खोजो ‘महा’ ढूँढो ‘महावीर’
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Notes
खोजो ‘महा’ बनो ‘महावीर’
- भगवान् श्रेणिकनाथ का वर्णन किस हिन्दू ग्रन्थ में आता है? - महाभारत
- चक्रवर्ती की एक निधि का नाम - महाकाल
- ऋषभदेव की पत्नी के भाई का नाम - महाकच्छ
- सबसे अधिक नाम वाले तीर्थंकर - महावीर
- भगवान् आदिनाथ का किसी पूर्वभव में नाम था - महाबल
- चक्रवर्ती द्वारा की जाने वाली पूजा - महामह
- चाँदी के समान वर्णवाला एक कुलाचल पर्वत - महाहिमवन्
- प्रिय विद्वान् में मौत का पर्यायवाची शब्द आता है - महानुभुजय
- चैत्र सुदी तेरस को आने वाला त्यौहार - महावीर जयन्ती
- भगवान् अजितनाथ के यक्ष का नाम - महायक्ष
- तप ऋद्धि का एक भेद - महातप
- बाहुभुज मुनि की प्रथम पारणा स्थली -
- ‘वीर हितावल…’ में मोह को कहा है - महाचल
- नवें चक्रवर्ती का नाम -
- अनंतनाथ के समय में होने वाले एक नारद का नाम -
- सातवीं नरक पृथ्वी का नाम - महातम
- एक तीर्थंकर के पिता का नाम - महासेन (8)
Notes
- दूसरे नारद का नाम - महाभीम
- भविष्यकाल के प्रथम तीर्थंकर - महापद्म
- रोहित और हरिकांता नदियाँ किस सरोवर से निकलती है - महापद्म
- दसवें स्वर्ग का नाम - महाशुक्र
- साधु परसाद्ध द्वारा पाले जाने वाले व्रत - महाव्रत
- इद्धकेतु पूजा किसके द्वारा की जाती है - महामण्डलेश्वर राजा
- उत्तरपुराण किस पुराण का पूरक भाग है - महापुराण
- भूतकाल के एक तीर्थंकर - महासाधु (3)
- णमोकार मंत्र को कहते हैं - महामंत्र
- अष्टापद से मोक्ष जाने वाले एक मुनिराज - महाबाल
- कविवर भागचंद रचित एक स्तुति का नाम - महाविशष्टक स्तोत्र
- महोत्सवा प्राप्ति के एक व्यंतर इन्द्र का नाम - महाकाय
Notes
जपो नाम ‘वीर’
- दुषमा काल के अंतिम मुनि - वीरांगद
- धवला टीका के रचनाकार - वीरसेन
- नाभिराय की प्रथम पारणा नगरी - वीरपुर
- दीपावली से बदलने वाला संवत् - वीर निर्वाण
- श्रावन मास में आने वाली एक जयंती - वीर शासन
- आदिपुराण के रचयिता जिनसेनाचार्य के गुरु का नाम - वीरसेन
- विहरमान 20 तीर्थंकरों में एक -
Notes
मेरी भाभ्यापच्ची, बताओ संख्या सच्ची
- संसारी जीवों के भेद में किनकी संख्या से गुणा करने पर श्रावक के मूलगुणों की संख्या आ जाए -
2x4 (कषाय) = 8 मूलगुण - इन्द्रियों की संख्या में किनकी संख्या से गुणा करने पर कषाय की कुल संख्या आती है - 5x5 (पाप) = 25
- तत्वों की संख्या में किसका गुणा करे कि शालाकापुरुषों की संख्या आ जाए - 7x9 (देवता) = 63
- स्वर्गों की संख्या में किनका गुणा करे कि भक्तामर के श्लोकों की संख्या आ जाए - 16x3 (गुणसे) = 48
- सिद्ध के मूलगुणों में क्या घटाने पर रत्नों की संख्या आ जाए - 8-5 (महाव्रत) = 3
- ज्ञान की संख्या के साथ किनका गुणा करने पर णमोकार मंत्र के अक्षरों की संख्या आ जाती है - 5x7 (नरक) = 35
- कुलाचल पर्वतों की संख्या को किनकी संख्या से गुणा करने पर आचार्यों के मूलगुणों की संख्या आ जाए -
6x6 (लेश्या) = 36 - शिक्षाव्रतों की संख्या को किनसे गुणा करने पर भगवान् महावीर की आयु आती है - 4x18 (दोष) = 72
- सम्यग्दर्शन के दोषों में किसकी संख्या कम करने पर पार्श्वनाथ की ऊंचाई ज्ञात होती है - 25-16 (स्वर्ग) = 9
- ध्यान की संख्या में किनकी संख्या जोड़े की धर्मों की संख्या आ जाए - 4+6 (आवश्यक) = 10
प्रश्न दो, उत्तर एक
- दाल का भेद, महाराजा श्रेणिक के पुत्र का नाम - अभय
- पर्याप्ति का भेद, मार्गणा का भेद - आहार
- हनुमान् की माता, नरक की धूम्रप्रभा पृथ्वी का अन्य/एक नाम - अंजना
- केकड़े का पुत्र, हमारा क्षेत्र - भरत
- वस्तु का स्वभाव, गमन करते हुए जीव व पुद्गलों के गमन से निर्मित - धर्म
- अवधिज्ञान का भेद, महावीर का नाम - वर्द्धमान
- एक वर्ण का वर्ण, एक प्रकार का शरीर - कर्मण
- चौदहवें कुलकर, ऋषभदेव के पिता - नाभिराय
- एक तत्त्व तथा पार्श्वनाथ पर उपसर्ग करने वाला देव - स्वंबर
- नेमिनाथ का वर्ण, एक लेश्या - कृष्ण
- ज्ञान का ज्ञान, जम्बूद्वीप का एक सरोवर - पद्म
- एक तीर्थंकर, षट्खण्डागम के रचयिता - पुष्पदन्त
- चक्रवर्ती का चक्र, एक मेरु - सुदर्शन
- एक द्वीप, अन्तिम अनुबद्ध केवली - जम्बू
- एक प्रकार के केवली, एक प्रकार का साल - श्रुत
- प्रसावान, महावीर भगवान् - सन्मति
- मोहनीय का भेद, एक गुणस्थान - मिथ्यात्व
Notes
- एक कल्प विमान, एक ग्रन्थ - अर्थार्थ सिद्धि
- नामकर्म की एक प्रकृति, एक प्रकार का भाव - शुभ
- पुद्गल की एक पर्याय, नामकर्म की प्रकृति - सूक्ष्म
- एक पक्षी, एक स्त्री - मैना
तीर्थंकर प्रश्नावली
- किस तीर्थंकर के नाम में एक कषाय का नाम आता है - वर्धमान - मान कषाय
- किस तीर्थंकर के नाम में अष्ट द्रव्य में से एक द्रव्य का नाम आता है - पुष्पदन्त - पुष्प
- जिनके नाम में भरतक्षेत्र के एक सरोवर का नाम आता है - पद्मप्रभ - पद्म सरोवर
- किनके नाम में भविष्यकाल की चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर का नामांश आता है - पद्मप्रभ, महावीर - महापद्म
- एक जानवर का नाम - वृषभनाथ
- तीर्थंकर के नाम में तीर्थंकर का नाम - सुपार्श्वनाथ
- किसी तीर्थंकर की जन्मस्थली और किसी तीर्थंकर की निर्वाण स्थली - चम्पापुरी (वासुपूज्य)
- पंचपरमेष्टि में से एक का नाम एक तीर्थंकर के नाम में - मुनिसुव्रत
- एक बलभद्र के नाम में तीर्थंकर का नाम - धर्म (३) धर्मनाथ
- एक बलभद्र के ऊपर नाम में तीर्थंकर का नाम - राम (८) - पद्म - पद्मप्रभ
- किसी तीर्थंकर के नाम में द्रव्य का नाम - धर्मनाथ
- ज्योतिष देवों का इन्द्र - चन्द्र - चन्द्रप्रभ
Notes
- शरीर का एक अंग - दन्त - पुष्पदन्त
- दार्शनिकों के प्रवर्तक - श्रेयांस - श्रेयांसनाथ
- जितने जीवद्रव्य - अनंत - अनंतनाथ
- ज्ञान का एक भेद - सुमति - सुमतिनाथ
- कितनों के नाम ‘अ’ या ‘आ’ से - 4/6 (अभिनन्दन, अजित, अरहनाथ, आदिनाथ)
- अंग्रेजी अक्षर जिसमें 24 नाम आते हैं - R (आर)
- भक्तामर स्तोत्र - आदिनाथ
- अग्नि का स्वभाव उष्ण है तो जल का स्वभाव - शीतल
- मुनिराज आहार किस विधि से लेते हैं - सुविधि
- संसार शब्द का पर्यायवाची - संभवनाथ
कौन बनेगा अकलंक - निकलंक
- अनुयोग चार प्रकार के हैं - प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग।
- कषाय चौकड़ी चार हैं - अनंतानुबंधी कषाय चौकड़ी, अप्रत्याख्यानावरण कषाय चौकड़ी, प्रत्याख्यानावरण कषाय चौकड़ी और संज्वलन कषाय चौकड़ी।
- क्षपक श्रेणि के गुणस्थान चार हैं - 8वाँ अपूर्वकरण, 9वाँ अनिवृत्तिकरण, 10वाँ सूक्ष्मसाम्पराय, 12वाँ क्षीणमोह।
- आस्तिकाय पाँच होते हैं - जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय।
- समिति पाँच होती है - ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण और प्रतिष्ठापन।
- पाँच तीर्थंकर बाल ब्रह्मचारी हैं - 12वें वासुपूज्य, 19वें मल्लिनाथ, 22वें नेमिनाथ, 23वें पार्श्वनाथ और 24वें महावीर स्वामी।
- मुनियों के छह आवश्यक हैं - समता, स्तुति, वंदना, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान।
- लेश्याएँ छह होती हैं - कृष्णा लेश्या, नील लेश्या, कापोत लेश्या, पीत लेश्या, पद्म लेश्या, शुक्ल लेश्या।
- परमागम पाँच होते हैं। पाँचों परमागमों के रचयिता आचार्य कुंदकुंद हैं।
- छहढाला में छह ढाल हैं। लेश्याएँ छह होती हैं। द्रव्यों की जातियाँ छह हैं। मुनि और श्रावक के आवश्यक भी छह हैं।
- तत्त्वार्थसूत्र के रचयिता आचार्य उमास्वामी आचार्य कुंदकुंद के शिष्य हैं। समयसार के कर्ता आचार्य कुंदकुंद जिनचंद्रचार्य के शिष्य हैं। आदिपुराण के रचयिता आचार्य जिनसेन आचार्य वीरसेन के शिष्य हैं।
- दामोदर मंत्र में 35 अक्षर हैं। मोक्षमार्ग प्रकाशक में 11 अधिकार हैं। समयसार में 415 गाथाएँ हैं। छहढाला में छह ढाल हैं। नियमसार में 311 कलश हैं।
