जैन कथाओं पर आधारित मंचन-योग्य नाटकों का संग्रह — (१) नेमि-राजुल : वसंत-उत्सव की पृष्ठभूमि में श्री कृष्ण द्वारा भगवान् नेमिकुमार (नेमिनाथ) का राजुल (राजमती) से विवाह-प्रस्ताव, बारात में विवाह-भोज हेतु बंधे पशुओं का करुण क्रंदन देखकर नेमिकुमार का वैराग्य व दीक्षा, और राजुल का विरह — नाट्य-रूप में अहिंसा व वैराग्य का मर्म। (२) जैन रामायण अंश : राम, सीता, लव-कुश, मंत्री-परिषद् व धोबी-धोबिन के प्रसंग सहित सीता-लोकापवाद व लंका-विजय के दृश्य। पूरे पात्र-संवाद, गीत व मंच-निर्देश सहित; पाठशाला व सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु।
A collection of staged Jain natak — (1) Nemi-Rajul: against a vasant-festival backdrop, Shri Krishna proposes the marriage of Lord Neminath (Nemikumar) to Rajul (Rajimati); seeing the animals bound for the wedding feast crying out, Nemikumar renounces the world and takes diksha, and Rajul is left in viraha — dramatizing ahimsa and vairagya. (2) A Jain Ramayan excerpt: Ram, Sita, Lav-Kush, the council of ministers and the washerman episode, with scenes of Sita’s public censure (lokapavad) and the victory over Lanka. Full character dialogue, songs & stage directions for pathshala & cultural programs.
(Background music तालियों की आवाज, वक्ता की आवाज)
कवि: ऽ आया वसंत का पर्व महान् - २ कोयल…
Song
(background music)
राजा: (वाह) अहो! कविराज ने की कविता ने तो मुफ्त में जाकर वसंत ऋतु का आनंद प्राप्त करने की ईच्छा उत्पन्न कर दी है। हम चाहते है के हम सब वन - २ में घूमें और जलाशय में जल क्रीड़ा करे। वसंत ऋतु के उत्सव की सूचना शिवदास में भी दे दी जाए
मंत्री: जो आज्ञा महाराज।
(background music सभा विसर्जित हो गई सुनकर यह आदेश शिवदासो में भी तुरंत पहुंच गया संदेश)
(गहेरु सभा समाप्त होती है राजा सहित सभी सभाकक्ष से चले जाते है।)
(तालियों की आवाज)
आया वसंत का पर्व music
राजा सहित सभी नंदन वन में -
राजा: हे वीर! नंदन वन की शोभा को देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है। जैसे इन्द्रराज और बसंती वाला को प्यार हुआ, पक्षीओ को देखकर ऐसा प्रतीत होता हे जैसे बाग में स्वागत गीत बाज रहे हो
देखो! झरने हमे पुकार रहे है। आओ जल क्रीडा करे
(Play background music)
आया वसंत का पर्व
(राजा मंत्री मंत्री आनंदित होते हुए आगे बढते है, तभी सतभामा आदि नेमिकुमार की भाभीओ की आगवानी)
सभी का नाच-गाना होता है।
(Music - सतभामा और पटरानिया तैयार भई फिर हुलसाय सब खूब रही संग में. वाद्य यंत्रो की आवाज)
सतभामा: अरे देवरजी! यहा तो आकर हम रंग नही लगाएंगे।
दूसरी भाभी: अरे आकर तो हम आपसे कुछ कहना चाहते है।
नेमी कुमार: ऽ हा हा भाभी शीघ्र कहिए
Music - कृष्ण देखत रह जाते … music)
भाभी: आप शादी कब करोगी १
नेमीकुमार: जब मेरी इतनी सारी भाभीयां है तो मैं शादी क्यो करूँ
भाभी: देवर जी हमें यूँ न बहकाइए। आज तो हम सब जानकर रहेंगे।
नेमीनाथ: भाभी मुझे विवाह की इच्छा ही नही है,
(music)
भाभी: क देवर जी यदि सब संसार करने लगे तो हम मनुष्य का क्या होगा? हम कुवांरी ही रह जाएंगी।
नेमीकुमार: भाभी! सागरिया अथवा घोडी ही ध्रुती है नागया स्वतंत्र द्वय है। छोटे तो नागिया भी आत्मानुभूती करके सफल हो सकती है।
स्वामी पा
(Music)
नाटक
(Music - जेल्हा सह संगमानी गाव्यांमध्ये बांगडे में डोले)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(background में जावली आवेगी या आवाज)
(सामान्य पार्श्व गांगित)
(लीला सं शंगव का सारे आरे आंग चढूनप)
(साहित्या दीविस राखून दी)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(background music त्यावादी या आवाज)
