महावीर भक्ति सुमन — जैन स्वाध्याय सामग्री | Mahavir Bhakti Suman

महावीर भक्ति सुमन

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

॥ नान्याथावादिनो जिनाः ॥

मङ्गल भक्ति सुमन

: संकलन एवं सम्पादन :
मङ्गलायतन उदित जैन, कानपुर (उत्तरप्रदेश)
मङ्गलायतन सक्षम जैन ‘ऐश्वर्य’, भिण्ड (मध्यप्रदेश)

: सह-संकलन एवं सम्पादन :
मङ्गलायतन आशीष जैन, कोटा (राजस्थान)
एवं समस्त मङ्गलायतन छात्र

: मुख्य मार्गदर्शक :
श्री पवन जैन, ‘ताऊजी’, अलीगढ़ (उत्तरप्रदेश)
पण्डित अशोक लुहाड़िया, अलीगढ़ (उत्तरप्रदेश)

प्रकाशक :
तीर्थधाम मङ्गलायतन
श्री आदिनाथ-कुन्दकुन्द-कहान दिगम्बर जैन ट्रस्ट
सासनी-204216, हाथरस (उत्तरप्रदेश) भारत

प्रथम संस्करण - 1500 प्रतियाँ

(तीर्थधाम मङ्गलायतन के 13वें वार्षिकोत्सव के अवसर पर
दिनांक 03 फरवरी 2016 से 07 फरवरी 2016 तक)

सहयोग राशि - रुपये 40.00 मात्र

प्राप्ति स्थान :

तीर्थधाम मङ्गलायतन
अलीगढ़-आगरा मार्ग, सासनी-204216
हाथरस (उत्तरप्रदेश)
website : www.mangalayat an.com
email : info@mangalayat an.com

मुख्य प्रेरणास्रोत :

स्वर्गीय पण्डित कैलाशचन्द्रजी जैन,
बुलन्दशहर (उत्तरप्रदेश)

मार्गदर्शक :

श्री स्वप्निल जैन ‘भैया’
पण्डित देवेन्द्रकुमार जैन
पण्डित संजयकुमार जैन ‘शास्त्री’
पण्डित अरुणकुमार जैन, जयपुर
पण्डित सचिन जैन
पण्डित सुधीरकुमार जैन, ‘शास्त्री’
पण्डित संदीपकुमार जैन, ‘शास्त्री’
पण्डित सन्देशकुमार जैन, ‘शास्त्री’

टाइप सेटिंग :

मङ्गलायतन ग्राफिक्स, अलीगढ़।

कवर पेज सेटिंग :

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मुद्रक :

(iii)

मन की बात

तीर्थधाम मङ्गलायतन परिषद् तत्त्वज्ञान का विशुद्ध क्षेत्र है। साथ ही
तत्त्वज्ञान की शोभा को बढ़ाये है, यहाँ संचालित ‘भगवान श्री आदिनाथ विद्यानिकेतन’
में अध्ययनरत मङ्गलायतन छात्र।

हम मङ्गलायतन छात्रों पर तीर्थधाम मङ्गलायतन व सम्पूर्ण जैन समाज का
बहुत उपकार है, जिसकी भरपाई करना बहुत मुश्किल ही नहीं अपितु नामुमकिन
है और अभी हम इतने सक्षम भी नहीं कि उस उपकार की भरपाई कर सकें।
तथापि उनके अंशरूप हम यह ‘मङ्गल भक्ति सुमन’ नामक पुस्तिका का प्रकाशन
कर रहे हैं।

पुस्तक प्रकाशन में परम पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी का हम उपकार नहीं
भूल सकते, जिनके द्वारा इस पंचम काल में तत्त्व की अमृत-वर्षा हुई। तत्त्व का
उद्घाटन हुआ। मुक्तिपथ का मार्ग मिला। साथ ही स्वर्गीय पण्डित कैलाशचन्द्रजी
जैन, श्री पवन जैन ‘ताऊजी’ एवं श्री स्वप्निल जैन ‘भैया’ का जिनके मोक्ष
सान्निध्य से तत्त्व एवं तत्त्वप्रसार का अनुपम, अद्भुत संयोग हमें मिलता है।
इसलिए इनके जितने आभारी प्रगट करें, उतने कम हैं।

इस पुस्तिका में, आप वे समस्त भक्तियाँ पायेंगे जो सभी विशेष प्रसंगों पर
गानी जानी चाहिए और वे, जो सामान्य भक्ति सन्ध्याओं में अपना एक अहम
स्थान संरक्षित करती हैं।

साथ ही हमने पुस्तिका में प्राचीन आध्यात्मिक कवि जैसे बनारसीदासजी,
दौलतरामजी, ज्ञानरायजी आदि तथा वर्तमान के आध्यात्मिक कवि बालचन्द्रवादी
रविन्द्रजी ‘आत्मन्’, अमायन; पण्डित अभयकुमारजी शास्त्री, देवलाली; डॉ.
विवेककुमारजी, हिन्दुवाड़ आदि सभी की भक्तियाँ सम्मिलित की हैं।

इस पुस्तिका में भक्तियाँ प्रसंगानुसार, विभिन्न खण्डों में विभाजित की गयी
हैं। जैसे पंच कल्याणक भक्ति खण्ड, प्राचीन कवि भक्ति खण्ड, वैराग्य-उपदेश
भक्ति खण्ड आदि-आदि।

चूँकि हमने अपनी योग्यता अनुसार इस पुस्तिका को त्रुटि मुक्त करने की
कोशिश की है, तथापि कोई त्रुटि रह जाये तो हमें अवश्य सूचित करें, ताकि
अगले संस्करण में उनका परिहार हो सके।

जय जिनेन्द्र !!

  • सम्पादक

(IV)

अनुक्रमणिका

मंगलाचरण

(१) श्री अरहंता सदा मंगलमय…
(२) श्री मंगल चार जगत में…
(३) मन्त्र जपो नमस्कार…
(४) मन्त्र णमोकार हमें प्राणों…
(५) मन्त्र परम शिरोमणि देखे…
(६) अरिहंत देव का…
(७) ॐ आदिनाथ नमः…
(८) भावे भजो भावे…
(९) ए आत्म हे मुझको नमन…
(१०) मन के विकार नाशो…
(११) ज्ञान को ज्योति जलाते चलो…
(१२) जयवंत सदा रहो…
(१३) चौबीसों वंदना…
(१४) मैं महापुण्य उदय से…
(१५) जय अरिहंता…
(१६) मंगल अरिहंत मंगल…
(१७) निज आत्मा में देखो…
(१८) आठों केवल ज्ञानमय…
(१९) आठ महा मद त्याग…
(२०) आठ अंगुल गुरुवर…
(२१) अनंतानंत सिद्ध होऽऽऽ…
(२२) तेरे पूजा ओ…
(२३) ॐ मंगलम्…
(२४) देवों के देव श्री जिनदेव…
(२५) णमोकार मंत्र हो…
(२६) मंगल मंत्र प्रभु…

देवभक्ति

(१) वीतरागी देव तुम्हारे…
(२) हे प्रभो चरणों में से…
(३) रोम-रोम से निकले…
(४) रोम-रोम पुलकित हो…
(५) आज हम जिनराज…
(६) निरखी-निरखी मनहर…
(७) मेरे मन मंदिर में आन…
(८) चाह मुझे है दर्शन की…
(९) निरखो अङ्ग-अङ्ग जिनवर के…
(१०) मंगलमय जिनराज तुम्हारे…
(११) दर्शन दो मेरे भगवान…
(१२) दिन हम तुम्हारे…
(१३) कोई इस आओ जी…
(१४) तुम्हारे दर्शन बिन स्वामी…
(१५) तिहारे ध्यान की सूरत…
(१६) आये आये रे जिनराज…
(१७) आज जिनमंदिर में स्वामी…
(१८) सच्चा सुखमय मनहर है…
(१९) प्रभु हम सब को एक…
(२०) थांको उत्तम क्षमा पै…
(२१) नाम तुम्हारी पूजा में सब…
(२२) एक घड़ी आधार हो…
(२३) प्रभु मैं तो नंदन सुखकी…
(२४) तुम शिवंकर…
(२५) तुम्हारी मूरत ये हमने देखा…
(२६) प्रभु शांति छवि तेरी अंतर…
(२७) जपूं माला जिनवर नामकी…
(२८) भक्ति मेरी छवि भगवान की…
(२९) हे मेरे देव! तुम बिन…
(३०) जिनवर मेरी नैया…
(३१) प्रभु विनती लेकर आये हैं…
(३२) तेरे वाणी को अंतर…
(३३) आओ जय परमात्मा…
(३४) कैसा सुंदर जिन प्रतिमा…
(३५) आज आनंद बरसा है…
(३६) नाम तुम्हारा हमने सुना…
(३७) स्वर्ग से सुन्दर अनुपम…
(३८) भूमण्डल मन मंदिर में…
(३९) करे ले प्रभु का ध्यान…

