खोज : आनन्द की
खोज : आनन्द की
लेखिका
विदुषी डॉ. शुद्धात्मप्रभा टट्टैया
बी.ए. ऑनर्स, एम.ए., पी.एच.डी. (स्वर्णपदक प्राप्त)
मो. 09321295265 / Email: [email protected]
मुम्बई (महाराष्ट्र)
प्रकाशक :
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट
ए-4, बापू नगर, जयपुर - 302015
फ़ोन : (0141) 2705581, 2707458
E-mail : [email protected]
समग्र प्रश्नोत्तरमाला : भाग-1 : विदुषी डॉ. शुद्धात्मप्रभा टट्टैया
● प्रथम संस्करण : 1 हजार
(1 जनवरी, 2022)
● E-book प्रथम संस्करण
(25 मई, 2016)
विषय-सूची
- पृष्ठभूमि 1
- गाथा - 1 6
- गाथा - 2 7
- गाथा - 3 10
- गाथा - 4 11
- गाथा - 5 12
- गाथा - 6 13
- गाथा - 7 19
- गाथा - 8 21
- गाथा - 9, 10 23
- गाथा - 11 24
- गाथा - 12 24
- गाथा - 13 26
- गाथा - 14 27
- गाथा - 15 32
- गाथा - 16 34
- गाथा - 17-18 35
मूल्य : सात रुपये
टाइपसेटिंग :
विभूति कम्प्यूटर्स,
ए-4, बापू नगर, जयपुर
मुद्रक :
देवना कम्प्यूटर
60 परम विहार
जगतपुरा, जयपुर
प्रकाशकीय
प्रस्तुत पुस्तक ‘प्रश्नोत्तरमाला भाग-1’ की लेखिका डॉ. शुद्धात्मप्रभा टट्टैया बचपन से ही प्रतिभाशाली रही हैं। उन्होंने पूना के चव्हाण पाटने में ही जन्म जाते हैं - कहावत को चरितार्थ किया है। विदुषी की दृष्टि से वे निग्रंथों डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल के पदचिन्हों पर ही चल रही हैं। उनके द्वारा अभी तक छोटी-बड़ी 51 पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। जिनकी सूची अभी अप्रकाशित की गई है।
साथ-ही-साथ आपने जैन सिद्धान्तों पर आधारित अनेक ‘गेम्स’ भी बनाए हैं, जिनके खेलने के नियम भी जैन सिद्धान्तों का ज्ञान कराते हैं। इन ‘गेम्स’ की विशेषता यह है कि इनको खेलने से बच्चों को सैद्धान्तिक ज्ञान के साथ-ही-साथ अहिंसात्मक आचरण की अनुभूति भी सहज विकसित हो जाती है। इनमें जीत हिंसात्मक कार्य मार-पीट से नहीं, ज्ञान-ध्यान से हासिल की जाती है। बच्चों को ज्ञान-ध्यान करने की प्रेरणा मिलती है।
आपने ‘आचार्य कुन्दकुन्द और उनके टीकाकार एक समालोचनात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध कर राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की है। आपने अपने शोध ग्रन्थ में शोध समीकरणों (rules and regulations) को ध्यान में रखते हुए आचार्य कुन्दकुन्द के ग्रन्थों और टीकाकारों का सर्वांगीण (सम्पूर्ण) विवेचन सरल-सुबोध भाषा में प्रस्तुत किया है, जो कि विद्वज्जन और बुद्धिजीवी वर्ग के साथ-साथ जनसामान्य को भी अपनी ओर आकृष्ट (attract) करता है।
आपके द्वारा लिखी गई बाल पुस्तकें भी अद्यावधि (अब तक) जैन समाज में प्रचलित अन्य पाठ्यपुस्तकों से भिन्न शैली, रंगीन चित्रमय प्रस्तुति एवं मूल तत्वज्ञान के समावेश के कारण अपनी विशेष पहचान रखती हैं।
आपकी सभी कृतियाँ अध्यात्मरस से सराबोर और भेदज्ञान से ओतप्रोत हैं। आप विभिन्न आयुवर्गों को ध्यान में रखकर चित्र-चित्र शैली में अध्यात्म को सरल भाषा में जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास कर रही हैं।
प्रस्तुत पुस्तक भी उसी अभिप्राय का परिणाम है। सभी पाठक सम्यक्कार को सरलता से हृदयंगम कर सकें - इस भावना से प्रस्तुत पुस्तक का प्रकाशन किया जा रहा है। शोध प्रकाशन व्यवस्था के लिए डॉ. अखिल बंसलजी का बहुत आभार है।
- पण्डित टोडरमल स्मारक
कार्यकारी महामंत्री
अपनी बात
प्रस्तुत पुस्तक ‘प्रश्नोत्तरमाला’ में समयसार की विषयवस्तु को छोटे-छोटे प्रश्नों में प्रस्तुत किया गया है।
