कमठ की कथा
कमठ की बन आई। उस दुराचारी ने उसका सतीत्व ही लूट लिया! …
जबराजा अरविन्द युद्ध से लौटे तब …
मंत्री: मैंने सुना है कि तुम्हारे बड़े भाई ने तुम्हारी पत्नियों के साथ… अब क्या दंड दिया जाये उस पापी को?
राजन! वह सगे बड़े भाई है! भूल हो गई होगी उनसे। कृपया उन्हें क्षमा कर दीजियेगा महाराज…
यह कैसे हो सकता है मंत्री जी! इतना बड़ा अपराध और दंड न दिया जाये! इस जघन्य कर्म के कसूरवार होना चाहिए। परन्तु आपके कहने के कारण मैं आज्ञा करता हूँ कि उसका काला मुंह करके गधे पर बैठाकर देश से बाहर निकाल दिया जाये!
जो आज्ञा महाराज!
कमठ को देश निकाला दे दिया गया… लोगों ने गधे पर थूक कर काला मुंह कर के नगर के बाहर तक विदा किया…
वहां से अपमानित कमठ, भूताचल पर्वत पर पहुँच गया जहां अटोघारी, शरीर पर राख लगाये, चिमटा लिए, प्याले और ओवन जलाये एक तापसी बैठा था…
महात्मन! मुझे भी अपना चेला बना लीजिए!
वत्स! जैसी तुम्हारी इच्छा!
कमठ तापसी के आश्रम में रहने लगा। एक दिन वह दोनों हाथी पर एक शिला उठाये तपस्या कर रहा था।
भैया! मुझे क्षमा कर दो। मैंने राजा को बहुत समझाया, परन्तु वह माने ही नहीं। मैं तुम्हें देखने को बहुत अधीन था। बहुत देखा। अब मिले हो। मुझे क्षमा करो। भैया क्षमा करो…
तुम्हे क्षमा कर दूँ? दुष्ट ‘कमठ’, तेरे ही कारण तो मुझे घर अपमान सहना पड़ा! अब तू कहाँ जायेगा मुझसे बच कर…
और कमठ ने वह शिला अपने छोटे भाई के मस्तक पर पटक दी। खून की धारा बहने लगी और मरुभूति वहीं मर गया…
मरुभूति मर कर सहस्रकी नाम के बन में, उसीधज नाम का हाथी हुआ और कमठ तापसी मर कर उसी बन में सर्प बना …
अहा! हा! कितना सुन्दर महल है यह? क्यों न मैं भी इसी प्रकार का महल बनवाऊँ। चक्रुराज नगर बना दूँ
राजा अरविन्द भोग लगाकर आये परन्तु … बादल महल गायब था …
हैं! यह क्या? वह महल कहां चला गया? वह तो अब है ही नहीं! कितना क्षण भंगुर है यह दृश्य? क्या ऐसी ही दशा हमारी होगी? मैं लडूंगा, मेरा यौवन, मेरे ये भोग विलास? क्या रखा है इनमें?
“यौवन, सुख, मोहन, नारी, धन धान्य धन आज्ञाकारी।
इन्द्रिय संग दिनकाई, सुरधनु चपला चपलाई।।”
और वह राजा अरविन्द मुनि बन गए। एक दिन विहार करते हुए, पहुँच गये उसी सहस्रकी बन में। ध्यान में बैठे थे। वज्र घोष हाथी उपद्रव मचा रहा था। मुनि को देख देख कर …
हैं कौन? ये कोई परिचित से मालूम होते हैं! वह आया। इसके अब मैं इन पर इतनी भयंकर सी तो था कितने शांत हैं ये और मैं कितना क्रोधी… चलो इनसे क्षमा मैं मांगू।
हे श्रवण! तेरा कल्याण हो! तू धर्म को स्वीकार कर। हिंसा से रहित किसी जीव को मत मार। किसी को तकलीफ न दे। हाथिनी में सुख रह। सबका भला चाह। तेरा कल्याण होगा।
हाथी ने धर्म अंगीकार किया। उसने घास फूस एवं खाने लगा। किसी जीव को उसने कष्ट नहीं ऐसी क्रिया वो रहने लगा। हाथिनी से दूर रहने लगा।
एक दिन बड़ी प्यास लगी और चल दिया वेगवती नदी की ओर…
हाथी हे! यह क्या? आया तो था यहाँ पानी पीने, परन्तु फँस गया हूँ कीचड़ में। इससे निकलना नामुमकिन है। मृत्यु निश्चित है। ऐसे में मुझे चाहिए कि मैं शांत परिणामों से मरूँ, खाना पीना छोड़ दूँ। और…
हाथी बैठ गया शांतचित्त होकर मानो समाधिमरण में बैठा हो - इतने में कमठ के जीव सर्प ने उसे डँस मारा और वह मर गया…
हाथी मरकर बारहवें स्वर्ग में ब्रह्मप्रभ देव हुआ… देव हे! यह क्या? मैं यहाँ कहाँ?
