कौण्डेश से कुन्द कुन्द - जैन स्वाध्याय सामग्री | Kaundesh Se Kund Kund

कौण्डेश से कुन्द कुन्द

प्रकाशकीय

“कौण्डेश से कुन्दकुन्द” का द्वितीय संस्करण श्री कुन्दकुन्द दिगम्बर जैन स्वाध्याय मंडल ट्रस्ट नागपुर के सत्साहित्य प्रकाशन एवं विक्रय केन्द्र के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यन्त प्रसन्नता है कि हिन्दी के प्रथम संस्करण की अतिशय सफलता के पश्चात् द्वितीय संस्करण के साथ कन्नड़ का भी प्रथम संस्करण प्रकाशित किया जा रहा है। यह प्रस्तुत कृति की लोकप्रियता का ही प्रमाण है।

कृति के लेखक डॉ० योगेश चन्द्र जैन को नाम जैन विद्वानों में सम्मान के साथ लिया जाता है। आपकी कृति “जैन श्रमण” को शास्त्र सभाओं में भी सम्मान के साथ पढ़ा जाता है। बालोपयोगी साहित्य में भी आपकी अभिरुचि धार्मिक कॉमिक्स की ओर आकर्षित हुई। आपकी द्वितीय कॉमिक्स “नाटक हो तो ऐसे भी” प्रकाशित हो चुकी है। जैसे लेखक का विचार है कि २१वीं सदी में प्रवेश के साथ कम से कम २१ कॉमिक्स अवश्य प्रकाशित होनी चाहिये। इस दिशा में वे तत्पर भी है। अन्य कॉमिक्सों का काम भी गतिशील है जिनमें भरद्वाज, चन्द्रगुप्त आदि के नाम उल्लेखनीय है।

हमारे ट्रस्ट ने भी यह उद्देश्य बनाया है कि मराठी/हिन्दी भाषा में अप्राप्य/अनुपलब्ध महत्वपूर्ण जनसाहित्य के प्रकाशन के साथ-साथ बालोपयोगी साहित्य भी प्रकाशित किया जाय। अभी तक जो रचनायें प्रकाशित हुई है उनमें योगसार (मराठी) रथयात्रा गीत, समभेद शिखर पूजन विधान (मराठी) का प्रकाशन किया जा चुका है तथा पद्मनान्दि पंचविंशति का ६०० पृष्ठ का पं० गजाधर लाल जी कृत के साथ प्रकाशन का कार्य प्रगति पर है। आशा है कि ४ माह में वह भी पाठकों को प्राप्त हो जायेगी इसका लागत मूल्य करीब ८०.०० रुपये आएगा। जबकि उसका विक्रय मूल्य ४०.०० रखना अपेक्षित है। पाठकों से निवेदन है कि वे इसकी कीमत कम करने में भी अपनी सहयोग राशि “श्री कुन्दकुन्द दिगम्बर जैन स्वाध्याय मंडल ट्रस्ट, नागपुर” के नाम से ड्राफ्ट अथवा मनीआर्डर भेजकर कर सकते है। आपके सहयोग की हमें आशा है।

अध्यक्ष - निर्मलकुमार जैन
मंत्री - अशोक कुमार जैन
श्री कुन्दकुन्द दिगम्बर जैन स्वाध्याय मंडल ट्रस्ट, नागपुर

कौण्डेश से कुन्द कुन्द
शब्द - डॉ. योगेश चन्द्र जैन
चित्र - त्रिभुवन शंकर बालोठिया

भारतवर्ष का दक्षिण प्रान्त संस्कृति एवं सभ्यता के लिए विश्व विख्यात है।

जैन साधुओं की जन्मस्थली दोना, यहाँ की मिट्टी की प्रकृति का स्वाभाविक वरदान है।

कुन्द कुन्द
धर्सेन
पुष्पदन्त
अकलंक
समन्तभद्र
उमास्वामी
रविसेन

सुक्ति कॉमिक्स

प्राचीन काल में यहाँ कोण्डेश नामक एक गोला-ग्वाला नामक रहता था। अपने स्वामी की गायों को चराने के लिए वह जंगल में ले जाया करता था।

गायों को जंगल में छोड़कर एकान्त में झरने के पास प्रकृति का आनंद लिया करता था।

एक दिन सन्ध्या नागरिकों को जंगल में आते देखकर कोण्डेश को बहुत आश्चर्य हुआ।

मैं जीवन में तो अभी तक इनलोगों को यहाँ नहीं देखा ये क्यों आये हैं? चलकर देखना चाहिए।

उसका वेश कोण्डेश उन व्यक्तियों के पीछे पीछे चलने लगा।

कोण्डेश से कुन्दकुन्द

कोमल शरीरवाले ये धनवान लोग मेरी पीछे गर्मी सहन चले जा रहे हैं, ये कोई विशेष बात अवश्य है।

मुनिराज की जय हो!
मुनिराज की जय हो!