यह पुस्तक - डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल लिखित - ‘समयसार अनुशीलन’ के आधार पर लिखी गई है।
मैंने विषयवस्तु के आधार पर ‘मिनी समयसार’ में जो विभाजन किया है; उसी आधार से आगम की 18 गाथाओं के प्रश्नोत्तर ही इस पुस्तक में लिए गए हैं।
10-12 वर्ष पूर्व जब मैंने इस पुस्तक को गहराई से अध्ययन किया, तब विषय-वस्तु को याद रखने के लिए इन छोटे-छोटे प्रश्नों को अपनी डायरी में लिख लिया था।
कुछ माह पूर्व परमार्थ ऑनर्स के विद्यार्थियों के आग्रह पर इसको मुखबला के रूप में जैनपथ प्रदर्शक में प्रकाशित किया जाने लगा।
अनेक पाठकों के विशेष आग्रह और श्रीमती कमला भारिल्ल की विशेष प्रेरणा से यह पुस्तक आज आपके हाथों में है।
- डॉ. शुद्धात्मप्रभा टट्टैया
कीमत कम करने में सहयोग
- श्रीमती कमला भारिल्ल, जयपुर 1000.00
- श्रीमान मांगीलाल जैन, मुम्बई 1000.00
- श्री महेश जे. पारेख, मुम्बई 501.00
- श्री मानिकचन्द जैन ‘एडवेल पेन वाले’, मुम्बई 500.00
- श्री कैलाशचन्द जैन, ठाकुरगंज 500.00
कुल राशि 3501.00
परमार्थ ऑनर्स के विद्यार्थियों को सप्रेम भेंट
- श्रीमान अमितकुमार जैन, नोखा
आनन्द एक : रूप अनेक
- आनन्द ! आनन्द !!!
वाह ! वाह !! क्या शब्द है ‘आनन्द’ !!!
सुनते ही मिश्री सी घुल जाती है कानों में ! खुशी छा जाती है
चेहरों पर। आँखें चमकने लगती हैं, दिल धड़कने लगता है।
हमारे अनेकों सवालों का जवाब है - आनन्द !
जब कोई पूँछता है - ‘आप कैसे हैं?’
हमारा जवाब होता है - ‘आनन्द से!’
वह फिर पूँछता है - ‘घर में सब कैसे हैं?’
पुनः हमारा जवाब होता है - ‘आनन्द से!’
हाँ ! भाई साहब, खुशी से कहो या कुराल मंगल से या आनन्द
से - सभी पर्यायवाची ही हैं।
हम सभी आनन्द से रहना चाहते हैं, बड़ी से सुखी जीवन का
आशीर्वाद चाहते हैं, छोटों को खुश रहने का आशीर्वाद देते हैं अर्थात्
हम सभी अपना जीवन आनन्द से बिताना चाहते हैं।
2. आनंद एक : प्रश्न अनेक
आनंद में जीना चाहते हैं सभी प्राणी, आनंद में रहना चाहते हैं सभी जन। आनंद के पीछे भागते हैं सारा जीवन। पल-पल, क्षण-क्षण समेटते हैं - आनंद के पलों को। बांध कर रखना चाहते हैं मुट्ठी में उन लम्हों को। पर फिसल फिसल जाते हैं वे पल, वे क्षण, वे लम्हे।
आनंद के पल इतने छोटे क्यों होते हैं? आज जिनमें आनंद महसूस हो रहा है, कल वे तकलीफ क्यों देने लगते हैं? 'कहीं आनंद के स्वरूप को समझने में ही तो मुझसे भूल नहीं हो रही है? - ऐसे अनेकों प्रश्न उठ रहे हैं मन में, चल रहा है अंतर्द्वंद्व मन में।
3. अंतर्द्वंद्व मन का
आनंद के जिन पलों के सहारे हम अब तक अपना जीवन आनंद से व्यतीत कर रहे थे, जब वे छोटे-छोटे पल भी हमारे हाथों से फिसलने लगते हैं; हमारे जीवन से निकलने लगते हैं, तब अनेकों प्रश्न हमारे मन-मस्तिष्क में गूंजने लगते हैं:-
- क्या बचपन में है आनंद?
- क्या शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति ही है आनंद?
- क्या मन की संतुष्टि में है आनंद?
- क्या मधुर वचनों में है आनंद?
- क्या दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति में है आनंद?
- क्या खुशी के साथ दुःख अनिवार्य है?
- क्या मृग मरीचिका है आनंद?
- क्या अभी तक हम आनंद के भ्रम में जी रहे थे?
- मेरी भूल
- कहाँ है आनंद?: कैसा है आनंद?
तो क्या बचपन में है आनंद?
4. क्या बचपन में है आनंद?
बचपन का आनंद! वाह!! क्या कहने हैं बचपन के आनंद के? दिन-रात तो देखने हैं उनके सुख!
