नियम का फल — जैन स्वाध्याय सामग्री | Niyam Ka Phal

नियम की फल

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

नियम का फल

दृश्य (1)

सेठजी की दुकान - सेठजी नहीं खाता चेक कर रहे हैं।

मुनीम - जय जिनेन्द्र सेठजी।
सेठ - इतनी देर से क्यों आये हो। सारा हिसाब गड़बड़ है।
मुनीम - माफ़ करना सेठजी। वो देरी हो गई। और मेरी तबीयत ठीक नहीं थी तो हिसाब में गड़बड़ी हो गई होगी। मैं अभी
“मुनीम फिर पीछे मुड़ता है।”
सेठ - कहाँ जा रहे हो?
मुनीम - जी मन्दिर।
सेठ - फिर मन्दिर।
मुनीम - जी सेठानी जी ने कहा था कि मन्दिर जी में अगर द्रव्य रखवाई
सेठ - क्यों रखता हूँ। free में आती है कहा सामग्री।
मुनीम - मुझे नहीं करना दान वान। कोई जरूरत नहीं है मन्दिर
में सामग्री रखवाने की। मेरे घर में भण्डार भरा है। अभी
सेठ - अब फिर पीछे मुड़ने लगता है।
मुनीम - जी सेठानी जी ने कहा था कि नगर में
मुनि संघ आया है तो चौके की व्यवस्था देखनी है।
सेठ - कहीं नहीं जाएंगे हम। एक गेनी नौकरी करते हैं या सेठानी
जी की। तुम्हें तनख्वाह कौन देता है? वो या मैं।
मुनीम - जी आप ही देते हो।
“और वो दुकान पर बैठ जाता है।”
सेठ - सेठानीजी को ले हूँ डरता हूँ।
दृश्य (2) के घर पर जाता है।
सेठानी - ये क्या दान वान नहीं लेंगे।
(सेठानी रोने लगे है)
सेठानी - खुद तो दान पुण्य करते नहीं और मैं करती हूँ तो करने
नहीं देते।
सेठजी - क्या होता है दान पुण्य करने से मुझे भी तो समझाओ।
सेठानी - अरे कोई धर्म से विमुख होकर रह सकता है। आपको नियम
जानने के दान से ही तो मिल रहे हैं। अभी दान करने से तो मोक्ष
सेठजी - मुझे मत समझाओ ये धर्म की बातें। मेरे पास 02 रुपये का
पैसा नहीं है इस सब कामों के लिये। एक बार कह दिया सो
कह दिया।

हे भगवान कोई इनको के सदबुद्धि दे
तुम्हे दे सदबुद्धि कुछ नहीं।

अगला दृश्य

सेठानी - वाला फिर रही है। वहां सहेली आती है।
सहेली - अरे सुलोचना तुम। (आज सुबह सुबह)
सेठानी - नगर में मुनि संघ आता है। तुम भी चलो दर्शन करने
जा रही हो। तुमको भी चलो दर्शन करने।
सहेली - नहीं, मेरी बहू सहेली के साथ जाने की इच्छा है।
सहेली - तब तो हो गए तुम्हारे दर्शन।
सेठानी - हूँ।

अगला दृश्य - सेठजी भोजन हेतु पधारे है।

सेठानी - भोजन की थाली लेकर आती है।
सेठानी - भोजन तो बड़ा स्वादिष्ट बनाया है।
सेठजी - अरे वाह भगवान भोजन तो बड़ा स्वादिष्ट बनाया है।
कहाँ क्या सामग्री हो। आज तुम जो कहोगी वही मैं करूँगा
सेठानी - वचन दिया?
सेठ - हां वचन दिया।
सेठानी - तो फिर कल प्रातः आप मेरे साथ चलेंगे।
सेठ - कहाँ।
सेठानी - नगर में मुनि संघ आया है। वहां दर्शन के लिए चलेंगे।
सेठ - आप भी मेरे साथ चलेंगे।
सेठजी - क्यों अपना समय व्यर्थ कर रही हो।
सेठानी - स्वामी भावने वचन दिया है।
सेठजी - तुम्हें मेरे महाराजांत जो चाहोगे ही ले लो।
सेठानी - नहीं ये भौतिक सुख सुविधाएँ है। ये मुझे नहीं चाहिए
आपकी मुनिराज के दर्शन करने ले चलेंगे।
सेठजी - ठीक है। चलूँगा तुम्हारे साथ।

अगला दृश्य -

मुनिराज - ज्ञान में मग्न है।
वह सेठानी - नमस्कार महाराज!
मुनिराज - धर्म वृद्धि हो!
सेठानी - कैसे लोगी धर्म वृद्धि महाराज? उनकी तो धर्म में रुचि
ही नहीं है।
मुनिराज - मन्दिर तो प्रतिदिन जाते ही होंगे ना?
सेठ - कैसे जाऊं महाराज। दुकान से समय ही नहीं मिलता।
मुनिराज - नियम पूर्वक प्रतिदिन मन्दिर अवश्य जाया करो।
सेठ - कह तो रहा हूँ महाराजजी समय ही नहीं मिलता।
मुनिराज - तो आप नियम पूर्वक किसी भी वस्तु का प्रतिदिन दान
किया करो।
सेठ - कुछ सोचकर। हाँ मुनिराज मेरे दुकान के सामने एक
कुम्हार रहता है। उसका एक गधा है। मैं उसी का
प्रतिदिन दर्शन किया करूँगा।
मुनिराज - किन-किन नियम पूर्वक।

“इसी तरह समय बीतता जा रहा था सेठ रोज गधे का
दर्शन करता फिर भोजन करता। परन्तु एक दिन उस जगह
गधे को वहां न पाकर वो हैरान परेशान हो गया और
उधर उधर ढूंढने लगा।”
(एक आदमी) से पूछती है।
सेठ - अरे तुमने किसी गधे को देखा है?
आदमी - मैं गधा तुम गधा यहाँ तो एक सभी गधे है। तुम्हें कौनसा
गधा चाहिए।
सेठ - मुझे अपना गधा चाहिए।
सेठ - मुझे अपना गधा चाहिए।
सेठ - मेरा गधा तो बहुत ही सीधा है।
सेठ - मेरा गधा तो बहुत ही सीधा है।
सेठ - मेरा गधा तो बहुत ही सीधा है।
सेठ - मेरा गधा

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 238.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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