अरे! वहाँ कौन वृक्ष के नीचे कौन बैठा है?

कोण्डेश उपदेश सज्जन की अपेक्षा करेगा

सभी जीव भगवान् हैं। स्वयं को पहचान कर लीन हो जाये तो सभी सुखी होंगे, कोई दुखी न रहेगा।

लेकिन मैं दुखी ग्वाला, भगवान् हो सकता हूँ?

सुक्ति कॉमिक्स

वह शाम तक सोचता रहा कि “सभी तो सुखी मुख करते हैं। इन मुनिराज ने भगवान् कहा?”

और फिर गायों को हाँक कर ले गया। रास्ते में तेज बारिश आरम्भ होने से वह भीग गया।

कोण्डेश बिना भोजन किए बिस्तर पर लेटे उपदेश के विषय में सोचता रहा —।

कोण्डेश सुबह नहीं उठा तब माँ ने उसे जगाया।

यदि मैं भगवान् बन गया तो गायें कौन चराएगा?
अरे! गायें भी तो भगवान् बन सकती हैं।

अरे! इसे तो तेज बुखार है।

माँ ने वैद्य को बुलाकर औषधि दी।

एक हफ्ते में बुखार उतर गया, परन्तु वह गायों को जंगल में न ले जा सका।

माँ गायें —
रहने दे, अभी और कुछ दिन आराम कर।

कोंडेश से कुन्द कुन्द

पंद्रह दिन बाद कोंडेश जंगल गया। अचानक जंगल जल चुका था, उसे चिन्ता हुई कि गायें कहाँ चराऊँगा और वह चारा और देखने लगा तभी –

अरे वहाँ वह पेड़ हरा-भरा कैसे है? चल कर देखता हूँ।

भयंकर आग के बीच वह पेड़ कैसे सुरक्षित रह गया? यह जानने के लिए वह ललचा पड़ा।

तभी उसे मुनिराज के उपदेश का स्मरण हुआ।

इस जंगल को जलाया किसने? और उस वृक्ष को बचाया किसने?

विश्व के जड़-चेतन के परिवर्तन स्वतन्त्र हैं, कोई किसी का कर्ता-धर्ता नहीं, सभी स्वतन्त्र हैं।

अरे वाह! इसमें तो कुछ लिखा भी है! पर मैं तो पढ़ना ही नहीं जानता!

वह जानेपर उसकी निगाह पेड़ की खोखल पर गई, जहाँ –

अरे यह क्या है? जरा खोल कर देखूँ तो सही।

मुक्ति कामिक्स

यदि मैं पढ़ा-लिखा होता तो पढ़ लेता परन्तु अब मैं – इसका क्या करूँ?

शायद इस गिरे ताड़पत्र के कारण यह वृक्ष जलने से बच गया।

“आत्मा कभी मरता नहीं जलता नहीं, गलता नहीं तथा सूखता भी नहीं।”

और कोंडेश जंगल में खोजता हुआ बहुत दूर निकल आया।

ठीक है, यह ताड़पत्र मैं उन मुनिराज को दे दूँगा।

चलते-चलते उसे दूर एक वृक्ष के नीचे मुनिराज दिखाई पड़े। कोंडेश श्रद्धा के साथ आनन्दित होता हुआ मुनिराज की ओर चला जा रहा था। उसे सन्तोष हो गया।

कोंडेश से कुन्द कुन्द

कोंडेश हे मुनिवर! यह ताड़पत्र स्वीकार कर मुझ पर उपकार कीजिए!” यह कहकर कोंडेश ने ताड़पत्र मुनि की ओर बढ़ा दिया।

मुनिवर ने प्रसन्नता से कोंडेश को देखा तो उसने भोलेपन से पूछा कि –

मुनिवर क्या यह आगमी है? क्यों कि यह तो जलाया गला नहीं है।

मुनिवर हाँ भव्य! यह आगम नहीं परन्तु, इसमें स्वामी कुन्दकुन्द आचार्य की ज्ञान लिखी है।

कोंडेश तो मुझे यह आत्मज्ञान कब व कैसे प्राप्त होगा? मेरा दुःख कब दूर होगा?

मुनिवर हाँ! हाँ! तुम्हें आत्मज्ञान अवश्य ही होगा और तुम सुखी भी होगे! तुम्हें हजारों वर्षों तक लोग याद करेंगे।

मुनिवर पूछते हो? आज तुमने संसार के दो महान् कार्य किये हैं!

कोंडेश वो, क्या?

कोंडेश वह कैसे?

मुक्ति कॉमिक्स

पहला तुमने ताड़पन के रूप में मोक्ष को सुरक्षित कर के, हजारों वर्षों तक के लिए अपना यश सुरक्षित किया है।

और दूसरा?

पहला और तुमने योग्य व्यक्ति को देकर जिनवाणी का प्रचार-प्रसार किया है!

