मणिभद्र नाटक
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ॐ
श्रीपरमात्मने नमः।
पंडित कुंजबिहारीलाल जैन शास्त्री “वत्सल”
कृत
गद्य-पद्यमयी स्टेज पर खेलने योग्य
मणिभद्र-नाटक।
प्रकाशक—
पंडित कुंजबिहारीलाल जैन शास्त्री,
प्रथमप्रचार ५००
मिली माघसिद शुक्ला २
वीर सम्वत् २४६५
विक्रम सम्वत् १९८५
मूल्य ॥
सर्वाधिकार प्रकाशयित्राधीन रक्खा है।
Printed and Published by
Srilal Jain
at the JAIN SIDDHANT PRAKASHAK PRESS,
3, Visvakosh Lane, Baghbazar, Calcutta.
ग्रन्थकर्त्ताके हार्दिक भाव।
लीजिये पाठक महानुभाव ! यह प्राथमिक भेद आपके
सामने ‘परिपुष्प-नाटक’ उपस्थित है। चाहे इसे स्टेजपर खेलिये,
चाहे यों ही पढ़िये, यह आपको रुचि पर निर्भर है। वर्तमानमें
इसका अक्षर अनमोल विशेष पड़ रहा है बड़ी विचारपूर्वक मैंने
कुछेक नाटक एवं ड्रामा तैयार किये हैं, जिनमें प्रायः इस बाल-
नाटिका नित्य नयी मिलनधर्मके साथ किया गया है। दो नो
भारतकी सन्तानें कभी नहीं हैं मगर ऐसे बहुत कम दृश्य हैं
जो सब वस्तुगतिके प्रत्यक्ष उद्बोधन हटाना हो।
इस पुस्तकमें मैं यथावाद्य रोचक्ता, विषयकी स्पष्टता आदि
लाया हूँ मगर मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी इस कंमको शैलो
अमलताको द्योतक ही होगी। सदापि मैं आशा करता हूँ कि
विषय उपयोगी जानकर इसका भी समादर आदर करनेमें कमी
न रखेंगे, वह इससे अवश्य फायदा उठावेंगे।
जिन महाशयोंकी प्रेरणासे मैंने बड़े निर्माण किया है
उन्हें मैं हार्दिक धन्यवाद देता हूँ क्योंकि वे प्रेरणा न करते तो
मैं खालसी कभी भी इस कमने समाजकी सेवा नहीं कर
सकता था।
अन्तमें मेरा निवेदन यह है कि इस विषयमें मेरी भज्ञानता
आदि अनेक त्रुटियां रह गई होंगी परन्तु बालक बुद्ध, बनपर
विशेष ध्यान देकर मुझे प्रोत्साहित करेंगे ताकि मैं उनके साथ
के बुधा भी सर्वोप सुदृढ़ कुलर्क भेंट कर सकूं 'शुभं भूयात्
समानका दास
कुंजविहारीलाल जैन ‘वत्सल’
महान्यापक-दि० जैनपाठशाला, हजारीबाग।
नाटकके पात्र !
प्रभाचन्द्र … सुभद्र सेठका पुत्र
कर्मकार … मणिभद्रका मुनीम
दिनेश … मणिभद्रका मित्र
यमदंड … अनूह हिलकाका नोकर
ज्ञानचंद … ब्रह्मचारी
कालिया … मिस्तर (म०)
कुरा … निहत्तर
अठ, वकील, पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट, तिवारी, दारोगा और
मुकादमदार आदि।
नाटककी पात्रायें !
चन्द्रप्रभा … मणिभद्रकी स्त्री
अनंततिलका … चेष्टा
रूपतिलका … अन’नतिलकाकी लडडी
शुभाभद्रा … मणिभद्रकी मा
निपुणा … बुढी और परियां
मणिभद्र नाटक।
प्रथमांक
( पार्विका मंगल गान करके लिये जाना )
परियां—श्री अजित जिनवरा, सन कृप लयकरा,
आज काज साधि विघ्न नाशि मनहरा ॥ टेक ॥
आज खुशीका समय तुमह दु’दर सुखदपदके जिनराज ।
मोद बढाऊँ हर्ष मनाऊँ गाऊँ गुण रूप हे महाराज ॥
मोद मन भरा ॥ श्री, अजित जिनवरा० ॥
शील शिरोमणि हे दुनिमामें अबतो यशपाया तुम भाल ।
छ्यसन सभी दुखवाई जगाऊँ, उन्हें भगा साधा निजकाल ॥
स्वच्छ गुणधरा ॥ श्री अजित जिनवरा० ॥
सम्यग्ज्ञान चारित्र पूज्य उनको तुम पाय हुये सिरताज ।
मिथ्या चारित्रादि हेय लखि छोडि दिये वैभाविक साज ॥
श्रलि धनधरा ॥ श्री अजित जिनवरा० ॥
कुशील नाशक नाटक खेलों हम्म तुमह द’र दु’रबधाय ।
सुनकर नर नारी तुम छोडो 'कु’जन भारी कुस दाष ॥
ज्ञान उजधरा ॥ श्री अजित जिनवरा० ॥
( गाते गाते परियोंका चला जाना )
शृंगारिक नाटक।
अंक पहिला-सीन पहिला।
स्थान-सेठ सघिभद्रका महल।
( सघिभद्र स्वाध्याय कर रहा है, सामने उसकी स्त्री चन्द्रप्रभा
शृंगार किये हाथमें ताम्बूलारि सामग्री लिये खड़ी है )
चन्द्रप्रभा—(स्वगत) क्या करूँ ? साधी तो कुछ देखते ही नहीं,
रात्रि दिन शास्त्रस्वाध्यायमें ही लगे रहते हैं। सिवाय पुस्तकके
यापर पलटनेके दूसरा तो ज्ञान ही नहीं है। (प्रगट स्वामीकी
तरफ) हे स्वामिन् ! कहिये। क्या आज्ञा है ? दासी आपके
सामने खड़ी है।
सघिभद्र—(ऊपरको निगाह उठाकर) अये। तुझे क्या
चाहिये ?
चन्द्रप्रभा—(शरीरको आकृति दिखाकर)
प्राण [ मैं क्या चाहती हूँ, आप क्या नहिं जानते।
कपरी रंग. ढंगसे बधा बदन वर्द्धि पहिचानले ॥
पिया कभी कोर्से 'पता सखी दरद दिलका फनी।
हो रहा की कह मोरी मदन-मर्मनका अभी ॥
क्या मेरी शरीरकी वेखा आप नहीं देख रहे हो ?
सघिभद्र—क्या तेरे शरीरमें कुछ वेदना है ?
चन्द्रप्रभा—हाँ नाथ ! वेदना है। क्या आप मेरी इस वेदनाको
नहीं मिटावेंगे ?
प्रथम अंक।
सघिभद्र—सारे जीवोंको सतत्ली वेदना दुःखदायिनी।
क्या कमोखी बात ये है प्रगट दीखे कामिनी ॥
शास्त्रके सुनने-सुनानेसे सभी सुख नाश हो।
वेदना रहित होकर सिद्धपदका प्राप्त हो ॥
तुम शास्त्रअध्ययन करो, इसी शास्त्रस्वाध्यायसे तुम्हारी सारी
वेदना दूर हो जायगी।
चन्द्रप्रभा—नाथ ! तुम्हारी बातका उत्तर मुझे सूझै नहीं।
किस कर्मका है बंध यह समझमें आता नहीं ॥
है पहा आश्चर्य यह सबसे कहा जाता नहीं।
क्या करू कुछ कर्ममें जो मन मेरा लगता नहीं।
क्या करू ! कर्मोदय अनिवार्य है।
सघिभद्र—किस कर्मका उदय कहती यश तुझे मालूम नहीं।
कर्म क्षयोदय उदय है, ये तुझे मालूम नहीं ॥
शास्त्रकी बाता नहीं तू इसीसे मालूम नहीं ॥
शास्त्रका स्वाध्याय करके दुःख क्यों मेटे नहीं।
आज कई दिनोंसे ही क्यों, अनादिकालसे ही इस जीवकी ऐसी
दशा को नहीं है। क्या तू नहीं जानती ? यदि तेरी इच्छा हो तो
बताऊँ कि इस कर्मोदयने संसारी जीवकी क्या दशा होती है।
चन्द्रप्रभा—क्या नाथ ! शास्त्रस्वाध्यायके अतिरिक्त मेरी
वेदना मिटानेका कोई दूसरा उपाय नहीं ? क्या आप समयकाल
-दशर भी मेरी वेदनाकी नहीं मेट सकते ? क्या मुझ यह दुख
'आजन्म सहन करना होगा ? क्या मुझ, दुखियाकी तरफ
मणिश्रेष्ठ नारद ।
कायरता चित्त में आयेगा ? सावधान ! मेरा दुख देखनेकी आपको सामर्थ्य है ।
मणिश्रेष्ठ– यद्यपि स्त्री है, सुन्दर, यह दण्ड देने योग्य है; मैं, सम्बोधन से नहीं हँ, मगर किसी धर्मका समर्थन भी माननेसे कोई विशेष आपत्ति नहीं है । अच्छा, तू बैठ, मैं ऐसे बेखबर बैठनेका उपाय करता हूँ ।
चन्द्रप्रभा– सामने बैठ जाती है और अनेक हाथ भाव प्रगट आदि दिखाती है । प्राणनाथ ! …
मणिश्रेष्ठ– बात काट कर । यह क्या ! तू शरीर ऐसा बेकाबू क्यों कर रही है ? मेरे नेत्र ऐसे चलायमान क्यों दीख पड़ते हैं ? क्या इस तरह अपशब्दोंसे क्यों रोती है ?
चन्द्रप्रभा– शरीरको ठीक करके । नहीं स्वामी ! यह शरीर ऐसे ही तो चला रहेगा, वैद्यकका प्रयोग अनिवार्य है । कीजिये, एक बारमें ! पागलका पीड़ा देती है ।
मणिश्रेष्ठ– शास्त्र स्वाध्यायके समय क्या यह चीज स्वामी चाहिये ।
चन्द्रप्रभा– लज्जा । क्या इसका स्वरूप हँस दे । रुचिके दल भेदाका समय है, इस वक्त तुमिरमें आनन्द एक रही है । अपभ्रंश ! काम मुझे समयसे १ बहुत दिन हो गये लेकिन इनका व्यवहार इससे अभी तक नहीं घटाया ! क्या कहूँ मेरा साथ अगर विफल जाता है । अवश्य ही मेरे कोई प्रबलधर्मका उदय है, अन्यथा ऐसी दशा आज क्यों होती, न मालूम इसका ऐसा वेग
मणिश्रेष्ठ ।
कब सफल रहेगा । प्रगट तेजकी तरफ इशारा करके । आहा-हा ! बलिये, अन्दर तेज सवार है, आराम कीजिये और मेरी प्रतीक्षाप्रभाको भी पूरी कीजिये मुझे आप कितने दिनोंसे भुजंग रहे हैं । नाथ ! मेरी तरफ नहीं देखते कि आपकी आत्मीयताकी क्या दशा हो रही है । मैं अपने निजी दुःखकी कहाँ तक कहूँ । आप डाँटिये और जलिये, मुझे क्यों विशेष तरसाते हो ?
मणिश्रेष्ठ– क्यों ? आजो तो संन्यासी हुई है ? देखो, जरा स्वाध्याय छोड़कर मैं वाद सुनने चलूँगा । फिर स्वाध्याय करने लगता है ।
चन्द्रप्रभा– लज्जित । अर्द्ध रात्रिके समय भी साँझ इनका आलसी हाथ रहे । दुष्कर्म ! तब गति समयमें नहीं सादती । दुख प्रिया, सुखकी तुझे कुछ खबर भी आता नहीं । निद्रित होते हुए किसीने दुःख क्या पाया नहीं ।
क्या कहूँ ? स्वामी तो मेरी चेष्टाओंमें असली बात समझते नहीं और मैं भी इससे साफ २ किन शब्दोंमें कहूँ, किन शब्दोंमें मैं कहती हूँ तब शब्दोंका ये अर्थ भी दूसरा लगा लेते हैं । मैं बड़ी दरिद्रजान हूँ । देखो, स्त्रीकी लज्जा भी कितनी बलिष्ठ है, जो अपने पतिसे साफ साफ कहनेमें हिचकती है । तो क्या अब मैं निर्लज्ज होकर ही सब बातें इनसे कह दूँ मगर इन्होंने फिर भी कहीं “छो भवाधि” लगाकर उसका अर्थ बहुत दिन तब मैं क्या कहूँगी । तथापि कहूँ तो सही, देखूँ । तब अन्तिम उपायका भी क्या असर होता है ? प्रकट–लाजमोडे । धिक्कार !, शक्ति बहुत हो गई है । इस समय सारी दुनियामें आराम कर रही है,
सनिग्रह नाटक ।
मृगिभट्ट—आप भी चलें और मुझ संतप्तहृदयको अपने अपूर्व प्रेमामृतसे शीतल करें। नाथ ! यह आरम्भ करमेका समय है।
मृगिभट्ट—तो यहाँ चलकर ही क्या होगा। मैं तुम्हें यहाँपर पेना उपदेशामृत पिलाऊँगा जिससे तेरा जलता हुआ हृदय शीतल हो जायगा। उसके सुननेसे तुझे यह आनन्द प्राप्त होगा जो वचनोंके अगोचर है। कदा समुख शांति अधिक हो गई है। महीमे क्या दशा है?
चन्द्रप्रभा—(स्वगत) मैं तो प्रथम ही जानती थी कि इसका भी ये व्यर्थ बदल देंगे, वही हुआ। अबतु ! तीन कलोड़यके समान सारे प्रयत्न निष्फल हो जाते हैं। (प्रगट, स्वामीसे) हाँ नाथ ! रात्रि बहुत हो गई है, पक्षीभी ग्वरदले ऊपर सो गया है, देखिये (घड़ी दिखाती है)
मृगिभट्ट—क्याकहने ऊपर हो गया ! तब चलो, आखिर तो तुम्हारी बात माननी ही पड़ी (दोनों उठकर चल देते हैं, मृगि- भट्ट सेज पर सो जाता है और चन्द्रप्रभा सामने खड़ी रहती है)
मृगिभट्ट—(सेजपर पड़ा पड़ा) तुम भी आराम करो और यदि इच्छा हो तो धर्मोपदेश सुनो। क्या शास्त्र सुननेकी अभिलाषा है?
चन्द्रप्रभा—नहीं नाथ ! नींद नहीं आती?
मृगिभट्ट—क्यों?
चन्द्रप्रभा—मालूम नहीं। जो उठ रहा है, मनमें कई प्रकारके संतर जाल पड़ रहे हैं, मेरा चित्त उचट गया है। नाथ !
प्रबोध
मेरा चित्त कोई काम करनेमें नहीं लगता। क्या करूँ? जिसका बहुत समावती है मगर हाथसे निकल ही जाता है।
मृगिभट्ट—(देखकर) क्या कहा? जी डर रहा है, सो तो ठीक ही है, जो सभी संसारी जीवोंका उड़ता रहता है। इस मनका चल विचल होना ही तो दुःख है। तथापि यह संछठ मन क्षणिकभी लाखोंसे बंधा ना सकता है। क्या स्वाध्याय करूँ? सुनूँ और उपदेश सुनाऊँ। मैं ठीक कहता हूँ कि तेरा चित्त शांत शांत्भाव करने या सुननेके ठीक दिशामें पर जा जायगा और शास्त्रतत्त्वसे इतनी रुचि बढ़ जायगी कि चित्त फिर कहीं भी चलायमान न होगा। यदि उपदेश सुनवा हो तो बैठ आ और सुन।
चन्द्रप्रभा—सुखिया उपदेश, स्वामी। अब नहीं डरकार है।
करो तुम आराम मेरा कर्म ही करतार है।
प्राण मेरा है नहीं कुछ गर्द मेरा अधिकार है।
कर्म अजबक डरावये है तब ललक ग्वार है।
मेरा ऐसा भाग्य कहाँ है जो आत्मतत्त्वका विचार कर सकूँ? आप लेट आवें।
मृगिभट्ट—तब तू क्यों खड़ी है? तू भी लेट जा और आराम कर, इस तरह खड़े रहनेमें क्या लाभ होगा?
चन्द्रप्रभा—प्राणेश्वर ! मैं भी पड़ रहूँगी, आप आराम कीजिये (मृगिभट्ट लेट जाता है। चन्द्रप्रभा बैठकर मृगिभट्टके पग दावती है और यह थोड़ी ही देरमें सो जाता है मगर चन्द्रप्रभा को नींद नहीं आती यह बात पहिले ही बोला है)
मञ्जिमद नाटक।
माना चंद्रप्रभाका।
मेरा सइयाँ बिरस रस मयाँ जुवन हुलसयाँ तरस रहों जान।
काहे सइयाँ सुके तरसयों मैं बहु कलहयाँ न उठती जवान ॥टिका॥
शर—अधम देरे से ये दुःख सहा ही नहिं जावा।
मेरा दिल उमग उमग कोपन से भर आता ॥
किसको दिखाऊँ दरद कहने में नहिं आता।
क्यों दुख दिखाय मुझे कर्म आज तरसावा ॥
हाय ! सइयाँ पड़ी दुख पइयाँ मैं बहु तड़फइयाँ तुमड़ नहिं ध्यान ॥
मेरा सइयाँ० ॥ १ ॥
बैर—तड़फ तड़फ रात्रि दिन को सु बिताती हूँ मैं।
बहुत दिनसे अब बळफ मेंय दिखाती हूँ मैं ॥
विरह आगि में निज दिलको जलाती हूँ मैं।
अध-सेरी से कुछ नहिं पेस पाती हूँ मैं ॥
क्या करू सइयाँ पड़ी विपत्तियाँ जुवन मुरझयाँ निकन रही
जान ॥ मेरा सइयाँ० ॥ २ ॥
( चन्द्रप्रभा काहूट पाकर गाना बंध कर देती है,
अपने सामने बाहु गुणभद्रको बेल लज्जित
हो मुख नीचा कर लेती है )
गुणभद्रा—( देखे तु लखे ) क्या वह आज आज्ञा नहीं करती ?