(लीला जावली वा शंगव वादन मार्गे की उभेरा मार्ग आवाज)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(माझा पार्श्व गांगित)
(साहित्या दीविस राखून दी)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(background music त्यावादी या आवाज)
(लीला जावली वा शंगव वादन मार्गे की उभेरा मार्ग आवाज)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(माझा पार्श्व गांगित)
(साहित्या दीविस राखून दी)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(background music त्यावादी या आवाज)
(लीला जावली वा शंगव वादन मार्गे की उभेरा मार्ग आवाज)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(माझा पार्श्व गांगित)
(साहित्या दीविस राखून दी)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(background music त्यावादी या आवाज)
(लीला जावली वा शंगव वादन मार्गे की उभेरा मार्ग आवाज)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(माझा पार्श्व गांगित)
(साहित्या दीविस राखून दी)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(background music त्यावादी या आवाज)
(लीला जावली वा शंगव वादन मार्गे की उभेरा मार्ग आवाज)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(माझा पार्श्व गांगित)
(साहित्या दीविस राखून दी)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(background music त्यावादी या आवाज)
(लीला जावली वा शंगव वादन मार्गे की उभेरा मार्ग आवाज)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(माझा पार्श्व गांगित)
(साहित्या दीविस राखून दी)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(background music त्यावादी या आवाज)
(लीला जावली वा शंगव वादन मार्गे की उभेरा मार्ग आवाज)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(माझा पार्श्व गांगित)
(साहित्या दीविस राखून दी)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(background music त्यावादी या आवाज)
(लीला जावली वा शंगव वादन मार्गे की उभेरा मार्ग आवाज)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(माझा पार्श्व गांगित)
(साहित्या दीविस राखून दी)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(background music त्यावादी या आवाज)
(लीला जावली वा शंगव वादन मार्गे की उभेरा मार्ग आवाज)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(माझा पार्श्व गांगित)
(साहित्या दीविस राखून दी)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(background music त्यावादी या आवाज)
(लीला जावली वा शंगव वादन मार्गे की उभेरा मार्ग आवाज)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(माझा पार्श्व गांगित)
(साहित्या दीविस राखून दी)
(माझा का मार्गाने जाऊन घेते)
(Back ground Music. . . . . .) 2 min..
श्री कृष्ण: - नेमी के रहते हुए मेरा राज्य निष्कंटक नहीं जान पड़ता।
सत्यभामा: (हंसकर) सत्यभामा के मुख से मेरी इतनी - सी प्रशंसा उसे सहन नहीं हुई। वो मेरी विभूति को देख मुझसे जलता है। (मन में सोचते हुए…)
बलराम: (आज उसने इतना तांडव मचा डाला तो किसी दिन मुझसे मतभेद होने पर युद्ध के लिए भी तैयार हो जायेगा। और वह मुझसे बलशाली है और अपने आगे मुझे कुछ नहीं समझता है। पर… ये क्या बात हुई यदि सत्यभामा ने अपमान किया था तो मुझसे आकर कहता।)
नेमीकुमार: - भाभी के छोते से मजाक पर मैंने आज जो व्यवहार किया। क्या वो उचित था? और भाभी ने मुझे बलहीन कहाँ कहा था वो तो खाली अपने पति की प्रशंसा कर रही थी।
सत्यभामा: - मेरे जीवन को धिक्कार है। मैंने कुछ भी नहीं सोचा और जो मन में आया कह दिया।
श्री कृष्ण: - और फिर पटरानी को कोई धोती धोने का काम देता है क्या? क्यों किया उसने एसे जब वहाँ हजारों सेवक खडे थे। अस्त्र-विद्या की पटरानी को कोई धोवन का काम बताता है क्या?
