लौकिका - जैन स्वाध्याय सामग्री | Laukika

लौकिका

जैन चित्रकथा

जैन चित्रकथा आपके बच्चे को जैन संस्कृति से परिचित कराती है। इस पुस्तक की कथा संस्कृत सुकुमाल चरित्र पर आधारित है। अनेक विद्वानों की राय से यह कहानी प्रतीकात्मक है। आज इस बात की जरूरत है कि दुनिया के विकसित धर्मों में हमारे लिए जो आवश्यक बातें कही गयी हैं उन्हें हम समझें और अपने जीवन में उनपर चलने की कोशिश करें।

नई पीढ़ी को सही समझ और शिक्षा देने के लिए ऐसे विचार उनके समक्ष रखना जरूरी है, जिससे वे आदर्शों की तरफ प्रेरित हों और जिन्दगी का सही रास्ता उन्हें मिल सके कहानियाँ इस तरह रखी गयी हैं कि बच्चों को वे उपदेश नहीं जीवन से जुड़ी हुई मालूम हों और आसानी से समझ में आ जाये। मुझे आशा है कि बच्चों के माता-पिता भी इन कहानियों को दिल-चस्पी से पढ़ेंगे और अपने जीवन को समृद्ध करेंगे।

मुझे उम्मीद है कि इस प्रयास को पसन्द किया जावेगा इस पर अमल किया जावेगा और इसका प्रचार किया जावेगा। यह प्रथम प्रकाशन ‘तीन दिन में’ सुधी पाठकों के हाथों सौंप रहे हैं।

प्रकाशक: आचार्य धर्मश्रुत ग्रन्थमाला, जयपुर
सम्पादक: धर्मचंद शास्त्री
लेखक: डॉ. मूलचंद जैन, मुजफ्फर नगर
चित्रकार: बनसिंह, जयपुर

श्रीमति बसन्ती देवी, धर्मपत्नी स्व. श्री महावीर सहाय बैराठी, जयपुर के सौजन्य से

प्रकाशन वर्ष: १९९६ अंक: १ मूल्य १०.०० रु.

तीन दिन में

जब जागो तभी सवेरा। सुकुमाल-शरीर से अत्यन्त कोमल, पूरी आयु भोगों में व्यतीत हुई। जब आयु के तीन दिन शेष रहे तभी, अवसर मिला… शुभ वचन सुनेगी व मौन मुनिदीक्षा ग्रहण कर। और सब निर्मल पड़े आत्म-कल्याण के पथ पर। ध्यानस्थ हो गये। महान् उपसर्ग हुआ। ध्यानीके उनके शरीर का भक्षण करने लगी और वह आत्म चिन्तन में लीन। समाधि-पूर्वक प्राण त्याग किया और बन गये अष्टमभद्र स्वर्गी सिंह में।

इंसिये कहाँ तो सुकुमाल भोगों में मस्त और कहाँ कठिन तपश्चरण। सब कुछ सम्भव है, बस केवल दृष्टि बदलने की आवश्यकता है। बाह्य से अन्तर को और दृष्टि कीजिये और भीखसे काम कैसे नहीं बनता।

बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले। जो हमारी आपकी बीत गई, उसका विचार न कीजिये। बस आज ही लग जाइये आत्म-कल्याण में। अभी भी देर नहीं हुई है। सुकुमाल तो केवल तीन दिन में ही कहीं से कहीं पहुँच गये। जैन कथाओं में सुकुमाल मुनिका विशेष स्थान है। आइये इसे पढ़े और कुछ प्रेरणा ले इससे।

तीन दिन में

उज्जयिनी नगरी में धार्मिक व सुशील दमयंती नामक सेठ सेठानी रहते थे। उनके घर की विभूति-सोना, चांदी, कोठी बंगला, दास दासियों से वे सम्पन्न थे। एक ही अभाव था उनके जो उन्हें सदैव अशांत बनाये रहता था-उनके कोई पुत्र न था।

सेठानी एक दासी से हे सखी! यह ढोंडीवाला क्या कह रहा है?