ओह! ध्यान आया- मैं पहले भव में हाथी था - धर्म धारण किया, संयम से रहा, भरते समय सन्थारा लिया, उसी का यह सब फल है। मुझे अब भी भगवान् जिनेन्द्र देव की वाणी पर अति श्रद्धा है। लोकरंजन चाहूँ।
इस प्रकार पूरा जीवन १६ सागर की आयु-एक बहुत लम्बा समय धर्म ध्यान में ही बिताया। उस ब्रह्मप्रभदेव को पर बुद्धि सूझ हुई कि १६वें स्वर्ग तक जहाँ किसी भी देव ने मनुष्य भर जाता और खास भी लेना पड़ता तो १६ पल्योपम के बाद वहाँ की आयु पूरी कर के पूर्व विदेह क्षेत्र में विमलकीर्ति युगल की विमला रानी के अभिनंदन नामक पुत्र हुआ।
बड़ा होने पर अभिनंदन ने मुनि दीक्षा ले ली। एक दिन वह मुनि गुफा में ध्यान मग्न बैठे थे। वहाँ पर एक अजगर आया। यह अजगर वही कमठ का जीव था जो सल्लेखना में सर्प से हुआ था। सर्प मर कर कोटि परिणामी व बहुले के भावों के कारण पाँचवे नरक में गया था। वहाँ से मर कर ही यह अजगर हुआ था। मुनि को ध्यान मग्न देख कर किन्तु अजगर को पूर्व वैर याद हुआ। और मुनि महाराज को डँस मार कर उनका काम तमाम कर दिया।
मर कर मुनि महाराज सोलहवें स्वर्ग के देव हुए…
सोलहवें स्वर्ग की आयु पूरी करके चम्पापुर नगर के राजा जिनेन्द्रराज की पटरानी प्रिया के अभिनंदन पुत्र हुए… अभिनंदन में प्रकृति से बने। अष्ट सम्पत्ति, १४ रत्न व निधि ९ करोड़ घोड़े ९० लाख रथ १६ हजार हाथी ७२ खण्ड का अधिपति-सब कुछ था उसके पास। तो भी धार्मिक क्रियाओं में ही लगा रहता था। वीतराग फल भोगते, ज्योकि राग जग माँही।
त्यो चक्की घूम सुख करे, धर्म बिसारे नाही।।
एक दिन… अभिनंदन हे कृपासिंधु! मैं इस कर्मबंधन से छूट ना चाहता हूँ। कृपया मुझे धर्म का उपदेश देकर कृतार्थ कीजियेगा।
मुनि हे भव्य! तुमने भला विचारा। धर्म ही शरण है। धर्म ही हित है। संसार असार है। शरीर अशुचि है। भोग क्षण भंगुर है। संसार में सुख है ही नहीं। सुख तो निराकुलता मोक्ष में हो। और मोक्ष प्राप्ति बिना सुख संभव हो ही नहीं सकती।
अभिनंदन तो हे महात्मन्, मुझे वही सुन दीक्षा दे दीजिये जो जिससे मैं आत्मज्ञान से छूटने का उपाय कर सकूँ।
मुनि वत्स! तेरा कल्याण हो।
कथा
वनजंगलि मुनि सब कुछ छोड़ दिया। जंगल में घोर तपस्याएँ कर रहे थे कि एक भील ने उन्हें देखा भील और कोई नहीं था। वही कर्मठ का जीव था जो अजगर के शरीर को छोड़ कर 24 साल का छोटे नरक में रहा और वहाँ से निकल कर अब भील हुआ। मुनि को देख कर…
भील हूँ! यह कौन है? यह तो वही मेरा पुराना कई जन्मों से चला आया शत्रु है। अब मेरे से बचकर कहाँ जायेगा। आज मैं इसको…
मुनि सरकार मध्यम क्षेत्रक में अहमिन्द्र हुए और भील सातवें नरक गया। यही तो है अच्छे बुरे भावों का फल?
