महावीर भक्ति सुमन - जैन स्वाध्याय सामग्री | Mahavir Bhakti Suman

महावीर भक्ति सुमन

  • यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है -

ॐ

॥ नान्याथावादिनो जिनाः ॥

मङ्गल भक्ति सुमन

: संकलन एवं सम्पादन :
मङ्गलायतन उदित जैन, कानपुर (उत्तरप्रदेश)
मङ्गलायतन सक्षम जैन ‘ऐश्वर्य’, भिण्ड (मध्यप्रदेश)

: सह-संकलन एवं सम्पादन :
मङ्गलायतन आशीष जैन, कोटा (राजस्थान)
एवं समस्त मङ्गलायतन छात्र

: मुख्य मार्गदर्शक :
श्री पवन जैन, ‘ताऊजी’, अलीगढ़ (उत्तरप्रदेश)
पण्डित अशोक लुहाड़िया, अलीगढ़ (उत्तरप्रदेश)

प्रकाशक :
तीर्थधाम मङ्गलायतन
श्री आदिनाथ-कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन ट्रस्ट
सासनी-204216, हाथरस (उत्तरप्रदेश) भारत

प्रथम संस्करण - 1500 प्रतियाँ

(तीर्थधाम मङ्गलायतन के 13वें वार्षिकोत्सव के अवसर पर
दिनांक 03 फरवरी 2016 से 07 फरवरी 2016 तक)

सहयोग राशि - रुपये 40.00 मात्र

प्राप्ति स्थान :

तीर्थधाम मङ्गलायतन
अलीगढ़-आगरा मार्ग, सासनी-204216
हाथरस (उत्तरप्रदेश)
website : www.mangalayat an.com
email : info@mangalayat an.com

मुख्य प्रेरणास्रोत :

स्वर्गीय पण्डित कैलाशचन्द्रजी जैन,
बुलन्दशहर (उत्तरप्रदेश)

मार्गदर्शक :

श्री स्वप्निल जैन ‘भैया’
पण्डित देवेन्द्रकुमार जैन
पण्डित संजयकुमार जैन ‘शास्त्री’
पण्डित अरुणकुमार जैन, जयपुर
पण्डित सचिन जैन
पण्डित सुधीरकुमार जैन, ‘शास्त्री’
पण्डित संदीपकुमार जैन, ‘शास्त्री’
पण्डित सन्देशकुमार जैन, ‘शास्त्री’

टाइप सेटिंग :

मङ्गलायतन ग्राफिक्स, अलीगढ़।

कवर पेज सेटिंग :

vibgyor adverts

मुद्रक :

(iii)

मन की बात

तीर्थधाम मङ्गलायतन परिषद् तत्त्वज्ञान का विशुद्ध क्षेत्र है। साथ ही
तत्त्वज्ञान की शोभा को बढ़ाये है, यहाँ संचालित ‘भगवान् श्री आदिनाथ विद्यानिकेतन’
में अध्ययनरत मङ्गलायतन छात्र।

हम मङ्गलायतन छात्रों पर तीर्थधाम मङ्गलायतन व सम्पूर्ण जैन समाज का
बहुत उपकार है, जिसकी भरपाई करना बहुत मुश्किल ही नहीं अपितु नामुमकिन
है और अभी हम इतने सक्षम भी नहीं कि उस उपकार की भरपाई कर सकें।
तथापि उनके अंशरूप हम यह ‘मङ्गल भक्ति सुमन’ नामक पुस्तिका का प्रकाशन
कर रहे हैं।

पुस्तक प्रकाशन में परम पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी का हम उपकार नहीं
भूल सकते, जिनके द्वारा इस पंचम काल में तत्त्व की अमृत-वर्षा हुई। तत्त्व का
उद्घाटन हुआ। मुक्तिपथ का मार्ग मिला। साथ ही स्वर्गीय पण्डित कैलाशचन्द्रजी
जैन, श्री पवन जैन ‘ताऊजी’ एवं श्री स्वप्निल जैन ‘भैया’ का जिनके मोक्ष
सान्निध्य से तत्त्व एवं तत्त्वप्रचार का अनुपम, अद्भुत संयोग हमें मिलता है।
इसलिए इनके जितने आभारी प्रगट करें, उतने कम हैं।

इस पुस्तिका में, आप वे समस्त भक्तियाँ पायेंगे जो सभी विशेष प्रसंगों पर
गायी जानी चाहिए और वे, जो सामान्य भक्ति सन्ध्याओं में अपना एक अहम
स्थान संरक्षित करती हैं।

साथ ही हमने पुस्तिका में प्राचीन आध्यात्मिक कवि जैसे बनारसीदासजी,
दौलतरामजी, ज्ञानरायजी आदि तथा वर्तमान के आध्यात्मिक कवि बालचन्द्रवादी
रविन्द्रजी ‘आत्मन्’, अमायन; पण्डित अभयकुमारजी शास्त्री, देवलाली; डॉ.
विवेककुमारजी, हिन्दुवाड़ आदि सभी की भक्तियाँ सम्मिलित की हैं।

इस पुस्तिका में भक्तियाँ प्रसंगानुसार, विभिन्न खण्डों में विभाजित की गयी
हैं। जैसे पंच कल्याणक भक्ति खण्ड, प्राचीन कवि भक्ति खण्ड, वैराग्य-उपदेश
भक्ति खण्ड आदि-आदि।

चूँकि हमने अपनी योग्यता अनुसार इस पुस्तिका को त्रुटि मुक्त करने की
कोशिश की है, तथापि कोई त्रुटि रह जाये तो हमें अवश्य सूचित करें, ताकि
अगले संस्करण में उनका परिहार हो सके।

जय जिनेन्द्र !!

  • सम्पादक

(IV)

अनुक्रमणिका

मंगलाचरण

(१) श्री अरहंता सदा मंगलमय…
(२) श्री मंगल चार जगत् में…
(३) मन्त्र जपो नमस्कार…
(४) मन्त्र णमोकार हमें प्राणों…
(५) मन्त्र परम शिरोमणि देखे…
(६) अरिहंत देव का…
(७) ॐ आदिनाथ नमः…
(८) भावे भजो भावे…
(९) ए आत्म हे मुझको नमन…
(१०) मन के विकार नाशो…
(११) ज्ञान को ज्योति जलाते चलो…
(१२) जयवंत सदा रहो…
(१३) चौबीसों वंदना…
(१४) मैं महापुण्य उदय से…
(१५) जय अरिहंता…
(१६) मंगल अरिहंत मंगल…
(१७) निज आत्मा में देखो…
(१८) आठों केवल ज्ञानमय…
(१९) आठ महा मद त्याग…
(२०) आठ अंगुल गुरुवर…
(२१) अनंतानंत सिद्ध होऽऽऽ…
(२२) तेरे पूजा ओ…
(२३) ॐ मंगलम्…
(२४) देवों के देव श्री जिनदेव…
(२५) णमोकार मंत्र हो…
(२६) मंगल मंत्र प्रभु…

देवभक्ति

(१) वीतरागी देव तुम्हारे…
(२) हे प्रभो चरणों में से…
(३) रोम-रोम से निकले…
(४) रोम-रोम पुलकित हो…
(५) आज हम जिनराज…
(६) निरखी-निरखी मनहर…
(७) मेरे मन मंदिर में आन…
(८) चाह मुझे है दर्शन की…
(९) निरखो अङ्ग-अङ्ग जिनवर के…
(१०) मंगलमय जिनराज तुम्हारे…
(११) दर्शन दो मेरे भगवान…
(१२) दिन हम तुम्हारे…
(१३) कोई इस आओ जी…
(१४) तुम्हारे दर्शन बिन स्वामी…
(१५) तिहारे ध्यान की मूरत…
(१६) आये आये रे जिनराज…
(१७) आज जिनमंदिर में स्वामी…
(१८) सच्चा सुखमय मनहर है…
(१९) प्रभु हम सब को एक…
(२०) थांकी उत्तम क्षमा पै…
(२१) नाम तुम्हारी पूजा में सब…
(२२) एक घड़ी आधार हो…
(२३) प्रभु मैं तो नंदन सुखकी…
(२४) तुम शिवंकर…
(२५) तुम्हारी मूरत ये हमने देखा…
(२६) प्रभु शांति छवि तेरी अंतर…
(२७) जपूं माला जिनवर नामकी…
(२८) भक्ति मेरी छवि भगवान् की…
(२९) हे मेरे देव! तुम बिन…
(३०) जिनवर मेरी नैया…
(३१) प्रभु विनती लेकर आये हैं…
(३२) तेरे वाणी को अंतर…
(३३) आओ जय परमात्मा…
(३४) कैसा सुंदर जिन प्रतिमा…
(३५) आज आनंद बरसा है…
(३६) नाम तुम्हारा हमने सुना…
(३७) स्वर्ग से सुन्दर अनुपम…
(३८) भूमण्डल मन मंदिर में…
(३९) करे ले प्रभु का ध्यान…

(V)

शांतिभक्ति खण्ड

(१) मैं जिनवाणी गाऊँ…
(२) भारी माँ जिनवाणी…
(३) ये तो जिनवाणी के भाग्य…
(४) सुनो सुनो रे जिनवाणी…
(५) जय शारदे…
(६) वीतराग मुद्रा में…
(७) हम अगर भोलाणी पर…
(८) महिमा है, अगम जिनागम…
(९) जिन बिन मूरत मोरी…
(१०) चरणों में ओ पड़ा हूँ…
(११) मंगलमय जिनवाणी सोहे…
(१२) धन्य धन्य जिनवाणी माता…
(१३) धन्य धन्य वीतराग वाणी…
(१४) नमो देव वागेश्वरी जैनवाणी…
(१५) जयवंती जिनवाणी…
(१६) ज्ञान बिन ज्ञान नहीं…
(१७) जिनवाणी हमें प्रिय…
(१८) हे जिनवाणी माता तुमको…
(१९) जिनवाणी माता दर्शन…
(२०) जिनवाणी माता रत्नत्रय…
(२१) जिन पौषी थी जिन…
(२२) शांति देवी जिनवाणी…
(२३) शांति का समरसार जाने…
(२४) परम परम गुरुओं ने गाया…
(२५) माँ जिनवाणी बसों हृदय में…
(२६) मोटे रत्न से भरी…
(२७) सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र…
(२८) माँ जिनवाणी तुम अंतर में…
(२९) माँ जिनवाणी तेरो नाम…
(३०) जिनवाणी माँ-२…
(३१) जिनवाणी-जिनवाणी…

गुरुभक्ति खण्ड

(१) श्री जिन शासन माता सह…
(२) भारी परम निष्ठाव…
(३) परम गुरु करता…
(४) धन-धन जैनी साधु…
(५) धन्य मुनिराज आता…
(६) जिन रागद्वेष…
(७) ऐसे साधु सुगुरु…
(८) गुरुओं के उपकार को…
(९) वंदन मुनिराज को…
(१०) जिन उपदेश…
(११) हे परम दिगम्बर मुनि…
(१२) धन्य मुनिराज हमारे…
(१३) ज्ञान अग्नि में…
(१४) सिद्धों की श्रेणी में…
(१५) धन्य दिगम्बर मुनि…
(१६) वंदना हे मुनिराज…
(१७) ज्ञान की ज्ञान मुद्रा में…
(१८) मुनिराज आज मेरे…
(१९) मेरे मुनिराज देखे हमने…
(२०) हे परम दिगम्बर देव…
(२१) धन्य मुनिराज को वंदना…
(२२) निर्ग्रन्थ दिगम्बर साधु…
(२३) जब मुनिवर आते हैं…
(२४) अपना करता हो कल्याण…
(२५) आत्म अनुभव जिन रमण…
(२६) गुरुवर ज्ञान ज्योति…

महामंत्र-भक्ति खण्ड

(१) महामंत्राक्षर पंच परम् कल्याणक…
(२) आज पंचकल्याणक महान…
(३) ये महा-महामंत्र…
(४) जो महा नाम जपाया जिनवर…
(५) पंचकल्याणक आज…
(६) मेरे पाँच हुए कल्याण प्रभो…
(७) आओ आओ पंचकल्याणक…
(८) ये महामंगलमय महामंत्र…
(९) मंगल महोत्सव में…

णमोकार-भक्ति खण्ड

(१) णमोकार का गुण…

(VI)

(२) सुनो ओ माँ ने…
(३) सोती थी भद्रदेवी माता…
(४) सोलह-सोलह स्वप्न…
(५) नाम में होऽऽऽ नाम में…
(६) मरुदेवी माता…
(७) गर्भ कल्याणक की…
(८) माता भावे सुहाती है कल्याणक…

जयमाला-कल्याणक खण्ड

(१) हे अमृत चार…
(२) आया आया सुहाना…
(३) जब जन्मे तीर्थंकर…
(४) जन्म कल्याणक आज…
(५) नमन हो मेरे…
(६) जिनवर प्रभु अवतार…
(७) आज कुंडलपुर में बधाई…
(८) प्रभु जी पधारे म्हारे आँगन…
(९) माता माया जागो जागो…
(१०) आज अम्माकल्याणक महान…
(११) म्हारे आँगन आज आई…
(१२) जब प्रभु जन्म हुए…
(१३) आनंद आनंद में…
(१४) वंदनवंदन… वंदनवंदन…
(१५) त्रिभुवन के नाथ प्रभु…
(१६) मंगल से अंतर आँगन…
(१७) पहिला ओऽऽऽ पहिला…
(१८) जन्मे रे जन्मे जिन दे…
(१९) हर आज दिन जागे…
(२०) बधाई आज जिन राजा…
(२१) आज तो बधाई राजा…
(२२) अमृत से भरी रही…
(२३) सुहाती है अपने शीश…
(२४) बुलाय दिनी माता…
(२५) आज घर-घर खुशियां…
(२६) आज आदिनाथ जन्मे हैं…
(२७) आज नगरों में जन्मे…
(२८) बधाई गाओ रे…
(२९) इंद्र गावे मेरी भक्ति…
(३०) छोटी-२ बधाई…
(३१) आनंद अंतर मा आज न…
(३२) छाओ छाओ रे छाओ…
(३३) आनंद अवसर आज…
(३४) महिला कही है आज मुख से…
(३५) आज पधारे देवा…
(३६) आज महादेवा कल्याण…
(३७) देखा मैंने विशालता को लाल…

स्तुति-कल्याणक खण्ड

(१) तीर्थंकरों का मान…
(२) जन्म-जन्म की अनवरत आयो…
(३) जिन सेवा में भक्तिभाव…
(४) मेरी-मेरी भक्ति कल्याणक…
(५) ये मुनिवर कब मिले हैं…
(६) ऐसे मुनिवर देखे वन में…
(७) आनंद अवसर आयो…
(८) अब विषयों में शांति मिली…
(९) विषयों का विष त्याग…
(१०) मैंने लगाया पार…
(११) तिहारी लगा लगा…
(१२) श्री नेमीकुमार गिरनारी वाले…
(१३) मंगल बेला आज…
(१४) वैराग्य भावों का…
(१५) छाट-छाट मुनिवर…
(१६) थोड़ा-सा अब तुम क्लेश…
(१७) नेमीनाथ स्वामी हो…
(१८) नेमीकुमार को देखो ये सब…
(१९) घर में ही वैरागी भरतो…
(२०) अंतर आनंद के रसिया…
(२१) देवों और मानवों में…
(२२) भाता है दिगम्बर देव…