(V)

शांतिभक्ति खण्ड

(१) मैं जिनवाणी गाऊँ…
(२) भारी माँ जिनवाणी…
(३) ये तो जिनवाणी के भाग्य…
(४) सुनो सुनो रे जिनवाणी…
(५) जय शारदे…
(६) वीतराग मुद्रा में…
(७) हम अगर भोलाणी पर…
(८) महिला है, आम जिनगम…
(९) जिन बिन मूरत मोरी…
(१०) चरणों में ओ पड़ा हूँ…
(११) मंगलमय जिनवाणी सोहे…
(१२) धन्य धन्य जिनवाणी माता…
(१३) धन्य धन्य वीतराग वाणी…
(१४) नमो देव वागेश्वरी जैनवाणी…
(१५) जयवंती जिनवाणी…
(१६) ज्ञान बिन ज्ञान नहीं…
(१७) जिनवाणी हमें प्रिय…
(१८) हे जिनवाणी माता तुमको…
(१९) जिनवाणी माता दर्शन…
(२०) जिनवाणी माता रत्नत्रय…
(२१) जिन पौषी थी जिन…
(२२) शांति देवी जिनवाणी…
(२३) शांति का समरसार जाने…
(२४) परम परम गुरुओं ने गाया…
(२५) माँ जिनवाणी बसों हृदय में…
(२६) मोटे रत्न से भरी…
(२७) सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र…
(२८) माँ जिनवाणी तुम अंतर में…
(२९) माँ जिनवाणी तेरो नाम…
(३०) जिनवाणी माँ-२…
(३१) जिनवाणी-जिनवाणी…

गुरुभक्ति खण्ड

(१) श्री जिन शासन माता सह…
(२) भारी परम निष्ठाव…
(३) परम गुरु करता…
(४) धन-धन जैनी साधु…
(५) धन्य मुनिराज आता…
(६) जिन रागद्वेष…
(७) ऐसे साधु सुगुरु…
(८) गुरुओं के उपकार को…
(९) वंदन मुनिराज को…
(१०) जिन उपदेश…
(११) हे परम दिगम्बर मुनि…
(१२) धन्य मुनिराज हमारे…
(१३) ज्ञान अग्नि में…
(१४) सिद्धों की श्रेणी में…
(१५) धन्य दिगम्बर मुनि…
(१६) वंदना हे मुनिराज…
(१७) ज्ञान की ज्ञान मुद्रा में…
(१८) मुनिराज आज मेरे…
(१९) मेरे मुनिराज देखे हमने…
(२०) हे परम दिगम्बर देव…
(२१) धन्य मुनिराज को वंदना…
(२२) निर्ग्रन्थ दिगम्बर साधु…
(२३) जब मुनिवर आते हैं…
(२४) अपना करता हो कल्याण…
(२५) आत्म अनुभव जिन रमण…
(२६) गुरुवर ज्ञान ज्योति…

महामंत्र-भक्ति खण्ड

(१) महामंत्राक्षर पंच परम् कल्याणक…
(२) आज पंचकल्याणक महान…
(३) ये महा-महामंत्र…
(४) जो महा नाम जपाया जिनवर…
(५) पंचकल्याणक आज…
(६) मेरे पाँच हुए कल्याण प्रभो…
(७) आओ आओ पंचकल्याणक…
(८) ये महामंगलमय महामंत्र…
(९) मंगल महोत्सव में…

णमोकार-भक्ति खण्ड

(१) णमोकार का गुण…

(VI)

(२) सुनो ओ माँ ने…
(३) सोती थी भद्रदेवी माता…
(४) सोलह-सोलह स्वप्न…
(५) नाम में होऽऽऽ नाम में…
(६) मरुदेवी माता…
(७) गर्भ कल्याणक की…
(८) माता भावे सुहाती है कल्याणक…

जयमाला-कल्याणक खण्ड

(१) हे अमृत चार…
(२) आया आया सुहाना…
(३) जब जन्मे तीर्थंकर…
(४) जन्म कल्याणक आज…
(५) नमन हो मेरे…
(६) जिनवर प्रभु अवतार…
(७) आज कुंडलपुर में बधाई…
(८) प्रभु जी पधारे म्हारे आँगन…
(९) माता माया जागो जागो…
(१०) आज अम्माकल्याणक महान…
(११) म्हारे आँगन आज आई…
(१२) जब प्रभु जन्म हुए…
(१३) आनंद आनंद में…
(१४) वंदनवंदन… वंदनवंदन…
(१५) त्रिभुवन के नाथ प्रभु…
(१६) मंगल से अंतर आँगन…
(१७) पहिला ओऽऽऽ पहिला…
(१८) जन्मे रे जन्मे जिन दे…
(१९) हर आज दिन जागे…
(२०) बधाई आज जिन राजा…
(२१) आज तो बधाई राजा…
(२२) अमृत से भरी रही…
(२३) सुहाती है अपने शीश…
(२४) बुलाय दिनी माता…
(२५) आज घर-घर खुशियां…
(२६) आज आदिनाथ जन्मे हैं…
(२७) आज नगरों में जन्मे…
(२८) बधाई गाओ रे…
(२९) इंद्र गावे मेरी भक्ति…
(३०) छोटी-२ बधाई…
(३१) आनंद अंतर मा आज न…
(३२) छाओ छाओ रे छाओ…
(३३) आनंद अवसर आज…
(३४) महिला कही है आज मुख से…
(३५) आज पधारे देवा…
(३६) आज महादेवा कल्याण…
(३७) देखा मैंने विशालता को लाल…

स्तुति-कल्याणक खण्ड

(१) तीर्थंकरों का मान…
(२) जन्म-जन्म की अनवरत आयो…
(३) जिन सेवा में भक्तिभाव…
(४) मेरी-मेरी भक्ति कल्याणक…
(५) ये मुनिवर कब मिले हैं…
(६) ऐसे मुनिवर देखे वन में…
(७) आनंद अवसर आयो…
(८) अब विषयों में शांति मिली…
(९) विषयों का विष त्याग…
(१०) मैंने लगाया पार…
(११) तिहारी लगा लगा…
(१२) श्री नेमीकुमार गिरनारी वाले…
(१३) मंगल बेला आज…
(१४) वैराग्य भावों का…
(१५) छाट-छाट मुनिवर…
(१६) थोड़ा-सा अब तुम क्लेश…
(१७) नेमीनाथ स्वामी हो…
(१८) नेमीकुमार को देखो ये सब…
(१९) घर में ही वैरागी भरतो…
(२०) अंतर आनंद के रसिया…
(२१) देवों और मानवों में…
(२२) भाता है दिगम्बर देव…