- आदिपुराण प्रथमानुयोग का ग्रंथ है। गोम्मटसार करणानुयोग का ग्रंथ है। रत्नकरण्ड श्रावकाचार चरणानुयोग का ग्रंथ है। प्रवचनसार द्रव्यानुयोग का ग्रंथ है और मोक्षमार्ग प्रकाशक चारों ही अनुयोगों का ग्रंथ है।
- आचार्य के 6 अंतरंग और 6 बहिरंग तप होते हैं। 6वें तीर्थंकर पद्मप्रभ भगवान् हैं। 6 महीने 8 समय में 608 नियम से मोक्ष जाते हैं।
- आदिनाथ कैलाश पर्वत से, वासुपूज्य चम्पापुरी से, नेमिनाथ गिरनार से, महावीर पावापुर से तथा शेष 20 तीर्थंकर सम्मेद शिखर से मोक्ष गए।
वे कौन थे
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जिनके ऊपर चलती पिंजड़ी रखी गई - राजकुमार
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जिन्हे जलते हुए गड्ढे पहनाए गए - पाण्डव
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जिन्होंने मरणासन्न कुत्ते को णमोकार मंत्र सुनाया - जीवनधर स्वामी
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जिन्होंने आत्मपरीक्षा शून्य लिखा - विद्यानंद आचार्य
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जिन्हें हाथी पर बैठे-बैठे वैराग्य हुआ - राजा मगध
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जो णमोकार मंत्र के अपमान से नरक गए - सुसीम यक्ष
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राक्षसी मुनि के गले में मृत सर्प डाला - श्रेणिक राजा
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जिन्हें भस्मक व्याधि हुई - समन्तभद्र
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नाटक समयसार की रचना की - बनारसीदास जी
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श्वेताम्बर देव ने इन पर उपसर्ग किया था - मुनि पार्श्वनाथ
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जिनका उपसर्ग राम-लक्ष्मण ने दूर किया था - कुलभूषण मुनिराज
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इस युग में प्रथम मोक्ष गए - ऋषभदेव
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जो दीक्षा के अंतर्मुहूर्त बाद केवलज्ञानी हो गए - भरत
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जिन पर स्त्रीतेन्दु ने उपसर्ग किया - मुनि राम
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जिन्हें ५४ तालों में बंद रखा गया - मानतुंग आचार्य
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जो मुनि विदेह क्षेत्र गए थे - कुन्दकुन्द आचार्य
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जिन्हें तीन दिन तक शलायनी स्वाती रही - सुकुमाल
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जिनका दाहिना पैर भस्म हुआ - सुकौशल
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जिन्हे वन में नग्न अवस्था में आहार दिया - चन्द्रगुप्त
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जिनके निमित्त से द्वारिका नगरी जली - द्विपायन मुनि
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जिन्होंने निमित्तज्ञान से बारह वर्षीय अकाल की घोषणा की - आचार्य भद्रबाहु
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प्रथम सूत्रात्मक जैन ग्रन्थ लिखा - उमास्वामी
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प्रथम जैनग्रन्थ लिखा - भूतबली-पुष्पदंत आचार्य
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जिनके पांचों कल्याणक एक स्थान पर हुए - वासुपूज्य
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जिनकी रक्षा सुअर ने की -
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जिनसे सम्राट चंद्रगुप्त ने १६ स्वप्नों का फल पूछा - आचार्य भद्रबाहु
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जिनके पैर की धूल से पर्वत सोने का हो गया था - शुभचन्द्राचार्य
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जिनसे दशरथ ने दीक्षा ली -
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सर्वप्रथम जय जिनेन्द्र उच्चारण करने वाले - भद्रबाहु
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पैर के अंगूठे से कैलाश पर्वत दबाने वाले - बालि मुनि
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सबसे कम समय में केवली हुए तीर्थंकर - मल्लिनाथ
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अंतिम अनुबद्ध केवली - जम्बूस्वामी
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जो पुरोहित पुत्र भद्रबाहु को भावी श्रुतकेवली जानकर अपने साथ ले गए - जम्बूस्वामी गोवर्धनाचार्य
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अंतिम श्रुतकेवली - जम्बूस्वामी
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आजीवन जिन्होंने कपड़े नहीं पहने - जिनसेन
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कड़वी तुम्बी का विषम आहार दिया गया -
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इनके काल में श्वेताम्बर मत प्रारम्भ हुआ - भद्रबाहु
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जिसने क्रूर भीलनी ने ब्रह्मचर्य व्रत लिया -
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रोग निवारण हेतु मुनिपद छोड़ा - धम्मन्तभट्ट
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जिन्होंने लवकुश को दीक्षा दी -
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१०० अजैनों को जैन बनाकर आहार का जिन्होंने नियम लिया -
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जिससे रावण ने परस्त्रीत्यागव्रत लिया - अनंतवीर्य
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दो बकरों की बलि से बचाकर अपना सर कटवाया -
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राजा के कहने पर मुनिपद लिया - ब्रह्मगुलाल
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चन्द्रगुप्त को जैनधर्म में दीक्षित किया - भद्रबाहु
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५०० पुत्रों के साथ दीक्षा ली -
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कुन्दकुन्द को दीक्षा देने वाले - जिनचन्द्र आचार्य
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जिनसे चाणक्य ने दीक्षा ली -
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‘अण’ शब्द का ६ माह तक अर्थ किया - कल्याण मुनि
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जिन्हें सिकन्दर यूनान ले गया -
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वेश्या के कोठे पर तीन दिन का उपवास -
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सर्प के मुँह में मेंढक देखकर वैराग्य - पूज्यपाद
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एक ही आसन पर खड़े-खड़े चार माह का उपवास - गणधर मुनि
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षड्रऋतु में १२ भावनाओं को पाठ सुनकर वैराग्य आया, पत्नियों की साड़ियों की रस्सी बनाकर महल से उतरकर
सुकुमाल
मुनि बन गए -
55. अपने घर में चोरी करते हुए चोर की सहायता की -
प. बनारसी दास जी
56. जिन्हें हाथी के पैर के नीचे कुचला गया - रोहरमलजी
57. श्रवणबेलगोला में बाहुबली की मूर्ति बनवाई - चामुंडराय
58. 363 पाखंड मत चलाए - मारीच
59. विवाह के अगले दिन दीक्षा ली - जम्बूस्वामी
60. धर्मप्रभावना हेतु अपनी जान दे कर भाई को
बचाया - निकलंक
61. अपनी बहन पर मोहित हुए - दशभ्रषण, कुलभूषण
62. जिनके गिरने पर शिला चूर-चूर हो गई - हनुमान्
63. जिनकी बताय से शिला हिलती है - प्रद्युम्न कुमार
64. जिन्हें लंका में केवलज्ञान प्राप्त हुआ - अनंतवीर्य
65. अपने 60 हजार पुत्रों की मृत्यु का समाचार सुनकर
व्यजितनाय मुनि से दीक्षा ली - सगर चक्रवर्ती
66. जिनके पिता व पुत्र कामदेव थे - कृष्णा
67. प्रतिदिन 100 आवेशों को जैन बनाने का नियम
लिया - जिनसेन
68.
