कर्म का और बाहरी पदार्थ का सहयोग | Karm Ka Aur Bahri Padarth Ka Sahyog

कर्म तो दिखाई देते नही सूक्ष्म है, जो पुदगल है | इसके उदय से या निर्जरा होने से बाहर की प्रतिकूलताएँ ओर अनुकूलताएँ कैसे होती है ? पुदगल ही पुदगल को परिणमित करता है?
इस के कारण बाहर की अवस्थाएँ कैसे बदल जाती है?

प्रस्तुत प्रश्न के समाधान हेतु मोक्षमार्ग प्रकाशक का दूसरा अधिकार मूल से पठनीय है ।

निमित्त-नैमित्तिक संबंध कर्मो का ओर बहरी द्रव का होता है क्या ? इस परिछेद का येही अर्थ समजू ?

देखिये,
आप इस प्रकरण का ये अर्थ समझें कि -
निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध बहुत प्रकार का हो सकता है, निकट से निकट और दूर से दूर।

एक निमित्त - नैमित्तिक सम्बन्ध यह भी है कि बादलों की रचना आसमान में बिखर गई और वैराग्य हो गया ।
और
एक निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध यह भी है कि जीव ने परिणाम किये और कर्मबन्ध हुआ तथा कर्म का उदय आया और जीव के परिणाम बिगड़े ।

इसी का अर्थ है अवस्थाएँ बदलना ।