जिनकाव्य
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जिनकाव्य
- आदिनाथ से बात
- जिनवाणी माता तुम्हें
- हे अगम्य अनाद्यंत अनंते
- जिनवाणी माता ने
- श्री पार्श्वनाथ जिन
- हम पाप हैं
- कौन दिशा में जेमी
- आई हे अब जिन खोज
- कुंदकुंद आचार्य
- परिणति हो मिटने सी
- सिद्धों का वो निलय
- सद्गुरु सीख
- अतुलयोग
- हीरा
- वीतराग प्रभु
- पगले ज्ञानोदय
- मुनिराज
- जन्म कल्याणक
- सम्यकत्व की महिमा
- गर्भ कल्याणक
- अहो अद्भुत है
- नवधा भक्ति
- प्रभु भक्ति धारा
- गुरुदेव श्री को समर्पित
- गुरु कहा न जे
- सभी उदार
- तुम न बोले कुछ
- दिगम्बर वीर ये चाले
- आई है अब जिन
- श्रीनाथ की वाणी
- अनंतज्ञान पूर्णिया हुआ
- धर्मी है जिनगुण अधिक
- श्री मुनिराज ये वन में सोहे
- बड़े हम मोक्ष महल की ओर
. हे पिता
. माँ तुम हां कह देना
. भूखा
. दिगम्बर वीर ये चाले
. वेश देख पहचान न पाया
. मरूवाह के तप सघन में
बाल काव्य
- सिद्ध प्रभु
- मंदिर आ जाओ
- आईसक्रीम
- Take a selfie
- पाप
- जीव भेद
- आगम भेदा
- रत्नत्रय
- Puzzle की पहेलीक
- सात तत्व
- त्याग की महिमा
- शिविर में आओ
- दादा दादी
- We equal to computer
- ओ पापा की परियों
श्री श्रुतदेव स्तवन
1. आदिनाथ से बात
बन गए तुम भगवान क्या तुमने ऐसा किया कमाल ॥टेका॥
साथ साथ में लोग बहुत थे, सर्व कला में योग्य बहुत थे।
असी मसी कृषि में सबसे आगे, युद्ध क्षेत्र में बहुत कुशल थे ॥
पर वह मेरे साथ… क्या तुमने.. ॥1॥
संग सहस्रों और बड़े थे, नग्न दशा घर गमन करे थे।
तुमने सब तज को क्या पाया, बाकी सब जो खोज रहे थे।
लौटे घर के द्वार… क्या तुमने…॥2॥
महीनों ध्यान किया न पाया, अनायास फिर केवल पाया।
थी क्या नहीं आत्म सम्मुखता, तब तक क्यों न शिवपद
पाया॥
होता क्रमणियमित नाथ… क्या तुमने…॥3॥
2. जिनवाणी माता तुम्हें जो जग न जान सका
जिनवाणी माता तुम्हें जो जग न जान सका ॥ टेका॥
करें प्रभु कृपा यदि तो बालक श्रेष्ठ मिले।
मन्नत पूरी तुम करो तुमसे ही जगत चले ॥
ये कल्पित भ्रमणा रही इनसे न उभर सका।।1।।
भौतिक युग में जो दिखे बस उसको स्वीकारा।
वैज्ञानिक की बात को बस सत्य स्वीकारा ॥
तुमने बतलाई आत्मा उसको न जान सका ॥2॥
दूर निकट अतिसूक्ष्म सब बातें तुम बतलाती।
अल्प बुद्धि बस प्राप्त कर कहता मैं हूं ज्ञानी ॥
तुम सर्वज्ञ की बात हो तुमको न स्वीकारा ॥3॥
‘नायक’ जग के जो प्रभु वे कर्ता न होते।
गुरुवर आत्म स्वरूप में ही स्थित होते ॥
शतपथ तुम दिखता रही ये सब न मान रहा ॥4॥
दुःखी रहा इस भव में पर भव बर्बाद किया।
मिथ्यापथ दिखता रहे लोगों का संग किया ॥
बड़े अनुग्रह से अरे माँ तुमने दिखलाया ॥5॥
बड़े भाग्य से मिल गया जिनशासन मेरी माँ।
व्रत भक्ति तप कर लिया जीवन सब निकल गया ॥
प्रभु को तो बहुत सुनाई, तुमको न सुन पाया ॥6॥
