कविवर बनारसीदास - जैन स्वाध्याय सामग्री | Kavivar Banarsidas

कविवर बनारसीदास

कवि बनारसीदास

'भक्तिकालीन हिन्दी साहित्यकारों में कविवर बनारसीदास अग्रगण्य हैं। अपने जीवन के 55 वर्षों के आत्मकथ्य को उन्होंने पद्यो का त्यो ‘अर्द्ध कथानक’ में उतारकर रख दिया। उनकी इस आत्मकथा को हिन्दी साहित्य की सर्वप्रथम आत्मकथा कहलाने का गौरव प्राप्त है।

1586 ई० में जन्मे इस कवि ने सम्राट अकबर का अन्तिम समय, जहाँगीर का शासन काल और शाहजहाँ के शासन का प्रारम्भ बहुत निकट से देखा था। कविवर का सम्पूर्ण जीवन भोग सौभाग्य, प्रभाव, संघर्ष तथा कड़वे-मीठे अनुभव से परिपूर्ण था। बनारसीदास बाणिकों में कई बार मिट्टे-बने। यहाँ तक कि ‘विद्वज्जन’ पर एक ‘नवरस’ ग्रन्थ ही रच डाला, किन्तु जब निर्वेद का अलख उनमें सुलगा तो गोमती की धारा में अपनी उस श्रेष्ठ रचना को प्रवाहित कर दिया।

व्यापार के सिलसिले में उनके जीवन का अधिकांश समय उत्तरप्रदेश के जौनपुर व आगरा में बीता। उस समय को राजनैतिक, सामाजिक स्थिति तथा व्यापारियों की कठिनाइयों का बेजोड़ वर्णन उनकी आत्मकथा में सन्निहित है। एक के बाद एक रोचक घटनाओं से उनका जीवन भरा हुआ था।

समयानुसार पड़ने के उपरान्त दिगम्बर जैनधर्म में उनको अगाध एवं सच्ची श्रद्धा रही। 1636 ई० में उन्होंने समयसार नाटक की हिन्दी में पद्य की रचना की। उनकी प्रसिद्ध के लिए यही ग्रंथ काफी है। उनकी फुटकर रचनाओं का संकलन ‘बनारसी विलास’ में संग्रहीत है। आगरा में उनको भेंट महाकवि तुलसीदास से भी हुई थी। जब तुलसीदास ने रामचरितमानस पर उनका अभिमत चाहा तो उन्होंने लिखा—
बिराजे रामायरा पट माहिं।
मरमी होय मरम सो जाने, मूरख जाने नाहिं॥
तुलसीदास जो ने भी मन-पार्श्वनाथ की स्तुति में कुछ छन्द बनारसीदास को लिखकर दिए उनमें से एक है—
जिहिनाथ पारस जुगल पंकज, चित्त चरनन आस।
रिद्धि-सिद्धि कमला भुजा, राजति भजत तुलसीदास॥
इस वर्ष कविवर बनारसीदासजी का 400 वाँ जन्म दिवस उत्साह पूर्वक देशभर में मनाया जा रहा है। अतः उक्त प्रसंग पर कविवर के जीवन की महत्व-पूर्ण घटनाओं पर प्रकाश डालने के उद्देश्य से यह चित्रकथा प्रकाशित की जा रही है। इसका आलेख समन्वयवादी के यशस्वी सम्पादक श्री अखिल बंसल ने तैयार किया है तथा चित्रों से सजाया है बाहुबली के सम्पादक श्री अनन्त कुशवाहा ने। वैसे तो राजस्थान के अग्रणी पत्र राजस्थान पत्रिका में प्रकाश-प्रकाशन क्रमशः हो चुका है, परन्तु देशभर में प्रचार-प्रसार की दृष्टि से इसका प्रकाशन पृथक से किया जा रहा है। आशा है यह कृति उपयोगी सिद्ध होगी।
—श्रीमती डी०एम०, एम०ए०
प्रकाशिका

प्रकाशक
बाहुबली प्रकाशन
लालकोठी
जयपुर-302015

मूल्य
चार रुपया

आलेख
अखिल बंसल एम०ए०

चित्रांकन
अनन्त कुशवाहा

प्रथम संस्करण
1988

14 नवम्बर, 1987

बनारसीदास

बनारसीदास श्रीमाल वंशीय जैन थे। इस नगर के लोग रोहतक शहर के निकटस्थ विछोली ग्राम में रहते थे।

जालन्धर अखिल बंसल
प्रस्तुत अनन्त कुशवाहा

ये जैन धर्म स्वीकार करने से पहले राजवंशीय राजपूत थे।

प्रणाम मुनिराज!