राजिके, बारह वर्ष तक तू यो ही बेठो रहती है। सो जा मेरी,
रात बहुत हो गई है।
प्रथमंक।
रंगमंच
चन्द्रप्रभा—( नप्रतासे ) ओ सासू जी। सो रहूँगी, आप क्यों
तकलीफ उठाती हैं ! मुझे नींद नहीं आती ऐसी बाते पेडो ह।
गुणभद्रा—( क्रोध खो-कर )
क्या कहूँ बेटी तेरी मैं है दशा बहु दुख भरी।
देखकर तेरी कपला अस्वती छाती भरी ॥
कांखसे बाळू बरसते दुख सहा आता नहीं।
क्या कहूँ बेटी मेरी कुछ अब मेरा चलता नहीं ॥
ना जा बेटी। तू समझदार होकर ऐसा क्या करती है
( स्वगत ) क्या करे व भी विचारी दुःख भारी सह रही।
पांच वर्षोसे कभी एक दिन सुखारी नहीं रही ॥
दुःख जो हमको सतावे ज्ञान का खटका उडे।
वेदना है भीतरी उसको दिखावे ये किसे।
क्या कहूँ, मैं खुद परेशान हूँ, मगर इसे कोई भी शिक्षा नहीं
देतादी। ( प्रगट ) मैं कल एक और उपाय करूंगी। देखूं
उसका इसके ऊपर क्या असर पडता है। देख मत करे, क्या
दुःखके दिन हमेशा थोडे ही रहते हैं।
चन्द्रप्रभा—आओ सासू जी ! आराम करो, मैं सो रहती हूँ’।
थोडी कमी २ तक देती हूँ’ मेरे इस वचने पर आप खयाल न
किया करे’। कमी फल भोज्य है उसे कौन निवारण कर
सकता है। ( सुनकर गुणभद्रा विशेष नहीं ठहरती वह बांओसे
अंधेरेपात करती चली जाती है। चन्द्रप्रभा भी पल तरफ सो
रहती है )
( यवनिका पतन )
गणिका नाटक ।
( नाचने या गानेवालीश। प्रवेश करके बाहर स्टेज पर )
( तेरी उछलत है श्री नृसिंह )
जो बड़ी व्यवहार माने घर की रीती न जाने उसको करदूत
सारी हया हो जाय ॥
याते कर्तव्य जानो अपनों न न तालो देखो दुनियां को
हाजत यहां तुम साथ ॥ टेक ॥
हंसत सागर की धीर रखले मच्छों से बेर कैसे होंगी सुखारी
अगनारी बु भाव ॥ १ ॥ पहिले सबको पिछानी पीछे प्राम में आनी
चाहो तो होंगे दुखारी समय को पाय ॥ २ ॥ घर को चिढ़वा न
भाई तप की रोवो न जाई ऐसे लोगों की फिरता न स्थिरता
अधाय ॥ ३ ॥ यारो जैसा नी रंग करो जैसा ही ढंग कही यारो
कहै ‘कुंज’ मौका मिलाय ॥ ४ ॥
( गानेवालीका गति १ चले जाना । )
अंक पहिला-सीन दूसरा ।
स्थान-अनंगतिलका वेश्याका मकान ।
अनंगतिलका अपनी परम सुंदरी कुपत्तिलका कहलेंको
पाला जोर वशीकरण आदि प्रयोग सिखा रही है ।
अनंगतिलका—( कुपत्तिलका से ) बेटी ! सीधे बैठ और अपना
। पेषा है सबको शिक्षा प्राप्त कर ( बतलादेवे ) अजी उस्ताद
प्रसंगक ।
जी ! इसे अच्छी तरह विद्यादेना, गानमें हावभाव और
नखशिखामें कमी न रखियेगा ।
उस्ताद—देखा हो होगा आपकी इस लड़कीको मैं हरएक विषयमें
अद्वितीय कर दू गा, किसी भी प्रकार कसर न रखूंगा ।
अनंग०—मैं यावत् विद्या करा कहूँ, यह आप हीकी लड़की है
आप जैसा आप सिखादेंगेगा ।
उस्ताद—आप क्यों फिक्र करती है । मैं इस आपकी लड़कीको
चउर रोगोंमें ही पेला दंगा जिसर समान दूसरी न
मिलेंगी ।
अनंग०—मुझे भी ऐसी ही उम्मीद है ( कुपत्तिलकासे ) सीधे
बैठ और उस्तादको संगी करके विद्या सीख ।
उस्ताद—( कुपत्तिलकाके ठीक बैठ जाने पर ) मेरे सामने देख
और मैं जैसे बोलू तू भी वैसे ही बोल । हाँ फड़, सा, रे, ग,
म, प, ध, नी, सा ( कुपत्तिलका देखा ही कहती है )
नि, ध, प, म, ग, रे, सा ( कुपत्तिलका भी यही कहती है )
सारेग, रेगम, गमप, मपध, पधनी, धनीसा ।
( कुपत्तिलका भी यही बोलती है )
सातिध, निधप, धपम, पमग, मगरे, गरेसा,
( कुछ० भी कहती है )
वारी जाऊँ रे सांवरिया तुम पर वारना रे ॥
( कुछ० भी इसी प्रकार कहती है )
झारना रे, तुम पर वारना रे, वारी जाऊँ रे सांवरिया तुम
पर वारना रे । ( लड़की भी० )
भूमिका नाटक।
१२
तन मन धन सब तुम पर वारूँ। (लड़की भी०)
घर घर अब सब तुम पर जाऊँ। (लड़की यही बोलती है)
कब तक लालित अबकर बसर मारमा रे, खसर मारमा रे,
अंतर मारमा रे, वारी जाऊँ रे सांवरिया तुम पर वारमा रे ५
(लड़की भी यही बोलती है)
उस्ताद—(अलग तिलमिलाते ) लीजिये सुनाब। आपको लड़की
चन्द्रप्रभेने ही गाना आदि सब सीख गई, आप परीक्षा करके
देख लीजिये।
अंगप्रवि०—(आश्चर्य में चमचमाव देवी ह और आपकी बुद्धि
एवं कार्यकुशलता पर कुरबान होती है, क्योंकि आपने इसे
अल्पसमय में ही इतना होशियार कर दिया। अच्छा एकाद
गाना और इससे गवाइये।
उस्ताद—(पुष्पमिलाते ) एक अच्छा गाना गाओ और अपने
हुनरका दिखाओ।
पुष्पवि०—(दोह बैठकर) गाना गाता है।
प्रभु तुम्हारी भक्ति में दिल आज मेरा लग गया।
मेरी सूरत देखते ही अब अँधेरा मिट गया ॥ टेक ॥
ज्ञान का दीपक जला अब मोह सारा मिट गया।
सुन तेरा उपदेश स्वामी मन निर्दोष होगया ॥ १ ॥
ज्यों ज्यों पंख खींचती ज्यों मेरा चित त्यों खिंचगया।
जब की ये सारी दशा लखि मन हमारा फट गया ॥२॥
प्रेम तेरा ही अटूट है जिसके दिल में लग गया।
वह हमेशा के लिये तुम रूप शंकर होगया ॥ ३ ॥
भूमिका।
१३
अंगप्रवि०—(उस्तादसे) बहुत खूब, मैं आपके हुनरकी बहुत
तारीफ करती हूँ, लीजिये इस तुच्छ भेंटको स्वीकार कीजिये
(उस्तादके हाथमें नोट देती है और वह उसे अन्दर कर दबा
जाता है)
अंगप्रवि०—(उस्तादके जाने बाद पुष्पमिलासे ) माता तो तू
सोलह गई अब मनुष्यको जन्ममें कर्मोंकी विद्या और सीख ले।
देख। चाहे हुए मनुष्य पर ऐसा ज्ञान दिखाना चाहिये और
उससे इस प्रकार बर्ताव करना चाहिये कि वह हँस जाय याभी
प्रेममें फँस जाय।
पुष्पवि०—हां मां। मैं ये सब जानती हूँ, मैंने रोज वही देखा है।
“भूखोंके आगे वित्त ही खोदते हैं” हमको विशेष शिक्षा देने
की जरूरत नहीं है।
अंगप्रवि०—(गुस्सा होकर) शाबाश बेटी! ऐसा ही चाहिये…
(आंखें फाड़कर कहना सब कर देती है। कर्मकारका प्रवेश)
कर्मकार—(गुणभद्रका भेजा हुआ, भद्रकके बाद) ये वेश्याओं-
में श्रेष्ठ धर्मविज्ञिका! आप हम तेरे हाथमें एक सोनेकी
मुद्रिका देने आये हैं। अब देखना चाहिये कि तू उसे अपने
हाथों से इस प्रकार रंग लेती है।
अंगप्रवि०—बैठी भाई। क्या बात है? जरा साफ साफ
कह आजो जिससे मुझे यथार्थ घटना मालूम हो।
कर्मकार—(बैठकर) यहां एक सेठ मन्दिभद्र। बड़ा धनवान
है मगर ग्राम्यभावस विशेष होनेसे विषयोंसे सर्वथा विरक्त है।
मणिभद्र नाटक।
१४
उसकी माँ का उद्देश्य उसे चिपवाकुरानी बनाना है, सो उसे फैलाओ और अपना काम भी चलाओ। घर बैठे ही अमीर हो जाओगे।
प्रसंगगतिः-क्या यह सेठ हमारे घर पर आ सकेगा या वहाँ आकर कुछ करना प्रबंध करना पड़ेगा।
कर्मकारः-जो हो यह क्या चलेगा मगर छानेकी तरकीब की जायगी। हम उसे आरंमद्वार पर कर आयेंगे, बादु ठीक ठाक करना आपका काम है।
प्रसंगगतिः-अच्छा आदरे, उसको यहाँ आने पर ही सब ठीक कर लिया रूचगा।
कर्मकारः-हम उसको आपसे पास ले आते हैं।
( कहकर कर्मकार चला जाता है )
दवनिका पतन।
अंक पहिला-सीन तीसरा।
स्थान-सेठ मणिभद्रका मकान।
मणिभद्र और कर्मकारका सदा विलाप पहला।
कर्मकार-( मणिभद्रसे ) शहरमें एक बड़े भारी महात्मा आये हुए हैं, वे अनेक शास्त्रोंके जानकार हैं, उनके दर्शनके लिये सभी लोग जा रहे हैं, आपको भी उनके दर्शनार्थ अवश्य चलना चाहिये।
प्रसंगगतिः
१५
मणिभद्रः-वे महात्मा कहाँ पर ठहरे हुए हैं ? क्या तुमने सब देखा है ?
कर्मकारः-हाँ तो पास ही की धर्मशालामें ठहरे हुये हैं उनके ज्ञानकी प्रशंसा सब लोग कर रहे हैं। जिससे सुनिये वही तारीफ करता है। ऐसा कोई भी पुरुष नहीं जो उनके दर्शनकर अपनेको धन्य नहीं समझता हो।
मणिभद्रः-तब तो उस ऐसे महात्माका दर्शन करना चाहिये और उनके उपदेशामृतका पान करना चाहिये। क्या अभी चले ?
कर्मकारः-हाँ. यही समय उपयुक्त है। बादमें जानेसे उनसे मुलाकात न हो सकेगी।
मणिभद्रः-चलो मैं अभी अनेकों तयार हूँ ( ज्योड़ी मजिस्ट्रात जाता है ज्योड़ी उसका मित्र दिनेश आ जाता है )
दिनेशः-( मणिभद्रको कहीं जाता हुआ देखकर ) मित्र ! इस समय आप कहाँ जा रहे हैं, आपको घरसे बाहर कभी निकलने की न थी, अब क्या बात है ?
मणिभद्रः-अरे मैं एक बड़े भारी योगमें आये हुए हैं, मैं उन्हींके दर्शन करने जा रहा हूँ। अच्छा हुआ तुम भी ठीक मौके पर आ गये, नहीं तो मुझे खुद खुड़के यहाँ जाना पड़ता। चलिये आप भी साथ साथ चलिये।
दिनेशः-तुमने तो किसी महात्माके आनेकी नहीं सुनी है, अब क्या यह बात कैसे मालूम हुई।
मणिसिद्ध नाटक
प्रस्तावना
मणिसिद्ध—ये हो कर्मकार कह रहे हैं कि वे यहाँ पास ही की धर्मशालाममें ठहरे हुए हैं, बड़े सन्त पर्व विद्वान् हैं।
कर्मकार—(विशेषले इशारेय कर) अजी आपको यही मालूम है, वे जल्दी देही आते हैं (पास जाकर दिनेयके कुछ कानमें कह देता है)।
दिनेय—(यथार्थ बात जानकर) अभी आये होंगे; मैं आज कार्यवश बाहर चला गया था, इसीसे वे समाचार सुननेमें नहीं आया। अच्छा; चलिये, मित्र मैं आपके साथ साथ ही चलता हूँ। (मणिसिद्ध अपने मित्र दिनेय और कर्मकारके साथ बात देता है।
[वचनिका पतन]
अंक पहिला-सीन चौथा।
अनंगतिलका का महल।
अनंगतिलका पुष्पवाटिकासे बात चीत कर रही है। प्राचारमें दो भद्र हाथी उत्पन्न बचा रहे हैं।
कर्मकार—(दोनों हाथियोंको दो तरफसे जाते देख कर) दिनेय! दिनेय! देखो सामनेसे यह हाथी हाथी सबको मारता कुदना आ रहा है। चलो, कहीं बचकर जान बचावें।
दिनेय—(पीछे देख कर) हैं, देखो न, पीछेसे भी एक मदोन्मत्त गज फैला चौड़ा आ रहा है। आज क्या बात है, आन बनेगी कि “!” दोनों तरफके रास्ते बन्द हैं।
प्रस्तावना
कर्मकार—अहा संकटका समय उपस्थित है, चलो भाई! इस सामनेवाले धर्ममें चलें और अपनी जान बचावें, बाद साधुके दर्शन करेंगे।
दिनेय—ठीक है, ठीक है, बस जल्दी चलो और कोई बचनेका दूसरा उपाय नहीं है। कर्मकार और दिनेय मणिसिद्धको सामनेवाले अनंगतिलकाके मकानमें लेजाते हैं। कर्मकार अनंगतिलकाको दशहरेसे सज्जाज समाचार दिनेयसहित मणिसिद्धको नहीं छोड़ आप मौका पाकर नीचे उतर आता है।
अनंगतिलका—(पुष्पमिलकासे) हगे, देवी। क्या देखती है? सामने सोनेकी सिड़िया देखा है, एकड़ती क्यों नहीं? मैं जल पीने जाती हूँ, तू इन चातुओंकी जरा खातिरदारी करना। (कहकर अनंगतिलका भी चली जाती है)।
मणिसिद्ध—(कुछ देर बाद कुपित० से) तुम कौन हो? क्या यही मदनाका मकान है? देखो तो सही क्या हाथियोंका उपद्रव शांत हो गया?
दिनेय—(स्वगत) हा, तुमको रास्ते पर आनेवाले महात्मा ये वो हैं, जरा बेटा तो सही, मालूम हो जायगा कि—ये गुरु तुम्हारी कैसी अज्ञानमें हाथ करें।
पुष्पमति—[हाथ जोड़ कर] कृपाकर आप विराजिये, मैं अभी तुरत देख आती हूँ [जाकर थोड़ी ही देरमें फिर लौट आती है] लागी तब वे दोनों हाथी खून खराबी कर रहे हैं, न किसीको आने देते हैं और न किसीको जाने देते हैं। बड़ा भारी कोलाहल हो रहा है।
१८
मणिभद्र नाटक
नाटक
मणिभद्र—[ उदास होकर ] मित्र दिनेश! कर्मकार कहाँ चला गया! उससे न होवे तो महात्माके दर्शन कौन करावेगा।
दिनेश—[ सस्नेह ] महात्माके दर्शन तो हो गये, अब उपदेश की बाकी है सो धीरे धीरे सुना करना [ प्रमाद, मित्रत ] क्या मैं जाकर कर्मकारको बुला लाऊँ? [ जाता है ]
मणिभद्र—[ रुककर ] नहीं मित्र, तुम मत जाओ, कर्मकार भी चला गया और तुम भी चले जाओगे तो मेरा यहाँ दिल ही कैसे लगेगा?
दिनेश—नहीं मित्र! मैं अभी आता हूँ, कर्मकार अवश्य उन्हीं महात्माके पास सूचना देने गया होगा। मैं भी उन हाथियोंका उपद्रव मिटाने जाता हूँ। मैं अभी लौट आता हूँ आप चिन्ता न करें। [ कहकर दिनेश भी चला जाता है। ]
मणिभद्र—ये मालूम पड़ा पर कब तक बैठना होगा?
पुष्पभूति—[ मणिभद्रसे ] चलिये और लक्ष हाथियोंवाले कमरेमें देखिये। मैं आपको हाथियोंका उपद्रव शांत होते ही पहुॅचा दूँगा। [ बड़ा प्रेम दिखाता है ]
मणिभद्र—अच्छा चलो, यहीं पर जब तक बैठे ये तब तक कि हाथियोंका उपद्रव शांत न होगा। पुष्पभूतिरूप मणिभद्रकी कमरेमें छिपा जाती है। मणिभद्रको सच्चे सिंहासन पर बैठाती है और आप नीचे बैठ जाती है ]
मणिभद्र—ऐसा तो सही, क्या अभी तक उन हाथियोंका उपद्रव शांत हुआ या नहीं?
प्रथमांक!
नाटक
१९
पुष्पभूति—नहीं, जब उपद्रव शांत हो जायगा तब आपके पास खबर आ जायगी। मैंने अपने आदमियोंको यहाँ खबर लानेके लिये नियत कर दिया है कि वे उपद्रव दूर होते ही यहाँ तुरंत खबर दें।
मणिभद्र—तब ऐसे बाजी बैठनेसे चित्त नहीं लगता। देखो किस कामके लिये तो आये थे और वीचमें किस झंझटमें फँस गये।
पुष्पभूति—आप जिस कार्यके लिये आये थे, यदि उसका बताना उचित हो तो मुझके कहिये, शायद मैं उसे कर सकूँ।
मणिभद्र—क्यों नहीं! मैं अपने मित्र दिनेशके साथ तक धर्मरत्नाके दर्शन करने और उनसे तत्त्वचर्चा सुनने आया था। मगर क्या किया जाय “श्रेयसि बहु विघ्नानि” वाली नीति चरितार्थ हो ही जाती है।
पुष्पभूति—क्या हर्ज है, वह भी कार्य हो जायगा। अभी तो, जो सेवायोग्य सेवा हो उसे कहिये, मैं उसे करनेको सर्वथा तयार हूँ। क्या आपको प्यास लगी है? लीजिये और इस अमृत-समान जलको पीजिये। [ तुलसीके गिलासमें पानी देती है ]
मणिभद्र—नहीं, प्यास नहीं लगी है और यदि लगे भी तो दवा से जितना बुझेगी थोड़ी ही जल पी सकता हूँ?
