निदान: सम्पूर्ण विस्तृत जानकारी | Nidan: Sampurn Vistrit Jankari

निदान क्या है?

धर्म, तप, व्रत या पूजा के फल के रूप में आगे के भवों में भोग, पद, यश या किसी इच्छित वस्तु की कामना करना निदान है। यह मन में चुभा हुआ एक काँटा है जो व्रतों को भीतर से खोखला कर देता है। इसीलिए आचार्यों ने इसे शल्य भी कहा और आर्तध्यान का एक भेद भी।

ग्रंथों के उद्धरण: निदान का लक्षण

आचार्य पूज्यपाद, सर्वार्थसिद्धि 7/37:

भोगाकांक्षया नियतं दीयते चित्तं तस्मिस्तेनेति वा निदानम्।

अर्थ: भोगों की आकांक्षा से जिसमें, या जिसके कारण, चित्त नियम से लगा दिया जाता है, वह निदान है।

सर्वार्थसिद्धि 7/18:

निदानं विषयभोगाकांक्षा।

अर्थ: विषय भोगों की लालसा निदान शल्य है।

द्रव्यसंग्रह टीका (ब्रह्मदेव), गाथा 42 में भी यही कहा है: देखे, सुने और अनुभव में आए हुए भोगों में जो निरन्तर चित्त को लगाए रखता है, वह निदान शल्य कहलाता है।

निदान एक शल्य है

शल्य किसे कहते हैं?

शृणाति हिनस्तीति शल्यम्। शरीरानुप्रवेशि कांडादि प्रहरणं शल्यमिव शल्यं यथा तत् प्राणिनो बाधाकरं तथा शारीरमानसबाधाहेतुत्वात्कर्मोदयविकारः शल्यमित्युपचर्यते। (सर्वार्थसिद्धि 7/18)

अर्थ: जो पीड़ा दे, वह शल्य है। जैसे शरीर में चुभा हुआ बाण या काँटा प्राणी को निरन्तर पीड़ा देता है, वैसे ही शरीर और मन की बाधा का कारण होने से कर्मोदय से उत्पन्न विकार को भी शल्य कहते हैं।

तीन शल्य

आचार्य शिवार्य, भगवती आराधना गाथा 538:

मिच्छादंसणसल्लं मायासल्लं णिदाणसल्लं च।

अर्थ: मिथ्यादर्शन शल्य, माया शल्य और निदान शल्य, ये तीन शल्य हैं।

  1. मिथ्यादर्शन शल्य: तत्त्वों पर विपरीत श्रद्धान
  2. माया शल्य: भीतर कुछ और, बाहर कुछ और, छल कपट
  3. निदान शल्य: धर्म के बदले भोगों की चाह

द्रव्यसंग्रह टीका (गाथा 42) में माया शल्य को बगुले के वेष जैसा बताया है:

बहिरंगबकवेषेण यल्लोकरंजना करोति तन्मायाशल्यं भण्यते।

अर्थ: जो बाहर बगुले जैसा वेष धारण करके लोगों को प्रसन्न करता है, वह माया शल्य कहलाता है।

व्रती शल्य रहित ही होता है

आचार्य उमास्वामी तत्त्वार्थसूत्र (अध्याय 7) में कहते हैं:

निःशल्यो व्रती ॥१८॥

अर्थ: जो शल्य रहित है, वही व्रती है।

सर्वार्थसिद्धि 7/18 में इस पर सुन्दर दृष्टान्त है:

यथा बहुक्षीरघृतो गोमानिति व्यपदिश्यते। बहु क्षीरघृताभावात्सतीष्वपि गोषु न गोमांस्तथा सशल्यत्वात्सत्स्वपि व्रतेषु न व्रती। यस्तु निःशल्यः स व्रती।

अर्थ: जिसके यहाँ बहुत दूध घी होता है, उसे ही गाय वाला कहते हैं। गायें होने पर भी यदि दूध घी न हो, तो वह गाय वाला नहीं कहलाता। उसी प्रकार व्रत होने पर भी जो शल्य सहित है, वह व्रती नहीं है। जो निःशल्य है, वही व्रती है।

भगवती आराधना गाथा 1214:

णिस्सल्लसेव पुणो महव्वदाइं सव्वाइं। वदमुवहम्मदि तीहिं दु णिदाणमिच्छत्तमायाहिं ॥१२१४॥

अर्थ: शल्य रहित यति के ही सब महाव्रतों का संरक्षण होता है। जो शल्यों का आश्रय लेते हैं, उनके व्रत निदान, मिथ्यात्व और माया, इन तीनों से नष्ट हो जाते हैं।