कथा
वह अहमिन्द्र आयु पूर्ण करके अयोध्या के राजा वज्रबाहु की रानी प्रभावती के ओजस्वी कुमार नाम का पुत्र हुआ। जवान हुआ, विवाह हुआ पिता ने राज्याभिषेक किया। एक दिन राजसभा में आनन्दकुमार राजा बैठे थे कि …
राजा महाराज की जय हो! महाराज! आज कल अष्टान्हिका पर्व चल रहा है। आप भी जिनेंद्र भगवान् का पूजन रचकर पुण्य लाभ उठाईयेगा।
मंत्री जी, आपमें अच्छी याद दिलाई। चलो जिन मंदिर में पूजन करने चलें।
राजा एक दिन … है यह क्या? सफेद बाल, मुँह का मिठास। अभी बुढ़ापा तो दूर है, मृत्यु, मृत्यु भी बहुत जल्दी आ ही जायेगी। क्यों ही अच्छा हो भर भर गृहस्थी के झंझट से दूर कर मुनिसंघ ले कर कल्याण मार्ग में लग जाऊँ।
कथा
दास राजा आनन्द दिगम्बर मुनि बन गये। उसम ज्ञानार्णव 10 धर्मों का पालन करने लगे। अष्टान्हिका 16 भावनाओं का चिंतन दिगम्बर 22 परिषह और 26 उपवासों का। जिनके भाव से तो लोकिक प्रकृति का बंध किया …
कथा
एक दिन आनन्द मुनि घोर तपस्या कर रहे थे कि एक शेर उन पर झपटा। यह शेर उसी कर्मठ का जीव था जो शेर भाव के कारण सातवें नरक से निकल कर इसी वन में शेर हुआ। मुनि को देख कर …
शेर अरे यह तो मेरा कई जन्मों का शत्रु है। अब कहाँ जायेगा मेरे से बच कर। मारूँ, कपड़ा और कर दूँ इसका काम तमाम।
कथा
मुनि उपसर्ग होने पर भी भीत से प्राण छोड़े। मुनि आनन्द और शुभ परिणामों के कारण पहले जन्म में अनंत नाम के स्वर्ग में वहाँ पर जब उनकी आयु छब्बीस क्षेत्रक रह गई तब वहाँ लोचर्म इंद्र ने कुबेर को बुलाकर मंत्रणा की व आगे की व्यवस्था के लिए आदेश दिया …
इंद्र देखो कुबेर! आनन्त स्वर्ग के इन्द्र की आयु के केवल छः महीने की बाकी रह गई है। वह वाराणसी में 23 वें तीर्थंकर होने वाले हैं। तुम वहाँ चले जाओ और नगरी की कुछ सज्जाओं और 23 महीने तक प्रतिदन रहने की चर्चा करो।
कुबेर जो आज्ञा महाराज।
कुबेर द्वारा वाराणसी नगरी की स्थिति
कुबेर द्वारा वाराणसी नगरी की स्थिति भी, प्रत्येक श्रेणी की शोभा होती रही। ६ महीने बीतने पर एक दिन रात्रि के पिछले पहर में राजा अश्वसेन को रानी वामादेवी ने १६ स्वप्न देखे … प्रातः होने पर रानी ने राजा से स्वप्नों की बात बताई और पूछा।
रानी प्रभुनाथ! आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मैंने रात्रि में १६ स्वप्न देखे हैं! कृपया आप बतलाईये इनका क्या फल होगा?
राजा प्रिये, तुम धन्य हो! इन सोलह स्वप्नों का फल यह है कि तुम्हारे गर्भ में २३वें तीर्थंकर पधारे हैं!
और उधर स्वर्ग लोक में …
इन्द्र है! आज हमारे आसन क्यों डोल रहे हैं! ओ हा!
