मुक्ति प्रकाशन (मुक्ति कॉमिक्स) की मंचन-योग्य जैन नाट्य-रचना ‘नाटक हो तो ऐसे’ — शून्य व आदमी के संवाद, ब्रह्मगुलाल की दीक्षा, राजदरबार व मुनि-उपदेश के दृश्यों के माध्यम से वैराग्य, भेदज्ञान व मुनि-जीवन की कला को दर्शाती कथा। बाल-संस्कार व सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु।
A staged Jain natak from Mukti Comics — through the dialogue of Shunya & the man, Brahmgulal’s initiation, and the royal-court muni discourse, it portrays detachment (vairagya), bhed-gyan, and the art of the muni life.
नाटक हो तो ऐसे
प्रकाशकीय
मुक्ति प्रकाशन से “मुक्ति कॉमिक्स” का यह दूसरा पुष्ट प्रकाशित करते हुए हमें अत्यधिक प्रसन्नता हो रही है। हमारी पहली कॉमिक्स “कोपेनहेगन से कुन्दकुन्द” को पाठकों द्वारा बहुत अच्छी प्रतिक्रिया व प्रोत्साहन मिलने पर, हम प्रस संकल्प के साथ प्रयेस कर रहे हैं कि 21 वीं सदी तक 21 कॉमिक्स समाज को दे सकें। आशा है: हमें इसके लिए मधुपुर सहयोग मिलेगा। इस संदर्भ में हम आप जी., श्री विजेन्द्रकुमारी शास्त्री, आगण व राडकी जीन समाज के बहुत आभारी हैं, कि उनसे हमें आधारिक सहयोग मिला। परन्तु इसके लिए बहुत दुख है कि हम इसे कुछ कठिनाइयों के कारण सही वर्तन पर प्रकाशित नहीं कर सके। एतदर्थ क्रमार्थां हैं। फिर भी हमें भविष्य में सहयोग मिलेगा रहेगा इस आशा के साथ -
आर. श्री. जैन
ब्रह्मगुलाल
बात बहुत पुरानी है। एक बजकुआर था, उसका मित्र ब्रह्मगुलाल बहुत कुशल-बुद्धिपना था।
ब्रह्मगुलाल: बोले दोस्त ब्रह्मगुलाल तो लोगों में एक हैं, उसका प्रभिनय तो बस पढ़ो ही मत… जिस रूप की धारण करना है वही बनाता है…
दूसरा पात्र: हाँ सबसे तो ऐसे ही है नहीं।
पहला पात्र: हे वाह! हे वाह… आचलुच सीता जैसा.
एक दिन ब्रह्मगुलाल ने क्षेत्र का नाटक किया।
पहला पात्र: जब देखे तब उसकी ही प्रक्रिया…
ग्राम फिर तो ब्रह्मगुलाल का यश बाजारबार में भी चली तरफ केले गया। इसके जल जनुकार मन्नी तो कुछ महिर के बड़े युवा चुचा। उसने राजकुमार की भड़काया।
राजकुमार: कल तुम्हें ब्रह्मगुलाल का नाटक देखा।
मन्नी: सरे… एना क्या करने करने में क्या हम तो तब जाने कि… वह प्राप्ती परिसा दें।
राजकुमार: डी.. भाई हो.. ये भी कहा करते हैं।
नाटक हे ते हैले
अभिनयकार: अब्जकुमार को तो जिस की श्रेयस्यता एवं पूर्ण निश्चलता था है, अतः उससे कहा…
विशुद्धि: तो दीक्षा हैं, उससी परिक्षा अरी कर लो.
अभिनयकार: तेरा है रे.
अभिनयकार: तेरा है, तेरा मन सब उबलको सिख के बूप में देखला चाहते हैं.
परन्तु हम: सिंह का लूय ही नहीं, उसका लेज व पलाकम भी देखला पाहते हैं.
वाजकुमार अंबिकी की बात को डटना से बसीकार करके नुलाल के पास पहुंचा.
वाजकुमार: यहाँ मुझे ब्रह्मनुगुलाल लोचते लगा.
ब्रह्मनुगुलाल: अब यह पलीकर आये! हमली कला ना प्रदर्शा तो आई बाल ही पुका, अवश्य ही कोई रहस्य है.
ब्रह्मनुगुलाल: पर सिंह का ही लवांग कोंग? और फिर उसके… कैसे… में कक्षा, परन्तु…!
वाजकुमार: परन्तु क्या? हे इसके लिए अब बड़ा कठिनता की तौहार में, तुम अपयात करो.
