राजकुमारी ‘मुक्ति’ का स्वयंवर — जहाँ देवपूजराज, अध्ययनराज, संयमराज, तपराज व दानराज अपने-अपने बाह्य साधनों (पूजा, शास्त्र-अध्ययन, संयम, तप, दान) का गर्व करते हैं, पर कषाय-सहित व पर-लक्ष होने से मुक्ति द्वारा अस्वीकृत होते हैं; अंत में ध्रुव-स्वभाव में लीन ध्रुवतत्वराज (केवलज्ञान) ही मुक्ति का वरण करते हैं। भेदज्ञान व निश्चय-व्यवहार का मर्म समझाता मंचन-योग्य नाटक।
An adhyatmik Jain natak: princess ‘Mukti’ (liberation) rejects suitors who personify outer virtues done with pride, and unites only with dhruva-svabhava (the eternal self). Jain natak on bhedgyan for pathshala & cultural programs.
नाटक - स्वयंवर
(संतान नि लोभ इच्छा)
(मिथ्यात्वराज - [अस्पष्ट])
(अविरत - भोगोपभोग इच्छा)
(प्रमाद - शरीरसेवा, कर्तव्यच्युत)
(कषायराज)
(योगराज)
पात्र:
① राजा मुक्तिपुरी (उद्घोषक) मतलब
② राजा की पुत्री मुक्ति श्रुती - पात्राधिपति
③ पुत्री की सखी - समता
④, ⑤, ⑥, ⑦, ⑧, ⑨ - छै विभिन्न देशों के राजा
④ देवपूजराज
⑤ अध्ययन राज
⑥ संधर्मराज
⑦ तपराज
⑧ दानराज
⑨ ध्रुवतत्वराज - चैतन्य चक्रवर्ति (केवलज्ञान)
राजा - अहो कैसे कहूँ कि पुत्री मुक्ति विवाह योग्य हो गयी है, पर उसके वि योग्य कोई योग्य युवक राजकुमार दिखाई ही नहीं देता? क्या बसुंधरा पुरुष वीरों से खाली हो गयी है, कि जो भेठी पुत्री का वरण कर सके।
(ध्रुवतत्व राज को छोड़कर बाँकी सभी राजा गण एक साथ कहते हैं)
सभी राजा - राजन् हम हैं वीर, हम वरेंगें आपकी पुत्री मुक्ति को
राजा - तो ठीक है एक-एक करके आप अपनी-अपनी विशेषताओं को प्रगट करें, वेरी मुक्ति जिसको योग्य समझेगी उसकेही गले में वरमाल डाल देगी। क्यों बेटी ठीक है न
बेटी मुक्ति :- जी पिताजी जैसा आप योग्य समझें
देवपूजराज - महाराज मेरा नाम देवपूजराज है, मैं पिछले 50 बर्षों से नित्य देवपूजा करता हूँ, ऊँची आवाज में, सुरीले कंठ से जब तक मैं पूजा न करूँ मैं जल नहीं करता, मैंने देव पूजन के कई बड़े अनुष्ठान भी किये हैं, मैंने जीव में कई विधान और पंचकल्याणक किये हैं, यहाँ तक कि मैंने प्रत्येक रवि को पार्श्वनाथ भगवान की पूजन की है तो शनिवार को मुनिसुव्रतनाथ से पूरे देवालय को गुंजायमान किया है। (मुक्ति अब! मुक्ति मुझे ही वरण करना चाहिए।)
मुक्ति - राजकुमार अभी तो आपको सच्चे अर्थों में अपना परिचय ही नहीं आप अस्पर्शी ज्ञानस्वरूपी तत्व हैं और आप भाषा वर्गण रूप सुरीले कंठ से अपना परिचय दे रहे हैं आप मेरे योग्य कहाँ? दूसरे आपकी पूजन लोभ कषाय या जिद्द हेतु ही रही तब तो आप दिन विशेष से तीर्थंकरों में बँटवारा किए हैं, आपके ख्याल में ही नहीं कि किसी भी तीर्थंकर की किसी भी क्षेत्र में अथवा किसी भी काल में भजो तत्काल सम्यक्त्व रुपी कला की प्राप्ति होती है। अब आप विश्राम करें
द्वितीयराजा