Notes
लिखने - जाने पहचानो,
उत्तर की बाओ
- राम के पिता कौन थे? उत्तर की जेठानी के पुत्रों के
मामा के पिता का नाम क्या था? - राजाजनक - द्रौपदी के पुत्रों के नाना के दामाद के सबसे छोटे व
बड़े भाई का नाम बताइए - युधिष्ठिर, सहदेव - जो अपनी बहन पर मोहित हुए और धन्य सात होने
पर दीक्षा ली, उन पर जब उपसर्ग हुआ उसको दूर
करने वालों का वर्तमान भव क्या है? - राम - मोक्ष,
लक्ष्मण - नरक, सीता - स्वर्ग - नारायण लक्ष्मण ने जिस प्रतिनारायण को मारा,
उसका जगत् प्रसिद्ध नाम जिस पर्वत के नीचे दबने से
पड़ा, उसको दबाने वाले कौन थे? - बालेमुनि - जिसने स्वप्न में दो बैल देखे, उनके शिष्यों द्वारा
रचित ग्रन्थ के मंगलाचरण स्वरूप लिखे मन्त्र में
किसको नमस्कार किया है? - पंच परमेष्ठि - सम्यक्त्व के वात्सल्य अंग में प्रसिद्ध मुनि ने
उपसर्ग दूर किया, उपसर्ग का निमित्त जिन मुनि का वाद-
विवाद था उनके गुरु का नाम - अकंपनाचार्य - एक तीर्थंकर का जो नाम है उस नाम के व्यक्ति ने जिस
तीर्थंकर मुनि को आहार दिया, उसका उन मुनि के साथ
पूर्वभव में क्या नाता था? - श्रेयांस + ऋषभदेव; पति + पति
Notes
- किल्ब पूजन में नौ द्रव्य चढ़ाए जाते हैं- जिनवाणी
- सौधर्मेन्द्र के मुकुट पर चिन्ह - स्वास्तिक
- ‘अन्धों के अन्धे होते हैं’ - इस कथन पर घटित घटना - महाभारत
Notes
एकीकृत लो जाने
(महाबाल, चिन्ह, मुनि)
- आशु करण से दिल्ली जाने की कह रहा है।
- वीर ही रण में अपना बलिदान देते हैं।
- भद्रबाहु बलि मुनि के संघ के आचार्य थे।
- व्याप सभी की मदद से ही शिविर का आयोजन हुआ है।
- जगमग रात्रि में तारे चमक रहे हैं।
- हे भव्य! तुम अनंत वीर्य के धनी हो।
- श्री जिन चन्द्र सम उज्ज्वल मुख वाले हैं।
Notes
- राधा तू पानी भर, तरुण आ रहा है।
- किल्ब की सेना में राजधर सेनापति था।
- वो मरा-मरा कहते-कहते बच गया।
तीर्थंकरों की वंदना
- हाथी का पर्यायवाची - गज - गजपंथ
- महाभारत के समय के एक गुरु - द्रोण - द्रोणागिरी
- एक धातु का नाम - सोना - सोनागिरि
- चन्द्रमा का अन्य नाम - चन्द्र
- 100-48 - 52 - बावनगजा
- एक परमोद्धि - सिद्ध - सिद्धचल
- आधे का आधा - पाव - पावापुर
- भोजन का पर्यायवाची - आहार - आहार जी
- एक उद्दुम्बर फल - बड़ - बड़वानी
- द्रव्य में अनन्त होते है - गुण - गुणावा
- एक राशि - कुम्भ - कुम्भोज बाहुबली
- एक प्रकार के जीव - मुक्त - मुक्तागिरी
- ज्योतिष देवों का इन्द्र - चन्द्र - चन्द्रगिरी
- 13x4 : 52
ज्ञात पहेली
-
भक्ति का वह अमरदीप है, सार प्रवचनों का अनमोल।
करे प्रकाश मोक्षमार्ग को, इष्ट उपदेश का क्या है तौल॥
भक्तामर, प्रवचनसार, मोक्षमार्ग प्र., इष्टोपदेश -
एक अक्षर का मेरा नाम, सम्पूर्ण जिनागम का मैं सार।
पंच प्रभु का मैं हूँ धाम, बोलो क्या है मेरा नाम॥
ॐ -
पाँच अक्षर का मेरा नाम, शुद्धतम का मुझमें धाम।
कुन्दकुन्द का मुझमें नाम, बोलो क्या है मेरा नाम॥
समयसार -
तीन अक्षर का मेरा नाम, आता हूँ रुकने के काम।
Notes
मुझसे बड़ा न जग में कोई, नाम बताओ मेरा कोई॥
आकाश
-
चार अक्षर का मेरा नाम, चारों गति में मेरा धाम।
उल्टी श्रद्धा मेरा काम, त्याग जग मुझमें पहचान॥
मिथ्यात्व -
पांच अक्षर का मेरा नाम, ज्ञानुजगत् के सब पदार्थ।
मैं रहता हु अपने अंदर, फिर भी दुनिया मेरे अंदर॥
केवलज्ञान -
एक पुरुष जिनवर ने देखा, पांच पसारे खड़ा हुआ।
हाथ कमर पर रखे हुए, काल अनन्त से खड़ा हुआ॥
लोक -
आठ अक्षर का मेरा नाम, जो खण्डों का मुझमें धाम।
मैं स्वयं में अपूर्ण हूँ, पर कहलाता पूर्ण हूँ॥
मोक्षमार्ग प्रकाशक -
चार अक्षर का मेरा नाम, मुझको क्या दुनिया से काम।
ज्ञान ध्यान ही बस व्यापार, मुक्ति पाने की तैयार।
दिखने में लगता कंगाल, फिर भी हूँ मैं मालामाल॥
मुनिराज
Notes
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मैं हूँ सब पापों का बाप, नाम बताएँ मेरा आप।
सारा जग मेरे आधीन, सब कुछ है फिर भी मैं दीन ॥
लोभ -
सब पापी मेरे घर आते, सात घरों में दुःख पाते।
तिल-तिल करे देह के खण्ड, खूब प्यास भी लगे प्रचण्ड ॥
नरक -
ज्ञान नहीं है आसान नहीं है, सुख या दुःख की खान नहीं है।
पाँच भाई है मेरे जग में, जीव शब्द भी रहता मुझमें ॥
अजीव -
जो जीवों को दुःख देता है, वह मुझको धारण करता है।
मैं ले जाती नरक के बीच, मुझमें है पापों का बीज ॥
हिंसा -
मैं सबको कसकर दुःख देती, सबकी सुखशान्ति हर लेती।
मैं हूँ आकुलता की माता, मेरा नाम किससे है आता ॥
कषाय -
दो अक्षर का मेरा नाम, रहता हूँ मैं सुख के धाम।
काम-धाम से हूँ बेकार, नाम बताएँ मेरा आप ॥
सिद्ध -
तीन अक्षर का मेरा नाम, संसार बढ़ाना मेरा काम।
कर्मों का मैं द्वार बनाता, बोलो भाई मेरा नाम ॥
आस्रव -
चार अक्षर का मेरा नाम, चार छोड़कर आया हूँ।
चार साथ में लाया हूँ, फिर भी पूज्य कहलाया हूँ ॥
अरहंत -
बियासी दिन तक मौन रहे, प्रभु अवसर का इंतजार किया।
इन्द्रभूति गणधर आया तो, जीवों का उद्धार किया ॥
महावीर स्वामी -
दो अक्षर का मेरा नाम, सारे जग के आता काम।
मुख्य गौण करके मैं जानूँ, श्रुतज्ञान में मेरा धाम ॥
नय -
सीमंधर के पास गए जो, उत्तम अनुभव शास्त्र रचे जो।
पंचम युग के देव कहाए, उनका नाम आप बताएँ ॥
कुन्दकुन्द आचार्य -
ऐसा शाश्वत पर्व बताओ, वर्ष में तीन बार आता।
उत्तम सहित चारित्र जगाता, श्रावक मुनि के मन भाता ॥
दशलक्षण -
मोक्षमार्ग की प्रथम सिढ़ी, कहते जिसे धर्मों का मूल।
बिन इसके तो देव दुखी है, इसके सहित नरक अनुकूल ॥
सम्यग्दर्शन -
मोक्षपुरी एक ने पाई, एक हुआ परिपूर्ण ज्ञानी।
उस दिन का तुम नाम बताओ, नहीं रहोगे तुम अज्ञानी ॥
दीपावली -
ऐसे शाश्वत पर्व बताओ, महीने में दो-दो आते।
संयम भाव जगाते, श्रावक के मन भाते ॥
अष्टमी, चतुर्दशी -
मेरा मस्तक सबसे ऊँचा, बोलो क्या है मेरा नाम।
मैं रावण को नरक ले गया, सब लोगों में मेरा धाम ॥
मान -
चार अक्षर का मेरा नाम, छह खण्डों में मेरा धाम।
पूर्वार्ध में छह रह जाता, मुझको गाते दौलतराम ॥
छहढाला -
छह अक्षर का मेरा नाम, समवशरण में मेरा काम।
सबको मुक्तिमार्ग बताना, कितना सुन्दर मेरा काम ॥
दिव्यध्वनि
Notes
-
दो अक्षर का मेरा नाम, आता हूँ मुक्ति के काम।
प्रथम करे तो रम बन जाऊँ, अंत करे तो खर्र जाऊँ॥
धर्म -
तीन अक्षर का मेरा नाम, अंत करे तो मैं ही सब हूँ।
मुझमें लोकालोक झलकते, मैं हूँ अनंत सुखों का धाम॥
सर्वज्ञ -
दो अक्षर का मेरा नाम, पांच भाईयों का हूँ मैं खाम।
मुझको जो अपनाता है, वह नरकों में जाता है॥
पाप -
चार अक्षर का मेरा नाम, चेतन से मुझको क्या काम।
फिर भी साथ सदा रहता हूँ, सारे जग में मेरा धाम॥
पुद्गल -
दो अक्षर का मेरा नाम, बिना कमाए ही आराम।
नाम अमर है दूजा मेरा, अमृत पीने का है काम॥
देव -
सब लोगों का माल हड़पना, सबको मैं पहुंचाती जेल।
सबकी बदनामी करवाती, बतलाओ ये कैसा खेल॥
चोरी
Notes
-
मुझे चाहिए रुपया पैसा, बोलो मेरा रूप है कैसा।
तृष्णा देवी मेरी माता, तीन लोक की ख्याति खाता॥
परिग्रह -
जिसके सर पे मैं हूँ जाता, उसकी होंठ भुजा फड़फड़ाता।
जो मुझमें अंधा हो जाता, छोटा बड़ा उसे न सुहाता॥
क्रोध -
तीन अक्षर का मेरा नाम, पूरे लोक में मेरा धाम।
सारी दुनिया चलकर रुकती, दुनिया कहती मेरा काम॥
अधर्म द्रव्य -
सब मायक संतों का प्यारा, मैं अविनाशी सुख का धारा।
रत्नत्रय के तत्व पर फलता, बोलो क्या है मेरा नाम॥
मोक्ष -
वही गुरु है वही शिष्य है, वही उपास्य वही उपासक।
स्वयं ध्येय है स्वयं ही ज्ञाता, बुझो मेरा नाम वो साता॥
आत्मा -
नौ नाली जिस नगर में, सदा रहे ख्यात।
गली-गली में रोग हैं, सदा करे दिन-रात॥
शरीर
Notes
- स्वर्गों के राजा कहलाए, तीर्थंकर की वंदना कराए।
चिन्ह देखते देखते पहले, हम सब उनका नाम बताए॥
सौधर्म इन्द्र
प्रश्नावली
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आदिनाथ का जन्म कहाँ हुआ था - अयोध्या
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उनकी माता का नाम क्या था - मरुदेवी
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उनके पिता का नाम क्या था - नाभिराय
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कितने कर्मों का उपदेश दिया - षट्कर्मों
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प्रथम आहार किसका हुआ - इक्षु रस
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प्रथम आहार से कौनसा पर्व प्रारंभ - अक्षय तृतीया
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पुद्गल के विशेष गुण - 4
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पुद्गल के प्रदेशा कितने - संख्यात, असंख्यात, अनंत
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पुद्गल के कितने भेद - दो
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सबसे छोटा पुद्गल - परमाणु
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छः द्रव्यों में से एक मूर्तिक द्रव्य - पुद्गल
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जीव के समान क्रियाशील द्रव्य - पुद्गल
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तीर्थंकर कितने हैं - 24
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बाल ब्रह्मचारी कितने हैं - 5
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उपसर्ग विजेता कितने हैं - 2
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बुरे कार्य को कहते हैं - पाप
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पापों से विरक्ति पर प्राप्त होते हैं - व्रत
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पाप कितने हैं - पाँच
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हिंसा के कितने भेद हैं - चार
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पाप का फल क्या है - नरक
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पाप का बाप कहा जाता है - लोभ
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जीव के स्वतन्त्ररूप भाव कितने हैं - 5
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औपशमिक भाव के भेद - 2
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क्षायोपशमिक भाव के भेद - 21
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संयमासंयम किस भाव का भेद है - क्षायोपशमिक
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क्षायिक भाव के भेद - 9
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तीन भेद कौनसे भाव के हैं - पारिणामिक
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गतियाँ कितनी हैं - चार
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नरक कितने हैं - सात