वाजकुमार: यदि उस बसकय हमके कोई प्रपवाद हो जावे तो क्षमा किया जावे.
ब्रह्मनुगुलाल: ठीक है, मैं फूनी पिसाजी के वचल ठेक आता है.
वाजकुमार व्याज के पास गया, और स्वागत नुलाल कहा.
वाजकुमार: तुमने यह दीक्षा नहीं किया पुरुष, फिर भी में एक प्रारंभ के प्रयारध के माफ कर दूंगा._
नाटक
वाह ! नाट्यशाला देखो… सजावट कितनी सुंदर…
विशुद्धि: आरे ! वह देखो… सिंहालय के पास बकरा ? पर वह क्यों बंधा है ?
उपस्थित जनता बेहक्री ने—अरे! कब रही थी…
एक बड़े बालूआ क्षेत्र में दलाल मारकर बसा माड़ में प्रवेश किया.
किराया: देवे ! ये डरवोक देशभक्त ही बेटा…
बाजकुमार सिंह की अग्निजल गारजा करते पर बी वही देखा रहा थी। दौड़ाते दौड़ाते किन्हें लोहाकोटे कुर कहा कि—
सिद्धात्मा केशव पावकल: तेरे बालाजों बकरा ब्याड़ा और ये गधा तेरी तरह दौड़े दौड़े कर बड़ा, दिव्यकाल हैं तेरी माँ के दूध को…
इतना सुनते ही सिद्ध की प्रतीक्षा अन्यंक को दोष के ताल हो गयी, और प्रभावित सिद्ध गजज अठा—
कमाल है, प्रस्मगुल्ल बिद्युल्ल श्रेष्ठ ओलेसा लवा बड़ा : किसी को बचावाई पता न होती तो आयाम किसी की हत्यागति बुक जाती…
अर्जुनका है, किसी की माल तो क्रक्षात नहीं, किन्तु सिद्ध कोरा ए सिद्धात्मा श्रेष्ठ के सम्बन्धों में देखा, परिवार है…
देसे ब्राह्मण बाला है।
नाटक दो तो है ये
अभिनय से प्रभावित होकर व्यजकुमार व उन्नबाली व्योच ही बोले से कि वही
एक ही मटाचे में ब्याजकुमार का नाम देखनर हो गया।
हाय! ये केसा दें सोचिये…
ये गरंगच वो क्षोटकमच में बड़ले देन लगी।
स्वार दुबार में व कुन्डर के बालावरण में बड़ल गया।
प्रोफेसर प्रभानुगुलाल मपरे मानव ब्रूय की आ जाय।
प्रोफेसर: प्राये! प्राये! शिष्य के प्रति से केसा प्रयवध? दिक्कत है बुरी… ओरे मेरे इस नाटक को
जेसे ब्रह्मगुलाल मलुप्य होकर भी शिष्य का प्रभिनय करते से हैं। ऐसा में चोल प्रयाद बाद कर बेहतर, ओरे तब यह प्रायनु बद्धान से भी गर्वान माना होगा और भगुवान श्रीकृष्ण को प्रायन उन्नबाली ओरे चोल के प्रप्रायन करते दुए चार गाँव में धूम रहा हैं। हाय! केसी इस भगवान्-श्रीकृष्ण की दुविशा।
युक्ति कॉमिक्स
इकलौते पुत्र की गुरु की बजाय भेड़ बुली थी, तिक्कुयाँ आई
प्रभिनय: मे पलवाद हो गया, अपनी गाली से ही अपने प्रयाद पुत्र की बेड़े देखा। और होटा था पह हो गया। प्रयानु ब्रह्मगुलाल से यह अन्तर्द्रश नहीं किया, यदि…
क्या उन्नहारा मतलब है उसके अज्ञानगुलाकर किया है। नहीं। नहीं वह स्वाच्छा कलाकार हैं, लिकिन वे जो स्वयं धरता हैं, उन्हें तब लगता है जाता है।
प्रयानु राजन: इक्के लिए मेरा मज़ा नहीं आयता अगले आजे में यह लाभ स्वाम्य भी तो नहीं…
ब्रजा के महड़काते हुए लीनी के फाड़ा
यदि अपनी बात सत्य ही है तो शिर उन्नबाली दिग्गजबार गुरु का नाटक करके तेजव्य व श्रीकृष्ण का उपदेश देते को कहो… किर देवेशे वस्तचाये वग्य थी?
अन्वाद: हाँ! ठहर उन्नबाली यह कहेगे, इससे हमने पुत्र वियोग का कुल भी बुर होगा और उसकी परीक्षा भी.
