शंका: महावीर भगवान् के चतुर्विध संघ में मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ कितने थे? क्या आर्यिकाओं की संख्या मुनियों से अधिक थी?
कृपया ग्रंथों के प्रमाण सहित समाधान बताएँ। ![]()
शंका: महावीर भगवान् के चतुर्विध संघ में मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ कितने थे? क्या आर्यिकाओं की संख्या मुनियों से अधिक थी?
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समाधान (ग्रंथों के प्रमाण सहित)
सुव्वदणमिणेमीसुं कमसो पासम्मि वड्ढमाणम्मि।
तीसं वीसट्ठारस सोलसचोद्दससहस्साणि॥
(तिलोयपण्णत्ती 4/1097, पृष्ठ 287)
अर्थ: भगवान् सुव्रत, नमि, नेमि, पार्श्वनाथ और वर्धमान स्वामी के समय में क्रमशः तीस हजार, बीस हजार, अठारह हजार, सोलह हजार और चौदह हजार प्रमाण ऋषि थे।
विगुणियवीससहस्सा णेमिस्स कमेण पासवीराणं।
अडतीस छत्तीसं होंति सहस्साणि विरदीओ॥
(तिलोयपण्णत्ती 4/1176, पृष्ठ 298)
अर्थ: नेमिनाथ के तीर्थ में चालीस हजार, और क्रम से पार्श्वनाथ एवं वीर भगवान् के तीर्थ में अड़तीस तथा छत्तीस हजार आर्यिकाएँ थीं।
अर्थात् आर्यिकाएँ मुनियों से ढाई गुने से भी अधिक (36000 ÷ 14000 ≈ 2.6) थीं।
मग्गिणिजक्खिसुलोया चंदणणामाओ उसहपहुदीणं।
एदा पढमगणीओ एक्केक्का सव्वविरदीओ॥
(तिलोयपण्णत्ती 4/1180, पृष्ठ 298)
अर्थ: (अन्तिम चार तीर्थों में) मार्गिणी, यक्षिणी, सुलोका और चन्दना, ये एक एक आर्यिकाएँ ऋषभादिक के तीर्थ की आर्यिकाओं के समूह में मुख्य थीं।
एक्केक्कं चिय लक्खं कुंथुजिणिंदादिअट्ठतित्थेसुं।
(तिलोयपण्णत्ती 4/1182, पृष्ठ 299)
अर्थ: कुंथुनाथ आदि आठ तीर्थंकरों (कुंथुनाथ से वर्धमान तक) के तीर्थ में एक एक लाख श्रावक थे।
श्राविकाएँ 3 लाख (तिलोयपण्णत्ती 4/1183, जैनकोष तीर्थंकर सारणी के अनुसार)।
अन्य ग्रंथ: जैनकोष की तीर्थंकर सारणी के अनुसार हरिवंशपुराण 60/432 से 440 में महावीर भगवान् की आर्यिकाएँ 35000 दी हैं, अर्थात् ग्रंथों में संख्या में थोड़ा भेद है।
ग्रंथ: तिलोयपण्णत्ती (आचार्य यतिवृषभ), महाधिकार 4, भाग 1, हिन्दी अनुवाद पं. बालचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री, जैन संस्कृति संरक्षक संघ, शोलापुर, 1956। पृष्ठ संख्या इसी संस्करण की है।