भक्तामर-भक्ति खण्ड

(१) धन-धन हे गौतम…
(२) जिनवर तुम्हारे गुण…

प्रास्ताविक भक्ति खण्ड

(१) सम्यग्दर्शन भयो, भान्ती…
(२) घर-घर आनन्द छावन…
(३) सम्यग्दर्शन स्वत्व…
(४) ॐकारमयी वाणी तेरी…
(५) शिव आत्मा का ज्ञान…
(६) सुखमय वाणी जिनवर की…
(७) जिन भक्त ने बड़ी चाव की…
(८) कर लो जिनवर का…
(९) आदि जिनेन्द्र-२…
(१०) गागर अमृत को भर…
(११) श्री आदिनाथस्वामी तुम्हें…
(१२) वन्दन आदिप्रभु तुम्हें…
(१३) श्री अरहंत छवि…
(१४) हे जिन तेरे सुजस…
(१५) निरखत जिनचन्द्र-वदन…
(१६) समता का भाव…
(१७) जिनवर की वाणी झलक…
(१८) प्रभु को वीतराग जिनमुद्रा…
(१९) दिलखानि बीरा…

मोक्षकल्याणक भक्ति खण्ड

(१) देखो जी आदीश्वर स्वामी…
(२) जाओगे सिद्ध भगवान…
(३) जाओ… जाओ…
(४) जहाँ राग-द्वेष का गंध नहीं…
(५) आओ जी आओ नी पावन…

प्राचीन भक्ति खण्ड

(१) चिन्मुद्रा तुम्हारी…
(२) ओतप्रोत अद्भुत अद्भुत…
(३) ज्ञान में परम रमण वाली…
(४) आत्मा हमारी नित्य…
(५) अब मेरे संशयित मानस…
(६) भाववन भवन क्यों भूला रे…
(७) हमको कबु भज ना रे…
(८) भोंदू भाई! समझ संबंद…
(९) दुनिया कब देखे या मन की…
(१७६)
१७६
१७७
१७८
१७९
१८०
१८१
१८२
१८३
१८४
१८५
१८६
१८७
१८८
१८९
१९०
१९१
१९२
१९३
१९४

१९५
१९६
१९७
१९८
१९९

१९४
१९५
१९६
१९७
१९८
१९९
१९९
१९९
१९९
(२०) लिखे ‘रामायण’ परमारि…
(२१) चेतन तू हितकारी अकेला…
(२२) हम बड़े अज्ञानी हीन से…
(२३) भावों में सरलता रहती है…
(२४) अब हम अमर भये रे…
(२५) ओ ओ देव बीतराग…
(२६) जिनवर चरण सरोज सम…
(२७) पिक-पिक जीवन समर्पित…
(२८) हमें निज धर्म पर चलना…
(२९) हे स्वतंत्र निजत्व निकाश…
(३०) अब के ऐसी दिवाली…
(३१) मेरे प्यारे जगन्नाथ…
(३२) चेतन हो तेरी खोज…
(३३) अरहंत गुण मन भावों…
(३४) लगी लौ भक्तिदर्शनों…
(३५) अब प्रभु चरण…
(३६) हम न किसी के कोई न…
(३७) अब किसे कोई क्यों अपने…
(३८) हे देव तेरी सुंदर जगमग…
(३९) हे जिन मेरी ऐसी कृपा कीजै…
(४०) कबथी मिले मोहि श्रीगुरु…
(४१) अपनी सुधि भूल आप…
(४२) चेतन कौन अज्ञानी गति रे…
(४३) हम तो कर्मों ने विजन पाये…
(४४) मेरे कर्मों का दिन सुधरी…
(४५) जिन दुख भंजन की…

प्रासंगिक भक्ति खण्ड

(१) आदिप्रभु का, वीतराग का…
(२) जिनेन्द्र चरण वन्द…
(३) आचार्य इन्द्रदेव…
(४) आत्मा तेरी ज्ञान दुशाला…
(५) मेरा पंडित गुरुराज…
(६) हे वीर रे आप हे मेरे हम गुरु…
(७) मुझे चरणों से लगा ले…
(८) करुणा के भण्डार…
(९) हे मेरे महावीर…
१५८
१५९
१६०
१६१
१६२
१६३
१६४
१६५
१६६
१६७
१६८
१६९
१७०
१७१
१७२
१७३
१७४
१७५
१७६
१७७
१७८
१७९
१८०
१८१
१८२
१८३
१८४
१८५
१८६
१८७
१८८
१८९
१९०
१९१
१९२
१९३
१९४

१९०
१९१
१९२
१९३
१९४
१९५
१९६
१९७
१९८
१९९
(१०) पास नाम…
(११) चेतन के दर्पण में…
(१२) सत्य सनातन धर्म प्यारा…
(१३) भावना की पुंज ओढ़ के…
(१४) हम सब सिद्धों भगवान…
(१५) अ.र.ह.ं.त. अ.र.ह.ं.त…
(१६) जिनवर हे सुमित्त देवस…
(१७) ऐसा दो वरदान जिनेश्वर…
(१८) मेरा ध्यान जब से किया है…
(१९) मैं ज्ञान बनूं सब…
(२०) मैं तो तुझसे…
(२१) आत्मा है मेरा सिद्धालय…
(२२) करता रहूं गुणगान…
(२३) गा रे भैया, गा रे भैया…
(२४) आओ, आओ रे हमारी…
(२५) आओ रे आओ रे…
(२६) जिनवर हे जिनवर…
(२७) राग मण्डल में…
(२८) ये शाश्वत सुख का प्याला…
(२९) विश्व तीर्थ बचा प्यारा…
(३०) जहाँ चेतन का दर्शन…
(३१) धर्म की है प्यास…
(३२) मोहे लागी लगन…
(३३) कितना सुन्दर…
(३४) हम आनन्दित…
(३५) कैसे करें गुणगान…
(३६) मेरा मन है शिवपुरी…
(३७) मोक्ष के प्रेमी बने…
(३८) हे धर्म यहाँ को रोव सब…
(३९) ये धर्म हमारा है…
(४०) अभी मेरे मन में ये, मैं…
(४१) तुम से ध्यान लगाकर…
(४२) जिनवर वाणी…
(४३) दश लक्षण के दशधर्मों का…
(४४) तुमसे लागी लगन…
(४५) जिन-वल्लभ…
(४६) विषयों में दामन क्योंते फंसा…
(४७) प्रभु जी अब न भटकेंगे…
(viii)
१९५
१९६
१९७
१९८
१९९
२००
२०१
२०२
२०३
२०४
२०५
२०६
२०७
२०८
२०९
२१०
२११
२१२
२१३
२१४
२१५
२१६
२१७
२१८
२१९
२२०
२२१
२२२
२२३
२२४
२२५
२२६
२२७
२२८
२२९
२३०
२३१
२३२
२३३
२३४
२३५
२३६
(४८) मेरा ज्ञान उत्पन्न…
(४९) प्यास प्यास लागे…
(५०) वैराग्य का पथ…
(५१) जय जय जय जिनवर हो…
(५२) जहाँ रागद्वेष से रहित…
(५३) अनंत ज्ञान का हा…

वैराग्य भक्ति खण्ड

(१) जागो जागो जागो चेतन…
(२) वीर जिनवर अपनी मुझको…
(३) क्या बन खोजा रे…
(४) भगवान् आत्मा आनंद भंडार…
(५) बड़े भाव से हमको मिला…
(६) देख सब जग में वीर…
(७) तू बन जा वीर हे…
(८) तुझे बेटा कहाँ कि वीर…
(९) करुणा सागर भगवान…
(१०) जिया कर…
(११) देखा देखा प्यारा…
(१२) हे अविचल पथ लो…
(१३) भावना के फूल…
(१४) भूल है तू स्वयं…
(१५) भूलकर अपना पर…
(१६) मैं क्या माँगूँ भगवान…
(१७) सुख शांति है, दुख आदि है…
(१८) वीर प्रभु का है कहना…
(१९) कर रे जिया…
(२०) पाना नहीं जीवन को…
(२१) मोहे भवे न भैया…
(२२) ओ जा रे चेतन जाग…
(२३) सुख शांति में विमल गयी…
(२४) अज्ञानता का नाश कर…
(२५) देव तेरी पर्याय को हरपल…
(२६) वीर प्रभु के ये बोल…
(२७) करले आत्म ज्ञान…
(२८) आत्मा हूँ आत्मा हूँ…
(२९) सत्य साधु वन्दे…
२१९
२१९
२२०
२२१
२२२
२२३

२००
२००
२०१
२०२
२०३
२०४
२०५
२०६
२०७
२०८
२०९
२१०
२११
२१२
२१३
२१४
२१५
२१६
२१७
२१८
२१९
२२०
२२१
२२२
२२३
२२४
२२५
२२६
२२७
२२८
२२९
(ix)
(३०) तू जाग रे चेतन प्राणी…
(३१) देखे तो दिखाई दे, है…
(३२) प्रेम जब अनन्त हो गया…
(३३) उठ रे तूफानी आँध…
(३४) चेतन तू है…
(३५) चेतन तू है…
(३६) तू ही शुद्ध है…
(३७) ज्ञान सम्यक् मेरा हो गया…
(३८) तू घर से जिन्दगी जीना…
(३९) आज मेरी जो कही है बात…
(४०) अज्ञानी ज्ञान तुझे…
(४१) कभी भूल नहीं जाना…
(४२) चेतो चेतन निज में आओ…
(४३) मोह को महिमा देखी…
(४४) वीतराग का मोहक शासन…
(४५) अज्ञान का मोह विडम्बना…
(४६) भ्रम शुद्धातम हो सब…
(४७) ममता की तलवार न तोड़ी…
(४८) तू जाग रे चेतन प्राणी…
(४९) मेरा गाँव है शिखर भी…
(५०) राग का भी मित्र…
(५१) जीवन है पानी की बूंद…
(५२) तीन भुवन के स्वामी…
(५३) जब आत्मा अनुभव भये…

मंगलार्थी भक्ति खण्ड

(१) अध्यात्म अनंता छोड़ा…
(२) न राग न द्वेष…
(३) जब से मैं आत्म…
(४) मेरे गुरुदेव को है प्यारा…
(५) आत्मा मेरी है आत्मा…
(६) धर्म सदा मंगल होय सम्यक्त्व…
(७) आत्म चिंतन का…
(८) शुद्ध स्व का किया ध्यान…
(९) हे तीन भुवन के स्वामी…
(१०) आत्मा मेरी अचिंत्य अमरिया…
(११) शुद्धातम की धुन…
(१२) पिया जाये आत्म का…
(१३) निजातम प्यासीया…
२३०
२३१
२३२
२३३
२३४
२३५
२३६
२३७
२३८
२३९
२४०
२४१
२४२
२४३
२४४
२४५
२४६
२४७
२४८
२४९
२५०
२५१
२५२
२५३

२३४
२३४
२३५
२३६
२३७
२३८
२३९
२४०
२४१
२४२
२४३
२४४
२४५
(१४) संसार भव मायारिया…
(१५) मंगलमय हो मंगलकारी…
(१६) भजो भजो आये ये सारा जमाना…
(१७) ये ये प्रभु है हमारा…
(१८) हे मेरी बगिया में…
(१९) जिनवाणी माता रे…
(२०) मुझे मिल गया सम्यक्…
(२१) मन मोहक छबी प्यारी…
(२२) वीर जिनेश्वर…
(२३) हम सब जावक है…
(२४) बाहुबली, जय बाहुबली…

विशिष्ट भक्ति खण्ड

पूज्य गुरुदेव भक्ति

(१) शांति सुधा बरसा गये…
(२) गुरुदेव आए रे…

बालगीत खण्ड

(१) आत्मा हमारा ही है…
(२) आत्मा मुझे तेरी याद…
(३) चेतन का प्यारा बच्चा…

सोमावाला/छज्जाखेड़ा भक्ति खण्ड

(१) यह धर्म है आत्म ज्ञानी का…
(२) बेचारिया करिया…
(३) मोक्षालय अब मंगलकारी…
(४) मेरा मन…
(५) अपना ही रहूँ मोहि…
(६) धन्य धन्य अब घड़ी…
(७) लहर-लहर लहराये…
(८) शासन भद्र लहराये…
(९) बड़े नगर में झण्डा लहरा…
(१०) जिनवाणी की मधुरता पर…
(११) श्री जिनवर की दिव्य देशना…

अन्य भक्ति खण्ड

(१) तत्व-बिन्दु…
(२) श्री पार्श्वनाथ स्तुति…
(३) श्री बाहुबली स्तुति…
(४) जब एक रात अनमोल है…
२४०
२४१
२४२
२४३
२४४
२४५
२४६
२४७
२४८
२४९
२५०
२५१

२४८
२४९

२५०
२५१
२५२

२५३
२५३
२५४
२५५
२५६
२५७
२५८
२५९
२६०
२६१
२६२

२५९
२६०
२६१
२६२

वीतरागता के लक्ष्यपूर्वक भगवान् की भक्ति

चेतन, जड़ नहीं होता और जड़, चेतन नहीं होता। जड़ के स्वभाव में चेतनपना नहीं होता और चेतन के स्वभाव में जड़पना नहीं होता। जड़ के संयोग से होनेवाला विकार भी वस्तुतः चेतन का स्वभाव नहीं है। जैसे, सर्वज्ञदेव वीतराग बिम्ब है, वैसा ही आत्मा का स्वभाव है – ऐसे तत्त्वसहित वीतराग भगवान् की भक्ति इत्यादि का राग आवे, वह प्रातःकाल की सन्ध्या / लालिमा जैसा है। जिस प्रकार प्रातःकाल की सन्ध्या / लालिमा के पश्चात् सूर्योदय होता है और सायंकाल की सन्ध्या / लालिमा के पश्चात् सूर्यास्त हो जाता है; उसी प्रकार वीतरागता के लक्ष्यपूर्वक भगवान् की भक्ति इत्यादि का जो शुभराग है, वह प्रातःकालीन लालिमा के समान है; तत्पश्चात् जगमगाता चैतन्य सूर्य उदय होनेवाला है।
जिसे वीतरागता का लक्ष्य नहीं है, वीतरागदेव की भक्ति नहीं है और मात्र शरीरादि जड़ के राग का ही पोषण करता है, उसे तो उस लालिमा के पश्चात् अन्धकार आयेगा, उससे चैतन्यसूर्य ढँक जायेगा।
यहाँ स्वभाव का लक्ष्य है, वहाँ वर्तमान राग की लालिमा की मुख्यता नहीं है, अपितु यह राग मेरा स्वरूप नहीं है; इस प्रकार वीतरागस्वरूप के लक्ष्य से वह राग मिटकर चैतन्य प्रकाश प्रगट होगा और पूर्ण केवलज्ञान होगा।
(– पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी, सोनगढ़ प्रतिष्ठा महोत्सव के प्रवचनों से)