पुष्पभूति—हम कोई नीच जाति नहीं हैं, आप फिक्र न करें। आपको यहाँ सभी चीजें शुद्ध मिल सकती हैं।
प्रबोध नाटक।
२७
प्रज्ञामित्र—यथा दुष्टजनके पास शास्त्र नहीं है, मैं स्वाध्याय
करना चाहता हूँ बिना शास्त्रस्वाध्यायके मेरा मन नहीं
रमता है।
पुण्यमति—शास्त्र तो बहुत हैं। मगर वे मेरे दूसरे घर पर हैं,
इन हाथियोंकी वजहसे रास्ता बंद है। कहिये तो मैं कुछ मुसाफ़
मातें कहूँ। बाद जैसी आपकी आज्ञा होगी शास्त्र वगैरह ला
दिये जायेंगे।
प्रज्ञामित्र—क्या तुम पढ़े हुए हो ?
पुण्यमति—हाँ, मैं पढ़ी हुई हूँ और शास्त्र पढ़ने सुननेका
मुझे बड़ा शौक है। यदि आपकी आज्ञा हो तो कुछ धार्मिक
बातें सुनाऊँ।
प्रज्ञामित्र—कहो, तब तक तत्त्वचर्चा ही सही। कुछ समय
ज्ञानचर्चा में करनेसे ही ठीक होगा।
पुण्यमति—संसारमें दो पदार्थ हैं।
प्रज्ञामित्र—कौनसे ?
पुण्यमति—एक जीव और दूसरा अजीब।
प्रज्ञामित्र—तुम कौन हो ?
पुण्यमति—हम संसारी जीव हैं।
प्रज्ञामित्र—संसारी जीव किसे कहते हैं?
पुण्यमति—जो संसारमें उत्पन्न हुये हैं, पंचेंद्रियसंज्ञी
विभिन्न देहें हुए हैं, उन्हें ही संसारी जीव कहते हैं।
प्रज्ञामित्र—विषय क्या चीज है।
प्रबोध नाटक।
२९
पुण्यमति—जो हम और आप दिन रात सेवन करते हैं
उन्हींको विषय कहते हैं।
प्रज्ञामित्र—हम और आप दिन रात क्या सेवन करते रहते
हैं ? खुलासा समझाओ।
पुण्यमति—अनेक जीवोंका स्वाद लेना, अनेक प्रकार सुगंधित
वस्तुओंकी खुशबू लेना, मनोशावलोक श्रीकी अवलोकन करवा
कर्णप्रिय मृदु। गान और मनोहर शब्दोंका सुनना तथा सरोजने-
न्द्रियजनित स्त्री पुरुष द्वारा निषद्यजनित सुखकर आनन्द
लेना, बस, इन्हीं सब विषयोंको हम और आप रात्रि दिवस सेवन
करते हैं। बस और भी विशेष खुलासा क्या ?
प्रज्ञामित्र—ठीक है, मगर कोई २ बात हमारी समझमें नहीं
पड़ती।
पुण्यमति—किये कौन सी बात आपकी समझमें नहीं आती ?
प्रज्ञामित्र—जो तुमने पीछेले कही है।
पुण्यमति—मुसिका कर अच्छा, अब भी समझमें आवेगी
येषा आपको। और भी कुछ बातें सुनाऊँ ? मैं बड़ी कहना चाहती
हूँ जो आपको रुचिकर हो। मैं प०प०को बड़ी लोगपायंती
समझती हूँ जो आपका मुझे संबंध प्राप्त हुआ है। सच कहती
हूँ मुझे आपके पेलनेहीसे इतना प्रेम हो गया है कि जिसका
बयान किया नहीं कर सकती।
प्रज्ञामित्र—और वही दशा मेरी भी हो रही है। न मालूम
तुम्हारी वचनावलीसे मेरा मन ऐसा स्थिर क्यों कर दिया है कि
१२
दशमस्कन्ध नाटक।
बढ़ कर दूसरी जगह आता ही नहीं। मैं कुछ नहीं कह सकता
हूँ कि यह किसका चमत्कार है।
दिनेश– एक तरफ़ हुरा ६, स्वगत ] क्या करूँ, यहाँ तो
चतुर्दिकरणके समान जल्दी जल्दी कुछ प्रकाशसे देखा परेगा ! और
यहाँ पर ये सुजनुखें बढ़ रहे हैं ! ठीक है यदि यह पड़ापर फँस
जाय तो मैं भी उधर लगे रहूँ। इससे मुझे कुछ और इस
अलौकिक घटनाकी खोज।
पुष्पगति– इसमें अवश्य कोई न कोई पराक्रमका सम्बन्ध
है, बिना बलके किसीका भी हृदय ऐसे विचलित नहीं हो
सकता।
मृशिभद्र– ठीक कहती हो, शास्त्रमें भी ऐसे कर्म इच्छासे
देखतेमें आते हैं जो पूर्व भवके मेनाधिपत्यसे रहते हैं ! यही
वजह है कि मेरा दिल तुम्हारेमें अनुरक्त हो गया है।
पुष्पगति– ठीक है। क्या आप अकाद गाथा सुनेंगे ?
मृशिभद्र– [ मैं मयूर्ख ] सुनाओ न, तुम्हारा वचन मुझे
बहुत प्यारा लगता है।
पुष्पगति– अच्छा, सुनिये। [ गाथा गाती है ]
जामो की लागी मुझ नादानको घुलसने आगे ॥ टेकना।
झुकेको बहकाने आगे, दिलको चुराने आगे,
नैननसे नैन मिलाये, सैननमें सैन चलाये।
मुरे नादान, निनकी नादानी दिलजले आगे ॥ गाथा० ॥ १ ॥
१३
प्रथम अंक।
मृशिभद्र–
तुमने मेरा दिल लीना, अपना मुझको नहि दीना।
मुझ पर वो जादू कीना मैं बन मन अर्पण कीना।
हमतो करचैन तुमपर हमको क्या समझावे जाये ॥ गाथा० ॥ २ ॥
मृशिभद्र– अहा, क्या अच्छा गाया है। मालूम पड़ता
है यह बाँसुर मेरे ऊपर ही पड़ रही है।
पुष्पगति– क्या मैंने कुछ कहा है ? मैंने जो भी कहा है वह
सब सच ही है। क्या आपको मेरा कहना असत्य मालूम
पड़ता है ?
मृशिभद्र– तो क्या मेरा दिल तुमने नहीं ले लिया है ? क्या मैं
तुम पर दिलोजानसे आशक नहीं हूँ ? प्रिये ! तुम्हारा गाना मुझे
बहुत भला मालूम होता है।
दिनेश– [ क्रिया हुअ ] अँ, अब यह ठीक काका उल्लू
बन गया। सच है जो हम खुडेको हाथमें फँस जाते है वे सूखे
घोड़े ही निकलते है, अपक्षय उन्हें दीक्षित होना ही पड़ता है।
[ मृशिभद्रसे पार्श्वम आकर ] क्यों मित्रो ! चलेने या कुछ देर
और यहाँ पर रहूँ ? यदि आप थोड़ी देर तक यहाँ पर विश्राम
तो मैं एक और जरूरी काम कर आऊँ।
पुष्पगति– [ दिनेशसे परदा करके ] तुमसे कह दीजिये न
कि चले जायँ। करना जरूरी काम कर आवें, मैं थोड़ी देर बाद
खुद आ जाऊँगा।
मृशिभद्र– [ दिनेशसे ] अच्छा. आप अपना जरूरी काम
कर आवें, मैं थोड़ी देरबाद आ जाऊँगा।
प्रविष्ठक।
२१
दिनेश— [स्वगत] देखा कैसा फँसा। ठीक है, ये राई तिल का’ उतना भाड़ा है। क्या मालूम था कि वेश्याके मणिभद्रकी इतनी जल्दी इन दुष्टोंको हालत हो जायगी! खैर, मेरे लिये तो अच्छा ही हुआ कारण कि इसके रहने मेंरा काम यात सामने आवेगा। अब आता हूँ और इस नागरीके लिखने एवं छापने का भरतकी तसवीर खोजता हूँ। (प्रगट मणिभद्र) अच्छा मित्र। सो मैं आता हूँ, आप यहीं पर रहिये, मैं फिर आ जाऊँगा।
मणिभद्र— (बदहवासीसे) साये। दिनेश जाता है किन्तु उसे रास्ते में ही अनंगतिलक रोक लेती है।
अनंगतिलक— (दिनेशसे) आप मिहरबानी करके अभी उसके पास न आया करें नहीं तो बना बनाया खेल बिगड़ जायगा। आप जानते हैं हमको इस में कितना परिश्रम करना पड़ा है। यदि आपको पिछले आदिकी यथाज्ञा हो तो मुझसे मिल लिया करें।
दिनेश— ठीक। मैं तो यही देखने गया था कि देखूँ इसका मन रेलायमान हुआ था नहीं?
अनंगतिलक— अभी रंग रचने दीजिये बिना रंगे अधले बात न कीजिये कई रंग परिश्रम व्यर्थ होगा, हमें फिर सरखुद सहना होगा। हमें रंग उच्च फिर पक्का होगा, हमारा अभी काम पक्का न होगा।
पक्के सम्बन्ध होने पर आप आ सकते हैं।
दिनेश— (स्वगत) तू रंग गहरा क्या खुदी है, काफी उसे तू फूला चुकी है।
प्रविष्ठक।
२२
अवश्यमेवैक पक्ष को लेगा, भला ठीक वस्तु को दूर रहेगा।
दिनेश— मेरा फलोमें फूल दबे, लिरा खीस भी अब वेश बु मैं।
(प्रगट अनंगति० से) अच्छा देखा ही होगा, आपने आप हीसे मुलाकात किया करेंगे।
अनंगतिलक— और जरा हाथों वर्षा मिलवा दीजिये। आप जानते हैं कि अब तक आपके मित्र यहाँ घर में तब तक हम दूसरी रोली नहीं लगा सकते, यहाँ पर हमारा सारा खर्च समझिये।
दिनेश— सो तो ठीक है, क्या यह बात हम नहीं जानते, अवश्य आपके पास, रक्त खेत ही आया करेगा। मगर तब रक्तमें तुम्हें मेरा हिस्सा भी रखना होगा।
अनंगतिलक— क्यों नहीं? आप हमारा कार्य करेंगे तो क्या हम आपका ख्याल न करेंगे?
दिनेश— बस! यही एक बातमें रहने लायक बात है। अच्छा, मैं आता हूँ और रक्त मिलवाता हूँ (कहकर दिनेशके जाते जाते कर्मकारका प्रवेश)
अनंगतिलक— (कर्मकारको रोककर) अभी आप यहाँ न आवें नहीं तो सब गुड़ गोबर हो जायगा। (दिनेशकी तरफ इशारा कर) ये भी मेरे बिना पूछे उनके पास चले गये थे। इनके आते ही हमारा भाव बदल गया था अगर मैंने इन्हें जल्दी हमारेसे छुड़ा लिया। मैंने इन्हें सारी बातें समझा दी हैं अगर मैं इनके बितेच्छु हूँ तो जब तक कुछ काम न बन जावे तब तक मेरे, दिवा
सुबोध शतक
पुद्गल आप धार्मिक कृत्यके पास न आवें नहीं तो हमारी सारी जिन्दगी व्यर्थ जायगी।
कर्मकार—आप मेरे ऐसा ही होगा, हम आपलोगोंके मित्रत्व सब शाश्वत दशायुक्त कर लिया करें। आपकी बिना आज्ञाके न आवेंगे।
अनुवृत्ति—अब आपका कार्य भी जल्दी हो जायगा। आप कुछ ऐसे वाक्य में कहें, इसका क्या कारण है? आप स्वयंने कह दिया है और संक्षेपमें आपने भी करदी है। कि अब एक आपके पीछे ही हमनें यहाँ पर रहने तक हम हम अपनी दूसरी आदिशक्ति नहीं लगा सकती है सहज आपका स्थान अमर शाश्वत आवश्यक है।
दिग्भ्रान्त—हाँ, आपका कहना ठीक है। (कर्मकारसे) देखा-देखीसे बढ़कर आप हमको आप अक्षर अर्थ भेद दीखता।
कर्मकार—अब हम आगे ही न जायँगे जिस स्थान पर हूँ या। हमारी आप चिन्ता न करें।
अनुवृत्ति—क्यों नहीं? आप लोगोंसे कुछ कुछ नहीं है कि हमारी सही आदिशक्ति है। कभी कभी आप दोनों महाशय सब गतियोंको पाकर पवित्र किया करें और हम सब अक्षर पद सिद्धार्थी होवें।
कर्मकार—ऐसा ही होगा। जो हम सब लोगोंको आप जानेकी इच्छासे देखेंगे, वह आपपर लिए गुणयुक्त करेंगे (हम सब दोनों बड़े सन्त हैं और हम अवस्थितिका भी बदले जाते है)।
प्रश्नोत्तर
पुष्पवति—(मक्खिमद्रसे) तो क्या आप गाना सुनेंगे या नाच देखेंगे?
मक्खिमद्र—क्यों नहीं! गाना भी नाचो और साथमें नाच भी दिखाओ।
पुष्पवति—सुनो (गाना गाती है और नाचती है)
जादू आसरेको विलंबें सगाय गयो रे।
सुभाव गयो, सभाव गयो, सभाव गयो रे।
जादू आसरेको विलंबें सभाव गयो रे ॥ टेक ॥
मेरा मन से गया, अपना नहिं दे गया। मेरे बिरहादिन तन-में सगाय गयो रे ॥ जादू० ॥ १ ॥ ‘मैं’ वो बिरहिणी हो, कहती हूँ 'सब जो ॥ मेरे आज्ञाकी फाँसी सगाय गयो रे ॥ जादू आसरे० ॥ २ ॥ ‘प्यारेकी यादमें पागल हुई हूँ मैं’ ।
मेरे दिशामें तह कहो सुनाय गयो रे ॥ जादू० ॥ ३ ॥
मक्खिमद्र—हा! क्या अच्छा रूप और नाच है। प्यारे तुम्हारे साथ हम भी नाचेंगे।
पुष्पवति—आओ न प्यारे। (दोनों उछलकर गाते हैं)
हम दोनोंका आज मन भाव गयो रे ॥ भाव गयो भाव गयो भाव गयो रे, हम दोनोंका आज मन भाव गयो रे ॥ टेक ॥
आज मिलकर गावो, प्रेम रस बरसावो। ठोक जीवन जवानी पे आय गयो रे ॥ हम दोनों० ॥
कैसी जुअल जोड़ी, मेरो हुक्म तेरी। ऐसी हलचलकी हमरो बनाय गयो रे ॥ बनाय गयो बनाय गयो फँसाय गयो।
हम दोनोंका आज मन भाव गयो रे ॥ २ ॥
नन्दिश्रेष्ठ नाटक।
दिनेश—(एक तरफ़ खुरा खड़ा है) और कौन ऐसी हालत बनायेगा, मैंने ही तुझ रुल्लू को यों फैलाया लोग बड़ा अपना काम बनाया, तू तो यहीं पर सहरा हुआ ढूँढ़ता कि धन में तेरे क्या दशा होती है, देवमूर्ख ! कहाँ वेश्या भी किसीकी होती है ? यह उनके साथ माय जान भी ले लेती है । मर साले । मैं भी तुम्हें ये बातें क्यों सुझाऊँ?
अनंदूति—(शरीरसे दुलत्ती हुई धीरे २) क्यों बाप फिर वहाँ पहुँच गये ! यह क्या बात है ?
दिनेश—(पासमें जाकर) नहीं जो । मैं इनके अपनी सूरत थाँई ही दिलाता हूँ । जो किये न, उस हाथ लागे बढ़ाये । (हाथमें रुपयोंकी एक थैली देकर) इसे आप फैला फैलाओ कि वर्षों तक आपके मुँहवाले पाखिर न होने पावे, अभी तो इसका धन जो कराडो दीनारोका है, आप के सकेगी ।
अनंदूति—चेला ही होगा, क्यों बाप आ रहे हैं ?
दिनेश—एक रूखरे काम होनेसे मैं अधिक नहीं ठहर सकता ।
अनंदूति—तो क्या कुछ देरके लिये भी न बैठेंगे ?
दिनेश—अभी नहीं बैठ सकता, माफ़ कीजियेगा । देखा मेरा भी ब्याज रहना, पैसा न हो कि आप सेरे पाछ ही न धरै । येरी रकम मुड़ी गई दिखा करना (कहकर जाता है )
अनंदूति—(दिनेशके जाते २ ) अरे हरामजादे । कहीं वेश्याओंसे भी कितने धन वापिस लिया है, सो तू ये शैतान-
प्रमांक १
नाटक।
शरीरी सरे कर रहा है । जा, तुमको बदलू मेरे यहाँ रात आते है (कहकर वह भी चल देती है )
पुष्पमित्र—अरे ! रात्रि बहुत हो गई है, चलिये आराम करें ।
मणिभद्र—अच्छा, चलिये (दोनों चले जाते हैं)
[पञ्चमिक्ष पतन]
अंक पहिला सीन पांचवां ।
दिनेशका मकान ।
दिनेश अकेला उछल रहा है ।
दिनेश—(उछलता हुआ) “संसार व्यवहारस्तु यदि माया विवर्जितः” इस नीतिके अनुसार अपना काम बनावेके किसी इस जीवको कुछ-कपट अवश्य करना ही पड़ता है । बिना पैसा किये वह अपने कार्य को पूरा कर ही नहीं सकता । देखो ! आज मैं ऐसी नीतिकी वजहसे धनवंत कर रहा हूँ । मेरे पास इसके पहिले मामूली पूँजी थी मगर आज मैं मणिभद्रक नाम वाली झूठी चिट्ठी लिख २ कर लाखों रुपयों का प्राप्त ले धनवान बन गया हूँ । मकिभद्र भी बुरी तरह फँस गया है यह इस वेश्याके मुँहसे नहीं निकल सकता । सब तक वाली निर्लोभा तब तक मैं अपना सब काम बनाकर कहीं दूर देशान्तर चला जाऊँगा और मौज करूँगा । यह तो सब हुआ मगर मेरी अभी एक और मुराद बाकी है, देख मेरी
मन्त्रिप्रद नाटक।
तृतीयक
चतुर बूढी उसकी सो क्या खबर लाती है। अहा! यह शुभ-लोचनौ अपने मनोहर प्रभावाली वदनसे लज्जाकी सुनतिकी फीका करनेवाली चन्द्रप्रभा मेरे दिलमें ऐसी धँस कर गई है कि उसकी जुदाई मुझे बेताब किये देती है। [ कुनीका प्रवेश होते ही जल्दीसे ] कहो। क्या तुमारे उसने आज नेकूर किया था नहीं ?
