क्या यही दीपावली है? पटाखों पर लघु दीपावली नाटिका | Kya Yahi Deepawali Hai? Short Deepawali Natika on Firecrackers

क्या यही दीपावली है?

रचना (जैसी छपी है): श्रीमती प्रीति जैन एवं एस. प्रेमा स्वरूपा, जयपुर

आयु: बच्चों और परिवार के मंचन योग्य, सरल लघु नाटिका।

सारांश

दीपावली की रात चार छोटे दृश्यों में एक ही प्रश्न उठता है: क्या शोर और धुआँ ही दीपावली है? छुटकी अपने भैया गोलू से कहती है कि पटाखों से उसे डर लगता है और बेजुबान पक्षियों के घर जल जाते हैं, पर गोलू उसे छोटी कहकर डाँट देता है। दादी शोर और जहरीले धुएँ से परेशान हैं और पोते को समझाती हैं, पर पोता बात काटकर पटाखे लेकर भाग जाता है। माता पिता रेखा और सुशील मानते हैं कि गलती उन्हीं की है, क्योंकि बच्चे वही करते हैं जो बड़ों को करते देखते हैं। अंत में तीन पक्षी धुएँ, शोर और अपनी ओर आते राकेट से बचते हुए मनुष्य के स्वार्थ पर दुख प्रकट करते हैं।

“बेटा, स्वयं की मौज मस्ती के लिए दूसरों के हृदय में पीड़ा और कष्ट उत्पन्न करना किसी त्योहार का आधार नहीं है।” (दादी)

स्वर के बारे में: यह पारिवारिक नाटिका है; इसमें “हे भगवान!” जैसे सामान्य उद्गार भी हैं।

पात्र

छुटकी, गोलू
दादी, पोता
रेखा, सुशील
पहला पक्षी, दूसरा पक्षी, तीसरा पक्षी

स्रोत

“जैन नाटक” स्कैन संग्रह (४९ पृष्ठ), पृष्ठ १२ और १३: Telegram: View @jainegranth (जैन ग्रन्थ ई लाइब्रेरी टेलीग्राम समूह)। स्कैन में नाटिका पक्षियों के दृश्य पर रुकती है; आगे का भाग, यदि कोई हो, स्कैन में नहीं मिला।

स्कैन में प्रकाशक का नाम नहीं है। संग्रह दिगम्बर परम्परा का है: इसी संग्रह में “कुन्दकुन्द का वैराग्य” नाटक (पृष्ठ २३), “अहो धन्य है दिगम्बर जैनधर्म!” (पृष्ठ ४९), और पृष्ठ १७ पर “मुनि / आर्यिका बनने के लिए” वाला प्रश्न है।

पृष्ठ १३ के ऊपर एक दूसरी कतरन का नाम भी चिपका है; वह इसी नाटिका का है या नहीं, स्पष्ट नहीं, इसलिए श्रेय में नहीं जोड़ा।

इसी विषय पर

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