प्रस्तावना — प्रकाशकीय एवं मन की बात
श्री राम-नन्दिनी ग्रंथमाला का पंचम पुष्प
कर्म विचारे कौन
(बाल नाटक संग्रह)
-: प्रकाशक :-
समर्पण
ध्रुवधाम, पो. कूपड़ा, जिला - बांसवाड़ा (राज.)
मो. 91 9414103492
प्रथम संस्करण : 1000 प्रतियाँ
दिनांक
: 30 अगस्त 2014 (दशलक्षण महापर्व)
वीर निर्वाण संवत् 2540
प्राप्ति स्थान
: समर्पण + 91 9414103492
लागत मूल्य
: 17 रुपये
पुनः प्रकाशन हेतु सहयोग राशि : 15 रुपये
मुद्रण व्यवस्था : देशना (दिनेश) कम्प्यूटर्स
एफ-23, सी-5, मालवीया इण्डस्ट्रियल एरिया,
जयपुर, मो. 9928517346
प्रकाशकीय
‘समर्पण’ द्वारा समर्पित साधर्मियों के सहयोग से अभी तक
‘श्री राम-नन्दिनी’ ग्रन्थमाला के अंतर्गत श्री कानजीस्वामी के प्रवचन
साहित्य का अनुशीलन एवं बढ़ते भगवान्-घटते भक्त (तीन संस्करण)
प्रकाशित किये जा चुके हैं।
इस वर्ष राजकुमार शास्त्री द्वारा लिखित ‘विलक्षण-दशलक्षण’ एवं
‘बढ़े सो पावे’ निबंध संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। अब ‘कर्म विचारे
कौन?’ यह नाटक/एकांकी संग्रह प्रकाशित किया जा रहा है।
पाठकों ने उक्त पुस्तकों को प्रकाशन पूर्व ही पसंद किया है जो कि
इन पुस्तकों की विषयवस्तु की आवश्यकता की ओर इंगित करता है।
‘समर्पण’ अनुपलब्ध या नवोदित लेखकों के स्तरीय साहित्य
प्रकाशन की भावना रखता है, अगर आपके पास ऐसा कोई साहित्य हो
तो हमें जरूर उपलब्ध करवावें, हम आपके ही सहयोग से यह सम्पन्न कर
गौरवान्वित अनुभव करेंगे। महावीर जयन्ती के अवसर पर भगवान्
महावीर से संबंधित कविताओं के संकलन किया जाना प्रस्तावित है,
आप स्वरचित या संकलित कवितायें उपलब्ध कराने का श्रम करावें ।
अंत में हम लेखक, ग्रन्थमाला संचालक, अर्थ सहयोग करने वाले
साधर्मियों एवं बुद्धिमान् पाठकों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हैं, जिनके
सहयोग से यह कार्य सम्पन्न हो रहा है।
सुन्दर मुद्रण के लिए श्री दिनेश शास्त्री, देशना कम्प्यूटर्स जयपुर का
धन्यवाद ।
निवेदक
समर्पण परिवार
मूल्य कम करने में प्राप्त सहयोग -
११००/ रुपये श्रीमती सुनीता ध.प. श्री महेश जैन, ब्यावर
११००/ रुपये श्री चांदमल, ललितकुमार किकावत, लूणदा
मन की बात
बच्चे ही नहीं बड़े भी पढ़ने-सुनने की अपेक्षा देखने से अधिक
व जल्दी सीखते हैं, इसीलिये नाट्य विधा सदा से ही सबकी पसन्द रही
है। आज तो चित्रपट (फिल्म) के माध्यम से उसकी सार्थकता सबके
समक्ष है।
पाठशाला में भी बच्चों द्वारा छोटे-छोटे संवादों के माध्यम से जिनागम
के सिद्धान्तों को पिरोकर प्रस्तुत करने के सार्थक प्रयास अनेक लेखकों
द्वारा किये जा रहे हैं।
मैं 1992 में जब कोटा स्थानान्तरित होकर पहुँचा; तब 1993 से ही
बाबूजी की प्रेरणा व मार्गदर्शन तथा डॉ. मानमलजी के संयोजकत्व में
जैनदर्शन व्यक्तित्व विकास शिविरों का शुभारंभ हुआ, जो आज तक
सुचारुरूप से संचालित हो रहे हैं।
शिविरों के समापन के अवसर पर उनकी भावना रहती थी कि
प्रतिवर्ष छोटा, नया व सार्थक संवाद प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिससे
पाठशाला के बच्चों की प्रतिभा का पता चल सके एवं समाज में कुछ
सन्देश भी दिया जा सके।
इसी भावना से मैंने प्रतिवर्ष नये संवाद लिखे, जिनमें कला पक्ष की
ओर कम ध्यान दिया गया, परन्तु भावपक्ष ही मुख्य रखा गया। उन
संवादों को एकत्र कर प्रकाशित करने की भावना कुछ समय से चल रही
थी, जो अब पूर्ण हो रही है।
प्रस्तुत संग्रह में ‘कर्म विचारे कौन?’ नाटक, राजसभा व न्यायालय
दो रूपों में मंचित किया जा सकता है, मैंने दोनों रूपों में ही अलग-अलग
स्थानों पर मंचित कराया है, अतः उस नाटक को दोनों रूपों में ही
संकलित किया है, निमित्त-उपादान संवाद में संक्षेप में निमित्त उपादान
का ज्ञान, भेदविज्ञान नाटिका में समयसार की गाथा 35 की टीका में दिये
गये उदाहरण को नाट्य शैली में प्रस्तुत किया है।
नेता कौन? नाटक में छः द्रव्यों का परिचय रोचक ढंग से प्रस्तुत
किया गया है एवं अन्तिम भगवान् महावीर और उनकी अहिंसा में
भगवान् महावीर का संक्षिप्त परिचय व अहिंसा के स्वरूप को स्पष्ट
किया है।
मैं लेखक नहीं हूँ, फिर भी लिखने का काम कर रहा हूँ अतः
कलापक्ष व भावपक्ष दोनों में ही त्रुटियाँ होने की पूरी संभावना है, जिनके
भी ज्ञान में त्रुटियाँ आवें तो सूचित कीजियेगा। आप स्वयं भी सुधार कर
या परिवर्तन/परिवर्धन कर इनका तत्त्वप्रचार में उपयोग कर सकते हैं।
यदि दशलक्षण पर्व या अन्य अवसरों पर ये संवाद मंचित होकर
कुछ ज्ञानवर्धन में सहयोगी बन सके तो निश्चित ही परिश्रम सार्थक होगा।
समर्पण प्रकाशन के लिए हार्दिक धन्यवाद, जिन्होंने इसे प्रकाशित
कराके मेरा उत्साहवर्धन किया है।
पल-पल जीवन बीता जाता है, बीता पल नहीं वापस आता है।
क्या तूने खोया है? क्या तूने पाया है? कर ले तू चिंतन सही।
क्योंकि आत्मा अनंत गुणों का धनी, फिर भी देखो पर्यायों में रुली ।टेक।
मोह लोभ में तू भरमाया है, सपनों का संसार सजाया है।
ये सब छलावा है, ये सब भुलावा है, कर ले तू चिंतन सही।
क्योंकि आत्मा अनंत गुणों का धनी…।।१ ।।
देव-शास्त्र-गुरु शरण मिली तुझको, जिनवाणी की राह मिली हमको ।
अब भी न सम्हला गर, मौका ये चूका गर
भव - भव में पछतायेगा, क्योंकि आत्मा अनंत गुणों का धनी…
प्रूफरीडिंग बाकी है