हे मानव ! ऐसा जनम अर्थात् मनुष्य जन्म बार-बार नहीं मिलता। यह मनुष्य भव बहुत ही कठिनाई व संयोग से मिलता है। विषयों में रमकर इसको मत गवाँ, मत खो ।
पाय चिन्तामन रतन शठ, छिपत उदधिमँझार।
अरे दुष्ट, तू चिंतामणि रतन को पाकर समुद्र में मत फेंक। अरे अंधे के हाथ में बटेर आ जाए, तो वह अपनी नासमझी के कारण उसे हाथ से छोड़ देता है।
कबहुँ नरक तिरजंच कबहूँ, कबहुँ सुरगबिहार ।
कभी नरक, कभी तिर्यंच और कभी स्वर्ग की पर्यायों में, विषयसुखों में रमण करता रहा। इस जगत में अनन्तकाल से इस प्रकार अनेक भवों में करता आ रहा है, और अब यह अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य जन्म मिला है।
पाय अम्रत पाँय धोवै, कहत सुगुरु पुकार।
यह मनुष्यजन्मरूपी अमृत पाकर, तू उसे पाँव धोने में व्यय कर रहा है अर्थात् निकृष्ट कामों में लगाकर व्यर्थ कर रहा है, निरर्थक कर रहा है! द्यानतराय कहते हैं कि अरे भाई, तू कषाय और विषयों को छोड़। तभी तू इस संसार के पार हो सकेगा, हो जावेगा।