भक्तामर-भक्ति खण्ड

(१) धन-धन हे गौतम…
(२) जिनवर तुम्हारे गुण…

प्रास्ताविक भक्ति खण्ड

(१) सम्यग्दर्शन भयो, भान्ती…
(२) घर-घर आनन्द छावन…
(३) सम्यग्दर्शन स्वत्व…
(४) ॐकारमयी वाणी तेरी…
(५) शिव आत्मा का ज्ञान…
(६) सुखमय वाणी जिनवर की…
(७) जिन भक्त ने बड़ी चाव की…
(८) कर लो जिनवर का…
(९) आदि जिनेन्द्र-२…
(१०) गागर अमृत को भर…
(११) श्री आदिनाथस्वामी तुम्हें…
(१२) वन्दन आदिप्रभु तुम्हें…
(१३) श्री अरहंत छवि…
(१४) हे जिन तेरे सुजस…
(१५) निरखत जिनचन्द्र-वदन…
(१६) समता का भाव…
(१७) जिनवर की वाणी झलक…
(१८) प्रभु को वीतराग जिनमुद्रा…
(१९) दिलखानि बीरा…

मोक्षकल्याणक भक्ति खण्ड

(१) देखो जी आदीश्वर स्वामी…
(२) जाओगे सिद्ध भगवान…
(३) जाओ… जाओ…
(४) जहाँ राग-द्वेष का गंध नहीं…
(५) आओ जी आओ नी पावन…

प्राचीन भक्ति खण्ड

(१) चिन्मुद्रा तुम्हारी…
(२) ओतप्रोत अद्भुत अद्भुत…
(३) ज्ञान में परम रमण वाली…
(४) आत्मा हमारी नित्य…
(५) अब मेरे संशयित मानस…
(६) भाववन भवन क्यों भूला रे…
(७) हमको कबु भज ना रे…
(८) भोंदू भाई! समझ संबंद…
(९) दुनिया कब देखे या मन की…
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(२०) लिखे ‘रामायण’ परमारि…
(२१) चेतन तू हितकारी अकेला…
(२२) हम बड़े अज्ञानी हीन से…
(२३) भावों में सरलता रहती है…
(२४) अब हम अमर भये रे…
(२५) ओ ओ देव बीतराग…
(२६) जिनवर चरण सरोज सम…
(२७) पिक-पिक जीवन समर्पित…
(२८) हमें निज धर्म पर चलना…
(२९) हे स्वतंत्र निजत्व निकाश…
(३०) अब के ऐसी दिवाली…
(३१) मेरे प्यारे जगन्नाथ…
(३२) चेतन हो तेरी खोज…
(३३) अरहंत गुण मन भावों…
(३४) लगी लौ भक्तिदर्शनों…
(३५) अब प्रभु चरण…
(३६) हम न किसी के कोई न…
(३७) अब किसे कोई क्यों अपने…
(३८) हे देव तेरी सुंदर जगमग…
(३९) हे जिन मेरी ऐसी कृपा कीजै…
(४०) कबथी मिले मोहि श्रीगुरु…
(४१) अपनी सुधि भूल आप…
(४२) चेतन कौन अज्ञानी गति रे…
(४३) हम तो कर्मों ने विजन पाये…
(४४) मेरे कर्मों का दिन सुधरी…
(४५) जिन दुख भंजन की…

प्रासंगिक भक्ति खण्ड

(१) आदिप्रभु का, वीतराग का…
(२) जिनेन्द्र चरण वन्द…
(३) आचार्य इन्द्रदेव…
(४) आत्मा तेरी ज्ञान दुशाला…
(५) मेरा पंडित गुरुराज…
(६) हे वीर रे आप हे मेरे हम गुरु…
(७) मुझे चरणों से लगा ले…
(८) करुणा के भण्डार…
(९) हे मेरे महावीर…
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(१०) पास नाम…
(११) चेतन के दर्पण में…
(१२) सत्य सनातन धर्म प्यारा…
(१३) भावना की पुंज ओढ़ के…
(१४) हम सब सिद्धों भगवान…
(१५) अ.र.ह.ं.त. अ.र.ह.ं.त…
(१६) जिनवर हे सुमित्त देवस…
(१७) ऐसा दो वरदान जिनेश्वर…
(१८) मेरा ध्यान जब से किया है…
(१९) मैं ज्ञान बनूं सब…
(२०) मैं तो तुझसे…
(२१) आत्मा है मेरा सिद्धालय…
(२२) करता रहूं गुणगान…
(२३) गा रे भैया, गा रे भैया…
(२४) आओ, आओ रे हमारी…
(२५) आओ रे आओ रे…
(२६) जिनवर हे जिनवर…
(२७) राग मण्डल में…
(२८) ये शाश्वत सुख का प्याला…
(२९) विश्व तीर्थ बचा प्यारा…
(३०) जहाँ चेतन का दर्शन…
(३१) धर्म की है प्यास…
(३२) मोहे लागी लगन…
(३३) कितना सुन्दर…
(३४) हम आनन्दित…
(३५) कैसे करें गुणगान…
(३६) मेरा मन है शिवपुरी…
(३७) मोक्ष के प्रेमी बने…
(३८) हे धर्म यहाँ को रोव सब…
(३९) ये धर्म हमारा है…
(४०) अभी मेरे मन में ये, मैं…
(४१) तुम से ध्यान लगाकर…
(४२) जिनवर वाणी…
(४३) दश लक्षण के दशधर्मों का…
(४४) तुमसे लागी लगन…
(४५) जिन-वल्लभ…
(४६) विषयों में दामन क्योंते फंसा…
(४७) प्रभु जी अब न भटकेगे…
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(४८) मेरा ज्ञान उत्पन्न…
(४९) प्यास प्यास लागे…
(५०) वैराग्य का पथ…
(५१) जय जय जय जिनवर हो…
(५२) जहाँ रागद्वेष से रहित…
(५३) अनंत ज्ञान का हा…

वैराग्य भक्ति खण्ड

(१) जागो जागो जागो चेतन…
(२) वीर जिनवर अपनी मुझको…
(३) क्या बन खोजा रे…
(४) भगवान आत्मा आनंद भंडार…
(५) बड़े भाव से हमको मिला…
(६) देख सब जग में वीर…
(७) तू बन जा वीर हे…
(८) तुझे बेटा कहाँ कि वीर…
(९) करुणा सागर भगवान…
(१०) जिया कर…
(११) देखा देखा प्यारा…
(१२) हे अविचल पथ लो…
(१३) भावना के फूल…
(१४) भूल है तू स्वयं…
(१५) भूलकर अपना पर…
(१६) मैं क्या माँगू भगवान…
(१७) सुख शांति है, दुख आदि है…
(१८) वीर प्रभु का है कहना…
(१९) कर रे जिया…
(२०) पाना नहीं जीवन को…
(२१) मोहे भवे न भैया…
(२२) ओ जा रे चेतन जाग…
(२३) सुख शांति में विमल गयी…
(२४) अज्ञानता का नाश कर…
(२५) देव तेरी पर्याय को हरपल…
(२६) वीर प्रभु के ये बोल…
(२७) करले आत्म ज्ञान…
(२८) आत्मा हूँ आत्मा हूँ…
(२९) सत्य साधु वन्दे…
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(३०) तू जाग रे चेतन प्राणी…
(३१) देखे तो दिखाई दे, है…
(३२) प्रेम जब अनन्त हो गया…
(३३) उठ रे तूफानी आँध…
(३४) चेतन तू है…
(३५) चेतन तू है…
(३६) तू ही शुद्ध है…
(३७) ज्ञान सम्यक् मेरा हो गया…
(३८) तू घर से जिन्दगी जीना…
(३९) आज मेरी जो कही है बात…
(४०) अज्ञानी ज्ञान तुझे…
(४१) कभी भूल नहीं जाना…
(४२) चेतो चेतन निज में आओ…
(४३) मोह को महिमा देखी…
(४४) वीतराग का मोहक शासन…
(४५) अज्ञान का मोह विडम्बना…
(४६) भ्रम शुद्धातम हो सब…
(४७) ममता की तलवार न तोड़ी…
(४८) तू जाग रे चेतन प्राणी…
(४९) मेरा गाँव है शिखर भी…
(५०) राग का भी मित्र…
(५१) जीवन है पानी की बूंद…
(५२) तीन भुवन के स्वामी…
(५३) जब आत्मा अनुभव भये…

