जिनशासन द्रव्य श्रुत और भाव श्रुत रूप है — जिनवाणी का मुख्य केंद्र बिन्दु अपनी आत्मा है, और द्वादशांग का सार भी एक आत्मा ही है। इस संक्षिप्त स्वाध्याय सामग्री में आत्मा के पाँच विशेषण (अबद्ध-अस्पृष्ट, अनन्य, नियत, अविशेष, असंयुक्त) दिये गये हैं।
A short Jain self-study (swadhyay) note on what it means to “see” the Jinshasan — dravya-shrut and bhav-shrut, and the five attributes of the soul as described in the Samayasar tradition.
जिनशासन द्रव्य श्रुत और भाव श्रुत रूप है ।
द्रव्य श्रुत अर्थात जिनवाणी ।
भाव श्रुत अर्थात जिनवाणी के प्रतिपाद्य को जानने वाली श्रुत ज्ञान की पर्याय ।
जिनशासन कैसा है ?
- जिसने जिनवाणी के मुख्य केंद्र बिन्दु अपनी
आत्मा को देखा उसने जिनशासन देख लिया । - द्वादशांग का सार तो एक आत्मा ही है ।
आत्मा के पाँच विशेषण
अबद्ध अस्पृष्ट
अनन्य
नियत
अविशेष
असंयुक्त
मूल प्रस्तुति (PDF)
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