नाटक
इससे दिन बाजा में श्रेमणुलाल की बुलाया
पियू: कलाकार! उसमें भारत व वैशाली यहाँ का दर्शन करते व्यक्ति हैं। अरे! तुम दिनाकर मुझे…
वरजज: मापापी मासा शिलोधार्म है। परन्तु हमें कुछ संजय नाहीं।
बाजा की बचन देकर श्रेमणुलाल और साथियों की सूचना दिखाया देखते जांगल आ पहुंचा
अहे! डेका कितना कठिनतम परन्तु सहज-आनन्ददायक अभिनय
रे सुरी! दिनाकर और साधु का जीवन कोई नाटक नहीं और कोई गान संगीत नहीं तो कितना वैशाल्य आवश्यक फल है…
माता: श्रेमणुलाल ने आप से अपनी समस्या कही, तो आप दिन लेंगे
अबी माँ! तुम चेती क्यों ऐ? तुमने आने पर पुरा की माँसा पद विश्वास नहीं?
ओ बेटे! प्यार उसने दुध से पाले-चोखे पुत्र की बोधता का काल नहीं? देख रूप! तेरी बोधता पर विश्वास देने से ही नहीं है।
पर आशिक क्युं?
माँ ठीक ही तो मान्ती हैं!
मेरी बाल! सुन कुछ साक्षात्, पुरा पुत्र विश्वास की, और दिनाकर वैमा धाना कुरूष जुन: दुसरा नेता राजा आल, तुम्हारा विश्वास।
मुनि कल्याण का निर्णय
मुनि कल्याण का निर्णय करके वह अपने घर वालों की आज्ञा लेने उठा है।
मुनि कल्याण: गे माँ! मैंने पाप का नाटक तो बहुत दिया, और तुम तो उसकी प्रसंगी तक हो! अब चमत्कार का नाटक करने के अभ्यास के लिए आपकी सम्मति आवश्यक है। आप मुझे आज्ञा दें।
माँ: दो माँ! मैं नहीं! तेरे यहाँ यह नाटक तो मुनि कल्याण के लिए बड़ा नाटक है; मन्दिर बाहर दौड़ाना नहीं किया जाता, और तुम अपनी पिता देना है, तेरी आनी नाई कुछ है।
प्रिय भाई: मैं सब कहती हूँ, यह तुम्हारी जीवनी नाटक है, और इसका अभ्यास भी नहीं कर तुम्हें था, प्रबंधन की परियोजना नहीं है। नहीं, तुम्हें जो विषय नहीं है, अब अपना विश्वास भरो।
मुनि: जानता हूँ! माधु वीवन जीना १०० निर्णय कला है, जिसमें दिया डेम के निर्णय पर अभ्यास की लाभी है। अब इस बुद्धिमत्ता की विशेषता है।
और वह प्रसंग चलने लगा फैल गई ओड़ा खुली करने लगी।
अरे भाई! ओह! देख शहर की बाद के कुछ बुला दिये। अपना गुजराल…
मुनि कल्याण: बन बाग तो मेरे। बड़ा आया मेरे गुजराल अगलाने, पागल, मुने के नाम दिया आकर अपने मुले! अपनी कौन देखे? तेरे भाई-भाई स्वामन देखा रखा।
गाँव! ऐसे मैं मिट गुजराल की बात कर रके था। बुला है पह अब साधु…
मुनि कल्याण: ठीक है ठीक है… मेरे अब जानता हूँ। बड़े नी अब मेरे जैसा भोटा-तागा है। बड़े आये वाह! बड़ी बात! बड़ी मनावट नीज, खुशी भी मेरे जो लोग देखो।
लट्टी आई! नहीं, तूसा नहीं, यह लगन दिखाबर जैन साधु अब बड़ा है… इसमें गन्धीर आन व तुपकरण।
नाटक हो तो ऐसे.
शून्य
पहले दृश्य में, शून्य और एक आदमी एक पेड़ के नीचे खड़े हैं। शून्य कुछ सोच रहा है, जबकि दूसरा आदमी उसे देख रहा है।
मुझको तो ये बात भी अब समझ आ कि…
आदमी
अरे पेटू! अब पता चला कि तेरा पास समझदारी भी है। बोल तू क्या कह रहा था।
शून्य
मैं अभी कुछ दिनों से अरण्यगुलाल के जंगल में कुछ नग्न साधुओं के पास पढ़ता-लिखता देख रहा हूँ।
आदमी
कमाल है, साधु होने के लिए इतने दिनों से कठोर अभ्यास साधु है, साधु बनने के पहले साधु का जीवन समझना आवश्यक है।
शून्य
पर मेरी तो कुछ और ही समझ में आ रहा है। राजा ने साधु का नाटक करने का कहकर पुत्र की मृत्यु का बदला तो नहीं लिया है?
