नाटक
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अनुक्रमणिका
| क्र. | विवरण |
|---|---|
| 1 | नाटक |
| 2 | जय जिनेन्द्र |
| 3 | पाठ परिचय |
| 4 | जैनत्व |
| 5 | नाटक: जीव है सो मैं ही हूँ। |
| 6 | काव्य |
| 7 | मि गिजा |
| 8 | सिद्धान्त |
नाटक
जिनमंदिर भिक्षालय नहीं शिक्षालय है।
पात्र:- (i) विद्यार्थी, (ii) बेरोजगार,
(iii) व्यापारी, (iv) भक्तवर चोर,
(v) युवा, (vi) श्रावक।
-
विद्यार्थी:-
O MY God! goodmorning
हे प्रभु! आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए।
मुझको कुछ आता नहीं, फिर भी पास कोशिश।
हे भगवान्! देखो, आपको पता है कि
कि मैं क्रिकेट का फैन हूँ और अभी भारत-
पाकिस्तान की श्रृंखला चल रही है। लो समझलो
कि भारत की इज्जत दांव पर लगी है। अतः
मैच देखवा बहुत ही जरूरी है और आपको
तो पता ही है कि बोर्ड की परीक्षा सिर पर
है। पढ़ाई तो हो नहीं पा रही है। पढ़कर करूँ कि
मैच देखूं। तो हे भगवान्! सम्हाल लेना। मेरी
इज्जत आपके ही हाथों में है। मैं अपनी पॉकेट
मनी में से 21 रू. दानपात्र में जरूर डालूंगा।
याद रहे भगवान्। भूल मत जाना।
Goodby! -
व्यापारी:-
अति क्रुद्ध उपमम्, आया।
सौ-सौ की गड्डी पाया।
चारे मंगल, सोना मंगल, चांदी मंगल।
रुपया मंगल, झट मंगल।
हे भगवान्! आप नाराज क्यों हो
गये हो। इस बार बिल्कुल भी सीजन नहीं
चल रहा है। अरे! आपको चौबीस घंटा सब
इतनी भी कमाई नहीं हो पा रही है। अरे!
जब आप खाने-खाने को नहीं मिलेगा तो
हम आपको क्या चढ़ाएंगे? भगवान् जब जरा।
आप दयानिधान हो। हमारी दुकान अठ्ठाईस
लाख जाए और उसमें मन हो जावे। भगवान्
अभी वह बात पक्की रही है। अभी मन हो
आपके आगे। 108 जोखाए विधान कराऊंगा। अब
तो अठ्ठाईस पार्श्वनाथ हम तुम्हारे ही भरोसे है। -
भक्तवर चोर:-
हे भगवान्! आप तो सर्वज्ञ
हैं। मैंने जो अर्जी लगाई है। आप तो समझ ही
गये होंगे। समझो न हो तो भगवान् मैं फिर
से बता रहा हूँ कि मैं तो खुर्राखुर्रा चोरी के
चक्कर में पकड़ा गया हूँ। लोगों ने कह दिया
है कि मैंने एक लाख रुपये की रिश्वत दी है। मगर
रात की बात बताऊं भगवान् भी तो दो लाख
की है। पर आप ही इस झंझट मुसीबत से
छुड़ा सकते हो। अगर मैं कोर्ट में बाइज़्ज़त
बरी हो गया तो 10% आपको दूंगा व 25% साथ
ही चढ़ाऊंगा भी।
-
बेरोजगार:-
इधर-उधर देखते हुए…
वाह! भगवान् वाह! आपके मंदिर में फर्श मार्बल
का, दीवारे पर वॉलपेपर, वेदी पर सोने का पेंट
हम चन्दादि चांदी के क्या कहना भगवान…?
