शंका: समवसरण में तो सभी जीव भगवान् की दिव्यध्वनि सुनने आते हैं। तो क्या मिथ्यादृष्टि, अभव्य और असंज्ञी जीव भी बारह सभाओं (कोठों) में बैठ सकते हैं?
कृपया ग्रंथों के प्रमाण सहित समाधान बताएँ। ![]()
शंका: समवसरण में तो सभी जीव भगवान् की दिव्यध्वनि सुनने आते हैं। तो क्या मिथ्यादृष्टि, अभव्य और असंज्ञी जीव भी बारह सभाओं (कोठों) में बैठ सकते हैं?
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समाधान (ग्रंथों के प्रमाण सहित)
मिच्छाइट्ठिअभव्वा तेसुमसण्णी ण होंति कइआइं।
तह य अणज्झवसाया संदिद्धा विविहविवरीदा॥
(तिलोयपण्णत्ती 4/932, पृष्ठ 266)
अर्थ: इन (बारह) कोठों में मिथ्यादृष्टि, अभव्य और असंज्ञी जीव कदापि नहीं होते, तथा अनध्यवसाय से युक्त, सन्देह से संयुक्त और विविध प्रकार की विपरीतताओं से सहित जीव भी नहीं होते हैं।
भव्यकूटाख्यया स्तूपा भास्वत्कूटास्ततोऽपरे।
यानभव्या न पश्यंति प्रभावांधीकृतेक्षणाः॥
(हरिवंशपुराण 57/104, जैनकोष “समवशरण” पृष्ठ से)
अर्थ: उनके आगे देदीप्यमान शिखरों से युक्त भव्यकूट नाम के स्तूप रहते हैं, जिन्हें अभव्य जीव नहीं देख पाते, क्योंकि उनके प्रभाव से उनके नेत्र अंधे हो जाते हैं।
ध्यान दें: तिलोयपण्णत्ती की गाथा बारह कोठों (सभाओं) के बारे में है। हरिवंशपुराण का श्लोक भव्यकूट स्तूपों के बारे में है।
ग्रंथ: तिलोयपण्णत्ती (आचार्य यतिवृषभ), महाधिकार 4, भाग 1, हिन्दी अनुवाद पं. बालचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री, जैन संस्कृति संरक्षक संघ, शोलापुर, 1956। पृष्ठ संख्या इसी संस्करण की है।
हरिवंशपुराण का पाठ जैनकोष (jainkosh.org, समवशरण) से लिया है।