दूसरा इससे क्या होगा?

पहला तुमने शास्त्रदान देकर सर्वज्ञ की वाणी को आगे बढ़ाया है। इससे भविष्य में तुम्हारे नाम की गौरवपूर्ण परंपरा चलेगी न तुमने सुगुरुत्व अपनाया!

दूसरा अच्छा! मैंने यह नहीं सोचा था।

पहला तभी से कोष्टेश का जीवन बदल गया। वह गायों पर और दयालु हो गया।

कोष्टेश जब सभी भगवान् हैं, तो किस भूल से यह गाय और मैं प्राणों बना?

एक दिन नदी में कीचड़ में फँसी गाय को देखकर कोष्टेश गाय को बचाने भागा, परन्तु…

…वह से टकरा कर —

कोष्टेश ओह! अब तो प्राणों का त्याग कर समाधि लेता हूँ।

कोष्टेश से कुन्द कुन्द

कोष्टेश मृत्यु को प्राप्त हो कोष्टेश ने कोंड कुंदपुर नगर सेठ के घर जन्म लिया।

स्त्री बधाई हो! पुत्ररत्न हुआ है!

पुत्र रत्न की प्राप्ति पर नगर सेठ बहुत प्रसन्न हुआ। सेठ ने नगर में धार्मिक उत्सव किए।

सेठ ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पद्म नंदी नाम श्रेष्ठ है।

सेठ जाओ! नगरोत्सव की तैयारी करो।

नगर में सानंद उत्सव मनाया गया।

स्त्री क्या तुमने देखा नहीं?

स्त्री सुना है नगरसेठ का पुत्र बहुत सुन्दर है।

मुक्ति कॉमिक्स

एक दिन पद्म नंदी बहुत रो रहा था, परिवार के सभी लोगों ने हर प्रकार से उसे चुप करने का प्रयत्न किया, किन्तु व्यर्थ रहा, तभी मंदिर से छोटी सहेली ने गोद में ले लिया…

सहेली शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरंजनोऽसि संसारमाया परिवर्जितोऽसि

स्त्री आश्चर्य! माँ के द्वारा लोरी सुनाने से यह चुप क्यों हो जाता है?

स्त्री मैंने तो सोचा बेटा रोएगा’ कह कर चुप करने की कोशिश की थी, तब भी यह रोता रहा।

स्त्री हाँ बहन मैंने भी सुनाने की कोशिश की थी।

स्त्री मेरा बेटा चुप क्यों होता? वह तो जाति के गीत ही सुनना चाहता है।

स्त्री अवश्य ही इस बच्चे में कोई असाधारण बात है!

क्रौंचेश से कुन्दकुन्द

स्त्री हाँ! हाँ! क्यों नहीं? बेटा भी तो तुम्हारा है, सो धर्मात्मा व विवेकशील ही होगा संभली।

स्त्री (दूसरा कथन) अवश्य ही होगा!

स्त्री हाँ। ऐसे पुत्र का जन्म देकर सेठानी ने अपना जीवन सफल कर लिया।

पद्मनंदि कम सोता है, देर तक जागता हुआ माँ से लोरियाँ सुनता है। सोचता है, हंसता है, तरह-तरह के प्रश्न करता है। इस बात से सेठानी चिंतित होती है। दिनोंदिन उनकी चिन्ता बढ़ती जाती है। और एक दिन रात्रि को सोते समय अपने पति नगरसेठ को कहती है।

सेठानी देखो जी मुझे पद्म बीमार लग रहा है।

सेठ ठीक है, अभी तुम आराम करो। सुबह देखूँगा।

परीक्षण के बाद उन्होंने अपने-अपने सुझाव दिए।

सेठ ने प्रातः निपुण चिकित्सकों एवं वैद्यो व ज्योतिषियों के आमंत्रित कर समस्या से अवगत किया। तथा उन्हें परीक्षण हेतु कहा।

वैद्य आश्चर्य! मात्र दो वर्ष की आयु में अल्पनिद्रा, फिर भी पूर्ण स्वस्थ।

मुक्ति कॉमिक्स

वैद्य इसकी प्रखर बुद्धि एवं ग्राही मस्तिष्क होने से अल्पनिद्रा स्वाभाविक है।

वैद्य मानसिक थकान से निद्रा आती है। लक्षण ऐसे जागृत बुद्धि होने से यह क्षणिक निद्रा नहीं लेते किन्तु, इसमें चिन्तित होने का कारणों नहीं है।

सेठ यह बालक तेजवान महापुरुष होगा सेठ।

सेठ आपलोगों का कहना सत्य है किन्तु—

सेठ किन्तु परन्तू कुछ नहीं उतनी आयु में ऐसे शुभ लक्षणयुक्त शिशु को नहीं देखा। तुम धन्य हो सेठ!