मंगलार्थी भक्ति खण्ड

(१) अध्यात्म अनंता छोड़ा…
(२) न राग न द्वेष…
(३) जब से मैं आत्म…
(४) मेरे गुरुदेव को है प्यारा…
(५) आत्मा मेरी है आत्मा…
(६) धर्म सदा मंगल होय सम्यक्त्व…
(७) आत्म चिंतन का…
(८) शुद्ध स्व का किया ध्यान…
(९) हे तीन भुवन के स्वामी…
(१०) आत्मा मेरी अचिंत्य अमरिया…
(११) शुद्धातम की धुन…
(१२) पिया जाये आत्म का…
(१३) निजातम प्यासीया…
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(१४) संसार भव मायारिया…
(१५) मंगलमय हो मंगलकारी…
(१६) भजो भजो आये ये सारा जमाना…
(१७) ये ये प्रभु है हमारा…
(१८) हे मेरी बगिया में…
(१९) जिनवाणी माता रे…
(२०) मुझे मिल गया सम्यक्…
(२१) मन मोहक छबी प्यारी…
(२२) वीर जिनेश्वर…
(२३) हम सब जावक है…
(२४) बाहुबली, जय बाहुबली…

विशिष्ट भक्ति खण्ड

पूज्य गुरुदेव भक्ति

(१) शांति सुधा बरसा गये…
(२) गुरुदेव आए रे…

डालगीत खण्ड

(१) आत्मा हमारा ही है…
(२) आत्मा मुझे तेरी याद…
(३) चेतन का प्यारा बच्चा…

सोमावाला/छज्जाखेड़ा भक्ति खण्ड

(१) यह धर्म है आत्म ज्ञानी का…
(२) बेचारिया करिया…
(३) मोक्षालय अब मंगलकारी…
(४) मेरा मन…
(५) अपना ही रहूँ मोहि…
(६) धन्य धन्य अब घड़ी…
(७) लहर-लहर लहराये…
(८) शासन भद्र लहराये…
(९) बड़े नगर में झण्डा लहरा…
(१०) जिनवाणी की मधुरता पर…
(११) श्री जिनवर की दिव्य देशना…

अन्य भक्ति खण्ड

(१) तत्व-बिन्दु…
(२) श्री पार्श्वनाथ स्तुति…
(३) श्री बाहुबली स्तुति…
(४) जब एक रात अनमोल है…
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वीतरागता के लक्ष्यपूर्वक भगवान की भक्ति

चेतन, जड़ नहीं होता और जड़, चेतन नहीं होता। जड़ के स्वभाव में चेतनपना नहीं होता और चेतन के स्वभाव में जड़पना नहीं होता। जड़ के संयोग से होनेवाला विकार भी वस्तुतः चेतन का स्वभाव नहीं है। जैसे, सर्वज्ञदेव वीतराग बिम्ब है, वैसा ही आत्मा का स्वभाव है – ऐसे तत्त्वसहित वीतराग भगवान की भक्ति इत्यादि का राग आवे, वह प्रातःकाल की सन्ध्या / लालिमा जैसा है। जिस प्रकार प्रातःकाल की सन्ध्या / लालिमा के पश्चात् सूर्योदय होता है और सायंकाल की सन्ध्या / लालिमा के पश्चात् सूर्यास्त हो जाता है; उसी प्रकार वीतरागता के लक्ष्यपूर्वक भगवान की भक्ति इत्यादि का जो शुभराग है, वह प्रातःकालीन लालिमा के समान है; तत्पश्चात् जगमगाता चैतन्य सूर्य उदय होनेवाला है।
जिसे वीतरागता का लक्ष्य नहीं है, वीतरागदेव की भक्ति नहीं है और मात्र शरीरादि जड़ के राग का ही पोषण करता है, उसे तो उस लालिमा के पश्चात् अन्धकार आवेगा, उससे चैतन्यसूर्य ढँक जायेगा।
यहाँ स्वभाव का लक्ष्य है, वहाँ वर्तमान राग की लालिमा की मुख्यता नहीं है, अपितु यह राग मेरा स्वरूप नहीं है; इस प्रकार वीतरागस्वरूप के लक्ष्य से वह राग मिटकर चैतन्य प्रकाश प्रगट होगा और पूर्ण केवलज्ञान होगा।
(– पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी, सोनगढ़ प्रतिष्ठा महोत्सव के प्रवचनों से)

मङ्गल भक्ति सुमन

मङ्गलाचरण

महावीरष्टक (पद्यानुवाद)

जिनके चेतन में दर्पणवत् सभी चेतनाचेतन भाव।
युगपत् झलकें अंत-रहित ही ध्रुव-उत्पाद-व्ययात्मक भाव॥
जगमगाशी शिवमणि-प्रकाशक जो हैं मानों सूर्य-समान।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥१॥
जिनके लोचनकमल लालिमा-रहित और चंचला-हीन।
दर्शति हैं भव्यजनों को बाह्याभ्यंतर क्रोध-विहीन॥
जिनकी प्रतिमा प्रकट शांतिमय और अहो है विमल अपार।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥२॥
नमते देवों की पीक को मुकुट-मणि का प्रभासमूह।
जिनके दोनों चरण-कमल पर झलके देखो जीव-समूह॥
सांसारिक ज्वाला को हरने जिनका स्मरण बने जलधार।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥३॥
जिनके अर्चन के विचार से मेंढक भी जब हर्षितवान।
क्षणभर में बन गया देवता, गुणसमूह और सुकृतिनिधान॥
तब अचरज क्या, यदि पाते हैं सच्चे भक्त, मोक्ष का द्वार।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥४॥

तत्त्वस्वर्ग-सा तन है, फिर भी तनविरहित जो ज्ञानशरीरी।
एक रहे होकर विचित्र भी, सिद्धरथ राजा के वीर॥
होकर भी जो जन्मरहित हैं, श्रीमान् फिर भी न रागरिकार।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥५॥
जिनकी वाणीरूपी गङ्गा, नवलहरों से हीन-विकार।
विपुल ज्ञान-जल से जनता को करती है जग में स्नान॥
अहो आज भी इससे परिचित ज्ञानीरूपी हंस अपार।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥६॥
तीव्र वेग त्रिभुवन का जेता, काम-योद्धा बड़ा प्रबल।
वज्रकुमार में जिसने जीता, उसको केवल निज के बल॥
शाश्वत सुख शांति के राजा बनकर जो हो गये महान।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥७॥
महामोह-आतंक शमन को, जो हैं आकस्मिक उपचार।
निरपेक्ष बन्धु हैं जग में, जिनकी महिमा अपरम्पार॥
भवभय से डरते संतों को, शरण तथा वर गुण भण्डार।
वे तीर्थङ्कर महावीर प्रभु मम हिय पधारें नयनद्वार ॥८॥
(दोहा)
महावीरष्टक स्तोत्र को, ‘भाग’ भक्ति से कीन।
जो पढ़ ले एवं सुने, परमगति हो लीन॥

मंगलाचरण खण्ड

(१) श्री अरहन्त सदा मङ्गलमय…

श्री अरहन्त सदा मङ्गलमय मुक्तिमार्ग का करे प्रकाश,
मङ्गलमय श्री सिद्धप्रभु जी, निजस्वरूप में करे विलास;
शुद्धात्म के मङ्गलसाधक, साधु पुरुष को सदा शरण हो,
धन्य घड़ी वह धन्य दिवस, जब मङ्गलमय मङ्गलाचरण हो ॥१॥
मङ्गलमय चैतन्यवरों में परिणति को मङ्गलमय लय हो,
पुण्य-पाप की दुःखमय ज्वाला, निजआश्रय से त्वरित विलय हो;
देव-शास्त्र-गुरु को वंदन कर, मुक्ति वधू का त्वरित वरण हो,
धन्य घड़ी वह धन्य दिवस, जब मङ्गलमय मङ्गलाचरण हो ॥२॥
मङ्गलमय पाँवों कल्याणक मङ्गलमय जिनका जीवन है,
मङ्गलमय वाणी सुखकारी शाश्वत सुख को भव्य सदन है;
मङ्गलमय सतधर्म तीर्थ-कर्ता को मुझको सदा शरण हो,
धन्य घड़ी वह धन्य दिवस, जब मङ्गलमय मङ्गलाचरण हो ॥३॥
सम्यग्दर्शन ज्ञान-चरणमय मुक्तिमार्ग मङ्गलदायक है,
सर्व पापमल का क्षय करके, शाश्वत सुख का उत्पादक है;
मङ्गल गुण-पर्यायमयी चैतन्यराज की सदा शरण हो,
धन्य घड़ी वह धन्य दिवस, जब मङ्गलमय मङ्गलाचरण हो ॥४॥