अध्ययन राज → राजन मुक्ति मेरे ही योग्य है क्योंकि मैं जीवनभर शास्त्र अध्ययन करता रहा मैंने ग्यारह अंग और नौ पूर्व पूरे पढ़ लिये हैं मैं किसी के भी कोई भी प्रश्न का जवाब दे सकता हूँ, आज कोई भी मेरी टक्कर में नहीं लगता, मेरा क्षयोपशम अद्भुत है, कोई भी मुझसे शास्त्रार्थ नहीं कर सकता, मैंने षट्खंडागम पढ़ा है। राजन मैंने धवला टीकायें पढ़ी हैं, मैं, तत्वार्थसूत्र की टीकायें कंठस्थ की हैं, राजन मुक्ति से कहो कि व मुझे वरण करे
मुक्ति → अध्ययनराज बड़ाही गर्व है आपको अपने क्षयोपशम पर, जिन आचार्य भगवंतों की टीकायें आपको याद हैं वह तो अपने को लघु समझते हैं और मार्दव धर्म का पालन करते हैं वह कहते हैं कि हमने तो स्वयं को ही मात्र पढ़ा है और कुछ नहीं और यदि जीव का विशेष भी जाना है तो उस सामान्य की दृष्टि के प्रयोजन से ही जाना है। उस विशेष में अटकने को नहीं और आप अपने क्षयोपशम पर ही मोहित हैं जो कर्म की अपेक्षा रखता है और उसको निरीक्ष्य इस पारणामिक की आपको उपरति नहीं है। कृपया कर अभी आप स्व को पढ़ें, ज्ञेय को नहीं।
तृतीयराजा → संयमराज → मुक्ति सत्य कहा. इन्होंने ग्यारह अंग पढ़े पर कोरे के कोरे ही रहे, मेरा जीवन देखो मैं छहकाय के जीवों की किंचित् विराधना नहीं करता, मैं पानी छानता हूँ। मर्यादित खान पान करता हूँ। मैंने इन्द्रियों पर विजय पा ली है मैं सर्दी हो या गर्मी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है, मैंने भरी गर्मी में पहाड़ों पर खड़े रहकर साधना की है, केवल इस कारण कि मुक्ति मुझे मिलेगी। आओ मुक्ति मुझसे मिल जाओ तुम्हारे खातिर मैंने शरीर को कौन से कष्ट नहीं दिये।
मुक्ति → राजकुमार संयमराज आप भूल रहे हैं, आप पड़ोसी के कार्यों को अपना कार्य बता रहे हैं एक क्षेत्र अवगाह संबंध होने से आप भूल गये कि जो असमान जाति द्रव्य पर्याय मेरी थीं ही नहीं, उससे होने वाले कार्य मेरा कैसे हो सकता है। स्वभाव पर लक्ष होता है तो दृष्टि शरीर के अनुकूलता प्रतिकूलता नहीं देखती, इसका नाम संयमथा, पर आप तो शरीर के कार्यों से ही अपनी महानता मान रहे हैं। क्षमा करें और [अस्पष्ट]।
तपराज→ राजन पूर्व राजकुमारों को अयोग्य ठहराया यह योग्य ही है, आप मेरी तरफ लक्ष कीजिये। मैंने छह-छह माह के उपवास किये। मैंने बीस बर्ष से नमक नहीं खाया। मैंने विविध प्रतिज्ञाओं का पालन करते हुये भोजन लिया, भोजन में कोई कमी हुई तो फिर प्राश्यचित्त लिया, और मैंने दुनिया को दिखा दिया कि मैं कितना बड़ा तपस्वी हूँ। मैंने अपने तप के प्रभाव से कई चमत्कार किये हैं। दुनिया में लोग मेरा लोहा मानते हैं। कई बर्बरों से मैंने दोस्ती कर रखी है। आप मुझे ही माला पहनायें।
मुक्ति→ राजन बड़े ही अज्ञानी हो, चैतन्य चमत्कार की खबर नहीं होने से दुनिया के जड़ चमत्कार से प्रसिद्धि पाने की बुद्धि बनी रहती है, मुक्ति जड़ चमत्कार से प्राप्त नहीं होती यह बात से बेखबर आप कभी मुक्ति को नही पा सकते। बड़े उपवास रखकर आपने काफी मान कमाया है और पुण्यता हासिल कर ली, उन उपवास के पुण्य का फल तो आपने यहीं नगद ले लिया। अब आपके पास क्या बचा जो मुक्ति को पावे।