3. है अगम्य अनमोल अनंती सुखदाई जिनवाणी
है अगम्य अनमोल अनंती सुखदाई जिनवाणी॥ टेका॥
मातृ अनुग्रह तनुज भक्ति के प्रति तो बहुत दिखाती।
यावत तावत नेक विधि श्रुत पथ अपवर्ग दिलाती।
सीख स्वयं की शास्त्र बताए शिवसुख सहज प्रदायी ॥1॥
जग में जननी अभिज्ञान तब मोह भाव से होता।
तुम जग जननी वीतरागता से किंन्दर्शन होता ॥
मिथ्यामल हर सद्दृष्टि से जाना मैं निज आतम ॥2॥
भव कांतार विषे परितः ही आकुलता थी होती।
चित्स्वरूप से विमुख निरंतर प्रीत सू पर में जोड़ी ॥
जिनवाणी ने कहा तभी लख तूं जिनसुख का शासन ॥3॥
कतिपय अंश सुभाषाओं में था सर्वस्व तुलाया।
पर वैभव प्रति अहम् भाव से हाहाकार मचाया।।
निज वैभव दे दिया हे माता नायक निज शुद्धात्म ।।4।।
4. जिनवाणी माता ने शुद्धात्म प्रगट किया।
जिनवाणी माता ने शुद्धात्म प्रगट किया।
जग का दिग्दर्श करा, निज से ही मिला दिया ।।टेका।।
श्रीनाथ की दिव्यध्वनि, गणपति ने मंथन कर।
हम पर करुणा उमड़ी, यतिराज ग्रंथ रचकर ।।
जननी जग प्राप्त हुई, मुक्ति का पंथ दिया ।।1।।
जग में नाना प्राणी, सब चले सत्य के पंथ।
जिसको जैसे होवे, बस समझा आएं ये ग्रंथ ।।
इसलिए मुनिजन ने अनुयोग स्वरूप दिया ।।2।।
‘नायक’ गर देखें हम जिनवाणी में खुद को।
नारकी सिद्धों तक की यात्रा में शामिल हो ।।
तब हो सकते हैं हम सिद्धत्व का मार्ग दिया ।।3।।
5. श्री पार्श्वनाथ जिन
नाम बनारस नगरी में, जन्मे पारसनाथ।
धनि धनि वामा मात है, अश्वसेन के लाल ।।
पारस नाथ जी सम्मेदवात् जाए, कि अब बारी हमरी ।। टेका।।
जन्म लियो श्री पारस स्वामि, जनम मरण मिटाने,
राज तजो और करी तपस्या, मुक्ति पुरी को पाने।
हम भी पावे मोक्ष का मार्ग, की अब वारी हमरी है ।।
श्रावण शुक्ला सप्तमी आई मुक्ति पुरी प्रभु जाए,
भव्य जीव के निमित्त कारण, शाश्वत सुख को पाने।
श्री जी को हम माथ नाय, की अब वारी हमरी है ।।
हम मिल प्रभु को शीश नवावें, उनके ही गुण गाएं
प्रभु सम निज का रूप निहारें, उन सम ही बन जाएं।
आत्मा ही है परमात्मा, की अब बारी हमरी है ।।
6. हम पाए हैं…
[mei jhopadi k bhagya]
मेरी मुक्ति के द्वार आज खुल आए हैं
हम पाए हैं…
हम पाए हैं पाए हैं आतम पाए हैं ।। टेका।।
हम पाए हैं जो आत्मा को ध्याये हैं,
निज ध्यान से करम झर जाएंगे।
शुद्धात्मा के ध्यान में रम जाएंगे ।।
हम पाए हैं…
जाने कब से ये निधियाँ गंवाई है,
निज की न निधि ये मैंने पाई है।
अब भोग में न लौट हम फिर आयेंगे ।।
हम पाए हैं…
व्यभिचारियों से परिणति टाली है।
जिनवर पितु पास में आई है।
निज पास में बुला के बस थम जाएंगे ॥
7. कौन दिशा में नेमी चले हैं राजुलिया –2
[Tarj.Aao re aao re gyanand ki]
कौन दिशा में नेमी चले हैं राजुलिया
रोके रे रोको, कोई पूछो रे पूछो
कहाँ मौन वते… मौन वते ॥ टेका॥