देव आज वाराणसी के राजा अश्वसेन के गर्भ में २३वें तीर्थंकर भगवान् पार्श्वनाथ आये हैं। चलो, सभी वाराणसी को चलें।
इन्द्र चलो भगवान् का गर्भ कल्याणक उत्सव बड़े उत्साह के साथ मनायें।
स्वर्ग के देवगण
स्वर्ग के देवगण अपने अपने वाहन पर वाराणसी की ओर तीर्थंकर माता-पिता की सेवा करने हेतु चले। वहाँ पहुँच कर …
देव आपकी जय हो। आप धन्य हैं। आप के यहां २३वें तीर्थंकर माताजी के गर्भ में आये हैं। आप बड़े पुण्यशाली हैं।
राजा हम माता जी की सेवा के लिए देवियों को छोड़ कर जाते हैं।
इससे ९ महीने बाद पोष बदी ११ को पहले स्वप्न में …
राजा है। आज मेरा यह इन्द्रासन क्यों कांप रहा है। ओह! ओह! मैं वाराणसी में भगवान् पार्श्वनाथ का जन्म हुआ है।
इन्द्र अपने आसन से उठ कर ९ पग आगे चल कर सौधर्म इन्द्र ने भगवान् को परोक्ष नमस्कार किया और फिर … (अहो प्रभु! आज वाराणसी में २३वें तीर्थंकर भगवान् पार्श्वनाथ का जन्म हुआ है। चलो प्रभु भगवान् का जन्म कल्याणक मनायें।
स्वर्ग से चल दिये सभी देवता लोग
स्वर्ग से चल दिये सभी देवता लोग भगवान् का जन्म कल्याणक मनाने। आगे आगे सौधर्म इन्द्र अपनी इन्द्राणी सहित ऐरावत हाथी पर, पीछे अन्य देवता गण अपने अपने वाहनों पर सभी नाचते, गाते, जय जयकार करते आकाश मार्ग से वाराणसी पहुंचे। नगर की परिक्रमा की और …
राजा अश्वसेन के महल में सौधर्म इंद्र की इंद्राणी प्रसूतिगृह में गई
इंद्राणी हा! हा! आज मैं निहाल हो गई। चलो, बालक को ले चलूँ, अपने पति को सौंप दूँ, और फिर चले पाण्डुक शिलापर बालक का जन्माभिषेक करने के लिए। परन्तु यदि बालक को ले जाती हूँ, माता को कष्ट होगा। अतः, इतनी देर के लिए माता को निद्रा में सुला दूँ और एक मायावी बालक को उनके निकट लिटाकर भगवान् बालक को उठा लूँ।
इंद्राणी बालक को लेकर सौधर्म इंद्र के पास
इंद्राणी इंद्राणी बालक को सौधर्म इंद्र को सौंपते हुए…
इंद्र प्राणनाथ! लो इन्हें लो! कितना सुन्दर बालक है? धन्य हुए हैं हम आज !
इंद्राणी बालक क्या है कमाल का रूप है इनका। मैं तो देख कर तृप्त ही नहीं हो पा रहा हूँ। शायद १००० नेत्र भी देख कर तृप्त हो सकूँ तो भी कम होगा। तो चलो १००० नेत्र बना ताकि नेत्रों के द्वारा इन्हें अपने हृदय में उतार सकूँ।
भगवान् बालक को लेकर सौधर्म इंद्र इंद्राणी हाथी पर बैठा। ईशान इंद्र ने छत्र चमरादि, शंखकुआदि नैमित्तिक सुधार ढो रहे हैं। सब देव देवियाँ गीत गाते, नृत्य करते पुष्प वृष्टि करते, उत्सव के रूप में पांडुक शिला की ओर जा रहे हैं …
पांडुक शिला पर बालक का विराजमान किया
पांडुक शिला पर बालक को विराजमान किया। क्षीरोदधि तक रत्नों की पैड़ियाँ बना कर देव देवियाँ बनाकर खड़े हो गये। वहाँ से हाथों हाथ जल ला रहे हैं और सौधर्म इंद्र आदि १००८ कलशों से भगवान् बालक का अभिषेक कर रहे हैं।
फिर सौधर्म की शक्राणी ने बालक को स्नान दे, शोभा वस्त्राभूषण पहनाये। तिलक किया।
जुलूस चल दिया वाराणसी को …
इन्द्राणी प्रसूतिगृह में गई बालक को माता बामा देवी के पास लिटाया…
अब माता जाग गई…
माता अहा! मैं आज कितनी धन्य हूँ! कितना सुन्दर बालक है! क्या अद्भुत रूप है? क्या मनोहर छवि है?