मङ्गल भक्ति सुमन

मङ्गलाचरण

महावीरष्टक (पद्यानुवाद)

जिनके चेतन में दर्पणवत् सभी चेतनाचेतन भाव।
युगपत् झलकें अंत-रहित ही ध्रुव-उत्पाद-व्ययात्मक भाव॥
जगमगाशी शिवमणि-प्रकाशक जो हैं मानों सूर्य-समान।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥१॥
जिनके लोचनकमल लालिमा-रहित और चंचला-हीन।
दर्शति हैं भव्यजनों को बाह्याभ्यंतर क्रोध-विहीन॥
जिनकी प्रतिमा प्रकट शांतिमय और अहो है विमल अपार।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥२॥
नमते देवों की पीक को मुकुट-मणि का प्रभासमूह।
जिनके दोनों चरण-कमल पर झलके देखो जीव-समूह॥
सांसारिक ज्वाला को हरने जिनका स्मरण बने जलधार।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥३॥
जिनके अर्चन के विचार से मेंढक भी जब हर्षितवान।
क्षणभर में बन गया देवता, गुणसमूह और सुकृतिनिधान॥
तब अचरज क्या, यदि पाते हैं सच्चे भक्त, मोक्ष का द्वार।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥४॥

तत्त्वस्वर्ग-सा तन है, फिर भी तनविरहित जो ज्ञानशरीरी।
एक रहे होकर विचित्र भी, सिद्धारथ राजा के वीर॥
होकर भी जो जन्मरहित हैं, श्रीमन् फिर भी न रागविकार।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥५॥
जिनकी वाणीरूपी गङ्गा, नयलहरों से हीन-विकार।
विपुल ज्ञान-जल से जनता को करती है जग में स्नान॥
अहो आज भी इससे परिचित ज्ञानीरूपी हंस अपार।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥६॥
तीव्र वेग त्रिभुवन का जेता, काम-योद्धा बड़ा प्रबल।
वज्रकुमार में जिसने जीता, उसको केवल निज के बल॥
शाश्वत सुख शांति के राजा बनकर जो हो गये महान्।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥७॥
महामोह-आतंक शमन को, जो हैं आकस्मिक उपचार।
निरपेक्ष बन्धु हैं जग में, जिनकी महिमा अपरम्पार॥
भवभय से डरते संतों को, शरण तथा वर गुण भण्डार।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥८॥
(दोहा)
महावीरष्टक स्तोत्र को, ‘भाग’ भक्ति से कीन।
जो पढ़ ले एवं सुने, परमगति हो लीन॥

मंगलाचरण खण्ड

(१) श्री अरहन्त सदा मङ्गलमय…

श्री अरहन्त सदा मङ्गलमय मुक्तिमार्ग का करे प्रकाश,
मङ्गलमय श्री सिद्धप्रभु जी, निजस्वरूप में करे विलास;
शुद्धात्म के मङ्गलसाधक, साधु पुरुष को सदा शरण हो,
धन्य घड़ी वह धन्य दिवस, जब मङ्गलमय मङ्गलाचरण हो ॥१॥
मङ्गलमय चैतन्यवरों में परिणति को मङ्गलमय लय हो,
पुण्य-पाप की दुःखमय ज्वाला, निजआश्रय से त्वरित विलय हो;
देव-शास्त्र-गुरु को वंदन कर, मुक्ति वधू का त्वरित वरण हो,
धन्य घड़ी वह धन्य दिवस, जब मङ्गलमय मङ्गलाचरण हो ॥२॥
मङ्गलमय पाँचों कल्याणक मङ्गलमय जिनका जीवन है,
मङ्गलमय वाणी सुखकारी शाश्वत सुख को भव्य सदन है;
मङ्गलमय सतधर्म तीर्थ-कर्ता को मुझको सदा शरण हो,
धन्य घड़ी वह धन्य दिवस, जब मङ्गलमय मङ्गलाचरण हो ॥३॥
सम्यग्दर्शन ज्ञान-चरणमय मुक्तिमार्ग मङ्गलदायक है,
सर्व पापमल का क्षय करके, शाश्वत सुख का उत्पादक है;
मङ्गल गुण-पर्यायमयी चैतन्यराज की सदा शरण हो,
धन्य घड़ी वह धन्य दिवस, जब मङ्गलमय मङ्गलाचरण हो ॥४॥

(२) जो मङ्गल चार जगत् में…

जो मङ्गल चार जगत् में है, हम गीत उन्हीं के गाते हैं,
मङ्गलमय श्री जिन-चरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥ टेक ॥
जहाँ राग-द्वेष की गन्ध नहीं, बस अपने ही से ही नाता है,
जहाँ दर्शन-ज्ञान-अनन्तवीर्य सुख का सागर लहराता है।
जो दोष अठारह रहित हुए हम मस्तक उन्हें नवाते हैं
मङ्गलमय श्री जिनचरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥१॥
जो द्रव्य-भाव-नोकर्म रहित नित सिद्धालय के वासी हैं,
आतम को प्रतिबिम्बित करते जो अजर-अमर अविनाशी हैं।
जो हम सबके आदर्श सदा, हम उनको ही नित ध्याते हैं,
मङ्गलमय श्री जिनचरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥२॥
जो परम दिगम्बर वनवासी गुरु रत्नत्रय के धारी हैं,
आरम्भ-परिग्रह के त्यागी जो निज चैतन्य विहारी हैं।
चलते-फिरते सिद्धों से गुरु-चरणों में शीश झुकाते हैं,
मङ्गलमय श्री जिनचरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥३॥
प्राणों से प्यारा धर्म हमें केवली भगवान् का कहा हुआ,
चैतन्यराज की महिमामय यह वीतराग रस भरा हुआ।
इसको धारण करनेवाले भव-सागर से तिर जाते हैं,
मङ्गलमय श्री जिनचरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥४॥

(३) मन्त्र जपो णमोकार…

मन्त्र जपो णमोकार मनुवा, मन्त्र जपो णमोकार;
पञ्चप्रभु को वन्दन कर लो, परमेष्ठी सुखकार ॥ टेक ॥
अरहन्तों का दर्शन करके, शुद्धात्म का परिचय कर लो;
शिवसुख साधनहार, मनुवा, मन्त्र जपो णमोकार ॥१॥

सब सिद्धों का ध्यान लगालो, सिद्ध समान स्वयं को ध्यालो;
मङ्गलमय सुखकार मनुवा, मन्त्र जपो णमोकार ॥२॥
आचार्यों को शीश नवाओ, निर्ग्रन्थों का पथ अपनाओ;
मुक्ति मार्ग आराध मनुवा, मन्त्र जपो णमोकार ॥३॥
उपाध्याय से शिक्षा लेकर, द्वादशाङ्ग को शीश नवाकर;
जिनवाणी डर धार मनुवा, मन्त्र जपो णमोकार ॥४॥
सर्व साधु को वन्दन कर लो, रत्नत्रय आराधन कर लो;
जन्म मरण क्षयकार मनुवा, मन्त्र जपो णमोकार ॥५॥

(४) मन्त्र णमोकार हमें प्राणों…

मन्त्र णमोकार हमें प्राणों से प्यारा
वही वो जहाज जिसने लाखों को तारा
मन्त्र णमोकार… ॥ टेक ॥
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।
एसो पंच णमोयारो, सव्वपावप्पणासणो
मंगलाणं च सव्वेसिं पढमं हवई मंगलं ॥
मन्त्र णमोकार… ॥१॥
अरहन्तों को नमन हमारे, अशुद्ध कर्म अरि हनन करे
सिद्धों के सुमिरण से आतम सिद्धक्षेत्र को गमन करे
भव भव में.. ओ.. नहीं भ्रमें दुबारा
मन्त्र णमोकार… ॥२॥
आचार्यों को आचार्य तक, निर्मल निज आचार्य धरे
उपाध्याय का ध्यान करें हम, संवर का सत्कार करें
सर्व साधु को… ओ… नमन हमारा
मन्त्र णमोकार… ॥३॥

इस मन्त्र से नागनागिनी, पद्मावती धरणेन्द्र हुए;
सेठ सुदर्शन को सूली से, मुक्ति मिली राजेन्द्र हुए;
अंजन चोर का… औ… कष्ट निवारा,
मन्त्र णमोकार… ॥४॥

(५) पञ्च परम परमेष्ठी देखे…

पञ्च परम परमेष्ठी देखे, हृदय हर्षित होता है,
आनन्द उल्लसित होता है, हो… ऽऽऽ सम्यग्दर्शन होता है ॥ टेक ॥
दर्जा-ज्ञान-सुख वीर्यस्वरूपी, गुण अनन्त के धारी हैं,
जग को मुक्ति मार्ग बताते, निज चैतन्य विहारी हैं।
मोक्षमार्ग के नेता देखे, विश्व तत्व के ज्ञाता देखे। हृदय ॥१॥
द्रव्यभावनोकर्म रहित, जो सिद्धालय के वासी हैं,
आतम को प्रतिबिम्बित करते, अजर-अमर अविनाशी हैं।
शाश्वत सुख के भोगी देखे, योगरहित निजयोगी देखे। हृदय ॥२॥
साधु संघ के अनुशासक जो, धर्मतीर्थ के नायक हैं,
निज-पर के हितकारी गुरुवर, देव धर्म परिचायक हैं।
गुण छत्तीस सुपालक देखे, मुक्तिमार्ग संचालक देखे। हृदय ॥३॥
जिनवाणी को हृदयंगम कर, शुद्धातम रस पीते हैं,
द्वादशांग के धारक मुनिवर, ज्ञानानन्द में जीते हैं,
द्रव्यभाव श्रुत धारी देखे, बीस-पांच गुणधारी देखे। हृदय ॥४॥
निजस्वभाव साधनरत साधु, परम दिगम्बर वनवासी,
सहज शुद्ध चैतन्यजगन्मय, निजपरिणति के अभिलाषी।
चलते-फिरते सिद्ध प्रभु देखे, बीस-आठ गुणमय विभु देखे। हृदय ॥५॥

(६) अरिहंत जय जय…

अरिहंत जय जय, सिद्ध प्रभु जय जय।
सर्व साधु जय जय, जिन धर्म जय जय॥
अरिहंत मङ्गल, सिद्ध प्रभु मङ्गल।
सर्व साधु मङ्गल, जिनधर्म मङ्गला॥१॥
अरिहंत उत्तम, सिद्ध प्रभु उत्तम।
सर्व साधु उत्तम, जिनधर्म उत्तम॥२॥
अरिहंत शरणा, सिद्ध प्रभु शरणा।
सर्व साधु शरणा, जिनधर्म शरणा॥३॥

(७) ॐ आदिनाथाय नमः…

ॐ आदिनाथाय नमः ॐ आदिनाथाय नमः ॐ आदिनाथाय नमः
जप लो रे आदीश्वर नाम, मंगल होंगे सारे काम॥टेक॥
प्रथम सूर्य है जैन धर्म के, बंधन तोड़े अष्ट कर्म के,
वंदन कर लो सुबह और शाम।
जप लो रे आदीश्वर नाम, मंगल होंगे सारे काम॥१॥
महाभाग्य से नर तन पाया, प्यारे प्रभु को क्यूँ बिसराया,
सुमिरन करलो सुबह और शाम।
जप लो रे आदीश्वर नाम, मंगल होंगे सारे काम॥२॥

(८) भावे भजो भावे…

भावे भजो भावे भजो जिनराया
चौबीस जिनवर पाया जी पाया… ॥टेक॥
ऋषभ अजित संभव अभिनंदन,
सुमति पद्म सुपार्श्व पद वंदन;
आतम में अपनापन करके मिथ्यातम को दूर भगाया।
जिनवर भजूँ आतम लखूँ, जिनराया ॥ चौबीस जिनवर… ॥१॥

चन्द्र पद्म शीतल श्रेयांस, जिन,
वासुपूज्य अरहंत महा जिन;
वीतरागि परिणति प्रगटाकर निर्मोही का पथ अपनाया।
समकित लहैं चारित्र लहैं, जिनराया ॥ चौबीस जिनवर.. ॥२॥
विमल अनन्त धर्म जय उज्ज्वल,
शांति कुन्थु अर मल्लि मुनिमल;
शुक्लध्यान की श्रेणी चढ़कर क्षण में केवलज्ञान उपाया।
आनन्द लहैं, कैवल्य लहैं, जिनराया ॥ चौबीस जिनवर.. ॥३॥
मुनिसुव्रत नमि नेमि पार्श्व प्रभु,
वर्धमान जिनराज महाविभु;
स्याद्वादमय दिव्यध्वनि से, जग को मुक्ति-मार्ग बताया।
ऐसा वरूँ तुम जैसा वरूँ, जिनराया ॥ चौबीस जिनवर.. ॥४॥

(९) ऐ आतम हे तुझको नमन…

ऐ आतम हे तुझको नमन, शुद्धातम हे तुझको नमन;
वीरवाणी का हम, जिनवाणी का हम।
सदा करते रहें चिन्तन, ऐ आतम ॥ टेक ॥
राग और द्वेष हममें भरा, और मिथ्यात्व से मन भरा;
मोह और मान में, आतम अज्ञान में, अपना जीवन अभी तक रहा,
अब हटाये सभी आवरण, और रहें धर्म पथ पर कदम ॥
वीरवाणी का हम… ॥१॥
आज जीवन हुआ दुःखरूपमय, ये तो संघर्ष का है समय;
हर तरफ भ्रान्ति है, हर तरफ क्रान्ति है, अपना जीवन बने शान्तिमय,
निज को निज से मिलायेंगे हम, ऐसे सिद्धपद को पायेंगे हम।
वीरवाणी का हम… ॥२॥

ऐसे जिनवर प्रभु को नमन, आत्मा में श्रद्धा ही रमन,
चलि चलाई न ही, तुम मुक्तिश्री, जिनशासन की लेके शरण,
जिनवाणी को पढ़कर के हम, और सुधारेंगे अपना जनम।
वीरवाणी का हम… ॥३॥

(१०) मन के विकार नासो हे महावीर…

मन के विकार नासो हे महावीर देवा,
संसार ताप छूटे, बस एक चाह देवा ॥ टेक ॥
भव की भंवर में भ्रमते, तुम ही हो एक खेवा,
कब तक रुलाएगा भगवन्, देखा न तुमसा देवा ॥१॥
जग में तो देव सारे, हैं भव भ्रमण के मरे,
जो सेवा नाहिं चाहें, देवे स्वपद का मेवा ॥२॥
रागादि भाव शीतल, निज आत्म माहिं करके,
तुम ही हो इस भवोदधि में तारने को खेवा ॥३॥
तुमसा समान बनकर, हो शान्त आग मेरी,
होकर के वीतरागी, अरहन्त नाम देवा ॥४॥