श्री कृष्ण: - अरे नहीं। मैं एसा क्यों ये सब क्या सोच रहा हूँ। नेमी तो मेरा प्रिय अनुज है। हम दोनों में भेद ही क्या है।
सत्यभामा: - यदि युवराज के मन में मेरा कोई सम्मान नहीं रहा तो न जाने प्रजा भी मेरे बारे क्या सोचती होगी। कृष्णराज भी तब से कितने चिंतित दिखाई देते हैं।
तबतब
नेमीकुमार: - अन्याय… (रुककर) ये अन्याय नहीं तो और क्या है? अपनी वीरता दिखाने के लिए, खुद को महावीर कहलाने के लिए आज मैंने व्यर्थ ही कितना तांडव किया। जनता, पशुपक्षी सभी के मन में भय उत्पन्न कर दिया।
श्री कृष्ण: - युवराज भी क्या सोचते होंगे। लेकिन मैं क्या करूँ राजनीति कहती है कि कभी किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए। चाहे वो पुत्र हो या भाई। अवश्य ही एक दिन सुख स्थान में नेमी से लड़ना होगा। क्यों न एक बार ही अखाड़े में अपने और नेमी के भुजबल का नाश करके। ही स्थायी कर लूँ।
(Back ground Music… बाजा बजने के साथ।)
(दरबार का दृश्य)
श्री कृष्ण: - ऐसा अहसास होता है। कि हमारे शासन में चहुंओर शांति है। इसलिए अब कोई मुकदमा और पेशी नही।
सैनिक मंत्री: - उचित कह रहे हैं महाराज।
श्री कृष्ण: - अरे। नेमी तुम इतने उदास क्यों हो। तुम्हें उदास देखकर मेरा मन भी उदास हो जाता है। हम चाहते हैं कि हम सब पुनः उपवन में चलें। आज जब क्रीडा नहीं करेंगे। भुककर घुमायेंगे, दंडबैठक कर ओर कुश्ती लडेंगे।
(दरबार का दृश्य)
श्री कृष्ण: - ऐसा अहसास होता है। कि हमारे शासन में चहुंओर शांति है। इसलिए अब कोई मुकदमा और पेशी नही।
सैनिक मंत्री: - उचित कह रहे हैं महाराज।
श्री कृष्ण: - अरे। नेमी तुम इतने उदास क्यों हो। तुम्हें उदास देखकर मेरा मन भी उदास हो जाता है। हम चाहते हैं कि हम सब पुनः उपवन में चलें। आज जब क्रीडा नहीं करेंगे। भुककर घुमायेंगे, दंडबैठक कर ओर कुश्ती लडेंगे।
नाटक
नेमिकुमार: आता की सुझाव आने तक समझ ही नहीं पाये। उसे में बहते अपना रास्ता लिखित कर नहीं पाने पाता। आता चुलबे नहीं कर अपनी शक्ति आपमाना पाहते ही।
नेमिकुमार, रीतुभा से लहोते हुए: नहीं आता! मारी-मारी में कुशती हो में कोशिश नहीं किया।
अरी कुला होसने हुए: ओहे! नेमी दम साच-सुच थोडे। होमार जाई हुई। दम तो बास मनोविज्ञान के लिए ही कुशती लेडे गो।
नेमीकुमार: नहीं आता, मारी-मारी में लड़ाई किया मी हो जोमा नहीं केली। केले क्षी में राता शांत निराकुल रहना चाहता हुई। लुके भाई-भाई दोनों रुक जोमी ही पतित होती हो आप तो मेरे के मारी यादें कुला के छलमुजा हो ये बाजा आपका है और आपका ही रहेगा।
मंत्री: नेमिकुमार राही रहते होई महाना मारी-मारी में लड़ाई किया-मारी मन को प्रवाह नहीं चलती।
मंत्री: नहीं! आपलोग न में।
मंत्री: पर नेमिकुमार पूरी आशा थाई उपायित है इसम सभी अपनी का प्रश्न नहीं लाहते हुई।
मंत्री: भाई-भाई न बादे में तो दीक है। पर हमें तो आवसर है।
(मंत्री आशा में उपायित: - इस-2 हमें तो आवसर है।)
नेमिकुमार: आई आप लोगों की जैसी ही उत्तर है तोपन में लोग की मत आवश्यकता है आवश्यकता है निर्दिष्ट में इस तैर को हिलाकर त्या दिशा दीपित। (सभी होसने हुई)