सेठ नगरसेठ आपने हम लोगों को बुलाकर महा-उपकार किया है। इस बालक के दर्शन कर हम कृतकृत्य हुए।

सेठ हाँ! हाँ। क्यों नहीं? जो भविष्य में इसके सम्पर्क में रहेंगे, वे अवश्य ही परम सौभाग्यशाली होंगे।

क्रौंचेश से कुन्दकुन्द

सेठ आशीर्वाद एवं शुभगमन भास्कर सभी वैद्य आदि जाते लगे तब…

सेठ हमारी दक्षिणा मिल चुकी नगरसेठ! बालक का दर्शन कर हम कृतार्थ हुए।

सेठ पंडित जी! दक्षिणा ले जाईयेगा।

कोमल पुष्प की तरह पल्लवित, विकसित पद्मनंदि चार वर्ष का हो चला। माँ (सेठानी) ने प्रारंभिक अक्षर ज्ञान के साथ धार्मिक शिक्षा देना भी आरंभ कर दी। और एक दिन…

सेठानी बेटा पद्म! कुल समय आकर पढ़ लो।

पद्म नहीं माँ! मैं तुमसे नहीं पढूँगा। अब तुम नई बातें नहीं सिखाती हो मुझे।

सेठानी अब इस पद्म को क्या पढ़ाऊँ! जो कुछ मुझे ज्ञान था वह तो इसने कुछ महीनों में ही सीख लिया। अब इसकी जिज्ञासा कैसे शांत करूँ?

सेठानी हाँ एक रास्ता अवश्य है, रात को मैं ‘पद्म’ को और सुबह वहाँ पद्म को पढ़ाऊँगी। यही ठीक रहेगा।

आज सो रही नहीं क्या प्रिये! दिन-रात पुस्तका में ही कोई रहती हो।

कुछ देर और पढ़ लूँ। सुबह पढ़नकी पढ़ना है।

माँ बनना सरल है माँ का कर्तव्य निभाना बहुत कठिन है।

शीघ्र ही पद्म के लिए योग्य, विद्वान् शिक्षक की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे वह भी विद्वान् बनकर सूर्य के समान प्रकाश -वान बने।

एक दिन प्रातःकाल से ही कोण्डकुण्डपुर में बहुत हलचल थी। लोग प्रसन्न थे। आपस में कुछ बात करते, और जंगल की ओर बढ़ चले।

अरे भाई! सुबह सुबह कहाँ भागे चले जा रहे हो? क्या कोई संकट आ गया है!

क्या तुम अबतक सो रहे थे? अभी तो जानने का समय है भैया!

तुम सब साफ़ साफ़ क्यों नहीं कहते? क्या बात है!

तो सुनो-संकट तो अब जाने वाला है, क्योंकि आचार्यश्रेष्ठ जिनचंद्र के नगर के समीप जंगल में देखा गया है!

पद्म सुनो ध्रुवेश! आज क्या हो रहा है तुम सब को? सुबह ही कहाँ..

ध्रुवेश अरे! तुम्हें नहीं मालूम? कल शाम यहाँ कुण्डकुण्ड श्री जिनचंद्र जी को नगर के पास जंगल में देखा गया है।

पद्म माँ! जल्दी उठो, देखो आज सूर्य का उदय हुआ है।

माँ उठ रही हूँ बेटे पद्म! परंतु तुम्हें क्या हुआ? सूर्योदय तो रोज ही होता है, नया क्या है?

पद्म हाँ माँ! मैं कहता, आज तो पूरा नगर ही पागल हुआ है। कि आज के सूर्य का उदय ही ऐसा है जिससे अज्ञान का नाश होगा। पाप गलेंगे, ज्ञान के प्रकाश से सभी पावन होंगे।

माँ पहेलियाँ क्यों बुझाते हो पद्म तुम तो मुझे ही पंडित करने लगे। सीधी बात बताओ।

पद्म बात यह है कि आचार्य जिनचंद्र के रूप में सूर्योदय हुआ है, वे पास के जंगल में विराजमान हैं। सारा नगर उनके दर्शन करने जा रहा है माँ! और मैं भी।

माँ सुनो पद्म! मैं भी चल रही हूँ।

पद्म की प्रतीक्षा किए बिना ही चला गया। इस बात से माँ सोचती है कि मुनिराज के प्रति ज्ञानी श्रद्धा और निष्ठा कि पद्म मेरा पुत्र होकर तात्विक प्रश्नोत्तर कर सके।

मैनानी की सोच का बादल घना होने लगा और उनके मस्तिष्क रूपी आकाश पर छा गया। उनको अचानक पद्म के मुनि बनने का ख्याल आया कि — वे स्वयं बुद्धुवान लगी-नहीं। नहीं! मैं ऐसा कभी नहीं होने दूँगी। मेरा तो एक ही पुत्र है। मैं उसे मुनि नहीं बनने दूँगी। मेरा पुत्र तो भावी नगर-सेठ है, और ज्ञानी भी है मेरा पद्म।