दासी एक ढोंडी-नगरी में राजा सुबाहु ने ढोंडी पिटवाई है। सेठानी मैं अभी सुनी।

सेठानी नगरी के उद्यान में नव दिगम्बर जैन मुनिराज विराजमान पधारे हैं। उनसे पुत्रार्थ फलने के लिए राजा सुबाहु ने भी ढोंडी पिटवाई है।

नमोद्गान में

सेठानी हे महात्मन्! मैं बहुत दुखी हूँ। कृपया बतलाइये कि मेरे पुत्र होगा या नहीं?

मुनिराज भद्रे! तेरे पुत्र अवश्य होगा, और वह भी बड़ा भाग्यशाली, सुन्दर, गुणवान, जगत् में मान्य।

सेठानी मुनिराज से परन्तु…

मुनिराज परन्तु क्या महाराज?

मुनिराज पुत्र का सुख देखते ही तेरा पति संसार, शरीर, भोगों से विरक्त होकर मुनिराज में जाकर निर्ग्रन्थ मुनि दीक्षा ले लेगा। और तेरा पुत्र भी जब किसी मुनिराज के दर्शन करने जायेगा तब उनके दर्शन सुन लेगा उसी दिन वह भी घर गृहस्थी का त्याग कर देगा।

एक दिन

सेठानी यशोभद्रा गर्भवती हुई, परन्तु इस रहस्य को गुप्त ही रखा और बालक के जन्म भी भूमि-गृह में दिया ताकि सेठ को बालक के जन्म का पता न लग सके।

सेठानी दासी से हे दासी ये कपड़े तू किसके धो रही है?

दासी सेठानी से तुम्हें पता नहीं विपराज-सेठानी ने सुन्दर बालक को जन्म दिया है, मैं उसी के कपड़े धो रही हूँ!

सेठानी दासी से अहा! हा! कितना शुभ दिन है! चलो सेठ जी को पुत्रजन्म की बधाई दें और खूब इनाम पावें।

दासी सेठ से सेठजी! सेठजी! बधाई हो! आपके भाग्य जागे हैं। सेठानी जी को पुत्र का जन्म दिया है।

शुभ लाभ

सेठानी के महल में: सेठानी तू बड़ी भाग्य-
शाली है तेरे पुत्र हुआ है बधाई है तुझे। अच्छा
लड़का है।

अच्छा! यह बात है!
चलता। मैं बालक
का मुँह देखके
जो प्रसन्न
हूँ आपका
इनाम

महात्मन्! मुझे संसार से डर लगा
है। कृपया मुझे वह दीक्षा दीजिये
जिससे मुझे सच्चे सुख की प्राप्ति हो।

बाबा सुखकर होगा।
अब मेरा कल्याण हो।

सेठ राजकुमार
अब सेठ नहीं रहे।
वह अब दिगम्बर
साधु बन गये।

और उधर - सेठानी युगों बाद
पुत्र जन्मोत्सव मना रही है।

बालक का नाम
रखा गया सुकुमाल
बालक की देख
भाल सेठानी खुद
करती रहती है।

कितनी भाग्यशाली हूँ मैं। परन्तु मुझे
प्रसन्न अवश्य करना चाहिए कि मेरा
सुकुमाल किसी मुनिराज के दर्शन
न कर सके।

सेठानी ने एक बहुत सुन्दर ‘सर्वतोभद्र’
महल तैयार कराया उसके चारों ओर ३२
और महल बनवाये। और इन महलों के चारों ओर
दीवारों से सुरक्षित कर दिये।

इन महलों
में कोई
मुनि न
आने पाये।

जो आज्ञा!

सुकुमाल-बड़ा कोमल सा बच्चा-रहने
लगा। महलों में-बड़े आराम से दिन
बिताता है। सब सेवा होती है, सभी
कामना होती है।
अनेक प्रलोभ के शरीर की सुविधाके
सभी साधन वहां उपलब्ध थे जो

सुकुमाल, जवान हुआ… और…
आज मैं कितनी प्रसन्न हूँ! मेरा
सुकुमाल कितना सुन्दर है,
कितनी आकर्षक है ये मेरी
बहूएँ। अब इच्छा है, मेरा भाई
इनके मेल से मेरा सुकुमाल
मेरा लाडला सुकुमाल।