निपुणा—यह औरत बड़ी छँट है, किसीका भी नाम तक नहीं सुनना चाहती।
दिनेश—तो क्या मुझे उसके वियोगमें कुण्ठता कर प्राण दे देना होगा !
निपुणा—काम तो बहुत कठिन है।
दिनेश—क्या कोई है काम पैसा जो मेरेसे भी न हो।
सैकड़ों करि काम ऐसे फिर भी क्यों यशहीन हो।
मिले हैं सर्टीफिकेट ! तुमको बहुत इस काम के।
फिर भी हिम्मत हारती क्यों हो बड़े समझायक ॥
देखो ! तुम्हें मरजानाका कर दूँगा ! मुँहमांगा इनाम दूँगा। तुम एकबार उस नाजनीसे अवश्य मुलाकात करा दो।
निपुणा—करूँगी कोशिश, अजीने आप क्यों घबराते।
आपना खाती न मेरा घर क्या समझायते ॥
मैं वायदा करती हूँ कि उस पीतवनीसे तुम्हारी शीघ्र ही मुलाकात कराऊँगी।
प्रथमअंक।
चतुर्थक
दिनेश—अभी तक तुमने क्या कार्रवाई की है जरा उन-
संक्षेपमें बयान कर दीजिये ताकि मेरे दिलमें कुछ तो तसल्ली
आ जाय।
निपुणा—मैंने प्रथम उसे बहुत समझाया, अनेक प्रकार
लुभाया, उसके दिलमें अनेक भाव पैदा करनेकी कोशिशें की
मगर उसके दिमागमें एक भी बात न बैठी जिससे मैं अपना कार्य
किसी तरह निकालती।
दिनेश—तो क्या तुम्हारी बातोंमें वह नहीं आई ?
निपुणा—अगर मैंने उसका पीछा नहीं छोड़ा और इसी विचार-
में लगी कि कोमली तरकीब करनेसे यह कार्य बन सकता है।
मैं कुछ दो दिनोंमें उसकी सासु शुभचन्द्राके पास गई और कह
सुनकर दाँईका काम हाथमें लिया, धीरे धीरे विश्वास जमा-
कर मैं रात्रमें भी आम कल वहीं रहने लगी हूँ।
दिनेश—तब तो तुमने बहुत अच्छा काम किया, अब मुझे
भी उम्मीद बँधती है कि यह कार्य बन जायगा। तो क्या वहाँ
पर अनेका यतिने मोक्ष नहीं लगा सकती ? क्या वह शुभ-
भद्राके साथ सोती है या तुम्हारे साथ ?
निपुणा—प्रथम तो सासु बहू एकही कमरेमें सोती थीं मगर
आजकल मैंने विशेष सेल बोल बढ़ा दिया है, इससे कभी कभी
हम दोनों भी एक कमरेमें सो रहती हैं।
दिनेश—( प्रसन्न कर ) शाबाश ! अब तो तुम्हें आपैसे भी
अधिक काम कर लिया। अब मेरेसे मुलाकात होनेकी तुमने
क्या तरकीब सोची है ?
द्वितीय अंक
अंक दूसरा-सीन पहिला।
अनंगतिलकाका मकान।
मंजिभट्ट और पुष्पतिलकाका बैठा देखना।
पुष्प०–कढ़िये प्यारे ! अब आपका क्या विचार है ?
मंजिभट्ट–मुझे तो तुमने देखा कब्जेमें कर लिया है कि
कहाँ भी दूसरी जगह एक घड़ीतक चाहते भी जानेकी इच्छा नहीं
होती। वास्तवमें तुम्हारा प्रेम एक अलौकिक प्रेम है।
पुष्प०–और क्या तुमने मेरा चित्त अपनी ओर आकृ-
षित नहीं किया है ? जो स्वप्नमें भी दूसरी तरफ नहीं आता।
मंजिभट्ट–इसमें कुछ संदेह है कि तुम्हारा और चित्त
दूसरी तरफ न जाय ! यह प्रकृति-विरुद्ध बात है !
पुष्प०–नाथ ! मुझको कथम देहका भी फनी जावो नहीं।
जन्म पालेसे कभी वेश्या मैं हो सकती नहीं ॥
प्राणप्यारे ! आपका यह नेत्र दिलमें छप गया।
इसको दिलसे दूर होना अब असम्भव हो गया ॥
क्या मिट्टीमें पड़ा हुआ लांवा मिट्टी हो जाता है ?
मंजिभट्ट–जानता हूँ मैं तेरा निश्छपट सच्चा प्रेम है।
यगर वश आजन्म उद्वेगता यही संदेह है ॥
मुझे यह नेत्र चञ्चलसुर हो दीखता है।
१
दण्डिनट नाटक।
२२
कलंक
निपुणा–बस, आज शक्तिको तुम ठीक शायद कहो येरा बदल
घर खाना, मैं जानती रहती। तुम चोरि किवाड थपथापाना, मैं
यह इशारा सुनते ही भीतरसे किवाड खोल दूंगी। लेकिन
खिड़कीकी राह आना। देखो ! आजकल कर्मकर बड़ी लोक्खी
रहता है। इसमें हमेषा बचते रहना। यह रहस्य उसे न बताना !
दिनेश–“नहीं”, इसे मेरे और तेरे सिवाय कोई भी नहीं
जान सकता। ‘मैं क्या मैं’ आज ही रात्रिमें ठीक चाह बजे यहाँ
आ जाऊँ।
निपुणा–हाँ, आज ही ठीक समय पर अवश्य आइये !
देखिये कोई पत्नी न हो।
दिनेश–क्या आप कभी जा रहे हैं ?
निपुणा–हाँ, जा रही हूं। इसी होनेसे मालकिनको संदेह
हो जायगा कि इतनी देर सिने कहाँ पर लगाती। इससे मेरा
अजी जाना सुभाषित है।
दिनेश–( शर्ममें नोट देकर ) लीजिये और अपने बापरेपर
बड़ा रहिये, ये कार्य होने पर तुमक मालामाल कर दूंगा।
( निपुणा छुट्टी चली जाती है। )
दिनेश–( स्वगत ) अब चन्द्रमाको भी अपने हाथ लगी
ही समझो। फिर क्या है। कहाँ’ राय प्रदेशमें जाकर दोनों
प्रेमी-प्रमोद-प्रमोद करेंगे। बहू’ और अपनी पोशाक एवं वेष
बदलनेकी फिक्र करूँ ! ( कहकर दिनेश भी चला जाता है )
[ अर्थमिका पतन ] रूप
धर्मक-समाप्त।
४४
भृगिभट्ट नाटक ।
तृतीय अंक
पृष्पति—नहीं स्वामी! प्रेम ये मेरा चिरस्थायी रहे।
इस वदनको और कोई दूसरा क्या छू सके ॥
यद्यपि आप जानते हैं कि मेरे इन शरीरोंको कोई अन्य स्पर्श करेगा ? हरगिज नहीं, यह स्वप्नमें भी न होगा। मेरे जीवना-धार आप ही रहेंगे। मुझे पक्षिगणसे उद्दीप्त होने लगे तो आप साथ, मुझे ६ लाख ललनायान हो आप, मगर मेरा प्रेम विच्-छिन्न नहीं हो सकता।
भृगिभट्ट—सखा क्या प्रमाण है ? यदि हम हमारे प्रेममें कोई बाधक हो गया और छलने हमारे दिलोंमें केचीनाथ पेश कर दिया तब क्या होगा ? क्या उस समय तुम मेरेले अपना प्रेम शायद निभाओगी ?
पृष्पति—एक तो ऐसा होना नहीं, और यदि कदा-चित् ऐसा निमित्त मिल भी गया तो मैं अपने इस शरीरको आप पर न्योछावर करूंगी। आपके कुछ विरहमें मैं धोती न बैठी रहूँगी। मैं सपने दिलसे कहती हूँ कि आपको छोड़ मुझे स्वप्नमें भी कोई स्पर्श न कर सकेगा। क्या आपको मेरी इन बातों पर विश्वास नहीं है ?
भृगिभट्ट—क्यों नहीं ? मुझे विश्वास अवश्य है, मगर किसी काव्यापारा यह बात निकल पड़ी थी। तुम कुछ संशय न करो।
पृष्पति—कौनसा कारण ? क्या वह मुझे नहीं बता सकते ?
भृगिभट्ट—क्यों नहीं। आजकल तुम्हारी माता कुछ विचार अवश्य करती होती है। बस। इसीसे शक है कि कहीं कोई विघ्न न उपस्थित हो जाय।
द्वितीय अंक।
तृतीय अंक।
पृष्पति—नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता। आप फिक्र न करें, इस दासीको जल्दी आत्म लेविका समझेंगे।
भृगिभट्ट—अब तुम्हारा प्रेम मेरे पर जटिल अनिवार्य है।
तब किसीके विघ्न करनेका नहीं अधिकार है ॥
दिनेश—(स्वगत, छिपा हुआ)
है नहीं अधिकार इस दुर्बुद्धिको मालूम नहीं।
आ नहीं सिरपर चिन्ती ये इसे मालूम नहीं ॥
मुझे भी क्या गरज जो इसको भुकाऊँ मैं लगी।
जहन्नुममें जाय ये, मैं तो न ये जाऊँ फसी ॥
(प्रगट, भृगिभट्टके पास आकर) कहिये मित्र ! क्या हाल-चाल है ? तबियत तो प्रसन्न है न, मेरे लायक कोई काम हो तो कहियेगा (पुष्पनिफा मुँह फेर लेती है)
भृगिभट्ट—सच आनन्द है। मुझे यहाँ किसी प्रकारकी तक-लीफ नहीं है। अब तुम्हारे लायक कोई काम होगा तब हम खुद तुम्हारे पास समाचार भेज देंगे।
दिनेश—(स्वगत) देखा ढँग ! अब तो इन्हें हमारा यहाँ आना भी खटकने लगा ! चलो एक प्रकार अच्छा ही हुआ, मैं तो ऐसा चाहता ही था। (प्रगट) अच्छा मित्र ! जैसी आपकी आज्ञा होगी वैसा ही किया जायगा। आप किसी बातकी फिक्र न करें। क्या घर पर चलनेका इरादा है ?
भृगिभट्ट—अभी घर पर नहीं जाऊंगा। वहाँ जाकर ही क्या करूँगा ! जरा एकबार कर्मकारको यहाँ पर भेज देना।
मणिभद्र नाटक ।
आप भी चलें और मुक्त संतप्तहृदयको अपने अपूर्व प्रेमामृतसे शीतल करें । नाथ! यह आराम करनेका समय है।
मणिभद्र—तो यहाँ चलकर ही क्या होगा। मैं तुझे यहींपर ऐना उपदेशामृत पिनाऊँगा जिससे तेरा जलता हुआ हृदय शीतल हो जायगा। उसके सुननेसे तुझे यह आनन्द प्राप्त होगा जो वचनोंके अगोचर है। क्या सचमुच रात्रि अधिक हो गई है। घड़ीमें क्या दता है?
चन्द्रप्रभा—(स्वगत) मैं तो प्रथम ही जानती थी कि इसका भी से अर्थ बदल देंगे, वही हुआ । अस्तु ! तीव्र कार्योंदयके समत सारे प्रयत्न विफल हो जाते हैं। (प्रमद, स्वामीसे) हाँ नाथ ! रात्रि बहुत हो गई है, घड़ीमें ग्यारहसे ऊपर हो गया है, देखिये (घड़ी दिखाती है)
मणिभद्र—ग्यारहसे ऊपर हो गया! तब चलो, आखिर तो
चन्द्रप्रभा—नहीं नाथ! नींद नहीं आती?
मणिभद्र—क्यों ?
चन्द्रप्रभा—मालूम नहीं! जी उब रहा है, मनमें कई प्रकारके भँवर जाल पड़ रहे हैं, मेरा चित्त उचट गया है। नाथ! मेरा चित्त कोई काम करनेमें नाहीं लगता। क्या कहूँ? चित्तका बहुत संभाला है मगर हाथसे निकल ही जाता है।
मणिभद्र—(बैठकर) क्या कहा? जी बढ़ रहा है, सो तो ठीक ही है, जो सभी संसारी जीवोंका उड़ता रहता है। इस मनका चल विचल होना ही तो दुःख है। तथापि यह चंचल मन शास्त्राभ्यासी सत्संगोंसे थांभा जा सकता है। क्या स्वाध्याय करूँ? तुझे और उपदेश सुनाऊँ? मैं ठीक कहता हूँ कि तेरा चित्त शास्त्र स्वाध्याय करने या सुननेसे ठीक ठिकाने पर आ जायगा और आत्मतत्वमें इतनी रुचि बढ़ आयगी कि चित्त फिर कहीं भी चलायमान न होगा। यदि उपदेश सुनना हो तो बैठ आ और सुन।
चन्द्रप्रभा—तुमझिया उपदेश, एकली। अब नहीं दरकार है। करो तुम आराम मेरा कर्म ही करतार है।।
भाग्य मेरा है नहीं कुछ नहिं मेरा अधिकार है। कर्म अवतक उलझाये हैं तब तन्नक गमभार है।।
मेरा ऐसा भाग्य कहां है जो आत्मतत्वका विचार कर सकूँ? आप लेट जाइये।
: मणिभद्र—तब तू क्यों खड़ी है? तु भी लेट जा और आराम कर, इस तरह खड़े रहनेसे क्या लाभ होगा?