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देवों के निकाय कितने हैं - चार
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मनुष्यों के भेद कितने हैं - दो
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गति किस कर्म का भेद है - नाम
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तिर्यंच कहाँ पाए जाते हैं - सम्पूर्ण लोक
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गुणों के समूह को कहते हैं - द्रव्य
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द्रव्य कितने हैं - 6
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रूपी द्रव्य कितने हैं - एक
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अरूपीक द्रव्य कितने हैं - पाँच
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एक मात्र चेतन द्रव्य का नाम है - जीव
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एक प्रदेशी द्रव्य है - काल
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कर्मों के कितने भेद हैं - 8
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ज्ञानावरणादि कौनसे कर्म हैं - द्रव्यकर्म
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द्रव्यकर्म के मूलभेद कितने हैं - आठ
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शरीर व पर्याप्ति कौनसे कर्म हैं - नोकर्म
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भावकर्म में क्या आते हैं - मोह - राग - द्वेष
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द्रव्यकर्म के सम्पूर्ण भेद कितने हैं - 148
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मद कितने हैं - आठ
Notes
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अहंकार को कहते हैं - मद
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मद किसको दूषित करता है - सम्यग्दर्शन
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मद को यह भी कहते हैं - मान, घमंड
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ज्ञानमद किसे होता है - ज्ञानी
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सुंदरता पर अभिमान कीनसा मद है - रूपमद
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सच्चेदेव के तीन गुण कौनसे - वीतरागी सर्वज्ञ हितोपदेशी
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पंच परमेष्टि में देव कितने - दो
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राग-द्वेष रहितपना कहलाता है - वीतराग
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लोकालोक को जानना है - सर्वज्ञता
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सच्चेदेव का अन्य नाम - आप्त
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आप्त कितने दोष रहित होते हैं - 18
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चित्त की एकाग्रता कहलाती है - ध्यान
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ध्यान के भेद है - चार
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ध्यान का उत्कृष्ट काल है - अंतर्मुहूर्त
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धर्मध्यान के कितने भेद है - चार
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पापो में आनंद मानना है - रौद्रध्यान
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मोक्ष में कारणभूत ध्यान है - धर्म, शुक्ल ध्यान
Notes
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सम्यग्दर्शन की संख्या - 12
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सम्यग्दर्शन के एकप्रकार - कुबेर
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कितने भावनाएँ होती है - चार
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जिनेंद्र का मुख्य कौनसी दिशा में - पूर्व, उत्तर
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सिंहासन से जिनेंद्र कितने ऊँचे - चार अंगुल
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कितनी सिद्धियाँ होती है - 20,000
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सबसे पहला द्वीप - जम्बूद्वीप
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लवण समुद्र के जल का स्वाद - नमक जैसा
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पुष्करवरद्वीप को विभाजित करने वाला पर्वत - मानुषोत्तर
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मनुष्यगमन कहाँ तक - पुष्करर्द्ध द्वीप, ढाई द्वीप
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द्वितीय द्वीप का नाम - धातकी खंड
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द्वितीय समुद्र का नाम - कालोदाधी
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जन्माभिषेक किस पर्वत पर - सुमेरु पर्वत
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कितने कलशों द्वारा अभिषेक - 1008
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कौनसे जल से अभिषेक - क्षीर सागर के जल
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जन्म पर प्रसूतिगृह से बाहर लाने वाली - प्राची इन्द्राणी
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इन्द्र के किस हाथी पर गमन - ऐरावत
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किस शिला पर अभिषेक - पाण्डुक
Notes
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इन्द्रियों के कुल विषय - 22
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स्पर्शनेन्द्रिय के विषय - 8
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रसनेन्द्रिय के विषय - 5
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घ्राणेन्द्रिय के विषय - 2
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चक्षु इन्द्रिय के विषय - 5
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कर्ण इन्द्रिय के विषय - 1
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कौन से द्वीप में - जम्बू द्वीप
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कौन से क्षेत्र में - विदेह क्षेत्र
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उसपर कितने चैत्यालय - 16
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कितना ऊँचा है - एक लाख चालीस योजन
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सुमेरु पर्वत संबंधित वन - चार
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पर्वत की चूलिका कितनी ऊँची है - चालीस योजन
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माता कितने स्वप्न देखती है - 16
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माता की सेवा करने वाली कुमारियाँ - 56
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रत्नवर्षा कितने माह तक - 14
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रत्नवर्षा कौन करता है - कुबेर
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तीर्थंकर जन्म से कितने ज्ञानधारी - तीन
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एक दिन में कितने रत्न बरसते है -
प्रश्नोत्तर
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भातको के मूलगुण कितने - आठ
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उद्दुम्बर फल कितने है - पांच
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उद्दुम्बर फलो का अन्य नाम -
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मकार कितने होते है - तीन
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उद्दुम्बर फल में क्या रहते है - त्रस जीव
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पंच उद्दुम्बर, तीन मकार क्या है - अभक्ष्य
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सिद्ध के कितने कर्म नष्ट - 8
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सिद्धालय में कबतक रहेंगे - अनन्त काल
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सिद्धो का आकार - किंचित न्यून पुरुषाकार
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सिद्धो के गुण कितने - 8
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सिद्धो के कितने शरीर - एक भी नहीं
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सिद्धो को कहते है - अशरीरी, मुक्त
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काल के कितने भेद है - दो
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एक कल्पकाल कितना लम्बा होता है - 20 कोड़ाकोड़ी सागर
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सर्वाधिक दुःख कौनसे काल में - दुषमा-दुषमा
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तीर्थंकर कौनसे काल में होते है - दुःखमा सुखमा
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कालपरिवर्तन कहां-कहां होता है - भरत, ऐरावत क्षेत्र
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अवसर्पीणी के कितने भेद है - छह
Notes
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वस्तु के अभिप्राय को कहते है - नय
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नय किसके अंश को विषय करता है - प्रमाण
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नय के मूल भेद कितने है - दो
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द्रव्यांश को ग्रहण करने वाला नय - द्रव्यार्थिक
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पर्यायांश को ग्रहण करने वाला नय - पर्यायार्थिक
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तत्त्वार्थसूत्र में नय के कितने भेद - सात
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अरहन्त के कितने कर्म नष्ट - चार
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अरहन्त के अतिशय कितने - 10
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प्रातिहार्य कितने होते है - 8
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मूलगुण कितने होते है - 46
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कितने दोष रहित है - 18
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मुख्य मूलगुण कितने है - 4
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महावीर के कितने नाम - 5
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पिता का नाम - सिद्धार्थ