(मंत्री आता है और कोशिश करके गीर बाना है।)
मंत्री: नहीं! आता है लगात है आते में जन करिया।
मंत्री: पहले इंटर कीटक जाता है, पुनाप लागू है। किन उसक ऑडियो से की शिक्षा चरता है। निर्दिष्ट इसके दायर रो, तिर दोनों दायरों के और गीर बाता हुआ।
नेमिकुमार: आता… भात…
प्रियंका: आओ नेमि उनाओ। थाकुमा भुवाव आवजी वीरता व दिखा दे देखार मन हमसनु दे गया। उचानु भी भान हुआ कि माप खुला हो गये है। उन: आपके विवाह के सम्बन्ध में सोचना-पाकुसिया (शोर-शोर: आमिया, थोड़े-थोड़े द्वारा गाना) (नेमि शामिल हुआ) मुझे आपना उत्तर मिल गया है नेमि, अब आप आ सकते है। (राती शंकर)
(गुजल के लिए का दरवार, कुछ समय बाद)
प्रियंका: महराज (ध्या गोविंदर)
पिता: प्रणाम स्वीकार करे वासुदेव।
कृष्ण: महराज 'आपने हमारे अग्रज नेमीश्वर के बारे मे तो सुना ही होगा, वह हमसे भी बलवान, वीर्यवान, परमशौर्य और इसी भव से मोक्ष जाने वाले तीर्थंकर होने जा रहे हैं। वह अभी भी अविवाहित हैं। आपकी पुत्री राजमती के लिए सर्व श्रेष्ठ, योग्य वर, आपकी पुत्री राजमती भी उनके योग्य है। अतः यदि आपकी सहमति होती तो —
पिता: (बात काटते हुए) यदुराज-- ये हमारा सौभाग्य है नेमीश्वर सा श्रेष्ठ वर राजुल के लिए वर रूप में प्राप्त हो रहा है। मतलब ये अहो भाग्य, हम अभी राजुल को यहाँ बुलाते हैं। और उसकी राय भी जान लेते हैं, ये लीजिए (इशारे से) राजुल भी यहीं आ रही है।
श्रीकृष्ण: राजराजमती राजमती, हम राजकुमार नेमीश्वर के लिए आपके पिता से आपका हाथ मांगने आये हैं। क्या आपको यह संबंध स्वीकार है। (घर में घुसते हुए जय जयकारे रंजीत)
ग़जुलय (शारदा): चरण क्षत्री नेमीश्वर मेरे अपने सें। पर वो दिन आयेगा कब। देखो तो, तुम्हें नही लगता कि सूर्य बहुत धीरे-धीरे चल रहा है।
(बशी): नही तो
ग़जुलय: तो फिर मुझे ये दिन दो-दो दिन जैसे क्यों प्रतीत होते हैं।
दासी: कुछ खालो राजुल
ग़जुल: ओ सखी पता नही मुझे कुछ अच्छा क्यों नही लग रहा। मन इतना चंचल हो गया है, अभी मैं उससे मिली। नहीं मैंने तो उसे देखा तक और सुना है तो यदा इस से ही प्रेरणा करता हूँ।
(Back Go Music)
राजुल: मेरा मेरा मन वश में स्थित, यह सुन और मन नेमी में रम गया हुआ है। प्राणनाथ नेमी के बिना अब मैं जी न सकूँगी। देवता ये बात किसी से कह मत देना। क्या तुम इसे बुला सकती हो? मैं मैं तो यूँही ही कह गई, तुम उसे कैसे बुलाओगी क्योंकि वो तो मेरे मन में ही छुपकर बैठे हुए है।
सखी: कैसी होगी राजुल, वे तो है बहुत शान्त, गम्भीर और बहुत बड़कीभागी हैं तब तो हमारा मिलन कितना सुंदर और जीवन कितना सुखमय हुआ होगा।
(MUSIC…)
सखी: मै उसे दिन को तरसा करता, जब बाला का संगम होगा मन शकुन, शान्त, सहज होगा - कितना आनन्दित वह होगा।
राजुल: किस प्रकार विवश हो जाऊँ मैं, जीत की रफ़्तार प्रेमामृत से भरी हुई आंखे, तभी तो रोकेगी।
सखी: स्नेहमयी हम दोनो की आंखे जब 4-प होगी, बाते होगी, चाहेगी होगी, किडाये बार-बार होगी।
राजुल: स्वामी तुम मेरे मन में छुपकर क्यों बैठ गये हो। सामने आओ, मैं तुम्हें कैसे देख पाऊँगी?