जब तक वे बोलना नहीं सीखते, तब तक तो उनकी अभिव्यक्ति सीमित, दुःख असीमित अर्थात कष्ट तो होता है उन्हें बहुत, पर बता नहीं सकते। रोना ही एकमात्र उनके कष्टों की अभिव्यक्ति का साधन है। माता-पिता अनुमान लगाते रहते हैं। भूख-प्यास आदि शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहते हैं। इन्हीं जरूरतों की पूर्ति से संतुष्ट हो जाते हैं बच्चे, मुस्कुराने लगते हैं। तो साथियों! यह है हमारे आनंदमय जीवन का आरंभ! तो क्या शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति ही है आनंद?
5. क्या शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति है आनंद?
शारीरिक आवश्यकतायें - भूख-प्यास आदि की वेदना में दुःख और पूर्ति पर प्रसन्नता का तो हमें अनादि से अभ्यास है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी आदि सभी प्राणी यह महसूस करते हैं, और वही संस्कार पैदा हुए बच्चों में साल-दो साल तक रहते हैं। ज्यों-ज्यों वह बड़ा होता जाता है, त्यों-त्यों खूब रहने की परिभाषाएं बदलने लगती हैं। कभी वह टॉफी, चॉकलेट में खुश हो जाता है; तो कभी मनपसंद खिलौने की प्राप्ति पर। इस खुशी की खास बात यह है कि अब वह शरीर की जरूरतों के अतिरिक्त मन की चाहत की पूर्ति में भी खुशी ढूँढ़ने लगा है।
इस प्रकार जब हमने शिशुओ (किड्स) पर निगाह डाली, तो हमें लगा कि शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति में है आनंद; किंतु जब बड़ों पर नज़र घुमाई, तो पता चला कि मन की संतुष्टि में भी है आनंद!
अब प्रश्न उठता है कि क्या मन की संतुष्टि में आनंद है?
6. क्या मन की संतुष्टि है आनंद?
हा! हा! हा! यह भी कोई विचार का विषय है क्या? अरे भाई! मन की संतुष्टि अर्थात इच्छाओं, चाहतों, कामनाओं की पूर्ति। बच्चा हो या, युवा हो या वृद्ध, सभी खुश होते हैं चाहतों की पूर्ति पर। हा! यह सत्य है कि मन की संतुष्टि होने पर हम कुछ पल मिल जाते हैं खुशी के; किंतु वे पल स्थाई नहीं, हमेशा रहते नहीं; क्योंकि हमारी चाहतों का अंत नहीं। चाहतों के भंडार है हम। हमारी सबकी, सभी उम्र के जनों की सारी चाहतें तो पूरी हो सकती नहीं। अतः हमें खुशी नहीं मिलती, संतुष्टि नहीं मिलती और हम दुःखी बने रहते हैं। इसलिए यदि मन की संतुष्टि में आनंद मानेंगे तो हम सभी पूर्ण संतुष्ट हो ही नहीं सकेंगे। तो क्या मीठी वाणी में, मधुर वचनों में है आनंद?
7. क्या मधुर वचन है आनंद?
मीठी वाणी! वाह!! क्या कहने मीठी वाणी के? बच्चे से बूढ़े तक-सभी दास हैं इसके। जब बच्चे भी प्यार की और डांट की भाषा पहचानते हैं, तो फिर बड़ों का तो कहना ही क्या है? हर वर्ग को अच्छी लगती है वचनों की मिठास-इसमें दो मत नहीं; पर यदि हम मात्र वाणी में ही आनंद मानेंगे, तो फिर जो बोल नहीं सकते अथवा मौन रहते हैं, वे तो इस आनंद से वंचित ही रह जायेंगे। हाँ, यह बात अवश्य है कि अपनी दैनिक आवश्यकताओं कि पूर्ति में सभी को खुशी मिलती है? तो क्या दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति में है आनंद?
बच्चा 1: वाह! वाह!!
बच्चा 2: क्या कहने!
8. क्या दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति है आनंद?
आज आप मुझसे सवाल करेंगे, तो मेरा जवाब ‘ना’ में ही होगा। पर ‘हाँ’, एक समय था जब मैं दैनिक अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी तरसता था और उनकी पूर्ति होने पर खुश हो जाया करता था। आज मेरे पास सब कुछ है, धन-दौलत, संपत्ति, परिवार; पर आनंद न जाने कहाँ खो गया है? जो मिला है उसे बनाए रखने के टेंशन में, न संपत्ति का उपयोग कर पाता हूँ, न परिवार को समय दे पाता हूँ। झल्लाहट, चिड़चिड़ाहट मेरे स्वभाव के अनिवार्य अंग बन गए हैं। हाँ! टॉप पोजीशन पर पहुँचने का सुकून अवश्य है मुझे; साथ ही है, टॉप पर बने रहने का टेंशन भी!