(राजुल नेमीकुमार का संवाद)
ओ नेमी तुम कह रहे थे, राजमति तेरी संगनी।
साथी नहीं कोई द्रव्य किसी का तू कैसे मेरी संगनी ॥
पिछले जनम के जो भव साथी –2
प्रीत न मोसे हटाओ रे…
मुक्ति का पथ काहे भावे न राजुलिया ॥1॥
फिर काहे थे ब्याह को राजी, काहे बाराती लाए थे
सम में थे तब अब हैं वैरागी कैसे तुझे समझाएँ ॥
समझाने की बात करो न –2
लौट के आओ गिरनार से…
अब हम चले हैं मोक्ष मार्ग की डगरिया ॥2॥
तीर्थंकर तुम चरम देह हो, मुक्ति पुरी को जाओगे।
मैं भी साथी बन के चलूँगी, दीक्षा अंगीकार के ॥
पंथ नहीं है राग का राजुल –2
पहले मोह नशाओ रे…
छूटे कैसे मोह कैसे धारु मैं वैरागीया ॥3॥
नेमीकुंवर अब बन गए जिनवर, अरहंत पद को पाय के।
मैं भी चली अब समवशरण में …
8. आई है अब निज शोध खोज की बारी
आई है अब निज शोध खोज की बारी ॥ टेक ॥
मैं कौन, कहाँ, क्यों, क्या कर्तव्य है मेरा?
कब कहाँ जाऊँ और क्या स्वरूप है मेरा?
इन प्रश्नों की करनी है खूब तैयारी ॥ 1॥
जो किया आज तक करते और करेंगे,
है किया किसे क्या इससे लाभ मिलेंगे?
सब की सुन पर क्या निज की अब तक मानी? ॥2॥
क्या मिला और क्या मिलता आया अब तक,
क्या चूक रहा जो खोता आया अब तक,
अब सुनूं वही जो बात रही अनजानी ॥३॥
जग घूम घूम कर घूमा थमा न तब तक,
गंतव्य मिला न मुझे हे स्वामी जब तक,
गंतव्य यहां है पर मैं व्यर्थ पिछानी ॥४॥
मैं स्वयं स्वयं का कर्ता कर्म करण हूं,
निज में थित, निज को, पर से पूर्ण रहित हूं,
निज को पा जाऊं कहे यही जिनवाणी ॥५॥
९. कुंदकुंद आचार्य
[baramasa]
पंचम युग में वरदान, मिले तीर्थंकर सम मुनिराज,
तत्व दर्शाया।
हे कुंदकुंद महाराज तुम्हे सिर नाया।
दक्षिण में जन्म सु पाया, तव कोण्कुंदपुर ग्राम।
ग्यारह वर्ष में ली दीक्षा, जिनचंद्र गुरु उपकार ॥
मां पिता मोह को त्याग, स्वयं निज चित्स्वरूप का
ध्यान, मुनिपद पाया ॥१॥ हे कुंदकुंद
युं हुए अनेकों मुनिवर, तप ऋद्धि युत जिन यतिवर।
की लोकलोक की चर्चा, कर्मों का रूप प्रगट कर ॥
पर समयसार आधार, जगत किया समय प्रकाश,
अतः प्रथम पद पाया ॥२॥ हे कुंदकुंद
सहदर्शन ज्ञान चरण में, थित जीव बताए स्वसमय।
जो कर्म पुद्गलों में रत, सो जीव बताए परसमय ॥
एकत्व सुनिश्चय आत्म, बताया सुंदर जग में नाथ,
बही में पाया ॥३॥ हे कुंदकुंद
सब बातें बहुत सुनी हैं, अनुभूति और रुचि है।
पर पृथक एक की प्राप्ति, इतनी भी सरल नहीं है॥
पर यही दिखाए आप, यदि न कर पाएं हम प्राप्त,
तो छल न पाना ॥४॥ हे कुंदकुंद
न प्रमत्त अप्रमत्त बताया, बस गायक भाव जनाया।
इस रीति प्राप्त जो होता, बस वही आत्म समझाया॥
हम ज्ञान चरित व्यवहार, सुनिश्चय एक मात्र परमार्थ, वही में
आपा ॥५॥ हे कुंदकुंद
10. परिणति हो सिद्धों सी…
(तर्ज..नगरी हो अयोध्या सी…)
परिणति हो सिद्धों सी, अरहन्त समागम हो।
