मगन रहु रे! शुद्धातम में | Magan rahu re! Shudhatam me

मगन रहु रे! शुद्धातम में मगन रहु रे || टेक ||

राग दोष पर को उत्पात, निहचै शुद्ध चेतना जात |
विधि निषेध को खेद निवारि, आप - आप में आप निहारि || १ ||

बंध मोक्ष विकलप करि दूर, आनंद कन्द चिदातम सूर |
दरसन ज्ञान चरन समुदाय, ‘घानत’ ये ही मोक्ष उपाय || २ ||

Artist- पं. घानतराय जी

अर्थ

हे भव्य ! अपने शुद्ध आत्म-स्वभाव में, उसके स्वरूप चिन्तन में तुम मगन रहो। ये राग-द्वेष तो परद्रव्य के विकार हैं, उपद्रव हैं। निश्चय में तो तुम्हारी जाति चेतन ही है।

विधि निषेधको खेद निवारि, आप आपमें आप निहारि ॥ मगन. ॥ २ ॥

अपने आप में केवल अपने आत्म-स्वरूप का चिन्तन करो, उसे ही निरखो, देखो और जानो-पहचानो। भाव और अभाव का, पुण्य-पाप का अर्थात् कर्मों का नाशकर, समस्त दुःखों का निवारण कर।

बंध मोक्ष विकलप करि दूर, आनंदकन्द चिदातम सूर ।। मगन. ॥ ३ ॥

कर्मबंध और मोक्ष, दोनों का विकल्प छोड़ दो। तब सभी विकल्प से परे यह अपना चिदात्म आनन्द का पुंज, सूर्य के समान अनुभव में आएगा।

दरसन ज्ञान चरन समुदाय, ‘द्यानत’ ये ही मोक्ष उपाय ॥ मगन. ।। ४ ।।

द्यानतराय कहते हैं कि दर्शन, ज्ञान और चारित्र का सम्यक् होना और उनका एकत्व होना ही मोक्ष का उपाय है।

ए मेरे मन! तू राग भांवों को छोड़ दे, उनसे निवृत्ति पा ले। रांगरूपी चिकनाई के कारण अपार कर्मरूप धूलि के कण आकर जम जाते हैं।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 1।

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