उपरीचही भगवान् के पास सत्ता परिषद् और
हम में आपका भक्त बेरोजगार घूम रहा हूँ।
किसी से मत कहना भगवान् ये इस भी मैंने
इसी की पहन रखी है। अरे भगवान्! कुछ तो
सोचो हमारे बारे में, हम जैसे बेरोजगारों पर
कृपा करो। बस हम दोले-दोले नौकरी दिला दो
भगवान्! पहली वेतन आपको ही चढ़ाऊंगा।
ज्यादा क्या कहूँ भगवान् और हो बाप समाज
से भय लगे। -
युवा:-
तुमसे लागी लगन, ले लो अपनी शरण।
पारस नाथ, तुम तो करता हो ख्याल हमारो।
हे पारसनाथ भगवान्! मैं कल से
रविवार का व्रत कर रहा हूँ। पर बाप से कि
सुनते ही नहीं हो। अरे मैं एक शादी ही तो
कर रहा हूँ। भगवान् आपकी ही कृपा से
पड़ोसियों की तो 96-96 शादियां हो गई
मुझे एक भी नहीं करवा सकते? अरे! आपको
पता है आपकी शादी नहीं हुई तो क्या हुआ?
आपको पता तो करो। शादी के लिए मैंने
पार्श्वनाथ! दया करो। किसी कन्या को मेरे ऊपर
प्रसन्न करवा दो।
- श्रावक:-
अभी आपने देखा कि कितने भक्त
युवा और बेरोजगार भगवान् से अपनी-अपनी
की बातें कर रहे गये। सो तो मैंने मैंने
सर-सर ली करनी है। कुछ काले काले हैं। कुछ
दरवाजे है। भगवान् के नाम पर से और
लोग भी कितना बाजार, धर्म बाजार, भक्त बाजार
चलाते है पर देवदर्शन की विधि क्या है यह भी
एक देव से नहीं जानते है।
कोई एक:- स्वाध्याय करने से क्या लाभ है?
श्रावक:- स्वाध्याय करने से हितोपदेश, ईश्वराध्य
पुरुषार्थ का ज्ञान होता है। यह द्रव्य व भाव
तत्व का ज्ञान अनेक भेदज्ञान से सम्यग्दर्शन
प्राप्त होता है।
सभी एक साथ:- भैया आपने तो
हमारी आंखें खोल दी।
श्रावक:- भैया आप सब लोग भी रोज मंदिर
भगवान् के पास आते है लेकिन भगवान् बोले
है और न देते है। हम लेते है ये तीन लोक
अथवा हमारा नहीं। सम्यक् देवदर्शन नहीं, सम्यक्
फल मिला फिर वो धर्म से दूषित हो रहे है।
हमसे पछतावा कौन है? अर्थात् कोई नहीं।
जय जिनेन्द्र
पाठ परिचय
धनिया - धोबी
अगम - शान्त प्रकृति का युवक
सन्देश - पंडित जी
दिलीप - शिक्षित, उद्दण्ड प्रकृति वाला युवक
विनय - विद्वान् मित्र
(धोबी इंसान - धनिया मनुष्य का है)
धनिया - धनिया धोबी मेरा नाम,
कपड़े धोना मेरा काम।
मैले को भगाऊँ, दाग को मिटाऊँ, कपड़ों को चमकाऊँ
हो … हो … धनिया धोबी …
(प्रवेश करते हुए) - ये तो लोग कितने
गंदे कपड़े कर लेते हैं। इन्हें धोते-धोते मेरे
पप्पू की अम्मा आधी घिस गई है।
दिलीप (आते हुए) - ओ भइया धनिया।
धनिया - कहिए भाई साहब क्या सेवा करूँ?
दिलीप - अरे भई, मैं परसों रुमाल छोटे को दे गया
था वह तैयार कर दिया क्या?
धनिया - अरे बिल्कुल तैयार है साहब, रुमाल
सब साफ यह रहा।
दिलीप - ठीक है लाओ इधर, मैंने बस में पकड़ा हुआ
धनिया - (नहीं भाई साहब ऐसी तो बातें नहीं
(दिलीप चार लेकर उठ कर चला जाता है)
धनिया - (प्रेरणा कर रहा है वह गुनगुना रहा है।)
धनिया धोबी मेरा नाम,
कपड़े धोना मेरा काम।
मैले को भगाऊँ ----- (मैले को भगाऊँ)
(अगम का आता देखकर)
धनिया - जय जिनेन्द्र अगम भाई साहब। आप तो बहुत
दिनों बाद नजर आए हैं कहीं बाहर गए थे क्या?