बनारसीदास के पिता का नाम ‘खड्गसेन’ था।

वे पढ़े-लिखे थे और रत्नों के व्यवसाय में दक्ष थे।

इनके व्यापार का क्षेत्र जौनपुर और आगरा था।

जौनपुर में रहते हुए, पुत्र प्राप्ति के लिए चिंतित थे।

सतीजाता का दर्शन करने चले

पुत्र प्राप्ति की कामना से सपत्नीक खड्गसेन रोहतक की सती माता की पूजा करने वहाँ कई बार गए।

1586 ई० में माघ शुक्ल, एकादशी, शनिवार को एक पुत्र का जन्म हुआ— विक्रमजीत।

बालक विश्वजीत ही आगे चलकर बनारसीदास के नाम से विख्यात हुए।

पुत्र को लेकर खड्गसेन बन्धु-बान्धवों सहित समीपस्थ तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ भगवान् का पूजन करने के लिए गए।

खड्गसेन (यह आपके ही शरण हैं।)

मंदिर के पुजारी ने ध्यानगति के बाद कहा-

पुजारी (भगवान् पार्श्वनाथ के यश से) कहा है कि यह बालक दीर्घायु होगा।

खड्गसेन (किसने कहा कि भगवान् पार्श्वनाथ का जन्म) जिस नगर में हुआ उसी के नाम पर इस बालक का नाम रखो।

कितना सौभाग्यशाली है यह बालक!

खड्गसेन (दीर्घायु तक जिएँगे एवं) प्रमुख व्यक्ति के रूप में उभरेंगे।

2.

कुशाग्र बुद्धि होने के कारण लिखना-पढ़ना जल्दी सीख गए।

इन्हें अधिक ज्ञान की इच्छा नहीं थी।

1595 ई. में जब बनारसी दास नौ वर्ष के थे, खैरराबाद के कल्याणमल लांबी की पुत्री के साथ इनका विवाह तय हुआ।

3.

एक वर्ष पश्चात् ही जौनपुर में भीषण अकाल पड़ा।

खाद्य पदार्थों का अभाव हो गया। मनुष्यों की बड़ी दुर्दशा थी।

दुर्भिक्ष का जोर कुछ कम होने पर बनारसीदास का विवाह सम्पन्न हुआ।

जिस दिन विवाह कर लौटे उसी दिन परिवार में एक दुखद घटना एक दुखद मृत्यु भी हुई।

बनारसीदास की पत्नी का अधिकांश समय मायके में ही बीतता था।

जौनपुर में जोहरियों पर मुसीबतें आईं।

4.

नवाब (उत्तरपाल नवाब किलिज खान।)

नवाब (तेल-घी तीनों से ही निकरेगा) चुके बड़ी रकम चाहिए।

नवाब (जोहरियों पर कोड़े बरसाए गए।)

नवाब (अकाल का असर हम पर भी पड़ा है हुजूर। हम इतना धन नहीं दे सकते।)

नवाब (ठीक है। अभी इन्हें जाने दो।)

अत्यधिक जोहरी जौनपुर छोड़ कर विभिन्न दिशाओं में भाग गए।

बनारसीदास के पिता खड्गसेन सकुटुम्ब मानिकपुर के निकट शाहजादपुर गए।

इतनी विपत्ति पर खड्गसेन बच्चों की तरह रोने लगे।

एक व्यवसायी करमचन्द माहर ने आश्रय दिया।

इस समय अन्तराल में बनारसीदास ने पाण्डव दनी प्रसाद से अवकाश नागर माला का अध्ययन किया।

ज्योतिषशास्त्र, अलंकार, तथा कोशशास्त्र आदि का अध्ययन किया।

अध्यात्म के अवसर पर पंडित मुनि भानुचंद से जैन धर्म के मूल-ग्रन्थ पढ़ने लगे।

शाहजादपुर में रहते हुए बनारसीदास अध्ययन मनन के साथ साथ व्यापार में भी रुचि लेते थे।

वातावरण ठीक होने पर इनका परिवार जौनपुर वापस आ गया।

युवा होने पर बनारसीदास के कई रूप हो गए।

इनका लेखन कार्य भी प्रारंभ हो चुका था।

काव्य

उनकी रुचि दिन प्रति दिन लेखन
में बढ़ती गई।

मनहर दोहा-चौपाइयों में नवरस पर काव्य।
विशेषतः सम्भोग प्रधान वर्णन।

संवाद

बनारसीदास आशिकी में डूब रहे थे।
बनारसीदास मैं तुम्हारे लिए चेतन
पिता जी की नजर बचाकर
चुरा कर लाया हूँ।
बनारसीदास अहा… अहा! वाह क्या वर्णन किया है!
मोहिनी का रूप साकार कर दिया है।

कथा

प्रेम-वासना में लिप्त, बनारसीदास का
असंयमित जीवन लगभग दो वर्ष चला।

उम्र तो केवल 15 वर्ष थी लेकिन
शायद जल्दी जवान हो गए थे।

उन्हें पता नहीं था। कुसंगति और
कुव्यसनों के कारण उन्हें गर्मी
या उपदंश रोग लग गया था।

बनारसी दास, पत्नी को विदा
कराने सैराबाद गए।

बनारसीदास नहीं! रोगाक्रांत हो गए।
(क्या बात है स्वामी?)
बनारसीदास आह!