कोंडेश से कुन्द कुन्द

जंगल के पास सभी एकत्रित होते हैं। दूर वृक्ष के नीचे ही आचार्य श्री ध्यानमग्न हैं। सभी आचार्यश्री के ध्यान खुलने की प्रतीक्षा में हैं।

एक व्यक्ति अरे भाई! हम तो प्रवचन सुनने आए थे, परन्तु मुनि राज तो ध्यान में लीन हैं, और खूब देर हो रही है।

दूसरा व्यक्ति पर हमें तो प्रवचन सुनकर ही जायेंगे। आज कुछ देर से दुकान खोलेंगे तो क्या अनर्थ होगा। प्रवचन सुनकर हमें लाभ ही लाभ होगा।

तीसरा व्यक्ति हाँ भैया! प्रवचन से हमें ज्ञान प्राप्त होगा। सुख का मार्ग मिलेगा।

एक व्यक्ति हाँ! तुम सत्य कहते हो। साधुजनों या सज्जनों की संगति का धन्यदय कर के भी प्राप्त करना चाहिए।

दूसरा व्यक्ति भाई! तुम कुछ भी कहो। बात में और अधिक समय व्यर्थ करना नहीं चाहता। आचार्य का भी कुछ कर्तव्य है, कि इतने लोग अपना काम छोड़कर यहाँ आए हैं।

मुक्ति कॉमिक्स

एक व्यक्ति तुम्हें जाना है तो जाओ। परन्तु वे मुनि हैं, किसी के अधीन नहीं जो किसी के आगे पर उपदेश दे दे। वास्तव में तुम्हारे पुण्य का उदय अभी नहीं हुआ।

दूसरा व्यक्ति इसका क्या होगा? मुनिश्री के दर्शन तो समय व्यर्थ करना कह रहा है। जिसको भव्य अच्छा नहीं उसे ऐसे ही अशुभ विचार आते हैं।

एक व्यक्ति सांसारिक कार्य तो चलते ही हैं, रुकते नहीं। फिर मैं क्यों मुनिराज के दर्शन-प्रवचनादि के सुनने से वंचित रहूँ। कितना ही समय हो, मैं प्रवचन सुनकर ही जाऊँगा।

दूसरा व्यक्ति थोड़ा धीमे-धीमे बोलिए आदरणीय! कहो! भगवन् श्री महाराज का ध्यान भंग न हो। अभी वे सिद्धों से बातें कर रहे हैं।

एक व्यक्ति हाँ! हाँ! वह बालक ठीक ही कह रहा है, ध्यान की अवस्था तो सिद्ध भगवन्तों से वार्ता की ही अवस्था है।

दूसरा व्यक्ति परम सत्य। हमें शांति से उनके कार्य का अनुमोदन कर पुण्य का भागीदार होना चाहिए।

तभी मुनिराज का ध्यान भंग होता है। वे जनसमूह को सम्मुख देखकर उपदेश देने लगते हैं।

मुनिराज शुद्धात्मा को जाने बिना दुःख ही दुःख है। सुख के लिए अहिंसा, दया, क्षमाचरण करना चाहिए। यदि संतोष हो तो मुनिधर्म धारण करना चाहिए।

कोंडेश से कुन्द कुन्द

विचार मग्न पदम उठकर आचार्य के सम्मुख पहुँचा।

पदम अरे! अब ज्ञान मैंने अब तक नहीं सुना। पूर्वभव में सत्य है मुनिराज! मेरे जीवन में ऐसी दशा कब होगी?

आचार्य आचार्यवर! आपके उपदेश से मैं संसार का स्वरूप जान गया हूँ। हे नाथ! मुझे दीक्षादान दीजिए।

पदम हे भव्य! तुम्हारे विचार तो उत्तम हैं, किन्तु परिजनों को अनुमति प्रथम है।

पदम माँ! क्या तुम मुझे अछूतपुत्र मानती हो, अब हित चाहती हो। और अनंत काल तक मेरी ही माँ बने रहना चाहती हो।

माँ हे पदम! क्या बात है? आज तुम ऐसी गंभीर बातें क्यों कर रहे हो?

पदम माँ! मैंने मुनि होने का निश्चय किया है। मैं सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर रहना चाहता हूँ। तुमसे दीक्षा की आज्ञा चाहता हूँ। तुम मुझे आज्ञा दोगी।

माँ नहीं नहीं! नहीं ऐसा नहीं हो सकता। अभी तुम्हारे छोटे भाई भी हैं।

अचानक पदम से मुनि बनने की बात सुन माँ वैरागी को दुःखद वियोग की कल्पना से ही तड़प गया। उसने तरह-तरह से पदम को समझाने का प्रयत्न किया, किन्तु सब व्यर्थ। पदम ने दृढ निश्चय कर लिया था। माँ का प्रयास भी विफल रहा तो उसके नेत्रों से अश्रुधार फूट निकली। सभी सदानों को देखन लगे।