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माता का नाम - त्रिशला
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जन्म कब हुआ - चैत्र शुक्ल त्रयोदशी
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निर्वाण पर मनाया जाने वाला त्यौहार - दिपावली
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गणधर कितने थे - 11
Notes
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पञ्चाङ्ग कितने है - पांच
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अष्टारी कितने है - चार
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केवलज्ञानयुक्त कितने है - दो
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अष्टारी कितने है - चार
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कितने देव, कितने गुरु - दो देव, तीन गुरु
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आठ प्रातिहार्य युक्त कौनसे - अरहन्त
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इसमें किसको नमस्कार किया है - पंच परमेष्ठि
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इसमें कितने अक्षर है - 35
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कौनसे छन्द में लिखा गया है - आर्या/गाथा
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कौनसे वृन्दों का मंगलाचरण है - षट्खण्डागम
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इसमें कितनी मात्राएं है - 58
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पंच परमेष्ठि के आद्याक्षरों से बना शब्द - ॐ
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चेतना रहित कौन - अजीव
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अजीव द्रव्य कितने है - पांच
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धर्मद्रव्य का कार्य - गतिहेतुत्व
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आकाश द्रव्य के भेद कितने है - दो
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आकाश द्रव्य का कार्य - अवगाहन
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काल द्रव्य का कार्य - परिणमन
प्रश्नोत्तरी
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गुणस्थान कितने हैं - 14
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कौनसे गुणों की तारतम्यरूप अवस्था - श्रद्धा, चारित्र
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क्षपकश्रेणी के गुणस्थान कितने - 4
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मुनियों के गुणस्थान कौनसे - 6 से आगे
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अरहत कौनसे गुणस्थान में - 13-14
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सम्यक्त्व कौनसे गुणस्थान से - 4 से
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कुलाचल पर्वतों की संख्या को किनकी संख्या से गुणा करने पर साचार्य के मूलगुणों की संख्या आ जाए- 6x6 (लेख्या) = 36
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शिक्षा व्रतों की संख्या को किनसे गुणा करने पर भगवान् महावीर की व्यायु आती है - 4x18 (दोष) = 72
प्रश्न दो, उत्तर एक
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दान का भेद, महाराजा श्रेणिक के पुत्र का नाम - अभय 2. पर्याप्ति का भेद, मार्गणा का भेद - आहार 3. हनुमान् की माता, नरक की धूमप्रभा पृथ्वी का अन्य / रुढ़ नाम - अंजना
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कैकई का पुत्र, हमारा क्षेत्र - भरत
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वस्तु का स्वभाव, गमन करते हुए जीव व पुद्गलों के गमन में निमित्त - धर्म
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नेमिनाथ का वर्ण, एक लेख्या - कृष्ण
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राम का नाम, जम्बुद्वीप का एक सरोवर - पद्म 12. एक तीर्थकर, षट्खण्डागम के रचयिता - पुष्पदन्त 13. चक्रवर्ती का चक्र, एक मेरू - सुदर्शन 14. एक द्वीप, अन्तिम अनुबद्ध केवली - जम्बू 15. एक प्रकार के केवली, एक प्रकार का ज्ञान - श्रुत 16. प्रज्ञावान, महावीर भगवान् - स्यन्मति
तीर्थकर प्रश्नावली
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24 तीर्थंकरों में किस तीर्थंकर के नाम में एक कषाय का नाम व्याता है - वर्द्धमान - मान कषाय
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किस्य तीर्थंकर के नाम में अष्ट द्रव्य में से एक इव्य का नाम आता है - पुष्पदन्त - पुष्प
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किनके नाम में भरतक्षेत्र के एक सरोवर का नाम याता है - पद्मप्रभ - पद्म सरोवर
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तीर्थकर के नाम में तीर्थंकर का नाम - सुपार्श्वनाथ 7. किसी तीर्थकर की जन्मस्थली और किसी तीर्थकर की निर्वाण एथली - चम्पापुरी (वासुपूज्य )
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पंचपरमेष्ठि में से एक का नाम एक तीर्थकर के नाम में - मुनिसुव्रत
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एक बलभद्र के नाम से तीर्थंकर का नाम - धर्म (3) धर्मनाथ
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एक बलभद्र के व्यपर नाम से तीर्थंकर का नाम - राम (8) - पद्म - पद्मप्रभ
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दानतीर्थ के प्रवर्तक - श्रेयांस - श्रेयांसनाथ 15. जितने जीवइव्य - अनंत - अनंतनाथ
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ज्ञान का एक भेद - सुमति - सुमतिनाथ
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कितनों के नाम ‘अ’ या ‘बा’ से - 4/6 (व्यादिनाय, व्यपित अभिन., अनंत, पर अतिक
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अंग्रेजी अक्षर जिसमें 24 नाम प्यजाते है- रि (बार) 19. भक्तामर स्तोत्र - व्यदिनाथ
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आग्न का स्वभाव उष्ठा है तो जल का स्वभाव - शीतल 21. मुनिराज आहार किश्य विधि से लेते है - सुविधि 22. संसार शब्द का पर्यायवाची - संभवनाथ
कौन बनेगा क
अकलंक निकलंक
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अनुयोग चार प्रकार के हैं। प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्वव्यानुयोग ।
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पांच तीर्थंकर बाल ब्रह्मचारी हैं- 12 वें वात्युपूज्य 19 वें माल्लनाथ, 22 वें नेमिनाथ, 23 वें पारर्वनाथ और 24 वें महावीर स्वामी।
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लेब्याएँ छह होती है - कृष्ण लेब्या, नील लेब्या, कापोत लेब्या, पीत लेब्या, पद्म लेब्या, शुक्ल लेब्या । 9. परमागम पाँच हैं। परमोष्ट पाँच होते हैं। पाप भी पाँच होते हैं। पांचों परमागमों के स्वयिता आचार्य कुन्दकुन्द है।
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छहढाला में छह ढाल हैं। लेब्याएँ छह होती है। द्रव्यों की जातियाँ छह है । मुनि और श्रावक के आवश्यक भी छह है।
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तत्त्वार्थसूत्र के स्वयिता आचार्य उमास्वामी आचार्य कुन्दकुन्द के शिष्य है। समयसार के कर्ता आचार्य कुन्द कुन्द जिनचन्द्राचार्य के शिष्य है। आदि पुराण के स्वयिता आचार्य जिनसेन आचार्य वीरसेन के शिष्टा है। 12. णमोकार मंत्र में 35 अक्षर है। मोक्षमार्ग प्रकाशक में जो अधिकार है। समयसार में 415 गाथाएँ हैं। छहढाला में छह ढाल है। नियमसार में 311 कलश हैं।
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आदिपुराण प्रथमानुयोग का ग्रन्थ है। गोम्मटसार करणानुयोग का ग्रन्थ है। रत्नकरण्ड श्रावकाचार चरण नुयोग का सन्ध है। प्रवचनसार द्रव्यानुयोग का सन्ध है और मोक्षमार्ग प्रकाशक चारों ही अनुयोगों का ग्रन्थ है।
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आचार्य के 6 अंतरंग और 6 बहिरंग तप होते हैं। 6 वे तीर्थकर पद्मप्रभ भगवान् है। 6 महिने 8 समय में 608 नियम से मोक्ष जाते है।
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आदिनाथ कैलाश पर्वत से, वासुपूज्य चम्पापुरी से, नेमिनाथ गिरनार से, महावीर पावापुर से तथा शेष 20 तीर्थकर सम्मेद शिखर से मोक्ष गए।
वे कौन थे …
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जिनके उपर जलती सिगड़ी रखी गई - गजकुमार
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जिन्हे जलते हुए गहने पहनाएँ गए - पाण्डव
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जिन्होंने मरणासन्न कुत्ते को णमोकार मंत्र सुनाया - जीवन्धर स्वामी
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जिन्होंने आप्तपरीक्षा ग्रन्य लिखा - विद्यानन्दि आचार्य 5. जिन्हें हाथी पर बैठे-बैठे वैराग्य हुआ - राजा मधु 6. जो णमोकार मंत्र के अपमान से नरक गए - सुभौम चक्रक 7. यशोधर मुनि के गले में मृत सर्प डाला - श्रेणिक राजा 8. जिन्हें भस्मक व्याधि हुई - समन्तभद्र
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नाटक समयसार की रचना की - बनारसीदास जी
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संवर देव ने इन पर उपसर्ग किया था - मुनि पार्श्वनाथ 11. जिनका उपसर्ग राम-लक्ष्मण ने दूर किया था - देशभूषण - कुलभूषण मुनिराज
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इस युग में प्रथम मोक्ष गए - अनंत वीर्य
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जो दीक्षा के अंतर्मुहुर्त बाद केवलज्ञानी हो गए - भरत 14. जिन पर सीतेन्द्र ने उपसर्ग किया - मुनि राम 15. जिन्हें 48 तालों में बंद रखा गया - मानतुंग आचार्य 16. जो मुनि विदेह क्षेत्र गए थे - कुन्दकुन्द आचार्य 17. जिन्हें तीन दिन तक शलायनी खाती रही - सुकुमाल 18. जिनका बाधिन ने भक्षण किया - सुकौशल
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जिन्हें वन में’ नगर बसाकर आहार दिया- चन्द्रगुप्त 20. जिनके निमित्त से द्वारिका नगरी जली - द्वीपायन मुनि 21. जिन्होंने निमित्तज्ञान से बारह वर्षीय व्यकाल की घोषणा की - आचार्य भद्रबाहु
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प्रथम स्यूतात्मक जैन ग्रन्थ लिखा- उमास्वामी 23. प्रथम जैनग्रन्थ लिखा - भूतबली - पुष्पदन्त व्याचार्य 24. जिनके पांचो कल्याणक एक स्थान पर हुए - वात्युपूज्य 25. जिनकी रक्षा सुअर ने की-
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जिनसे दशरथ ने दीक्षा ली -