क्या खुशी के साथ दुःख अनिवार्य है? आज तो यही है मेरा अंतर्द्वंद्व।
9. क्या खुशी के साथ अनिवार्य है दुःख?
आज जब मैंने अपने जीवन पर दृष्टि डाली, तो मुझे आभास हुआ कि जब-जब भी मुझे कोई खुशी मिली है; वह अकेली नहीं आई। अपने साथ दुःख अवश्य लाई। जैसे- पेट भर मनपसंद खाने की खुशी मिली तो अनेक बीमारियों का दुःख भी हुआ। आराम करने का सुख मिला, तो वजन बढ़ने का दुःख भी हुआ। दामाद अच्छा मिलने की खुशी हुई, तो बेटी की विदाई का दुःख भी हुआ। क्या-क्या गिनाऊँ, आप सभी तो भुक्तभोगी हैं। ऐसे 10-20 उदाहरण आपके पास भी होंगे ही। अब प्रश्न उठता है, क्या मृग मरीचिका है आनंद?
10. क्या मृग मरीचिका है आनंद?
आज आपके प्रश्न ने मुझे सोचने को मजबूर कर दिया है। मैं आज तक कभी शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति में, तो कभी मीठे वचनों में, तो कभी मन की जरूरतों की पूर्ति पर खुशी खोजता रहा हूँ। मन, वचन, काय की इन जरूरतों से ऊपर उठा भी हूँ तो कभी बाह्य वस्तुओं में, तो कभी बाह्य प्रवृत्तियों में, क्रियाओं में आनंद ढूँढ़ता रहा हूँ। पर आज समझ आ रहा है कि यदि वस्तुओं कि प्राप्ति और अनुकूल बाह्य प्रकृति में आनंद होता तो मुझे आज आनंद मिलना चाहिए? पर ऐसा तो नहीं हो रहा है। आज भी अनेक प्रश्न उठ रहे हैं मेरे मन में। आजतक जिस खुशी से हम परिचित हैं; क्या वही है आनंद अथवा अभीतक हम आनंद के भ्रम में जी रहे थे?
11. क्या अभी तक हम आनंद के भ्रम में जी रहे थे?
मुझे जीवन में कभी खुशी मिली ही न हो, ऐसी बात नहीं है। पर आनंद के कुछ पलों को तरस रहा हूँ! जिन चीजों की उपलब्धि पर कल तक खुशी मिलती थी, आज वही दुःखकर लगने लगी है। जिनका साथ कल तक अच्छा लगता था, आज उनसे दूर जाने का मन करने लगा है। अधिक क्या कहूँ? सारे अनुकूल संयोग आज प्रतिकूल लगने लगे हैं। आज महसूस हो रहा है कि मैं अब तक भ्रम में जी रहा था। तो क्या जिस खुशी में हम आनंद मान रहे थे, वह आनंद का आभास मात्र था? आज मुझे मेरी गलती समझ आ गई है। मेरी यह भूल क्या थी?
12. मेरी भूल
मेरी एक नहीं, अनेकों भूलें थी। सर्वप्रथम मैंने अपनी खुशी ‘साथ’ में ढूँढ़नी चाही। बचपन से माँ-बाप में, फिर भाई-बहन में। ज्यों-ज्यों बड़े होते गए साथ का दायरा बढ़ता गया और खुशी के लिए अधिक पराधीन हो गए। कभी दोस्तों के, तो कभी पत्नी-बच्चों के साथ में।
पत्नी बच्चों के साथ के छोटे-छोटे पलों के लिए तो अपना तन, मन, धन, सभी समर्पित कर दिया। मेरी यह ‘साथ’ की भावना ही पहली भूल थी यह आज समझ आया। तो फिर कहाँ है खुशी? कहाँ है आनंद?
13. कहाँ है आनंद?
आज मुझे समझ आ रहा है; पर के साथ में, संयोगों में खुशी मिल सकती है; आनंद नहीं।
वस्तुतः मैं आनंद नहीं, वस्तु में आनंद नहीं, तो मिलेगा कहाँ से? आनंद तो बिल्कुल व्यक्तिगत वस्तु है, जो कि मुझमें ही है। नहीं! नहीं! मुझमें आनंद नहीं, मैं स्वयं आनंद स्वरूप हूँ, आनंद का घन पिंड हूँ। अब प्रश्न उठता है कि यदि मैं आनंद का पिंड हूँ, अभी तक मुझे मिला क्यों नहीं आनंद? क्या स्वरूप है आनंद का? क्या अंतर है दोनों आनंद में? क्या दुःख रहित आनंद प्राप्त किया जा सकता है? यदि हाँ तो कैसे? कैसे? इन सभी की क्रमशः चर्चा कर आयेंगे है हम ‘मिनी समयसार’ में।
14. आनंद! अनिन्द्रिय आनंद! अनंत आनंद!!