सौधर्म इन्द्र भगवान् के माता पिता के पास पहुंच गये …
सौधर्म इन्द्र आप धन्य हैं! आपके तीर्थंकर पुत्र ने जन्म लिया है। कृपया हमारा प्रणाम स्वीकार करें। और ये तुच्छ भेंट भी
राजा अश्वसेन ने भी बालक तीर्थंकर का जन्मोत्सव मनाया।
अब तो बालक प्रभु बाल क्रीड़ा करने लगे। देवता लोग भी बालक का रूप बनाकर उनके साथ खेलते खाते, खुशियां मनाते, नाचते गाते थे।
माता जब पार्श्वनाथ १६ वर्ष के हुए तब एक दिन…
माता बेटा अब तुम जवान हो गये हो, अब तो यही उचित है कि तुम विवाह कर लो और गृहस्थों के सुख भोगो।
बेटा मैं कबसे स्वप्न संजो रही हूँ, कि घर में एक छोटी सी प्यारी सी बहू, आयेगी!
माता मानती हूँ, मेरी आयु केवल १०० वर्ष की है। ३० वर्ष की आयु में मुझे घर छोड़ देना है। फिर केवल १४ वर्ष को ही मैं गृहस्थी के जंजाल में क्यों फँसू। मैं तो इस बंधन में बिल्कुल भी बंधना नहीं चाहता। कृपया मुझे क्षमा कीजियेगा।
और उधर …! कमठ का जीव जिससे शेर की पर्याय में मुनि आनंद कुमार को अपने पंजों से मार डाला था, मुनि हत्या के पाप से पाँचवी नरक में गया- वहाँ पर १६ सागर की आयु पूरी की। वहाँ से मर कर ३ सागर तक और और उसने अनेक धारण कर के नारकी दुःख सहे। फिर किसी पुण्यदेव से महापाप-पुण्य से महापाप-पुण्य हुआ। महीपाल नामक दुष्ट कामी शिकारी ही, भगवान् पार्श्वनाथ की आत्मा को जब महीपाल राजा की पटरानी का देहान्त हो गया तो वह राजा महीपाल पृथ्वी हो कर तापसी बन गया और पंचानग्नि तप करने लगा। एक दिन वह पंचानग्नि तप कर रहा था कि राजकुमार उधर से निकला।
राजकुमार अरे! यह तुम क्या कर रहे हो? जिस लकड़कड़ी तुम जला रहे हो उसमें तो नाग नागनी का जोड़ा है।
तापसी अरे तुझे बड़ा पता है कि इसमें क्या है? तू कल का छोकरा तथा तू समझाई है मुझे मैं तेरा नाना और उपदेशी! पर तुझना उद्दण्ड कि मुझे नमस्कार तक भी नहीं किया!
राजकुमार हाथ कंगन को आरसी क्या? तुम इसमें फाड़ कर देखलो।
तापसी अच्छा! इसे अभी फाड़ता हूँ।
तापसी ने उसी क्षण कुल्हाड़ी से लककड़ को फाड़ डाला … उसमें से अध जले नाग नागिन निकले
नाग नागिन अंहें?
राजकुमार णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं
आयु पूर्ण होने पर यही तापसी मरकर संवर नाम का ज्योतिषि देव हुआ
णमोकार मंत्र को सुन कर नाग नागिनों के परिणामो में सुधार हुआ और मर कर वे देव लोक में धरणेन्द्र व पद्मावती बने।
जब राजकुमार पार्श्वनाथ ३० वर्ष के हुए, एक दिन अयोध्या के राजा जयसेन का दूत पार्श्वनाथ को भेंट देने के लिए आया …
दूत आपकी जय हो! अयोध्या के राजा जयसेन आपके चरणों में यह भेंट भिज्वाई है, कृपया स्वीकार कीजियेगा।
राजकुमार यह अयोध्या कौन सी नगरी है? बताइये तो सही!