आदमी
ताकि नंगा साधु होकर भूख-प्यास तथा अन्य तकलीफें सह-सहकर मर जाये।
नया आदमी
नया आदमी, जो टोपी पहने हुए है, तीसरे व्यक्ति से बात करता है।
क्या खाक सोची। हमारा गुलालु बहुत बड़ा कलाकार है, और अच्छा व बड़ा कलाकार वही हो सकता है, जिसे अपनी कला में आनन्द आये। दिल लेना हमारे मित्र को भी अपने इस काम में आनन्द ही आयेगा।
शून्य
वाह! लल्लू, छोटे काह! खूब तगड़ी सोची।
नया आदमी
मैं करता हूँ कि यह देखा नाटक करे ही क्यों? इससे क्या लाभ? राजा का क्रोध भी दूर होने से रहा।
आदमी
मुनि होने के बाद राजा के वश में कोई कम नहीं, और नारायणी में कोई गड़बड़ी क्यों कि, गुलाल नीलरामी को जायेगा।
शून्य
हाँ भाई। ज्ञान रूपी कला जिनके हृदय में प्रकट हो जाती है, वे तो संसार में सहज ही वैरागी हो जाते हैं।
आदमी
अब तो मैं समझ गया आई। कि डालना और शरीर का भेद ज्ञान प्रकट होना भी एक कला की है।
नाटक तो हो तो ऐसे
ब्रह्मबुल: दीक्षा हेतु जंगल में आचार्य के पास जाता है
हे आचार्य श्रेष्ठ! आप अपने वचनों से, श्री परम सुख देने की कला सिखाइये। जन्म-मरण के दुःख को दूर करने की कला समझाइये नाथ…।
आचार्य आसन पर बैठे हुए हैं और ब्रह्मबुल हाथ जोड़कर सामने बैठा है
वीतरागी दशा अंगीकार करने वाले हे भव्य! तेरा अविनाशी कल्याण हो।
मुनि बनने के बाद
ब्रह्मबुल: वाह! इस कलाकार का जीवन भी कितना प्रेरक!
ब्रह्मबुल मुनि बन गया है, और लोग उसके चारों ओर खड़े हैं
तुम ठीक कहते हो इसकी गृहस्थ अवस्था भी, शुक्रमाथा थी, जिसमें दुःख ही दुःख थे।
इसने तो सारे संसार को क्षणभंगुर बताकर अब मुक्ति रूपी लक्ष्मी के साथ सहकार के बाद के, दृश्य प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है।
और जब दीक्षा की अनुमति मांगने परिवारिजनों के पास गया था, वह नाटक का मध्यांतर था।
मुनिराज: परमरस कहते हैं ये मुनिजन, क्यों कि मुनिधर्म से तो मोक्ष रूप परमसुख प्राप्त होने के कारण यह नाटक, नियमानुसार सुखान्त है।
एक व्यक्ति: वाह भाई पंडित जी! वाह! खूब कही…।
दूसरा व्यक्ति: बहुत अच्छा…
श्रावक: और एक दिन भाव-परिवर्तन का जादूगर ब्रह्मबुल राजदरबार की ओर चल दिया।
राजदरबार में राजा और उनके मंत्री खड़े हैं
श्रावक: राजन्! सुना है ब्रह्मबुल मुनि बन गए हैं…।
नाटक तो हो ऐसे
राजदरबार में मुनिराज ब्रह्मगुलाल के प्रवेश करते ही पूरी सभा सम्मान में उठ खड़ी हुई।
शास्त्रादों के कहने पर राजा ने मुनिराज को उच्चासन पर विराजमान कर उपदेश देने का आग्रह किया।
राजा: राजन! इस आत्मा में अनंत शक्तियाँ हैं। पशु से परमात्मा बनने का सामर्थ्य है। अतः शोकभाव छोड़कर शांतभाव धारण करो।
मंत्री: धन्य है! तुम्हारी कला, कलाकार हो तो ऐसा…
मुक्ति कॉमिक्स
मुनिराज के उपदेश को सुनकर सभासद वार्तालाप करते हैं कि-
सभासद 1: दिगम्बर वेष धारण कर वैराग्य का नाटक करके, तो मानो इन्होंने औपचारिक नाटकी पर बिलकुल ही विराम दी है।
सभासद 2: हमें तो ऐसा लग रहा है कि मानो साक्षात्कारी ही रूप धारण करके आये हों।
मंत्री: इस कलाकार ने इतनी तक जितनी भी नाटक किये थे, वे तो वास्तव में दुःखान्त ही थे। सही अर्थों में तो अब इन्होंने सुखाभाव नाटक किया।
राजा: सच कहती हो रानी, इस कला को देखने व तुम्हारी कहने मात्र से ही कितनी शीतलता व शान्ति मिलती है।
मंत्री: सही जीवन जीना ही एक कला है। मनुष्य एक कलाकार है, और उसकी कला का सच्चा व अच्छा प्रयोग तो सुनिश्चित ही है।
सेनापति: वाह भई वाह, क्या गजब बातें कही, तुम्हें तो मान गए।
नाटक हो तो ऐसे
पहला दृश्य
राजा और साधु
राजा शुद्धात्मा: तुम तुम्हारे बस साधु वेश से बहुत प्रसन्न हो। कहो तुम्हे क्या वरदान दूं?