मङ्गल भक्ति सुमन / 1

(२) जो मङ्गल चार जगत में…

जो मङ्गल चार जगत में है, हम गीत उन्हीं के गाते हैं,
मङ्गलमय श्री जिन-चरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥ टेक ॥
जहाँ राग-द्वेष की गन्ध नहीं, बस अपने ही से ही नाता है,
जहाँ दर्शन-ज्ञान-अनन्तवीर्य सुख का सागर लहराता है।
जो दोष अठारह रहित हुए हम मस्तक उन्हें नवाते हैं
मङ्गलमय श्री जिनचरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥१॥
जो द्रव्य-भाव-नोकर्म रहित नित सिद्धालय के वासी हैं,
आतम को प्रतिबिम्बित करते जो अजर-अमर अविनाशी हैं।
जो हम सबके आदर्श सदा, हम उनको ही नित ध्याते हैं,
मङ्गलमय श्री जिनचरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥२॥
जो परम दिगम्बर बनवासी गुरु रत्नत्रय के धारी हैं,
आरम्भ-परिग्रह के त्यागी जो निज चैतन्य विहारी हैं।
चलते-फिरते सिद्धों से गुरु-चरणों में शीश झुकाते हैं,
मङ्गलमय श्री जिनचरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥३॥
प्राणों से प्यारा धर्म हमें केवली भगवान का कहा हुआ,
चैतन्यराज की महिमामय यह वीतराग रस भरा हुआ।
इसको धारण करनेवाले भव-सागर से तिर जाते हैं,
मङ्गलमय श्री जिनचरणों में हम सादर शीश झुकाते हैं ॥४॥

मंगलाचरण खण्ड

(३) मन्त्र जपो णमोकार…

मन्त्र जपो णमोकार मनुवा, मन्त्र जपो णमोकार;
पञ्चप्रभु को वन्दन कर लो, परमेष्ठी सुखकार ॥ टेक ॥
अरहन्तों का दर्शन करके, शुद्धात्म का परिचय कर लो;
शिवसुख साधनहार, मनुवा, मन्त्र जपो णमोकार ॥१॥

मङ्गल भक्ति सुमन / 2

मंगलाचरण खण्ड

सब सिद्धों का ध्यान लगालो, सिद्ध समान स्वयं को ध्यालो;
मङ्गलमय सुखकार मनुवा, मन्त्र जपो णमोकार ॥२॥
आचार्यों को शीश नवाओ, निर्ग्रन्थों का पथ अपनाओ;
मुक्ति मार्ग आराध मनुवा, मन्त्र जपो णमोकार ॥३॥
उपाध्याय से शिक्षा लेकर, द्वादशाङ्ग को शीश नवाकर;
जिनवाणी डर धार मनुवा, मन्त्र जपो णमोकार ॥४॥
सर्व साधु को वन्दन कर लो, रत्नत्रय आराधन कर लो;
जन्म मरण क्षयकार मनुवा, मन्त्र जपो णमोकार ॥५॥

(४) मन्त्र णमोकार हमें प्राणों…

मन्त्र णमोकार हमें प्राणों से प्यारा
वही वो जहाज जिसने लाखों को तारा
मन्त्र णमोकार… ॥ टेक ॥
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।
एसो पंच णमोयारो, सव्वपावप्पणासणो
मंगलाणं च सव्वेसिं पढमं हवई मंगलं ॥
मन्त्र णमोकार… ॥१॥
अरहन्तों को नमन हमारे, अशुद्ध कर्म अरि हनन करे
सिद्धों के सुमिरण से आतम सिद्धक्षेत्र को गमन करे
भव भव में.. ओ.. नहीं भ्रमें दुबारा
मन्त्र णमोकार… ॥२॥
आचार्यों को आचार्य तक, निर्मल निज आचार्य धरे
उपाध्याय का ध्यान करें हम, संवर का सत्कार करें
सर्व साधु को… ओ… नमन हमारा
मन्त्र णमोकार… ॥३॥

मङ्गल भक्ति सुमन / 3

मंगलाचरण खण्ड

इस मन्त्र से नागनागिनी, पद्मावती धरणेन्द्र हुए;
सेठ सुदर्शन को सूली से, मुक्ति मिली राजेन्द्र हुए;
अंजन चोर का… औ… कष्ट निवारा,
मन्त्र णमोकार… ॥४॥

(५) पञ्च परम परमेष्ठी देखे…

पञ्च परम परमेष्ठी देखे, हृदय हर्षित होता है,
आनन्द उल्लसित होता है, हो… ऽऽऽ सम्यग्दर्शन होता है ॥ टेक ॥
दर्जा-ज्ञान-सुख वीर्यस्वरूपी, गुण अनन्त के धारी हैं,
जग को मुक्ति मार्ग बताते, निज चैतन्य विहारी हैं।
मोक्षमार्ग के नेता देखे, विश्व तत्व के ज्ञाता देखे। हृदय ॥१॥
द्रव्यभावनोकर्म रहित, जो सिद्धालय के वासी हैं,
आतम को प्रतिबिम्बित करते, अजर-अमर अविनाशी हैं।
शाश्वत सुख के भोगी देखे, योगरहित निजयोगी देखे। हृदय ॥२॥
साधु संघ के अनुशासक जो, धर्मतीर्थ के नायक हैं,
निज-पर के हितकारी गुरुवर, देव धर्म परिचायक हैं।
गुण छत्तीस सुपालक देखे, मुक्तिमार्ग संचालक देखे। हृदय ॥३॥
जिनवाणी को हृदयंगम कर, शुद्धातम रस पीते हैं,
द्वादशांग के धारक मुनिवर, ज्ञानानन्द में जीते हैं,
द्रव्यभाव श्रुत धारी देखे, बीस-पांच गुणधारी देखे। हृदय ॥४॥
निजस्वभाव साधनरत साधु, परम दिगम्बर वनवासी,
सहज शुद्ध चैतन्यजगन्मय, निजपरिणति के अभिलाषी।
चलते-फिरते सिद्ध प्रभु देखे, बीस-आठ गुणमय विभु देखे। हृदय ॥५॥
मङ्गल भक्ति सुमन / 4

मंगलाचरण खण्ड

(६) अरिहंत जय जय…

अरिहंत जय जय, सिद्ध प्रभु जय जय।
सर्व साधु जय जय, जिन धर्म जय जय॥
अरिहंत मङ्गल, सिद्ध प्रभु मङ्गल।
सर्व साधु मङ्गल, जिनधर्म मङ्गला॥१॥
अरिहंत उत्तम, सिद्ध प्रभु उत्तम।
सर्व साधु उत्तम, जिनधर्म उत्तमा॥२॥
अरिहंत शरणा, सिद्ध प्रभु शरणा।
सर्व साधु शरणा, जिनधर्म शरणा॥३॥

(७) ॐ आदिनाथाय नमः…

ॐ आदिनाथाय नमः ॐ आदिनाथाय नमः ॐ आदिनाथाय नमः
जप लो रे आदिश्वर नाम, मंगल होगे सारे काम॥टेक॥
प्रथम सूर्य है जैन धर्म के, बंधन तोड़े अष्ट कर्म के,
वंदन कर लो सुबह और शाम।
जप लो रे आदिश्वर नाम, मंगल होगे सारे काम॥१॥
महाभाग्य से नर तन पाया, प्यारे प्रभु को क्यूँ बिसराया,
सुमिरन करलो सुबह और शाम।
जप लो रे आदिश्वर नाम, मंगल होगे सारे काम॥२॥