समकित के पाने पर, अंतर उजियारा हो ॥ टेका॥
अब तक न जाना था, जग में ही भ्रमाया था।
विषयों में रत पच कर, सर्वस्व लुटाया था ॥१॥
पर अब तो जान गए, जिनराज के वचन सुनो।
जिनदेव के दर्शन से, निजरूप के नयन खुलो॥२॥
निर्ग्रन्थ के पथ चलें, आगम अनुशरण करें।
मोहादिक पर लक्ष्यी, भावों को सहज तजो॥३॥
‘नायक’ तुम जगती के, जग साक्षी द्रष्टा हो।
तुम सम मैं हो जाऊँ, कर्तृत्व न मन में हो ॥४॥
11. सिद्धों का वो निलय
सिद्धों का वो निलय, निज में ही मैंने पाया।
खोजा यहां वहां पर, सुख कहीं न पाया॥ टेका॥
जो सिद्ध बन गए है, उनको जो जन भजो।
कहते कि वे विराजित, सिद्धांलय में जा बसो।
पर वे तो निज में बैठे, निज को ही उनने ध्याया॥१॥
सिद्धों का जो सफर, सिद्धों से तय करे।
पर निज में ही निरंतर, सिद्धों सा अनुभवै।
वह पाते सिद्ध पद को, कर कर्म का सफाया॥२॥
ये भक्त को कभी भी, न दर्श दे सकें।
जो सिद्ध बनता स्वयं, वो दर्श पा सके।
भगवान बन सके हम, इनसे हैं हमने सीखा॥३॥
12. सद्गुरु सीख…
श्री सद्गुरु की सीख
सुन ले श्री सद्गुरु की सीख
भोगे भोग सुख मान रहा पर दुख की खींचे कीशा॥ टेका॥
काल अनंत गवाए जग में, मिली प्रतिष्ठा खीवा।
धन सुख प्रभुता मिली बहुत, अरु मिली ये जग की प्रीता॥
कुछ खोया कुछ मिला मिला क्या, जो निज सुख की रीता।
भव में सुख माने संग अटका, पुनः गिरा भव बीचा॥
अब आया अवसर मत चूको, देख निजातम खीरा।
गुण से भरी ये मुदुता मय है, अब ते इसको तीखा॥
जो भव से चित्त हटे तो लगता, हो अंतर में लीना
एक बार अंतर झांका तो, मिटे ये भव की पीड़ा॥
13.अनुयोग
जिनदेव मुख तें खिरे हैं, अनुयोग चारों कहें हैं
मोक्ष मग में लगाने का, प्रयोजन जो रखे हैं॥ टेका॥
द्रव्य छः नव तत्व का जो बोध हमको करे है
सात तत्वों को बता जो मोक्ष मग में धरे है॥
द्रव्यानुयोग कहे हैं —2
लोक तीनों कर्म की जो प्रकृतियों को कहे है।
गणित की बातों से हमको, मोक्ष मग में धरे है॥
करणानुयोग कहे हैं —2
महापुरुषों की कथा पुराण उनको कहे हैं
राग से वैराग्य तक जो मोक्ष मग में धरे है॥
प्रथमानुयोग कहे हैं —2
अनगारी सागारी जनों के आचरण को कहे है।
व्यवहार नय भी कथन कह जो मोक्ष मग में धरे है।
चरणानुयोग कहे हैं —2
14.हीरा
हीरा न बोले निज बोल…2
यदि तुहार से बोलन जाए, मार हटौरा ठोस॥टेका॥
फिरत फिरत जग जिन गतियाँ मैं, कीच माटी के कूरा
उत जाए अरु चाहे तिजोरी, ताज तहां कित होया॥
त्यों मैं आतम गुणन अनंता जड़ वाणी वरूं बोला
बोल बोल भूला निज गुण को, हीरा कूरा क्यों होता॥
शांत चित्त हीरा निज सुखिया, बैठा कोई छोरा
दूर देख जौहरी हरषावे, पहिचाने तेरो मोला॥
15.वीतरागी प्रभु तेरी अद्भुत छवि
वीतरागी प्रभु तेरी अद्भुत छवि,
नाशदृष्टि धरी तो धरी रह गई।
देखे दुनिया को क्या वो तो अंतर में है
तब्बी नव केवल की प्रकट हो गई॥ टेका॥