अगम - हाँ भाई धनिया। बाहर ही गया था और आज
फिर जयपुर जाना है (गम्भीरता में एक-चार कहकर
गया था वह तैयार कर दिया।
धनिया - भाई साहब, धनिया समय का पाबंद है। बाकी
नजर तो खूब से तैयार है, यह लीजिए। (चादर
उठाकर देता है।)
अगम - (कपड़ी तरह चादर देखते हुए)
ओ धनिया! यह चादर मेरा नहीं है। इसका
डिजाइन और गिनती का क्या।
धनिया - अरे बाप रे भूल हो गई, अभी-अभी दिलीप
भाई साहब यह चादर ले गए हैं उनका भी बिल्कुल
ऐसा ही था। तब मैं चादर बदल कर दे दूँगा।
अगम - अरे नहीं भइया, मुझे तो अभी रात को जयपुर
जाना है मुझे चादर बहुत जरूरी है।
धनिया - तो भाई साहब आप से क्या कहूँ? मैं
उनके यहाँ से बदलते हुए नहीं लाऊँगा।
अगम - हाँ यह ठीक है।
दिलीप (घर जाकर)
मेरे को है … दिलीप भी निकला।
(कोई आवाज नहीं आती तो अंदर जाता है)
अरे क्या भाई साहब चादर तैयार तो रहे
है। दिलीप! ओ दिलीप! (चादर खोलता है)
दिलीप (खुशी में कपड़े पहनते हुए)
कौन बेवकूफ मेरी नींद खराब कर रहा है?
अगम - अरे भइया नारायण मत हो और, मैं अपनी
चादर लेने आया हूँ।
दिलीप - निगाह भी खराब नहीं हो गया। एक तो मेरी
नींद खराब कर दी आकर, आ हा … क्या
मजा आ रहा था। इससे कह रहे हो कि अपनी
चादर लेने आया हूँ। यह कोई बढ़िया धोबी
की दुकान है क्या?
अगम - अरे नहीं भइया, मैं तो चादर तुमने चोरी
है, तो मैं लेने आया हूँ।
दिलीप - जो कर लो बात। यह साहब भी चादर
की अपनी बताने लगे, ओ हो गई, फिर क्या
है यह भी मेरा है। अरे भइया, ये चादर तो
मौसी धनिया के यहाँ से धुलवा रहा हूँ।
अगम - देखो धनिया ने ही कहा है कि मेरा चादर
चुराया है।
दिलीप - देखो एक बार में ही समझाओ कि यह
चादर मेरा है।
अगम - तुम भी अभी तक समझो कि यह
चादर मेरा है। (चादर खींचता है)
दिलीप - नहीं मेरा है (दोनों कपड़े से खींचते हैं)
अगम - मेरा है। (आपस में चादर खींचते हैं)
(इतने में विनय व ज्ञानेश का प्रवेश)
विनय - अरे यह क्या महाभारत मचा रखी है।
अगम - देखो भाई साहब यह मेरा चादर नहीं
दे रहा है।
दिलीप - बस करो! ये भाई मेरे घर पर आकर मुझे
ही चोर बना रहा है। गुस्सा तो मेरा आ रहा
कि सिर फोड़ कर रख दूँ।
विनय - चुप रहो फालतू की बातें मत करो।
अगम - मैं बताता हूँ कि तुम्हारी चादर क्यों आई है?
अगम - मैंने अपनी चादर धनिया के यहाँ धुलने डाली
थी। मैं कहा चादर लेने गया तो मेरी चादर गलती
से ले के चला आ गया।
दिलीप - अच्छा तो तुम्हारी चादर की कोई पहचान है।
अगम - हाँ यह देखो चादर पर मेरा नाम लिखा है।
(सभी चादर देखते हैं)
विनय - अरे! बस पर तो अगम का सही लिखा
हुआ है।
दिलीप - यह तो सच में इसका ही है, तो फिर मेरा
चादर कहाँ है?
ज्ञानेश - नहीं भइया। इतनी तो अभी तुम बिना दूरी है
भाव बिना बिना मोह मोह तीन के पर भी दूरी।
अगम - बस मोह नींद से क्या होता है?
ज्ञानेश - अरे दिलीप! स्वार्थ से तुम्हारे नाम को अभी
मानकर सो रहा था। ये तो हर एक मोह नींद
में शरीर, धन इत्यादि, पर पदार्थों को अपना
मानकर सो रहे हैं।
विनय - यह बात पूरी तरह समझ में नहीं आई, जरा
अच्छे तरह समझाओ ना।
ज्ञानेश - अच्छा सुनो! आप सब अपना नाम तो जानते होंगे।
दिलीप - हाँ हाँ क्यों नहीं मेरा नाम दिलीप है।
ज्ञानेश - और तुम्हारा?