एक दिन…

राजन! मैं रत्नकम्बल का व्यापारी
हूँ-कृपया मुझे दीजिये और पहनवाइये
तो परीक्षा की कृपा कीजिये।
आपके ही लायक है यह
रत्नकम्बल

रत्न कम्बल तो बहुत
सुन्दर है परन्तु इसका
मूल्य चुकाना मेरे
बस की बात नहीं
है।

माताजी! आप की बहुत प्रशंसा सुनी है। आप के लिए रत्नकम्बल लाया है। इसे ओढ़ने से अवश्य प्रसन्न आयेंगी।

कम्बल है, इससे रत्नकम्बल का जवाब नहीं- बड़ा ही सुन्दर है! लो इसका मूल्य।

माँ! कम्बल तो बहुत सुन्दर है। परन्तु बहुत कम है। मैं इसे की भी वह चुगता है। मेरे मतलब का यह नहीं है तुम ही रखलो माँ ओ इसे

हे सुकुमाल! देख तेरे लिए कितना सुन्दर रत्नकम्बल अरोढ़ा है जैन- ले इसे काम में ले।

अच्छा करूँ इस रत्न कम्बल का। हाँ सचमुच में आगिया। क्यों न अभी 32 बहुओं की जूतियां बनवाऊँ इस रत्न कम्बल को

एक दिन सुकुमाल की एक स्त्री सुकुमाल रत्नकम्बल से बनी जूती पहन कर महल के ऊपर चली गई और जूती निकाल कर बैठ गई।

चोल जूती लेकर राजमहल की छत पर पहुँच गई! मांस समझ कर खाने लगी! जब खाई नहीं गई तो वहीं छोड़ कर उड़ गई।

है यह क्या? कितनी सुंदर है यह रत्न जूती। किसकी हो सकती है यह कौन इतना धनवान है? जिसकी स्त्री को यह मिले।

मंत्री जी पता लगाओ यह जूती किसकी है?

अच्छा राजन! बहुत जल्दी पता लगा कर आपको बतलाऊँगा।

कुछ दिन बाद…

राजन! पता चल गया है। यह जूती यहाँके नगरसेठ सुकुमाल की है। वह सुकुमाल की पत्नी की है।

कितना भाग्यशाली है यह सुकुमाल। मंत्री जी प्रतिदिन हमें भी उस पुण्यशाली के दर्शन कराओ। हमारी उससे मिलने की बड़ी इच्छा है।

आओने राजन आपका स्वागत है, कृपया यहाँ आसन पर विराजिये।

यहाँ भक्तों को जब सुकुमालजी कि राजा सुभलोक स्वयं उनके घर पर पधारे हैं तो उसने अपने स्वागत् को खूब तैयारी की।

संवाद

राजा कसिये राजन ! कैसे पधारना हुआ ?

सेठानी कुछ नहीं सेठानी ! हम तो केवल आपके पुत्र को देखने करने आये है।

राजा आओ बेटा, यहां बिराजी।

सेठानी यह बालक सुकुमाल स्थिर होकर क्यों नहीं बैठ पा रहा है ? इसकी आत्मा में पानी, क्यों भर रहा है ?

राजा राजा शुभोकर और सुकुमाल दोनों भोजन करने लगे।

सेठानी हे यह क्या ? सुकुमाल एक एक चावल चुन कर क्यों खा रहा है ?

सेठानी सेठानी जी ! आपने मेरा स्वागत किया, भोजन कराया- मैं आपका आभारी हूँ। आपके पुत्र से मिल कर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई परन्तु…

राजा परन्तु क्या ? राजन !

सेठानी सेठानी जी, ऐसा लगता है कि आपके पुत्र को कुछ रोग है, कृपया इनका इलाज अवश्य कराइयेगा।

राजा क्या रोग है मेरे पुत्र को ? जरा भी तो सुनो।

सेठानी मेरी दृष्टि में पहला रोग इस तरह है कि यह स्थिर आसन नहीं बैठ सकता है।

सेठानी राजन ! यह रोग नहीं ! मेरा बेटा बहुत सुकुमार है, सदैव अत्यन्त कोमल शय्या पर ही सोता है और वैसी ही गद्दी पर बैठता है। आज मैंने मृगल स्वरूप आपके ऊपर कुछ खरखरा डाली थी जिसके कुछ दाने इसके आसन पर भी गिर गये होंगे। वे इसे सरसो के दाने मालूम होता है इसके चुभ रहे है इसीलिए वह स्थिर होकर नहीं बैठ पा रहा है।

राजा अच्छा यह बात है ! यह तो बताइये कि आरती के समय इसकी आँखों में आँसू क्यों आये ?