साधु: हे राजा शुद्धात्मा के प्रति “ऐसे अनुचित विचार शोभादायक नहीं हैं।”
राजा शुद्धात्मा: मैं तो यह कह रहा हूँ कि यहाँ आकर अपने हाव, भाव को जो नाटक किया है, उससे हम प्रभावित हुये, अब तुम अपने मूल वेश में आओ।
साधु: राजन! यह जीव तीन लोक में पंच पर अनादि काल से पशु, नारकी, पेड़ पौधे, देव, मनुष्य आदि में शरीर धारण कर नाटक की जो खेल खेले हैं परन्तु…
राजा शुद्धात्मा: परन्तु क्या?
साधु: नाटक खेलते खेलते इसमें इतना रम गया कि अपने असली स्वरूप को ही भूल गया। “मैं कौन हूँ" इसकी इसे अभी पहचान नहीं है।
दूसरा दृश्य
राजा और साधु
राजा शुद्धात्मा: क्या मैं इतना भी नहीं जानता हूँ? मैं राजा हूँ, राजा, सबों का स्वामी! सबका मालिक।
साधु: "अरे मूर्ख! जरा सोचो, जब तुम्हारे पास राज्य नहीं था, तब कहाँ के राजा थे, और अब भी तुम वही हो।
राजा शुद्धात्मा: आप कुछ और स्पष्ट करें।
साधु: राजन! पृथ्वी का स्वामी कोई नहीं, कोई किसी का मालिक नहीं, यहाँ सभी अपनी सत्ता के स्वामी हैं, उनकी पहचानना इस आत्मा का पहला कर्तव्य है। अतः तुम सब मृत्यु आने के पहले ये सब करो।
यह कहकर मुनिराज जंगल में चले गए।
तीसरा दृश्य
राजा और राजकुमारी
राजा शुद्धात्मा: यह बात तो मैंने अभी तक सुनी भी नहीं, अनसुनी बात है। वाह! नाटक हो तो ऐसा।
राजकुमारी: अब शुद्धात्मा ने तो दिशा ही दिशा को खुशामद से शान्ति व सुख प्राप्ति का सच्चा साधन है।
नाटक हो तो ऐसे
राजा को सम्बोधन के बाद मुनिराज जंगल में ध्यानमग्न हैं। तभी अचानक
परन्तु, आश्चर्य! सिंह कुत्ते की तरह पूँछ हिलाकर बोलने लगा -
सिंह: मुझे को अतिक्रूर हुआ।
अरे! मैं मेरा मित्र पर क्यों वर कर आव और अब कितना परम शान्त भाव।
इस तरह के मानव को पहले कभी
सिंह की मनोदशा को जानकर मुनिराज बोले -
मुनिराज: हे वनराज! जिस महान् मुनिधर्म को प्रदर्शन की वस्तु समझा था वे जन्म उसी का प्रतिफल है। इस जीव ने काम-क्रोध आगे के संग बहुत किये परन्तु शान्त भाव का रूप कभी नहीं देखा।
सिंह: आह! एक अपराध का इतना बड़ा दुःख। पर अब इतने अपराधी का।
मुक्ति कॉमिक्स
तभी अचानक राजा आ गया।
राजा: हे मुनिराज! ये कैसा आश्चर्य? शेर तो आपको मारने आ रहा था, परन्तु… और आप मुनिधर्म को नौ नाटक कह रहे थे।
मुनिराज: हाँ राजन! निज नय में वेश धारण करने हमें अपना मूल स्वरूप अध्ययन रहना ही नाटक है और मुनि-धर्म भी नाटक का अंत तथा सिंह दशा नाटक का अंत।
सारा वृत्तान्त जानकर राजा को संसार में वैराग्य हो गया और…
राजा: हे मुनि पुंगव! मुझे मुनिदीक्षा दीजिये।
मुनिराज: अहा! मैं सुदर्शन का राजकुमार, ब्रह्म राजा का पुत्र और अब मैं सिंह की देह… कब तक होंगी ‘देह’ की दलाली? परन्तु मैं तो सुदर्शन हूँ…
राजा: वाह! नाटक हो तो ऐसा!
