निर्ग्रन्थ पद हितकार, आत्मन् धारण करो।
धारण करो, हाँ धारण करो।। टेक॥
संयोग तो भिन्न रहते सही हैं,
परद्रव्य अपने होते नहीं हैं।
विषयों से दुःख का निवारण नहीं हो,
परिग्रह तो सुख का कारण नहीं हो।।
मोह तजो दुःखकार, भव का निवारण करो॥ 1॥
अन्त में मिलती है बाहर निराशा,
पहले ही छोड़ो विषयों की आशा।
तत्त्व विचार करो सुखदाई,
वैराग्य भावना भाओ रे भाई।।
सब संसार असार, जीरण तृण सम तजो।। 2॥
होओ रे निर्मम निर्द्वन्द निराकुल,
सिद्ध समान समझकर निज कुल।
गुरुवर की साक्षी में हर्षित होकर,
वस्त्राभूषण सब ही तजकर।।
केशों को कर से उखाड़, पीछी कमंडल धरो।। 3।।
व्रतादि की ले सुखमय प्रतिज्ञा,
सहज ढले अन्तर में प्रज्ञा।
निर्विकल्प हो आत्म भावना,
शेष नहीं कुछ रहे कामना।।
भावलिंग अविकार, अंतर प्रगट करो॥ 4॥
प्रचुर स्वसंवेदन सुखकारी,
अक्षय सुख की हो तैयारी।
सहजपने हो समताधारी,
वृत्ति अलौकिक हो अविकारी।।
ज्ञान-ध्यान-तप लीन, हो भव सफल करो॥ 5॥
ऐसा निश्चल ध्यान लगाओ,
सब वैभाविक कर्म नशाओ।
निज प्रभुता निज में प्रगटाओ,
दुःखमय आवागमन मिटाओ।।
ध्रुव अनुपम अरु सार, शिवपद प्रगट करो।। 6॥
रचियता - पूजनीय बाल ब्रह्मचारी पंडित श्री रवीन्द्र जी आत्मन्
Source - जिन भक्ति सिंधु