चन्द्रप्रभा—प्राणेश्वर! मैं भी पड़ रहूँगी, आप आराम कीजिये (मणिभद्र लेट जाता है। चन्द्रप्रभा बैठकर मणिभद्रके पग दाबती है और वह थोड़ी ही देरमें सो जाता है मगर चन्द्रप्रभा को नींद नहीं आती यह काम पीड़ित हो बोलों है) मजिमद्र नाटक ।
गाना चन्द्रप्रभाका ।
मेरा सइयां विरस रस भयां जुषन हुबसइयां तरस रही जान । काहे सइयां मुझे तरसयों में बहू कलपइवां न उड़ती जवान ॥ टेका॥ शर—अत्र घेरे से ये दुःख सहा ही नहि जाता । मेरा दिल उमग उमग जोबन से भर आता ॥
किसको दिखाऊँ दरद कहने में नहि आता ।
क्यों दुख दिखाय मुझे कर्म आज तरसावा ॥
हाय ! सइयां पडी हुत्र पड़यों में बहु तड़फड्यों तुम्ह नहि ध्यान ॥ मेरा सडयोः ॥ १ ॥
और—तडफ तड़फ रात्रि दिन को जु बिताली हु मैं । बहुत दिनसे अब बलक प्रम दिखाती हूँ में ॥
विरह आगि में निज दिलको जलाती हूँ में ।
कर्म-बंरी से कुछ नहिं पेस पाती हूँ थे ॥
क्या करू सड़यां पड़ी विभलयां जुवन सुरतयां निकन रही जान ॥ मेरा सड्यां० ॥ २ ॥
( चन्द्रममा आहूट पाकर गाना बंद कर देती है, अपने सामने सासु गुणमद्राको देख लाजित
हो गृख नीचा कर लेती है )
गुणमद्रा—(थडे दु लसे) क्या यह आज आराम नहीं करती ! रात्रिके बारह बजे तक तू यो ही बैठी रहती है । सो जा बेटी, रात बहुत हो मई है ।
प्रथमांक ।
चन्द्रप्रभा—(नम्रतासे) हा सासू जी ! सो रहूंगी, आप क्यों तकलीफ उठाती हैं ! मुझे नींद नहीं आती इसी वास्ते बैठी हूँ । गुणभद्रा—(प्राद खाँसकर)
क्या करूँ बेटी तेरी ये है दशा बहु दुख भरी । देखकर तेरी अचला पवती छाती भरी ॥
आँखसे आसूं बरसते हुस्न महा जादा नहीं ।
क्या करूँ बेटी मेरी कुछ वश मेरा चलता नहीं ॥ जा जा बेटी । तू समझदार होकर ऐसा क्या करती है (स्वगत) क्या करे ए भी विचारी दुःख भारी सह रही । पांच वर्षोंसे कभी इक दिन सुखारी नहिं रही ॥
दुःख जो इसको सतावे जान का सक्ता उसे ।
वेदना है भीतरी उसको दिखावे ये किसे ।
क्या करूँ, मैं खुद परेशान हूँ, मगर इसे कोई भी शिक्षा नहीं कहती । (प्रगट) मैं कल एक और उपाय करूंगी । देखें उसका इसके ऊपर क्या असर पड़ता है । रंज मत करे, क्या दुःखके दिन हमेशा थोडे ही रहते हैं ।
[ यवनिका पतन ]
मणिमद्र नाटक ।
(मायने या गानेवाली। प्रवेषेत परदेके बाहर स्टेज पर) (तेरी उक्षष्ल है की नजेमें)
जो सही व्यवहार माने घर की रीतो न जाने उसको करतूत सारी दृथा हो जाय ।।
याते कलेव्य जान्नो अपनो २ न तातो देखो दुनियां को हालद यहां तुप आथ ॥ टेक ॥
करत सागर की रॉर रखते मच्छों से बरे कैसे होंगे सुखारी अनारी बु भाय ॥ १ ॥ पहिले शक्तो पिछानो पीछे आरंभ गनो नदि ला होगें बुखारी सभ्य को पाय ॥ २॥ घर की शिक्षा न पाई तप की रोतो न आई ऐसे जीनों की पिरता न थिरवा काशाय ॥ ३ ।। थारो जैसा भी रंग करो नेसा ही डंग कही मालो कई ‘कु’ज’ मोका मिक्षाय ॥ ४ ॥
( गानेबालीका गाते २ चले जाना।)
अंक पहिला-सीन दूसरा ।
स्थान-अनंगदिलका वेश्याका मकान।
अनगसिल्का अपनी परम सुन्दरी पुष्पतिङका बडसीको जाना जऔर वशीकरणादिके प्रयोग सिखा रही है।
अनइतिश्वका (पुग्दतिखका से) बेटी! सीखे बैड और अवमा । पेशा है उसकी शिक्षा प्राप्त कर (उस्तादसे) अजी उस्ताद प्रथमांक ।
जी ! इसे अच्छी तरह सिष्णाइयेगा, गानमै हावभाव और कटाक्षादिमें कमी न रखियेगा।
उस्ताद—पेला हो होथा आपकी इस लडकीको मैं हरएक विषयमे अद्वितीय कर दूंगा, किसी भी प्रकार कसर न रखूंगा। अनंग०—मैं यावले विशेष क्या कहूँ, यह आप हीकी लडकी है आप जैसा जाने सिबायेगा।
उस्ताद—आप क्यों फिक्र करती हैं। मैं इस आपकी छडकीको नव रोजोंमें ही ऐसा बना दूंगा जिसने समान दूसरी न मिलेगी।
अनंग०—मुझे भी ऐसी हो उम्मीद है (पुष्पतिलकासे) सीधे बैठ और उस्ताद्को वंश्गी करके बिद्या सीख । उस्ताद—(पुष्यतिल्यका के ठीक बैठ जाने पर) मेरे सामने देख और मैं जैसे बोलू’ तू मी वैसे ही बोल। हां कह, सा, रे, प, म, प, ध, नी, सा (पुष्पतिलका ऐसा ही कहती है) नि, ध, प, म, ग, रे, सा (पुष्पत्तिलका भी यही कहती है) सारेग, रेगम, गमप, मपध, पधनी, घनदेखा।
(पुष्यनिलका भी यही बोलती है)
सानिध, निधप, धपम, पमग, मगरे, गरेसा,
(पुष्प० मी कहती है)
बारी जाऊँ रे सांमरिया तुम पर बारना रे ॥
(पुष्प० भी इसी प्रकार कहती है)
बारना रे, तुम पर बारना रे, बारी जाऊँ’ रे सामिरिया तुम पर बारना रे । (लड़की भी०)
मणिभद्र नाटक ।
तन मन धन भव तुम पर वारू’ । (लड़की भी०)
घर हर अर सब तुम पर जाऊँ’ । (लड़की यही बोलती है) कब तक कातिल बनकर खंजर मारना रे, खंजर मारना रे, खंजर मारना रे, वारी जाऊँ’ रे सोमरियां तुम पर वारना रे। ( लड़की भी यही बोलती है )
उस्ताद—( अनंग तिलकासे ) लीजिये जुनाव ! आपकी लड़की चन्दरोजमें ही गाना आदि सब सीख गई, आप परीक्षा करके देख लीजिये ।
अनंगति०—आपको मैं अभ्यबाद देती हूँ और आपकी बुद्धि एवं कार्यकुशलता पर कुरबान होती हूँ, क्योंकि आपने इसे अल्पसमयमें ही इतना होशियार कर दिया । अच्छा एकाद गाना तो इससे गवाइये ।
उस्ताद—( पुष्पतिलकासे ) एक अच्छा बाजा गाओ और अपने हुनरका दिखाओ ।
पुष्पवि०—( डोर बैठकर ) गाना गाती है ।
सुन तेरा उपदेश स्वामो मन निसंशय होगया ॥ १॥ उपल तु’बक खींचती ज्यों मेरा चित त्यों खिचगया। जग की ये सारी दशा लखि मन हमारा फट गया ॥२॥ प्रेम तेरा हो अटन है जिसके दिल में लग गया ॥ वह हमेशा के लिये तुझ रूप शंकर होगया ॥ ३ ॥ प्रथमांक ।
अनंगति०- (उस्तादले) बहुत ठीक, मैं आपके हुनरकी बहुत तारीफ करती हूँ, लीजिये इस तुच्छ भेंटको स्वीकार कीजिय (उस्तादके हाथमें नोट देती है और वह उसे बन्दगी कर चला जाता है)
अनंग०- (उस्तादके जाने बाद पुष्पतिलकासे) गाना तो तू सीख गई अर्थ मनुष्यको वशमें करनेकी विद्या और सीख ले। देख। आये हुए मनुष्य पर ऐसा प्रेम दिखाना चाहिये और उससे इस प्रकार बर्ताव करना चाहिये कि वह फँस जाय यायी प्रेममें अन्धा बन जाय ।
पुष्यति०-हां मा। मैं ये सब जानती हूँ, मैंने रोज वही देखा है। “मूंसोंके जाये विछ ही खोदते है” वनको विशेष शिक्षा देने की जरूरत नहीं है।
अनंगति०- (खुश होकर) शाबाश बेदो। ऐसा ही चाहिये… ( आहट पाकर कादला शब्द कर देती है। कर्मकारका प्रवेश) कर्मकार- (गुणमद्र का पेक्षा हुआर, बन्दगीके बाद) हे वेश्याओं- में श्रेष्ठ अनंगतिजका! आब हम तेरे हाथमें एक सोनेकी चिड़िया देने आये है। अब देखना चाहिये कि तू उसे अपने रंगमें किस प्रकार रंग देती है।
अनंगति०-बैठो भाई। क्या बात है? जरा साफ साफ
कह जाओ जिससे मुझे यथार्थ घटना मालूम हो।
कर्मकार- (बैठकर) यहाँ एक सेठ मणिभद्र बड़ा मालदार है मगर शास्त्राभ्यास विशेष होनेसे विषयोंसे सर्वथा विरक्त है। मणिभद्र नाटक ।
इसकी नग का उद्देश्य इसे विषयानुरागी दमानेका है, सो हले फैलाओ और अपना काम भी चलाओ । घर बैठे ही अमीर हो आओगी ।
अनंगति०-क्या यह सेठ हमारे घर पर आ सकेगा या वहीं आकर कुछ अपना प्रपंच करना पड़ेगा ।
कर्मकार-यों तो यह क्या आवेगा मगर जानेकी तरकीर की जायगी । हम उसे आपके घर पर कर जांयगे, बाद ठोक ठाक करना आपका काम है ।
अनंगति०-अच्छा आइये, उसको यहां आने पर ही सब ठीक कर लिया रूचेगा ।
कर्मकार०-हम उसको आपके पास ले आते हैं ।
( कहकर कर्मकार चला जाता है )
यवनिका पतन ।
अंक पहिला-सीन तीसरा ।
स्थान-सेठ मणिभद्रका मकान ।
मणिभद्र और कर्मकारका खडा दिखाइ पड़ता ।
प्रथमोऽङ्कः
मणिभद्र—वे महात्मा कहाँ पर ठहरे हुये हैं ? क्या तुमने उन्हें देखा है ?
कर्मकार—अहीं तो पास ही की धर्मशालामें ठहरे हुये हैं उनके ज्ञानकी प्रशंसा सब लोग कर रहे हैं । जिससे सुनिये वही तारीफ करना है । ऐसा कोई भी पुरुष नहीं जो उनके दर्शनकर अपनेको कृतकृत्य नहीं समझता हो ।
मणिभद्र—तब तो जरूर ऐसे महात्माका दर्शन करना चाहिये और इनके उपदेशामृतका पान करना चाहिये । क्या अभी चलें ?
मणिभद्र—चलो मैं अभी जानेको तयार हूँ (ज्योंही मणिभद्र चलता है त्योंही उसका मित्र दिनेश आ जाता है)
दिनेश—(मणिभद्रको कहीं जाता हुआ देखकर) मित्र ! इस समय आप कहां जा रहे हैं, आपतो घरसे बाहर कभी निकलने भी न थे, आज क्या बात है ?
मणिभद्र—शहरमें एक बड़े भारी योगी आये हुए हैं, मैं उन्हींके दर्शन करने जा रहा हूँ । अच्छा हुआ तुम भी ठीक मौके पर आ गये, नहीं तो मुझे खुद तुम्हारे यहां आना पड़ता । चलिये आप भी साथ साथ चलिये ।
दिनेश—हमने तो किसी महात्माके आनेकी नहीं सुनी है, आप को यह बात कैसे मालुम हुई ।
मणिभद्र नाटक ।
मणिभद्र—ये दो कर्मकार कह रहे हैं कि वे यहीं पास ही की धर्मशालामें ठहरे हुए हैं, बड़े सन्त एवं विद्वान् हैं। कर्मकार—(दिनेशसे इशारा कर) अजी आपको नहीं मालूम है, वे अभी ही आये हैं (पास जाकर दिनेशके कुछ कानमें कह देता है)
दिनेश—(यथार्थ बात जानकर) अभी आये होंगे; मैं आज कार्यवश वाहिर चला गया था, इसीसे ये समाचार सुननेमें नहीं आया। अच्छा; चलिये, मित्र मैं आपके साथ साथ ही चलता हूँ । (मणिभद्र अपने मित्र दिनेश और कर्मकारके साथ बात देता है।
[ यवनिका पतन ]
अंक पहिला-सीन चौथा ।
अनंगतिलका का महल ।
अनंगतिलका पुष्पतिलकासे बात चीत कर रही है। बाज़ारमें दो मस्त हाथी ऊधम मचा रहे हैं।
कर्मकार—(दोनों हाथियोंको दो तरफसे आते देख कर) दिनेश! दिनेश ! देखो सामनेसे यह खूनी हाथी सबको मारता कूदता आ रहा है। चलो, कहीं बचकर जान बचावें । दिनेश—(पीछे देख कर) हैं, देखो न, पीछेसे भी एक मदोन्मत्त गज कैसा दौड़ा आ रहा है। आज क्या बात है, जान बचेगी कि "! दोनों तरफके रास्ते बन्द हैं।
प्रथमाक
कर्मकार—बड़ा संकटका समय उपस्थित है, चलो भाई ! इस सामनेवाले घरमें चलें और अपनी जान बचावें, वार्ष साधुके दर्शन करेंथे।
दिनेश—ठीक है, ठीक है, वस जल्दी चलो और कोई
बचनेका दूसरा उपाय नहीं है। कर्मकार और दिनेश मणिभद्रको सामनेवाळे अनेगतिलकाके मकानमें लेजाते हैं। कर्मकार अर’गतिलकाको इशारे से सा हाल सम्मझाकर दिनेशसहित मणिभद्रको बदीं छोड़ आप मौका पाकर नीचे उतर आता है। अनंगति०—(पुष्पतिळकाले) हां, बेटी। क्या देखती है। सामने सोने की चिडिया बैठी है, पकड़ती क्यों नहीं? मैं जल पीने जाती हैं’, तू इव चाबुओंकी जरा खातिरदारी करता। ( कहकर अनंगतिद्धका भी चली जाती है)
मणिभद्र—(कुछ देर बाद पुष्पति० से) तुम कौन हो ? फ्या यही मदानाका मकान है। देखो तो सही क्या हाथियोंका उप- द्रय गांत हो गया ?
दिनेश—[स्वगढ] हा, तुमको रास्ते पर लानेवाले महात्मा ये ही हैं, जरा बैठा तो सही, मालूम हो जायगा फि ये गुरु तुम्हारी कैसी हजामत करते हैं।
पुष्पति०—[ हाथ जोड़ कर ] कृपाकर आप विराजिये, मैं अमी तुरत देल आती है [ शाफर थोड़ी ही देरमें फिर लौट आती है ] सभी तक ये दोनों हाथी खून खरादी कर रहे हैं, न किसीको आने देते हैं और न किसीको जाने देते हैं। बड़ा सारी कोलारस हो रहा है।
मणिमद्र नाटक
मणिभद्र—[रोककर] नहीं मित्र, तुम मत जाओ, कर्मकार भी चला गया और तुम भी चले जाओगे तो मेरा यहां दिल ही कैसे लगेगा?
दिनेश—नहीं मित्र! मैं अभी आता हूँ, कर्मकार अवश्य उन्हीं महात्माके पास सूचना देने गया होगा। मैं भी उन हाथियोंका उपद्रव मिटाने जाता हूं। मैं अभी लौट आता हूँ आप चिन्ता न करें। [ कहकर दिनेश भी चल देता है।] मणिभद्र—न मालुम यहां पर कब तक वैठना होगा?
पुष्पवतिः— [ मणिभद्रसे] चलिये और उस सामनेवाले कमरेमें बैठिये। मैं आपको हाथियोंका उपद्रव शांत होते ही पहुँचा दूंगी। [ बड़ा प्रेम दिखाती है ]
मणिभद्र—अच्छा चलो, यहीं पर अब, तक बैठे गे तब तक कि हाथियोंका उपद्रव शांत न होगा। पुष्पविलका मणिभद्रको कमरेमें लिया जाती है। मणिभद्रको ऊँचे सिंहासन पर बैठाती है और आप नीचे बैठ जाती है ]
प्रथमांक !
तृतीय
पुष्यति०—नहीं, जब उपद्रव शांत हो जायगा तब आपके पास खबर आ जायगी। मैंने अपने आदमियोंको यहीं खबर लानेके लिये नियत कर दिया है कि वे उपद्रव दूर होते ही यहां तुरंत खबर दें।
मणिभद्र—सर ऐसे जाली बैठनेसे चित्त नहीं लगता। देखो किस कामके लिये तो आये थे और बीचमें किस झंझटमें फँस गये।
पुष्यति०—आर किस कार्यके लिये आये थे; यदि उसका बताना उचित हो तो मुझसे कहिये, शायद मैं उसे कर सकूँ। मणिभद्र—क्यों नहीं ? मैं अपने मित्र दिनेशके साथ एक धर्मात्माके दर्शन करने और उनसे तत्त्वचर्चा सुनने आया था। मगर क्या किया जाय “श्रेयांसि बहु विघ्नानि” वाली नीति चरितार्थ हो ही जाती है।
पुष्यति०—क्या हर्ज है, वह भी कार्य हो जायगा। अभी तो, जो मेरेयोग्य सेवा हो सके कहिये, मैं उसे करनेको सर्वथा तयार हूं। क्या आपको प्यास लगी है ? लीजिये और इस अमृत- समान जलको पीजिये। [सुवर्ण ग्लासमें पानी देती है] मणिभद्र—नहीं, प्यास नहीं लगी है और यदि लगे भी तो क्या मैं बिना जाने बूझे थोड़े ही जल पी सकता हूँ ? पुष्यति०—हम कोई नीच जाति नहीं हैं, आप फिक्र न करें। आपको यहां सभी चीजें शुद्ध मिल सकेंगी। मणिभद्र नाटक ।
मणिभद्र—क्या तुम्हारे पास शास्त्र नहीं है, मैं स्वाध्याय करना चाहता हूँ विना शास्त्रस्वाध्यायके मेरा मन नहीं रमता है।
पुष्यतिः—शास्त्र तो बहुत हैं। मगर वे मेरे दूसरेघर पर हैं, इन हाथियोंकी वजहसे रास्ता बंद है। कहिये तो मैं कुछ मुखाग्र बातें’ कहूँ। बाद जैसी आपकी आज्ञा होगी शास्त्र वगैरह ला दिये जांयेंगे ।
मणिभद्र०—क्या तुम पढ़ी हुई हो ?
पुष्यति०—हाँ, मैं पढ़ी हुई हूँ’ और शास्त्र बांचने सुननेका मुझे बड़ा शौक है। यदि आपकी आज्ञा हो तो कुछ तात्त्विक बातें सुनाऊँ।
मणिभद्र—कहिये, तब तक तत्वचर्चा ही सही। कुछ समय प्रश्नोत्तरमें करनेसे ही ठीक होगा।
पुष्यति०—संसारमें दो पदार्थ हैं।
मणिभद्र—कौनसे ?
पुष्यति०—एक जीव और दूसरा अजीव।
मणिभद्र—तुम कौन हो ?
पष्पति०—हम संसारी जीव हैं।
मणिभद्र—संसारी जीव किसे कहते हैं ?
पष्पति—जो संसारमें अटके हुये हैं, पंचेन्द्रियसंबंधी विषयोंमें फंसे हुए हैं, उन्हें ही संसारी जीव कहते हैं। मणिभद्र—विषय क्या चीज है।
प्रथमांक ।
पुष्पदि—जो हम और आप दिन रात सेवन करते हैं
उन्हींको विषय कहते हैं ।
पुष्पतिः—अनेक चीजोंका स्वाद लेना, अनेक प्रकार सुगंधित वस्तुओंकी खुशबू लेना, मनोषाभतोष चीजोंका अवलोकन करना कर्णप्रिय मधुमान और मनोहर शब्दोंका सुनना तथा रुदर्शने- न्द्रियजमित स्त्री पुष्य द्वारा विषयज्ञभित सुखकर आनन्द देना, बस, इन्हीं सव विषयोंको हम और आप रात्रि दिवस लेधन करते हैं । क्या और भी विशेष खुलासा करु’ ?
मणिभद्र—ठीक है, मगर कोई २ बात हमारी समझमें नहीं बैठती ।
पुष्पति०—करिये कौन सी बात आपकी समझमें नहीं आती । मणिभद्र—जो तुमने पीछेसे कही है ।
पुष्पति०—[मुशिका कर] अच्छा, अहे. मी समझमें आजायगी पैया आपको और भी कुछ बातें सुगड’ ? मैं बही कहना चाहती हजा आपको रुचिकर हो । मैं उपनेको बडी सौभाग्यवंती समझती हूँ’ जो आपका मुझे संबंध प्राप्त हुआ है । सच कहती इ’ मुझे आपके देखनेडीसे इतना प्रेस हो गया है कि जिसका बयात जिह्वा नहीं कर सकती ।
मणिभद्र—और वही दक्षा मेरी भी हो रही है । व माजूम तुम्हारी बचनावलीने मेरा मत्त ऐसा स्थिर क्यों कर दिया है कि मणिभद्र नाटक।
बढ़ कर दूसरी जगह आता ही नहीं। मैं कुछ नहीं कह सकता हूँ कि यह किसका चमत्कार है।
दिनेश—एक तरफ हुश २, स्वयंत ] खूब फैले, यहां तो चन्द्रकिरणके समान अपनी स्त्री चन्द्र प्रभासे इतना परेज़ ! और यहां पर ये सुजकरैं बढ़ रहे हैं !! ठीक है यदि यह यद्वापर फैंस जाय तो मैं भी उधर लगने दिलीहोसले पूरे बस और उस अलौकिक फलादको भोगू।
पुष्पति०—इसमें अवश्य कोई न कोई परमयका सम्बन्ध है, बिना बसके किसीशा भी सत्य २वे दिलीप्रेम नहीं हो सकता।
मणिभद्र—ठीक कहती हो, शास्त्रोंमें भी ऐसे कई दृष्टान्त देखतेमें पाये हैं जो पूर्व भवके मेनासिवको यतकाते हैं। वही वजह है कि मेरा दिल तुम्हारेमे अनुरक्त हो गया है। पुष्पति०—ठीक है। क्या आप एकाद गाना सुनेंगे ? पणिभद्र—[ मैं मपूर्वक ] सुनाओ न, तुम्हारा वचन मुझे बहुत प्यारा लगता है।
पुष्पति०—अच्छा, सुनिये। [ गाना गाती है ]
जाओ भी जाओ मुझ नादानको फुसलाने आये ॥ टेक॥ मुझको बहकाने आये, दिलको चुराने आये,
नैननसे नैन पिलाये, सैननमें सैन चलाये।
मुरे नादान, जिनकी नादानी दिखलाने आये ॥ जाओ० ॥ १ ॥ प्रथमांक ।
तुमने मेरा दिल लीना, अपना मुझको नहि दीना,
मुझ पर वो जादू कीना मैं’ तन मन अर्पण कीना।
हमवो कुरवान तुमपर हमको क्या समझाने आये ॥जाओ०॥२॥ मणिभद्र—महा, क्या अच्छा गाना गाया है। मालूम पडता है यह बौछार मेरे ऊपर ही पड़ रही है।
पडता है ?