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अन्तिम श्रुतकेवली - जम्बूस्वामी
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आजीवन जिन्होंने कपडे नहीं’ पहने. जिनल्येन 36. कड़वी तूमडी का विषमय आहार दिया गया- कालो
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इनके काल में श्वेताम्बर मत प्रारंभ हुआ - भद्रबाहु 38. जिनसे क्रुर भील ने व्याहियां व्रत लिया - 39. रोग निवारण हेतु मुनिपद छोड़ा - समन्तभद्र 40. जिन्होंने लवकुश को दीक्षा दी -
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100 अजैनों को जैन बनाकर आहार का जिन्होंने नियम लिया -
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जिनसे रावण ने परस्त्रीत्याग व्रत लिया - अनंतवीर्य 43. दो बकरों को बलि से बचाकर अपना सर कटवाया - 44. राजा के कहने पर मुनिपद लिया - ब्रह्मगुलाल 45. चन्द्रगुप्त को जैनधर्म में दिक्षित किया - भद्रबाहु 46. 500 पुत्रों के साथ दीक्षा ली -
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अयं शब्द का 6 माह तक अर्थ किया -
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अर्द्धरात्री में 12 भावनाओं का पाठ सुनकर वैराग्य आया, पत्नियों की साड़ियों की रस्सी बनाकर महल से उतरकर मुनि बन गए -
सुकुमाल
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अपने घर में चोरी करते हुए चोर की सहायता की - पं. बनारसी दास्य जी
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जिन्हें हाथी के पैर के नीचे कुचला गया - टोडरमलजी 57. श्रवणबेलगोला में बाहुबाले की मूर्ति बनवाई - चामुण्डराय 58. 363 पाखण्ड मत चलाए - मारीच
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प्रतिदिन 100 अजैनों को जैन बनाने का नियम लिया - जिनसेन
रिबते-नाते पहचानो,
उत्तर की बानो
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सम्यक्त्व के वात्स्यल्य अंग में प्रसिद्ध मुनि ने उपसर्ग दूर किया, उपसर्ग का निमित्त जिन मुनि का वाद- विवाद था उनके गुरू का नाम - अकम्पनाचार्य
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क्रिय पूजन में नौ द्रव्य चढ़ाएँ जाते हैं- जिनवाणी 2. सौधर्मेन्द्र के मुकुट पर चिन्ह - स्वस्तिक 3. ‘अन्धों के अन्धे होते हैं’ इस कथन पर घटित 4. घटना - महाभारत
स्वोखो तो जाने
(भगवान्, चिन्ह, मुनि)
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आशु करण से दिल्ली जाने को कह रहा है। 2. वीर ही रण में अपना बलिदान देते हैं। 3. भद्रबाहु बलि मुनि के संघ के आचार्य थे। 4. आप सभी की मदद से ही शिविर का आयोजन हुआ है।
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जगमग रात्रि में तारें चमक रहे हैं। 6. हे भव्य! तुम अनंत वीर्य के धनी हो। 7. श्री जिन चन्द सम उज्ज्वल मुख वाले हैं। 8. राधा तू पानी भर, तरूण आ रहा है। 9. किसकी सेना में राजधर सेनापति था। 10. वो मरा मरा कहते-कहते बच गया। तीर्थक्षेत्तों की वंदना
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हाथी का पर्यायवाची - गज - गजपंथा 2. महाभारत के समय के एक गुरु - द्रोण - द्रोणगिरी 3. एक धातु का नाम - सोना - सोनागिर 4. चन्द्रमा का अन्य नाम - चन्द्र
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100-48 - 52 - बावनगजा
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एक परमोष्ठि - सिद्ध - सिद्धाचल
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आधे का आधा - पाव - पावापुर
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भोजन का पर्यायवाची - आहार - आहार जी 9. एक उदुम्बर फल - बड़ - बड़वानी
ज्ञान पहेली
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भक्तों का वह अमरदीप है, सार प्रवचनों का अनमोल । करे प्रकाशक मोक्षमार्ग को, इष्ट उपदेश का क्या है तौल ।। भक्तामर, प्रवचनसार, मोक्षमार्ग प्र., इष्टोपदेश 2. एक अक्षर का मेरा नाम, सम्पूर्ण जिनागम का मैं सार । पंच प्रभुका मैं हूँ धाम, बोलो क्या है मेरा नाम ।। ॐ
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पांच अक्षर का मेरा नाम, शुद्धातम का मुझमे धामा कुन्दकुन्द का मुझमे नाम, बोलो क्या है मेरा नाम ।। समयसार
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तीन अक्षर का मेरा नाम, आता हूँ रहने के काम । मुझसे बड़ा न जग में कोई, नाम बताओं मेरा कोई ॥ आकाश
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चार अक्षर का मेरा नाम, चारों गति में मेरा धाम। उल्टी श्रद्धा मेरा काम, सारा जग मुझसे परेशान ॥ मिथ्यात्व
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पांच अक्षर का मेरा नाम, जानुजग के सब पदार्थी मैं रहता हूँ अपने अंदर, फिर भी दुनियाँ मेरे अंदर ॥ केवलज्ञान
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एक पुरुष जिनवर ने देखा, पाँव पसारे खड़ा हुआ। हाथ कमर पर रखे हुए, काल अनंत से खड़ा हुआ ॥ लोक
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सब पापी मेरे घर आते, सात घरों में दुःख पाते। तिल-तिल करे देह के खण्ड, भूख प्यास भी लगे प्रचण्ड।। नरक
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सान नहीं है असान नहीं है, सुख या दुःख की खान नहीं है। पांच भाई है मेरे जग में, जीव शब्द भी रहता मुझमे।। अजीव
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जो जीवों को दुःख देता है, वह मुझको धारण करता है। मैं ले जाती नरको बीच, मुझमे है पापों का बीज।। हिंस्या
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मैं सबको कसकर दुःख देती, सबकी सुख शान्ति हर लेती। मैं हूँ आकुलता की माता, मेरा नाम किसे है आता।। कषाय
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दो अक्षर का मेरा नाम, रहता हूँ मैं सुख के धाम। काम-धाम से हूँ बेकार, नाम बताएँ मेरा आप।। सिद्ध
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छियासठ दिन तक मौन रहे, प्रभु अवसर का इंतजार किया। इन्द्रभूति गणधर आया तो, जीवों का उद्धार किया।। महावीर स्वामी
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दो अक्षर का मेरा नाम, सारे जग के आता काम। मुख्य गौण करके मैं जानु, श्रुतसान में मेरा धाम।। नय
कुन्दकुन्द आचार्य
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मोक्षमहल की प्रथम सिढ़ि, कहते जिसे धर्मो का मूल। बिन इसके तो देव दुःखी है, इसके सहित नरक अनुकूल।। सम्यग्दर्शन
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मोक्षपुरी एक ने पाई, एक हुआ परिपूर्ण ज्ञानी। उस दिन का तुम नाम बताओं, नहीं रहोगे तुम अज्ञानी।। दीपावली
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ऐसे शाश्वत पर्व बताओ, महिने में दो-दो आते। स्वयं भाव जगाते, श्रावक के मन भाते।।
अष्टमी, चतुर्दशी
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मेरा मस्तक सबसे ऊंचा, बोलो क्या है मेरा नाम। मैं रावण को नरक ले गया, सब लोगों में मेरा धाम।। मान
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दो अक्षर का मेरा नाम, आता हूँ मुक्ति के काम । प्रथम करे तो रम बन जाँऊ, अंत करे तो घर जाँऊँ ।। धर्म
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दो अक्षर का मेरा नाम, बिना कमाए ही आराम । नाम अमर है दूजा मेरा, अमृत पीने का है काम ।। देव
चोरी
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मुझे चाहीए रूपया पैत्या, बोलो मेरा रूप है कैया। तृष्णा देवी मेरी माता, तीन लोक की संपति स्वाता।। परिग्रह
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जिसके सर पे मैं हूँ जाता, उसकी होठे भुजा फडफड़ाता। जो मुझमे अंधा हो जाता, छोटा बड़ा उसे न सुहाता ।। क्रोध
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तीन अक्षर का मेरा नाम, पूरे लोक में मेरा धामा। स्यारी दुनियाँ चलकर सकती, दुनियाँ कहती मेरा कामा।। अधर्म द्रव्य
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सब सायक यतो का प्यारा, मैं अविनाशी स्युख का धामा। रत्नत्रय के तरू पर फलता, बोलो क्या है मेरा नाम।। मोक्ष
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नौ नाली जिस नगर में, सदा रहे बरख्यात।
गली-गली में रोग हैं, सड़ा करे दिन-रात।।
शरीर
- स्वर्गों के राजा कहलाएँ, तीर्थंकर को न्हवन कराएँगे। चिन्ह देखते सबसे पहले, हम सब उनका नाम बताएँगे।। सौधर्म इन्द्र
प्रश्नावली
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पुद्गल के विशेष गुण - 4
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सबसे छोटा पुद्गल - परमाणु
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तीर्थकर कितने हैं - 24
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बालब्रह्मचारी कितने हैं - 5
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उपसर्ग विजेता कितने हैं - 2
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एकाधिक नाम वाले कितने हैं- 5. तीन पद के धारी कितने हैं- 6. शिखर जी श्ये मिलने मोक्ष गए -
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बुरे कार्य को कहते हैं- 2. पापों से विराक्त पर प्राप्त होते हैं- 3. पाप कितने हैं-
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हिस्सा के मिलने भेद हैं- 5. पाप का फल क्या है -
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पाप का बाप कहा जाता है - पाप
व्रत
पाँच
चार
नरक
लोभ
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जीव के स्वतत्त्वरूप भाव कितने हैं- 2. औपशामिक भाव के भेद - 3. औदयिक भाव के भेद -
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संयमासंयम किस्य भाव का भेद है- 5. क्षायिक भाव के भेद - 6. तीन भेद कौनसे भाव के हैं- क्षायोपशामिक
पारिणामिक
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गतियाँ कितनी हैं-
-
नरक कितने हैं-
चार
सात
- देवों के निकाय कितने हैं - 4. मनुष्यों के भेद कितने हैं- 5. गति किस्य कर्म का भेद है - 6. तिर्यञ्च कहाँ पाए जाते हैं - चार
दो
नाम
सम्पूर्ण लोक
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गुणों के समुह को कहते हैं- 2. द्रव्य कितने हैं-
-
रूपी द्रव्य कितने हैं- 4. अमूर्तिक द्रव्य कितने हैं- 5. एक मात्र चेतन द्रव्य का नाम है - 6. एक प्रदेशी द्रव्य है - द्रव्य
एक
पाँच
जीव
काल