(११) ज्ञान की ज्योति जलाते चलो…

ज्ञान की ज्योति जलाते चलो, निज अन्तर कि वीणा बजाते चलो ॥ टेक ॥
जीवन तो आना-जाना, इसका नहीं ठिकाना।
कल क्या होगा समय घड़ी पे, ये तो किसने जाना;
अपने मन को, जगाते चलो ॥ निज अन्तर ॥१॥
जीवन अच्छे से जीने का नाम है ईश्वर पूजा
सत्य अहिंसा प्रेम से बढ़के नहीं धर्म है दूजा;
इसको सीखोऽऽऽ सिखाते चलो ॥ निज अन्तर ॥२॥

खुद जीयो जीने दो सबको, यही धर्म का नारा,
साम्यभाव और विश्व शांति का फैलाओ डंफारा;
गीत धर्म के ही गाते चलो ॥ निज अन्तर ॥३॥
काम क्रोध, मद, राग-द्वेष की जंजीरों को तोड़ो,
यही देशना है सन्तों की बुरी आदतें छोड़ो;
अपना जीवनऽऽऽ फूल खिलाते चलो ॥ निज अन्तर ॥४॥

(१२) जिनवर सत्य है…

जिनवर सत्य है… जिनधर्म सत्य है… आत्म सत्य है…
आओऽऽऽ सब मिल जैनो मुक्ति का मार्ग है,
जैनं जयतु शासनम्, होऽऽ… १
जय-जय जैन धर्म आऽऽ… २
जैनं जयतु शासनम्… ॥ टेक ॥
आषाढ़ में ऽऽ आषाढ़ में आदिनाथ है, वीरा पावापुर में,
दया करो प्रभु हे जगदीश्वर, सब जायें शिवपुर में;
जिनवर शरण मङ्गल, जैनं जयतु शासनम् ॥१॥
एक सूत्र हैऽऽऽ एक देशना, एक ही सबको वाणी;
आतम हो परमातम जानो; जानो हे भविप्राणी,
जिनवर शरण मङ्गल, जैनं जयतु शासनम्… ॥२॥
धन्य भाग हैऽऽऽ धन्य जनम है, धन्य है पुण्य हमारा
धन्य-धन्य है माँ जिनवाणी, धन्य वो तारणहारा;
वन्दन उन्हें शत् नमन, जैनं जयतु शासनम्… ॥३॥

(१३) चौबीसी वन्दना…

जो अनादि से व्यक्त नहीं था, त्रैकालिक ध्रुव ज्ञायक भाव;
वह युगादि में किया प्रकाशित, वन्दन ऋषभ जिनेश्वर राव ॥१॥
जिसने जीत लिया त्रिभुवन को, मोह शत्रु वह प्रबल महान्;
उसे जीतकर शिवपद पाया, वन्दन अजितनाथ भगवान् ॥२॥
कालहीन जिन सदा असम्भव, निज सन्मुखता का पुरुषार्थ;
निर्मल परिणति के स्वकाल में, सम्भव जिसने पाया अर्थ ॥३॥
त्रिभुवन जिनके चरणों का, अभिनन्दन करती तीनों काल;
वे स्वभाव का अभिनन्दन कर, पहुँचे शिवपुर में तत्काल ॥४॥
निज आश्रय से ही सुख होता, यही सुमति जिन बतलाते;
सुमतिनाथ प्रभु की पूजन कर, भव्यजीव शिवसुख पाते ॥५॥
पद्मप्रभु के पद पंकज की, सौरभ से सुरभित त्रिभुवन;
गुण अनन्त के सुमनों से शोभित, श्री जिनवर का उपवन ॥६॥
श्री सुपार्श्व के शुभ-सु-पार्श्व में, जिसकी परिणति करे विराम;
वे पाते हैं गुण अनन्त से, भूमित सिद्ध सदन अभिराम ॥७॥
चांद चन्द्रसम सदा सुशीतल, चेतन - चन्द्रप्रभ जिनराज;
गुण अनन्त की कला विभूषित, प्रभु ने पाया निजपद राज ॥८॥
पुष्पदन्त सम गुण आवर्धित से, सदा सुशोभित हैं भगवान्;
मोक्षमार्ग की सुविधि बताकर, भविजन का करते कल्याण ॥९॥
चन्द्र किरण सम शीतल वचनों से, हरते जग का आताप;
स्याद्वादमय दिव्यध्वनि से, मोक्षमार्ग बतलाते आप ॥१०॥
त्रिभुवन के श्रेयस्कर हैं, श्रेयांसनाथ जिनवर गुणखान;
निज स्वभाव से पारस श्रेय का, केन्द्र बिन्दु कहते भगवान् ॥११॥
शत इन्द्रों से पूजित जग में, वासुपूज्य जिनराज महान्;
स्वाश्रित परिणति द्वारा पूजित, पूज्यतम भाव गुणों की खान ॥१२॥

निर्मल भावों से भूषित हैं, जिनवर विमलनाथ भगवान्;
राग-द्वेष मल का क्षय करके, पाया सोक्ख अनंत महान् ॥१॥
गुण अनन्तपति की महिमा से, मोहित है यह त्रिभुवन आज;
जिस अनन्त को वन्दन करके, पाऊँ शिवपुर का साम्राज्य ॥२॥
वस्तुस्वभाव धर्मधारक हैं, धर्म धुरन्धर नाथ महान्;
ध्रुव को भूषिमय धर्म प्रगट कर, वंदित धर्मनाथ भगवान् ॥३॥
रागरूप अङ्गोंरों द्वारा दहके, रहा जग को परिणाम;
किन्तु शान्तिमय निज परिणति से, शोभित शान्तिनाथ भगवान् ॥४॥
कुन्थु आदि जीवों की भी, रक्षा का देते जो उपदेश;
स्व-चतुष्टय से सदा सुरक्षित, कुन्थुनाथ जिनवर परमेश ॥५॥
पञ्चेन्द्रिय विषयों से सुख को, अभिलाषा है जिनको अस्त;
धन्य-धन्य अरनाथ जिनेश्वर की, राग-द्वेष अरि किये परास्त ॥६॥
मोह-मल्ल पर विजय प्राप्त कर, जो हैं त्रिभुवन में विख्यात;
मल्लिनाथ जिन समवशरण में, सदा सुशोभित हैं दिन-रात ॥७॥
तीन कषाय चौकड़ी जयकर, मुनि-सु-व्रत के धारी हैं;
वन्दत जिनवर मुनिसुव्रत जो, भविजन को हितकारी हैं ॥८॥
नमि जिनेश्वर ने निज में नमकर, पाया केवलज्ञान महान्;
मन-वचन से करूँ नमन, सर्वज्ञ जिनेश्वर हैं गुणखान ॥९॥
धर्मधुरा के धारक जिनवर, धर्मतीर्थ रथ संचालक;
नेमिनाथ जिनराज वचन नित, भव्यजनों के हैं पालक ॥१०॥
जो शरणागत भव्यजनों को, कर लेते हैं आप समान;
ऐसे अनुपम अद्वितीय पारस, हैं पार्श्वनाथ भगवान् ॥११॥
महावीर सम्मति के धारक, वीर और अतिवीर महान्;
चरण-कमल का अभिनन्दन, है वन्दन वर्धमान भगवान् ॥१२॥

(१४) मैं महापुण्य उदय से…

मैं महापुण्य उदय से जिनधर्म पा गया ॥
जिनधर्म पा गया जिनमन्दिर आ गया ॥ टेक ॥
चार घाति कर्म नाशे ऐसे अरहंत हैं।
अनन्त चतुष्टय धारी श्री भगवन्त हैं ॥
मैं अरहंतदेव की शरण आ गया ॥१॥
अष्टकर्म नाश किये ऐसे सिद्धदेव हैं।
अष्टगुण प्रगट जिनके हुए स्वयमेव हैं ॥
मैं ऐसे सिद्धदेव की शरण आ गया ॥२॥
वस्तु का स्वरूप बतावे वीतराग-वाणी है।
तीन लोक के जीव हेतु महाकल्याणी है ॥
मैं जिनवाणी माँ की शरण आ गया ॥३॥
परिग्रह रहित दिगम्बर मुनिराज हैं।
ज्ञान ध्यान सिवा नहीं दूजा कोई काज है ॥
मैं श्री मुनिराज की शरण पा गया ॥४॥

(१५) जय अरिहन्त…

जय अरिहन्त तुमही महान्, जय श्री सिद्धा तुमही महान्।
तुझ में हमें दिखाई देती, सहज सुखों की खान ॥ टेक ॥
तुम हो विगत सकल अभिलाषा, तुमने जन्म मरण है नाशा।
तुमसे दृष्टि मिलाये गर हम, निजपर का हो ज्ञान ॥
जय अरिहन्त… ॥१॥
मोक्ष मार्ग का तू परिचालक, द्रव्य भाव मय है इस लायक।
निज अनुभव के आश्रय से हम, पावें पद निर्वाण ॥
जय अरिहन्त… ॥२॥

(१६) मंगल अर्हन्त मंगल सिद्धा…

मंगल अर्हन्त मंगल सिद्धा,
मंगल साधु पद पा जाना;
मंगलमय जिनवाणी माता,
कैवल्य कला को पा जाना ॥
मंगल अर्हन्त… ॥ टेक ॥
ये चारों मंगल उत्तम हैं,
मैं शरण इन्हीं की पा जाऊँ।
इनका ही मनन सुमिरन करके,
अपने शुद्धातम को ध्याऊँ।
अन्वेषण हो आराधन हो,
फिर नित्य निरंजन पा जाना।
मंगल अर्हन्त… ॥१॥
ये पञ्चकल्याणक सुयोग मिला,
निर्वाण भूमि पर आ जाना।
मंगल सुयोग महान् मिले,
जिनवाणी का अमृत पाना।
मेरा महंगा नरभव सफल बने,
ऐसा कुछ गुरुवर बतलाना।
मंगल अर्हन्त… ॥२॥

(१९) निज आत्मा में देखो…

निज आत्मा में देखो, भगवान् बस रहा है,
मङ्गलायतन में देखो, सोना बरस रहा है ॥टेक॥
तुझमें करम नहीं है, तुझमें नहीं कषायें,
अपनी ही भूल चेतन, भव-भव तुझे रुलाये।
तू आज तक भी चेतन, कुदन सा हो खरा है ॥१॥
भ्रान्ताप को मिटाने, निज में ही शक्ति क्षमता,
अनजाने में हुई थी, दुखदायी मोह ममता।
आया मुहूर्त मंगल, हर रोम जग गया है ॥२॥
भगवान् आत्मा हूँ, गुरुदेव ने बताया,
पामर नहीं प्रभु हूँ - वैभव अमित दिखाया।
सिद्धों से कम नहीं हूँ - आगम भी कह रहा है ॥३॥
सब तीर्थों का राजा है, स्वर्णपुरी हमारा,
सर्वोच्च सीख पाने, गुरुदेव करे इशारा।
सिद्धायतन स्वयं हूँ, अनुभव ये कह रहा है ॥४॥

(१८) अहो चैतन्य आनंदमय…

तर्ज - (हे अपना दिल तो आवारा)
अहो चैतन्य आनंदमय, सहज जीवन हमारा है।
अनादि अनंत पर निरपेक्ष, ध्रुव जीवन हमारा है ॥टेक॥
हमारे में न कुछ पर का, हमारा भी नहीं पर में।
द्रव्य दृष्टि हुई सच्ची, आज प्रत्यक्ष निहारा है ॥१॥
अनंती शक्तियाँ उछले, सहज सुख ज्ञानमय विलसे।
अहो प्रभुता ! परम पावन, जीव का भी न पारा है ॥२॥

सहज ऐश्वर्यमय मुक्ति, अनलों गम्यमयी ऋद्धि।
विलसती नित्य ही सिद्धि, सहज जीवन हमारा है ॥३॥
किसी से कुछ नहीं लेना, किसी को कुछ नहीं देना।
अहो ! निश्चित परमानंद, मय जीवन हमारा है ॥४॥
ज्ञानमय लोक है मेरा, ज्ञान ही रूप है मेरा।
परम निर्दोष समतामय, ज्ञान जीवन हमारा है ॥५॥
मुक्ति में व्यक्त हैं जैसा, यहाँ अव्यक्त है वैसा।
अबद्धस्पृष्ट अनन्य, नियत जीवन हमारा है ॥६॥
सदा हो ही न होता है, न जिसमें कुछ भी होता है।
अहो उत्पाद व्यय निरपेक्ष, ध्रुव जीवन हमारा है ॥७॥
विनाशी बाह्य जीवन की, आज ममता तजी झूठी।
रहे चाहे अभी जाये, सहज जीवन हमारा है ॥८॥
नहीं परवाह अब जग की, नहीं है चाह शिवपद की।
अहो परिपूर्ण निश्पृष्ठ ज्ञान, मय जीवन हमारा है ॥९॥

(११) घड़ी-घड़ी पल-पल…

घड़ी-घड़ी पल-पल छिन-छिन निश-दिन,
प्रभुजी का सुमिरन कर ले रे ॥ टेक॥
प्रभु सुमिरनें पाप कटत है, जनम मरन दुख हर ले रे ॥ १ ॥
मनवचकाय लगाय चरन चित्त, ज्ञान हिये बिच धर ले रे ॥ २ ॥
‘दौलतराम’ धर्म नौका चढ़ि, भवसागरतें तिरले रे ॥ ३ ॥

(२०) आम आगम गुरुवर…

तर्ज (थोड़ा सा प्यार हुआ है)
आम आगम गुरुवर सौख्य दातार है,
ज्ञानदातार है, मुक्ति दातार है ॥
वीतरागी छवि जिनकी, शांत मुद्रा सुपावन,
दिव्यध्वनि अमृतवर्षा, भविकजन को मन भावन,
श्री अरिहंत दर्शन, करना भव पार है
आम आगम … ॥१॥
नित्य नव-नव सुखों का, सदा वेदन जो करते,
अष्ट गुणों से शोभित, अष्टम वसुधा में बसते,
तुम्हीं आदर्श मेरे, महिमा अपार है
आम आगम … ॥२॥
निष्पृही अपरिग्रही जो, सिद्धों के लघुनंदन है,
मोक्षमार्गी यतियों को, मेरा शत्-शत् वंदन है,
आप जिनशासन, के मूल आधार है
आम आगम … ॥३॥
आगम चक्षु से माता, निज की प्रभुता बताई,
सात तत्व छः द्रव्यों से, विश्व रचना समझाई,
सर्वज्ञ प्रभु सम माता, तेरा उपकार है
आम आगम … ॥४॥