पहली नजर में देखें तो आनंद, अनिन्द्रिय आनंद, और अनंत आनंद यह सभी पर्यायवाची से ही लगते हैं; पर यदि सूक्ष्मता से विचार करें तो इनमें भेद है, काफी गहरा भेद है। न केवल क्वालिटी (Quantity) भेद है, अपितु क्वालिटी (Quality) भेद भी है।
उक्त शीर्षक में क्वांटिटी (Quantity) भेद के साथ-साथ क्वालिटी (Quality) भेद की ओर भी इशारा किया गया है।
तो आइये दृष्टांत करते हैं, आनंद की क्वालिटी (Quality) पर।
चित्र
15. अंतर आनंद की क्वालिटी का
पहला आनंद सांसारिक आनंद के लिए प्रयुक्त किया गया है। जो इंद्रियों से प्राप्त होने के कारण इंद्रिय आनंद भी कहलाता है। अज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव की ही पाँचों इंद्रियों के विषय भोगों में सुख बुद्धि होती है।
दूसरा अनिन्द्रिय आनंद और तीसरा अनंत आनंद ये दोनों ही पारमार्थिक आनंद हैं। दोनों ही इंद्रियों की सहायता से न होने के कारण अतीन्द्रिय कहलाते हैं। दूसरा आनंद मनजनित होने के कारण अनिन्द्रिय भी कहलाता है। पर केवलज्ञानियों का आनंद अतीन्द्रिय ही कहलायेगा, अनिन्द्रिय नहीं; क्योंकि उनके मन नहीं होता और जिस आनंद का कभी अंत नहीं होता ऐसा आनंद अतीन्द्रिय आनंद कहलाता है। ज्ञानी जीवों की पंचेंद्रियों के विषय भोगों में सुख बुद्धि नहीं होती।
इसप्रकार सांसारिक इंद्रिय आनंद और पारमार्थिक अतीन्द्रिय आनंद - दोनों की क्वालिटी में जमीन आसमान का अंतर है। अब हम आनंद की क्वांटिटी के अंतर को जानेंगे।
चित्र
16. अंतर आनंद की क्वांटिटी का
दूसरा अनिन्द्रिय आनंद ज्ञानी सम्यक् दृष्टि के आनंद के लिए और तीसरा अनंत-आनंद केवलज्ञानी के आनंद के लिए प्रयुक्त किया गया है।
सम्यक् दर्शन का आनंद वास्तविक आनंद का आरंभ है और केवलज्ञान उसी आनंद की परिपूर्णता की स्थिति है।
इसप्रकार हम देखते हैं कि पहला इंद्रिय आनंद और दूसरा, तीसरा अतीन्द्रिय आनंद में क्वालिटी भेद है तथा दूसरे सम्यक् दृष्टि के अनिन्द्रिय आनंद में और केवलज्ञानी के अतीन्द्रिय आनंद में क्वालिटी (Quality) तो समान है, पर क्वांटिटी (Quantit) असमान है।
तो आइए अब नजर डालते हैं सांसारिक और पारमार्थिक आनंदों के स्वरूप पर!
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17. अंतर सांसारिक आनंद और पारमार्थिक आनंद में
पहला आनंद - पहला सांसारिक आनंद पंचेंद्रियों के विषय भोगों को भोगने से उत्पन्न आनंद है। यह अधिक, नश्वर, दुःख सहित और दुःख का कारण भी होता है। अधिक क्या कहें? यह तो दुःख स्वरूप ही है और उसका फल भी दुखदायी होता है। यह सभी संसारीयों के अनुभूतियाग्य है। जिन संसारीयों ने अनादि से अभी तक इसके अलावा अन्य आनंद का स्वाद लिया ही नहीं। वे इसे भिन्न अन्य आनंद को जानते ही नहीं। इसे पहचानते ही नहीं; समझते ही नहीं; अतः वे इसी की प्राप्ति में निरंतर लगे रहते हैं। वे पंचेंद्रियों के विषयों की पूर्ति होने पर आनंदित होते हुए उसी में तुम रहते हैं।
धर्मगुरु, शास्त्र हमारा ध्यान इस ओर आकर्षित भी करते हैं, पर जब तक हमें उन सांसारिक सुखों में दुःख महसूस नहीं होता, तब तक हम उनकी बात पर ध्यान नहीं दे पाते। जब तक हमें विषय भोगों में आनंद मिलता रहता है, रुचि मिलती रहती है, तब तक हम पारमार्थिक आनंद की ओर कदम भी नहीं बढ़ाते हैं।
पारमार्थिक आनंद - दूसरा अनिन्द्रिय आनंद और तीसरा अनंत आनंद दोनों ही पारमार्थिक आनंद की श्रेणी में आते हैं। यह आनंद ज्ञान से उत्पन्न आनंद है; अपने ज्ञान स्वरूप में अपनेपन से उत्पन्न आनंद है।