कथा

शरीर में असंख्य दुर्गंधित घाव हो गए। बाल झड़ने
लगे। इतने कुरूप हो गए कि लोग दूर रहने लगे।

यह मेरे पापों का फल है।

बनारसीदास की पत्नी और सास ही
उनकी थोड़ी-बहुत देखभाल करती थीं।

संवाद

बनारसीदास कोई फायदा नहीं हो रहा था।
एक माई वैद्य मैं इलाज करूँगा। इन्हें भुना चना और
बिना नमक का भोजन देना होगा।
बनारसीदास छः मास पश्चात् बनारसी
दास रोगमुक्त हो सके।
बनारसीदास आह… आह!

संवाद

बनारसीदास माई महाराज, आपने
मुझे नया जीवन दिया है।
माई महाराज आप ठीक
हो गए, मेरी
मेहनत
सफल हो
गई।
बनारसीदास घर लौटने के पश्चात् वे फिर पहले जैसा असंयमित
जीवन बिताने लगे।

कथा

आलोचकों ने समझाया।

प्रेम का व्यसन छोड़ दो। सोनाग्रेन ब्राह्मण
सारंगी का भाई है। व्यापारी के लड़के हो
व्यापार में मन लगाओ।

पत्नी के रहते भी विजय-सेन, मोहन पुरसेठ और
अंबारामदा में कोई कमी नहीं आई थी।

संवाद

बनारसीदास अधिक पढ़ने-लिखने वालों
को भीख मांगनी पड़ती है।
बनारसीदास गुरुजनों की बातों का
बनारसी दास पर कोई
प्रभाव नहीं पड़ा।
बनारसीदास गुरुवचन पाकर
जो दुराचार करते थे
(लोग भी शुद्ध पत्थर
हो गए हैं)।
बनारसीदास मन 1604 ई.
बनारसीदास एक पुत्री हुई पर
कुछ दिनों में ही उसका
देहांत हो गया।

कथा

बनारसीदास की कोई भी संतान अधिक दिन जीवित नहीं रही।
शायद उनके रोग के कारण ही ऐसा हुआ होगा।

अपनी दुष्टप्रवृत्तियों के कारण वह
पुनः बीमार पड़ गए।

संवाद

बनारसीदास सेवा की रात से 20 मिनट तक
बनारसी दास को भोजन नहीं
दिया गया।
बनारसीदास रोटी! … मुझे
रोटी खिलाओ!
बनारसीदास मुझे खाने को चाहे मत दो, किन्तु
केवल रोटी मेरी आँखों के सम्मुख
रख दो।
बनारसीदास ऐसे में मैं
रोटी के मोह में
सोच सोच कर
ही पागल हो
जाएगा।
बनारसीदास नहीं। इस हालत
में रोटी जहर है।
बनारसीदास आज्ञा! सैर वजन की दो
रोटी दीजिये उन्हें। दी
गई।
बनारसीदास (दीजिए, खाऊंगा
बिल्कुल नहीं!)
बनारसीदास बनारसी दास ने दोनों
रोटियां तकिए के नीचे
रख ली।
बनारसीदास रात को जब सब (मैं आदि सो गया)
सो गए थे। इन रोटियों को जाकर
खाऊंगा।

चित्रकथा

आचार्य: हे सबेरे ठीक हो गए थे।

शिष्य: क्या! ये मेरी शैय्या में तुम ठीक कर दिया!

आर्थिक दृष्टि से घर में अस्थिरता थी। बनारसीदास बहुत चिन्तित रहते थे।

बनारसीदास: व्यापार भी स्कतरहु का जुआ है!

एक सन्यासी से भेंट हुई।

सन्यासी: बच्चा, मैं एक ऐसा मंत्र जानता हूँ जिसे नियमित जपने से…

बनारसीदास: प्रचुर धन प्राप्त होगा।

सन्यासी: अष्ट सिद्ध लेकर योगिनियां देह से मंत्र का जाप करना होगा।

बनारसीदास: होगा योगी राज।

एक वर्ष पश्चात् प्रतिदिन अपने द्वार पर एक सोने की मोहर पायी।

बनारसीदास: बनारसी दास ने रुक-रुक तक मंत्र का चुपचाप जाप किया।

बनारसीदास: कभी-कभी वह मंत्र को गोमती के एकान्त तट पर।

मंत्र के जाप से मोहरें कहा मिलने वाली थी।

बनारसीदास: ये मुझे अपना।

कुछ दिनों बाद एक और योगी मिला।

योगी: यह हंसराज, भगवान् महादेव का प्रतिरूप है। इसकी नित्य…

योगी: …पूजा करोगे तो शिवपुरी मिलेगा।

योगी: सभी मनोकामना पूरी होगी।

बनारसीदास अब अतुल्य से गुप्त रूप में शिव और उनके बाल की पूजा करने लगे।

बनारसीदास: शिल-शिल।

सन 1604 ई०। बनारसीदास के पिता सहस्रदीन विशाल संघ के साथ सम्मेद शिखर की यात्रा पर गए।