अगम - मेरा नाम अगम है।
ज्ञानेश - तो तो आपने उस शरीर के नाम बताए हैं, आप
अपना नाम बताइए ना।
दिलीप - हाँ कर लो बात। बिना मैं और मेरा गरीब जन्म-जन्म
मोटी है। हम दोनों यह ही तो हैं।
ज्ञानेश - नहीं भइया। यह तो हमारी भूल है जो भाविक में
नहीं आ रही है और हम भूल के कारण ही मैं सब
गरीब आदि गरीबों के दुख उठाना पड़ रहे हैं।
दिलीप - ये बात तो समझ में नहीं आई। ठीक है
चादर में तो आपने चिन्ह दिखाकर समझा दिया
कि वह चादर मेरा ही है पर शरीर तो मैं ही
हूँ इस पर तो मेरा ही अधिकार है।
जैनत्व
दिलीप- देखो समझने से समझ में आता है समझने से नहीं। आप समझने की कोशिश करोगे तो और समझ में जाएगा। अच्छा यह बताओ कि जीव किसे कहते हैं?
उपासम- अरे जो जानता-देखता और सुख-दुःख का अनुभव करता है वही तो जीव है।
ज्ञानेश- और पुद्गल?
दिलीप- जिसमें स्पर्श, रस, गंध और वर्ण पाया जाए उसे पुद्गल कहते हैं।
ज्ञानेश- बहुत बढ़िया, आप सबको तो सब याद है।
अध्या- पिताजी तुम बताओ; तुम्हारा श्वेतांग है?
दिलीप- मेरा रंग गोरा है।
ज्ञानेश- और वजन कितना है?
दिलीप- ५० किलो।
ज्ञानेश- अब बताओ कि गोरा, काला रंग, हल्का भारी वजन, सुगन्ध-दुर्गन्ध यह सब किसमें पाये जाते हैं?
दिलीप- अभी अभी तो विनय ने बताया था कि स्पर्श-रस-गंध ये सब पुद्गल में पाये जाते हैं। मुझे इतना भी याद नहीं रहता क्या?
ज्ञानेश- तो फिर यह मुझे क्यों हो कि गोरा रंग और ५० किलो का वजन पुद्गल का है, जीव का नहीं।
दिलीप- अरे हाँ यार! ये बात तो सही है कि यह सब ‘पुद्गल’ है ‘पुद्गल’ का है। तो फिर मैं कौन हूँ?
ज्ञानेश- जैसे शरीर की अपनी पहचान है उसी तरह जीव की भी अपनी पहचान है। जो जानता-देखता हम सब जानते देखते हैं इसलिए हम जीव हैं-शरीर नहीं।
दिलीप- दूसरा बात है ज्ञानेश भाई साहब। आपने तो लपेटा में हमें जगा दिया। हम तो अभी तक शरीर और जीव दोनों के गुणों को अपना ही मान कर सो रहे थे।
ज्ञानेश- शरीर, धन परिवार को तो छोड़ो हमारे भीतर जो राग-द्वेष गुस्सा के भाव होते हैं वो भी जीव नहीं हैं, जीव का स्वभाव नहीं है।
विनय- पर उन सब कर्मों को तो हम ही कर रहे हैं।
ज्ञानेश- प्रेम हो या क्रोध हो या मोह का या माया का लोभ का या क्या दान का यह सब जैसा संयोग होगा हे बेटे! होते हैं और हमारी अज्ञानता से होते हैं।
अध्या- शरीर से पर पदार्थों के कारण होने वाले लेने से और दुःख के कारण होने से वह भी जीव नहीं है।
विनय- पर भाई साहब पुण्य भाव तो दुर्गति से भी लेते हैं।
ज्ञानेश- सुगति के पुण्य भाव होते जरूर हैं पर उनसे वह अपना नहीं मानते उन भावों पर भावों पर रहते नहीं हैं। वह उसे अपना दोष मानकर आत्मा में ही लीन रहते हैं।
उपासम- आज तो आपने भेदज्ञान का बहुत ही सुन्दर स्वरूप समझाया है पर यह भेदज्ञान होता कैसे है?
