क्या सभी तीर्थंकरों का समवसरण एक जितना बड़ा होता है? | Kya Sabhi Tirthankaron Ka Samavsaran Ek Jitna Bada Hota Hai

शंका: क्या हर तीर्थंकर का समवसरण एक जितना बड़ा होता है? ऋषभदेव और महावीर भगवान् के समवसरण का विस्तार कितना था?

और विदेह क्षेत्र में विराजमान तीर्थंकरों का समवसरण कितना बड़ा होता है?

कृपया ग्रंथों के प्रमाण सहित समाधान बताएँ। :folded_hands:

समाधान (ग्रंथों के प्रमाण सहित)


१. ऋषभदेव का समवसरण: 12 योजन

रविमंडल व्व वट्टा सयला वि य खंधइंदणीलमई।
सामण्णखिदी बारस जोयणमेत्तं मि उसहस्स॥
(तिलोयपण्णत्ती 4/716, पृष्ठ 232)

अर्थ: भगवान् ऋषभदेव के समवसरण की सम्पूर्ण सामान्य भूमि सूर्यमण्डल के सदृश गोल, इन्द्रनीलमणिमयी और बारह योजन प्रमाण विस्तार से युक्त थी।


२. फिर क्रम से घटता हुआ, महावीर भगवान् का 1 योजन

तत्तो बेकोसूणो पत्तेक्कं णेमिणाहपज्जंतं।
चउभागेण विरहिदा पासस्स य वड्ढमाणस्स॥
(तिलोयपण्णत्ती 4/717, पृष्ठ 232)

अर्थ: इसके आगे नेमिनाथ पर्यन्त प्रत्येक तीर्थंकर के समवसरण की सामान्य भूमि दो कोस (आधा योजन) कम, और पार्श्वनाथ एवं वर्धमान तीर्थंकर की योजन के चतुर्थ भाग से कम थी।

इस क्रम से अजितनाथ का 11½ योजन, नेमिनाथ का 1½ योजन, पार्श्वनाथ का 1¼ योजन और वर्धमान भगवान् का 1 योजन होता है (जैनकोष, समवशरण सारणी में भी यही)।


३. उत्सर्पिणी और विदेह क्षेत्र

अवसप्पिणिए एदं भणिदं उस्सप्पिणीए विवरीदं।
बारसजोयणमेत्ता सा सयलविदेहकत्ताणं॥
(तिलोयपण्णत्ती 4/718, पृष्ठ 233)

अर्थ: यह सामान्य भूमि का प्रमाण अवसर्पिणी काल का है। उत्सर्पिणी काल में इससे विपरीत है। विदेह क्षेत्र के सम्पूर्ण तीर्थंकरों के समवसरण की भूमि बारह योजन प्रमाण ही रहती है।


ग्रंथ: तिलोयपण्णत्ती (आचार्य यतिवृषभ), महाधिकार 4, भाग 1, हिन्दी अनुवाद पं. बालचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री, जैन संस्कृति संरक्षक संघ, शोलापुर, 1956। पृष्ठ संख्या इसी संस्करण की है।