(music बजने दे (तबले की voice—) (गीत) समय बीता।)
आखिरकार वह दिन आया ही गया।
बाजे है ------ music (B.G. Voice…)
(पशु की आवाज)
नेमी: अरे भाई जरा देखो तो ये पशुओं की करुण आवाज कहा से आ रही है, ये तो पशुओं के घर लौटने का समय है।
सखा: युवराज, आपकी बरात निकल रही है। अतः यदुपति कृष्ण के आदेशानुसार इन सारे पशुओं को रोककर रखा है।
नेमी: लेकीन श्राता श्री ने ऐसा क्यों किया है, वो जानते है ये उचीत नही है फिर भी…
मन क्यों सोचते हस
नेती: आ: तेरे रहते धाता श्री को अपरा शब्द बिल्कुल नहीं जान पड़ता। इसलिए उन्होंने मेरे सामने वैराग्य का निसंग उपस्थीत किया।
विस्लेहम नेमी डु: जो भी हो। इतने बंधन और रुदन का कारण एक मात्र मैं ही हूँ। उसका उत्तरदायी भी केवल मात्र मैं ही हूँ। देखो। कितनी व्याकुलता ताल रही है, उन व्याकुल पशुओं की आँखो में। क्या सुख होगा? सोचो तो हिंसा के इन प्यालो में। और क्या फर्क पड़ता है कि निमित्त बना है क्या बनाया गया है। यह संसार स्वार्थमयी है। ये बात तो सत्य ही है। इन पशुओं के बंधन और क्रंदन,… पशु तो सत्य हीन है। वसिलीघ के वश होकर हम संसार में सुख मानते है। पर संसार में सुख है कहाँ?
(Music…)
नेमी: आज मैं इसी समय अविचल सुख को खोजुंगा। गर्मी, सर्दी, आँधी ओलो की ओर न कंपित देखुंगा।
दास: महाराज। महाराज की जय हो।
क्या हुआ?
दास: पानी का केन्द्र देखकर समिन्दर मे भयानक ज्वाला का देखा। और अपने रथ सिपाही की और लौट लिया।
राचुल: मैंने प्रण ठाना राचुल प्रियवर के मै हमेशा के लिए एक हताश इस देश से इस बंधन को तोड़ कर कही दूर इस छोड़कर चला जाऊंगा।
(राचुल गिर जाती है।)
राचुल की माँ: राचुल - राचुल … मेरी बेटी को। क्या हुआ इस अचेत हो गयी। उठो राचुल बेटी। सब जाते है कि नेमी इसी रास्ते गये। जब नेमि के घोड़े राचुल को स्नेह से देखकर करुणा करेगा वह आयेगा।
राचुल: छोडो उसे विवाह जंजाल नही। अगर नेमीं वो बरात लेकर भी आते जाते, उसे देख लेते। तो उस से मेरा हदय क्यों कर उसे नेमी कहता। उनके देखकर कर जो कंपित होता है, राचुल का क्या होगा?
राचुल की माँ: व्याकुल मत हो बेटी। वैराग्य होतो हो सकता है। पर लड़कीयो मे तो इतना नही।
प्रेअक्षर्ग की समझाइष का जानी की वैराग्य भाव को कैसा स्थीर किय उस स्थीती हो गया।
राचुल: नही माता वो वैराग्य क्या कर सकते। वो तो वैराग्य के धन्य क्या उन्होने एकबार भी नही सोचा, कि मेरे सपनो का क्या होगा ए मेरा क्या होगा?
नेमीनाथ (स्वपन में)
राचुल: इस तरह अर्धागिनी होना आत्महित का सद्मार्ग दिखाना। रोग, धोना, व्याकुल होना है समस्त कार्य का काम नही। जब मैं बारात लेकर आया तब रागी था अनुरागी था। क्षण में अबुध अनुराग भरा और आप वीतरागी हूँ मैं। मैने न कोई घोडा दिया साथी की मैंने हठ की थी सब बात उद्गम पकडी थी मन से पूरी तैयारी थी। मगर इस रागभाव का मर जाना ये कोई असंभव काम नही। रागी से वैरागी होना यह तो कोई अपराध नही। न धोखा है न छद्मप्रपंच इसमे है कोई पाप नही। अब क्या होगा कैसे होगा इसका जिसको भान है।
राजुल: तो ठीक है मैं भी दीक्षा धारण करुगी आप के पद चिन्हो पर चलकर आपके आत्मालायी बनूँगी।
नेमीकुमार: दीक्षा… ही… वैराग्य का फल है राजुल ये सच्चा वैराग्य नही है तुम मुडो पति समझकर मेरी अनुगामी बनना चाहती हो ये तुम्हारा मेरे प्रति तीव्र मोह है इस बात को समझो मैं तुम्हारा कुछ भी नही मैं एक दिगम्बर सन्यासी हूँ।
राजुल: पर हम तो पिछले नौ भवो के साथी है न।
संगीनाथ: सम्बोधित होना, भव से डरेंगे गौरव की बात नही भव का नेव
सजाव बरना देवी ये हैं गोरख की बात सही। (ताली)
ये राग भाव तोडी राजुल भव की चक्की डा अंत उने में अधिक बहूँ क्या हे राजुल इस भव के भव का अंत करो।
राजुल: नाथ मैं भी।
राजुल की माँ: -
राजुल: क्या हुआ मेरी।
राजुल: माँ मुझे नेमीश्वर दिखाई दिये। नेमीश्वर।
माँ: नेमीश्वर दिखाई दिये?
