मन हंस ! हमारी लै शिक्षा हितकारी | Man hans ! Hamari lae Shiksha hitkaari

मन हंस ! हमारी लै शिक्षा हितकारी |
श्री भगवान् चरन पिंजरे वसि, तजि विषयनि की यारी || टेक ||

कुमति कागली सौं मति राचो, ना वह जात तिहारी |
कीजै प्रीत सुमति हंसी सौं, बुध हंसन की प्यारी || १ ||

काहे को सोवत भव झीलर, दुःखजल पूरित खारी |
निजबल पंख पसारि उड़ो किन, हो शिव सरवर चारी || २ ||

गुरु के वचन विमल मोती चुन, क्यों निजवान विसारी |
ह्वै है सुखी सीख सधी राखें, ‘भूधर’ भूलैं ख्वारी || ३ ||

Artist : कविवर पं. भूधरदास जी

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अर्थ

हे हंसरूपी मन, हे हंस के समान मन, हमारी हितकारी शिक्षा ले। तू विषय-कषाय की रुचि छोड़ दे और प्रभु के चरणकमलरूपी पिंजरे में अपना निवास कर, अर्थात् भगवान के श्रीचरणों में मन लगा, उन्हीं में रम जा। जैसे पक्षी पिंजरे से बाहर नहीं आता, उसी प्रकार तू चरण-कमल के अलावा अन्यत्र अपना ध्यान न लगा।

कुमति कागलीसौं मति राचो, ना वह जात तिहारी।

हे हंस ! कुमति - कौवे की भाँति हैं, वह तेरी जाति की नहीं है, उसमें अपना मन मत लगा। तू सुमतिरूपी हंसिनी से प्रीति कर जो ज्ञानी हंसों के मन को भाती है, प्यारी लगती है।

काहेको सेवत भव झीलर, दुखजलपूरित खारी।

तू इस भवरूपी झील में, जो दुःखरूपी खारे जल से भरी है, क्यों पड़ा है? तू तो मुक्तिरूपी सरोवर का निवासी है, तू अपने पंख पसारकर अपने पुरुषार्थ से उड़कर वहाँ क्यों नहीं जाता! हे हंस! तू सदगुरु के पवित्र उपदेश के वचनरूपी मोती चुन। उन्हें न चुनकर तू अपना मोती चुगने का स्वभाव क्यों छोड़ रहा है! (मोती चुगना हंस का स्वभाव है)। भूधरदास कहते हैं - तू इस सीख को ध्यान में रखे तो तेरे सारे दुख मिट जायेंगे, समाप्त हो जायेंगे।

शब्दार्थ: हंस - नीर-क्षीर विवेकी, बुद्धिमान पक्षी।

स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पद 65।

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