सेठानी राजन ! आँसुओ के आसू आने का कारण बीमारी नहीं है। यह मेरा पुत्र सदैव रत्नों के प्रकाश में रहता आया है आज आपकी आरती धूप दीपों की है। धूप दीप का प्रकाश इसकी आँखे सहन नहीं कर पाई इसलिए आँसुओ से पानी बहने लगा।

राजा सेठानी जी एक शंका मेरी और है। जब हम भोजन कर रहे थे तो उसने एक एक चावल चुन कर क्यों खाया ?

सेठानी रात्रि में चावलों को कमल की कली में रख दिया जाता है। प्रातः जब वह चावल सुगन्धित व कोमल हो जाते है तब उन्हें पकाकर सुकुमाल को खिलाया जाता है। आज आपके आने के कारण कुछ साधारण चावल उन चावलों में मिल गये थे, अतः वह कोमल चावलों को ही चुन चुन कर खा रहा था।

संवाद

राजा क्या सुख? बाद में सुकुमाल। कमाल है मेरी कोमलता का। उन्हें सुकुमाल मैंने कभी नहीं देखा।

अचला राजन! वह तुच्छ भेंट स्वीकार कीजियेगा। आपके परिवार का बहुत बहुत धन्यवाद। फिर भी कभी पधारकर इस कुटिया को पवित्र करने की कृपा कीजियेगा।

कथा

चातुर्मास ग्रहण करने का दिन - पहुँचते ही सुकुमाल के महल के पास बगीचे में बैठे मुनिराज यशोभद्र की माता यशोभद्रा जो मुनि हो गये थे और जिन्होंने अपने ज्ञान से जान लिया था कि सुकुमाल की आयु बहुत थोड़ी रह गई है, बात किसी प्रकार उनकी कल्याण मार्ग में लगाना ही चाहिए।

संवाद

यशोभद्रा हाय विधाता! अब क्या करूँ?

यशोभद्रा सेठानियों! गजब हो गया। एक नया साधु जिन मंदिर में आकर बैठ गया है, क्या करूँ अब उन्हें के से निकालूँ?

कथा

और सेठानियाँ पहुँच गई मुनिराज यशोभद्र के पास।

संवाद

यशोभद्रा महाराज! मैं किस मुँह से कहूँ। मेरा एक पुत्र है यदि आपने आपके वचन सुन लिए, आपके दर्शन कर लिए तो वह तपस्वी बन जायेगा। मैं कहीं की नहीं रहूँगी। मुझे कितना क्लेश होगा सोच भी नहीं सकती। शायद उस आत्मध्यान में मेरी मृत्यु ही न हो जाये। अतः आप कृपा करके यहाँ से चले जाइये और कहीं जाकर ठहर जाइये।

यशोभद्र भद्रे! हमने यहाँ चातुर्मास योग धारण कर लिया है। अब हम यहाँ से अन्यत्र नहीं जा सकते।

कथा

चातुर्मास पूर्ण होने का दिन - कार्तिक कृष्ण अमावस्या - चौथे प्रहर का समय मुनिराज यशोभद्र में ज्ञानोपयोगिक अवधि सुकुमाल निद्रा से जाग गया है। उसे बोधते हुए वह जोर जोर से पाठ करने लगे।

अधोलोक, मध्यलोक व उर्ध्वलोक में कहीं भी तो सुख नहीं है। नरकों के दुखों को सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी की असह्य वेदना यह वहाँ सहनाई निरर्थक तथा मनुष्यगति के दुःख तो सर्व विदित ही हैं। और स्वर्गों में भी अगर मानसिक वेदना। देखो: अच्छी स्त्रियों के पट्टराणुका विमान में पट्टनाभ देव की विस्मृति का क्या ठिकाना था। इतनी विस्मृति से भी उसे लाभ नहीं मिली।