दानराज→ मुक्ति मेरी सुनो, राजन आप भी सुनो। मैंने मुक्ति को पाने के लिए क्या-क्या नहीं किया। मैंने बड़ी-बड़ी धर्मशालायें बनवायीं, मैंने औषधालय खुलवाये, मैंने स्कूल कॉलेज खुलवाये, लोग मानते हैं कि मैं क्या हूँ? और राजन आप कहें तो मैं आपकी धर्मशाला के निर्माण में अभी कुछ मदद कर दूँ। मैं पंचकल्याणक में २५ लाख रूपयों की बोली लेकर सौधर्म इन्द्र बना था, हाथी पर बैठकर मैं नगर में घूमा था, लोग वाह वाह कह उठे, मुक्ति प्रसन्न होकर वरमाला मुझे डालो आपके भाग्य खुलने का समय आ गया है।
मुक्ति→ रे पापी, हाथी पर बैठकर अपनी मान प्रतिष्ठा कराकर तू क्या सोचता तू धर्मात्मा है। तुझे अरे राजकुमार अभी बुद्धि विकसित कर सोचो कि एक संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव जो कि हम सब जैसा ही परमात्म तुल्य है। उस पर बैठ कर अपना बड़प्पन इसका नाम त्याग है क्या? अरे होना तो मान का त्याग था, पर तुमने त्याग का ही मान कर लिया। और मुक्ति को लेने आये हो।
राजन - लगता है पृथ्वी पुरुषार्थी वीरों से रहित हो गयी है, बेटा मुक्ति तुम्हारे निर्णय से मैं सहमत हूँ, पर क्या तुम्हारा स्वयंवर अवरुद्ध हो जायेगा। अरे राजकुमार आप तो शांत बैठे हैं आपने अपने बारे में कुछ नही बताया। कहिये आप भी तो कुछ कहिये।
ध्रुवताराज - राजन क्या कहूँ। जगत में कुछ ऐसा लगता ही नही जिसमे चित्त रंजायमान हो। पर द्रव्य में एकत्व या कर्तत्व ही दुःख का कारण है। अता ज्ञायक स्वभाव से हटने का परिणाम ही नहीं होता, जबसे तत्व निर्णय हुआ है, हेय, ज्ञेय, उपादेय रूप बुद्धि हुई है, तबसे स्वभाव में ही रस आता है, हालांकि जब स्वभाव की स्थिरता टूटती तो देवपूजा, दान, संयम आदि का भी भाव आता है, पर कमजोर क्या करने लायक होती है? नहीं राजन अस्थिरता जन्य पुरुषार्थ में होने वाले कार्य शुभ बंध के कारण हैं जो कि संसार को ही बढाते हैं उनसे मेरी शोभा कैसी? अतः राजन मैं शांत हूँ। राजन क्या कहूँ देखो तत्व विचार की महिमा, तत्व विचार रहित - - - -
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- मुझे मेरे, पर मिल गए ने
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मुक्ति - पिताजी मैं तो ध्रुवतब्बराज नही वरण करुंगी
ध्रुवत्वराज - पर मुक्ति मुझे तुम्हें वरण करने का भी राग नहीं है, मेरी दृष्टितो ध्रुवस्वभाव पर ही है, पर्याय में मैं मुक्त स्वरूप ही अनुभवता हूँ। मेरी दृष्टि मुक्ति पर्याय पर भी नहीं है
मुक्ति - पर ध्रुव मेरा, आश्रय तो त्रिकालीध्रुव ही है। मैं भी अब अपने को पर्याय अनुभव करती है, मैं भी तो ध्रुव हूँ और ध्रुव में ही समा जाना चाहती हूं, आओ ध्रुवहम एक हो जावें। और दोनो गले लग जाते है
तपराज → राजन पूर्व राजकुमारों को अयोग्य ठहराया यह योग्य ही है, आप मेरी तरफ लक्ष कीजिये। मैंने छह-छह माह के उपवास किये। मैंने बीस बर्ष से नमक नहीं खाया। मुक्ति मैंने विविध प्रतिज्ञाओं का पालन करते हुये भोजन लिया, भोजन में कोई कमी हुई तो फिर प्राश्यचित्त लिया, और मैंने दुनिया को दिखा दिया कि मैं कितना बड़ा तपस्वी हूँ। मैंने अपने तप के प्रभाव से कई चमत्कार किये हैं। दुनिया में लोग मेरा लोहा मानते हैं। कई बर्बरों से मैंने दोस्ती कर रखी है। आप मुझे ही माला पहनायें।