आचरण और मौजमादि में भी पूर्ण संयम रखते।

पिता की अनुपस्थिति में बनारसीदास, अपनी माँ की बन आए।

माँ: मैं बनारस नहीं जानती हूँ।

बनारसीदास: मैं बनारस जाऊंगा।

माँ: मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब तक बनारस नहीं जाऊंगा, दूध, दही वो, सालन आदि का सेवन नहीं करूँगा।

माँ: अजीब होती है यह।

बनारसीदास की प्रतिज्ञा के ई: शाह बाद कार्तिक पूर्णिमा आई।

तीर्थ यात्रियों के साथ बनारसीदास जी बनारस चले।

गंगा स्नान करने गए।

बनारसीदास ने भक्तिभाव से शिव की पूजा की।

बनारसीदास: मैंने जिन जिन वस्तुओं को छोड़ने की प्रतिज्ञा की थी, उन्हें ही पा रहा हूँ।

बनारस में भी केवल - कामियों को नहीं भूले हो।

बनारसीदास: मेरे पुत्र के योग्य हो।

सन-1605 ई०। बनारसीदास बनारस से जौनपुर लौट आए थे तभी…

बादशाह अकबर का इन्तकाल हो गया।

लोग: अरे हाय! सम्राट अकबर का देहांत हो गया!

बनारसीदास घर घर कोपने लगे।

अकबर के देहांत की खबर सुनकर बनारसी दास सीढ़ियों से लुढ़क पड़े।

बनारसीदास: हे भगवान्!

बनारसीदास: आ आह!

इनका रक्त बहना रोका!

लोग: उपाय करलो हूँ।

अकबर की मृत्यु से सारा नगर आतंकित हो आ था।

लोग: हे भगवान्! आ आह!

चोरों-चोरों सब दिपारों! अराजकता फैलनेवाली है!

आगरा में यह खबर आने के बाद कि राजधानी में शांति है और…

लोग: …लोगों में ‘व्यास आतंक फैल हुआ’।

बनारसीदास: सेठजी, अब गोमती पार कर भागने की जरूरत नहीं। संकट टल गया!

बनारसीदास मैं शिव का अनन्य सोच रहे थे।

बनारसीदास: भक्त और उपासक था किन्तु मैं सीढ़ी से गिर कर घायल हुआ तो उन्होंने रक्षा नहीं की।

बनारसीदास: मैं अब शिव रुपी शैव की प्रता नहीं करूँगा।

काव्य

एक दिन गोमती
के पुल पर।

बनारसी, तुमने प्रेम भरी
कविताओं की नव-रस ग्रन्थ
रच डाला है…

…इस मनोरम स्थान पर उनका
रसास्वादन कराओ।

बनारसी ने नदी-सौन्दर्य
का क्या खूब वर्णन
किया है!

मैंने निरखा सौन्दर्य का पूरा
ग्रन्थ ही रच डाला है।

इसके पन्ने गोमती के
वक्ष में सजाए यहाँ
ठीक है!

अरे! अरे! यह
क्या किया!

हाय! अब तो उस पांडुलिपि
को समेटना असंभव है!

मैं अब ऐसी
रचनाएँ नहीं करूँगा।

अब अपना मन नैतिक, और
धार्मिक चिन्तन में लगाऊँगा!

नव-रस ग्रन्थ के पन्ने नदी
में फेंक दिए।

बनारसीदास बात-व्युत्पाद में
एक सज्जन ही उठे थे।

उनकी चरित्रहीनता से जो लोग उन्हें
धिक्कारते थे वे अब प्रशंसा करने लगे।

अरे, बनारसी
दास तो एकदम
बदल गया है!

मैं आपको
प्रणाम करता हूँ।

कथा

खदगमेन दूसरे व्यवसाय के लिए
आगरा भेजने की तैयारी करने
लगे।

इन रत्नों और वस्तुओं को लेकर
तुम्हे पूरी जिम्मेदारी में जाना है।

यथासंभव अधिक
लाभ प्राप्त करना।

इटावा पहुँचते ही आकाश
मेघाच्छन्न हो उठा था।

मुसलाधार पानी बरसने
लगा।

घनघोर वर्षा में बनारसीदास सहित सब
आश्रय के लिए इधर-उधर दौड़े।

कोई इन्हें आश्रय देने को
तैयार नहीं था।

तेज ठंड, कीचड़, अंधेरा…
बनारसीदास की हालत दयनीय थी।

नगर प्रवेश द्वार पर एक झोपड़ी थी
उसमें कुछ पहरेदार बैठे थे।

पहरेदार भाग जाओ!