यह सुख सहित, सुख का कारण और सुख स्वरूप और उसका फल भी सुखदायी है। यह सभी सम्यग्दृष्टियों के अनुभूतियाग्य है। जो संसारी जीव एक बार इस आनंद का पान कर लेते हैं, वे अपने संसार को सीमित कर लेते हैं और जो लगातार अंतर्मुहूर्त तक इस आनंद का पान करते रहते हैं, वे संसार से मुक्त हो जाते हैं।
18. उक्त दोनों प्रकार के आनंद को निम्न प्रकार समझ सकते हैं -
- इंद्रियों से प्राप्त इंद्रिय आनंद ही सांसारिक आनंद कहलाता है। आत्मा में अपनेपन का अतीन्द्रिय आनंद ही पारमार्थिक आनंद कहलाता है।
- मिथ्या दृष्टि का आनंद सांसारिक आनंद है। सम्यक् दृष्टि का आनंद पारमार्थिक आनंद है।
- दुःख मिश्रित खुशी सांसारिक आनंद है। दुःखरहित खुशी पारमार्थिक आनंद है।
- इंद्रिय आनंद दुःखरूप है। अतीन्द्रिय आनंद सुखरूप है।
- इंद्रिय आनंद का फल दुखदायी है। अतीन्द्रिय आनंद का फल सुखदायी है।
- अनिन्द्रिय आनंद का प्रारंभ है। अनंत आनंद, आनंद कि पूर्णता है और इंद्रिय आनंद, आनंद का आभास मात्र है।
जब तक संसार में सुख का आभास होता रहेगा, तब तक सही आनंद की खोज ही आरंभ नहीं होगी। जब दुःखों का एहसास होगा तब आनंद की खोज आरंभ होती है।
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19. आनंद की खोज
न केवल मनुष्य अपितु संसार के समस्त प्राणी प्रतिसमय आनंद की खोज करते रहते हैं। जब जहाँ उन्हें दुःखों से निवृत्ति होती है, तब वहाँ वे कुछ शांति महसूस करते हैं। उस कम दुःख को वे सुख समझ बैठते हैं; जैसे भूख लगी, तो भोजन मिलने पर किंचित तृप्ति मिली; खुजली हुई, खुजाने पर कुछ शांति मिली; प्यास लगी, पानी पीने पर संतुष्टि हुई - ऐसे ही हमारे जीवन में छोटे-छोटे पल होते हैं, जिनमें हमें कुछ देर सुकून भी महसूस होता है। उन छोटे-छोटे पलों में हम आनंद अनुभव कर अपने को सुखी समझते हैं। जबकि यह सभी पलभर की संतुष्टि है। इसप्रकार हम जीवनभर आनंद की खोज करते रहते हैं और पलों की तृप्ति में संतुष्ट हो जाते हैं; क्योंकि अनेक रूप में हमारे सामने आता है। आनंद के नकली मीठेपन में उलझ हम असली आनंद की कद्र हम ही नहीं बढ़ा पाते हैं।
साधन की दृष्टि से यदि विचार करें तो जीव तीन प्रकार से आनंद की अनुभूति करता है -
(1) इंद्रियों के द्वारा होने वाला इंद्रिय ज्ञान और इंद्रिय आनंद।
(2) मन के द्वारा होने वाला अनिन्द्रिय मनजनित ज्ञान और अनिन्द्रिय आनंद।
(3) सीधा आत्मा के द्वारा होने वाला अतीन्द्रिय ज्ञान और अतीन्द्रिय आनंद।
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19. इंद्रिय आनंद
इंद्रियों से प्राप्त होने वाली खुशी को ही यहाँ इंद्रिय आनंद कहा जा रहा है।
संसार में, लोक में इसे ही आनंद माना जाता है, अतः इसे ही ‘सांसारिक आनंद’ या ‘लौकिक आनंद’ भी कहते हैं। सभी संसारी जीवों के पास इंद्रियाँ होती हैं। वे सभी जीव इंद्रियों द्वारा ही जानते हैं, सुख-दुःख का वेदन करते हैं इतना विशेष कि पेड़-पौधों के पास एकमात्र स्पर्शन इंद्रिय ही होती है, अतः वे स्पर्श द्वारा ही सुख-दुःख का वेदन करते हैं।
इसीप्रकार इल्ली, चींटी, मच्छर, पशु-पक्षी आदि को क्रमशः दो, तीन, चार और पाँच इंद्रियाँ होती हैं। जिनके द्वारा सभी जीव क्रमशः स्पर्श, रस, घ्राण, वर्ण और शब्द को जानते हैं।
चूँकि हम मनुष्यों को पाँच इंद्रियाँ प्राप्त हैं, अतः हम सभी पाँचों इंद्रियों के माध्यम से आनंद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि सभी मनुष्यों और पाँच इंद्रियों वाले कुछ थलचर, जलचर, नभचर-हाथी, शेर, मछली, तोता आदि पशु-पक्षियों के मन भी होता है। मन होने पर मन सहित सभी जीवों को एक विशेष शक्ति प्राप्त हो जाती है, जिसकी विशेष चर्चा ‘अनिंद्रिय आनंद’ के प्रकरण में की जाएगी।