(८) भावे भजो भावे…

भावे भजो भावे भजो जिनराया
चौबीस जिनवर पाया जी पाया… ॥टेक॥
ऋषभ अजित संभव अभिनंदन,
सुमति पद्म सुपार्श्व पद वंदन;
आतम में अपनापन करके मिथ्यातम को दूर भगाया।
जिनवर भजूँ आतम लखूँ, जिनराया ॥ चौबीस जिनवर… ॥१॥
मङ्गल भक्ति सुमन / 5

मंगलाचरण खण्ड

चन्द्र पद्म शीतल श्रेयांस, जिन,
वासुपूज्य अरहंत महा जिन;
वीतरागि परिणति प्रगटाकर निर्मोही का पथ अपनाया।
समकित लहैं चारित्र लहैं, जिनराया ॥ चौबीस जिनवर.. ॥२॥
विमल अनन्त धर्म जय उज्ज्वल,
शांति कुन्थु अर मल्लि मुनिमल;
शुक्लाध्यान की श्रेणी चढ़कर क्षण में केवलज्ञान उपाया।
आनन्द लहैं, कैवल्य लहैं, जिनराया ॥ चौबीस जिनवर.. ॥३॥
मुनिसुव्रत नमि नेमि पार्श्व प्रभु,
वर्धमान जिनराज महाविभु;
स्याद्वादमय दिव्यध्वनि से, जग को मुक्ति-मार्ग बताया।
ऐसा वरूँ तुम जैसा वरूँ, जिनराया ॥ चौबीस जिनवर.. ॥४॥

(९) ऐ आतम हे तुझको नमन…

ऐ आतम हे तुझको नमन, शुद्धातम हे तुझको नमन;
वीरवाणी का हम, जिनवाणी का हम।
सदा करते रहें चिन्तन, ऐ आतम ॥ टेक ॥
राग और द्वेष हममें भरा, और मिथ्यात्व से मन भरा;
मोह और मान में, आतम अज्ञान में, अपना जीवन अभी तक रहा,
अब हटाये सभी आवरण, और रहें धर्म पथ पर कदम ॥
वीरवाणी का हम… ॥१॥
आज जीवन हुआ दुःखरूपमय, ये तो संघर्ष का है समय;
हर तरफ भ्रान्ति है, हर तरफ क्रान्ति है, अपना जीवन बने शान्तिमय,
निज को निज से मिलायेंगे हम, ऐसे सिद्धपद को पायेंगे हम।
वीरवाणी का हम… ॥२॥
मङ्गल भक्ति सुमन / 6

मंगलाचरण खण्ड

ऐसे जिनवर प्रभु को नमन, आत्मा में श्रद्धा ही रमन,
चलि चलाई न ही, तुम मुक्तिश्री, जिनशासन की लेके शरण,
जिनवाणी को पढ़कर के हम, और सुधारेंगे अपना जनम।
वीरवाणी का हम… ॥३॥

(१०) मन के विकार नासो हे महावीर…

मन के विकार नासो हे महावीर देवा,
संसार ताप छूटे, बस एक चाह देवा ॥ टेक ॥
भव की भंवर में भ्रमते, तुम ही हो एक खेवा,
कब तक रुलाएगा भगवन्, देखा न तुमसा देवा ॥१॥
जग में तो देव सारे, हैं भव भ्रमण के मरे,
जो सेवा नाहिं चाहें, देवे स्वपद का मेवा ॥२॥
रागादि भाव शीतल, निज आत्म माहिं करके,
तुम ही हो इस भवौदधि में तारने को खेवा ॥३॥
तुमसा समान बनकर, हो शान्त आग मेरी,
होकर के वीतरागी, अरहन्त नाम देवा ॥४॥

(११) ज्ञान की ज्योति जलाते चलो…

ज्ञान की ज्योति जलाते चलो, निज अन्तर कि वीणा बजाते चलो ॥ टेक ॥
जीवन तो आना-जाना, इसका नहीं ठिकाना।
कल क्या होगा समय घड़ी पे, ये तो किसने जाना;
अपने मन को, जगाते चलो ॥ निज अन्तर ॥१॥
जीवन अच्छे से जीने का नाम है ईश्वर पूजा
सत्य अहिंसा प्रेम से बढ़के नहीं धर्म है दूजा;
इसको सीखोऽऽऽ सिखाते चलो ॥ निज अन्तर ॥२॥

मंगलाचरण खण्ड

खुद जीयो जीने दो सबको, यही धर्म का नारा,
साम्यभाव और विश्व शांति का फैलाओ डंफारा;
गीत धर्म के ही गाते चलो ॥ निज अन्तर ॥३॥
काम क्रोध, मद, राग-द्वेष की जंजीरों को तोड़ो,
यही देशना है सन्तों की बुरी आदतें छोड़ो;
अपना जीवनऽऽऽ फूल खिलाते चलो ॥ निज अन्तर ॥४॥

(१२) जिनवर सत्य है…

जिनवर सत्य है… जिनधर्म सत्य है… आत्म सत्य है…
आओऽऽऽ सब मिल जैनो मुक्ति का मार्ग है,
जैनं जयतु शासनम्, होऽऽ… १
जय-जय जैन धर्म आऽऽ… २
जैनं जयतु शासनम्… ॥ टेक ॥
आषाढ़ में ऽऽ आषाढ़ में आदिनाथ है, वीरा पावापुर में,
दया करी प्रभु है जगदीशवर, सब जायें शिवपुर में;
जिनवर शरण मङ्गल, जैनं जयतु शासनम् ॥१॥
एक सूत्र हैऽऽऽ एक देशना, एक ही सबको वाणी;
आतम हो परमातम जानो; जानो हे भविप्राणी,
जिनवर शरण मङ्गल, जैनं जयतु शासनम्… ॥२॥
धन्य भाग हैऽऽऽ धन्य जनम है, धन्य है पुण्य हमारा
धन्य-धन्य है माँ जिनवाणी, धन्य वो तारणहारा;
वन्दन उन्हें शत् नमन, जैनं जयतु शासनम्… ॥३॥

मंगलाचरण खण्ड

(१३) चौबीसी वन्दना…

जो अनादि से व्यक्ता नहीं था, त्रैकालिक ध्रुव ज्ञायक भाव;
वह युगादि में किया प्रकाशित, वन्दन ऋषभ जिनेश्वर राव ॥१॥
जिसने जीत लिया त्रिभुवन को, मोह शत्रु वह प्रबल महान;
उसे जीतकर शिवपद पाया, वन्दन अजितनाथ भगवान ॥२॥
कालहीन जिन सदा असम्भव, निज सन्मुखता का पुरुषार्थ;
निर्मल परिणति के स्वकाल में, सम्भव जिसने पाया अर्थ ॥३॥
त्रिभुवन जिनके चरणों का, अभिनन्दन करती तीनों काल;
वे स्वभाव का अभिनन्दन कर, पहुँचे शिवपुर में तत्काल ॥४॥
निज आश्रय से ही सुख होता, यही सुमति जिन बतलाते;
सुमतिनाथ प्रभु की पूजन कर, भव्यजीव शिवसुख पाते ॥५॥
पद्मप्रभु के पद पंकज की, सौरभ से सुरभित त्रिभुवन;
गुण अनन्त के सुमनों से शोभित, श्री जिनवर का उपवन ॥६॥
श्री सुपार्श्व के शुभ-सु-पार्श्व में, जिसकी परिणति करे विराम;
वे पाते हैं गुण अनन्त से, भूमित सिद्ध सदन अभिराम ॥७॥
चांद चन्द्रसम सदा सुशीतल, चेतन - चन्द्रप्रभ जिनराज;
गुण अनन्त की कला विभूषित, प्रभु ने पाया निजपद राज ॥८॥
पुष्पदन्त सम गुण आवर्धित से, सदा सुशोभित हैं भगवान;
मोक्षमार्ग की सुविधि बताकर, भविजन का करते कल्याण ॥९॥
चन्द्र किरण सम शीतल वचनों से, हरते जग का आताप;
स्याद्वादमय दिव्यध्वनि से, मोक्षमार्ग बतलाते आप ॥१०॥
त्रिभुवन के श्रेयस्कर हैं, श्रेयांसनाथ जिनवर गुणखान;
निज स्वभाव से पारस श्रेय का, केन्द्र बिन्दु कहते भगवान ॥११॥
शत इन्द्रों से पूजित जग में, वासुपूज्य जिनराज महान;
स्वाश्रित परिणति द्वारा पूजित, पूज्यतम भाव गुणों की खान ॥१२॥

