नाममाला टीका — जैन स्वाध्याय सामग्री | Nammala Tika

नाममाला टीका

काव्य

प्रमाणमकलंकस्य, पूज्यपादस्य लक्षणम्!
धनञ्जयकवेर्काव्यं, रत्नत्रयमपश्चिमम्!!

  • (नाममाला टीका)

अर्थ

अकलंकदेव का प्रमाण, पूज्यपाद का लक्षण,
धनञ्जय कवि का काव्य, ये तीन अद्भुत रत्न है।

काव्य

अविश्रामं वहतू भारं, शीतोष्णं च न विन्दति।
ससन्तुष्टोपस्थता नित्यं, त्रीणि शिक्षेत् गर्दभात्।।

  • (चाणक्य नीति)

अर्थ

गधे से भी तीन शिक्षा लेनी चाहिए वह बिना विश्राम
किए भार वहन करता है, सर्दी गर्मी में भी रुकता नहीं है
हमेशा संतोष धारण करता है।

काव्य

अधो जिघृक्षवो यान्ति यान्त्यूर्ध्वमजिघृक्षवः।
इति स्पष्टं वदन्तौ वा नामोन्नामौ तुलान्तयोः।।

  • (आत्मानुशासन, 154)

अर्थ

तराजू के दो पलड़े हमें यह शिक्षा देते हैं कि जो
ग्रहण या संचय करता है उसका अधोपतन होता है और जो
त्याग करता है वह ऊपर उठता है।

काव्य

आदहिदं कादव्वं, जदि सव्वकदि परहिदं पि कादव्वं।
आदहिदं परहिददो, आदहिदं सूदु कादव्वं।।

  • भगवती आराधना (टीका 154) उद्धृत

अर्थ

“हमें आत्महित करना चाहिए, यदि सम्भव हो तो परहित
भी करना चाहिए, किन्तु आत्महित और परहित में से
आत्महित को ही अच्छी तरह से करना चाहिए।”

काव्य

"अहनन्नपि भवेत् पापी निहनन्नपि न पापभाक्।
परिणामविशेषेण यथा धीवरकर्षकौ।।

  • (सोमदेवसूरि, यशस्तिलकचम्पू/72)

अर्थ

एक व्यक्ति हिंसा न करता हुआ भी हिंसक होता है और दूसरा कोई हिंसा
करता हुआ भी हिंसक नहीं होता- यह सब परिणामों की विशेषता है जैसे कि
कोई धीवर दिनभर एक भी मछली न मार पाने पर भी हिंसक होता है और
कृषक खेत में अनेक जीवों को मारता हुआ भी हिंसक नहीं होता।

काव्य

"श्राद्धः श्रोता सुधीर्वक्ता युज्येयातां यदीश! यत्।
त्वच्छासनस्य साम्राज्यमेकच्छत्रं कलावपि।।

  • (वीतराग-स्तोत्र, 3)

अर्थ

हे प्रभो! यदि श्रद्धालु व सुधी (विद्वान्) श्रोता-वक्ता का योग मिल जाए तो इस
कलियुग में भी आपके शासन का एकछत्र साम्राज्य हो। प्रतीत होता है कि आजकल
जिनवचनों के सुधी विद्वान् श्रोता-वक्ता बहुत कम हो गये हैं, इसीलिए जैन धर्म का
प्रभाव क्षीण हो रहा है।

श्लोक

भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं, वित्ते नृपालाद्भयं
मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जरायाभयम्।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं
सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्॥
(सन्दर्भ - ३९, वैराग्यशतकम्)

अर्थ

भोग करने पर रोग का भय, उच्च कुल में जन्म होने पर अपयश का भय, अधिक धन होने पर राजा का भय, मौन रहने पर दैन्य का भय, बलशाली होने पर शत्रुओं का भय, रूपवान् होने पर वृद्धावस्था का भय, शास्त्र में पारङ्गत होने पर वाद-विवाद का भय, गुणी होने पर दुर्जनों का भय, उत्तम शरीर होने पर यम का भय रहता है। इस संसार में सभी वस्तुएँ भय उत्पन्न करने वाली हैं। केवल वैराग्य से ही लोगों को अभय प्राप्त हो सकता है।

श्लोक

तादृशी जायते बुद्धिः; व्यवसायोऽपि तादृशः।
सहायाः तादृशाः सन्ति यादृशी भवितव्यता॥
(मूल आधार - चाणक्य नीति ६/६)

अर्थ

जैसी भवितव्यता होती है वैसी ही बुद्धि हो जाती है, वैसे ही कार्य हो जाते हैं और उसी के अनुसार निमित्त मिलते हैं।

श्लोक

सर्वमेव हि जैनानां प्रमाणं लौकिको विधिः।
यत्र सम्यक्त्वहानिर्न न चापि व्रतदूषणम्॥

  • (यशस्तिलकचम्पू, सोमदेवसूरि)