पाँचों इंद्रियों की वृत्ति बहिर्मुखी होती है अर्थात् उनके द्वारा बाह्य वस्तुओं (मूर्त पदार्थों) का ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है; अतः वे बाह्य साधनों में ही सुख ढूँढ़ती हैं।
आप सभी स्वयं अपने जीवन पर दृष्टिपात करें तो पाएँगे कि पाँचों इंद्रियों के द्वारा होने वाले कुछ ज्ञानों में हम अनुकूलता फीलिंग करते हैं और कुछ फीलिंग्स में प्रतिकूलता। जिनमें अनुकूलता महसूस होती है, उनमें हमें सुख का एहसास होता है और जिनमें प्रतिकूलता महसूस होती है, उनमें हमें दुःख होता है। जैसे:- किसी को एकदर्शन की ठंडक सुखद लगती है और किसी को दुःखप्रद। इसीप्रकार किसी को तीखा खाना अच्छा लगता है तो किसी को मीठा। इसीप्रकार हम सभी पाँचों इंद्रियों के सुख-दुःख को तो दिन-रात भोगते रहते हैं। अतः अनादि से चिर-परिचित उस खुशी के विशेष कथन की यहाँ आवश्यकता नहीं; किंतु विचारणीय विषय यह है कि खुशी के उन छोटे-छोटे पलों की प्राप्ति के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करना उचित है क्या? यदि, नहीं! तो वह कौन सा आनंद है- जिसे हमें अपना लक्ष्य बनाना चाहिए? क्या हम उस आनंद को पा सकते हैं?
तो आइए! अब हम उसी आनंद की चर्चा करते हैं-
20. अनिंद्रिय आनंद
मन से प्राप्त होने वाले आनंद को ही यहाँ अनिंद्रिय आनंद कहा जा रहा है। इंद्रियों की सहायता से रहित होने के कारण इसे अनिंद्रिय कहते हैं और मन के होने के कारण इसे ही मनजनित भी कहते हैं।
मन की गति दिखाई देने वाले, न दिखाई देने वाले- सभी विषयों और वस्तुओं की तरफ होती है। मन का काम सोचना-विचारना, अनेकों विकल्प खड़े करना और अपने-पराए की पहचान करना है, इसे स्व-पर भेदविज्ञान कहते हैं। अपने-पराए की पहचान करना- यह वह विशेष शक्ति है- जिसके द्वारा जीव अनिंद्रिय आनंद की प्राप्ति की ओर कदम बढ़ाता है।
21. स्व-पर भेदविज्ञान
स्व और पर के बीच में भेद पूर्वक होने वाला विशेष ज्ञान ही स्व-पर भेदविज्ञान कहलाता है।
स्व (आत्मा) का और पर (शरीरादि) का भिन्नपना जैसे भासित हो, वैसे विचार करते रहने से भेदविज्ञान होता है। चूँकि इस चिंतन में स्व और पर मुख्य हैं; अतः इसे ‘स्व-पर भेदविज्ञान’ कहते हैं। विशेष बात ध्यान देने की यह है कि यहाँ अपने बच्चों और पराए बच्चों की पहचान होना स्व-पर भेदविज्ञान नहीं; क्योंकि ऐसा ज्ञान तो पशु-पक्षियों को भी हो जाता है। कौआ और कोयल भी अपने-अपने बच्चों को पहचानते ही हैं; किंतु यहाँ आत्मा में अपनापन को ‘स्व’ और शरीर्रादि में परायापन को ‘पर’ मानना ही स्व-पर भेदविज्ञान की श्रेणी में रखा गया है।
यह स्व-पर भेदविज्ञान ही हमें अनिंद्रिय आनंद व अतींद्रिय आनंद की ओर ले जाता है।
22. भेदविज्ञान की प्रक्रिया
शास्त्रों को पढ़कर, गुरु के वचनों को सुनकर अपने ज्ञान में स्व और पर के बीच विभाजन रेखा को खींचने से ही भेदविज्ञान की प्रक्रिया आरंभ होती है।
जब हम पर पदार्थों और भावों से भिन्न भिन्न भावन आत्मा की अनुभूति कर लेते हैं, प्रत्यक्ष वेदन कर लेते हैं, तब असली भेदविज्ञान का आरंभ होता है। यह आत्मा की अनुभूति ही वास्तविक भेदविज्ञान है, तथापि इसके लिए किए गए पुरुषार्थ को भी भेदविज्ञान कहा जाता है।
सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम हमें स्व-पर के बीच विभाजन रेखा खींचना होगी।