निदान एक आर्तध्यान है

तत्त्वार्थसूत्र (अध्याय 9) में आर्तध्यान के चार भेद बताए हैं:

आर्तममनोज्ञस्य संप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारः ॥३०॥
विपरीतं मनोज्ञस्य ॥३१॥
वेदनायाश्च ॥३२॥
निदानं च ॥३३॥

अर्थ:

  1. अनिष्ट वस्तु के संयोग होने पर उसके वियोग की बार बार चिन्ता करना
  2. इष्ट वस्तु के वियोग होने पर उसकी प्राप्ति की बार बार चिन्ता करना
  3. रोग की वेदना होने पर उसे दूर करने की बार बार चिन्ता करना
  4. निदान: आगामी भोगों की वांछा में चित्त लगाए रखना

इष्ट वियोग और निदान में अन्तर

आचार्य अकलंकदेव, राजवार्तिक 9/33:

अप्राप्तपूर्वविषयत्वान्निदानस्य। सुखमात्रया प्रलंभितस्याप्राप्तपूर्वप्रार्थनाभिमुख्यादनागतार्थप्राप्तिनिबंधनं निदानमित्यस्ति विशेषः।

अर्थ: प्रश्न: “विपरीतं मनोज्ञस्य” सूत्र में ही निदान आ जाता है? उत्तर: नहीं, क्योंकि इष्ट वियोग वाला आर्तध्यान खोई हुई वस्तु के लिए होता है, जबकि निदान उस वस्तु के लिए होता है जो कभी मिली ही नहीं। सुख के लोभ में भविष्य के भोगों की प्राप्ति की सतत चिन्ता निदान है।

निदान किसके होता है?

तदविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानाम् ॥३४॥ (तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय 9)

… प्रमत्तसंयतानां तु निदानवर्ज्यमन्यदार्त्तत्रयं प्रमादोदयोद्रेकात्कदाचित्स्यात्। (सर्वार्थसिद्धि 9/34)

अर्थ: आर्तध्यान अविरत, देशविरत और प्रमत्तसंयत जीवों के होता है। अविरत और देशविरत (श्रावक) के चारों प्रकार का आर्तध्यान हो सकता है, परन्तु प्रमत्तसंयत मुनि के निदान को छोड़कर शेष तीन आर्तध्यान प्रमाद की तीव्रता से कभी कभी होते हैं। अर्थात् सच्चे मुनि के निदान नहीं होता।

आर्तध्यान का फल

तिर्यग्भवगमनपर्यवसानम्। (राजवार्तिक 9/33)

अर्थ: इस आर्तध्यान का फल तिर्यंच गति है।

निदान के भेद: प्रशस्त, अप्रशस्त और भोगकृत

भगवती आराधना गाथा 1215:

तत्थ णिदाणं तिविहं होइ पसत्थापसत्थभोगकदं ॥१२१५॥

अर्थ: निदान तीन प्रकार का है: प्रशस्त, अप्रशस्त और भोगकृत।

भगवती आराधना गाथा 1216 से 1219:

संजमहेदुं पुरिसत्तसत्तबलविरियसंघदणबुद्धी सावअबंधुकुलादीणि णिदाणं होदि हु पसत्थं ॥१२१६॥
माणेण जाइकुलरूवमादि आइरियगणधरजिणत्तं। सोभग्गाणादेयं पत्थंतो अप्पसत्थं तु ॥१२१७॥
कुद्धो वि अप्पसत्थं मरणे पच्छेइ परवधादीयं। जह उग्गसेणघादे णिदाणं वसिट्ठेण ॥१२१८॥
देविगमणिसभोगो णारिस्सरसिट्ठिसत्थवाहत्तं। केसवचक्कधरत्तं पच्छंतो होदि भोगकदं ॥१२१९॥

अर्थ:

  1. प्रशस्त निदान: संयम के साधन के लिए पुरुषत्व, उत्साह, बल, वीर्य, उत्तम संहनन, बुद्धि, और श्रावक या बन्धुओं के कुल में जन्म की कामना करना
  2. अप्रशस्त निदान: मान के वश होकर उत्तम जाति, कुल, रूप, आचार्य पद, गणधर पद, तीर्थंकर पद, सौभाग्य और आज्ञा की प्रार्थना करना। क्रोध में आकर मरण समय शत्रु के वध आदि की कामना करना भी अप्रशस्त निदान है, जैसे मुनि वशिष्ठ ने उग्रसेन के घात का निदान किया
  3. भोगकृत निदान: देव और मनुष्य के भोग, स्त्रीपना, धनिकपना, सेठ का पद, सार्थवाह पद, नारायण पद या चक्रवर्ती पद, भोगों के लिए इनकी अभिलाषा करना