- कर्मों के कितने भेद हैं - 2. ज्ञानावरणादि कौनसे कर्म हैं- 3. द्रव्यकर्म के मूलभेद कितने हैं- 4. शरीर व पर्याप्ति कौनसे कर्म हैं- 5. भावकर्म में क्या आते हैं- 6. द्रव्यकर्म के सम्पूर्ण भेद कितने हैं- द्रव्यकर्म
आठ
नोकर्म
मोह-राग - द्वेष
- मद कितने हैं-
आठ
-
अहंकार को कहते हैं -
-
मद किसको दूषित करता है - 4. मद को यह भी कहते हैं - 5. ज्ञानमद किसे होता है - 6. सुंदरता पर अभिमान कौनसा मद है -
मद
सम्यग्दर्शन
मान, घमंड
उपसानी
रूपमद
- सच्चे देव के तीन गुण कौनसे - 2. पंच परमेष्ठी में देव कितने - 3. राग-द्वेष रहितपना कहलाता है - 4. लोकालोक को जानना है - 5. सच्चे देव का अन्य नाम - 6. आप्त कितने दोष रहित होते हैं -
वीतरागी सर्वज्ञ हितोपदेशी दो
वीतराग
सर्वज्ञता
आप्त
-
चित्त की एकाग्रता कहलाती है - 2. ध्यान के भेद हैं -
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ध्यान का उत्कृष्ट काल है - 4. धर्मध्यान के कितने भेद हैं - 5. पापों में आनंद मानना है - 6. मोक्ष में कारणभूत ध्यान हैं -
ध्यान
चार
अंतर्मुहुर्त
चार
रौद्रध्यान
धर्म, शुक्ल ध्यान
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समवशरण की समाएँ - 12
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समवशरण के स्वनाकार - कुबेर
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कितने मानस्तंभ होते हैं - चार
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जिनेन्द्र का मुख कौनसी दिशा में - पूर्व, उत्तर 5. सिंहासन से जिनेन्द्र कितने ऊंचे - चार अंगुल 6. कितनी सीढ़ियाँ होती हैं - 20,000
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सबसे पहला द्वीप - जम्बुद्वीप
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लवण समुद्र के जल का स्वाद - नमक जैसा 3. पुष्करवरद्वीप को विभाजित करने वाला पर्वत - मानुषोत्तर 4. मनुष्य गमन कहाँ तक - पुष्कराद्ध द्वीप, ढाई द्वीप 5. द्वितीय द्वीप का नाम - धातकी खण्ड
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द्वितीय समुद्र का नाम - कालोदधि
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जन्माभिषेक किस पर्वत पर - सुमेरू पर्वत 2. कितने कलशों द्वारा अभिषेक - 1008
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कौनसे जल से अभिषेक - क्षीर सागर के जल 4. जन्म पर प्रसुतिगृह से बाहर लाने वाली - शचि इन्द्राणि 5. इन्द्र के किस हाथी पर गमन - ऐरावत
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किस शिला पर अभिषेक - पाण्डुक
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इन्द्रियों के कुल विषय - 2. स्पर्शनेन्द्रिय के विषय - 3. रत्यनेन्द्रिय के विषय - 4. घाणेन्द्रिय के विषय - 5. चक्षु इन्द्रिय के विषय - 6. कर्णेन्द्रिय के विषय -
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कौन से द्वीप में -
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कौन से क्षेत्र में - 3. उस पर कितने चैत्यालय - 4. कितना ऊंचा है -
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सुमेरू पर्वत संबंधित वन - 6. पर्वत की चूलिका कितनी ऊंची हैं -
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माता कितने स्वप्न देखती है - 2. माता की सेवा करने वाली कुमारियाँ - 3. रत्नवर्षा कितने माह तक - 4. रत्नवर्षा कौन करता है - 5. तीर्थंकर जन्म से कितने ज्ञानधारी - 6. एक दिन में कितने रत्न बरसते हैं -
जम्बु द्वीप
विदेह क्षेत्र
एक लाख चालीस्य योजन
चार
चालीस्य योजन
कुबेर
तीन
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श्रावकों के मूलगुण कितने - आठ
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उदुम्बर फल कितने हैं- पांच
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उडुम्बर फलों का अन्य नाम -
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मकार कितने होते हैं- तीन
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उदुम्बर फल में क्या रहते हैं- त्रस जीव 6. पंच उदुम्बर, तीन मकार क्या हैं- अभक्ष्य
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सिद्ध के कितने कर्म नष्ट - 8
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सिद्धालय में कबतक रहेंगे- अनन्त काल 3. सिद्धों का आकार- किंचित न्यून पुरुषाकार 4. सिद्धों के गुण कितने - 8
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सिद्धों के कितने शरीर - एक भी नहीं 6. सिद्ध को कहते हैं- अशरीरि, मुक्त
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काल के कितने भेद हैं- दो
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एक कल्पकाल कितना लम्बा होता है- 20 कोड़ाकोड़ी स्यागर 3. सर्वाधिक दुःख कौनसे काल में - दुषमा - दुषमा 4. तीर्थकर कौनसे काल में होते हैं- दुःखमा सुखमा 5. काल परिवर्तन कहाँ-कहाँ होता है- भरत, ऐरावत क्षेत्र 6. अवसर्पिणी के कितने भेद हैं- छह
वक्ता के अभिप्राय को कहते हैं - नय किसके अंबा को विषय करता है - नय के मूल भेद कितने हैं - इव्यांश को ग्रहण करने वाला नय - पर्यायांश को ग्रहण करने वाला नय - तत्त्वारसूत्र में नय के कितने भेद - नय
प्रमाण
दो
द्रव्यार्थिक
पर्यायार्थिक
सात
अरहन्त के कितने कर्म नष्ट - जन्म के अतिशय कितने -
प्रातिहार्य कितने होते हैं - मूलगुण कितने होते हैं - कितने दोष रहित हैं -
मुख्य मूलगुण कितने हैं - चार
महावीर के कितने नाम -
पिता का नाम -
माता का नाम -
जन्म कब हुआ -
निर्माण पर मनाया जाने वाला त्यौहार - गणधर कितने थे -
सिद्धार्थ
त्रिशला
चैत्र शुक्ल त्रयोदशी
दिपावली
1 परनोल्ड कितने हैं- पाँच
2 संसारी कितने हैं- चार
- केवल ज्ञान युक्त कितने हैं- दो
4 सशरीरी कितने हैं- चार
- कितने देव. कितने गुल- दो देव, तीन गुरू 6. अष्ट प्रातिहार्य युक्त कौनसे - अरहते
1 इसमें कित्यको नमस्कार किया है- पंच परमेष्ठि 2. इसमें कितने अक्षर हैं- 35
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कौनसे छन्द में लिखा गया है- यार्या/ गाया 4. कौनसे मृन्ध का मंगलाचरण है - षट्खण्डागम 5. इसमें कितनी मात्राएं हैं- 58
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पंच परमेष्ठि के व्याद्याक्षरों से बना बाब्द- ॐ
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चेतना रहित कौन - अजीव
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राजीव इव्य कितने हैं- पाँच
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धर्मद्रव्य का कार्य - गति हेतुत्व 4. आकाश इत्य के भेद कितने हैं- दो
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आकाश द्वव्य का कार्य- अवगाहन
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काल इल्य का कार्य - परिणमन
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गुणस्थान कितने हैं - 14
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कौनसे गुणों की तारतम्यरूप अवस्था - श्रद्धा, चारित्र 3. क्षपकश्रेणी के गुणस्थान कितने - 4 4. मुनियों के गुणस्थान कौनसे - 6 से आगे 5. अरहंत कौनसे गुणस्थान में - 13-14 6. सम्यक्त्व कौनसे गुणस्थान से - 4 से फोन नम्बर
55567 - मुनि के 28 मूलगुण
5 महाव्रत, 5 समिति, 5 इन्ड्रिय विषय, 6 आवश्यक, 7 शेष गुण
10101448 - अरहंत के 46 मूलगुण
10 केवलज्ञानातिशय, 10 जन्मातिशय, 14 देवकृत अतिशय, 4 अनंत चतुष्टय, 8 प्रातिहार्य
2499912 - 63 शलाका पुरुष
24 तीर्थंकर, 9 नारायण, 9 प्रतिनारायण, 9 बलभद्र, 12 चक्रवर्ती
43311116 - औदयिक भाव के 21 भेद
4 गति, 4 कषाय, 3 लिंग, मिथ्यादर्शन, अज्ञान, असंयम, असिद्धत्व, 6 लेब्या
4335111 - क्षायोपशमिक भाव के 18 भेद
4 ज्ञान, 3 दर्शन, 3 अज्ञान, 5 लाब्धि, सम्यक्त्व, चारित्र, संयमासंयम
1012536 - आचार्य के 36 मूलगुण
१० धर्म, १२ तप, ५ आचार, ३ गुप्ति, ६ आवश्यक
५०४२२५२११ - १०० इन्द्र
५०० भवनवासी, ३२ व्यंतर, २५ स्वर्ग, २ ज्योतिष, १-१ नर-ति. TITLE
१४१० - परिग्रह (अंतरंग - बहिरंग) ८५५२ - पुद्गल की २० पर्याय / विषय ४ स्पर्श, ५ रस, ५ वर्ण, २ गन्ध ४४४४ - कषाय चौकड़ी
४४४४ - ध्यान (आर्त्त, रौद्र, धर्म, शुक्ल) १११४ - उपाध्याय के २५ मूलगुण
११ अंग, १४ पूर्व
८८६३ - सम्यक्त्व के २५ दोष नहीं होते ८ शंकादि दोष, ८ मद, ६ अनायतन, ३ मूढ़ता ५३५५८ - णमोकार मंत्र
१६९९५ - ऊर्ध्वलोक
१६ स्वर्ग, ९ अनुदिश, ९ ग्रैवेयक, ५ अनुत्तर SS
एक
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आत्मा
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मुनि ऋषभदेव ने आहार लिया इतने काल बाद 3. दिगम्बर मुनि दिन में इतनी बार आहार लेते हैं 4. अधर्मद्रव्य
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धर्मद्रव्य
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सुमेरु पर्वत
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चेतन द्रव्य
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अनास्तकाय द्रव्य 9. रूपीद्रव्य / मूर्तिक द्रव्य 10. लोक के बाहर भी व्याप्त द्रव्य 11. जम्बुद्वीप में मेरू 12. अविग्रह गति का काल दो
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जीव के भेद
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संसारी जीव के भेद 3. वनस्पति के भेद 4. निगोद के भेद
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औपशमिक भाव के भेद 6. गंध के भेद
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नय
-
मोह
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गोत्र
-
काल
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राजा ऋषभदेव की पुत्रियाँ 12. आकारा
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विहायोगति
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प्रत्येक वनस्पति 15. कर्म
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मिथ्यात्व
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जम्बू द्वीप में कालपरिवर्तन के क्षेत्र 18. क्रियाशील द्रव्य 19. घातकीखण्ड द्वीप में मेख 20. वैमानिक देव
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मनुष्य के दो भेद तीन
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रत्न
२. भाव
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पारिणामिक भाव 4. वेद
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गुप्ति
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जन्म
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कर्म
-
गुणवृत
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अज्ञान
-