फिर पर पदार्थों, पर भावों से भिन्न निज आत्मा की अनुभूति होगी। जब ज्ञान में पर से हटकर स्व में लगता है अर्थात् स्व आत्मा ज्ञान का ज्ञेय बनता है; तब ज्ञान, ज्ञान में प्रतिष्ठित हो आनंद का अनुभव करता है। यही ज्ञान की अनुभूति आत्माअनुभूति है, सम्यग्दर्शन है। यह भेदविज्ञान चार स्तरों पर किया जाता है।
23. भेदविज्ञान के स्तर
- सर्वप्रथम प्रकट बाह्य पदार्थों से भेदविज्ञान करना है। जिसमें माता-पिता, भाई-बहन, स्त्री-पुत्र, मकान आदि से भेदविज्ञान किया जाता है। ये मैं नहीं, ये मेरे नहीं, मैं इनका (कर्ता-भोक्ता नहीं ऐसा जाना जाता है, माना जाता है।
- दूसरे स्तर पर देह से भेदविज्ञान किया जाता है। आत्मा देह में रहता है पर देह नहीं है ऐसा जाना माना जाता है। इसमें देह में रहते हुए आत्मा को देह से भिन्न देखना है।
- तीसरे स्तर पर विकारी भावों (मोह, राग, द्वेष) से भेदविज्ञान किया जाता है। ये भाव यद्यपि आत्मा में ही उत्पन्न होते हैं, आत्मा से इनका क्षणिक तादात्म्य संबंध भी है, फिर भी ये पर के लक्ष्य से उत्पन्न होते हैं, दुःखदायी हैं अतः पर ही हैं।
- चौथे स्तर पर निर्मल पर्याय से भेदविज्ञान किया जाता है; क्योंकि पर्याय में रहते हुए पर्याय से पर देखना है। पर्याय में एकत्व बुद्धि नहीं करनी है; क्योंकि पर्याय क्षणिक है।
इसीप्रकार चार प्रकार से भेद विज्ञान करते हुए जब आत्मा अपने में ही आत्माबुद्धि करता है कि यह आत्मा मैं ही हूँ, तब अधिक रुचि के जोर में उपयोग पर से हटकर त्रिकाली ध्रुव, अखण्ड, अमेय आत्मा पर चला जाता है। उपयोग के तेजी से अन्तर्मुख होने से पर से आत्मामुख हो जाता है। रत्नत्रय का आरंभ होता है। इस पूरे भेदविज्ञान की भावना को बचाने से रत्नत्रय की पूर्णता होती है।
ये मैं नहीं हूँ
24. रत्नत्रय की पूर्णता
रत्नत्रय की पूर्णता के लिए आत्मानुभूति प्रकट होने के बाद उपयोग की अस्थिरता और शेष रागांश के विनाश के लिए भी भेदविज्ञान की भावना के बल से ही उपयोग बाहर से हटकर बारंबार आत्मा में जाता है, आत्मा का स्पर्श करता है; आत्मा में गहराई से जमता, रमता है और एक दिन ऐसा आता है कि उपयोग सदा के लिए उपयोग में स्थिर हो जाता है, आत्मा सब विकारों से मुक्त हो जाता है। इसप्रकार जबतक आत्मा मुक्त नहीं हो जाता तबतक भेद विज्ञान की उपयोगिता है। यह स्व पर भेदविज्ञान ही हमें अनिंद्रिय आनंद की ओर ले जाता है। इसे अनिंद्रिय आनंद भी कहते हैं। जिसकी चर्चा आगे की जा रही है।
25. अतीन्द्रिय आनंद
सीधा आत्मा से प्राप्त होनेवाले ज्ञान को अतीन्द्रिय आनंद कहा जाता है। इंद्रियों की सहायता से रहित होने के कारण इसे अतीन्द्रिय कहते हैं।
हमारा जो ज्ञान पाँच इंद्रियों द्वारा स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द को जानता है; मन द्वारा अनेक विकल्प करता है, वही ज्ञान जब मात्र अपने ज्ञान स्वरूप को ही जानता है, तब यह आनंद प्रगट होता है। जब यह आनंद प्रगट होता है, तब अन्य का जानना सहज ही नहीं होता है; क्योंकि हमें उपलब्ध हमारा वर्तमान ज्ञान एक समय में एक ज्ञेय को ही जानता है।
यद्यपि जो ज्ञान इंद्रियों और मन के द्वारा पर को जानता है, वही ज्ञान अपना अनुभव करता है, तथापि इस ज्ञान को अतीन्द्रिय कहते हैं; क्योंकि इंद्रियाँ तो स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द को ही जानती हैं। वह यहाँ अनुभव में नहीं है और मन विकल्प करता है, वह भी यहाँ नहीं है।
विकल्प रहित होने के कारण इस अनुभव और आनंद को निर्विकल्प अनुभव और निर्विकल्प आनंद भी कहते हैं।
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स्रोत: Gyata संग्रह।
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