कुंदकुंद मुनि बारामासा | Kundkund Muni baramasa

कुंदकुंद मुनि

पंचम युग में वरदान,मिले तीर्थंकर सम मुनिराज, तत्व दर्शाया।
हे कुंदकुंद महाराज तुम्हे सिर नाया।

दक्षिण में जन्म सु पाया, तव कोण्डकुंडपुर ग्राम।
ग्यारह वय में ली दीक्षा, जिनचंद्र गुरू उपकार।।
मां पिता मोह को त्याग,स्वयं निज चित्स्वरूप का ध्यान, मुनिपद पाया ।।1।।

यूं हुए अनेकों मुनिवर, तप ऋद्धि युक्त जिन यतिवर।
की लोकलोक की चर्चा, कर्मों का रूप प्रगट कर।।
पर समयसार आधार, जगत किया समय प्रकाश,अतः प्रथम पद पाया।।2।।

सद्दर्शन ज्ञान चरण मे,थित जीव बताए स्वसमय।
जो कर्म पुद्गलौं में रत,सो जीव बताए परसमय।।
एकत्व सुनिश्चय आत्म, बताया सुंदर जग में नाथ, बही में पाया।।3।।

सब बातें बहुत सुनी हैं,अनुभूति और रूचि है।
पर पृथक एक की प्राप्ति, इतनी भी सरल नहीं है।।
पर यही दिखाएं आप,यदि न कर पाएं हम प्राप्त,तो छल न पाना।।4।।

न प्रमत्त अप्रमत्त बताया, बस गायक भाव जनाया।
इस रीति प्राप्त जो होता, बस वही आत्म समझाया।।
दृग ज्ञान चरित व्यवहार, सुनिश्चय एक मात्र परमार्थ, वही में आपा।।5।।