सारी निधियां तजी निज की दृष्टि धरी।
आत्म दृष्टि जो ध्यायी जमी रह गई॥
आत्मदृष्टि का फल घाती वारों नशो,
सारी पाप प्रकृतियां वो क्षय हो गई॥
इंद्र सारे वहां किन्ही खड़ा महा।
कोठी बारह बनाई वो स्वर्ण मई॥
उनमे बैठे पशु नारी नर देव है,
खिरती दिव्यावधि ओंकारमई॥
कैसा अद्भुत है प्रभु का ये समवशरण
सारी जग की सुविधा यही पे धरी॥
आए मानी भी तो देखे मानस्तंभ,
मानता वो टंडी की टंडी रह गई॥3॥
16. पधारो ज्ञानोदय
पधारो ज्ञानोदय हो ज्ञान उदय,
दुःख नाश हो कर्म नाश हो मोह कर्म हो क्षय॥
पंच बालयती चौबीसी शीतल प्रभु समवशरण।
पंच मेरु अरु पार्श्व प्रभु का मानस्तंभ अटल॥
यहां बैठ निज में थिर हो सम्यकता होवे दृण।
वीतराग की वाणी से मिटते हैं सारे भय॥
गुरु कहान ने तत्त्व बताया उसका ही यह फल।
गूंज रही है जिनवाणी ज्ञानोदय के हर कण॥
17 मुनिराज
ज्ञाता स्वयं को जिन्हों ने है जाना,
जग के विभव को सदा भिन्न माना।
निर्ग्रन्थपथ पर वो अविरल चले हैं, अविरल चले हैं, अविरल चले हैं॥टेक॥
सिद्धों के सागर की सरिता बने हैं,
चिदानंद चेतन में लीन हुए हैं।
मुक्ति के पथ पर आगे बढ़े हैं, आगे बढ़े हैं, आगे बढ़े हैं॥1॥
ज्ञान की धारा में थिर जो भए हैं,
एकत्व चिद्रूप ज्ञायक भजे हैं।
सौम्य सुमुद्रा मुनिवर धरे हैं, मुनिवर धरे हैं, मुनिवर धरे हैं॥2॥
विनाशीक संसार क्षणता हैं जानी,
नग्न दिगंबर मुनि दीक्षा धारी।
लौकांतिक अनुमोदन को खड़े हैं, मोदन खड़े हैं, मोदन खड़े हैं ॥3॥
18. जन्म कल्याणक
नाद शंख की होवे, घंट नाद जब होवे,
ढोल नगाड़े बाजे, भेरी धुन गूंजाए।
जन्मे तीन लोक के नाथ, जन्मे त्रिभुंजग तारणहारा॥
चार गति के जीव सुखी, इंद्रासन कंपित आज,
सात हाथ आगे जा सारे, देव करें नत भाला।
अतिशय पंच दिखे जगती को, लोग सभी खुशहाला॥1॥
शचि पधारी प्रभु को लाई, गर्भ नारी पर्याय,
पुनः पुनः देखे प्रभुजी को, सम्यक दर्शन पाए।
नेत्र हजार बनाके इंद्र, प्रभु का रूप निहारा॥2॥
पांडुक वन पर गए इंद्र ले, प्रभु अभिषेक कराने,
छीरोदधि तक इंद्र खड़े, कलशा हाथों में साजो।
जन्माभिषेक महोत्सव किन्हों, धन्य धन्य जयकार ॥३॥
19. सम्यक्त्व की महिमा
दर्शन की मैं महिमा गाऊं, जा ते होवे भव पार रे।
समदृष्टि जग में जग में रह, नित्य पराया जान रे॥
समदृष्टि शंका नहीं जिन पर,कांक्षा भव की त्याग रे।
आपहिं रूप निहार निरंतर, सब विधि दोष निकार के॥
मद मन त्याग विहाय कुपथ को, तत्व स्वरूप विचार रे॥१॥
इह भव पर भव पीड़ा मृत्यु, का भय मन से टार दे।
संवेगादिक प्रशमादिक से वह, निज को और निखारते॥
पंक रहित पंकज समदृष्टि, मुक्ति पुरी को पाए॥२॥
20. गर्भ कल्याणक
आनंद में उत्साह, माता अति हर्षाए।
होवे अचरज स्वप्न माहीं, अलौकिक शक्ति आए॥
गर्भ वास होवे तब देखा, माएं अति अकुलाती।
