मर्यादा काल और अभक्ष्य का विवेक | Maryada Kaal Aur Abhakshay Ka Vivek


जैनेन्द्र प्रमाण कोष

Please through light on the marked para.

1)किसे इष्ट माने किसे नहीं। क्योंकि अधिकतर वनस्पति या तरल पदार्थ में कुछ न कुछ गुण पाए जाते हैं जो किसी अपेक्षा शरीर के लिए लाभकारी हो सकते हैं।

2)मर्यादा काल यदि प्राचीन समय का था तो आज के समय मे क्या मानना सही है।

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@Labdhi_Shah जी, जय जिनेन्द्र।
आपका प्रश्न बहुत समय तक बिना उत्तर के रहा, इसके लिए खेद है। श्रुतम् में शास्त्रों से जो मिला, वह यहाँ रख रहे हैं।

1. भक्ष्य और अभक्ष्य का आधार: किसी पदार्थ के शारीरिक गुण से अधिक, उसके सेवन में होने वाली हिंसा देखी जाती है। जिसमें बहुत जीव उत्पन्न होते हैं, वह अभक्ष्य है।

नवनीतं च त्याज्यं योनिस्थानं प्रभूतजीवानाम् । यद्वापि पिण्डशुद्धौ विरुद्धमभिधीयते किञ्चित् ।।१६३।।

(पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, गाथा १६३; पुरुषार्थसिद्ध्युपाय प्रवचन भाग ३, पृष्ठ ७६)

कंदमूल माटी विष आमिष, मधु माखन अरु मदिरापान । फल अति तुच्छ तुसार चलित रस, जिनमत ए बाईस अखान ।।५५।।

(नाटक समयसार प्रवचन भाग ६, पृष्ठ ३४०)

2. मर्यादा काल:

आटा शीतऋतु में सात दिन का, ग्रीष्म ऋतु में पाँच दिन का, वर्षा ऋतु में तीन दिन से अधिक का नहीं खाना चाहिये। आटा का संग्रह नहीं करना चाहिये। आटे में बहुत लटें पैदा हो जाती है।

(रत्नकरण्ड श्रावकाचार, पं. सदासुखदास जी कासलीवाल की टीका, पृष्ठ १८३)

श्रुतम् के उत्तर का भाव यह है कि सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति का नियम समय के साथ नहीं बदलता, इसलिए शास्त्रोक्त मर्यादा आज भी मान्य है।

स्रोत: श्रुतम् (ऊपर दिए ग्रंथ और पृष्ठ)

साधर्मी जन से निवेदन: दूध, घी, दही और पकवानों की मर्यादा किन ग्रंथों में आती है, संदर्भ सहित यहाँ रखिए।