कथा

सुकुमाल ने भी यशोभद्र के वचन सुने और उन्हें ज्ञान स्मरण हो गया - विचारने लगे…

मैं ही न था पट्टनाभ देव। जब वहाँ के भोगों से भी मेरा मन नहीं था तो भोगों से तो कुछ भी नहीं है। मुझे तो मुनि होना। मैं अपना उपकार हूँ, पराधीन हूँ।

संवाद

सुकुमाल ज्यों ज्यों संयोग मनोरम मन वांछित जन पावे।
त्यों त्यों विस्मृति टले, लहर जहर की आवे।।
शरीर जिसका हो, नाश ऐसा है, अब भूख, प्यास, ठंड, भास
है। अनित्य, अशुचि, दुःख, दुःख ऐसा शरीर में कितनी लोग
करना सुखना नहीं तो क्या है। शरीर में इतनी दुःख है।
जो संसार विष सुख होता, मोहकर जन त्यागे। काहे को मिथ्याज्ञान करने
संयम से अनुरागे। अब मैं अपना क्या हूँ, अपना कल्याण करने
वाला हूँ।

कथा

देखो निकलूँ मैं इस महल से? सब द्वार बंद है, द्वार पर पहरा है
कहीं से भी निकलना नहीं जा सकता। अरे! दिशा यह
जो खिड़की में रस्सी की श्रृंखला या सकला में उतरने कैसे
संभव तो यह है। समय में आया। किसी अपनी परिचर्याओं
सहेलियों को आपस में बांधकर एक रस्सी सी बना
लूँ और उसका खिड़की से बांधकर नीचे
खिड़की का, उसके सहारे सहारे
नीचे उतर जाऊँ।

बस काम बन गया।

मुनि यशोधर के चरणों में

और सुकुमाल पहुँचाया

सुकुमाल
भद्रे! तूने बहुत सुंदर विचार किया…

सुकुमाल
…और हाँ, मेरी आयु भी अब केवल तीन दिन की बाकी है।

मुनि यशोधर
महात्मन्! मैं आज्ञा हूँ, आपके चरणों से। मोक्ष में पहुँचा हुआ आत्मा को। अब आज्ञा गया है। अपने का परिवर्तन गया है। संसार, भवचक्र, मोक्ष, निर्जलाद, पीड़ाने वाले हैं। मुझे। कृपया दे दीजिये न मुझे भी मुक्ति दीक्षा ताकि मैं भी अपना कल्याण कर सकूँ।

सुकुमाल ने त्याग कर दिया सब ही प्रकार के परिग्रह का ४० प्रकार का बहिर्भूत परिग्रह, और १४ प्रकार का अंतरंग परिग्रह।

नग्न दिगम्बर मुनि बन गये और यह सब दूसरे जंगल को, और प्रायश्चित्त संन्यास धारण करके निश्चल खड़े हो गये।

और महलों में

दासी
हे यह क्या? हमारे पोत कहाँ चले गये? आओ उन्हें ढूँढे।

दासी
सालाजी! सालाजी! रात्रि में हमारे पति सुकुमाल न जाने कहाँ चले गये। (मुझे ही नहीं चमक)

दासी
सा! … सुकुमाल…

चेत होने पर…

रानी
कहाँ गया मेरा पुत्र, मेरा सुकुमाल… कितना सुकुमाल है मेरे मुँह क्या बात नहीं… होगी तुम… पर…

रानी
है। यह क्या, यह साड़ियों की रस्सी इस खिड़की से… क्यों बंधी है। इसकी। अवश्य ही मेरा लाडला इन्हीं साड़ियों से बनी रस्सी से नीचे उतरा होगा।

