कहिवे को मन सूरमा | Kahive ko man soorma

कहिवे को मन सूरमा, करवे को काचा |
विषय छुड़ावै और पै, आपन अति माचा || टेक ||

मिश्री-मिश्री के कहैं, मुंह होय न मीठा |
नीम कहैं मुख कटु हुआ, कहुं सुना न दीठा || १ ||

कहनेवाला बहुत हैं, करने को कोई |
कथनी लोक रिझावनी, करनी हित होई || २ ||

कोटि जनम कथनी कथै, करनी बिनु दुःखिया |
कथनी बिनु करनी करै, ‘द्यानत’ सो सुखिया || ३ ||

Artist- पं. द्यानतराय जी

अर्थ

अरे मन ! तू कहने के लिए तो शूरवीर बनता है पर क्रिया करने के लिए अत्यन्त कमजोर है। अर्थात् मन की उड़ान की कोई थाह नहीं, पर क्रिया करने में अत्यन्त असमर्थ है। अन्य लोगों को तो इन्द्रिय-विषय छोड़ने का उपदेश देता है, परन्तु तू स्वयं उनमें रच-पच रहा है, बहुत रत हो रहा है।

मिश्री-मिश्री कहनेभर से मुँह मीठा नहीं होता और न नीम-नीम कहने से मुँह कडुवा होता है। ऐसा होते हुए न कहीं सुना और न ही कहीं देखा।

कहनेवाले तो बहुत है, परन्तु करने के लिए कोई विरले ही होते हैं। कहना मात्र तो लोक को रिझाने के लिए होता है, जबकि हित तो उसके करने से होता है।

करोड़ों जन्म तक कहता तो रहा, अर्थात् कहते-कहते करोड़ों जन्म बीत गये पर किया कुछ नहीं, इसलिए दुःखी हुआ। द्यानतराय कहते हैं कि जो शक्ति मात्र कहने में अर्थात् बातें करने में व्यय की जाती है उस शक्ति को जो कोई क्रिया करने में व्यय करता है वह ही सुख पाता है अर्थात् जो कहता नहीं है बल्कि करने में अपनी शक्ति का उपयोग करता है वही लाभ पाता है।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 94।

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