हे भव्य ! अपने शुद्ध आत्म-स्वभाव में, उसके स्वरूप चिन्तन में तुम मगन रहो। ये राग-द्वेष तो परद्रव्य के विकार हैं, उपद्रव हैं। निश्चय में तो तुम्हारी जाति चेतन ही है।
विधि निषेधको खेद निवारि, आप आपमें आप निहारि ॥ मगन. ॥ २ ॥
अपने आप में केवल अपने आत्म-स्वरूप का चिन्तन करो, उसे ही निरखो, देखो और जानो-पहचानो। भाव और अभाव का, पुण्य-पाप का अर्थात् कर्मों का नाशकर, समस्त दुःखों का निवारण कर।