लोग लूटते अवश्य हैं पर अविश्वासी नहीं। जो भी मिलता है सब मिल बाँट कर खाते हैं।
सुलहराज– (आश्चर्य भरे स्वर में) अच्छा!
श्रीमाली– विद्वान को अप्रत्यक्ष मूढ़ तोड़ने की सहन नहीं है, न ही वह उचित है। (चुनौती और संकेत कर) ये क्या ऐसी ही मुक्ति है।
सुलहराज– लगभग मूढ़ द्रष्टी थी तो भोजन नहीं किया।
श्रीमाली– तो क्या तुम पूर्ण परिचित प्रेमी नहीं हो?
सुलहराज– परिचित हैं, प्रेमी नहीं। आपसे क्या छिपाऊँ?
श्रीमाली– मुझे अपनी हितैषी समझो, मेरे द्वारा कदापि तुम्हारा अनिष्ट संभव नहीं।
सुलहराज– मुझे विश्वास है। यथार्थ बात यह है कि इस कन्या से विवाह करने की अभिलाषा थी किन्तु चर्चा करने से पूर्व ही वह अन्य को वाग्दान हो चुकी थी।
श्रीमाली– तुम्हारे माता-पिता ने प्रयत्न नहीं किया?
सुलहराज– वे इसलिए मौन हो गये कि वाग्दत्ता कन्या अन्य ग्रह को ब्याही जा चुकी है। मेरी इच्छा का उन्होंने असम्मान, उपेक्षा कहकर टाल दिया।
श्रीमाली– संतान को प्रसन्नता के अर्थ तो माता-पिता प्राणों का विसर्जन कर देते हैं। संभव है अन्य संतान पर अधिक ममत्व हो।
सुलहराज– मैं अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र हूँ सुलहराज। पर हमारी जातीय संस्कृति ही कुछ ऐसे नियमों से है कि उसमें सर्वोपरि स्थान नैतिकता को है, पुण्य को मानती को नहीं, नैतिकता की ओट में न जाने हुए परिवार समाज में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं।
श्रीमाली– बलिवैही है तुम्हारी नैतिकता की।
सुलहराज– नैतिकता की निम्न देह पर मुझे अपनी अभिलाषाओं का हनन करना स्वीकार नहीं था।
श्रीमाली– क्यों करे? तुम पुरुष है, वीर भोगने का हक प्रकृति प्रदत्त अधिकार है। जहाँ हमारी इच्छाओं का दमन होता हो उस संस्कृति से क्या लाभ? खाओ, पियो, आनन्द करो।
सुलहराज– और क्या? छोटे-सा जीवन, उसी में अनेक नियमों के बन्धन मुझे तनिक भी रुचिकर नहीं।
श्रीमाली– अच्छा। यह बताओ यह युवती डरी, भोजन किया या नहीं?
सुलहराज– नहीं रोती रहती है और आज निराहार है।
श्रीमाली– इसकी नींद खुली तो तुम्हें दुष्ट जानेगी। (श्रीमती कोहनी मारते) इसकी आवश्यकता नहीं है। अब तो तुम्हें भूख के शिक्षण अधिक लग रही है।
सुलहराज– फिर भी सो लो, कदाचित् प्रयोग में आ जाए। रात्रि अधिक हो गई है मैं चलूँ। तुम विश्राम करो। चिन्ता न करना। यहाँ तुम पूर्णतः सुरक्षित हो। युवती से कहो-अपने आज्ञाकारियों से जायेगी।
श्रीमाली– आप आराम करो।
सुलहराज– सुनो श्रीमाली। एक उपाय है हमारा गुरु ओझा है। वह झाड़-फूंककर भ्रम हरते हैं, वह सब वशीकरण का काम करते हैं। कहो तो अभी ले आऊँ।
श्रीमाली– नहीं, नहीं, वह ढकोसला करेगा और भी भय क्या कष्ट देगा। धम्प ध्रुव के स्पर्श से वह और बिचक जायेगी।
सुलहराज– अच्छा, मैं उसे समझाकर ले आऊँगा। तुम नास निकालो तो, हमारे उपाय, उपचार क्या जानो? मैं शीघ्र ही आता हूँ।
(सुबाला का प्रस्थान। सुबाला अर्द्धदृष्टि-सी घौघ देख आती है)
उन दोनों की वार्तालाप को सुन रही थी। दुष्टों के चंगुल में फँसकर उदार होंगे? यह सोचकर वह पुनः मूर्छित हो जाती है। श्रीमाली निकट जाकर उसे जगाने का प्रयत्न करता है। वह सचेत हो उठकर बैठ जाती है।
सुबाला– (दुःख एवं क्रोध मिश्रित स्वर में खड़े हो, तुम्हें यहाँ क्यों लाये?)
