मैं क्या माँगूँ भगवान्, मैं तुमसे क्या माँगूँ?
मेरे रोम रोम में बस जाओ भगवान् और मैं क्या माँगू।।टेक।।
धन न माँगूँ भगवन्, मान न माँगूँ
झूठे जग की शान न माँगें।
देना हो तो दे दो भगवन्,
अपने को जिन धाम और मैं क्या माँगूँ ।।१।।
हे प्रभु तुम तो अन्तर्यामी,
पार करो ये नाव हमारी।
दया करो हे दया सिंधु भगवान्,
करो कल्याण,और मैं क्या माँगू।।२।।
तुम तो सारे जग के रखवारे,
तुम तो हो सबके जाननहारे।
दो ऐसा वरदान प्रभुजी,
चरणों में रहे ध्यान
और मैं क्या माँगू।।३।।
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ २१७ से २१८