कर्त्तव्याष्टक | Kartavyashtak

आतम हित ही करने योग्य, वीतराग प्रभु भजने योग्य।।
सिद्ध स्वरूप ही ध्याने योग्य, गुरु निर्ग्रन्थ ही वंदन योग्य।।1।।

साधर्मी ही संगति योग्य, ज्ञानी साधक सेवा योग्य ।।
जिनवाणी ही पढ़ने योग्य, सुनने योग्य समझने योग्य।।2।।

तत्त्व प्रयोजन निर्णय योग्य, भेद-ज्ञान ही चिन्तन योग्य।
सब व्यवहार हैं जानन योग्य, परमारथ प्रगटावन योग्य।।3।।

वस्तुस्वरूप विचारन योग्य, निज वैभव अवलोकन योग्य।।
चित्स्वरूप ही अनुभव योग्य, निजानंद ही वेदन योग्य।।4।।

अध्यातम ही समझने योग्य, शुद्धातम ही रमने योग्य।
धर्म अहिंसा धरने योग्य, दुर्विकल्प सब तजने योग्य।।5।।

श्री जिनधर्म प्रभावन योग्य, ध्रुव आतम ही भावन योग्य।
सकल परीषह सहने योग्य, सर्व कर्म मल दहने योग्य।।6।।

भव का भ्रमण मिटाने योग्य, क्षपक श्रेणी चढ़ जाने योग्य।
तजो अयोग्य करो अब योग्य, मुक्तिदशा प्रगटाने योग्य ।।7।।

आया अवसर सबविधि योग्य, निमित्त अनेक मिले हैं योग्य।
हो पुरुषार्थ तुम्हारा योग्य, सिद्धि सहज ही होवे योग्य।।8।।

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