दूत महाराज, यह अयोध्या वह नगरी है जहाँ पर देवाधिदेव प्रथम तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव ने जन्म लिया था।
राजकुमार है! भगवान् ऋषभदेव की जन्म भूमि! भगवान् ऋषभदेव ने तो कर्मों का नाश करके मोक्ष को प्राप्त कर लिया था … और मैं अभी भी संसार में फँसा हुआ हूँ! मुझे भी घर बार छोड़ कर अपना कल्याण कर लेना चाहिए। देर नहीं करनी चाहिए अब मुझे अब, अब मुनि बनने …
राजकुमार पार्श्वनाथ … वैराग्य की भावना का चिन्तन कर कल्याण मार्ग पर अग्रसर हो गये …
संवाद
तभी पादपे स्वर्ग से लोकान्तिक देव आ पहुँचे वे भगवान् के तप कल्याणक में ही आए हैं। प्रायः ब्रह्मचारी होते हैं और अगले भव में मोक्ष को प्राप्त करते हैं
देवता वह सुन! आपने भला विचारा महाराजा! आपको यही योग्य है। आप धन्य हैं।
देवता देवताओं ठहरो, पालकी हम उठायेंगे! आपको क्या हक है पालकी उठाने का?
राजा ये तो पालकी उठाई उससे पार्श्वनाथ को बैठाया और पालकी उठाने लगे कि…
राजा हम पालकी के उठाने के हकदार क्यों नहीं मैं भाई? भगवान् के गर्भ कल्याणक में हम आये, जन्मोत्सव हमने मनाया, फिर पालकी हम क्यों न उठायें
संवाद
राजा नहीं! पालकी हम उठायेंगे! हम मनुष्य हैं और हम भी मनुष्य फिर ये हक हमारा ही है।
देवता नहीं! दूर हट जाओ। पालकी हम उठायेंगे! हम तुम से बहुत शक्तिशाली हैं अतः हमारा हक है।
राजा हम ठीक शक्तिशाली तो नहीं पर निष्ठा ही सुन, जो यह बनने जा रहे हैं।
देवता सेवा युद्ध हम विवश हैं! हम मुनि व्रत धारण नहीं कर सकते लेकिन हम करने की शक्ति तो तुम में ही है हम तुम से भीख मांगते हैं हम को कुछ क्षण के लिए मनुष्य भव दो हम बदले में हमारा सारा वैभव ले लो।
कथा
निर्णय के अनुसार पालकी पहले भूमिगोचरी राजाओं ने उठाई, कुछ दूर चल कर विद्याधरों ने, और कुछ दूर चलकर के बाद नम्बर आया देवों का।
कथा
पालकी को लेकर देव पहुँच गये वन में। वहाँ पर वट वृक्ष के नीचे बैठ गये राजकुमार पार्श्वनाथ! वस्त्राभूषण उतार कर फेंक दिये, केशों को हाथ से उखाड़ डाला और बन गये दिगम्बर मुनि…
कथा
एक दिन मुनि पार्श्वनाथ आहार के लिए उठे - गहन गये राजा ब्रह्मदत्त के यहां निर्विघ्न जोहार हुआ। पंचाश्चर्य हुए उसी समय देवताओं ने पुष्प वृष्टि की।
कुछ समय बाद एक दिन मुनि पार्श्वनाथ ध्यानस्थ बैठे थे। अहिछत्र में, ऊपर से जा रहा कामठ का जीव संवर नाम का देव अपने विमान में। विमान मुनि के ऊपर आया और अटक गया। रुक गया।
संवर हे! मेरा विमान क्यों रुक गया? अरे नीचे वही मुनि बैठा है जो पहले भव में मेरा शत्रु था! इसने मेरा बड़ा अपमान किया था! अब लूंगा इससे बदला दिल खोलकर। देखूं कहाँ जाता है मुझ से बच कर! आज तो सारी कसर निकाल ही लूंगा।
संवर देव ने मुनि पार्श्वनाथ पर उपसर्ग शुरू किया… भीषण वर्षा… तूफान… अग्निवर्षा, पत्थर गारे फेंटू, मुनि ध्यानमग्न बैठे रहे।
नाग नागिनी के जीव जो धरना प्रजापति बन गये थे, अचानक उनका आसन हिलने लगा…