अर्थ

जैन लोगों की वह सर्व लौकिक विधि प्रमाण है जिसमें सम्यक्त्व की हानि न हो और व्रतों का दूषण न हो।

श्लोक

सत्त्वेषु मैत्री गुणिषु प्रमोदं, क्लिष्टेषु जीवेषु कृपापरत्वम्।
माध्यस्थ भावं च विपरीत वृत्तौ, सदा ममात्मा विदधातु देवा॥
(भावना बत्तीसी, आचार्य अमितगति)

अर्थ

हे जिनेन्द्र देव! मेरा सज्जनों के साथ मित्रता का भाव, गुणी जनों में हर्ष, दुःखी प्राणियों के प्रति करुणा का भाव, दुर्जनों के प्रति मध्यस्थ भाव रहे तथा मैं स्वयं की आत्मा का ही ध्यान करूँ।

श्लोक

भवबीजाङ्कुरजनन रागाद्याः क्षयमुपगताः यस्य।
ब्रह्मा वा विष्णुर्वा हरो जिनो वा नमस्तस्मै॥
(- आ० हेमचन्द्रसूरि, स्याद्वादमञ्जरी, प्रस्तावना पृष्ठ ७)

अर्थ

जिसने संसार के कारणभूत रागादि को क्षय कर दिया है उसे ही नमस्कार हो; चाहे वह ब्रह्मा हो, विष्णु हो, हर हो या जिन हो।

श्लोक

तत्प्रति प्रीतिचित्तेन येन वार्तापि हि श्रुता।
निश्चितं सः भवेत् भव्यो भावनिर्वाणभाजनं॥
(– पद्मन्नन्दि पञ्चविंशतिका)

अर्थ

जो जीव इस जिनवाणी की बात को प्रीतिपूर्वक चित्त से सुनता है वह निश्चित ही भव्य है और भविष्य में निर्वाण को प्राप्त करेगा।

श्लोक

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।
लोचनाभ्याम् विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति॥
(– चाणक्य नीति)

अर्थ

जिसके पास स्वयं की बुद्धि नहीं होती है, शास्त्र उसका क्या कर सकते हैं? जिसप्रकार नेत्रों से विहीन व्यक्ति का दर्पण भला क्या कर सकता है?

श्लोक

यथा खरः चंदनभारवाही, भारस्य वेत्ता न तु चंदनस्य।
एवं हि बहुनि शास्त्राण्यधीतः, अर्थेषु मूढाः खरवद्देहिनः॥

अर्थ

जिसप्रकार गधा चंदन का भार वहन करता है तो वह भार का ही वहन कर्ता होता है, चंदन का नहीं। उसी प्रकार यदि मूर्खजन बहुत से शास्त्रों का अध्ययन कर ले तो भी उनके अर्थों को उस गधे की तरह ही ढोते रहते हैं।

श्लोक

धर्मस्य शब्दमात्रेण, प्रायेण प्राणिनोऽधमाः।
अधर्ममेव सेवन्ते, विचारजडचेतसा॥
(पद्मपुराण)

अर्थ

धर्म और धर्मान्धता में बड़ा भारी अंतर होता है, जिसे समझना बहुत आवश्यक है। अधिकांश लोग धर्मान्ध तो बन जाते हैं, पर धर्मात्मा नहीं हो पाते। सच्चा धर्मात्मा बनने के लिए समीचीन धर्म को परीक्षा करके अंगीकार करना होता है।

श्लोक

कुलप्रसूतस्य न पाणिपद्मं, न च जारजातस्य शिरोविषाणम्।
यदा यदा मुञ्चति वाक्यबाणं तदा तदा जातिकुलप्रमाणम्॥

अर्थ

उच्च कुल में उत्पन्न हुए व्यक्ति के हाथ में कोई कमल पुष्प नहीं होता है और नीच कुलोत्पन्न व्यक्ति के शिर पर कोई सींग नहीं होता है। जब जब वह व्यक्ति अपने वाक्य बाण प्रक्षेपित करता है तब तब उसके जाति और कुल का प्रमाण मिलता है।

श्लोक

आशागर्तः प्रतिप्राणि यस्मिन् विश्वमणूपमम्।
कस्य किं कियदायाति वृथा वो विषयैषिता॥
(– आत्मानुशासन,36)

अर्थ

प्रत्येक प्राणी के इतना बड़ा आशारूपी गड्ढा है कि उसकी पूर्ति के लिए सारा विश्व भी अणु के समान है। फिर जीव भी तो अनंत हैं और प्रत्येक की ऐसी ही अनंत-अनंत इच्छाएँ हैं; यदि इस विश्व का बटवारा किया जाय तो किस जीव के हिस्से में कितना आयेगा? अतः विषयों की आशा करना वृथा ही है।