दिनेश—( छिपा हुआ ) हाँ, अब यह ठीक काठका उल्लू
बन गया। सच है जो इन बुड़ेलोंके हाथमें फँस जाते हैं वे सूखे थोड़े ही निकलते हैं, अवश्य उन्हें दीक्षित होना ही पड़ता है। [ मणिभद्रसे पासमें आकर ] क्यों मित्र। चलेंगे या कुछ देर और यहीं पर रहेंगे ? यदि आप थोडी देर तक यहीं पर विराजे तो मैं एक और जरूरी काम कर आऊँ।
पुष्पति—[ दिनेशसे परदा करके ] इनसे कह दीजिये न कि चले जायँ। अपना जरूरी काम कर आवें’, मैं थोड़ी देर बाद खुद आ जाऊँगा।
मणिभद्र—[ दिनेशसे ] अच्छा, आप अपना जरूरी काम
कर आवें, मैं थोडी देरबाद आ जाऊँगा।
मणिभद्र नाटक ।
दिनेश—[ स्वगत ] हेला कैसा फंसा। ठीक है, ये राहें जितना कर उतना थाड़ा है। क्या मालूम था कि यकायक मणिभद्रकी इतनी जल्दी इन दर्जेकी हालत हो आयगी! खैर, मेरे लिये तो अच्छा ही हुआ कारण कि इसके रहते मेरी कबशात सामने वाली थी। अब जाता हूँ और उस नाजनींसे मिलने एवं अपने वश करनेकी तरकीब सोचता हूं। (प्रकट-मणिभद्र) अच्छा मित्र। तो मैं जाता हूँ, आप यहीं पर रहिये, मैं फिर आ आऊँगा। मणिभद्र०—(उदासीनतासे) आइये। दिनेश जाता है किन्तु उसे रास्तेमें ही अनंगतिलका रोक लेती है।
अनंगतिः—(दिनेशसे) आप मिहरबानी करके अभी उनके
पास न आया करें नहीं तो बना बनाया खेल बिगड़ जायगा। आप जानते हैं हमको इसमें कितना परिधान करना पड़ा है। यदि आपको मिलने आदिकी बवाश हो तो मुझसे मिल लिया करें।
दिनेश—ठीक! मैं तो यही देखने गया था कि देखूं इसका मन रंजायमान हुआ या नहीं ?
अनंगति—अभी रंग रचने दीजिये विना रंगे उनसे बात न कीजिये नहीं हां परिणाम उल्टा होगा, हमें फिर तरदुद सहना होगा। हमें रंग उष्ण फिर पकाना होगा, हमारा अभी काम पल्हा धु होगा। एक अवस्था होने पर आप जा सकते हैं।
दिनेश—(स्वगत) तू रंग गहरा लगा चुकी है, काफी उसे तू फंसा चुकी है।
प्रथमाङ्क ।
अधार्मे देके पड़ा औ लेना, बना ठीक छलछू इसे लूट लेना ॥ दिया मंत्र कानोंमें फूंक तूने, लिया खीझ भी मत्र वेश बु मैंने ॥ (प्रगट अनंगति० से) अच्छा ऐसा ही होगा, आजसे आप हीसे मुलाकात किया करेंगे।
अनंगति०—और जरा खर्चा वर्धा भिजवा दीजिये। आप
जानते हैं कि अब तक आपके मित्र यहाँ पर रहे’ तब तक हम दूसरी रोजी नहीं लगा सकते, इन्हीं पर हमारा सारा खर्च समझिए।
दिनेश—सो सो ठीक है, क्या यह बात हम नहीं जानते, अवश्य आपके पास, रक़म भेज दी जाया करेगी। मगर उस रक़ममें तुम्हें मेरा हिस्सा भी रखना होगा।
दिनेश—बस ! यही एक ख्यालमें रखनेलायक बात है,
अनंगति०—(कर्मकारको रोककर) अभी आप वहाँ न जावें नहीं तो सब गुड़ गोबर हो जायगा। (दिनेशकी तरफ इशारा कर) ये भी मेरे बिना पूछे इनके पास चले गये थे। इनके आते ही समका भाव बदल गया था मगर मैंने इन्हें जल्दी इशारेसे बुला लिया। मैंने इन्हें सारी बातें समझा दी हैं आप भी इनके हितेच्छु हैं जो अब तक पूरा काम न बन जावे तब तक मेरे, दिसा मणियह मदन।
पूछे आप इनित उनके पास न जाये नहीं हो हमारी साधे सिदमत व्यर्थ आवणी।
कर्मकार—आमेरे पैसा ही होगा, हम आपहीये शिल्फार सथ शालत दरयाफ्त कर लिया करें है। आपकी विना शाके नांगगे।
अनङ्गति—रुष आपका कार्य भी करती हो जायगा। आप कुछ खाने वश्य दे कायें, इसका सय कारण इन बाबू स्वसे कह दिया है और संक्षेपने आपमे मी करती हूँ कि अथ राक आपके सेठी हमारे यहां पर रहेंगे सब तक हम अपनी दूसरी आजीविका नहीं लगा सस्ती है यह आपका साल श्वर अल्यस्त प्राचश्यक है।
दिनेश—टों, जंका कहना ठीक है। (कर्मशारले) मेडा- मोसेसे कहकर आप इनके ९य जरूर अर्व मेश दीजिएगा। कर्मकार—वर पर शासे ही में आपके लिम वर्धा मेश था। इसकी आए निम्ता न करें।
अनङ्गति०—पी नहीं आए लोगों से कुछ कुश नहीं है कि हमारी यही ग्राज्ञीविश है। कभी कभी भाप दोनों महाशय इस गरीधवानेश्को आकार पक्षिष किया करें और इ अवलपर मिहश्यानी खयो।
कर्मकार—ऐसा ही होगा। वो कारन सोगोंको आद जानेकी इजाजत दीजिये, बार आकर फिर मुलाकात करणे कबर शेरों चके जाते है और (घर अनयतिलका भी बनी कती है)
प्रथमांक
मणिभद्र—क्यों नहीं! गाना भी गाओ और साथमें नाच भी दिखाओ।
पुष्पवति०—सुनो (गाना गाती है और नाचती है) जादू आखोंका दिलमें समाय गयो रे।
समाय गयो, समाय गयो, समाय गयो रे।
जादू आखोंका दिलमें समाय गयो रे ॥ टेक ॥
मेरा मन ले गया, अपना नहिं दे गया। मेरे बिरहाग्नि तन- में लगाय गयो रे ॥ जादू० ॥ १ ॥ मैं वो बिरहिणी हो सहती हूँ’ सब जो ॥ मेरे आशाकी फांसी लगाय गयो रे ॥ जादू आखों० ॥ २ ॥ प्यारेकी यादमें पागल हुई हूँ’ मैं’। मेरे दिलमें तह कांटा चुनाय गयो रे ॥ जादू० ॥ ३ ॥ मणिभद्र—अहा। क्या अजब लय और ताल है। प्यारे तुम्हारे साथ हम भी गायेंगे ।
पुष्पवति—गाओ न प्यारे ।। (दोनों-उछलकर गाते हैं) हम दोनोंका आज मन भाय गयो रे ॥ भाय गयो भाय गयो भाय गयो रे, हम दोनोंका आज मन भाय गयो रे ॥ टेक ॥ आज मिलकर गाओ, प्रेम रस बरसाओ। ठीक जोबन
जवानी पे आय गयो रे ।। हम दोनों० ॥
कैसी जुगल जोडी, मेरो सुभग तेरी। ऐसी हालतको इमरो बनाय गयो रे ॥ बनाय क्यो बनाय गयो फँसाय गयोरे। हम दोनोंका आज मन भाय गयो रे ॥ २ ॥
मणिमद्र नाटक ।
• दिनेश–(जो एक तरफ छुपा खड़ा है) और कौन ऐसी
हालत बनायेगा, मैंने ही तुझ उल्लूको यहां फँसाया और वहां अपना काम बनाया, तू तो यहीं पर सड़ता हुआ देखना कि अंत- में तेरी क्या दशा होती है, बेवकूफ ! कहीं वेश्या भी किसीकी होती है ? वह धनके साथ साथ जान भी ले लेती है । मर साले । मैं भी तुझे ये बातें’ क्यों सुझाऊँ ?
अनङ्गति०–(इशारेसे चुनाती हुई धीरे २) क्यों आप फिर वहां पहुँच गये ! यह क्या बात है ?
दिनेश–(पासमें आकर) नहीं जी । मैं उनको अपनी सूरत थोड़े ही दिखाता हूँ’ । लीजिये न, जरा हाथ आगे बढ़ाये । - (हाथमें रुपयोंकी एक थैली देकर) इसे आप ऐसा फैलाओ कि वर्षों तक आपके चुंगुलसे बाहर न होने पावे, जभी तो इसका धन जो कराडों दीनारोंका है, आप ले सके’गी ।
अनङ्गति०–ऐसा ही होगा, क्या आप जा रहे हैं ?
दिनेश०–एक जरूरी काम होनेसे मैं अधिक नहीं ठहर सकता ।
अनङ्गति०–तो क्या कुछ देरके लिये भी न बैठेंगे ? दिनेश–अभी नहीं बैठ सकता, माफ कीजियेगा । देखें। मेरा भी ख्याल रखना, ऐसा न हो कि आप मेरी याद ही न करें । मेरी रकम छुपी रख दिया करना (कहकर जाता है )
अनङ्गवि०–(दिनेशके जाते २) अरे हरामजादे ! कहीं वेश्याओंसे भी किसीने पण वापिस लिया है, जो तू ये शैतान- प्रथमांक ।
सरीखी बातें’ कर रहा है। जा, तुझसे मल्लू मेरे यहां राज खाते है (कहकर वह भी चल देती है)
पुष्पति० प्यारे। रात्रि बहुत हो गई है, चलिये आराम करें। मणिभद्र अच्छा, चलिये (दोनों चले जाते हैं) [यवनिका पतन ]
अंक पहिला-सीन पांचवां ।
दिनेशका मकान ।
दिनेश अकेला उहल रहा है।
दिनेश (टहलता हुआ) “संसार व्यवहारस्तु नहि माया धिपर्जितः” इस नीतिफे अनुसार अपना काम बनानेके लिये इस जीवको कुल-कपट अवश्य करना ही पड़ता है। चिप्ता ऐसा किये बद जपने कार्य को पूरा कर दी नहीं सकता। देखो । आज में इसी नीतिकी वजहसे अमनचैन कर रहा हूँ। मेरे पास इसके पहिले मासूत्ती पूंजी थी मगर आज मैं मणिभद्रक नाम जाली कुठी चिट्ठी लिख २ कर लाखो रुपयों- का माल ले धनवान बन गया हूँ। मणिभद्र भी बुरी तरह फंस गया है वह उस वैश्याफे चुंगुलसे निकल नहीं सकता। जब तक वहाँसे निकलेगा तब तक मैं अपना सब काम बनाकर कहीं दूर देशान्तर बजा जाऊंगा और मौज करूंगा। यह तो सब हुआ मगर मेरी अभी एक और मुराद बाकी है, देह मेरी मणिभद्र नाटक ।
चतुर दूतों इसकी को पथा खबर, जाती है। अहा ! यह मृग- लोचनी अपने मनोहर प्रभाशाली वदनसे चन्द्रमाकी युनिको कीका करनेदाक्षी चन्द्रप्रभा मेरे दिलोंमें ऐसी प्रवेश कर गई है कि उसकी जुदाई मुझे बेताब किचे देती है। [दूतीका प्रवेश होते ही जल्दीसे] कहो। बया हुआ ? उसने आना मंजूर किया या नहीं ?
दिनेश—तो क्या मुझे इसके वियोगमें इटपटा कर प्राण दे देना होगा !
निपुणा—काम तो बहुत कठिन है।
दिनेश—क्या कोई है काम पैसा जो तेरेखे भी न हो। सैकड़ों करि काम ऐसे फिर भी क्यों गमगीन हो। मिले हैं सार्टीफिकट ! तुझको बहुत इस काम के। फिर भी हिम्मत हारती क्यों जा बसे समझायक ॥ देखो ! तुम्हें मालामाल कर दूंगा। मुँहमागा इनाम दूंगा। तुम एकचार उस नाजनीसे अवश्य मुलाकात करा दो। निपुणा—करूंगी कोशिज, अभीने आप क्यों घबराते। जायगा खाली न मेरा वार पया समझावते ॥
मैं वायदा करती हूँ कि उस पीतस्तनीसे तुम्हारी शीघ्र ही मुलाकात कराऊंगी।
प्रथमांक 1
दिनेश-तो क्या तुम्हारी बातोंमें वह नहीं आई ? निपुणा-मगर मैंने उसका पीछा नहीं छोड़ा और इसी विचार- में लगी कि कोमली तरकीब करनेसे यह कार्य बन सकता है। मैं कुछ दो दिनोंमें उसकी सासु गुणभद्राके पास गई और कह सुनकर दाईका काम हाथमें लिया, धीरे धीरे विश्वास जमा- कर मैं रात्रिमें सो आज कल वहीं रहने लगी हूँ । दिनेश-तब तो तुमने बहुत अच्छा काम किया, अब मुझे भी उम्मीद बंधती है कि यह कार्य बन जायगा ।, तो क्या वहीं पर आनेका रात्रिमें मौका नहीं लगा सकतीं? क्या वह गुण- भद्राके साथ सोती है या तुम्हारे साथ ?
निपुणा-प्रथम तो सासु बहु एकही कमरेमें सोती थीं मगर आजकल मैंने विशेष मेल जोल बढ़ा लिया है इससे कभी कभी हम दोनों भी एक कमरेमें सो रहती हैं।
दिनेश-(खुश कर) शाबाश! तब तो तूने आपसे भी
मणिभद्र नाटक ।
निपुणा-बस, आज रात्रिको तुम ठीक बारह बजे वेश बदल कर आना, मैं जागती रहूंगी। तुम धीरे किवाड खटखटाना, मैं यह इशारा सुनते ही भीतरसे किवाड खोल दूंगी। लेकिन खिड़कीकी राह आना। देखो ! आजकल कर्मकार बड़ी चोक्सी रखता है उससे हमेशा बचते रहना। यह रहस्य उसे न बताना ! दिनेश-नहीं, इसे मेरे और तेरे सिवाय कोई भी नहीं जान सकता। तो क्या मैं’ आज ही रात्रिके ठीक बारह बजे वहाँ आ जाऊं।
निपुणा-हां, आज ही ठीक समय पर अवश्य आइये !
देखिये कोई गल्ती न हो।
दिनेश-क्या आप अभी जा रही हैं?
निपुणा-हां, जा रही है। देरी होनेसे मालकिनको संदेह हो जायगा कि इतनी देर इसने कहां पर लगाली। इससे मेरा अभी जाना मुनासिव है।
दिनेश— (हाथमें नोट देकर) लीजिये और अपने वायदेपर पक्का रहिये, मैं कार्य होने पर तुझ मालामाल कर दूंगा। ( निपुणा दूती चली जाती है।)
दिनेश- (स्वगत) अब चन्द्रप्रभाको भी अपने हाथ लगी ही समझो। फिर क्या है। कहीं रम्य प्रदेशमें जाकर दोनों प्रेमी आमोद-प्रमोद करेंगे। चलू और अपनी पोशाक एवं वेश बदलनेकी फिक्र करू । (कहकर दिनेश भी चला जाता है) [ यवनिका पतन ] दूप
प्रथमांक-समाप्त ।
द्वितीयांक
अंक दूसरा-सीन पहिला ।
अनंगतिलकाका मकान । .
मणिभद्र और पुष्पत्तिलकाका बैठा दीखना ।
पुष्पत्ति०- कहिये प्यारे ! अब आपका क्या विचार है ? मणिभद्र- मुझे तो तुमने ऐसा कब्जे में कर लिया है कि कहीं भी दूसरी जगह एक घड़ीक बास्ते भी जानेकी इच्छा नहीं होती । वास्तवमें तुम्हारा प्रेम एक अलौकिक प्रेम है । पुष्पत्ति०- और क्या तुमने मेरा चित्त अपनी ओर आकर्- षित नहीं किया ? जो स्वप्नमें भी दूसरी तरफ नहीं आता । मणिभद्र- इसमें मुझे संदेह है कि तुम्हारा और चित्त दूसरी तरफ न जाय ! यह प्रकृति-विरुद्ध बात है । पुष्पत्ति०- नाथ । मुझको ग्राम्य वेश्या सी कभी जानो नहीं । जन्म पानेसे कभी वेश्या में हो सकती नाहीं ॥
प्राणप्यारे ! आपका यह प्रेम दिलमें लग गया । बसको दिलसे दूर होना अब असम्भव हो गया ॥
क्या मिट्टीने पढ़ा हुआ सोना मिट्टी हो जाता है ? मणिभद्र- मानता हूँ मैं तेरा निष्कपट सच्चा प्रेम है । मगर क्या आजन्म ठहरेगा यही संदेह है ॥
मुझे यह प्रेत क्षणभंगुर ही दीखता है ।
मणिभद्र नाटक ।
क्या आप जानते हैं कि मेरे इस शरीरको कोई अन्य स्पर्श करेगा ? हरगिज नहीं, यह स्वप्नमें भी न होगा। मेरे जीवना- धार आप ही रहेंगे। सूर्य पश्चिममें उदय होने लगे तो लग जाय, मुझे चाहे चलायमान हो डाव, मगर मेरा प्रेम विच्- छित नहीं हो सकता ।
मणिभद्र—इसका क्या प्रमाण है ? यदि हम हमारे प्रेममें कोई बाधक हो गया और उसने हमारे दिलोंमें द्वेषीभाव पैदा कर दिया तर क्या होगा ? क्या उस समय तुम मेरेसे अपना प्रेम वायदा निभाओगी ?