समाप्त
अंगारक
लेखक- - डॉ० योगेश जैन
चित्रोकन - त्रिभुवन सिंह
सहयोग - सरोज डी० एम०
आज सेठानी डिब्बी में जड़ी-बूटी जा रही थी और महाशेठ को नीचा दिखाने की सोच रही थी, तभी उसके पति ने प्रवेश किया!
सेठ: अरे भगवान्! सुनो अभी तक भोजन नहीं..
सेठानी: मुझसे मत बोलो तुम्हारी नोकरानी हूँ? रसोईया हूँ?
चन्द्रमुखी से ज्यादामुखी बनी पत्नी की खुशामद करते हुये सेठ बोला
सेठ: अरे बावली! कैसी बाते करती हो! नारों के गले की शोभा तो मधुर वाणी, व्यवहार और उसका शील है!
सेठानी: सभी कुछ कहो भी बात क्या हुई? कोने छिपा देने से क्या पता चले?
सेठ: क्या करूँ? मुहल्ले की सारी औरते तो रोज नये-नये गहने पहनें और में बस वही माली पुराना हार, चूड़ियाँ-।
सेठानी: तुम कुछ समझते हो? बिना सूंदर गहने पहने हमारा नाम न कमल है!
सेठानी: तुम्हे क्या हो गया है? मेरी के नाते मैं बंधी, सोशल की तरफ़ गले में हार डाल लने से समाज में इज्जत दाती है!
सेठ: मुझे उपदेश नहीं हार-चाहिये हार-।
फलस्वरूप पत्नी पीड़ित ओलूराम सेणफ की दुकान पर जा पहुँचा!
सेठ: सेठ जी! कोई ऐसा, सुंदर हार दिखावो जो किसी के पास न हो।
सेठ: अच्छा 'बैठो, लाता हूँ। ऐसा हार, जो संसार में कोई न बना सके - -।
सेठ: यो लों बस एक री के सुशोक ने बनाया था, जो राजा का विशेष सुधार था, पर अब वह कभी नहीं बनायेगा - -।
सेठानी: पर रोका क्या? पूरी बात कहो न।
अंगारक
और अंगारक की कथा सुनकर भीनू अपने घर आया।
भीनू: जो स्त्री संसार का सबसे सुन्दर हार!
पत्नी: वाह! सचमुच कितना सुन्दर… तुम बहुत अच्छे थे।
दूसरे दिन जब हार पहनकर उत्सव में गई।
पत्नी: ये कितनी निर्दयी दुष्ट औरतें! मेरे हार कंगन की कोई देख ही नहीं रही… ना कोई पूछ रही…
- उसकी निंदा से जलने के पहले दिखाने की एक तरकीब निकली। अपने घर में स्वयं ही आग लगा दी।
- घर में आग लगा दी
पत्नी: आग-आग… बचाओ-बचाओ!