बनारसीदास अब अपने की
जगह नहीं मिली
तो मैं मर जाऊँगा।

पहरेदार दया करिए! हम अगंतुक हैं।
रात भर के लिए आश्रय खोज
रहे हैं। नगर में कहीं जगह नहीं मिली।

पहरेदार हम पहरेदार यहाँ से जा रहे हैं।
झोपड़ी का मालिक आरही उससे
विनती कर लेना।

कथा

यह मेरी झोपड़ी है। रोज रात को मैं यहाँ सोता
हूँ। निकल लो बाहर नहीं तो चाबुक मार मार
बाहर करूँगा।

अंधेरा, ठंड, वर्षा देख कर
उसे दया आ गई।

हम, तुम लोग बेसहारा
और अकेले दिखते हो।

बनारसीदास झोपड़ी का
मालिक आया।

झोपड़ी का मालिक मैं नें खाट पर सो जाऊँगा, तुम लोग चाहो तो
खाट के नीचे टाट पर सो सकते हो।

किसी तरह
रात बीती।

दूसरे दिन बनारसीदास
आगरा पहुँचे।

पक्का व्यवसायी न होने के कारण
उन्हें माल बेचने में भारी
नुकसान हुआ।

बनारसीदास का अनमोल
निधि मालिक नगीने कहीं
खो गए या गिर गए।

पाजामे के
नेफे में तो
रखे थे।

इतना अफ़सोस हुआ
कि बनारसी दास बीमार
पड़ गए।

एक माह तक बीमार रहे।

अब मैं सत्कर्म अधिक
का प्राण धन में क्यों
रहता है।

बनारसीदास के माता-पिता
को व्यापार की क्षति का पता चला।

उस कुपुत ने तो मुझे
डुबा ही दिया।

चित्रकथा

आगरा में बनारसीदास के पास जो कुछ बचा था उसे बेच कर खा गए।

फिर घर से आहार निकलना बंद हो गया।

बनारसीदास संख्या की अपने घर पर डकरा हुई इस तरह आदमियों को…
मधुमालती और मृगावती प्रेमगाथा गाकर सुनाते थे।

श्रोताओं में करोड़ी बेचैन खाना एक हलवाई था।

वाह, महाशय!
आनंद आ गया।

बनारसीदास अपने श्रद्धालु श्रोता हलवाई से करोड़ी उधार लेकर खाते थे।
(उधार ले रहा है)

आज भी
एक शेर
दौल देना

बस ऐसे ही करोड़ियों खाकर दिन बिता रहे थे।

आज की
घर पर मुझे
नज़र आया।

एक माह तक उधार खाने के हालात इनसे नहीं सहा गया।

बनारसी बन्धु,
मैं आपकी अपनी
हालत बताता हूँ।

आप मेरे यहाँ
भोजन की बातें न
गायन सुनने आते
रहें हैं, पर मेरी
हालत नहीं जानते
होंगे।

बनारसी दास ने हलवाई को बताया।

इस तरह मैं तुमसे करोड़ी
उधार लेकर दिन बिता
रहा हूँ।

आप भले हैं। जब हो सके
उधार चुकाकर दे दीजिएगा।
मैं किसी से जिक्र नहीं करूँगा।

इसी तरह छः माह बीत गए

ये हलवाई बंधु ने
२०० तक उधार
देने को कहा है।

बनारसीदास के श्वसुर पक्ष के रिश्तेदार ताराचंद तो भी इन्हें अपने घर ले गए।

धर्मदास की भागीदारी में इन्होंने फिर व्यवसाय शुरू किया।

जितना कमाया उतना खर्च हो गया।

हलवाई का ५० का उधार चुका आया।

दीवारों का हाड़ तोड़ श्रम व्यर्थ गया।

एक कहानी थोड़ी
भी नहीं बनी।

किसी चीज का ज्ञान नहीं।
नई हो या पुराने की कथा।
वही मैं मक्काने की कथा
जो भी रुकने लगी हाथ।

इन उस पोटली में
क्या है?