एकाधिक नामधारी तीर्थंकर 11. अनेकपदधारी तीर्थंकर 12. मिथ्यात्व 13. मूढ़ता
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लोक
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सम्यक्त्व 16. अविगृह गति का समय / काल 17. मकार
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शल्य
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योग
चार
-
कषाय
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कषाय चौकड़ी 3. ध्यान
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आर्त ध्यान के भेद 5. रौद्र ध्यान 6. धर्म ध्यान
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शुक्ल हयान
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देवों के निकाय 9. गति
-
अनंत चतुष्टय 11. शिक्षाव्रत 12. विकला
-
विनय
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क्षपकश्रेणि के गुणस्थान 15. उपराम श्रेणि के गुणस्थान 16. व्यवहार नय के भेद 17. निश्चयनय
-
आयु
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आनुर्पूव्य 20. निष्क्रिय द्वव्य 21. धाति कर्म
-
त्रस
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दान
-
सुमेरू पर्वत के वन 25. अघाति कर्म 26. हिंसा
Scanned with CamScanner पांच
- पाप
२. परमोत्लि
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महाव्रत
-
अणुव्रत
S. स्यमिति
-
इन्द्रिय
-
इन्द्रिय विजय 8. आचार
-
शरीर
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व्यसाधारण भाव 11. स्वाध्याय के भेद 12. परमागम
-
मेरुपर्वत 14. अचेतन इव्य 15. अरूपी द्रव्य 16. ज्ञान
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बालयति
-
एस
-
वर्ण
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कल्याणक
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ज्ञानावरण के भेद 22. अंतराय कर्म 23. जाति
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पूजा के अंग 25. अनुत्तर
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परावर्तन
-
आस्तकाय
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कौनसे स्वर्ग के देव लोकान्तिक कहलाते हैं 29. दीक्षासमय सम्बोधन करने वाले देव 30. ज्ञानावरण 31. उदुम्बर फल 32. निद्रा
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मरण
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लाब्धि
१. द्रव्य
२. आवश्यक
३. लेग्या
४. अन्तरंग तप ५. बहिरंग तप ६. काय
७. कुलाचल पर्वत ८. षडरखण्ड ९. काल
१०. अनायतन ११. पर्याप्ति १२. आयतन
१३. संस्थान १४. संहनन
१५. सरोवर
१६. सामान्य गुण १७. कारक
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तत्त्व
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मुनि के शेष गुण 3. नरक
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क्षेत्र
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नय (तत्त्वार्थ सूत्र) 6. महावीर की ऊंचाई 7. सप्तर्षि
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व्यसन
आठ
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कर्म
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सिद्ध के मूलगुण 3. पृथ्वीयाँ
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प्रातिहार्य 5. स्पर्श
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पूजन के द्रव्य 7. मद
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निशंकादि अंग 9. शंकादि दोष
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अष्टपाहुड़ 11. श्रावक के मूलगुण 12. अष्ट मंगल द्रव्य नौ
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निधि
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पदार्थ
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नवद्या भाक्ति 4. लाब्ध
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क्षायिक भाव के भेद 6. नोकषाय
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अनुविश
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देवेयक
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नारायण
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प्रतिनारायण 11. वर्शनावरण 12. योनि
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नवदेवता दस
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दबालक्षT 2. कल्पवृक्ष 3. जन्मातिशय 4. केवलज्ञानातिशय 5. भवनवासि 6. प्राण
डांग्ग्रेजी को हिन्दी में बोलो,
सही उत्तर टटोलो …
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A एक समिति का नाम - एषणा
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A जम्बुद्वीप में कितने मेरू पर्वत हैं - एक 3. B विद्यमान तीर्थकर कितने - बीस
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C विदेह क्षेत्र के एक तीर्थकर - सीमन्धर 5. C मुनियों के गमन संबंधी समिति - ईर्या 6. G कुत्ते को णमोकार मंत्र सुनाया - जीवन्धर 7. I आचार्यों को णमोकार मंत्र में कहा - आइरियाणं 8. J जिनेन्द्र की आज्ञा मानने वाला - जैन 9. K ज्ञान का एक भेद - केवलज्ञान
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L ये मध्यम पात्र कहलाते हैं - एलक 11. O एक प्रकार का शरीर - औदारिक
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P एक उदुम्बर फल - पीपल
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R भगवान् के गुणानुवाद का उपन्य नाम - आरती 14. T मुख्य ग्रन्थ के आधार पर की गई एचना - टिका 15. U यह पीढी धर्म से विमुख हो रही है - युवा 16. V 700 मुनियों की रक्षा करने वाले - विष्णुकुमार 1. अरहंत - चार घातियाँ कर्मों के नाश 2. सिद्ध - पूर्ण निर्मल पर्याय
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आचार्य - मुनि संघ के नायक
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उपाध्याय - मुनिसंघ के अध्यापक
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साधु - 28 मूलगुण के धारक
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उत्तम - लोक में सबसे महान्
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मंगल - राग-द्वेष गलाकर सुख देने वाला 8. शरण - सहारा
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विश्व - छः द्रव्यों का समुह
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द्रव्य - गुणों का पिण्ड
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गुण - सहभावी पर्याय
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पर्याय - गुणों का परिणमन
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रक्षाबंधन - 700 मुनियों का उपसर्ग निवारण 14. दीपावली - भगवान् महावीर का निर्वाण दिवस 15. अक्षय तृतीया - मुनि ऋषभदेव का प्रथम आहार 16. टोडरमल जी - मोक्षमार्ग प्रकाशक के रचयिता 17. कुन्दकुन्दाचार्य - पंच परमागम के कर्ता 18. वितरागी - 18 दोषों से रहित
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भ. महावीर - वर्तमान शासन नायक
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निःसहि - सर्व सांसारिक कार्यों का निषेध 21. 148 - 8 कर्मों की कुल प्रकृतियाँ 22. तीर्थकर - धर्म तीर्थ के उपदेशक
170 - अजितनाथ तीर्थंकर के काल में हुण। 24. गजपंथ - 7 बलभद्र, 8 करोड़ मुनियों की निर्वाणभूमि 25. मांगीतुंगी - 99 करोड़ मुनियों की निर्वाणस्थली 26. हस्तिनापुर - 3 कामदेव तीर्थंकरो की जन्म स्थली 27. दिगम्बर - दिशा ही है बस्त्र जिनका 28. मानुषोत्तर पर्वत - मनुष्यलोक की सीमा 29. चक्रवर्ती - षट् खण्डों के अधिपति 30. ओम् - पंच परमेष्ठियों का सूचक
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उत्पाद - द्रव्य की नवीन पर्याय की उत्पत्ति 32. व्यय - द्रव्य की नवीन पर्याय का नाश 33. ध्रौव्य - द्रव्य की नित्यता।
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अभक्ष्य - न खाने योग्य परार्थ
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भव्य - जिसमें मोक्ष जाने की योग्यता हो 36. अयोध्या - तीर्थकरों की जन्मभूमि शाश्वत 37. अर्धकथानक - हिन्दी की प्रथम आत्मकथा 38. नय - जो वस्तु के एकांश को ग्रहण करें। 39. पूजा - जिनेन्द्र भगवान् का गुणानुवाद 40. मकार - मद्य, मांस, मधु का त्याग 41. श्रावक - श्रद्धावान, विवेकवान, क्रियावान 42. आवश्यक - अवश्य करने योग्य कार्य 43. जिनवाणी - जिनेन्द्र भगवान् की वाणी 44. स्याद्वाद - अनेकांत की कथन पद्धति 45. अनेकांत - अनंतधर्मात्मक वस्तु
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जैन - जिनेन्द्र की आज्ञा मानने वाला TITLE
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समयसार - अध्यात्म शास्त्रों की परमेश्वरी 48. भद्रबाहु - 12 वर्षीय अकाल की घोषणा करने वाले 49. अहिंसा - परमधर्म
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समवाय - कार्य के नियामक कारण Scanned with CamScanner
सीमंधर स्वामी प्रश्नोत्तर
माता - सत्यदेवी
पिता - श्रेयांस
जन्म स्थान - पूर्व विदेह, पुष्कलावती देश, पुण्डरिकीणी राजधानी
वैराग्य का कारण - बादल का विलीन होना काया - 500 धनुष, स्वर्ण सम
आयु - एक कोटि पूर्व
कुन्दकुन्द मुनि - आठ दिवस समवशरण में रहे, छोटी आकृति से एलाचार्य नाम, ४प पाहुड़ रचे वाणी पर विदेही - 1. विदेह क्षेत्त के निवासी 2. देह में रह के भी देहातीत
सीमन्धर - शब्द के 2 अर्थ -
५. अपनी सीमा में रहते हैं।
- अपने ज्ञान को अपने में सीमित कर लिया । वैराग्य में निमित्त
१. हनुमान् - तारा टूटने से
२. रामचन्द्र - लक्ष्मण की मृत्यु पर देवों के संबोधन से ३. भरत - त्रिलोकमंडन हाथी को देखकर ४. इन्द्रजीत, कुम्भकर्ण - रावण की मृत्यु से ५. सीता - अग्नि परीक्षा के बाद
६. मधु कैटभ - युद्ध के प्रत्यंग से ७. कैकयी - भरत के साथ धर्मोपदेश सुनकर ८. राजा मय - रावण की मृत्यु
९. सहस्त्र रश्मि - रावण से पराजित होने पर १०. कपिल ब्राह्मण - राम नगरी देखकर ११. पार्श्वनाथ - जाति स्मरण
१२. चन्द्रप्रभ - उल्कापात
१३. माल्लनाथ - वटवृक्ष के विनाश से जाति स्मरण १४. श्रीपाल - अपने पूर्वभव सुनने पर १५. कीर्तिधर - राहु के द्वारा सूर्य ग्रस्त होने पर १६. प्रद्युम्न - द्वारिकादहन की सुनकर १७. वज्रबाहु - जंगल में मुनिराज दर्शन पर उदयसुंदर ने कहा- क्या आप ऐसा बनना चाहते है?
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 188.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है