श्रीमाली– बहुत भोली हो सुबाला। नारी को एकांत में लाने का एक ही प्रयोजन होता है कि मैं तुम्हें ग्रहण करना चाहता हूँ।
सुबाला– धिक् तुम्हें लज्जा नहीं आती। ऐसा घृणित प्रस्ताव रखते? कौन हो तुम?
श्रीमाली– मैं तुम्हारी सौंदर्य का प्यासा श्रीमाली हूँ।
सुबाला– ओह! श्रीमाली। वही तो नहीं, जिसके लिये विवाह का प्रस्ताव लेकर मेरे पिता के समीप आये थे?
श्रीमाली– (रोष से) और तुमने पिता से अपमान करा दिया था।
सुबाला– उचित ही था। अब मेरा सम्बन्ध लखनपुर लिखित का फरमान हो चुका था तब असत्य कैसे किया जा सकता था?
श्रीमाली– परन्तु तुम मेरे हृदय से क्षण भर को क्या, मुझे कैसे चैन थी?
सुबाला– तो क्या इसलिए तुमने परिवार से परिवार को मर्मांतक पीड़ा दी, अनेक परिवारों को लूटा? उन्हें नष्ट-भ्रष्ट कर दिया?
श्रीमाली– जन-विहीन कर दिया? यह तेरी विवशता थी। प्रिये। तुम्हारे प्रति तीव्र अनुराग ने ही मुझे क्रूर कर्म करने की प्रेरणा दी।
सुबाला– यह अनुराग नहीं, वासना है जो अंधी और विवेकहीन होती है।
श्रीमाली– तुम्हारा कथन यथार्थ है पर मैं करूँ क्या, नहीं छूटे, मुझे इस प्रकार न ठुकराओ सुबाला! मैंने तुम्हें मिलने की केवल युक्ति बताई और प्रतिदिन मैं तुम्हें पाने को मृग तृष्णा करी सुबाला!
सुबाला– मेरे सुख-शांति नष्ट करके परिवार से विछोह कराकर अब क्षमा याचना करते हो।
श्रीमाली– मैं वचन देता हूँ कि तुम्हें इससे अधिक सुख से रखूँगा।
(मञ्जूषा की ओर संकेत कर) देखो यह सुंदूर पूरा। तुम भूखों से श्रीमाली। पंकज की शोभा पंक के साथ रहने पर ही है, स्वर्ण पात्र में नहीं। वह वहाँ सुगंधि नहीं बिखेरेगा किन्तु असमय में ही सो जायेगा।
सुबाला– (क्रोधित कठोरता से) मुझे तुम्हारा उपदेश नहीं, तुम्हारी स्वीकृति, तुम्हारा समर्पण चाहिए। मैं एक अंतराग्नि शमन सफल देखें हैं। तुम आज विवाहित को विवश कर सकती हो।
सुलहराज– (प्रवेश कर, दंडवत्) श्री श्रीमाली। हमारी गुरु ओझा अवध्य है, वे आये। उन्होंने जब यह भष्म दी है। इसके चारों ओर बिखेरने से यह आज्ञाकारी सेवक की भाँति तुम्हारी आज्ञा का पालन करेगी। ये वशीकरण भस्म है। तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। विश्वास रखो।
(सुलहराज चला जाता है। सुबाला सोती रहती है।)
श्रीमाली– सुबाला। मैं दो दिन का थका हूँ, मुझे तृप्ति दी है तो ही तुम भी विश्राम करो। पर सावधान! भागने का प्रयत्न मत करना। वन में मैं पिशाचों का बड़ा प्रतिकत्स्य है। (श्रीमाली सुबाला के आगे, और भृभंगि दिखाता है)
सुबाला– भस्म छिड़क देते हैं?
श्रीमाली– तुम्हारी सुरक्षा का प्रबन्ध कर रहा हूँ ताकि तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट न हो।
सुबाला– (स्वागत) हे प्रभु! अब क्या होगा? कोई मा।
स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि)।
प्रूफरीडिंग बाकी है