प्रशस्त निदान भी मुमुक्षु नहीं करते

भगवती आराधना गाथा 1223 और 1224:

कोढी संतो लद्धूण डहइ उच्छं रसायणं एसो। सो सामण्णं णासेइ भोगहेदुं णिदाणेण ॥१२२३॥
पुरिसत्तादि णिदाणं पि मोक्खकामा मुणी ण इच्छंति। जं पुरिसत्ताइमओ भावी भवमओ य संसारो ॥१२२४॥

अर्थ: जैसे कोई कोढ़ी, कोढ़ नाशक रसायन पाकर उसे जला दे, वैसे ही निदान करने वाला सब दुःखों के नाशक संयम को भोगों के निदान से नष्ट कर देता है। संयम के कारण पुरुषत्व आदि का प्रशस्त निदान भी मोक्ष के इच्छुक मुनि नहीं करते, क्योंकि पुरुषत्व आदि पर्याय भी भव है, और भव ही संसार है।

तो फिर क्या माँगें?

भगवती आराधना गाथा 1225 और 1226:

दुक्खक्खयकम्मक्खयसमाधिमरणं च बोहिलाहो य। एयं पत्थेयव्वं ण पच्छणीयं तओ अण्णं ॥१२२५॥
पुरिसत्तादीणि पुणो संजमलाभो य होइ परलोए। आराधयस्स णियमा तत्थमकदे णिदाणे वि ॥१२२६॥

अर्थ: मेरे दुःखों का क्षय हो, कर्मों का क्षय हो, समाधिमरण हो और बोधि (रत्नत्रय) का लाभ हो, बस इतनी ही प्रार्थना करनी चाहिए, इसके सिवा कुछ नहीं। जिसने रत्नत्रय की आराधना की है, उसे निदान न करने पर भी अगले भव में पुरुषत्व आदि और संयम का लाभ नियम से होता है।

पूजा और प्रतिक्रमण के अन्त में जो दुःखक्षय, कर्मक्षय, बोधिलाभ और समाधिमरण की प्रार्थना की जाती है, वह यही निदान रहित भावना है।

सल्लेखना में निदान एक अतिचार

जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानानि ॥३७॥ (तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय 7)

अर्थ: जीने की आशंसा, मरने की आशंसा, मित्रों से अनुराग, पहले भोगे सुखों का स्मरण, और निदान, ये सल्लेखना के पाँच अतिचार हैं। अर्थात् समाधिमरण के समय भी आगामी भोगों की चाह व्रत में दोष लगाती है।

हम क्या सीखें?

  1. पूजा, दान, तप या व्रत करें तो बदले में कुछ न माँगें। धर्म का फल कर्मों का क्षय है, भोग नहीं
  2. “अगले भव में राजा बनूँ, स्वर्ग मिले, सुन्दर रूप मिले”, ऐसी चाह भी निदान है
  3. क्रोध में किसी का बुरा चाहना सबसे भयंकर अप्रशस्त निदान है, यह संयम को जला देता है
  4. सच्ची प्रार्थना केवल दुःखक्षय, कर्मक्षय, समाधिमरण और बोधिलाभ की है
  5. निःशल्य हुए बिना व्रत, व्रत नहीं कहलाते

स्रोत:

  1. तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी): अध्याय 7 सूत्र 18 और 37; अध्याय 9 सूत्र 30 से 34
  2. सर्वार्थसिद्धि (आचार्य पूज्यपाद): 7/18, 7/37, 9/34
  3. राजवार्तिक (आचार्य अकलंकदेव): 9/33
  4. भगवती आराधना (आचार्य शिवार्य): गाथा 538, 1214, 1215, 1216 से 1219, 1223 से 1226
  5. द्रव्यसंग्रह टीका (ब्रह्मदेव): गाथा 42
  6. सहायक: ज्ञानार्णव (आचार्य शुभचन्द्र) अधिकार 25; अमितगति श्रावकाचार अध्याय 7; महापुराण पर्व 21

उद्धरणों का पाठ जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश (jainkosh.org) में दिए मूल पाठ से लिया गया है, तत्त्वार्थसूत्र के सूत्र मूल ग्रन्थ से मिलाए गए हैं।

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