(२१) अभिनंदन-वंदन होऽऽऽऽऽऽ

अभिनंदन-वंदन होऽऽऽऽऽऽ अभिनंदन-वंदन
तीर्थधाम मङ्गलायतन में, मंगल अभिवादन
अभिनंदन-वंदन… ॥ टेक ॥
उदयाचल से भानु जागे,
मोहनिद्राक्षण क्षण में भागे।

जाग रहा चेतन, जाग रहा चेतन
अभिनंदन - वंदन … ॥१॥
अभिनव, नव कलरव ले उर में,
गाएँ पंछी मधुरिम स्वर में।
अवसर है पावन, अवसर है पावन
अभिनंदन - वंदन … ॥२॥
सुर तरुओं के पुष्प मनोहर,
दश दिशों में आच्छादित मनहर
महक रहे उपवन, महक रहे उपवन
अभिनंदन - वंदन … ॥३॥
निजकल्याण के हेतु कल्याणक,
बोधि लाभ हो पाएँ सम्यक्
छूटे भव क्रंदन, छूटे भव क्रंदन
अभिनंदन - वंदन … ॥४॥

(२२) तेरी पूजा ओ…

तर्ज (तेरे सुर और मेरे गीत)

तेरी पूजा ओ मेरे ईश, निश दिन चरण में रहेगा ये शीश ॥ टेक ॥
वैराग्य मन में समाया हुआ
संसारगी से तू दूर जाता हुआ।
दुनियाँ के मन्दिर में लाखों हैं देव
अनादि से स्वामी मैं भटका हुआ।
निशदिन चरण में रहेगा ये शीश।
तेरी पूजा… ॥१॥

पाऊँगा अब तेरे चरणों की धूल
जाएगा आत्मा में समकित की धूल।
श्रद्धा ज्ञान और चारित्र में
निशदिन रहूँगा मैं लवलीन।
अब मैं भी जागूँ हूँ ओ मेरे ईश
निशदिन चरण में रहेगा ये शीश।
तेरी पूजा… ॥२॥

(२३) ॐ मंगलम् …

ॐ मंगलम् - ओंकार मंगलम्
णमो मंगलम् - णमोकार मंगलम्
देव मंगलम् - जिनवाणी मंगलम्
वाणी मंगलम् - जिनगुरु मंगलम्
अरहंत मंगलम् - सिद्ध मंगलम्
साधु मंगलम् - सर्व साधु मंगलम्
कुन्द मंगलम् - कुन्दकुन्द मंगलम्
अमृत मंगलम् - अमृतचंद्र मंगलम्
समय मंगलम् - समयसार मंगलम्
नियम मंगलम् - नियमसार मंगलम्
आदि मंगलम् - महावीर मंगलम्
तीर्थ मंगलम् - तीर्थंकर मंगलम्
देव मंगलम् - देव-शास्त्र मंगलम्
गुरु मंगलम् - गुरुदेव मंगलम्

(२४) देवों के देव श्री जिनदेव..

देवों के देव श्री जिनदेव! नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥ टेक ॥
महापुण्य से दर्शन पाया, भक्ति भाव उर में उमगाया।
स्वयमेव चरणों में झुकता है माथ। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥१॥
तुम ही जग में शरण सहारे, निरपेक्ष बांधव हो तुम ही हमारे।
अहो अहो! तुम ही हो सांचे तात। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥२॥
तुम से विमुख रह बहुदुःख उठाये, आत्म चिंतन सब सहज गमाये।
दर्शन से स्वामी हुए हम सनाथ। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥३॥
तत्त्वों का स्पष्ट ज्ञान हुआ है, निज पर भेद-विज्ञान हुआ है।
अनुभव में आया है चैतन्यनाथ। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥४॥
जग से उदासी हुई सुखकारी, दूर हुए दुर्भाव विकारी।
मन में बसी है छवि मुनिनाथ। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥५॥
वीतराग निर्दोष सर्वज्ञ तुम्ही हो, तीर्थ प्रणेता हितैषी तुम्ही हो।
संवस्मरण में न हो दिनरात। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥६॥
चतुर्निकाय के इन्द्र नमत है चक्रों नरेन्द्र मृगेन्द्र नमत है।
मुनीन्द्र गणीन्द्र नवावत है माथ। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥७॥
रत्नत्रयमार्ग प्रभु ने दिखाया, मोक्षार्थी भव्यो को अन्तर में भाया।
हो ऐसा बल ध्यायें हम निजनाथ। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥८॥

(२५) णमोकार मंत्र को..

णमोकार मन्त्र को प्रणाम हो, प्रणाम हो

ये अनादि महामन्त्र मंगल निष्काम हो…

पहला अरहन्त नाम, करता है कर्म नाश - २,

जीवों को देता है, ज्ञान सूर्य का प्रकाश - २,

जय हो अरहन्त देव तुम्हीं धर्म ध्यान हो - २।

ये अनादि महामन्त्र मंगल निष्काम हो…

दूजा है सिद्ध नाम, जन्म मृत्यु से विहीन - २, अविनाशी वीतरागी, सदा स्वयं आत्मलीन - २,

है अनन्त शुद्धतत्त्व, सृष्टि के ललाम हो - २। ये अनादि महामन्त्र मंगल निष्काम हो…

महाव्रती ज्ञानी आचार्य, नमस्कार हो - २,

उपाध्याय ज्ञान ज्योति, जहाँ अन्धकार हो - २, विनयशील वीतराग साधु ज्ञानवान हो - २।

ये अनादि महामन्त्र मंगल निष्काम हो…

सर्वसाध्य मुक्तिरूप, महामन्त्र ध्यान से - २, अन्तर बाहिर पवित्र, मन्त्र नमस्कार से - २, नमस्कार मन्त्र मुक्ति, सिद्धि के निधान हो - २। ये अनादि महामन्त्र मंगल निष्काम हो…

(२६) म्हारा पंच प्रभु भगवान् सुहावनो रे… म्हारा पंच प्रभु भगवान् सुहावनो रे… म्हारा पंच प्रभु थारी वीतराग जिनमुद्रा मन भावनो रे… - २ म्हारा पंचप्रभु भगवान् सुहावनो रे… २

म्हारा अरिहन्त प्रभुवर प्यारा, जग को मुक्ति मार्ग दिखलावें। - २ प्रभु की सौम्य छवि मनभावन, हम को वस्तुस्वरूप दिखावें ॥ - २ प्रभु ने रत्नत्रय प्रगटायो.. सुखकारनों रे.. ॥१ ॥ सर्वकर्मों से विरहित शाश्वत सिद्ध परमपद पायो । - २ अविनाशी अविचल सुखरूपी, भव्यों के आदर्श सदा हो ॥ - २ भोगें सुख अनन्तानंत आनन्दकारनों रे… ॥२ ॥

साधु संघ के अनुशासक आचारज विज्ञानी ध्यानी। निर्मल आचारज के धारी जो मुनिवर पथ के हैं अनुगामी ॥ पंचाचार धारी मुनिवर.. हितकारनों रे.. ॥३ ॥ श्रुत आगम के बहु अभ्यासी, स्वयं पढ़ें है और पढ़ावें । ज्ञानादिक स्वभाव आराधक, ध्रुव ज्ञायक के गीत सुनावें ॥ विषयों की न चाह जिनके मंगलकारनों रे… ॥४॥ मुनिवर सकलव्रती बड़भागी, भव भोगों से सदा विरागी। चलते फिरते सिद्धों सम मुनि परणति अनुभव नित पागी ॥ बहती उपशम रस की धारा… सुखकारनों रे… ॥५॥

देवभक्ति खण्ड

(१) वीतरागी देव तुम्हारे

वीतरागी देव तुम्हारे जैसा जग में देव कहाँ, मार्ग बताया है जो जग को कह न सके कोई और यहाँ ॥ टेक ॥ हैं सब द्रव्य स्वतन्त्र जगत् में कोई न किसी का काम करें, अपने-अपने स्वचतुष्टय में सभी द्रव्य विश्राम करें। अपनी-अपनी सहज गुफा में रहते पर से मौन यहाँ, वीतरागी देव तुम्हारे जैसा जग में देव कहाँ ॥१॥ भाव शुभाशुभ का भी कर्ता, बनता जो दीवाना है, ज्ञायक भाव शुभाशुभ से भी भिन्न न उसने जाना है। अपने से अनजान तुझे भगवान् बताते देव यहाँ, वीतरागी देव तुम्हारे जैसा जग में देव कहाँ ॥२॥ पुण्य-पाप भी पर आश्रित है, उसमें धर्म नहीं होता, ज्ञान भावमय निज परिणति से बन्धन कर्म नहीं होता। निज आश्रय से ही मुक्ति है कहते श्री जिनदेव यहाँ, वीतरागी देव तुम्हारे जैसा जग में देव कहाँ ॥३॥

(२) हे प्रभो चरणों में तेरे…

हे प्रभो ! चरणों में तेरे आ गये; भावना अपनी का फल हम पा गये ॥ टेक ॥ वीतरागी हो तुम्ही सर्वज्ञ हो;

सप्त तत्त्वों के तुम्ही मर्मज्ञ हो। मुक्ति का मारग तुम्ही से पा गये; हे प्रभु! चरणों में तेरे आ गये ॥१॥ विश्व सारा है झलकता ज्ञान में;

किन्तु प्रभुवर लीन हैं निज ध्यान में। ध्यान में निज-ज्ञान को हम पा गये; हे प्रभु! चरणों में तेरे आ गये ॥२॥ तुमने बताया जगत् के सब आत्मा;

द्रव्यदृष्टि से सदा परमात्मा ।

आज निज परमात्मा पद पा गये;

हे प्रभु! चरणों में तेरे आ गये ॥३॥ (३) रोम-रोम से निकले प्रभुवर नाम… रोम-रोम से निकले प्रभुवर नाम तुम्हारा, हाँ ! नाम तुम्हारा । ऐसी भक्ति करूँ प्रभुजी, पाऊँ न जन्म दुबारा ॥ टेक ॥ जिनमन्दिर में आया, जिनवर दर्शन पाया। अन्तर्मुख मुद्रा को देखा, आतम दर्शन पाया ॥ जनम-जनम तक न भूलूंगा, यह उपकार तुम्हारा ॥१ ॥ अरहंतों को जाना, आतम को पहिचाना। द्रव्य और गुण-पर्यायों से, जिन सम निज को माना ॥ भेदज्ञान ही महामन्त्र है, मोह तिमिर क्षयकारा ॥२॥

पञ्च महाव्रत धारूँ समिति गुप्ति अपनाऊँ ।

निर्ग्रन्थों के पथ पर चलकर, मोक्ष महल में आऊँ ॥ पुण्य-पाप की बन्ध श्रृंखला, नष्ट करूँ दुखकारा ॥३ ॥ देव-शास्त्र-गुरु मेरे, हैं सच्चे हितकारी। सहज शद्ध चैतन्यराज की महिमा, जग से न्यारी ॥ भेदज्ञान बिन नहीं मिलेगा, भव का कभी किनारा ॥४॥

(४) रोम-रोम पुलकित हो…

रोम-रोम पुलकित हो जाय, जब जिनवर के दर्शन पाय। ज्ञानानन्द कलियाँ खिल जाँय, जब जिनवर के दर्शन पाय ॥ जिनमन्दिर में श्री जिनराज, तनमन्दिर में चेतनराज । तन-चेतन को भिन्न-पिछान, जीवन सफल हुआ है आज ॥ टेक ॥ वीतराग सर्वज्ञ देव प्रभु, आये हम तेरे दरबार । तेरे दर्शन से निज दर्शन, पाकर होवें भव से पार ॥ मोह-महातम तुरत विलाय, जब जिनवर के दर्शन पाय ॥१॥ दर्शन-ज्ञान अनन्त प्रभु का, बल अनन्त आनन्द अपार । गुण अनन्त से शोभित है प्रभु, महिमा जग में अपरम्पार ॥ शुद्धातम की महिमा आय, जब जिनवर के दर्शन पाय ॥२॥ लोकोलोक झलकते जिसमें, ऐसा प्रभु का केवलज्ञान। लीन रहें निज शुद्धातम में, प्रतिक्षण हो आनन्द महान् ॥ ज्ञायक पर दृष्टि जम जाय, जब जिनवर के दर्शन पाय ॥३॥ प्रभु की अन्तर्मुख-मुद्रा लखि, परिणति में प्रगटे समभाव। क्षणभर में हों प्राप्त विलय को, पर-आश्रित सम्पूर्ण विभाव ॥ रत्नत्रय-निधियाँ प्रगटाय, जब जिनवर के दर्शन पाय ॥४॥

(५) आज हम जिनराज…

आज हम जिनराज तुम्हारे द्वारे आये, हाँ जी हाँ! हम आये आये ॥ टेक ॥

पुण्य-उदय से आज तिहारे, दर्शन कर सुख पाये। देखे देव जगत् के सारे, एक नहीं मन भाये ॥१॥ जन्म-मरण नित करते, काल अनन्त गमाये। अब तो स्वामी जन्म-मरण का, दुखड़ा सहा न जाये ॥२ ॥ भव-सागर में नाव हमारी, कब से गोता खाये। तुम ही स्वामी हाथ बढ़ाकर, तारो तो तिर जाये ॥३॥ अनुकम्पा हो जाय आपकी, आकुलता मिट जाये। ‘पंकज’ की प्रभु यही वीनती, चरण-शरण मिल जाये ॥४ ॥

(६) निरखी-निरखी मनहर मूरति… निरखी-निरखी मनहर मूरति,

तोरी हो जिनन्दा ।

खोई-खोई आतम निज निधि,

पाई हो जिनन्दा ॥ टेक ॥

मोह दुःख का घर है मैने,

आज सरासर देखा है, - २

आतम-धन के आगे झूठा,

जग का सारा लेखा है, - २

मैं अपने में घुल-मिल जाऊँ,

तो पाऊँ जिनन्दा ॥१ ॥

तू भवनाशी मैं भववासी,

भवसागर से तिरना है, - २

शुद्धस्वरूपी तुझ-सा-बनकर,

शिवरमणी को वरना है, - २

मैं अपने में ही रम जाऊँ,

वर पाऊँ जिनन्दा ॥२ ॥

नादानी में अब लों मैंने,

पर को अपना माना है, - २

काया की माया में भूला,

तुझको नहिं पहिचाना है, - २

अब भूलों पर रोता,

ये मन मोरा हो जिनंदा ॥३ ॥

(७) मेरे मन मन्दिर में आन…

मेरे मन मन्दिर में आन, पधारो महावीर भगवान् ॥ टेक ॥ भगवन तुम आनन्द सरोवर रूप तुम्हारा महा-मनोहर। निश-दिन रहे तुम्हारा ध्यान, पधारो महावीर भगवान् ॥१ ॥ सुर-किन्नर-गणधर गुण गाते, योगी तेरा ध्यान लगाते। गाते सब तेरा यश-गान, पधारो महावीर भगवान् ॥२ ॥ जो तेरी शरणागत आया, तूने उसको पार लगाया। तुम हो दया-निधि भगवान्, पधारो महावीर भगवान् ॥३॥ भक्तजनों के कष्ट निवारें, आप तरें हमको भी तारें। कीजे हमको आप समान, पधारो महावीर भगवान् ॥४॥

