काय क्लेश तप । Kaay Klesh Tap

काय क्लेश तप का कैसा स्वरूप है?

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धर्म के दश लक्षण - (आ. छोटे दादा)
आत्मसाधना एवं आत्माराधना में होने वाले शारीरिक कष्टों की परवाह नहीं करना कायक्लेश तप है। इनमें ध्यान रखने की बात यह है कि काय को क्लेश देना तप नहीं है, वरन् कायक्लेश के कारण आत्माराधना में शिथिल नहीं होना मुख्य बात है।

कायक्‍लेश तप का लक्षण
मू.आ./मू./३५६
ठाणसयणासणेहिं य विविहेहिं पउग्‍गयेहिं बहुगेहिं।
अणुविचिपरिताओ कायकिलेसो हवदि एसो।
खड़ा रहना, एक पार्श्‍व मृत की तरह सोना, वीरासनादि से बैठना इत्‍यादि अनेक तरह के कारणों से शास्‍त्र के अनुसार आतापन आदि योगोंकरि शरीर को क्‍लेश देना वह कायक्‍लेश तप है।

स.सि./९/१९/४३८/११
आतपस्‍थानं वृक्षमूलनिवासो निरावरणशयनं बहुविधप्रतिमास्‍थानमित्‍येवमादि: कायक्‍लेश:।
आतापनयोग, वृक्षमूल में निवास, निरावरण शयन और नानाप्रकार के प्रतिमास्‍थान इत्‍यादि करना कायक्‍लेश है। (रा.वा./९/१९/१३/६१९/१५), (ध.१३/५/४,२६/५८/४), (चा.सा./१३६/२), (त.सा.७/१३)

का.अ./मू./४५०
दुस्‍सह-उवसग्‍गजई आतावण-सीय-वाय-खिण्‍णो वि।
जो णवि खेदं गच्‍छदि कायकिलेसो तवो तस्‍स।
दु:सह उपसर्ग को जीतने वाला जो मुनि आतापन, शीत, वात वगैरह से पी‍ड़ित होने पर भी खेद को प्राप्त नहीं होता, उस मुनि के कायक्‍लेश नाम का तप होता है।

वसु.श्रा./३५१
आयंबिल णिव्वियडी एयट्ठाणं छट्ठमाइखवणेहिं।
जं कीरइ तणुतावं कायकिलेसो मुणेयव्‍वो।३५१।
आचाम्‍ल, निर्विकृति, एकस्‍थान, चतुर्भक्त, (उपवास), षष्ठ भक्त (बेला), अष्टम भक्त
तेला), आदि के द्वारा जो शरीर को कृश किया जाता है उसे कायक्‍लेश जानना चाहिए।

भ.आ./वि./६/३२/१८
कायसुखाभिलाषत्‍यजनं कायक्‍लेश:।
शरीर को सुख मिले ऐसी भावना को त्‍यागना कायक्‍लेश है।

कायक्‍लेश व परिषह में अन्‍तर
स.सि./९/१९/४३९/१
परिषहस्‍यास्‍य च को विशेष:। यदृच्‍छयोपनिपतित: परिषह: स्‍वयंकृत: कायक्‍लेश:। = प्रश्‍न –परिषह और काय क्‍लेश में क्‍या अन्‍तर है?
उत्तर —अपने आप प्राप्त हुआ परिषह और स्‍वयं किया गया कायक्‍लेश है। यही दोनों में अन्‍तर है।

for more details one can visit -
http://jainkosh.org/wiki/कायक्‍लेश

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