Meaning of these lines in Nandishwar Pujan


#1

What is the meaning of following red marked lines in Nandishwar Pujan?

nandishwar pujan


#2

नंदीश्वर द्वीप में विराजमान भगवंतों का वर्णन इन पंक्तियों में किया गया है।
लाल नख मुख से यहां गुलाबी नख एवं मुख लेना, नयन अर्थात आंखें श्याम (काली) और श्वेत (सफेद) है। भौंहे काले रंग की है तथा सर के केश भगवान की सुंदरता को और निखार रहे हैं । भगवान की सूरत तो ऐसी लग रही है मानो मुस्कारतें हुए उनके मुख से वचन निकल रहे हो और हमारे मिथ्यात्व रूपी अंधकार का क्षय हो गया हो।

Please rectify, if anything wrong is stated.


#3

These line looks bit contradictory to वीतरागता.

हास्य नो कषाय है। What say?


#4

हास्य (laughter) is a नोकषाय but not a smile. On the other hand, we see many जिनप्रतिमा having a smiling gesture and it can be considered a symbol of समता भाव as well.
And in thi context, the writer is expressing his views and feels as if the जिनप्रतिमा is smiling and about to utter some words of हित.


#5

It should also be considered under हास्य। It’s a type of राग परिणाम।

However, I think, द्यानत राय जी wrote that out of poetic style. Any idea?


#6

But it’s all about a जिनप्रतिमा and not an Arihant bhagwan. May be that’s a poetic way of describing like using metaphor.


#7

नंदीश्वर द्वीप में विराजमान प्रतिमा देखने पर ऐसी प्रतीत होतीं हैं मानो कि वे साक्षात भगवान ही बैठे हों। इसलिए इस प्रकार का शारीरिक सौन्दर्यतापूर्वक कथन कवि ने किया है।
हँसत शब्द के आगे मनो लगा हुआ है, जिससे स्पष्ठ ख्याल में आता है कि ये मात्र एक कल्पना की गयी है। जिनेन्द्र भगवान की मूर्ति हसमुख नही होती, और न ही उदास अपितु साम्यभाव रूप होती है। जहाँ जहाँ ऐसी प्रतिमाएं देखने मे आती है वे सभी मात्र मंदिर की शोभा बढ़ाने के लोभ में स्थापित की गयी है, जो की गलत है।

हँसत शब्द को दर्शन करने वाले व्यकि के साथ भी जोड़ा जा सकता है। जिनेन्द्र भगवान की बोलती हुई सजीव प्रतिमा को देखकर मानो संसारी जीव के हंसते हंसते(सहज रूप से) कलुषताओं का नाश हो गया हो।


#8

त्रिलोकसार, गाथा 958
सिंहासणादिसहिया विणीलकुंतल सुवज्जमयदंता।
** विद्दुम अहरा किसलय सोहायर हत्थपायतल।।958।।**

अर्थ :- सिंहासन ,छत्रादिक से संयुक्त हैं , मस्तक आदि पर केश हैं, वज्रमयी दांत हैं , मूँगा के समान रक्तवर्णीय होठ हैं, नवीन कोंपल के समान किसलय हैं, रक्तपने की शोभा से युक्त हस्त तल और पाद तल हैं, ऐसी जिनेन्द्र देव की प्रतिमा विराजमान होती है।

नंदीश्वर पूजन में पण्डित द्यानतराय जी भी इसीप्रकार लिखते है :-
लाल नख मुख नयन श्याम अरु स्वेत हैं।
श्याम रंग भोंह सिर केश छबि देत हैं ।।