आये हैं हम शरण तिहारी, भक्ति हो स्वीकार हमारी। तुम हो करुणा दया निधान, पधारो महावीर भगवान् ॥५ ॥ रोम-रोम में तेज तुम्हारा, भू-मण्डल तुमसे उजियारा। रवि-शशि तुमसे ज्योतिर्मान, पधारो महावीर भगवान् ॥६ ॥ (८) चाह मुझे है दर्शन की…

चाह मुझे है दर्शन की, प्रभु के चरण स्पर्शन की ॥ टेक ॥ वीतराग-छवि प्यारी है, जग जन को मनहारी है। मूरत मेरे भगवन् की, वीर के चरण स्पर्शन की ॥१ ॥ कुछ भी नहिं श्रृंगार किये, हाथ नहीं हथियार लिये। फौज भगाई कर्मन की, प्रभु के चरण स्पर्शन की ॥२॥ समता पाठ पढ़ाती है, ध्यान की याद दिलाती है। नासादृष्टि लखो इनकी, प्रभु के चरण स्पर्शन की ॥३॥ हाथ पै हाथ धरे ऐसे, करना कुछ न रहा जैसे। देख दशा पद्मासन की, प्रभु के चरण स्पर्शन की ॥४॥ जो शिव आनन्द चाहो तुम, इनसा ध्यान लगाओ तुम । विपत हरै भव भटकन की, प्रभु के चरण स्पर्शन की ॥५ ॥ (९) निरखो अङ्ग-अङ्ग जिनवर के…

निरखो अङ्ग-अङ्ग जिनवर के, जिनसे झलके शान्ति अपार ॥ टेक ॥ चरण-कमल जिनवर कहें, घूमा सब संसार ।

पर क्षणभंगुर जगत् में, निज आत्मतत्त्व ही सार। यातैं पद्मासन विराजे, जिनवर झलके शांति अपार ॥१ ॥ हस्त-युगल जिनवर कहें, पर का करता होय ।

ऐसी मिथ्या बुद्धि से ही, भ्रमण-चतुर्गति होय । यातें पद्मासन विराजे, जिनवर झलके शांति अपार ॥२ ॥

लोचन द्वय जिनवर कहें, देखा सब संसार ।

पर दुःखमय गति-चतुर में ध्रुव आत्मतत्त्व ही सार। यातें नासादृष्टि विराजे, जिनवर झलके शांति अपार ॥३ ॥ अन्तर्मुख मुद्रा अहो, आत्मतत्त्व दरसाय।

जिन-दर्शन कर निज-दर्शन पा सत्गुरु वचन सुहाय। यातैं अन्तर्दृष्टि विराजे, जिनवर झलके शांति अपार ॥४॥

(१०) मङ्गलमय जिनराज तुम्हारे…

मङ्गलमय जिनराज तुम्हारे, निश-दिन शरणे आये। भक्ति-भाव की सरगम गाकर, चरणे शीश झुकाये ॥ टेक ॥ भाव-सुमन की सुर-सौरभ हो, गाती निश-दिन प्रभु गौरव को। अमृत देती प्रभु-भक्तों को, भव सागर तिर जाये ॥१ ॥ भाव-किरण की ज्योति जलाई, भक्ति स्वरों में आरती गाई। अखियाँ दर्शन को ललचाई, जन्म सफल कर जाये ॥२ ॥ नव लय नव संगीत सुनाये, शान्त-स्वरों में बीन बजाये। नवरस भक्ति तान सुनाये, निश दिन प्रभु-गुण गाये ॥ ३ ॥

(११) भक्ति के उठे सरगम…

भक्ति के उठे सरगम, मैं गाऊँ तेरे गुण,

मेरे दिल में लगन, आये दरस मिलन,

प्रभु चरणों में मन है मगन ॥ टेक ॥

बीच भंवर में नाव हमारी, पार करो तुम केवल ज्ञानी। मैं आऊँ प्रभु-चरणन में, मेरे मन में उठी है उमङ्ग ॥१॥ नर-नारी मिल मङ्गल गायें, भक्ति के नवदीप जलायें। सात सुरों की अंजलि गावें, भव-भव के सब कर्म छुड़ावें ॥२॥ मन मन्दिर में आप विराजो, अन्तर में प्रभु ज्ञान जगा दो। भव-भव के सब कर्म छुड़ादो, विनती प्रभुजी मेरी सुन लें ॥३ ॥

(१२) दिन-रात स्वामी तेरे गीत गाऊँ… दिन-रात स्वामी तेरे गीत गाऊँ भावों की कलियाँ चरणे खिलाऊँ ॥ टेक ॥ तेरी शान्त-मूरत मुझे भा गई है। मेरे नयनों में नजर आ गई है।

मैं अपने में अपने को कैसे समाऊँ, भावों की कलियाँ चरणे खिलाऊँ ॥१ ॥ मैं सारे जहाँ में कहीं सुख न पाया। है गम का भरा गहरा दरिया है छाया। ये जीवन की नैया मैं कैसे तिराऊँ, भावों की कलियाँ चरणे खिलाऊँ ॥२॥ निगोद अवस्था से मानव गति तक। तुझे लाख ढूंढा न पाया मैं अब तक । कहाँ मेरी मन्जिल तुझे कैसे पाऊँ, भावों की कलियाँ चरणे खिलाऊँ ॥३॥ यही आस जिनवर-शरण पाऊँ तेरी,

मिट जाये मेरी ये भव-भव की फेरी। शरण दो, तुम्हें नाथ शीश नवाऊँ, भावों की कलियाँ चरणे खिलाऊँ ॥४॥ (१३) कोई इत आओ जी…

कोई इत आओ जी, वीतराग ध्याओ जी। जिनगुण की आरती, संजोय लाओ जी ॥ टेक ॥ दया का हो दीपक, क्षमा की हो ज्योत । तेल सत्य संयम में, ज्ञान का उद्योत । मोह तम नशाओ जी, वीतराग ध्याओ जी ॥१ ॥

संयम की आरती में समकित सुगंध।

दर्श ज्ञान चारित्र की हृदय में उमंग।

भेद-ज्ञान पाओजी, वीतराग ध्याओ जी ॥२॥

नर-तन को पाय कर, भूलियो मती।

बन जा दिगम्बर महाव्रत यती।

भावना ये भावो जी, वीतराग ध्याओ जी ॥३ ॥ जिनगुण की आरती में ध्यान की कला।

भव-भव के लागे सब कर्म लो गला।

भवभ्रमण मिटाओ जी, वीतराग ध्याओ जी ॥४॥

(१४) तुम्हारे दर्श बिन स्वामी …

तुम्हारे दर्श बिन स्वामी, मुझे नहिं चैन पड़ती है। छवी वैरागमय तेरी, मेरी आखों में फिरती है ॥ टेक ॥ निराभूषण विगत दूषण परम आसन मधुर भाषण।

नजर नैनों की आशा की अनी पर ये गुजरती है ॥१ ॥ नहीं कर्मों का डर हमको, कि जब लग ध्यान चरणन में। तेरे दर्शन से सुनते हैं, करम रेखा बदलती है ॥२॥ मिले नर स्वर्ग की सम्पति अचम्भा कौन सा इसमें। तुम्हें जो नयन भर देखे गति दुरगति की टलती है ॥३॥ हजारों मूर्तियाँ हमने बहुत सी अन्य मत देखीं। शान्त मूरत तुम्हारी सी नहीं नजरों में चढ़ती है ॥४॥ जगत् सिरताज हो जिनराज सेवक को दरश दीजे। तुम्हारा क्या बिगड़ता है मेरी बिगड़ी सुधरती है ॥५ ॥

(१५) तिहारे ध्यान की मूरत…

तिहारे ध्यान की मूरत अजब छवि को दिखाती है। विषय की वासना तज कर निजातम लौ लगाती है ॥ टेक ॥ तेरे दर्शन से हे स्वामी, लखा है रूप मैं मेरा। तजूँ कब राग तन-धन का ये सब मेरे विजाती हैं ॥१ ॥ जगत् के देव सब देखे, कोई रागी कोई द्वेषी । किसी के हाथ आयुध है किसी को नार भाती है ॥२॥ जगत् के देव हठ ग्राही, कुनय के पक्षपाती है। तू ही सुनय का है वेत्ता, वचन तेरे अघाती है ॥३॥ मुझे कुछ चाह नहीं जग की यही है चाह स्वामी जी। जपूं तुम नाम की माला जो मेरे काम आती है॥४॥ तुम्हारी छवि निरख स्वामी निजातम लौ लगी मेरे। यही लौ पार कर देगी जो भक्तों को सुहाती है ॥५॥ (१६) आये आये रे जिनन्दा …

आये आये रे जिनन्दा, आये रे जिनन्दा तोरी शरण में आये। कैसे पावें…हो कैसे पावें, तुम्हारे गुण गावें रे ॥ मोह में मारे-मारे, भव-भव में गोते खाये । तोरी शरण में आये, हो… आये आये रे जिनन्दा ॥ टेक ॥ जग झूठे से प्रीत लगाई, पाप किये मन माने। सद्गुरु वाणी कभी न मानी, लागे भ्रम रोग सुहाने ॥१ ॥ आज मूल की भूल मिटी है, तव दर्शन कर स्वामी। तत्त्व चराचर लगे झलकने, घट-घट अन्तरयामी ॥२॥ जन्म-मरण रहित पद पावन, तुम-सा नाथ सुहाया। वो सौभाग्य मिले अब सत्वर, मोक्ष-महल मन भाया ॥३ ॥

(१७) आओ जिनमन्दिर में आओ…

आओ जिनमन्दिर में आओ, श्री जिनवर के दर्शन पाओ। जिनशासन की महिमा गाओ,

आया आया रे अवसर आनन्द का ॥ टेक ॥

हे जिनवर तब शरण में, सेवक आयो आज ।

शिवपुर-पथ दरशाय के, दीजे निज पद राज ॥

प्रभु अब शुद्धातम बतलाओ चहुँगति दुख से शीघ्र छुड़ाओ । दिव्यध्वनि अमृत बरसाओ, आया प्यासा मैं सेवक-आनन्द का ॥१ ॥ जिनवर दर्शन कीजिए, आतम दर्शन होय।

मोह-महातम नाशि के, भ्रमण चतुर्गति खोय ॥

शुद्धातम को लक्ष्य बनाओ, निर्मल भेदज्ञान प्रगटाओ । अब विषयों से चित्त हटाओ, पाओ पाओ रे मारग निर्वाण का ॥२ ॥ चिदानन्द चैतन्यमय, शुद्धात्म को जान।

निज स्वरूप में लीन हो पाओ केवलज्ञान ॥

नव केवलब्धि प्रगटाओ, फिर योगों को नष्ट कराओ। अविनाशी सिद्धपद को पाओ, आया आया रे अवसर आनन्द का ॥३ ॥ 卐

(१८) दरबार तुम्हारा मनहर है…

दरबार तुम्हारा मनहर है, दरबार तुम्हारा मनहर है-२ प्रभु दर्शन कर हर्षाये हैं, दरबार तुम्हारे आए हैं ॥ टेक ॥ भक्ति करेंगे चित से तुम्हारी, तृप्ति भी होगी चाह हमारी। भाव रहे नित उत्तम ऐसे, घट के पट में लाये हैं ॥ दरबार तुम्हारे आए हैं ॥१ ॥

जिसने चिंतन किया तुम्हारा, मिला उसे संतोष सहारा। शरणे जो भी आये हैं, निज आतम को लख पाये हैं ॥ दरबार तुम्हारे आए हैं ॥२ ॥

विनय यही है प्रभु हमारी, आतम की महके फुलवारी। अनुगामी हो तुम पद पावन ‘वृद्धि’ चरण सिर नाये हैं ॥ दरबार तुम्हारे आए हैं ॥३ ॥

(१९) प्रभु हम सब का एक…

प्रभु हम सब का एक, तू ही है तारण हारा रे। तुम को भूला, फिरा वही नर मारा-मारा रे ॥ टेक ॥ बड़ा पुण्य अवसर यह आया, आज तुम्हारा दर्शन पाया। फूला मन यह हुआ सफल मेरा जीवन सारा रे ॥१ ॥ भक्ति में जब चित्त लगाया, चेतन में तब चित ललचाया। वीतरागी देव करो अब भव से पारा रे ॥२॥

अब तो मेरी ओर निहारो, भव समुद्र से नाव उबारो॥ ‘पंकज’ का लो हाथ पकड़ मैं पाऊँ किनारा रे॥३॥ जीवन में मैं नाथ को पाऊँ, वीतरागी भाव बढ़ाऊँ। भक्ति भाव से प्रभु चरण में जाऊँ-जाऊँ रे ॥४॥ (२०) थांकी उत्तम क्षमा पै…

थांकी उत्तम क्षमा पै जी अचम्भो म्हानें आवे, किस विधि कीने करम चकचूर ॥ टेक ॥

एक तो प्रभु तुम परम दिगम्बर, पास न तिल-तुष मात्र हुजूर । दूजे जीव दया के सागर, तीजे सन्तोषी भरपूर ॥१ ॥ चौथे प्रभु तुम हित उपदेशी, तारण तरण जगत् मशहूर । कोमल वचन सरल सत्वक्ता, निर्लोभी संयम तप सूर ॥२॥

कैसे ज्ञानावरणी नास्यौ, कैसे कर्यो अदर्शन चूर । कैसे मोह-मल्ल तुम जीत्यो, कैसे किये घातिया दूर ॥३॥ कैसे केवलज्ञान उपायो, अन्तराय कैसे निरमूल । सुरनर मुनि सेवें चरण तुम्हारे, तो भी नहीं प्रभु तुमकू गरूर ॥४॥ करत आश अरदास नैनसुख, दीजे यह मोहे दान जरूर। जनम जनम पद ‘पंकज’ सेखूँ, और न चित कछु चाह हुजूर ॥५ ॥ (२१) नाथ तुम्हारी पूजा में सब…

नाथ तुम्हारी पूजा में सब, स्वाहा करने आया। तुम जैसा बनने के कारण, शरण तुम्हारी आया ॥ टेक ॥ पंचेन्द्रिय का लक्ष्य करूँ मैं, इस अग्नि में स्वाहा। इन्द्र नरेन्द्रों के वैभव की, चाह करूँ मैं स्वाहा। तेरी साक्षी से अनुपम मैं यज्ञ रचाने आया ॥१ ॥ जग की मान प्रतिष्ठा को भी, करना मुझको स्वाहा। नहीं मूल्य इस मन्द भाव का, व्रत तप आदि स्वाहा। वीतराग के पथ पर चलने का प्रण लेकर आया ॥२॥ अरे जगत् के अपशब्दों को, करना मुझको स्वाहा।। पर लक्षी सब ही वृत्ति को, करना मुझको स्वाहा। अक्षय निरंकुश पद पाने और पुण्य लुटाने आया ॥३॥ (२२) एक तुम्हीं आधार हो…