ज्ञानेश- जब हम प्रतिदिन स्वाध्याय करेंगे, चिंतन करेंगे, मनन करेंगे, तत्व का अभ्यास करेंगे तो यह भेदज्ञान अवश्य एवं जल्दी ही होगा।
दिलीप- तो क्यों न हम सब कुछ समय में अध्या जब तो आप विनय के साथ ‘ज्ञानेश’ स्वाध्याय में जुड़ेंगे।
अध्या- मैं तो जाऊंगा ही और मुझे भी साथ में ले चलूंगा।
प्रियंका- क्यों नहीं मैं भी जरूर चलूंगा।
ज्ञानेश- ये देखकर मुझे बात (भाव) हम सब भेदज्ञान प्राप्त करके मोक्षमार्ग में बढ़ेंगे। औषध में पुण्य-पाप के भाव आते तो उन्हें अपने नाशवान स्वभाव कर मुक्ति मार्ग में बढ़े चलेंगे।
धनियांव- (देखकर मोटे हुए) अरे मद्रास! यहाँ संसार में ही छोड़ दोगे क्या? हमें भी तो साथ में ले चलो।
ज्ञानेश- अरे भइया! शिवाजी तो हम सबको मुक्तिमार्ग में चलने का आमंत्रण देते हैं।
चलो हम सब करें सब मिलकर गाएँ
मुक्तिमार्ग प्राप्त कर बढ़े चलो बढ़े चलो।
दुःख न एक क्षण कभी बढ़े चलो बढ़े चलो।
मैं विचार मार्ग में बढ़े-बढ़े कर लायेंगे।
मोक्ष सुख का बना, उसे सदा दिखायेंगे।
फिर अनुज समझ कर बढ़े-चलो बढ़े-चलो…।
शुभकर्म प्राप्त कर बढ़े चलो बढ़े-चलो।।
महावीर भगवान् की जय हो।
नाटक: जीव है सो मैं ही हूँ।
एक लेखिका - अ.ज. अरसी जैन
पात्र - दस सिद्धांत
पहला मित्र - चलो भाई! कहीं तीर्थ वंदना को चलते हैं।
दूसरा मित्र - हाँ भाई! विचार तो बहुत अच्छा है, चलो चलते हैं।
तीसरा मित्र - पर मित्र! ये तो बताओ कौन-से तीर्थ चलने का विचार है?
चौथा मित्र - सुरातोदियान के पार्श्वनाथ भगवान् के दर्शन करने बनारस नगरी चलते हैं।
हाँ सभी मित्र एक साथ - हाँ-हाँ बनारस नगरी ही चलते हैं।
पांचवा मित्र - (हँसते मित्र से) - चेतन! ऐसा करना तुम आज ही नाव बुक से बात कर लेना, रात्रि-०७ बजे हम सब निकल जाएंगे।
छठा मित्र - ठीक है मित्र! मैं नाव वाले से बात कर लूंगा।
सातवां मित्र - तो मित्र! आज शाम हम सभी गंगा के घाट पर मिलें। जयजिनेन्द्र
प्रस्तुत - सबसे त स्वर में जयजिनेन्द्र
सभी एक चक्कर लगाकर।
सभी मित्र नाव में एक के पीछे एक बैठे।
आठवां- चार मित्रों के हाथ में डंडियाँ हैं, जिसे वे एक्टिंग कर चलायेंगे।
यात्रा प्रारंभ करते समय - बोलो पार्श्वनाथ भगवान् की जय।
आठवां मित्र- मित्र! बनारस पहुँचने में बहुत समय लगेगा। ऐसा करते हैं समय बिताने के लिए कुछ करते हैं।
नौवां मित्र- ठीक है भाई। अन्ताक्षरी खेलते हैं।
दसवां मित्र- शुरू करो। अन्ताक्षरी लेकर मधुका नाम समय बिताने के लिए करता है कुछ काम। सब से बोलो
पहला मित्र- मीठे रस से भरी जिनवाणी बात, जिनवाणी लगे। मन में आत्मा की बात प्यारी लगे।
दूसरा मित्र- गा रे भैया गा रे भैया, गा रे भैया। प्रभु गुण गा। समय न गवा।
तीसरा मित्र- बनारस चले। पार्श्वनाथ हमारे बनारस चले।
तुम्हारी घर जन्म लियो है, साला की कोख को धन्य कियो है।
अज्ञान की काली के तारे।
पार्श्वनाथ प्यारे, बनारस चले।
चौथा मित्र- बाल कुलपुर में ब्रह्म की नारी।