पुष्पत्तिः—एक तो ऐसा होगा ही नहीं, और यदि कदा- चित् ऐसा निमित्त मिल भी गया तो मैं अपने इस शरीरको आप पर न्योछावर करूंगी। आपके दुःख विरदमें मैं योंही न बैठी रहूंगी। मैं सच्चे दिलसे कहती हूँ कि आपको छोड़ मुझे स्वप्नमें भी कोई स्पर्श न कर सकेगा। क्या आपको मेरी इन बातों पर विश्वास नहीं है ?
मणिभद्र—क्यों नहीं ? मुझे विश्वास अवश्य है, मगर किसी कारणवश यह बात निकल पड़ी थी। तुम कुछ संशय न करो। पुष्पत्ति०—कौनसा कारण ? क्या वह मुझे नहीं बता सकते ? मणिभद्र—क्यों नहीं ! आजकल तुम्हारी माता कुछ विचार अन्यथा प्रतीत होता है। बस। इसीसे शक है कि कहीं कोई विघ्न न उपस्थित हो जाय।
द्वितीयाङ्क ।
पुष्पति—नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता । आप फिक्क न करें, इस दासीको अपनी आजन्म सेविका समझें । मणिभद्र—जब तुम्हारा प्रेम मेरे पर जटिल अनिवार है । तब फिलीके विघ्न करनेका नहीं अधिकार है ॥
दिनेश—( स्वगत, छिपा हुआ )
है नहीं अधिकार इस दुर्बुद्धिको मालुम नहीं । आः रहीं सिरपर विपत्ती वे इसे मालुम नहीं ॥
मुझे भी क्या गरज जो इसको सुझाऊँ ये सभी ।
जहन्नुममें जाय थे, मैं तो न है जाऊँ कभी ॥
( प्रगट, वणिभद्रके पास आकर ) कहिये मित्र ! क्या हाल- चाल है ? तबियत तो प्रसन्न है न, मेरे लायक कोई काम हो तो कहियेगा (पुष्पनिलका मुँह फेर लेती है )
मणिभद्र—अभी घर पर नहीं आऊँगा । वहां जाकर ही क्या करूँगा ? जरा एकबार कर्मकारको यहां पर भेज देना । दिनेश—(स्वगत)
किया ये प्रश्न था मैंने इसीके साथ देखन को । गाणभद्र नाटक ।
ठीक अन्धा हुञ्ज अब मैं चलू’ निज काज साधनको । आज उस चन्द्रवदनीसे निकालू’ ख्याले मिलकर । जिन्दगीका मजा लूंई बगाई नारि अब चलकर ॥
(प्रगट) कर्मकार आते ही होंगे, ये मेरे साथ आनेवाले थे मगर किसी कारणवश न आ सके। क्या मैं अभी जा सकता हूँ? भणिभद्र—हां, जा सकते हो।
अनंगमति०—(जाते हुए दिनेशको राहतेने रोककर) मेरे विना पूछे आप फिर वहां पहुंच गये। देखिये, कहीं आपकी इस गश्तीसे हमारा कहीं बना बनाया काम न बिगड़ जाय। आप समझ कर काम नहीं करते ।
दिनेश—काम बिगड़ जायगा यह आप क्या कह रही हैं । मैंने इन दोनोंकी बात चीठ सुनी है, वे कभी भी इस प्रेम-प्रीति से जुद्दे नहीं हो सकते। आप थीं नहीं, इसीसे जरा हाल चाल देखने चला गया था। (थेली देकर) लीजिये और इसीसे अपनी खीं बनाइये। हां, इसमें मेरा भी भाग रखती जाना, भूल न करना।
अनंगमतिः—यह सब आपको ही मिहरबानी है। भला आप- का मुझे व्याह क्यों न रहेगा? क्या आप अभी जा रहे हैं? दिनेश—हां, जा रहा है। (कहकर दिनेश चला जाता है) द्वितीयांक ।
अनङ्गतिलका—(विवेशके जाते समय) पथा इससे भी दुनियांमें फोई बेषकृफ होगा। जो हम सर्वमक्षियोंको रकम देता हुआ भी फिर वापिस लेनेकी आशा कर गढ़ा है। “कहीं पेटमें गया हुआ मी मोक्षन फिर बापित मिल सकता है ?” सुर्ख कहीं का। (कहती २ अनगतितका भी चली जाती है) पुष्पति०—(मभिद्रले) चलिये, भोजन तयार है। लम्रप व्यधिक हो गया है। पोछे भोजन ठंडा हो जायगा। मणिभद्र—क्या भोजनका समय हो गया। मैं तो अभी प्रातःकाल ही हुआ समभाता था। अच्छो, चलो। (दोनोंका चला जाना । [ यवनिका यत्तव]
००१५००
अंक दूसरा-सीन दूसरा ।
दिनेशका मकान ।
(दिनेश जानेकी तयारीने खडा है)
दिनेश—(बड़ीकी तरफ देखकर) ठीक ग्यारहका समय व्हो गया, अथ मुझे सब सामान ठीक करके चलना चाहिये। निपुणाफे कहे अनुसार घेश बदल कर ही जाना ठीक होगा। (डाड़ी, सुछ, तथा पावडर आदि लगाकर वेश बदल लेता है। शायनेमें चहरा देख कर) अय मुझे कौन कह सकता है कि ये दिनेश है। अब चलना चाहिये, देरी करनेसे ठीक न होगा। कीं ऐसा न हो कि सारा वना बनाया खेळ विमड जाय । नियुयाने मणिमद नाटक ।
वास्तवमें जाइकाला काम किया है। वह श्रायश्य काविश्व इनाम पानेके है। किसकी मजाल थी जो हजारों रुपया खर्च करने पर भी इतनी जल्दी कार्य कर देता। (जरा आगे चलकर खड़ा २ सोचता है) हैं; नोटोंका विंटल ता भूल ही गया, उस- के न होनेसे तो सारा गुढ मिट्टी हो जाता। अच्छा हुआ, जो चलते समय ही याद आ गया, नहीं तो बड़ी कठिनाई पड़ती। (जाकर नोटोंका विंटल पाकेदन रख चल देता है। परदा गिर जाता है। गानेवालेका प्रवेश )
गान—क्या दशा संसारको है समझदारो देखलो।
सचि, झूठे प्राणियोंकी करि परीक्षा परख लो ॥टेक॥ है जमाना चहुत खोटा पग बचाना सीख लो।
दुष्ट, दुर्जन प्राणियोंका कृत्य साख देखलो ॥ १॥ मत बनो विश्वास-घातक यह सुशिक्षता सीख लो।
दुष्ट कर्मोंका नतीजा खूब पहिले सोचलो ॥ २॥ बिना जाने अंतमें पछिताओग ये जान लो।
मत करो विश्वास सहसा ‘कु’न’ कहना मानलो ॥३॥ ( गहन वालेका घटा जाता, उसी समय दिनेशका वेश बदले आना )
दिनेश—( मणिमद्र को हवेलीके पास आकर ) यद्यपि रात्रि सुनसान है मगर तो भी मुझे बहुत समझ बूझ कर काम करना चाहिये। (हवेली की तरफ देखकर ) यह हवेली तो मत्रि `मद्रकी ही है, तथ चतुं ओर निपुणा के बताये हुए इशारेसे काम द्वितीयांक ।
दूं। (एक तरफसे कुछ खटकेकी आवाज सुन) हैं, कौन है। यह आवाजें कहाँसे आई ? (चारों ओर देख) कोई भी तो मालूम नहीं होता। फिर चलता है मगर फिर भी किसीके पीछेसे आनेकी आहट सुन) कोई है जरूर, मगर क्या कारण है कि मैं किसीको भी नहीं देख रहा हूँ ! (थोड़ी देर खड़ा रह चारों तरफ आश्चर्यसे देखकर) ये खुटके तो होते ही रहेंगे, यदि इन्हींसे मैं डर गया तो आगेका कार्य कैसे कर सकूँगा ? चाहे जान भले ही चली आय मगर उस मृगनयनीसे एकबार अवश्य मुलाकात करूँगा। (धीरे २ चलकर हवेलीके पीछेकी खिड़कीकी तरफ पहुँच कर चारों तरफ निगाह डाल) कोई भी तो नहीं है, मुझे झूठे ही भ्रम हो गया था। (बिल्कुल खिड़कीके पास पहुँच ज्यों ही किवाड़ों पर हाथ लगाता है त्योंही इसके चेहरे पर चोर-लालटेनकी रोशनी पड़ती है) अरे। यह क्या ? (एक चीख मार कर जमीन पर गिर पड़ता है)
द्वारपाल—(पकड़कर)
अबे है तू कौन को आया अँधेरी रात में।
चले छिपता ताकता डोले बना किल घात में ॥
बता कारण यहां आनेका नहीं हूँ’ मारकर।
देख इस शमसेरसे तेरा करू’ मैं अलग सर ॥
दिनेश—(घबड़ाकर)
हा। मुझे मारो नहीं मुझ पर दयाकर छोड़ दो।
आ गया हूँ इधर रस्ता भूल कर अब छोड़ दो ॥
मुझे रास्ता बता दा, मैं चला जाऊँगा।
मणिभद्र नाटक ।
द्वारपाल (घबड़ाकर) बड़ा मझार मालूम होता है। अये ! कहां जा रहा था, जो रास्ता भूल गया। तू कांप क्यों रहा है? दिनेश—(भयभीत होकर) हर लगना है इ जुर का इ र। मुझे छोड़ दीजिये, मैं अपनी रास्ता चला जाऊगा। द्वारपाल—(टपटकर) वप सीधे अपना द्वास्त नहीं बता- येगा ? क्या बुझाऊँ पुलिस को ? तेरा नाम क्या है ? और कहाँ का रहने बाजा है ?
दिनेश—(काँप कर) पुलिस ! पुलिस !!
द्वारपाल—हाँ; पुलिस । यदि तू अपना नाम धाम ठीक न बतावेगा तो अभी पुलिसके हवाले कर दिया जायगा। क्या नाम नहीं बतावेगा ?
दिनेश—बताऊगा, क्यों न बताऊगा ! आप मुझे कृवाकर पुलिसके हाधर्म न दीजिये ।
द्वारपाल—तो जल्दी बता तेरा नाम क्या है ? यहां क्यों आया ? कहाँका रहने वाला है ?
दिनेश—(धीरे २) मेरा नाम है दि…ने…श…ध्र
और रहने वाला यहीं का हूँ।
द्वारपाल—और यहां किसलिये आया था ?
दिनेश—किसलिये यह भी बताना डोयम्स क्या आपको । इन सर्वोके पूछनेसे क्या गरज है आपको ॥
मैं चला जाता हूँ अपने ठीक घरके रास्ते । तुम सताते व्यर्थ मुझको किस गरजके वास्ते ॥ रहने दीजिये न, यह पूछ कर आप क्या करेंगे ? द्वितीयाङ्क
द्वारपाल—(डपट कर) फिर वही बात। आमता है इन कौन है? क्या नहीं बतावेगा? बुलाऊँ पुलिस को। दिनेश—(डरकर) जानता हूँ। मेरा मित्र मणिभद्र आज बहुत दिनोंसे घर पर नहीं है। चल, इसलिये कभी कभी इधर देखरेखके लिये प्राजाता हूँ।
द्वारपाल—हुड। क्या बुलाऊँ एर्भकारको, और पूछुँ कि क्या तुमने इन्हें ऐसा करनेको कहा है कि ये गुपचुप वेश बदैछ चोरोंकी भांति छिपे छिपे रात्रिष्डे यारह बजे पिछली खिड़कीसे आकर तुम्हारे घरकी चौकसी किया करें?
दिनेश—(दाथ जोड) नहीं; रुपाकर आप ये बात कर्मकार से न कहियेगा। असली बात मैं आपको बताता ये देतर है। मेरी इच्छा थी कि मणिभद्रके घर पर आऊँ और उसकी स्त्रीसे मुलाकात करू, मगर पाज मुझे इन बातोंसे बडी घृणा हो गई है। आप माफ कीजिये और ये यात किसीसे न फहिये। द्वारपाल—क्या ऐसा हो सकता है?
दिनेश—क्यों नहीं? प्रापकी कृपा होने पर यह कोई बडी यात नहीं है। मैं आपको इसकी एबऊमें खुश कर दूंगा। द्वारपाल—काम तो ये नीतिविरुद्ध है। मगर
दिनेश—अ/पके उपदेशसे मेरा सुधारा हो गया।
जन्मभरके वास्ते अहसान तुमरा हो गया।
भ्यायके अनुकूल सारा फैसला तुमने किया।
लीजिये रुपया सहसके नोट हो खुश मैं दिया ॥
मणिभद्र नाटक ।
(कहकर नोटोंका बिंडल पाकेटमेंसे निकाल दे देता है) इसमें एक हजारके नोट है।
द्वारपाल—(नोट हाथमें लेकर) अच्छा, आप बड़े आदमी है, इससे मैं छोड़ देता हूं। मगर हाँ, आगे ऐसा फिर कभी भी विचार न कीजियेगा।
दिनेश—कभी नहीं। यदि आपकी आज्ञा होय तो अभी घर पर चला जाऊँ।
द्वारपाल—हाँ! आप जा सकते हैं। (दिनेशके चले जाने पर) मालिकका नुकसान भी न हुआ और मेरा काम भी बन गया। यदि इसी प्रकार एक दो बात और लग जाय तब फिर हम नौकरीके करनेकी जरूरत न रहै। घर बैठे २ अमन चैन करूँ, किसीकी फिर गुलामी करनेकी दरकार नहीं। आगे न मालूम मेरा भाग्य चेत जाय और ऐसी ही चिड़िया शायद फिर दशद हाथ आ जाय। भाग्य बढ़वान है वह जो न करे सो थोड़ा है। (कहकर द्वारपालका चला जाना) [यवनिका पतन],
अंक दूसरा-सीन तीसरा ।
मणिभद्रका महल ।
[ गुणभद्रा के समाने कर्मकार खड़ा है ]
कर्मकार—बाजारसे बराबर तगादा आ रहा है। अभी बहुतोश रुपया देना है।
द्वितीयांक
गुसाभद्रा—सबका छपा एकदम चुका दो और फाड़ दो कि जो खर्चा मंगाना हो यहींसे मंगावे, परवारा परवारा वाहिर विल न पेश करे।
कर्मकार—ऐसा हो कह दिया आयगा, नहीं तो आगे आपत्तिका आना सम्भव है। (सेठ दौलतरामका प्रवेश) दौलतराम—(बाहिरसे) सेठजी ! सेठजी ! जरा वाहिर पधारिये, एक जरूरी काम है।
कर्मकार—(गुणभद्रासे) मालूम होता है सेठ दौलतरामजी होंगे कारण कि उनका अभी यह आदमी पचास हजार रुपयों का बिल लाया था। क्या उनका रुपया दे दिया जाय? गुणभद्रा—हां भाई ! उनका रुपया देना ही होगा, जाकर दे दो।
कर्मकार—(बाहिर आकर) कहिये सेठजी क्या, काम है? दौलतराम—यह लीजिये पचास हजारका बिल। रुपयोंकी दरकार है, इसी वास्ते मुझे जल्दी आना पड़ा। कर्मकार—लीजिये, आप अपना हाथ के जाइये। (पचास हजारक तांह देता है तथा वहीं पर हस्ताक्षर करा लेता है। दौलतरामक जाते ही दो दुकानदार और आ जाते हैं और अपना अपना बिल पधोस पशील दबारका पेश करते हैं)
कर्मकार—(दोनों दुकानदारोंसे) अच्छा, आप लोग बैठिये, हम भीतरसे अभी आते हैं। (भीतर जाकर सेठानामे) दौलत- रामजीके पचास हजार चुका दिये मगर दो दुकानदार अपना मणिभद्र नाटक।
विठ पचास हगरा और लाये हैं। इन सः स्लिपर मनि- भद्रके दस्ताक्षर हैं। कहिये, क्या किया जाय ? गुणभद्रा—(आश्चर्य करके) द्वाद ! मेरे पुत्रकी यह दशा ॥ अरे ! क्या तुम लोगोंने उसे वहां जाकर समझाया नहीं ? हाय यह क्या हो गया ! (गिरकर बेहोश हो जाती है)।
कर्मकार—(सचेत कर) क्या करें निडानीजी। हम
तो बहुत कोशिश करते हैं मगर अंतर्गनिलका उन तक पहुं’चने ही नहीं देती, ऊपर ही ऊपर पाने’ बनाकर डाल देती है। कहिये सोहागरोंको क्या जवाब दिया जाय !
गुणभद्रा—खजानेमें रुपया है या नहीं ?