एक तुम्हीं आधार हो जग में, अय मेरे भगवान् । कि तुमसा और नहीं बलवान ।

सम्हल न पाया गोते खाया, तुम बिन हो हैरान। कि तुमसा और नहीं बलवान ॥ टेक ॥

आया समय बड़ा सुखकारी, आतम बोध कला विस्तारी। मैं चेतन तन वस्तु न्यारी, स्वयं चराचर झलकी सारी ॥ निज अन्तर में ज्योति ज्ञान की अक्षय निधि महान् ॥१ ॥

दुनियाँ में एक शरण जिनंदा, पाप-पुण्य का बुरा ये फंदा ॥ मैं शिव भूप रूप सुख कंदा, ज्ञाता दृष्टा तुम सा बन्दा ॥ मुझ कारज के कारण तुम हो और नहीं मतिमान ॥ २ ॥

सहज स्वभाव भाव दरशाऊँ पर परिणति से चित्त हटाऊँ। पुनि-पुनि जग में जन्म न पाऊँ सिद्धसमान स्वयं बन जाऊँ ॥ चिदानन्द चैतन्य प्रभु का है सौभाग्य प्रधान ॥२॥ (२३) प्रभु पै यह वरदान सुपाऊँ…

प्रभु पै यह वरदान सुपाऊँ,

फिर जग कीच बीच नहीं आऊँ ॥ टेक ॥

जल गंधाक्षत पुष्प सुमोदक, दीप धूप फल सुन्दर ल्याऊँ। आनन्द जनक कनक भाजन धरि, अर्घ अनर्घ हेतु पद ध्याऊँ ॥१ ॥ आगम के अभ्यास मांहि पुनि चित एकाग्र सदैव लगाऊँ। संतनि की संगति तजि के मैं, अन्त कहूँ इक छिन नहीं जाऊँ ॥२ ॥ दोष वाद में मौन रहूँ फिर, पुण्य पुरुष गुण निश दिन गाऊँ। राग दोष सब ही को टारी, वीतराग निज भाव बढ़ाऊँ ॥३॥ बाहिर दृष्टि खेंच के अन्दर, परमान्द स्वरूप लखाऊँ । ‘भागचन्द’ शिव प्राप्त न जोलों तोलों तुम चरणांबुज ध्याऊँ ॥४॥ (२४) नेमि जिनेश्वर…

नेमि जिनेश्वर… नेमि जिनेश्वर तेरी जय जयकार करें हम सारे… ॥ टेक ॥ भव भयहारी मम हितकारी, तुम हो ज्ञाता-तुम हो दृष्टा; प्राणी मात्र के प्रभु आपने सारे कष्ट निवारे… ॥१ ॥ विघ्न विनाशक स्वपरप्रकाशक, तुम्ही महंता तुम भगवंता; तीन जगत् के सारे ज्ञेयाकार निहारे… ॥२ ॥

ध्येय प्रकाशक हेय विनाशा, उपादेय निज तुम दर्शाया; इन्द्र सुरेन्द्र नरेन्द्र तुम्हारी आरती उतारें… ॥३ ॥

(२५) तुम्हारी मूरत पे हमने देखा…

तुम्हारी मूरत पे हमने देखा, गजब की समता झलक रही है। तुम्हारे अन्तर की रश्मियों से, अनन्त सृष्टि झलक रही है ॥ टेक ॥ हजारों भानुओं की प्रभा भी, शर्म से मस्तक झुका रही है। तुम्हें विलोकन को इन्द्र तरसे, नव निधियाँ छटपटा रही हैं ॥१ ॥ अनन्त गरिमा है उनकी हमको, मिले नहीं जग में कोई ऐसा। पुण्य पाप का ना होवे कीचड़, दिव्य ध्वनि अब बरस रही है ॥२ ॥ लाख चौरासी में आना जाना, नहीं मिली एक समय की फुरसत । अजर अमर पद पायेंगे हम सब, गजब दामिनी दमक रही है ॥३ ॥

(२६) प्रभु शांति छवि तेरी अंतर…

प्रभु शांति छवि तेरी अंतर में है समाई ।

प्रत्यक्ष देख मूरत, शांति हृदय में छाई ॥ टेक ॥ शुभ ज्ञान ज्योति जागी आतम स्वरूप जाना

प्रत्यक्ष आज देखा चैतन्य का खजाना

जो दृष्टि पर में भ्रमती, वह लौट निज में आई ॥प्रत्यक्ष.. ॥१ ॥ अक्षय निधि को पाने, चरणों में प्रभु के आया

पर प्रभु ने मूक रहकर, मुझको भी प्रभु बताया

अंतर में प्रभुता मेरे निश्चय प्रतीति आई ॥प्रत्यक्ष.. ॥२ ॥ हे देव आपको लख खुदही हुआ अकामी

है आश पर की झूठी मैं पूर्ण निधि का स्वामी

पर्याय हीनता से मुझमें कमी न आई ॥प्रत्यक्ष.. ॥३ ॥ मम भाव अभाव शक्ति पामरता मेट देगी

अभाव भाव शक्ति, प्रभुता विकास देगी

निश्चिन्त होय दृष्टि निज द्रव्य में रमाई ॥ प्रत्यक्ष.. ॥४ ॥

सर्वोत्कृष्ट निज प्रभु, तजकर कहीं न जाऊँ

जिन, बहुत धक्के खाये, विश्राम निज में पाऊँ

हो नमन कोटिशः प्रभु शिव सुख डगर बताई ॥प्रत्यक्ष.. ॥६५ ॥ (२७) जपि माला जिनवर नामकी…

जपि माला जिनवर नाम की।

भजन सुधारससों नहिं धोई, सो रसना किस काम की ॥ टेक ॥ सुमरन सार और सब मिथ्या, पटतर धूंवा नाम की।

विषम कमान समान विषय सुख, काय कोथली चाम की ॥१ ॥ जपि. ॥ जैसे चित्र-नाग क मांथै, थिर मूरति चित्राम की। चित आरूढ़ करो प्रभु ऐसे, खोय गुंडी परिनाम की ॥२ ॥ जपि. ॥ कर्म बैरि अहनिशि छल जोवैं, सुधि न परत पल जाम की। ‘भूधर’ कैसे बनत विसारैं, रटना पूरन राम की ॥३ ॥जपि. ॥ (२८) भवि देखि छवि भगवान् की…

भवि देखि छवि भगवान् की।

सुन्दर सहज सोम आनन्दमय, दाता परम कल्यान की, भवि.. ॥ टेक ॥ नासादृष्टि मुदित मुखवारिज, सीमा सब उपमान की। अंग अडोल अचल आसन दिढ़, वही दशा निज ध्यान की ॥१ ॥भावि. ॥ इस जोगासन जोगरीतिसौं, सिद्धि भई शिवथान की।

ऐसे प्रगट दिखावै मारग, मुद्रा धात पखान की ॥२ ॥ भवि. ॥ जिस देखें देखन अभिलाषा, रहत न रंचक आनकी।

तृपत होत ‘भूधर’ जो अब ये, अंजुलि अम्रतपान की ॥३ ॥भवि. ॥ (२९) मनहर तेरी मूरतियाँ…

मनहर तेरी मूरतियाँ, मस्त हुआ मन मेरा।

तेरा दर्श पाया-पाया, तेरा दर्श पाया ॥ टेक ॥

प्यारा प्यारा सिंहासन अति भा रहा, भा रहा। उस पर रूप अनूप तिहारा छा रहा, छा रहा ॥ पदमासन अति सोहे रे, नयना उमगे हैं मेरे । चित्त ललचाया पाया, तेरा दर्श पाया ॥१ ॥ तव भक्ति से भव के दुख मिट जाते हैं, जाते हैं। पापी तक भी भव सागर तिर जाते हैं, जाते हैं ॥ शिव पद वही पाये रे, शरणाऽगत में तेरी ॥ जो जीव आया, पाया, तेरा दर्श पाया ॥२॥ सांच कहूं कोई निधि मुझको मिल गई मिल गई। जिसको पाकर मन की कलियाँ खिल गई, खिल गई ॥ आशा पूरी होगी रे, आशा लगा के वृद्धि, तेरे द्वार आया, पाया, तेरा दर्श पाया. ॥३ ॥ (३०) जिनराज तेरी महिमा…

जिनराज तेरी महिमा, मुख से न कही जाए । तेरी छवि नयनों में, चेतन छवि दरशाए।। टेक ।। रागादि से है न्यारा, पर्यायों से है पारा। सदा पूज्य आत्मदेवा, तीनों लोकों में है न्यारा।। ज्ञानानंद का है धारी, यह दिव्य ध्वनि में आए।। जिनराज…।।१।।

है अगम अगोचर ज्ञायक, निज का महानायक। ज्ञानानंद का है दरिया, सुख मय चिन्मय ज्ञायक।। उपदेश तेरा पावन, हर पल यही दरशाए।।

जिनराज…।।२।।

ज्ञानमय ज्ञायक प्रभुवर, तू अखंड निजातम है। अनंत शक्ति का भंडारा, तू अचल परमातम है।। हर जीव है परमातम, जिनवाणी ये बतलाये ।। जिनराज…।।३।।

(३१) प्रभु विनति लेकर आये हैं…

प्रभु विनति लेकर आये हैं, भगवान् तुम्हारे चरणों में। मेरे भक्ति भाव को मिल जाए, स्थान तुम्हारे चरणों में।।टेक।। धन यौवन पर अभिमान न हो, मिथ्यात्व से पूरित ज्ञान न हो, श्री देव-शास्त्र-गुरुवर्यों का, भूले से भी अपमान न हो। मैं बनके रहूँ इक धर्ममयी, संतान तुम्हारे चरणों में।।१।। व्रत नियम अटल संकल्प अटल, किसी स्थिति में चारित्र छूटे न, तेरे चरणों में गज मुक्ता, रत्नों को अर्पण कर दूँ हाँ। यदि कुछ न बने तो मैं रख दूँ, निज प्राण तुम्हारे चरणों में।।२।।

(३२) तेरी वाणी को अंतर

तेरी वाणी अंतर में स्वीकार करते हैं।

ओ प्रभु हम तो सिर्फ तेरा ध्यान धरते हैं।।टेक।। जो स्वरूप तेरा वो ही मेरा है ।

आठ कर्मों ने आके घेरा है-२।।

तेरे दर्शन से अंतर का भान करते हैं ऽऽऽ

ओ प्रभु…।।१।।

तेरी मुद्रा हमें सिखाती है ।

वीतरागता से शांति आती है - २ ।।

आनंदामृत हूँ मैं ये ध्यान धरते हैं ऽऽऽ

ओ प्रभु…।।२।।

हर घड़ी हमको दर्श तेरा मिले ।

स्वानुभव रत्नत्रय कलियाँ खिलें - २ ।।

तेरे चरणों में भक्ति से गान करते हैं ऽऽऽ

ओ प्रभु…।।३।।

(३३) आएँगे जब परमात्मा…

आएँगे जब परमात्मा, त्रिभुवन झूम उठेंगे।

बरसेगा आनन्द-बरसेगा आनन्द तीनों लोक में।

भविजन भाग्य जगेंगे… ॥ टेक ॥

पंच कल्याणक आए हैं, रत्न सुरों ने बरसाएँ हैं। निज कल्याणक कराते हैं, भविजन समकित पाते हैं। आयें शुद्धात्मा, आये सिद्धात्मा।

बरसेगा आनन्द-२… ॥१॥

त्रिलोकीनाथ पधारे है, त्रिजग में जयकारे हैं। सातिशय पुण्य को धारे हैं, प्रथम जिनेश्वर हमारे हैं ॥ आयें शुद्धात्मा, आये परमात्मा।

बरसेगा आनन्द-२… ॥२॥

पावन अवसर आयाहै, पुण्योदय से पाया है।

नरपति सुरपति आये हैं गणधर महिमा गाते हैं ॥ आयें शुद्धात्मा, आये सिद्धात्मा।

बरसेगा आनन्द-२… ॥३॥

(३४) कैसी सुन्दर जिन प्रतिमा…

कैसी सुन्दर जिनप्रतिमा है, कैसा सुन्दर है जिनरूप। जिसे देखते सहज दीखता, सबसे सुन्दर आत्मस्वरूप ॥ टेक ॥ नग्न दिगम्बर नहीं आडम्बर, स्वाभाविक है शान्तस्वरूप। नहीं आयुध नहीं वस्त्राभूषण, नहीं संग नारी दुखरूप ॥१ ॥ बिन श्रृंगार सहज ही सोहे, त्रिभुवन मांही अतिशयरूप। कायोत्सर्ग दशा अविकारी, नासादृष्टि आनन्दरूप रूप ॥२ ॥ अर्हत् प्रभु की याद दिलाती, दर्शाती अपना प्रभुरूप। बिन बोले ही प्रगट कर रही, मुक्तिमार्ग अक्षय सुखरूप ॥३ ॥

जिसे देखते सहज नशावें, भव-भव के दुष्कर्म विरूप । भावों में निर्मलता आवे, मानों हुए स्वयं जिनरूप ॥४॥ महाभाग्य से दर्शन पाया, पाया भेदविज्ञान अनूप । चरणों में हम शीश नवावें, परिणति होवे साम्यस्वरूप ॥५ ॥ (३५) नाथ तुम्हारे दर्शन से…

नाथ तुम्हारे दर्शन से, निज दर्शन मैंने पाया। तुम जैसी प्रभुता निज में लख, चित मेरा हर्षाया ॥ टेक ॥ तुम बिन जाने निज से च्युत हो, भव-भव में भटका हूँ निज का वैभव निज में शाश्वत, अब मैं समझ सका हूँ निज प्रभुता में मगन होऊँ, मैं भोगूँ निज में माया ॥१ ॥ पर्याय में पामरता, तब भी द्रव्य सुखमयी राजे । लक्ष्य तजूँ पर्यायों का, निजभाव लखू सुख काजे ॥ पर्यायों में अटक-भटक कर, मैं बहु दुःख उठाया ॥२ ॥ पद्मासनथिर मुद्रा, स्थिरता का पाठ पढ़ाती । निज भाव लखे से सुख होता, नासादृष्टि सिखलाती। कर पर कर ने कर्तृत्व रहित, सुखमय शिवपंथ सुझाया ॥३ ॥ यही भावना अब तो भगवन, निज में ही रम जाऊँ। आधि-व्याधि उपाधि रहित, मैं परम समाधि पाऊँ ॥ ज्ञाननन्दमय ध्रुवस्वभाव ही, अब मेरे मन भाया ॥४॥ (३६) नाम तुम्हारा तारण हारा…