मुक्ति कॉमिक्स
एक महिला: वाह सेठानी! ये कंगन हार बहुत सुन्दर, खूब खरीदा, किसने बनाया-
दूसरी महिला: अरे मूर्ख! अब तक कहाँ थी? जब सारा घर जल-कर, राख हो गया तब हार कंगन की तारीफ़ कर रही है।
एक महिला: पर बताओ तो सही… ये गहने तो मैंने अब तक नहीं देखे।
दूसरी महिला: आह! जिन गहनों के शौक़ ने मेरे सुख-चैन छीने, यहाँ तक कि घर में भी आग लगवा दी और तो और इसको बनाने वाले अंगारक भी।
एक महिला: अरे! ये अंगारक कौन है? जरा मैं भी तो सुनूँ।
दूसरी महिला: इस देश के राजा के यहाँ अत्यंत बुद्धिमान् व चतुर अंगारक नाम का एक सुनार था। एक दिन राजा ने आदेश दिया-
नाटिका
एक व्यक्ति एक व्यापारी से कुछ कह रहा है
व्यापारी: प्रिय अङ्गारक! आपकी बात मैंने अनुक्षण बनायी। जैसे अब तक किसी ने न बनायी हो।
अंगारक: जैसी आपकी इच्छा।
अंगारक व्यापारी से बात कर रहा है
अंगारक: और गज़ने वाला अङ्गारक नगीना देकर विदा किया।
अंगारक अपने घर में बैठकर काम कर रहा है
पत्नी: अजी उठो! सुबह से काम कर रहे हो, दस बज गए, भोजन कर लो।
अंगारक घर के बाहर से आता है
अंगारक: वह भोजन के लिये हाथ-मुंह धोने घर के बाहर आता है।
अंगारक स्नान कर रहा है
अंगारक: हाँ-हाँ! अभी आता हूँ।
अंगारक घर के बाहर आकर एक मुनि को देखता है
अंगारक: अरे वाह! पुण्य जाग हमारे! अतिथि-पूजा-सत्कार का महान् सुअवसर। मुनिराज! लगता है साक्षात् नक्षप्रभ ही हमारे द्वार पर चलकर आ रहे हों।
अंगारक अपनी पत्नी के साथ मुनि को भोजन करा रहा है
अंगारक: सहर्ष पुण्यादन में अङ्गारक पत्नी सहित मुनिराज का पडगाहन कर आहार देता है।
एक मोर पेड़ के नीचे खड़ा है
अंगारक: तभी घर के आंगन में वृक्ष पर बैठा मुख्य मोर नीचे उतर आता है।
अंगारक
मंच पर अंगारक भोजन कर रहा है।
नवाधा: भक्तिपूर्वक आहारदान के बाद अंगारक स्वयं भोजन करता है।
अंगारक: और फिर जब सपने बताने आता है तो
अंगारक के पास उसकी पत्नी आती है
अंगारक: डाया ने लूट गया-अब क्या होगा-अभी तो सर्दी थी?
नवाधा: अरे! क्या हो गया! इतनी सर्दी में भी पसीना-क्या है ये?
अंगारक: चुप रह। मैं तो मर आऊँगा, क्या मुँह दिखाऊँगा..। अभी तो नहीं रखकर गया था,
अंगारक: राजा का बेशकीमती नगना, ने यहीं रखकर गया था; नहीं मिला तो मर जाऊँगा
नवाधा: तुम! क्या कह रहे हो? अब क्या होगा?
अंगारक: मुनिराज के अलावा तो अभी तक यहाँ कोई नहीं आया, लगता है वही
नवाधा: अरे! तुम्हें पता है कि तुम क्या कह रहे हो? ब्रह्मचारी महाव्रत के धारी मुनिराज क्या कभी ऐसा अधम काम कर सकते हैं?
अंगारक: नहीं-नहीं वही पापी अधम धूर्त-जो मेरे नगने को..
नवाधा: आह! मैं क्या सुन रही हूँ? अभी धरती! तू फट क्यों नहीं गई-! काश! आज मैं बहरी होती!
अंगारक एक डंडा लेकर जंगल की ओर जाता है
नवाधा: और अत्यंत क्रुद्ध होकर अंगारक मुनिराज को मारने जंगल की ओर चल दिया।
अंगारक: अरे! यह देखो! वही है धूर्त-चोर-देखता हूँ…
अंगारक
पास आते ही एक मूल अंगारक, नगरी-नागरिक कहने लगा
अंगारक: मुनिवर! ये आस्तीक मुनि हैं। मैंने धारण कर लिया।
अंगारक ने मुनिवर के सिर पर डंडा मारा।
अंगारक: अरे चुप क्यों हो गया? चला मेरा नगीना कहाँ है? नहीं तो… ढोंग से चलना मजा।
मुनिवर: परन्तु इच्छा पेड़ पर बैठे मोर के जा लगा।
मोर के पंख से नगीना निकल गया।
अंगारक: अरे वाह! ये नगीना ऊपर पेड़ से गिरा…
अंगारक: परन्तु मुझे… बिल्कुल वही… मेरा नगीना… और मोर भी वहीं जो मेरे अंगीन पर आकर बैठता है…
सारी बात समझकर अंगारक को बहुत पश्चाताप हुआ।
अंगारक: क्षमा करो भगवन! मुझसे भारी अपराध हुआ।
मुक्ति कॉमिक्स
आत्मग्लानि से भरा अंगारक नगीना लेकर राजा के पास गया।
अंगारक: अपराध क्षमा करे राजन! ये लो अपना नगीना और रखों… इस जड़ रत्न को पाने में मैं अमूल्य नर-जन्म यूँ ही गवाँया।
राजा: अरे क्या हुआ? क्या तुमने रत्न लगाना बन्द कर दिया?