कौण्डेश से कुन्द कुन्द

पद्मा नहीं माँ! मैं अपने जन्म के लिए लज्जित हूँ। अब अनन्त काल तक जन्म न लूँगा, किसी को कष्ट न दूँगा। इतने वर्ष संयम बिना व्यर्थ किये, परन्तु अब न करूँगा।

माँ तुम जानते हो पद्म कि मैं तुम्हें कितना प्यार करती हूँ। तुम ही मेरी एकमात्र संतान हो। मैं कैसे अपनी ममता को दबोच लूँ।

पद्मा मैं जानता हूँ मैं। इसी लिए तुमसे दीक्षा की आज्ञा चाहता हूँ। तुम अपनी ममता को अगर कर दो अध्यक्ष। स्त्री जन्म तक तुम्हारा पुत्र कहलाऊँगा। तुम अपनी ममता को मेरी राह में न लाओगी!

माँ नहीं नहीं, पद्मा। ऐसा नहीं होने दूँगी। तुम्ही अनन्तकाल तक मेरे पुत्र कहलाओगे।

पद्मा मुनि ने मुझे शिक्षा दी है। संयम-पूर्वक मुझे आज्ञा दो।

माँ पर ऐसा संभव कैसे? पद्म का कहना असत्य तो नहीं। और फिर माँ को कष्ट। तो पुत्र को कुमार्ग से रोकना है। वियोग की आशा से ही मैं ‘रखाथियंती’ बन रही हूँ…

पद्मा धिक्कार है! मेरा मोह जो सन्मार्ग पर चलने वाले पुत्र के सुख में ही बाधा बन रहा है।

कौण्डेश से कुन्द कुन्द

पद्मा तुम तो कैसी धर्म की बातें करती थी। अब कैसे सिसककर रो रही हो?

माँ कौन कहता है कि मैं रोती हूँ? अरे! (निगोदी) पुत्र की (सिंह गर्जना से मोही) माँ का मोह नेत्र-पथ से बह कर पुत्र के पद प्रक्षालित कर रहा है।

पद्मा फिर ये आँसू क्यों गिर रहे हैं?

माँ ये आँसू नहीं भैया! जन्म-मृत्यु को जीतने वाले पुत्र पर क्षीरोदधि से जल भर महा मस्तकाभिषेक कर रही है।

पद्मा और सुनो पद्म! तुम्हें मेरे ममत्व की सौगन्ध, तुम अनन्त काल तक मेरे ही पुत्र रहोगे। जाओ मैं तुम्हें भावनाशिनी जैनेश्वरी दीक्षा की सहर्ष अनुमति प्रदान करती हूँ।

माँ ठीक है जो! मैं जानता था तुम अवश्य अनुमति दोगी। तत्व सखी जो हो और मेरी गुरु भी!

मुक्ति कॉमिक्स

12 वर्ष की आयु में पद्म ने आचार्य जिनचन्द्र से दीक्षा ग्रहण की। अनेक लोगों ने अनुव्रत लिए। पद्म के वैराग्य से प्रभावित होकर दीक्षित हुए। हजारों, लाखों लोग प्रेरित व प्रभावित हुए।

  • साधु बनकर पद्मनांदी कठोर तपस्या करने लगे। इनकी कीर्ति चारों ओर फैलने लगी।

  • अरे देखो पद्मनांदी का तप! कई दिनों से आहार भी नहीं लिया।

  • मैं अद्भुत लेता हूँ। मैं प्रतिमारूढता हूँ, अंगीकार करता हूँ।

  • संघ के साधु भी उनकी तपस्या से प्रभावित हुए।

  • देखो तो सही। दीक्षा में चाहे हम छोटे परन्तु ज्ञान, ध्यान एवं तपस्या में हम सबसे श्रेष्ठ हैं। धन्य है उनकी साधना।

  • आचार्य जिनचन्द्र वृद्ध हो जाने से दूसरे संघ में जाकर समाधि लेना चाहते थे। और योग्य मुनि का आचार्य नए साधुकर मुनि पाना चाहते थे।

  • पद्मनांदी ही श्रेष्ठ मुनि हैं जिन्हें संघ के सभी मुनि चाहते हैं। प्रशंसा करते हैं। श्रावकों में भी विशेष पूजनीय हैं।

  • फिर भी उन्होंने संघ के मुनियों से जानकारी ली। मेरे पश्चात् इस संघ के आचार्य का पद कौन मुनि संभाल पायेगा।

  • पद्मनांदी से श्रेष्ठ इस भूतल पर कौन हो सकता है।

कौंडेश से कुन्द कुन्द

आचार्य भगवन् की आज्ञा शिरोधार्य

मैं तुम्हें यह जिनशासन सौंपता हूँ! इसकी गरिमा रखना तथा संयस्थ शिष्यों की मोक्ष मार्ग में दृढ़ता रखना तुम्हारा कर्तव्य है।