नाम तुम्हारा तारण हारा, कब तेरा दर्शन होगा। तेरी प्रतिमा इतनी सुन्दर, तू कितना सुन्दर होगा ॥ टेक ॥ सब नर मुनि तेरे चरणों में, निश दिन ध्यान लगाते हैं। जो भी आता तेरे दर पर पे, मन वांछित फल पाता है। धन्य यही समझेंगा उस दिन, जिस दिन यह शरणा होगी। नाम तुम्हारा… ॥१ ॥

दीन दयालू दया के सागर, जग में नाम तुम्हारा है। जो भी आया दर पे तेरे, उसको पार लगाया है। नाव से पार उतरने को बस, भावों का सरगम होगा। नाम तुम्हारा…॥२॥

(३७) स्वर्ग से सुन्दर अनुपम

स्वर्ग से सुन्दर अनुपम है, ये जिनवर का दरबार। श्रद्धा से जो जीव ध्यावे निश्चित हो जाता भव पार ॥ यही श्रद्धान हमारा, नमन हो तुम्हें हमारा ॥ टेक ॥ कभी न टूटे श्रद्धा तुम पर भगवान् हमारी। झुक जायेगी जीवन में प्रतिकूलता सारी ॥ है विश्वास हमारा एक दिन छूटेगा संसार। यही श्रद्धान…॥१ ॥

निर्वाछक है भगवन, ये आराधना हमारी । हुई दशा हमारी बस जैसी हुए तुम्हारी ॥ रत्नत्रय का मार्ग चलेंगे मुक्तिद्वार। यही श्रद्धान… ॥२॥

स्याद्वाद वाणी ही, भ्रम का अज्ञान मिटाये। निज गुण पर्यायें ही, अपना परिवार बताये ॥ है विश्वास हमारा एक दिन छूटेगा संसार ॥ यही श्रद्धान… ॥३॥

लोकालोक झलकते, कैवल्य ज्ञान है पाया। फिर शुद्धात्मा ही बस उपादेय बतलाया ॥ मानो आज मिला मुझको मिलाये सिद्धालय । यही श्रद्धान…॥४॥

(३८) प्रभुजी, मन मंदिर में …

प्रभुजी, मन मंदिर में आओ।। टेक ।।

हृदय सिंहासन सूना तुम बिन, उसमें आ बस जाओ।।१।। नीरस मन को भक्ति के रस में, प्रभुवर अब सरसाओ।।२।। भर दे सद्गुण गण प्रभु मुझमें, दुर्गुण दूर हटाओ।।३।। आनंदमय हो जाऊँ ऐसा, प्रभु सन्मार्ग बताओ।।४।। जीवन यह आदर्श बने प्रभु, ज्ञान की ज्योति जगाओ।।५।। शुद्ध उपयोग में रमण करूँ मैं, सज्जन तुम मिल जाओ।।६।।

(३९) कर ले प्रभु का ध्यान…

कर ले प्रभु का ध्यान, मन के मन्दिर में।

सब कुछ है तेरे पास मन के मन्दिर में ॥

करना उसी का ध्यान, मन के मन्दिर में।

सब कुछ है तेरे पास मन के मन्दिर में ॥

जिसको ढूँढे वन वन में, जिसको ढूँढे पर्वत में। जिसको ढूँढ़े मन्दिर में, वह तो है तेरे अन्दर में ॥ करना उसी का ध्यान, मन के मन्दिर में ॥१ ॥

मन मंदिर को करना साफ, क्रोध मान माया का करना नाश डर की जग में नहीं कोई बात, धर्म का फिर तू लेना साथ लोभ को दे फटकार, मन के मन्दिर में ॥२ ॥

समय जाय फिर आये न हाथ, समय की कीमत को पहिचान । तन से करना पर उपकार, भाव से देना चारों दान। समय को ले लो साथ, मन के मन्दिर में ॥ ३ ॥

महामन्त्र को बोल बोल बोल, ज्ञान के द्वार खोल खोल खोल जग में जिसका नहीं है मोल, वो तो तुझ में ही है अनमोल आतम का कर ले ध्यान, मन के मन्दिर में ॥४ ॥

शास्त्रभक्ति खण्ड

(१) माँ जिनवाणी ज्ञायक…

माँ जिनवाणी ज्ञायक बताय दियो रे, बताय दियो रे। आनंद भयो भारी, आनंद भयो रे।।

सविनय शीश नवाय रह्यो रे, नवाय रह्यो रे। मैं भीज गयो आज, मैं भीज गयो रे।।टेक।।

काल अनादि से भ्रमता फिरता।

जनम-जनम में बहु दुख सहता।।

अब सब दुख पलाय गयो रे।।आनंद…।।१।। जो प्रमत्त अप्रमत्त नहीं है।

ज्ञायक शुद्ध अभेद सही है।।

स्वयं सिद्ध दर्शाय दियो रे ।। आनंद … ।।२।। पर अवलंबन छोड़ जु देख।

निज का वैभव प्रत्यक्ष देख।।

सम्यक् रत्नत्रय प्रगटाय रह्यो रे ।। आनंद… ।।३।। अब न कामना कोई बाकी।

निज महिमा सर्वोत्तम आँकी ।।

निज महिमा में डुबोय रह्यो रे ।। आनंद… ।।४।।

(२) म्हारी माँ जिनवाणी…

म्हारी माँ जिनवाणी थारी हो जय जयकार।।टेक।। चरणा में राखी लीजो, भव से अब तारी दीज्यो। कर दीज्यो इतनो उपकार।। थारी तो…।।१।। कुंदकुंद सा थारा बेटा, दुखड़ा सब जग का मेटा। कर दीज्यो इतनो उपकार।। थारी तो…।।२।। जिनवाणी सुन हर्षाये, निश्चित ही भव्य कहावे हो जावे भव से पार।। थारी तो…।।३।। तत्वों का सार बतावे, ज्ञायक से भेंट करावे कियो अनंत उपकार।। थारी तो…।।४।।

(३) थे तो जिनवाणी के मारग…

थे तो जिनवाणी के मारग, मारग चालो जी मारा मनड़ा। चालो जी मारा जिवड़ा।

लख चौरासी कट जासी।।टेक।।

कुण थारे संगे आयो, कुण थारे संगे जासी । काँईं गोरखधंधा राच्यो रे।।१।।

पिछला भव की कमाई, इनाँ भव मां कुण खाई। अगला भव को काँईं सोच्यो रे।।२।।

बांता बांता मां ही बाँध्या, हँसता हँसता कर्म तू बांध्या। चुकाणुं पड़गो तो रोई रे।।३।।

थाने जिनवाणी समझावे, जड़ चेतन भिन्न बतावे। थे तो भेदज्ञान को करणं रे।।४।।

विभाव भाव से नाता तोड़ो, स्वभाव से नाता जोड़ो। ज्ञायक के आश्रय से ही थाने, थाने जी म्हारा मनड़ा।। सच्चूं मारग मिल जासी।।५।।

(४) सुनो सुनो रे जिनवाणी…

सुनो-सुनो रे-२ जिनवाणी, मीठे बोल बोले -२ आगम की वाणी में म्हारो,

आगम की वाणी में म्हारो मन डोले।।टेक।।

बड़ा पुण्य अवसर यह आया, आज तुम्हारा दर्शन पाया। पावापुर के महावीरा ने, सब भव्यों को पार लगाया।। गाओ-गाओ रे-२, जिनवाणी मीठे… ।।१।।

घट-घट माटी गुरुदेव की, महिमा है हितकारी। आत्मज्ञान की बात बताकर, सच्ची ज्योति है जगाई।। नाचो-नाचो रे-२, म्हारो मन हौले-हौले…।।२।। जिन मंदिर में सब नर-नारी, थारा ही गुण गावें। मन से तेरी भक्ति करके, पुण्य महान् कमावें।। नाचो-नाचो रे-२, प्रभु के आगे हौले-हौले…।।३।। कुन्दकुन्द ने परमागम में, परमामृत बरसाया। कहान गुरु ने परमामृत को, घर-घर में पहुँचाया।। सुनो-सुनो रे-२, जिनवाणी मीठे बोल बोले…।।४।। थारे दर्शन के कारण मैं, बड़ी दूर से आया। सुन-सुन थारी महिमा, भैया दूर-दूर से आया।। करो-करो रे-२, प्रभु के दर्शन हौले-हौले… ।।५।।

(५) ग्रंथ समयसार…

ग्रंथ समयसार हमें प्राणों से प्यारा।

यही है वो ग्रंथ होऽऽऽ, जिसने लाखों को तारा…।। णमो परमागमम् ! णमो रत्नाकरम्, णमो जिनदेशनम्, णमो वागेश्वरम्, णमो लोए सव्व शब्द ब्रह्म।।टेक।।

शुद्धातम का ज्ञान कराता, परमातम का दर्श दिखाता। ज्ञान गगन में सैर कराता, सिद्ध प्रभु से भेंट कराता।। सदियों पुराना परमागम हमारा।। ग्रंथ… ।।१।। श्रीमद् जी ने इसको पाकर, रत्न लुटाये झोली भर-भर। गुरु कहान ने मारग पाया, श्री बनारसी दास को भाया।। कलिकाल सर्वज्ञ यही है हमारा।। ग्रंथ… ।।२।। द्रव्य-दृष्टि का यही ग्रंथ है, स्वानुभूति का यही पंथ है। शुद्धातम ही परमदेव है, स्वयं स्वयंभू महादेव है।। न्यौछावर इस पर जीवन हमारा।। ग्रंथ… ।।३।।

(६) सीमंधर मुख से …

सीमंधर मुख से फुलवा खिरे, जाकी कुन्दकुन्द गूँथे माल रे। जिनजी की वाणी भली रे, सीमंधर मुख से फुलवा खिरे।।टेक।। वाणी प्रभु मन लागे भली, जिसमें सार समय सिरताज रे। जिनजी की वाणी भली रे, सीमंधर मुख से फुलवा खिरे।।१।। गूँथा पाहुड़ अरु गूँथा पंचास्ति, गूंथा जो प्रवचनसार रे। जिनजी की वाणी भली रे, सीमंधर मुख से फुलवा खिरे।।२।। गूँथा नियमसार गूँथा रयणसार, गूँथा समय का सार रे। जिनजी की वाणी भली रे, सीमंधर मुख से फुलवा खिरे।।३।। स्याद्वादरूपी सुगंधी भरा जो, जिनजी का ओंकार नाद रे। जिनजी की वाणी भली रे, सीमंधर मुख से फुलवा खिरे।।४।। वन्दूं जिनेश्वर, वन्दूं मैं कुन्दकुन्द, वन्दूं यह ओंकार नाद रे। जिनजी की वाणी भली रे, सीमंधर मुख से फुलवा खिरे।।५।। हृदय रहो मेरे भावे रहो, मेरे ध्यान रहो, जिनबैन रे। जिनजी की वाणी भली रे, सीमंधर मुख से फुलवा खिरे।।६।। जिनेश्वरदेव की वाणी की गूंज, मेरे गूँजती रहो दिन रात रे। जिनजी की वाणी भली रे, सीमंधर मुख से फुलवा खिरे।।७।।

(७) हम अगर वीरवाणी पर…

हम अगर वीरवाणी पर, श्रद्धा करें, ज्ञान के दीप जलते चले जाएँगे।

गर जले ज्ञान के दीप हृदय में तो, मार्ग संयम के खुलते चले जाएँगे।।टेक।। हमने मुश्किल से पाया है, मानव जनम, देव तरसें जिसे ऐसा पाया रतन।

गर इसे हमने विषयों में ही खो दिया, भूल पर अपनी हम खुद ही पछताएँगे।।१।। अब मिला जिन धरम और जिनवर शरण,

गुरु मिले हैं दिगम्बर और अमृत वचन। राग से भिन्न ज्ञायक है, अनुभव करो, मार्ग कल्याण के खुद ही खुल जाएँगे।।२।। जब नहीं सच्ची श्रद्धा, तो क्या अर्थ है, इस बिना ज्ञान और आचरण व्यर्थ है। हम पुजारी बनें वीतरागी के तो,

कर्म के बंधन कटते चले जाएँगे।।३।। (८) महिमा है, अगम जिनागम …

महिमा है, अगम जिनागम की ॥ टेक ॥

जाहि सुनत जड़ भिन्न पिछानी, हम चिन्मूरति आतम की ॥१ ॥ रागादिक दुःख कारन जानैं, त्याग बुद्धि दीनी भ्रम की ॥२॥ ज्ञान-ज्योति जागी उर अन्तर, रुचि बाढ़ी पुनि शम-दम की ॥३ ॥ कर्मबंध की भई निरजरा, कारण परम पराक्रम की ॥४॥ ‘भागचन्द’ शिवलालच लाग्यो, पहुँच नहीं है जहँ जम की ॥५ ॥

(९) जिन बैन सुनत मोरी…

जिन बैन सुनत मोरी भूल भगी ॥ टेक ॥

कर्मस्वभाव भाव चेतन को, भिन्न पिछानन सुमति जगी ॥१ ॥ निज-अनुभूति सहज ज्ञायकता, सो चिर रुष-तुष मैल पगी ॥२ ॥ स्याद्वाद धुनि निर्मल जल तें, विमल भई समभाव लगी ॥३ ॥ संशय-मोह भरमता विघटी, प्रगटी आतम सोंज सगी ॥४॥ ‘दौल’ अपूरव मङ्गल पायो, शिवसुख लेन होंस उमगी ॥५ ॥ (१०) चरणों में आ पड़ा हूँ…

चरणों में आ पड़ा हूँ, हे द्वादशांग वाणी।

मस्तक झुका रहा हूँ, हे द्वादशांग वाणी ॥ टेक ॥ मिथ्यात्व को नशाया, निज तत्त्व को प्रकाशा। आपा-पराया भासा, हो भानु के समानी ॥१ ॥

षट् द्रव्य को बताया, स्याद्वाद को जताया।

भवफन्द से छुड़ाया, सच्ची जिनेन्द्र वाणी ॥२ ॥ रिपु चार मेरे मग में, जंजीर डाले पग में।

ठाड़े है मोक्ष मग में, तकरार मोसों ठानी ॥३ ॥ दे ज्ञान मुझको माता, इस जग से तोडूं नाता । होवे सुदर्शन साता, नहिं जग में तेरी सानी ॥४॥ (११) केवलिकन्ये, वाङ्गमय गंगे…

केवलिकन्ये, वाङ्गमय गंगे, जगदम्बे, अघ नाश हमारे । सत्य-स्वरूपे, मङ्गलरूपे, मन-मन्दिर में तिष्ठ हमारे ॥ टेक ॥ जम्बूस्वामी गौतम-गणधर, हुए सुधर्मा पुत्र तुम्हारे । जगतैं स्वयं पार है करके, दे उपदेश बहुत जन तारे ॥१ ॥ कुन्दकुन्द, अकलंकदेव अरु, विद्यानन्दि आदि मुनि सारे ।

  • अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -

:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2382.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है