निर्ग्रन्थों का मार्ग हमको प्राणों से भी प्यारा है|
दिगम्बर वेश न्यारा है......निग्रन्थों का मार्ग.......॥
शुद्धात्मा में ही, जब लीन होने को, किसी का मन मचलता है|
तीन कषायों का, तब राग परिणति से सहज ही टलता है||
वस्त्र का धागा…. वस्त्र का धागा, नहीं फिर उनने तन पर धारा है || दिग.॥(1)
पंच इंद्रिय का, विस्तार नहीं जिसमें, वह देह ही परिग्रह है,
तन में नहीं तन्मय, है दृष्टि में चिन्मय, शुद्धात्मा ही गृह है,
पर्यायों से पार..... पर्यायों से पार, त्रिकाली ध्रुव का सदा सहारा है ॥दिग.॥(2)
मूलगुण पालन, जिनका सहज जीवन, निरंतर स्वसंवेदन
एक ध्रुव सामान्य, में ही सदा रमते, रत्नत्रय आभूषण!
निर्विकल्प अनुभव...... निर्विकल्प अनुभव से ही, जिनने निज को श्रृंगारा है ॥दिग.||(3)
आनंद के झरने, झरते प्रदेशों में,
निज ध्यान जब धरते हैं,
मोह रिपु क्षण में, तब भस्म हो जाता, श्रेणी जब चढ़ते हैं,
अंतर्मुहूर्त में... अंतर्मुहूर्त में ही, जिनने अनन्त चतुष्टय धारा है ॥दिग.॥(4)
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १०५ से १०६