पर तुमरे यह गर्भ कौन जो, तुम इतनी हर्षाती॥
आएं देवियां सेव करें, माता का रूप निहारे।
माता चिंतवे अनुभूति में, आत्म स्वरूप निहारे॥
रत्न वृष्टि हो पूर्व मास छः, जन जयकार लगाएं।
तीनलोक मणि पूज्य जिनेश्वर मात गर्भ में आए॥
21. अहो अद्भुत है …
अहो अद्भुत है जिनका देश,
रत्नत्रय के बाग बगीचे, नग्न दिगम्बर वेश ॥टेका॥
बाघ गुफा जिनका है सुंदर, महल शांत परिवेश।
उस प्रासाद में निज रस भोगे, निज आतम से नेह ॥१॥
सुंदर सैया कंकड़ पत्थर की जिनकी है देहा।
धूल चढ़ी श्रृंगार चमकती, बज्र विराजी शैला॥२॥
जिनके देश दिखे पशु वानर, ऊपर चढ़ती बेला।
विषधार निलय बनाएं अपने, पर न करते द्वेष ॥३॥
विटपति तेरी शरणा में आते मोही नरेश।
वे वैरागी हो जाते हैं, धार दिगम्बर वेष॥५॥
22. नवधा भक्ति
तोरण द्वार सजे हैं हाथों, लिए कलश सुंदर कनक के।
जब मुनिवर का हो पड़गाहन, भाग्य खुलेंगे हम भक्तों के॥
वे अतिथि न कर सकते हैं, हम आमंत्रण उनका जाकर।
हो भूपति उनके परिजन भी, देखें बस वे आश लगा कर॥
कई सूरज ढलते जब उगते, एक दिवस श्री नग्न दिवाकर।
हो उत्साही जोर शोर से, करने लगते जन पड़गाहन॥
हो पड़गाहन यदि मिल जाए, जो मन ठानी योग्य विधि तो।
उच्चासन पर उन्हें बैठाएं, पादकमल का प्रक्षालन हो॥
पूजन श्री मुनि की करते हों, वंदन बारम्बार करे हम।
मन वच काया शुद्धि हो अरु, भोग नीर भी होवे प्रासुक॥
नवधा भक्ति हो फिर करते, मुदा छोड़ अंजुली धारण।
हो आहार विधि पूर्वक फिर, दे आहार हुआ मैं पावन॥
जो मुनिवर को दे आहार, न यश लालच अभिमान पूर्वका।
भोगभूमि में जन्म होय निज, भी सकता मुनिव्रत धारण॥
23. प्रभु भक्ति धारा में वहूँ …
चिंतन में नित रहें प्रभु, उनका यश हम गाएं।
गुणोद्यान से उनके कुछ हम सुमन सुरभि पाएं॥
भेदज्ञान अनुपम सौरभ हमने है पाया॥१॥
है अनंत वैभव के स्वामी, नर सुर यश गाते।
तीनलोक पति की भक्ति से बंधन कट जाते॥
जिनमुद्रा लख श्री जिनवर का दर्शन है पाया॥२॥
जिनकी वाणी से नित बहती शाश्वत सुख धारा।
उसका जो आस्वाद करे तो भव दुख नश जाता॥
मुनिराजों भी निज आतम का गीत सदा गाया॥३॥
24. गुरुदेव श्री को समर्पित
संत न देखा ऐसा संत न देखा _२
समयसार को देख स्वयं को समयसार देखा॥
निवृति का मार्ग भी चल कर मन मैं करे विश्वास
सत्य मार्ग तो अन्य कोई है जिससे हो भव पार
समयसार को भेंट किया फिर दामोदर देखा॥१॥
लोकविवाद की न कर चिंता लालच का कर त्याग,
पुण्य कर्म का होय उदय तो रोटी मिले हजार।
पापोदय से भी न डरकर संप्रदाय त्यागा॥२॥
हो एकाकी मिला सोनगढ़ श्रावक पथ स्वीकार
समयसार जग को बतलाया एक न उन्नीस बार
जिनप्रतिमा को देखा स्वयं ही बही अश्रु धारा।।
लिखे बिना ही शब्द को भी न कह अपनी बाता
मुलाचार्यों के ग्रंथो सीमंधर की बात।
पुण्य कर्म को हेय बताया, धर्म नहीं छोड़ा।।4।।
25. गुरु कहान ने गुरु…