कर्मकार—नगद रुपया तो नहीं है, हां, जव्हारात जरूर है। गुणभद्रा—(माथे पर हाथ रख) तो जव्हारात ही में दो भाई, मगर देखो आगेके लिये ठीक बंदोबस्त करो, मुझे तो लक्षण अच्छे प्रतीत नहीं होते। हाय विधाना। तूने क्या किया ? मेरी ये क्या दशा कर दी १ (रोती है)
कर्मकार—(बाहिर सौदागरोंसे) अच्छा भाई ! कसमें इस समय रुपया नगद तो नहीं है, यदि अभी लेना है तो अद्धा- रात पचास हजारश ले जाइये अन्यथा कल आइये। (कर्म- कार पचास हजारकी जब्बारात देकर और उन दोनोंके हस्ता- क्षर करा विदा करता ही है कि इसतेमें तीन दुकानदार और चौथा अनङ्ग तिलकाका नोकर यमश्यड बरकट कर्मकारसे रुपयों- के लेनेकी कह रहे हैं ! तीनों दुरुानगरोंश बिल बाई लाखका है और यमखंड चिट्ठी एक लाखकी जुदी दिखाता है।
द्वितीयांक ।
कर्मकार—(भीतर आकर सेठानीजीसे) सेठानीजी सा०! तीन दुकानदार अपना अपना वित्त सब ढाई लाखका लेकर आये हैं और साथमें अनइतिलकोका नोकर यमदंड एक लाख- की चिट्ठी जुझे दिखा रहा है, कहिये क्या करूँ? इतने रुपयोंकी तो अबशरात मो न होगी। (सुनकर गुणभद्रा बेहोश हो जाती है)
गुणभद्रा—(दोश में आकर) कथा करू’ भाई। मुझे तो कुछ भी नहीं सूझता १ जो तुम्हें सूझे वही करो। कर्मकार—क्या करें सेठानी साहिश, खजाना विलकुल- खाली हो गया।
गुणभद्रा—(बडे दुःखधे)
हाय! खाली हो गया क्या? हाथ खाली हो गया। करोडों रुपयोंका हा ! मंडार खाली हो गया ॥ लुट गई मैं, हे प्रभो! हा ! सब तरहसे लुट गई। क्या करू? मेरी दशा हा! आज कैसी हो गई ॥ (रोती है और उसके साथ चन्द्रयमा भी रोती है) कर्मकार—रोनेसे क्या होयगा अब धैर्य धरना चाहिये दुःख दिवसोंमें न तुम्हें हताश होना चाहिये ॥ धैर्य धरा शायद दिन पलट आंय।
गुणभद्रा—भाई। अब दिन क्या पलटेंगे? भाग्यमें यही बखा था कि मैं घर घरकी सिखारिन बनकर महान् दुःखोंको भोगूं। हाय बाल। तू मुझे क्यों नहीं उठा ले जाता, तू क्यों मुझे अधिक दुःख दिखानेके लिये जीवित रख रहा है। मणिभद्र नाटक ।
कर्मकार—सेठानीजी! मैंने एक युक्ति सोची है,
उससे बहुत कुछ काम निकल सकता है। मालूम होता है अनंभलिका मणिभद्रसे हस्ताक्षर करा कराकर बाजेरमे लाखोंका माल मंगा रही है सो इसके रोकनेके लिए मैंने एक समबीज सोची है कि एक ऐसी घोषणा फिरा दू कि जिनमें कोई भी फिर मणिभद्रके हस्ताक्षरी चिजको पास न कर सके। इसमें आपकी क्या राय है ?
गुणभद्रा—भाई ! इस समय मुझे भले बुरेका कुछ भी प्राच गाहीं है। मैं तुम्हें मणिभद्रके वरावर मानझती हूं। जैसा तुम्हारा समभकरें आवे करो मुझे सव मंजूर है। (सुनकर कर्मकार चाहिए चला जाता है)
कर्मकार—(दुकानदारों से) भाइयो। तुम क्यों मणिभद्रके नाम माल देते हो ? वह यागी हो गया है, पेश्याके फंदमें फंस गया है, उसके हस्ताक्षरोंका बिल पास नहीं होगा। लक्ष्मीचन्द—तो इनको क्या मालुम था कि यह वागी हा गया है ? क्या तुमने पहिले हमारे पास ऐसी सूचना भेजी थी ? फागर ऐसा था तो तुम्हें हमारे पास पडिलेडी सूचना भेज देनी थी।
कर्मकार—तो अब भेज दी जायगी ।
लक्ष्मीचन्द—भेज देंगे तो हम जोग आगेसे माल नहीं देंगे। मगर हमारा पहिला हिसाब तो चुभता कर दीजिये, उसमें क्यों गोलभान कर रहे हैं।
द्वितीयांक ।
यमदंड—और मुझे भी एक लाख रुपया और दीजिये, यह लीजिये मणिभद्रको चिट्ठी (चिट्ठी दिखाता है ) कर्मकार—(चिट्ठी लेकर) जा, कह दे; कि अब खजानेमें एक रुपया भी नहीं है । आगेसे एक पल्ला भी न मिलेगा। लक्ष्मीचन्द—अरे भाई । इसे नहीं तो हमारा धनया तो जल्दी दो । हम लोगोंको माल छुड़ाने स्टेशन जाना है । कर्मकार—अच्छा; आज तो आए लोग जावें, कल हम आप- के इन बिलों पर विचार करेंगे ।
'लक्ष्मीचन्द—कल रुपया नकद तयार रखना, पैसा न हो कि फिर आनेके लिये टालम टूल कर दो (सब सेठों तथा यम- दण्डका चला जाता ।)
कर्मकार—(भीतर सेठानीजीसे) मैं दुकानदारोंको तो कल का काम लेकर विदा कर आया । अब कल एक ऐसी घोषणा किरानेका विचार है कि “सुमद्र सेठका पुत्र मणिभद्र बागी हो गया है, वह वेश्याके यहां रहता है । उसके नामसे जा कोई रुपया या माल वगेरः देगा उसका भुगतान नहीं दिया जायगा” इत्यादि ।
गगणभद्रा—हाय ! मैं पापिन सब जगहसे लुट गई हा ! लुट गई । धनसे जनसे सब तरहसे दुखी मैं अब हो गई ॥
पतीकर दुख था क्षमा अब पुत्रके गममें पड़ी । तड़फड़ाऊं देख हालत अपनी मैं दुख भरी ॥
मणिमद्र नाटक ।
हाय ! मैंने घट्टा बुरा किया डॉर अवना पुत्र वेश्याको सोव दिया। यक्ष रहता तो धीरे धीरे सुकर जाता मगर में क्या जानती थी कि यहां तक अवस्था पहुंच जायगी। आजकल दिनेश भी नहीं जाता। बया यह भी मणिभद्रके लाने की कोजिन नहीं करता ? (सेठानी रोती है और साथमै चन्द्रपना भी रो रही है) कर्मकार धैर्य घरी, सेहानीजी । रोमा बन्द करो, फार्मका उदय अनिवार्य होता है, वह रुक नहीं सकता। आप साझदार होकर भी यह क्या कर रही है।
गुणभद्रा-ठीक पाहते हो ! सगर या करूँ’ १ अपनी भूचे पर मुझे, रुजाई पाती है फळेला टूटता है, लेकिन अफशोश है कि जान नहीं निक्याती ।
कर्मकार - मैं अभी, सुनाथी फिराता है और कोशिश करता हूँ कि यह मामला सुधर जाथ। मुमाबीयाला अभी तक नहीं आया क्या कारण है ? (सुगादीवासेश्रा प्रवेश)
सुनादीवाला - भी हजूर! यह सुनाडीवाला कापडी सेवाम दाजिर है। कहिये, क्या थाहा है?
कर्मकार जाओ और सारे नवरा यह मुनादी फिश
आध्यो कि “सुभद्र सेठका पुश्त मणिभद्र वागी हो गया है, बद वेश्याने यहां रहता है, जो उनके नामसे कोई रापगा या माज सधैः देगा उसका मुमताच नहीं दिया जायना” सुबा । मुनादीवाला २श सुन्द्र सेडका पुत्र मणिभद्र बाद हो गया है?
द्वितीयांक ।
कर्मकार-अरे नहीं, बाथ नहीं ‘गगी’ होगया है
सुनादीवाला-हुजूर ! मैं ये संस्कृत और फारसी नहीं पढ़ा है। अच्छा, जरा अबकी एक बार और तो कह आइये।
( कर्मकार फिर कद देता है और सुनादोधाला उसे रेट लेखा है वाद घीरे धीरे सारे शहरमें वक्त सुनादी फिरा देता है) मुनादी सुननेके बाद ही दौलतगम, लक्ष्मीचन्द श्रादि पांच सेठ बाहे है। कर्मक्रारको बुजाते हैं)
कर्मकार–(खेळानीचे) मालूम होता है ये लोग सुनादी सुनकर ही आये हैं। प्रच्छा मैं जाकर देखता हूँ कि क्या ग्रामजा है ? (दादिर आकर) क्यों लाय जोग मबके सब क्यों आये हैं? लक्ष्मीचंद-आपने रुपयोंके देनेका कल वायदा किया था न; कि आव जोग अपना रुपया कल क्षेभाया। सो दीजिये और देरी न कीजिये ।
कर्मकार-मजकी कहा था तो कल देरेंगे आज आप लोग क्यों ध्याये हैं?
लक्ष्मीचंद-पेसे तो कक्ष कभी भी न भायगा। क्या आप दिलगी कर रहे हैं कि सरया देते हैं?
कर्मकार-दिल्लगी तो आप लोग ही कर रहे हैं जो अपनी चात पर कायम नहीं है।
दौलतराम-आपको रुपया देना है या नहीं?
कर्मकार-श्यों नहीं? क्या लेना हो तो कल ले जाना, नहीं * तो जो तुम्हें घूझे यह करो।
मणिमद्र नाटक ।
दौलतराम-व्यर्थमें सफ़र करो तुम ननीशा अच्छा नहीं। राह वैरनविरोधका बढ़ना सुनो अच्छा नहीं ॥ नालिश करें हम कोर्टमें बदनाम होवोगे तुम्हीं । सेठदे शुभ नाममें षड्डा लगावोगे तुम्हीं ॥ हम जोगोंने बड़ा पक्का काम करने रुपया दिया है। देखिये— (सब सेठ मणिभद्रके हस्ताक्षरोंने तमम्मुख दिखाते हैं) कर्मकार-जाइये सरकारमें करना जु हो कर कीजिये। डर दिखाते हो किसे वस, राह घरकी लीजिये।
लक्ष्मीचंद-तो रुपया न दोगे?
कर्मकार-समस्त लो, न देंगे।
लक्ष्मीचंद-अच्छा तो हम दूसरी तरहसे रुपया निकाल लेंगे (कहकर सभी सेठ चले आते हैं इधर कर्मकार भी चला जाता है)
[ यवनिका पतन]
अंक दूसरा-सीन चौथा।
इजलास-कचहरी।
बल वक़ील दुकानदार लक्ष्मीचन्द दौलतराम तथा दिनेश आदिका बाकायदे खडे बैठे नजर आना।
द्वारपाल- (सेठ दौलतरामको बुलाकर और मुचलका नराकर) कहिये क्या बात है? सब सच बयान कीजिये झूठ न बोलिये।
द्वितीयांक ।
दौलतराम—हमारे यहाँसे माक्ष तथा नगड़ रुपया पन्द्रह जाखका मणिभद्र सेठके यहां गया है। जब मांगने पर नहीं दिया तर आपके यहां फिराद की है।
वकील—क्या इसका आपके पास कोई सबूत है ? (सुशी सब नोट कर लेता है)
दौलतराम—क्यों नहीं ! हमारे बही खातेमें उर सिदीमें रकम नामे पडी है, जो लेगया है इसके हाथके हस्ताक्षर तक हैं। वकील—और भी कोई प्रमाया है ?
दौलतराम—हां, मणिभद्रके खुद हस्ताक्षरोंके विक्ष मौजूद हैं। हजूर हम सब सच कह रहे हैं।
वकील—किसकी मारफत्र तुमने माक्ष तथा नयद रुपया विया है, कथा मणिभद्र खुद से गया है?
दौलतराम—नहीं, मखिभद्र खुद नहीं के गया है उसके गुमास्ते तथा नौकर आदि लेगये है और हमेशा से ऐसा ही होता है। हमारा खाता वर्षोंका है पहिले वहुन सी रकम चुकादी है मगर अभी इश्वर छह माहका चिज कोई भी नहीं चुकाया है। वकील—अच्छा हम आपका वडिवट देखना चाहते हैं। दौलतराम—लीजिये भ, देखिये इससे भावको सब मालूम डो ज्ञायना। (वही खाता देता है और नकोल देखता है) बकोल—(देखकर) दिनेश कौन है?
दौलतराम—मधिर्भद्रका यही तो कर्त्ता-धर्त्ता है। मणिभद्र नाटक ।
वकील—(द्वारपाल से) दिनेशको हाजिर करो (द्वारपाल दिनेशको बुलाता है और बसी तरह सुचलका आदि भरवाता है) वकील-क्यों दिनेश ? वौलतरामका माल व तकदी तुम्हारी सहरफत आया है। ये बहीमें तुम्हारे ही हस्ताक्षर है न ।’ दिनेश—हस्ताक्षर तो मेरे ही हैं मगर क्या यह सारा मारहा मेरे घरदर ही थोड़े आया है?
वकील—हो किसके घर पर आया है?
दिनेश—मणिभद्रके। इजुट जैसी सेठश्रीकी आज्ञा हुई हम उसी मुताबिक माज संमाते गये ।
वकील—इन सौदागरोंका रुपया जो मांग रहे हैं ठीक है त न दिनेश—ठीक तो है मगर इनको फिर माल नहीं देना था । वकील—ये बात हम अभी नहीं पूछते हैं। अभी हमको यही पूछता है कि ये रुपया ठीक है या नहीं।
दिनेश—रुपया सी ठोक ही है।
वकील—(द्वायाळ) अच्छा ममदाङको हाजिर करो। द्वारपाठ यमइडका पुकारता है उसी प्रकार सवमुचलके आदि भराता है । वकील—(यमदयड से) क्यों भाई ! अथर तुम इन दुकान वारोंरु यहसि माल ले गये हो न १ देखी ! ये बीमें तुम्हारे ही अंगूठे की निशानी है न?
यमदंड—(देखकर) निशानी तो मैंने की थी और कभी २. माल भी क्षे गया हूँ मगर ये तो सारी बढ़ी मेरे अंगुडेंसे रंगी बीखती है, कथा मैं इतनी बार आया था?
द्वितीयांक ।
वकील—ये तो तू जाते । क्या तेरे पास नोट बुक है, जिस- मैं तूने मिती बार ध्याना जाना जिख रक्खा है । यमदण्ड—हजूर यदि मैं पढ़ा हुआ ही होता तो क्या ये दृश पांच रुपये की ही नौकरी करता ! क्या आप सरोखा कुर्ती पर बैठ मैं भी हुकूमत न करतर !
वकील—मालूम है ! ये इजज्ञास है विश्ज़गी-घर नहीं है । जो बात पूछूं उसीका जबाव दो क्यादे कहने की अक्कत नहीं है । तू माल लेने आता था या नहीं ?
यमदण्ड—जाता था । (मुन्शी सब इजहार डिल लेता है) वकील—(दिनेश से) जब तुम इनका देना कबूल करते ही तब हिसाव चुकता न करनेका बया कारण है ?
दिनेश—इनका रुपया इनको दे दिया गया है । बादमें इसका झांज आया है उसके देनदार हम नहीं हो सकते ।
वकील—क्यों ?
दिनेश—हमारी तरफसे मुनादी फिरा दी गई थी कि आज से मणिभद्रके दस्ताक्षरका बिल पास न किया जायगा कारख कि बह बागी हो गया है । बेश्याके कन्देमें फंस गया है । मुन्शी सब जिख लेता है)
वकील—(अजसे) हजुर ! तप तो इन सौदागरोंका दावा करमा मिथ्या प्रतीत होता है । इन्हें माल नहीं देना था । वकील—(दौलतराम पादिका, दिनेशवे) आपने सुनादी कथ फिराई थी ।
दिनेश—आज दो रोज हो गये ।
मणिभद्र नाटक ।
वकील—(वही दिखाकर) और देखिये इन लोगोंका दिया- दुला भाक्ष बहुत दिन पहलेका है। इन्होंने सुनादी सुनकर आज दो हिमसे कुछ भी माल नहीं दिया है। सब माल पहिलेका है। अतः इन सौदागरोंका दादः साबिक वस्तूर ठीक है। क्या ये माल पहिलेका नहीं है?
दिनेश— अब बढ़ी ही कद रही है तब मेरी कौन सुनशा? और कहूं भी तो क्या सथा माना जायगा ?
वकील—कई फूड बाल भी सची हो सकती है। (जजसे) देखिये इसूर दिनेशका पक्ष कितना कमजोर है। अब आप इन्हें योग्य- फैसला सुना दीजिये (अज कानून के मुताबिक फैसला दे देता है। फैसला सक्ष्मीचन्द दौलतराम आदि सेठोंका रुपया जी मणिमड़की सश्री पर्व गुमास्तों और नौकरीको भारफत माल तथा मगदी रूपमें गया है बहु ठोक है। मणिभद्र एक प्रतिष्ठित पुरुष है इसलिये प्रथम पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट अाकर इनके रुपये दे देनेको कहै। यदि मणिभट्ट के सुमीम-गुमास्ते इन सौदागरों का हिसाब चुकता न करें तो मणिभद्रकी तमाम आयटाद मकान्तात चरीरः भीक्षाम कर दी जाय और इन लोगोंका रुपया झुका दिया जाय।
दिनैन—(स्वगत) भाग्यका द्वारा चमकते वया लगे कुछ देर है । बन्द रोजोंपें हुआ मेरे रुथोंका डेर है।
बिना चाोधाजसे सुख किसीको मिलता नहीं।
सरलता के धारनेचे काम बुद्ध बश्ता नहीं ।॥
द्वितीयाङ्क ।
यदि मैं यह व्याजबाजी न चलता और वकील आदिको
पहिले ही से न मिलाता तो क्या सहज ही यह मामला इस रूपमें हो जाता? अब मैं नोञ्ज्ञानमें मणिभद्रकी हवेली आदि ले लेता हूँ। दूसरा कौन है जो मेरे सामने से सके। पश्चात् किसी उपाय द्वारा उसी चन्द्रप्रभाको लाकर उस हवेलीमें रहगा और जिन्दगीका सानन्द लूटूंगा। ऐसा कोष है जो दिनेशसे बाहिर हो? यह सब रुपयोंका मेल जोल है। अभी तो चलूँ और मणिभद्रका सारा माल मेरे ही हस्तगत हो, जाकर ऐसा उपाय करूँ ( कहकर दिनेशका चला जाना वकील जर्ज दुकान- दारोंका भी चला जाना )
[ यवनिका पतन ]
अंक दूसरा-सीन पांचवां ।
मणिभद्रका मकान ।
कर्मकार गुणभद्राको समझा रहा है।
कर्मकार-सेठानी साहब। आप क्यों सोच कर रही है? भवितव्य बलवान होता है उसके सामने किसी की नहीं चलती। गुणभद्रा-तो क्या तुम्हारे समझाने पर भी मणिभद्र नहीं आया? क्या तुमने यहांकी सब हालत उसे नहीं बताई? वह हम लोगोंका बिलकुल भूल गया !
कर्मकार-सेठानीजी साहब ! आनेकी बात तो जाने दीजिये वे मेरेसे अच्छी तरह बोले तक नहीं। न मालूम उनके साथन इस वेश्याने क्या वशीकरण कर दिया है।
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 2434.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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