राजुल: हाँ माँ वह रह रहे थे में अपने में पूर्ण है। तुम भी अपने में पूर्ण हो तुम किसी की कुछ नही हो शुद्धातमा हो अविकारी हो। पर की आशा छोड दो अपने आप को अपनाओ बस अपना ही ध्यान करो।
माँ: सत्य ही कह रहे थे।
राजुल: हाँ सत्य ही कह रहे थे मुझे भी रम्य संतुष्टी का अनुभव हो रहा है। पर पराया में उनके बिना रह पाऊँगी।
आना: सपने में
माँ: बेटी जो होना था सो हो गया। अब तो धैर्य धरो धैर्य धरो बेटी।
आना: जो होगा
माँ: राजुल जिस समय जिस कारण जिस विधी से जो होना होता है वैसा ही होता है। अनहोनी कभी नही होती होता वही है जो पहले से सुनिश्चित हो बस हम ही नही जानते। तुम्हे इस महासत्य को स्वीकार करना ही होगा। जो भी कुछ हुआ है वो पहले से ही सुनिश्चित था।
राजुल: हाँ माँ। मैंने इस महासत्य को स्वीकार कर लिया कि जो होना होता है वही हुआ है। पर क्या करूँ मैं ये भी तो सत्य है कि जब नेमी की याद आती है। तब आपकी सब बाते विस्मृत हो जाती है। मेरा हृदय फटने लगता है चाहकर भी मैं उन्हे भूल नही पाती।
माँ: मन को तो समझाना ही होगा। नेमी की परणती शुद्ध हो चूकी है वो अपने आप में ही लीन है और वितरागतातीत हो चुके है। अब तुम्हे अपने बारे में विचार करना होगा। जब भगवान् के ज्ञान में एक क्षण वैराग्य की बात आई तो तुम्हारा विवाह निश्चित होगा। ये भी तो तुम्हे पता होगा।
राजुल: नही माता आप से मैं कैसी बात कर रही हूँ मैं अब से कभी शादी नही करुगी
माँ: नही मै पहली आप की बात कर रह हूँ बेटी अभी तक तुम्हारी पहली शादी हुई वो गलत है पति पत्नि के सात फेरे पुरे हो जाने पर माने जाते है छः फेरो तक बेटी तुम्हारी रहती है यदि किसी पुरुष का विवाह न हो पाये तो किसी रोग वस से विवाह किया जा सकता है के ये सर्व मान पारंगत है
राजुल: परंया कुछ भी हो पर अब में विवाह नहि करना चाहती है
माँ: विवाह नही करना चाहती हो ये तो तुम कहती हो परन्तु सच तो ये है कि अभी नेमी के बाद है तो माँ को व्याकुल हो जाते हो, बडी लगन में अभी वैराग्य के योग संयम नही है, एसे में विवाह करना ही उचित है
राजुल: नही माँ मुझे विवाह करना निश्चित नही में संयम धारण कर सकती हूँ इसके योग में अपने आप को वनयोगीणी
माँ: राजुल ये इतना सरल नही है बेटी तुम शांति से सोचो विचारो किसी भी निर्णय पर पहुंचने की जल्दी मत करो अपने चित को स्वास्थ होने दो फिर भविष्य को निर्णन करो।
जमा: ठस
(राजुल पिता के पास जाती है)
राजुल: पिता जी प्रणाम
पिताजी: आओ बेटी आओ
राजुल: पिता जी मैने बहुत विचार किया कि में अब विवाह नही करुगी मैने निश्चय कर लिया है कि में संयम धारण कर गिरनार जाउगी
नाटक
माता: बेटी तुम गिरनार हो बगो जाना-वादती हो उसी लिये ना वि नेमीवार भी वधाँ उरा ई-ग अन्युत बेनी ने ते रागई वे रागयन्ही अपुल आना
सीता: हे रवामिन् थाडे आपडे मुडे व्याडला हे था वे विरनि आमिडो। दे संध में थोड देने अच्छा कुसी धामिडु स्वाल था लिच्छिक्र पर धी वेज देने वराँ में धावियान ने ऊटी।
(सीता का गमन)
उम झुरप्पल दे आते हैं।
सीता की दीक्षा
पुरुषभाई दीक्षा: आद्यामें कायलांग