ओह मौसी! … हे भगवान्,
डूबते को सहारा मिला।

बनारसीदास अपनी ससुराल सैराबाद पहुंचे।

मेरे पास के ये
२०० रु० रखो। माँ से
भी माँगेगी हूँ।

माँ ने चुपचाप ये २०० रु० दिए हैं।
आगरा जाकर फिर से व्यापार शुरू
करो।

पत्नी से आरो
आप भी तो कहो।

मुझमें आत्मा
विश्वास फिर लौट आया है।

बनारसीदास नए उत्साह से कार्य करने लगे।

व्यापार के लिए वस्तुएँ खरीदने और… उन्हें बिक्री के लिए आगरा ले जाने का काम करने लगे।

इन कपड़ों को अच्छी तरह धोना। आगरा में बेचना है।

पुनः आगरा में व्यवसाय शुरू किया।

कपड़े के व्यापार में घाटा हुआ।

यह कपड़ा
हाफकट

दो रचनाएँ ‘अष्टान्हिका छंद’ और
‘नाममाला’ लिखने में व्यस्त हो गए।

धतिया है। बंकर है
इसे धुलवा कर और ठीक
कर ले आए।

अब समझ में आता है कि रत्न-जवाहरातों के धन्धे में ही लाभ संभव है।

व्यापार में जो थोड़ा लाभ हुआ वह सब हो गया और बनारसी दास फिर फक्कड़ हो गए।

जमा-खर्च
बराबर!

बनारसीदास अपने मित्र नरोत्तमदास से मिले।

मैं तो दिवालिया हो गया हूँ।
न हाथ में पैसा, न और
विकल्प।

मित्र, तुम मेरे भाई
की तरह हो। मेरे घर
पर ही रहो।

नरोत्तमदास, उनके श्वसुर और बनारसीदास काम के सिलसिले में पटना चले।

शाहनारपुर से एक हमाल करके दोनों पैदल ही चले।

कैसी तेज बादली बिजली
सवेरा होने में ज्यादा देर
नहीं होगा।

बादलों के भ्रम में जल्दी निकल पड़े थे। अंधेरा गहराया व रास्ता भूलकर घने जंगल में पहुँच गए।

रास्ता भूल
गए!

संवाद

जंगल (कमी) गहरी भेक कर भागा
जंगल (कमी) मी तो इस जंगल में नहीं रुकूँगा!
जंगल (कमी) अरे ठहर! ठहर! आग गया दस्यु!
जंगल (कमी) अब हम क्या करें? गशरी तो मारी दे!
जंगल (कमी) तीन हिस्सा करके, ले चले।

अधो-रात का समय था। बनारसीदास, नरोत्तम व उनके श्वसुर रोते-कलपते जंगल में आगे बढ़े जा रहे थे।
जंगल में डाकुओं का अड्डा।
जंगल (कमी) कौन है वहाँ?
जंगल (कमी) अरे बाप रे! डाकू!
जंगल (कमी) प्राण नहीं बचेंगे।

डाकू सरदार का अपनी ओर आते देख कर बनारसीदास को एक युक्ति सूझी।
डाकू सरदार डा. इन्द्रनाथ!
डाकू सरदार ईसावास्यमिदं सर्वम यत्किञ्चजगत्याम जगत् … ब्राह्मण का आशीर्वाद है।
डाकू सरदार पीछे लगता है पंडित जी, आप तो हमारे गुरु हैं।

डाकू सरदार मेरी कुटिया पवित्र कीजिए।
डाकू सरदार आप लोग जंगल में इतनी रात को…
डाकू सरदार हमारा भूल गए है यजमान।
डाकू सरदार कोई बात नहीं। रात्रि विश्राम कर लीजिए, कल हम आपको रास्ता बता देंगे।
डाकू सरदार धन्यवाद श्री मान।

डाकू सरदार अरे बाप रे! मेरी बातो में भी पड़ाचक कर नहीं रहा है।
डाकू सरदार डाकुओं को जरा भी संदेह हो गया कि…
डाकू सरदार हम ब्राह्मण नहीं, व्यापारी हैं तो काट डालेंगे।
डाकू सरदार रात के अंधेरे में उन्हें पता नहीं चला पर अब जल्दी से ब्राह्मण बनने का उपाय करें।

बनारसीदास ने मृद निकालकर तीन जनेऊ बनाया।
बनारसीदास ब्राह्मण बिना जनेऊ कैसा दिखेगा।
बनारसीदास गोटी मिट्टी से तीनों ने बड़े से तिलक बनाए।
बनारसीदास अब ठीक है।
डाकू सरदार गले में कोपते किसी तरह रात बिताई है।
डाकू सरदार सरदार अपने आदमियों सहित दर्शन करना चाहते हैं।

डाकू सरदार बनारसीदास जनेऊ माता च पिता जनेऊ जनेऊ बन्धुश्च सखा जनेऊ
डाकू सरदार मेरा आशीर्वाद है।
डाकू सरदार जंगल में बाहर निकालने का रास्ता दिखाता है।

डाकू सरदार किधर जाना चाहते हो?
डाकू सरदार फतेहपुर जाना है।
डाकू सरदार उस वृक्ष के उस पार फतेहपुर है।
डाकू सरदार अच्छा चलता हूँ। रोते हुए