श्लोक

“तस्यानैकान्तवादस्य लिंगं स्याच्छब्द उच्यते।
तदुक्तार्थे विना भावे लोकयात्रा न सिद्ध्यति॥”
(आचार्य जटासिंहनन्दि, वरांगचारित्र26/83)

अर्थ

उस अनेकान्तवाद का चिह्न ‘स्यात्’ शब्द है। उसे कहे बिना लोकयात्रा भी नहीं चल सकती है।

श्लोक

त्यक्तेहेत्वन्तरानपेक्षौ गुणदोषनिबन्धनौ।
यस्यादानपरित्यागौ स एव विदुषां वरः॥
(-आचार्य गुणभद्र, आत्मानुशासन, 145)

अर्थ

जो जीव अन्य अपेक्षाओं को छोड़कर केवल गुण-दोष के कारण ही ग्रहण त्याग करता है, वही श्रेष्ठ विद्वान् है।

श्लोक

भारतं मे प्रियं राष्ट्रं, भारतं हितकारकम्।
भारतय नमस्तुभ्यं, यत्र मे पूर्वजाः स्थिताः॥
(-विश्वलोचन कोश, आचार्य धरसेना)

अर्थ

भारत मेरा प्रिय राष्ट्र है। भारत हितकारक है। अहो, मैं इस भारतवर्ष को नमस्कार करता हूँ, जहाँ कि मेरे महान पूर्वज रहे हैं।

श्लोक

पाकं त्यागं विवेकं च वैभवं मानितामपि।
कामातार्ताः खलुमुञ्चन्ति किमन्यैः स्वञ्च जीवितम्॥12॥
(-क्षत्रचूड़ामणि)

अर्थ

काम से पीड़ित पुरुष भोजन, दान, विवेक, सम्पत्ति औरपूज्यता भी निश्चय से छोड़ देते है और तो क्या अपने जीवन को भी छोड़ देते हैं।

श्लोक

आचार्यः पादमाचष्टे, पादः शिष्य स्वमेधया।
तद्विज्ञसेवया पादः, पादः कालेन पच्यते॥
(धवला, वीरसेन स्वामी, पुस्तक- 12, पृष्ठ-111)

अर्थ

ज्ञान का प्रथम पाद गुरु होते है, द्वितीय पाद शिष्य अपनी मेधा से प्राप्त करता है, तीसरा पाद उस विषय के विशेषज्ञों की सेवा से प्राप्त होता है, चतुर्थ पाद काल आने पर स्वयमेव प्राप्त होता है।

श्लोक

स धर्मो यत्र नाधर्मस्तत्सुखं यत्र नासुखम्।
तज्ज्ञानं यत्र नाज्ञानं सा गतिर्यत्र नागतिः॥ 46॥
(-आत्मानुशासन)

अर्थ

धर्म वही है, जिसमें अधर्म नहीं; सुख वही है, जिसमें दुःख नहीं; ज्ञान वही है, जिसमें अज्ञान नहीं और गति वही, जिसमें आगति (पुनरागमन) नहीं।

हस्तस्य भूषणं दानं, सत्यं कंठस्य भूषणं।
श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं, भूषणैः किं प्रयोजनम्॥

अर्थ:-

हाथ का आभूषण दान है, गले का आभूषण सत्य है, कान की शोभा शास्त्र सुनने से है, अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है?

पक्षपातो न मे वीरे, न द्वेषः कपिलादिषु।
युक्तिमद्वचनं यस्य, तस्य कार्यः परिग्रहः॥
(लोकत्तत्वनिर्णय, हरिभद्रसूरी 1/38)

अर्थ:

हमें भगवान महावीर से कोई पक्षपात नहीं है, अन्य कपिलादि से कोई द्वेष नहीं है, जिसके वचन युक्तिसंगत है उसके कार्यों को ग्रहण करना चाहिए।

नास्तिकत्वपरिहारः शिष्टाचारप्रपालनम्।
पुण्यावाप्तिश्च निर्विघ्नं शास्त्रादावाप्तसंस्तवात्॥

अर्थ:-

मंगलाचरण नास्तिकता का परिहार करने के लिए, शिष्टाचार के पालन के लिए, पुण्य की प्राप्ति के लिए तथा निर्विघ्न शास्त्र की समाप्ति हेतु किया जाता है।

न श्रद्धयैव त्वयि पक्षपातो, न द्वेषमात्रादरुचिः परेषु।
यथावदामत्त्वपरीक्ष्या तु, त्वामेव वीरप्रभुमाश्रिता रमः॥
(-आचार्य हेमचन्द्र, अन्ययोगव्यवच्छेदिका, 29)

अर्थ:

हे महावीर! मैं केवल श्रद्धा से ही आपका पक्ष नहीं ले रहा हूँ और द्वेष मात्र से ही अन्यों से अरुचि नहीं रखता हूँ, अपितु ठीक से परीक्षा करके ही केवल आपकी शरण लेता हूँ।


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 691.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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