अंगारक: नहीं राजन! रत्न लगाने का काम तो अब शुरू कर रहा हूँ। अपने शुद्धारत्न में संयम-रत्न… जिसके लिए ये दुर्लभ मनुष्य जन्म मिला है।
राजा: हमारा पूरा राज्य धन्य है, तुम्हारे विचारों पर।
क्षमा है अंगारक
समाप्त
संपादकीय
भारतीय कथा साहित्य में जैन कथा साहित्य काफी समृद्धि लिये हुए तो है ही; साथ ही वह अपना अलग से वैशिष्ट्य लिए हुए भी है । जिसके कारण भले ही उसके कुछ पात्र अन्य कथाओं से साम्य लिये हुए हों; परन्तु उनके उददेश्य एकदम पृथक् व अपने दार्शनिक व नैतिक गरिमा के अंदाज लिये हुए हैं। यदि जैन कथाकारों से यह प्रश्न किया जावे कि तुम्हारे नायक में ऐसी क्या विशेषता है कि, जो अन्य कथाकारों से पृथक् करके अपनी स्वतन्त्र पहचान बनाने में सरलतामुप सक्षम हो, सहज ग्राह्य हो । तो जैन कथाकारों का एकमेव उत्तर होगा कि उनके नायक न तो ईश्वरीय रूप है, और न ईश्वर ही; अपितु अपनी प्रभुता को प्रगट करने की महत्त्वाकांक्षा वाले वे सामान्य-पात्र हैं, कि जिनका लक्ष्य वीतरागता है, और अपने प्रतीक्षित-क्षण में उस वीतरागी नग्न दिगम्बर दशा को प्रगट करते हुए कथा का समापन करते हैं । जो कि सही अर्थों में इस संसार रूपी मंच में खेले जाने योग्य नाटक है। जैसा कि आप इस कॉमिक्स में पायेगे ही।
इस कॉमिक्स का प्रिय पात्र ब्रहमगुलाल फिरोजाबाद के समीप चन्द्रवार नामक स्थान का लगभग 16-17 वीं शताब्दी में पदमावती-पुरवाल जाति को सुशोभित करने वाले एक अभिनवरेला पुरुष है । इनका इस कामिक्स में कुछ पौराणिक व कुछ कल्पनालोक से लिए मोतियों को चुन-चुनकर यहाँ माला के रूप में पिरोया है ; जो संस्कार-विहीन पीढी का कण्टहार बनी, तो मेरे लिए यह गर्व की बात होगी; और मुक्ति-कामिक्स परिवार का सही वक्त पर राही कदम भी …।
डा. योगेशचन्द्र जैन
इक्कीस कामिक्सों के संग बढ़ें इक्कीसवीं सदी को कदम
कुछ पंक्तियाँ, कुछ संवाद
क्या आप अपने बच्चों के तन ढकने को अच्छे कपड़े लाकर नहीं देते ?
हाँ! भाई! हाँ! …।
और आप उन्हें सभी सुख सुविधाएँ नहीं देते जिनकी उन्हें आवश्यकता है?
हाँ! हाँ! क्यों नहीं: हमें उनकी पूरी चिन्ता है!
पर क्यों आप उनसे सदाचार विचार निर्माण के लिए कुछ देते है ?
??
हाँ! हाँ! बोलिये बोलिये चुप क्यों है ?
परन्तु …।
परन्तु परन्तु कुछ नहीं: हमने आपकी चिन्ता समझी है,
अब ज्यादा देर ठीक नहीं।
आज ही ‘मुक्ति कॉमिक्स’ परिवार के सदस्य बनकर श्रेष्ठ आचार-विचार के अलंकरणो से अपने नन्हें-मुन्ने बच्चे को सजाकर इक्कीमवीं सदी में प्रवेश कराइये । आज ही ‘मुक्ति-प्रकाशन, अलीगंज’ के नाम ड्राफ्ट बनड़ये
मुक्ति कॉमिक्स पढ़िये … इक्कीसवीं सदी में चलिये … ।
मुक्ति प्रकाशन, अलीगंज (एटा), उ.प्र., 207247
स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि)।
प्रूफरीडिंग बाकी है