जौनपुर। किसी जन्म का पुण्य काम आया।
जौनपुर फतेहपुर, इलाहाबाद होते हुए बनारसीदास जौनपुर लौटे।
जौनपुर इलाहाबाद में मैं अपनी माँ से धन कर पिताजी को भिजवाया।
जौनपुर व्यापार के सिलसिले में बनारस गए।
जौनपुर भगवान् पार्श्वनाथ के मंदिर में कुछ प्रतिज्ञाएँ की।
जौनपुर कुछ वस्तुओं का त्याग करूँगा।

बनारस में नवजात शिशु के साथ पूजी का रहस्य होगा।
बनारस नवजात शिशु के साथ पूजी का रहस्य होगा।
बनारस दुसद समाचार के साथ पुनर्विवाह का प्रस्ताव भी था।
बनारस मेरे श्वसुर ने अपनी दूसरी कन्या का विवाह मुझसे तय कर दिया है।
बनारस दोनों सूचनाएँ एक पत्र में!

बनारस मेरी स्थिति तो लुहार-खवासी की तरह हो गई है जो अग्नि में और रक्तधार जल में जाती है।
बनारस बनारसीदास ने नरोत्तम संसारे साथ मिलकर अपने व्यवसाय में मन लगाया।
बनारस विभिन्न मुल्कों में घूमते-घूमते मैं तो पस्त हो गया।
बनारस जौनपुर, वाराणसी और पटना इनका व्यापार क्षेत्र था।
बनारस और व्यापारी को लोग समझते हैं आसानी से धन कमा लेता है।

जौनपुर का नवाब और चीनी किंग खान बनारसीदास पर कृपालु था।
जौनपुर मेरी ओर से यह सिरोपा कबूल करो।
जौनपुर किंग खान ने बनारसीदास से ‘नाममाला’, ‘शत्रु कोष’ और ‘सुमन बोध’ जैसी कुछ पुस्तकों का अनुवाद करवाया।
जौनपुर किंग खान ने बनारसीदास से ‘नाममाला’, ‘शत्रु कोष’ और ‘सुमन बोध’ जैसी कुछ पुस्तकों का अनुवाद करवाया।

सन् 1618 ई. में प्रदीप अमीर आधानूर जौनपुर के शासक के रूप में आया।

अमीर आधानूर ने जौहरियों, सर्राफों बनियों आदि को बहुत सताया।

इन्हें और कीमती माल-अस्बाब लूटने का हुक्म दिया।

अमीर [अपने सैनिकों से] मुझे ऐसा चाहिए और उन विद्रोही लोगों को निर्दोषता से ही कैसा मिलेगा!

सैनिक [अमीर से] सार्थक व्यापार गया। धनिक लोग घर छोड़ कर भागने लगे।

अमीर [सैनिक से] क्या हुक्म आया है!

बनारसीदास [अपने साथियों से] भी कुछ लोगों के साथ भाग रहे हो।

बनारसीदास [अपने साथियों से] दूसरी ओर! भागकर कहाँ रहे हो?

बनारसीदास [अपने साथियों से] तुम लोगों के लिए हम बालिका भी लाए हैं।

पूछताछ [बनारसीदास से] तुम दोनों कौन हो?

बनारसीदास [पूछताछ से] हम मथुरावासी ब्राह्मण हैं। हुजूर।

पूछताछ [बनारसीदास से] और तुम?

बनारसीदास [पूछताछ से] मैं बनारसीदास जौहरी हूँ। जौनपुर में मेरा व्यवसाय है।

पूछताछ [बनारसीदास से] यह माहेश्वरी और मैं दोनों भद्र नागरिक हैं।

पूछताछ [बनारसीदास से] इस बनी शहर में आप दोनों को कोई जानता है?

पूछताछ [बनारसीदास से] मेरे छोटे भाई के साथ यहाँ रहते हैं। पहचान करा सकता हूँ।

साहू [बनारसीदास से] आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए क्षमा करें।

मथुरावासी ब्राह्मण [बनारसीदास से] हमारे रुपए दिन गए।

बनारसीदास [मथुरावासी ब्राह्मण से] आप की जान हमारी पास कुछ नहीं। बच गई यही बहुत है।

पहचान होने के बाद।

बनारसीदास [मथुरावासी ब्राह्मण से] हम दोनों कंगाल हो गए हमें कुछ रुपए दो।

मथुरावासी ब्राह्मण [बनारसीदास से] नहीं तो यमुना में डूब कर प्राण देंगे।

बनारसीदास [मथुरावासी ब्राह्मण से] अच्छी मुसीबत है।

मथुरावासी ब्राह्मण [बनारसीदास से] ये ब्राह्मण तो रो रहे हैं।

हाय-हाय!