मुक्ति → राजन बड़े ही अज्ञानी हो, चैतन्य चमत्कार की खबर नहीं होने से दुनिया के जड़ चमत्कार से प्रसिद्धि पाने की बुद्धि बनी रहती है, मुक्ति जड़ चमत्कार से प्राप्त नहीं होती यह बात से बेखबर आप कभी मुक्ति को नहीं पा सकते। बड़े उपवास रखकर आपने काफी मान कमाया है और पुण्यता हासिल कर ली, उन उपवास के पुण्य को आपने यही नगद ले लिया। अब आपके पास क्या बचा जो मुक्ति को वरे।
दानराज → मुक्ति मेरी सुनो, राजन आप भी सुनो मैंने मुक्ति को पाने के लिए क्या-क्या नहीं किया। मैंने बड़ी-बड़ी धर्मशालायें बनवायीं, मैंने औषधालय खुलवाये, मैंने स्कूल कॉलेज खुलवाये, लोग मानते हैं कि मैं क्या हूँ? और राजन आप कहें तो मैं आपकी धर्मशाला के निर्माण में अभी कुछ मदद कर दूँ। मैं पंचकल्याणक में 25 लाख रूपयों की बोली लेकर सौधर्म इन्द्र बना था, हाथी पर बैठकर मैं नगर में घूमा था, लोग वाह वाह कह उठे, मुक्ति प्रसन्न होकर वरमाला मुझे डालो आपके भव्य खुलने का समय आ गया है।
मुक्ति → रे पापी, हाथी पर बैठकर अपनी मान प्रतिष्ठा कराकर तू क्या सोचता तू धर्मात्मा है। बुझे अरे राजकुमार अभी बुद्धि विकसित कर सोचो कि एक संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव जो कि हम सब जैसा ही परमात्म तुल्य है। उस पर बैठ कर अपना बडप्पन इसका नाम त्याग है क्या? अरे होना तो मान का त्याग था, पर तुमने त्याग का ही मान कर लिया। और मुक्ति को लेने आये हो।
राजन → लगता है पृथ्वी पुरुषार्थी वीरों से रहित हो गयी है, बेटा मुक्ति तुम्हारे निर्णय से मैं सहमत हूँ, पर क्या तुम्हारा स्वयंवर अवरुद्ध हो जायेगा। अरे राजकुमार आप तो शांत बैठे हैं आपने अपने बारे में कुछ नही बताया,। कहिये आप भी तो कुछ कहिये।
ध्रुवताराज – राजन क्या कहूँ, जगत में कुछ ऐसा लगता ही नही जिसमे चित्त रंजायमान हो। पर द्रव्य में एकत्व या कर्तत्व ही दुःख का कारण है। अता ज्ञायक स्वभाव से हटने का परिणाम ही नहीं होता, जबसे तत्व निर्णय हुआ है, हेय, ज्ञेय, उपादेय रूप बुद्धि हुई है, तबसे स्वभाव में ही रस आता है, हालांकि जब स्वभाव की स्थिरता टूटती तो देवपूजा, दान, संयम आदि का भी भाव आता है, पर कमजोर क्या करने लायक होती है? नहीं राजन अस्थिरता जन्य पुरुषार्थ में होने वाले कार्य शुभ बंध के कारण हैं जोकि संसार को ही बढाते हैं उनसे मेरी शोभा कैसी? अतः राजन मैं शांत हूँ। राजन क्या कहूँ देखो तत्व विचार की महिमा, तत्व विचार रहित – – – –
– – – मुझे मेरे, पर मिल गए ने
मुक्ति : पिताजी मैं तो ध्रुवताराज कही वरण करुंगी
ध्रुवताराज - पर मुक्ति मुझे तुम्हें वरण करने का भी राग नहीं है, मेरी दृष्टितो ध्रुवस्वभाव पर ही है, पर्याय का मैं मुक्त स्वरूप ही अनुभवता हूँ, मेरी दृष्टि मुक्ति पर्याय पर भी नहीं है
मुक्ति! पर ध्रुव मेरा, आश्रय तो त्रिकालीध्रुव ही है। मैं भी अब अपने को पर्याय अनुभव करती है, मैं भी तो ध्रुव हूँ और ध्रुव में ही समा जाना चाहती हूँ, आओ ध्रुव हम एक हो जावें। (और दोनो गले लग जाते है)
स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि, यूनिकोड देवनागरी में लिप्यंतरित)।
प्रूफरीडिंग बाकी है