सब कुछ क्रमबद्ध है , बस यही क्रमबद्धपर्याय का सच्चा श्रद्धान है ।
विचार करें ।
लगता है , अब यहाँ स्पष्टीकरण की आवश्यकता नही ।
● सही कहा । , लेकिन ऐसा तब संभव है , जब किसी महापुरुष के साथ रहा जाए , मुनिराज तो रह सकते नही , तथा उनके लिए तो कथा सुनना ही एक मात्र साधन है , वे उस महापुरुष के जीवन को प्रारम्भ से तो देख नही सकते ।
● तथा लिखने की परंपरा भी काफी समय बाद प्रारम्भ हुई है , और यह सही ही फैसला है कि सिद्धांत ग्रंथों की रचना पहले ही हो जाये । क्योंकि घटते हुए क्षयोपशम के साथ इनकी सुरक्षा कर पाना कठिन था , अतः सिद्धांत ग्रंथ पहले लिख दिए गए ।
● रही बात प्रथमानुयोग के साहित्य की , तो इसकी रचना का प्रयोजन आप मोक्षमार्ग प्रकाशक से देख ही लेंगे । वहाँ से इस बात को जोड़ कर समझ सकतें हैं ।
~ जो बात राम जी ने सीता से कही , वह बात तो वो ही जानतें है ,तथा उन शब्दों को हूबहू तो उतार नही सकते , इसलिए रस-छंद-अलंकार आदि का प्रयोग करके उन्हें लिखा है ।
परन्तु तथ्य की ओर मैं भी जब देखता हूँ , तो शंका होती है , लेकिन तब भी इसका महत्व नही है , महत्व तो उस कथा से लक्षित होने वाले सिद्धांतों का है ।
तिलोय - पण्णत्ति आदि ग्रंथ इसके साक्षी हैं ।
लेकिन जिसके द्वारा यह प्रतिपादित है , वह सर्वज्ञ है , वह वीतरागी हैं , दोषों से रहित हैं ।
इस कथा में doubt करने जैसा कुछ नही , आप अंजन चोर की कथा से भी परिचित होंगे , उसके साथ भी ऐसी कथाएं हैं कि वह आकाशगामिनी विद्या से युक्त था , तो हमारे महामुनिराज के संदर्भ में ऐसी शंका क्यों …?
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विदेह गमन
देवसेनकृत दर्शनसार ग्रंथ सभी को प्रामाणिक है। उसमें कहा है कि-
जइ पउमणंदिणाहो सीमंधरसामिदिव्वणाणेण।
ण विबोहइ तो समणा कहं सुमग्गं पयासंति।।४३।।
यदि श्री पद्मनंदिनाथ सीमंधर स्वामी द्वारा प्राप्त दिव्यज्ञान से बोध न देते तो श्रमण सच्चे मार्ग को कैसे जानते ? पंचास्तिकाय टीका के प्रारम्भ में श्री जयसेनाचार्य ने भी कहा है-
प्रसिद्धकथान्यायेन पूर्वविदेहं गत्वा वीतरागसर्वज्ञसीमंधरस्वामितीर्थंकरपरमदेवं दृष्ट्वा च तन्मुखकमलविनिर्गतदिव्यवर्ण… पुरप्यागतै: श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवै:।
श्री श्रुतसागर सूरि ने भी षट्प्राभृत की प्रत्येक अध्याय की समाप्ति में -
पूर्व विदेह पुण्डरीकिणीनगर वंदित सीमंधरापरनाम स्वयंप्रभजिनेन तच्छ्रुतसम्बोधित भारतवर्ष भव्यजनेन।
इत्यादि रूप से विदेहगमन की बात कही है।
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ऋद्धिप्राप्ति
श्री नेमिचन्द्र ज्योतिषाचार्य ने तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा नामक पुस्तक भाग ४ के अन्त में बहुत-सी प्रशस्तियाँ दी हैं। उनमें देखिए-
श्री पद्मनन्दीत्यनवद्यनामा, ह्याचार्यशब्दोत्तरकोण्डकुन्द:।
द्वितीयमासीदभिधानमुद्यच्चरित्र-सम्जातसुचारणद्र्धि:।
वंद्योविभुम्र्भुवि न वैâरिह कौण्डकुन्द:, कुन्दप्रभाप्रणयिकीर्ति-विभूषिताश:।
यश्चारुचारण-कराम्बुजचंचरीक-श्चक्रे श्रुतस्य भरते प्रयत: प्रतिष्ठाम्।
श्री कोण्डकुन्दादिमुनीश्वराख्यस्सत्संयमादुद्गतचारणद्र्धि:।
…चरित्रसजातसुचारणद्र्धि:।।४।।
तद्वंशाकाशदिनमणि-सीमंधरवचनामृतपान-संतुष्टचित्त-श्रीकुन्दकुन्दाचार्याणाम्।।५।।
इन पांचों प्रशस्तियों में श्री कुन्दकुन्द के चारणऋद्धि का कथन है तथा जैनेन्द्रसिद्धान्त कोश-२ में शिलालेख नं. ६२, ६४, ६६, ६७, २५४, २६१, पृ. २६३-२६६ कुन्दकुन्दाचार्य वायु द्वारा गमन कर सकते थे उपरोक्त सभी लेखों से यही घोषित होता है।
जैन शिलालेख संग्रह-(पृ. १९७-१९८)
रजोभिरस्पष्टतमत्वमन्तबह्यापि संव्यजयिर्तुयतीश: रज: पदं भूमितलं विहाय, चचार मन्ये चतुरंगुल स:।
यतीश्वर श्री कुन्दकुन्ददेव रज:स्थान को और भूमितल को छोड़कर चार अंगुल ऊँचे आकाश में चलते थे। उसके द्वारा मैं यों समझता हूँ कि वह अन्दर में और बाहर में रज से अत्यन्त अस्पष्टपने को व्यक्त करते थे।
हरी नं. २१ ग्राम हेग्गरे में एक मन्दिर के पाषाण पर लेख-
स्वस्ति श्री वर्धमानस्य शासने।
श्री कुन्दकुन्दनामाभूत् चतुरंगुलचारण।
श्री वर्धमान स्वामी के शासन में प्रसिद्ध श्रीकुन्दकुन्दाचार्य भूमि से चार अंगुल ऊपर चलते थे।
ष. प्रा.। मो. प्रशत्ति। पृ. ३९३ नामपंचकविराजितेन चतुरंगुलाकाशगमनर्द्धिना नाम पंचक विराजित (श्रीकुन्दकुन्दाचार्य) ने चतुरंगुल आकाशगमन ऋद्धि द्वारा विदेह क्षेत्र के पुण्डरीकिणी नगर में स्थित श्री सीमंधरप्रभु की वंदना की थी।
भद्रबाहु चरित्र में राजा चन्द्रगुप्त के सोलह स्वप्नों का फल कहते हुए आचार्य ने कहा है कि पंचमकाल में चारणऋद्धि आदि ऋद्धियां प्राप्त नहीं होती। अत: यहां शंका होना स्वाभाविक है किन्तु वह ऋद्धि निषेध कथन सामान्य समझना चाहिए। इसका अभिप्राय यही है कि ‘‘पंचमकाल में ऋद्धि प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ है तथा पंचमकाल के प्रारम्भ में दुर्लभ नहीं है, आगे अभाव है, ऐसा भी अर्थ समझा जा सकता है। यही बात पं. जिनराज फड़कुले ने मूलाचार की प्रस्तावना में लिखी है।