कौन बनेगा - अकलंक निकलंक
कौन बनेगा अकलंक निकलंक
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अनुयोग चार प्रकार के हैं। प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग।
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कषाय चौकड़ी चार हैं। अनंतानुबंधी कषाय चौकड़ी, अप्रत्याख्यानावरण कषाय चौकड़ी, प्रत्याख्यानावरण कषाय चौकड़ी और संज्वलन कषाय चौकड़ी।
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क्षपक श्रेणी के गुणस्थान चार हैं। 8 वाँ अपूर्वकरण, 9 वाँ अनिवृत्तिकरण, 10 वाँ सूक्ष्मसाम्पराय, 12 वाँ क्षीणमोह।
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अस्तिकाय पाँच होते हैं- जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय।
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समिति पाँच होती हैं- ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण और प्रतिष्ठापन।
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पाँच तीर्थंकर बाल ब्रह्मचारी हैं- 12 वें वासुपूज्य, 19 वें मल्लिनाथ, 22 वें नेमिनाथ, 23 वें पार्श्वनाथ और 24 वें महावीर स्वामी।
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मुनियों के छह आवश्यक हैं- समता, स्तुति, वंदना, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान।
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लेश्याएँ छह होती हैं- कृष्ण लेश्या, नील लेश्या, कापोत लेश्या, पीत लेश्या, पद्म लेश्या, शुक्ल लेश्या।
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परमागम पाँच हैं। परमेष्ठी पाँच होते हैं। पाप भी पाँच होते हैं। पाँचों परमागमों के रचयिता आचार्य कुन्दकुन्द हैं।
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छहढाला में छह ढाल हैं। लेश्याएँ छह होती हैं। द्रव्यों की जातियाँ छह हैं। मुनि और श्रावक के आवश्यक भी छह हैं।
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तत्त्वार्थसूत्र के रचयिता आचार्य उमास्वामी आचार्य कुन्दकुन्द के शिष्य हैं। समयसार के कर्ता आचार्य कुन्दकुन्द जिनचन्द्राचार्य के शिष्य हैं। आदिपुराण के रचयिता आचार्य जिनसेन आचार्य वीरसेन के शिष्य हैं।
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णमोकार मंत्र में 35 अक्षर हैं। मोक्षमार्ग प्रकाशक में नौ अधिकार हैं। समयसार में 415 गाथाएँ हैं। छहढाला में छह ढाल हैं। नियमसार में 111 कलश हैं।
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आदिपुराण प्रथमानुयोग का ग्रन्थ है। गोम्मटसार करणानुयोग का ग्रन्थ है। रत्नकरण्ड श्रावकाचार चरणानुयोग का ग्रन्थ है। प्रवचनसार द्रव्यानुयोग का ग्रन्थ है और मोक्षमार्ग प्रकाशक चारों ही अनुयोगों का ग्रन्थ है।
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आचार्य के 6 अंतरंग और 6 बहिरंग तप होते हैं। 6 वें तीर्थंकर पद्मप्रभ भगवान् हैं। 6 महीने 8 समय में 608 नियम से मोक्ष जाते हैं।
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आदिनाथ कैलाशपर्वत से, वासुपूज्य चम्पापुरी से, नेमिनाथ गिरनार से, महावीर पावापुर से तथा शेष 20 तीर्थंकर सम्मेद शिखर से मोक्ष गए।
मूल दस्तावेज़ (PDF): 156.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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