रानी
होने हो मेरा बेटा मुनभवो मुँह के पास ही गया होगा। चलो। हाँ। चलकर उसे ढूँढे।

रानी
नहीं तो नहीं है मेरा सुकुमाल और यह महाराजा धर्मदत्त।

चित्र कथा

खूब खोज की गई सुकुमाल की- पर वह नहीं
मिले… नहीं मिले, सब्र करके सब बैठ गये।

और उधर जंगल में- घोर तपस्या में
लीन खड़े हैं मुनिराज सुकुमाल
ध्यानस्थ

अहा! हा!
कितना मीठा खून है
जिसका स्वाद मुझे
मिल रहा है यह

हे! यह कौन है! ओह याद आया!
किसी पिछले जन्म में मैं इसकी
भाभी थी। मैं अविमुक्त ब्राह्मण की
स्त्री सोमदत्ता थी और यह
मेरा देवर वायुभूति था।
एक दिन…

इस मेरे देवर
वायुभूति ने क्रोध
में आकर
मुझे लात
मारी थी।
तब मैं
तड़प उठी
थी। निश्चयकर
लिया था कि आज
न सही, कभीनकभी
इसका बदला
अवश्य लूँगी और
इसके इसी पैर का
माँस खाऊँगी और खून पीऊँगी।
आज मौका है, बदला अपना
चुकाना।

जिस शरीर को यह स्याल्नी खा रही है, वह मैं
हूँ ही नहीं। मैं इस शरीर से बिल्कुल भिन्न हूँ।
मैं आत्मा हूँ, यह शरीर अचेतन है। मैं तो ज्ञान
दर्शनोपयोगी, चैतन्यपिंड, एक आत्मा मात्र हूँ।
शरीर के साथ होने पर भी मेरा कुछ नहीं।
मैं तो अगर अमर हूँ, फिर क्यों मैं खेद करूँ।
क्यों अपने स्वरूप से डिगूँ। शरीर को स्याल्नी खा
रहा है तो मुझे तो नहीं। शरीर नष्ट होगा तो मैं नहीं।
बस अपने में ही रहूँ। इसी में मेरा हित है।

और बढ़ गई ध्यानस्थ मुनि की और और
स्याल लगी उनका दायां पैर और उसकी बच्ची
लगी उनके बायें पैर को खाने

प्रथम दिन

दूसरे दिन

इन विचारों तथा अन्य ऐसे ही
विचारों के (१२ भावनाएँ) आदि
के चिन्तन के बल पर इस
महान् उपसर्ग में भी वह
विचलित नहीं हुए और
उन वेदना के चिन्ता न
किये हुए अपने आत्म
ध्यान में ही लीन रहे।
स्याल्नी अपना कर्म कर
रही है और मुनिराज
अपना।

तीसरे दिन

काव्य

अहा! हा। मैं कहाँ अभागा।
सर्वार्थसिद्धि में… या हा! बस आनन्द ही आनन्द है किसी
प्रकार का दुःख नहीं। ३३ सागर की आयु। तैंतीस हजार वर्ष पश्चात्
मुख तभी कण्ठ से अमृत झरना और भूख का न होना। १६३ माह में एक मात्र
श्वास लेना क्या कष्ट है मुझे और यह सब क्यों मिलेगा मुझे, पूर्व
जन्म में तप जो किया था। बस यही तो मनुष्य भव
और उसी भव से मोक्ष। अहा हा।

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लोकप्रिय प्रकाशन

जैन साहित्य प्रकाशन में एक नए युग का प्रारम्भ

आचार्य धर्म श्रुत ग्रन्थ माला से प्रकाशित
आधुनिक साहित्य

१. साधना और सिद्धि - १००/-
२. ज्ञान विज्ञान - २०/-
३. मंत्र महाविज्ञान - ६०/-
४. ज्योतिष विज्ञान - ६०/-
५. कर विज्ञान - ३०/-
६. साधु परिचय - ५०/-
७. वराग चरित्र - ५०/-
८. बोलती माटी - २५०/-
९. आखन देखी आत्मा - ६०/-
१०. जैन रामायण सचित्र - २५/-
११. भक्तामर सचित्र हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती - ५००/-
१२. जैन चित्र कथाएँ प्रति अंक - १५/-
१३. सुनो सुनाएँ सत्य कथाएँ प्रति अंक - २०/-
१४. आओ बच्चों गाये गीत, सचित्र - ५०/-

प्राप्ति स्थान : जैन मंदिर गुलाब वाटिका लोनी रोड, दिल्ली
फोन ०५७६२-६६०७४


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 181.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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