मंगलाचरण खण्ड

निर्मल भावों से भूषित हैं, जिनवर विमलनाथ भगवान;
राग-द्वेष मल का क्षय करके, पाया सोक्ख अनंत महान ॥१॥
गुण अनन्तपति की महिमा से, मोहित है यह त्रिभुवन आज;
जिस अनन्त को वन्दन करके, पाऊँ शिवपुर का साम्राज्य ॥२॥
वस्तुस्वभाव धर्मधारक हैं, धर्म धुरन्धर नाथ महान;
ध्रुव को भूषिमय धर्म प्रगट कर, वंदित धर्मनाथ भगवान ॥३॥
रागरूप अङ्गोंरों द्वारा दहके, रहा जग को परिणाम;
किन्तु शान्तिमय निज परिणति से, शोभित शान्तिनाथ भगवान ॥४॥
कुन्थु आदि जीवों की भी, रक्षा का देते जो उपदेश;
स्व-चतुष्टय से सदा सुरक्षित, कुन्थुनाथ जिनवर परमेश ॥५॥
पञ्चेन्द्रिय विषयों से सुख को, अभिलाषा है जिनको अस्त;
धन्य-धन्य अरनाथ जिनेश्वर की, राग-द्वेष अरि किये परास्त ॥६॥
मोह-मल्ल पर विजय प्राप्त कर, जो हैं त्रिभुवन में विख्यात;
मल्लिनाथ जिन समवशरण में, सदा सुशोभित हैं दिन-रात ॥७॥
तीन कषाय चौकड़ी जयकर, मुनि-सु-व्रत के धारी हैं;
वन्दत जिनवर मुनिसुव्रत जो, भवविजन को हितकारी हैं ॥८॥
नमि जिनेश्वर ने निज में नमकर, पाया केवलज्ञान महान;
मन-वचन से करूँ नमन, सर्वज्ञ जिनेश्वर हैं गुणखान ॥९॥
धर्मधुरा के धारक जिनवर, धर्मतीर्थ रथ संचालक;
नेमिनाथ जिनराज वचन नित, भव्यजनों के हैं पालक ॥१०॥
जो शरणागत भव्यजनों को, कर लेते हैं आप समान;
ऐसे अनुपम अद्वितीय पारस, हैं पार्श्वनाथ भगवान ॥११॥
महावीर सम्मति के धारक, वीर और अतिवीर महान;
चरण-कमल का अभिनन्दन, है वन्दन वर्धमान भगवान ॥१२॥

(१४) मैं महापुण्य उदय से…

मैं महापुण्य उदय से जिनधर्म पा गया ॥
जिनधर्म पा गया जिनमन्दिर आ गया ॥ टेक ॥
चार घाति कर्म नाशे ऐसे अरहंत हैं।
अनन्त चतुष्टय धारी श्री भगवन्त हैं ॥
मैं अरहंतदेव की शरण आ गया ॥१॥
अष्टकर्म नाश किये ऐसे सिद्धदेव हैं।
अष्टगुण प्रगट जिनके हुए स्वयमेव हैं ॥
मैं ऐसे सिद्धदेव की शरण आ गया ॥२॥
वस्तु का स्वरूप बतावे वीतराग-वाणी है।
तीन लोक के जीव हेतु महाकल्याणी है ॥
मैं जिनवाणी माँ की शरण आ गया ॥३॥
परिग्रह रहित दिगम्बर मुनिराज हैं।
ज्ञान ध्यान सिवा नहीं दूजा कोई काज है ॥
मैं श्री मुनिराज की शरण पा गया ॥४॥

(१५) जय अरिहन्त…

जय अरिहन्त तुमही महान, जय श्री सिद्धा तुमही महान।
तुझ में हमें दिखाई देती, सहज सुखों की खान ॥ टेक ॥
तुम हो विगत सकल अभिलाषा, तुमने जन्म मरण है नाशा।
तुमसे दृष्टि मिलाये गर हम, निजपर का हो ज्ञान ॥
जय अरिहन्त… ॥१॥
मोक्ष मार्ग का तू परिचालक, द्रव्य भाव मय है इस लायक।
निज अनुभव के आश्रय से हम, पावें पद निर्वाण ॥
जय अरिहन्त… ॥२॥

(१६) मंगल अर्हन्त मंगल सिद्धा…

मंगल अर्हन्त मंगल सिद्धा,
मंगल साधु पद पा जाना;
मंगलमय जिनवाणी माता,
केवल्य कला को पा जाना ॥
मंगल अर्हन्त… ॥ टेक ॥
ये चारों मंगल उत्तम हैं,
मैं शरण इन्हीं की पा जाऊँ।
इनका ही मनन सुमिरन करके,
अपने शुद्धातम को ध्याऊँ।
अन्वेषण हो आराधन हो,
फिर नित्य निरंजन पा जाना।
मंगल अर्हन्त… ॥१॥
ये पञ्चकल्याणक सुयोग मिला,
निर्वाण भूमि पर आ जाना।
मंगल सुयोग महान मिले,
जिनवाणी का अमृत पाना।
मेरा महंगा नरभव सफल बने,
ऐसा कुछ गुरुवर बतलाना।
मंगल अर्हन्त… ॥२॥

(१९) निज आत्मा में देखो…

निज आत्मा में देखो, भगवान बस रहा है,
मङ्गलायतन में देखो, सोना बरस रहा है ॥टेक॥
तुझमें करम नहीं है, तुझमें नहीं कषायें,
अपनी ही भूल चेतन, भव-भव तुझे रुलाये।
तू आज तक भी चेतन, कुदन सा हो खरा है ॥१॥
भ्रान्ताप को मिटाने, निज में ही शक्ति क्षमता,
अनजाने में हुई थी, दुखदायी मोह ममता।
आया मुहूर्त मंगल, हर रोम जग गया है ॥२॥
भगवान आत्मा हूँ, गुरुदेव ने बताया,
पामर नहीं प्रभु हूँ - वैभव अमित दिखाया।
सिद्धों से कम नहीं हूँ - आगम भी कह रहा है ॥३॥
सब तीर्थों का राजा है, स्वर्णपुरी हमारा,
सर्वोच्च सीख पाने, गुरुदेव करे इशारा।
सिद्धायातन स्वयं हूँ, अनुभव ये कह रहा है ॥४॥

(१८) अहो चैतन्य आनंदमय…

तर्ज - (हे अपना दिल तो आवारा)
अहो चैतन्य आनंदमय, सहज जीवन हमारा है।
अनादि अनंत पर निरपेक्ष, ध्रुव जीवन हमारा है ॥टेक॥
हमारे में न कुछ पर का, हमारा भी नहीं पर में।
द्रव्य दृष्टि हुई सच्ची, आज प्रत्यक्ष निहारा है ॥१॥
अनंती शक्तियाँ उछले, सहज सुख ज्ञानमय विलसे।
अहो प्रभुता ! परम पावन, जीव का भी न पारा है ॥२॥