सीता: हे निवे! लेमेनी ज्ञान अन उमारां के बेटे थे उमे आपने विरासत दे उस आ ने गा आ नहीं! अब मैं आपडे लाभी नहीं राखूँ बे नहीं राखूँ
आम: मुझे आपने जब दे विरासत में उन्हारा ना बे राखूँ तो आपने विरासत दे वारा राखूँ
सीता: नहीं, आपने जब दे विरासत नहीं दे रहे तो मैं भी उसे नहीं लेना चाहती। आज से मैं अपना पथ चलूँगी।
आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। वचनबद्ध राम।
सीता: (विभीषण-सुग्रीव-हनुमान् को) स्वामी, मुझे स्वीकार है। निसन्य स्वामी क्या मेरे जी अब आपके चरणों की पवित्र-रज को छूने आपके देह के दर्शन भी अब मेरे भाग्य में नहीं। बार बार सामान्य मनुष्य क्या सोचेगा कि मैं वर्षों तक रावण के यहां रही, सती हूँ? यह मेरे मुख से स्थायी कही बातें भी उसे सच्ची नहीं लगेंगी। मेरे ही कर्म के उदय से जी के किये गये इस कार्य को मैं अपनी परीक्षा मान कर ही मैं सन्तोष मानूंगी। ना धर्म है। नहि व्रत…
आपके पैरों में (तभी वहाँ से एक मेघवेहन नाम का मुनिराज का देव भक्तभूषण मुनि का उपदेश सुन तत्काल ही महोत्सव मनाने के लिए महेन्द्र नाम के अधिपतियों के उद्यान में जा रहा था। तभी उसने अपने नयनों से अवलोकन किया तो जाना कि सीता निर्दोष है। फिर मैं भी आकर उसके चरणों को कमल में परिणमित नमस्कार कर दिया। (और आपके परीक्षा सफल हुई।))
पक्षिमा का जयजयकार सीता की प्रशंसा
प्रजाण के…
राम: हे सीते! अजान को अब तुम्हारे ऊपर पूर्ण विश्वास हो गया है। अज्ञान बैठेही मुख में तुम्हें स्वीकार करता हूँ और अयोध्या में तुम्हारा तिरस्कार करने से जो जाने के बाद मैं तुम्हें लेकर घर भी नहीं सकता हूँ। और अब मैं जब तक (जाऊंगा) जाऊंगा जब तक राज्य में नहीं रह सकती
राम: मुझे क्षमा कर दे सीते। मैंने तुम्हारे साथ बहुत बडा अन्याय किया है। इस मेरे साथ महल में प्रवेश करो।
सीता: स्वामी, मुझे आपका यह तो मेरे पूर्व (उसमें) कोई भी भूषण नहीं है। फल है। जो मैं अपने कर्मों का ही आज मुझे भोगना पड़ रहा है। जो आप
सीता कि अग्नि परीक्षा? या विभीषण-सुग्रीव-हनुमान् कि (Oway)
तीनों मिलकर कहते है कि हे पुरुषोत्तम आप के बिना सीता बहुत दुखी है। आप उसे अयोध्या बुला लीजिए।
राम: मैं जानता हूँ सीता सती है निर्दोष है। परन्तु मैंने उसे लोकपवाद के कारण घर से निकाला था। उसे वापस कैसे बुला लूँ। यदि वह कुछ अपनी निर्दोषिता का प्रमाण दे तो मैं उसे अपने घर में बुला लूँगा।
तीनों आज्ञा स्वीकार करते हुए सीता को पुष्पक विमान में बिठाकर अयोध्या ले आते हैं। तब राम चकित हो देखते हैं।
आने को कैसे कहते थे?
राम: हे सीते! मेरे सामने से दूर हो। तुम यहां क्यों आई हो? इतने दिन रावण के घर यहां रही अब मैं तुम्हें अपने घर में कैसे रख लूँ? घर में कैसे रख लूं? कैसे मैं तुम्हें निर्दोष मानूँ? तुम्हारी निर्दोषिता का क्या प्रमाण है? मैं अपनी सभा- तो आप ही बतइये निर्दोषिता का प्रमाण कैसे दूँ।
राम: हे सीते! प्रजाजन के समक्ष तुम्हें पवित्रता के लिए अग्नि परीक्षा देनी होगी।
महलों में निवास करने वाली, तुम्हारी ये दुर्दशा मुझे हुए।।
हे भ्राता!