और आचार्य जिनचंद्र देव (स्वामीजी) वर्षीय पक्का मुनि का चतुर्विध संघ की उपस्थिति में संघ का भार आचार्य पद सौंप कर समाधि हेतु प्रस्थान कर गये।

आचार्य बनने के बाद उनका यश चारों दिशाओं में फैलने लगा। कोण्डकुंदपुर जन्मस्थान होने से पट्टनभेदी ‘कुंदकुंद’ नाम से प्रसिद्ध हुए।

एक दिन पल्लवदेश के राजा शिवस्कंध सपरिवार उनके दर्शनार्थ आते हैं।

अच्छा हुआ, राजा के आग्रह से कुंदकुंद एक दिन और ठहर जायेंगे!

कुंदकुंद से प्रभावित होकर राजा शिवस्कंध भी मुनिवेषधारण कर संघ के पीछे हो लिये।

हमे भी राजा के श्रेष्ठ निर्णय का अनुकरण करना चाहिए

अरे! यह क्या? मुनि संघ का रुकने वाला ही, स्वयं मुनि हो गया, तब संघ को कौन रोकेगा!

कौंडेश से कुन्द कुन्द

विज्ञानी मुनियों, तरुकोटों में रहने वाली मुनिराज कहने पर भी कुंदकुंद का शरीर स्वर्ण सा रहने लगा। यह आश्चर्य देखकर सब मुनि सोचते हैं कि

कठोर तपश्चर्या करने पर भी आचार्य श्री का शरीर क्षीण न होकर तेजस्वी कैसे रहा?

कुछ बात नहीं! आचार्य को अनेक ऋद्धियाँ के साथ चारण ऋद्धि भी प्राप्त है। अब वे पृथ्वी से चार अंगुल ऊपर भी चल सकते हैं!

एक दिन स्वाध्याय करते हुए उन्हें किसी आगम का मर्म जानने की तीव्र इच्छा हुई।

इसका समाधान सिद्धेश्वर के भगवान् ही कर सकते हैं!

महाविदेह का चक्रवर्ती सीमंधर भगवान् से प्रश्न पूछता है।

भगवान्! भरतक्षेत्र में इस समय सर्व श्रेष्ठ साधु कौन है?

आचार्य कुंदकुंद ही धर्मघोष हैं!

तभी यहाँ अदृश्य से चारण ऋद्धिधारी मुनि सामने हैं।

ऐसे में महान् तपस्वी व अलौकिक ज्ञानोपयोगी संत के दर्शन करने चाहिए।

फिर तो अभिप्राय चलता ही चाहिए।

भरतक्षेत्र में भगवान् कुंदकुंद आचार्य के दर्शनार्थ यह से चले।

अरे! यह क्या? आकाशमार्ग में ये कौन मानवाकृति दौड़ती आ रही है!

अरे! ये तो मुनिराज हैं! हाँ! हाँ! शायद चारण ऋद्धि मुनि युगल कुंदकुंद आचार्य की भुजा के पास उतर रहे हैं। हमें भी वहाँ चलना चाहिए।

कौंडेश से कुन्द कुन्द

मुनियुगल नीचे उतरकर आचार्य कुंदकुंद की वंदना कर विराजते हैं। और अपना परिचय देते हैं।

पूज्यपाद गणधरदेव की क्या आज्ञा है?

आज्ञा जिनकी हंसी से हो, जो स्वर्ग के भैरव हो, महाविदेह के जिनकी कीर्ति हो, आचार्य की चर्चा हो, उनसे निष्कंप आज्ञा की जा सकती है!

क्या आपको साक्षात् तीर्थंकर देव के दर्शन की इच्छा नहीं होती!

क्यों नहीं? यह दुर्लभता अभी शेष है ही।

क्यों न आप भी हमारे साथ चलें?

विचार तो उत्तम है। वहाँ जाकर कुछ शंकाओं का समाधान होगा।

आपको चारण ऋद्धि प्राप्त है ही आप भी हमारे साथ अर्हंत देव के दिव्य वचनामृत का पान करें!

सुकृति कॉमिक्स

कुंदकुंद के नग्नत्व में पहुँचने पर ५०० धनुष ऊँचे मनुष्य आश्चर्य से पूछते हैं :
भगवान्! छोटे शरीर वाले मुनिराज कौन हैं?
ये भरत क्षेत्र के महान् तपस्वी व श्रुतज्ञानी मुनिराज कुंदकुंद हैं।

आठ दिन रहकर जिनवाणी के मर्म का सूक्ष्मज्ञान प्राप्तकर कुंदकुंद पर्वत से लौटें।

धन्यभाग हमारे। जो आज हमें साक्षात् तीर्थंकर की दिव्यवाणी सुनकर लौट आचार्य कुंदकुंद का प्रवचन सुनने का अवसर मिला है।

आचार्यश्री! धर्म क्या है?