मङ्गलाचरण खण्ड

सहज ऐश्वर्यमय मुक्ति, अनलों गम्यमयी ऋद्धि।
विलसती नित्य ही सिद्धि, सहज जीवन हमारा है ॥३॥
किसी से कुछ नहीं लेना, किसी को कुछ नहीं देना।
अहो ! निश्चित परमानंद, मय जीवन हमारा है ॥४॥
ज्ञानमय लोक है मेरा, ज्ञान ही रूप है मेरा।
परम निर्दोष समतामय, ज्ञान जीवन हमारा है ॥५॥
मुक्ति में व्यक्त हैं जैसा, यहाँ अव्यक्त है वैसा।
अबद्धस्पृष्ट अनन्य, नियत जीवन हमारा है ॥६॥
सदा हो ही न होता है, न जिसमें कुछ भी होता है।
अहो उत्पाद व्यय निरपेक्ष, ध्रुव जीवन हमारा है ॥७॥
विनाशी बाह्य जीवन की, आज ममता तजी झूठी।
रहे चाहे अभी जाये, सहज जीवन हमारा है ॥८॥
नहीं परवाह अब जग की, नहीं है चाह शिवपद की।
अहो परिपूर्ण निश्पृष्ठ ज्ञान, मय जीवन हमारा है ॥९॥

(११) घड़ी-घड़ी पल-पल…

घड़ी-घड़ी पल-पल छिन-छिन निश-दिन,
प्रभुजी का सुमिरन कर ले रे ॥ टेक॥
प्रभु सुमिरनें पाप कटत है, जनम मरन दुख हर ले रे ॥ १ ॥
मनवचकाय लगाय चरन चित्त, ज्ञान हिये बिच धर ले रे ॥ २ ॥
‘दौलतराम’ धर्म नौका चढ़ि, भवसागरतें तिरले रे ॥ ३ ॥
मङ्गल भक्ति सुमन / 14

मङ्गलाचरण खण्ड

(२०) आम आगम गुरुवर…

तर्ज (थोड़ा सा प्यार हुआ है)
आम आगम गुरुवर सौख्य दातार है,
ज्ञानदातार है, मुक्ति दातार है ॥
वीतरागी छवि जिनकी, शांत मुद्रा सुपावन,
दिव्यध्वनि अमृतवर्षा, भविकाजन को मन भावन,
श्री अरिहंत दर्शन, करना भव पार है
आम आगम … ॥१॥
नित्य नव-नव सुखों का, सदा वेदन जो करते,
अष्ट गुणों से शोभित, अष्टम वसुधा में बसते,
तुम्हीं आदर्श मेरे, महिमा अपार है
आम आगम … ॥२॥
निश्पृही अपरिग्रही जो, सिद्धों के लघुचंदन है,
मोक्षमार्गी यतियों को, मेरा शत्-शत् वंदन है,
आप जिनशासन, के मूल आधार है
आम आगम … ॥३॥
आगम चक्षु से माता, निज की प्रभुता बताई,
सात तत्व छः द्रव्यों से, विश्व रचना समझाई,
सर्वज्ञ प्रभु सम माता, तेरा उपकार है
आम आगम … ॥४॥

(२१) अभिनंदन-वंदन होऽऽऽऽऽऽ

अभिनंदन-वंदन होऽऽऽऽऽऽ अभिनंदन-वंदन
तीर्थधाम मङ्गलायतन में, मंगल अभिवादन
अभिनंदन-वंदन… ॥ टेक ॥
उदयाचल से भानु जागे,
मोहनिद्राक्षण क्षण में भागे।
मङ्गल भक्ति सुमन / 15

मंगलाचरण खण्ड

जाग रहा चेतन, जाग रहा चेतन
अभिनंदन - वंदन … ॥१॥
अभिनव, नव कलरव ले उर में,
गाएँ पंछी मधुरिम स्वर में।
अवसर है पावन, अवसर है पावन
अभिनंदन - वंदन … ॥२॥
सुर तरुओं के पुष्प मनोहर,
दश दिशों में आच्छादित मनहर
महक रहे उपवन, महक रहे उपवन
अभिनंदन - वंदन … ॥३॥
निजकल्याण के हेतु कल्याणक,
बोधि लाभ हो पाएँ सम्यक
छूटे भव क्रंदन, छूटे भव क्रंदन
अभिनंदन - वंदन … ॥४॥

(२२) तेरी पूजा ओ…

तर्ज (तेरे सुर और मेरे गीत)

तेरी पूजा ओ मेरे ईश, निश दिन चरण में रहेगा ये शीश ॥ टेक ॥
वैराग्य मन में समाया हुआ
संसारगी से तू दूर जाता हुआ।
दुनियाँ के मन्दिर में लाखों हैं देव
अनादि से स्वामी मैं भटका हुआ।
निशदिन चरण में रहेगा ये शीश।
तेरी पूजा… ॥१॥
मङ्गल भक्ति सुमन / 16

मंगलाचरण खण्ड

पाऊँगा अब तेरे चरणों की धूल
जाएगा आत्मा में समकित की धूल।
श्रद्धा ज्ञान और चारित्र में
निशदिन रहूँगा मैं लवलीन।
अब मैं भी जागूँ हूँ ओ मेरे ईश
निशदिन चरण में रहेगा ये शीश।
तेरी पूजा… ॥२॥

(२३) ॐ मंगलम् …

ॐ मंगलम् - ओंकार मंगलम्
णमो मंगलम् - णमोकार मंगलम्
देव मंगलम् - जिनवाणी मंगलम्
वाणी मंगलम् - जिनगुरु मंगलम्
अरहंत मंगलम् - सिद्ध मंगलम्
साधु मंगलम् - सर्व साधु मंगलम्
कुन्द मंगलम् - कुन्दकुन्द मंगलम्
अमृत मंगलम् - अमृतचंद्र मंगलम्
समय मंगलम् - समयसार मंगलम्
नियम मंगलम् - नियमसार मंगलम्
आदि मंगलम् - महावीर मंगलम्
तीर्थ मंगलम् - तीर्थंकर मंगलम्
देव मंगलम् - देव-शास्त्र मंगलम्
गुरु मंगलम् - गुरुदेव मंगलम्
मङ्गल भक्ति सुमन / 17

मंगलाचरण खण्ड

(२४) देवों के देव श्री जिनदेव..

देवों के देव श्री जिनदेव! नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥ टेक ॥
महापुण्य से दर्शन पाया, भक्ति भाव उर में उमगाया।
स्वयमेव चरणों में झुकता है माथ। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥१॥
तुम ही जग में शरण सहारे, निरपेक्ष बांधव हो तुम ही हमारे।
अहो अहो! तुम ही हो सांचे तात। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥२॥
तुम से विमुख रह बहुदुःख उठाये, आत्म चिंतन सब सहज गमाये।
दर्शन से स्वामी हुए हम सनाथ। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥३॥
तत्त्वों का स्पष्ट ज्ञान हुआ है, निज पर भेद-विज्ञान हुआ है।
अनुभव में आया है चैतन्यनाथ। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥४॥
जग से उदासी हुई सुखकारी, दूर हुए दुर्भाव विकारी।
मन में बसी है छवि मुनिनाथ। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥५॥
वीतराग निर्दोष सर्वज्ञ तुम्ही हो, तीर्थ प्रणेता हितैषी तुम्ही हो।
संवस्मरण में न हो दिनरात। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥६॥
चतुर्निकाय के इन्द्र नमत है चक्रों नरेन्द्र मृगेन्द्र नमत है।
मुनीन्द्र गणीन्द्र नवावत है माथ। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥७॥
रत्नत्रयमार्ग प्रभु ने दिखाया, मोक्षार्थी भव्यो को अन्तर में भाया।
हो ऐसा बल ध्यायें हम निजनाथ। नाथों के नाथ श्री जिननाथ ॥८॥

(२५) णमोकार मंत्र को..

णमोकार मंत्र को प्रणाम हो, प्रणाम हो
ये अनादि महामंत्र मंगल निकाम हो…
पहला अरहंत नाम, करता है कर्म नाश - १,
जीवों को देता है, ज्ञान सूर्य का प्रकाश - २,
जय हो अरहंत देव तुम्ही धर्म ध्यान हो - १
ये अनादि महामंत्र मंगल निकाम हो…
मङ्गल भक्ति सुमन / 18

मंगलाचरण खण्ड

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स्रोत: Gyata संग्रह।

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