मिथ्यातम नाशवे को | Mithyatam Nashve ko । जिनवाणी स्तुति । Jinvani Stuti

shastra
#1

मिथ्यातम नाशवे को, ज्ञान के प्रकाशवे को,
आपा-पर भासवे को, भानु-सी बखानी है ।
छहों द्रव्य जानवे को, बन्ध-विधि भानवे को,
स्व-पर पिछानवे को, परम प्रमानी है ॥

अनुभव बतायवे को, जीव के जतायवे को,
काहू न सतायवे को, भव्य उर आनी है ।
जहाँ-तहाँ तारवे को, पार के उतारवे को,
सुख विस्तारवे को, ये ही जिनवाणी है ॥

हे जिनवाणी भारती, तोहि जपों दिन रैन,
जो तेरी शरणा गहै, सो पावे सुख चैन ।
जा वाणी के ज्ञान तैं, सूझे लोकालोक,
सो वाणी मस्तक नमों, सदा देत हों ढोक ॥

Artist - अज्ञात
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