आचार्य कुंदकुंद भक्तजन की समस्या सुनकर पास में ही बैठ गये।
चारित्र ही वास्तविक धर्म है। धर्म से ही समता भाव की उत्पत्ति होती है।
परन्तु मुक्त में इतनी सामर्थ्य कहाँ?

कौंडेश से कुन्द कुन्द

कुंदकुंद पर्वत पर जाकर समयसार की रचना करते हैं।
समय का सार है, जो आत्मा-अनुभूति है।

उत्तर भारत विहार के समय साधुओं के आचरण को देखकर कहते हैं कि :
सद्गुरुओं की ही बदलता की जाती है। इसके बिना व्यक्ति न तो सच्चा मुनि हो सकता है और न ही श्रावक।

जो मुनिवेषी होकर गंदी भावना रखता है, स्त्री सम्पर्क करता है, वह तो मुनि है ही नहीं, निर्वस्त्र है।
उनके तर्क संगत आत्महितकारी वचनों को सुनकर लोग प्रभावित हुए। श्रावक चर्चा करने लगे। देखो तो सही ५०० मुनियों का संघ। एक तरफ अध्यात्म प्रतिकुल और दूसरी ओर चारित्र का जीवित किया।

हाँ! हाँ! क्यों नहीं, यदि कुंदकुंदाचार्य न होते तो साधुओं में भ्रष्ट आचरण को कौन रोक सकता था?
लोग तो सवस्त्र मोक्ष पाने को बैठे थे, या फिर नंगे होकर पूजे जाने के लिए आतुर थे। मुनिधर्म का निर्वाह कौन करे?

सुकृति कॉमिक्स

भगवान् महावीर के उपदेश का सम्पूर्ण भारत में प्रचारित करते हुए कुंदकुंद ने ८४ पाहुड़ों की रचना की। उनकी आयु ६४ वर्ष थी। उन्होंने योग्य शिष्य की तलाश थी जिससे संघ के आचार्य पद पर स्थापित करना था।

योग्य मुनि को आचार्य पद सौंपकर मुनिवर कुंदकुंद समाधिस्थ हुए। अन्न जल का त्याग कर पौन्नूर पर्वत पर गये।
मुनिवर कुंदकुंद के देह त्याग के बाद समयानुसार उनके अध्यात्म को अमृतचंद, जयसेनाचार्य आदि ने आगे बढ़ाया। उनके ग्रंथों की टीकाएँ की।

सैकड़ों वर्षों तक लोग उनको याद करते रहे। आचार्य देवसेन ने कहा - यदि सीमंधर भगवान् से प्राप्त दिव्य ज्ञान को उपदेश कुंदकुंद आचार्य न देते तो मुनिजन सच्चे मार्ग को कैसे पाते?
कुंदकुंद तो कलिकाल में सर्वज्ञ के रूप में थे।
सुनो हाँ! न हो सिंहों में मुनिन्द्र कुंदकुंद से!

सम्पादकीय

प्रातः स्मरणीय आचार्य कुन्दकुन्द भारत देश के महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सन्त है। भारतीय समाज पर उनका अविस्मरणीय अनगिनत उपकार है। आज से 2000 वर्ष पूर्व उन्होंने ही भारतीय साहित्यिओं को साहित्य की सुरक्षा, संरक्षण और संवर्धन करना सिखाया है। आत्मविद्या के महान् वैज्ञानिक कुन्दकुन्द ने जीवन की सत्यानुभूतियों की ‘चिंतन शैली’ पर चिंतन करके उसमें नयी शोध-खोज कर भारतीय जन-मानस को नयी दिशा प्रदान की है।

भगवान् महावीर के शासन के अन्तिम श्रुत-केवली भद्रबाहु के शिष्य कुन्दकुंद ने बाल्यावस्था में ही राग-द्वेष आदि विकारों को ललकारते हुए वीतरागी नग्न दिगम्बर दशा अंगीकार करके मोही जीवों को चमत्कृत कर दिया था। सचमुच में ही बाल्यावस्था को उनका यह चमत्कार नमस्कार के योग्य था। सम्पूर्ण विश्व के जीवों को अपनी मजबूत फौलादी पकड़ करने वाले मोह को लोहे के चने चबाने वाले ये दूध के दांतों वाली कुन्दकुन्द की बाल्यावस्था, स्वयं में चमत्कार है। उनके जीवन चरित्र को प्रस्तुत करने वाली इस कार्मिक्स की प्रस्तुति के रूप में मेरा नमस्कार है, और चमत्कारी कुन्दकुन्द की उम्र के पाठक बच्चों को जो इसको पढ़कर अपना जीवन सुधारेंगे, ज्ञानवान बनेंगे, उन्हें हमारा सत्कार है, सत्कार है।

डॉ. योगेश चन्द्र जैन

हमारा आगामी प्रकाशन “तीर्थंकर श्रुभदेव”


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 177.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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