पुनः गाना शुद्ध हुई यमुना नदी के तट पर पहुँचे।

बनारसीदास [मथुरावासी ब्राह्मण से] आपने हमें आत्महत्या से बचा लिया।

बनारसीदास और माहेश्वरी ने ब्राह्मण को कुछ रुपए दिए।

हिसाब-किताब खत्म करने के लिए साहू सबल सिंह मोचिया के पास गए वे तो अपने वैभव में मस्त थे।

साहू मोचिया के पास जाने बनारसीदास की रुक संगीता हो गया लेकिन उनका काम नहीं रहा था।

बनारसीदास [अपने साथियों से] आज भी उन्हें फुरसत कहाँ है!

अंत में बादशाह के प्रयत्न से बंदियों पर हस्ताक्षर हुआ।

बनारसीदास [अपने साथियों से] साहूकारी के बंधन से मुक्त होकर बनारसी दास को प्रसन्नता हुई।

बनारसीदास [अपने साथियों से] आह चिंता, मिट गई!

बनारसीदास [अपने साथियों से] आगरा में पहला रोग फैला।

बनारसीदास [अपने साथियों से] मौत रोग फैल रहा है। लोग धड़ाधड़ मर रहे हैं।

बनारसीदास [अपने साथियों से] इसका कोई उपचार नहीं है। शहर छोड़ कर भागो।

बनारसी दास ने भी आगरा छोड़ कर एक ग्राम में आश्रय लिया।

आगरा से महामारी खत्म हुई तो बनारसीदास तीर्थ यात्रा के लिए निकल पड़े।

उन्होंने जैन साहित्य का अधिकाधिक अध्ययन किया।

बनारसीदास [अपने साथियों से] ये दुर्लभ मूल पांडुलिपियाँ हैं।

उनका पुनर्विवाह हुआ किन्तु सेनापति के बाद पुनः पुत्र का वियोग हो गया।

बनारसीदास का मन विरक्त होने लगा।

बनारसीदास [अपने साथियों से] कोई नई बात नहीं है।

बनारसीदास [अपने साथियों से] लोगों के आग्रह से उन्होंने तीसरी शादी की।

बनारसीदास [अपने साथियों से] मैं से और राम।

उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया जब ‘समयसार’ पढ़ा।

बनारसीदास [अपने साथियों से] अब दिगम्बर जैन धर्म में मैं से आत्मा शुद्ध हो गई है।

बनारसीदास का सारा समय अध्यात्म-चर्चा और लेखन में व्यतीत होने लगा।

तीसरी पत्नी भी नहीं रही। जैसे सारा पारिवारिक बंधन ही टूट गया।
लेखन, अनवरत लेखन चलता रहा।

‘युक्ति रत्नमाला’, ‘शिव-पच्चीसी’, ‘राम-रावण अन्तर’, ‘सहस्र आठोत्तर नाम’ आदि बनारसीदास की उस समय की उल्लेखनीय रचनाएँ हैं।
सबसे महत्वपूर्ण रचना है ‘समयसार नाटक’। इसमें 727 पद हैं।

बनारसी दास ने 55 वर्ष की आयु में अपनी आत्मकथा ‘अर्द्धकथानक’ लिखी।
महात्मा की आयु 110 वर्ष की होने चाहिए। इसमें मेरी आयु के 55 वर्ष का वृत्तांत है।
एकबार उनके श्रेष्ठ महात्मा तुलसीदास से भेंट हुई।
मैं रामचरित मानस की यह प्रति आपको भेंट करता हूँ।
मेरा सौभाग्य है भक्त-शिरोमणि।

बनारसीदास के प्रति वात्सल्य भाव से तुलसीदास ने भगवान् पार्श्वनाथ पर…
कुछ पंक्तियाँ लिखकर उन्हें भेंट किया था।
संवत् 1643 ई.। अचानक गली-सड़ी-गली से एक शाही फौज़ आई।
रंक और रेश, आदर्श, मोरता और दूसरों और त्याग, उपदेशों। जनमानस को दोनों की आवश्यकता है।
शिवनाथ परब्रह्म पूजें रिद्धि करन कासा।
रिद्धि सिद्धि करन का अवसर गणपति गनत तुलसीदासा।।

बिस्तर पर पड़े पड़े वे ध्यान व चिन्तन में निमग्न रहते थे।
लगातार वे कविता का प्राण माया व कुटकुटियों में अटका हुआ है।
सांसारिक मोह त्यागना आसान नहीं है।

वे कुछ लिखना चाहते हैं।
इसी स्थिति में भी?
कांपती अंगुलियों से ओ लेखनी से अक्षर बन रहे थे।

कविबर ने अंतिम छंद लिखा-
स्मृति शेष रह गई।
ज्ञान कृतकमक हाथ, मारि मरि मोहना।
प्रगटयो रूप स्वरूप, अनंत सुमोहना।।
जापरजे की अन्त, सत्यकर मानना।
चले बनारसीदास, फेर नहिं आवना।।
चले बनारसीदास। फेर नहीं आवना।
समाप्त

बाहुबली प्रकाशन का आगामी आकर्षण

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:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 182.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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