राम: वह चली गई
लव कुश का दुःख ? लव कुश का जन्म
लव कुश कि शिक्षा
कुंदक सी सिहानी के द्वारा लव कुश को ढूँढा।
कुंदक: ? हे सिहिनी आज हम णमोकार मंत्र कि महिमा श्रवण करेंगे।
लव कुश का युद्ध ? काव्य
(इसी बीच नारद (Oway) भिखारी लक्ष्मण से कहते हैं।)
(भिखारी) नारद: हे लक्ष्मण यह तुम्हारे भ्राता राम के ही पुत्र हैं। भिखारी के पुत्र। अपने कुटुम्बी जनों से युद्ध सही क्या करें।
राम व कुश का मिलन? अयोध्या लौट गये।
(राम का मंत्री परिषद् से सलाह वार्तालाप)
राम: कहिए सेनापति जी मंत्री जी अब क्या किया जाए?
मंत्री: हे राजन्। एक राजा का यह कर्तव्य है कि वह प्रजा के हित में न्याय करे। राजा को यह दायित्व है कि वह एक निष्पक्ष निर्णय ले।
विशुद्धि: (विशुद्धि सीता व सेनापति का कुल-वधू-शीतलाप वाला आर्जव का इशारा करते हुए)
सीता: हे सेनापति! अवधेश ने करना तो निराकार लोकापवाद के कारण आपने मुझे छोड़ दिया उसी प्रकार आप स्व धर्म को न छोड़ दे।
((सीता व सेनापति का वापिस गमन))
((दुःखी संगीत))
((सीता व लवकुश का मिलन → लवकुश को वृतांत बतलाना))
लवकुश: (सोचते हुए) यह तो मुझे अयोध्या की महारानी जानकी जी प्रतीत हो रही है।
((पाश जाकर पूरा वृतांत सुनकर) हे भगनी तुम तो)
काव्य द्वारा वृतांत
→ (राम के मन की विडम्बना)
काव्य =>
राजा के समक्ष कहने की क्या धृष्टता करे?
राजदरबार का दृश्य =>
राम सिंघासन पर बैठे हुए तथा दरबारीगण भी बैठे।
राम: मन्त्रीवर। प्रजा में सब कुशल मंगल है।
मंत्री: (चिड़ियाते हुए) रामराज्य में तो युग मंगल ही होगा महाराज। यन्त-तत्र सर्वत्र सम्पूर्ण राज्य जय श्रिया युक्त है और आपके आगमनम् से प्रजा में आनन्द का वातावरण है।
राम: और आप सभी को किसी भी तरह की समस्या।
मंत्री: (बीच में टोकते हुए) - नही सम्राट आपके राज्य में किसी चीज की कमी नहीं।
दरबार: (राम मन में विचारते हुए) अरे! ये क्या हो रहा है, जो मेरे प्रश्नों से धुपई जा रही है। अन्यथा मंत्रीगण चिन्तित तो दिखाई पड़ते।
(दरबार समाप्ति की घोषणा)
(गुप्तचर का प्रवेश)
राम: कहो। क्या समाचार है।
गुप्तचर: (हिचकिचाते हुए) मैं क्या कहूँ महाराज? कहना उचित नही है परन्तु आपसे समक्ष अपने दायित्व को निभाते हुए वृतांत कहता हूँ। सुना हुआ
लंका पर विजय
सूत्रधार: लंका पर विजय प्राप्त कर राम-लक्ष्मण सीता के साथ संघ में प्रवेश कर रहे है तथा उनके आगमन की खुशी के उत्साह में प्रजाजन उत्सव मना रहे हैं।
राम-लक्ष्मण सीता का प्रवेश।
स्वागत कार्यक्रम।
बाजार का दृश्य
धोबी-धोबिन का वार्तालाप
लोग: परायें घर से कुड़ कर आई स्त्री को हमारे अपने घर में रखना उचित नहीं है।
धोबी: सत्य ही कहते हैं लोग! (क्रोध में) मैं तुम्हें शरण अपने घर में शरण नहीं दूंगा।
धोबिन: मैं जो चार दिन रह-कर आई? तो आप सभी चार बात सुना रहे हैं और जो वो अवधकुमारी छह माह लंका में रहकर आई उन्हें सब माफ है। उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। वो उनके पति ने कुछ नहीं कहा।
सूत्रधार: (प्रजा में बात आग की तरह फैल रही है)
प्रजा: वो तो राजा हैं, सरायौ घर से भाई उन्हें कैसे रख लिया।
स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि)।
प्रूफरीडिंग बाकी है