पांचवा मित्र- मैं वीर जन्म। महावीर जी।
काव्य
पांचवा मित्र- जीवरा हो हो जीवरा।
जीवा राज उड़ के आओ सम्मेद शिखर में।
भाव सहित वंदन करो पार्श्वचरण में।
जीवरा हो हो जीवरा।
छठा मित्र- रंगमा-रंगमा-रंगमा रे।
प्रभु तारा टी रंग मा रंगमा गयो रे।
सातवां मित्र- रोम-रोम से निकले प्रभुवर।
नाम तुम्हारा हा नाम तुम्हारा।
आठवां मित्र- रोम-रोम पुलकित हो जाय।
जब जिनवर के दर्शन पाय।
नौवां मित्र- ये धर्म है आत्मज्ञान का,
सोमवीर महावीर स्वामी का।
ये धर्म का भैया क्या करना,
ये धर्म है चारों का गढ़ना।
जय हो।
दसवां मित्र- हँसी खेली मुनिराज शिखरवन में।
ये अकेले वन में, मधुवन में।
पहला मित्र- (इशारा करते हुए)- अरे-अरे!
मित्रों! देखो बनारस नगरी आ गई।
बोलो! पार्श्वनाथ भगवान् की जय।
(नाव से उतर कर खड़े हो जाते हैं)
दूसरा मित्र- चलो मित्र! नगरी में जाने से पहले
एक बार जिनेंद्र करें, दूर हो जिनेंद्र।
तीसरा मित्र- चलो मैं मिलता हूँ। विनय
मि गिजा
एक - दो - तीन - … - नौ।
अरे! अरे! रे ये क्या हुआ, जब हम गाँव से निकले थे तो पूरे दस थे, लेकिन अब नौ ही बचे…।
चौथा मित्र - अरे भाई! तुमने अच्छे से नहीं गिना, मैं गिनता हूँ।
एक-दो - … - नौ, अरे नौ ही हैं…।
पांचवा मित्र - अरे, अरे! लगता है तुम दोनों की ही गिनना नहीं आता - मैं अंग्रेजी में गिनता हूँ, वन-टू - … - नाइन।
अरे क्या बात है, नाइन ही हैं।
छटवा मित्र - अरे लगता है, रास्ते में अपना एक मित्र डूब गया। … ऊं उं उं -
- (सब मित्र रोने लगते हैं।) *
- (तभी वहां से एक पंडितजी निकलते हैं।) *
पण्डितजी - क्यों भाई क्या बात है? तुम सब रो क्यों रहे हो?
सातवां मित्र - क्या बताये! हमारा एक मित्र गंगा में डूब गया।
पण्डित जी - क्या ? गंगा में डूब गया, कब डूबा है?
आठवां मित्र - ये तो हमें नहीं मालूम लेकिन - हम अपने गाँव से दस मित्र आये थे, अब नौ ही बचे।
पण्डितजी - अच्छा - अच्छा मैं समझ गया, चलो कोई बात नहीं मैं गिनता हूँ। देखो एक-दो - … - दस। देखो तुम लोग तो पूरे दस हो। तुम दूसरों को तो गिन रहे थे, लेकिन स्वयं को गिनना भूल जा रहे थे, इसलिए दुखी हो रहे थे।
सिद्धान्त
इसी प्रकार यह जीव, जीव को जानने के नाम पर जीव द्रव्य, जीव तत्त्व, जीव पदार्थ, जीवास्तिकाय आदि सभी को जानता है। जीव के सभी भेद संसारी - मुक्त, त्रस - स्थावर, गुणस्थान, मार्गणास्थान, जीवसमास, सभी कुछ सीख लेता है, जीव की परिभाषा भी रट लेता है, लेकिन वह ज्ञान-दर्शन को धारण करती हुई वस्तु में स्वयं हूँ, जीव है सो मैं ही हूँ, ऐसी प्रतीति नहीं करता, ऐसा भाव भासन नहीं करता, इसलिए संसार में परिभ्रमण कर दुःखी होता है। यदि स्वयं को जान ले तो, परम सुखी हो जावे।
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 146.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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