धरना है! यह क्या? आसन क्यों डोल रहा है? आज हमारे उन पूज्य गुरु पर कोई उपसर्ग हो रहा है, जिन्होंने हमारे प्राण बचाये थे। और हमें ग्रामोदक मंत्र सुनाया था। जिसके प्रताप से हम यहां उत्पन्न हुए हैं। चलो हमें उनका उपसर्ग फौरन दूर करना चाहिए।
और दोनों आये ओम्न के। इन्द्रध्वज ने फन फैला कर मुनि पार्श्वनाथ को ऊपर अपने फन से इस लगा लिया बीच में मुनि पार्श्वनाथ ध्यानस्थ बैठे।
मुनि पार्श्वनाथ ध्यान में दृढ़ रहे। घरना स्वामी फन फैलाकर उनकी रक्षा करने लगे।
और संवरदेव भाग गया।
इन्द्र अपने देवता लोगों के साथ चल दिये भगवान् पार्श्वनाथ का कल्याण करने के लिए। और इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने समवसरण बना डाला - समवसरण यानि सम + अव + सरण यानि सभी जीवों (२ कोड़ी से अनंत) बिना द्वेष, भय, विरोध, आदि यहां जीवों में वैर विरोध नहीं, भगवान् के शुभ भाव और से, रात दिन का भेद नहीं।
भगवान् पार्श्वनाथ समवसरण में अपनी दिव्य ध्वनि दे रहे हैं। सब बैठे अपनी अपनी भाषा में समझ रहे हैं। कोई परवाह नहीं देवता को कि कोई संवर देव।
अहा! कितना सुन्दर उपदेश है! मैं कितने जन्मों से इनसे वैर कर कर के पापबंध करता रहा नाना प्रकार के दुःख सहता रहा। और अब भी बिल्कुल शांत बने रहे। परिणाम स्वरूप ये मुझ भगवान को हुए विराजमान हैं! क्या मैं भी ऐसा बन सकता हूँ? क्यों नहीं बन सकता हूँ! क्या विशाल क्षमा, दया, शांति, प्रेम क्या स्वरूप है? इसकी सच्ची श्रद्धा करूंगा। इसका जैसा मान करूंगा और इसी को प्राप्त करने में लग जाऊंगा। इस भव में न सही अगले भव में मुनि बन कर मैं अपना कल्याण अवश्य कर लूंगा।
भगवान् पार्श्वनाथ का विहार होने लगा। जहां जहां भगवान् समवसरण लगता। सभी में सब मनुष्य पक्षी का। आगे आगे देवता लोग भूमि साफ करते हुए, में पोषक छिड़कते हुए, पुष्प वृष्टि करते हुए चल रहे थे। आकाश में देवता लोग जय जयकार करते थे। देवता लोग जो रहे हैं नाच रहे हैं। बजा रहे हैं दिव्य वाद्य
पाठ
इस प्रकार विहार करते हुए अन्त में पहुंच गये सम्मेद शिखर पर। बैठ गये ध्यानमग्न। शेष बचे चार अघातिया कर्म (आयु, नाम, गोत्र, वेदनीय) भी भाग गये। चार घातिया कर्म (ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी मोहनीय, अन्तराय) पहले ही नष्ट हो गये थे। तभी तो उन्हें केवल ज्ञान हुआ था।
आगे क्या हुआ। शरीर, तो कपूर की तरह उड़ गया हाँ बचे रह गये केश और नाखून। अग्निकुमार देवों ने अपने मुकुट से अग्नि जलाई और भगवान् के नाखून और केशों को जला डाला उससे बनी भस्म को सब देवों ने अपने मस्तक पर लगाया।
और भगवान् आत्मा, उसे मिल गई मुक्ति, सब झंझटों से, सब कर्मों से, द्रव्य कर्म, भाव कर्म व नो कर्म से। अब वह हो गये पूर्ण निर्विकार, पूर्ण शुद्ध, पूर्ण ज्ञानी व पूर्ण सुखी। जा पहुंचे मोक्ष में, जहां से कभी नहीं लौटेंगे संसार में, कभी नहीं लेंगे अवतार, कभी नहीं होंगे अशुद्ध। और इधर इन्द्रादिक आ पहुंचे भगवान् का निर्वाण कल्याणक मनाने।
आओ हम भी भगवान् बनें।
मूल दस्तावेज़ (PDF): 179.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है