गुरु कहान ने गुरु लघुता का भेद मिटाया।
एक समय में समवशरण था दिव्यध्वनि थी
कुंकुकुंद आदि गुरुओं मय ये पृथ्वी थी
ढोंगे उस पल पर अब तक मैं तिर न पाया।।1।।
जब पर शासन के विरुद्ध था सारा भारत।
समझा रहे थे मेरी है ये भूमि पावन।।
यह भी पर स्वामित्त, यही तुमने है बताया।।2।।
हम तकदीर के हो फकीर कुछ सुन न पाती।
सत झूठे परिवार जनों का पथ अपनाती।।
पर तुमने यह पंचवाद का कीट मिटाया।।3।।
गाड़ी जब भी चले फयूल को कर्ता माना।
है निमित्त ही कर्ता सब ने यह था जाना।।
पर निमित्त ही कर्ता यह जग को समझाया।।4।।
जिनवाणी को विस्मृत कर जन अपनी बाते कहते।
धर्म नाम पर पंचवाद का नित ही पोषण करते।।
तुमने अपनी न कह मूलाचार्य को ही सुनाया।।5।।
26. सच्ची उद्धार
सुनो तो स्वामी, अंतर्यामी, तीन लोक के स्वामी।।
मेरे हाथों में आए, मेरे हाथों में आशा टेका।।
न बस प्रभु आए, निज गुण भी पाए
आत्म प्रभु को पाया, ज्ञानानंद पाए।।
यह सुख पाया, अब क्या आशा, श्री जिनेंद्र की काया।।1।।
प्रथम गोढ़ में पा कर, अंतर्ध्यान लगाकर।
यह सौभाग्य मिला है, हे तिहुंजन करुणाकर।।
हे करुणाकर, ज्ञान दिवाकर, मति श्रुत अवधि धारक।।2।।
सच्ची पद के सुख भोगे, दिवा स्वप्न संजोए
आज समझा पर आया कि दुःख के बीज थे बोए।
हुआ अंकुरण, सम्यक दर्शन, भव नाशक अभयकर।।3।।
…
26. तुम न बोले कुछ
तुम न बोले कुछ, कह दिया सब कुछ।।
न ही देखा जग को केवल,
बस स्वयं को ही तो देखा।
सुख भिखारी जन को तुमने,
इतना कर के ये ही बोला।
देख निज को, कह दिया सब कुछ।।1।।
हाथ थामों नाथ मेरे,
कहे दुनिया भक्त तेरे,
कर थमाया कर को निज के,
छोड़ डाला सारे पर के।
कर बिना कुछ, कह दिया सब कुछ।।2।।
जो मिला सब छोड़ डाला,
दिया जग को जग से सारा।
27. दिगम्बर वीर वे चाले
न जग से आश, तज के राग, तन वैराग्य पथ चाले,
दिगम्बर वीर वे चाले…
है समता भाव, लोक निर्भार, मोह की मूल विनशावें,
दिगम्बर वीर वे चाले…
केवल निज आतम ध्यावें, विषयों में नहीं रमावें।
सिद्धों सम निज को लख कर, जग के पद सब ठुकरावें।।
है न कुछ संग, रहते नग्न, मुक्तिपुर पंथ को चाले।।।
दिगम्बर वीर वे चाले…
द्वादश अनुप्रेक्षा भावें, दस लक्षण निज में पावें।
शुद्धोपयोग में रत मुनि, सिद्धों सम आनन्द पावें।।
महाव्रत पाल समिति के साथ आवश्यक नित्य पल जावें।।
दिगम्बर वीर वे चाले…
श्रुतिनाथ कंठाग्रत धारे, पीढ़ी संयम अनुरागे।
एकाशन तेज शिर पर, जिनशासन ध्वज लहरावे।।
चौदह केश, कर्म की रेस, ये सब कर्म भग जावे।।।
दिगम्बर वीर वे चाले…
28. आई है अब निज
आई है अब निज शोध खोज की बारी।। टेक ।।
मैं कौन, कहां, क्यों, क्या कर्तव्य है मेरा?
कब कहां जाऊँ और क्या स्वरूप है मेरा?
इन प्रश्नों की करनी है खूब तैयारी।।1।।
जो किया आज तक करते और करेंगे,
है किया किसे क्या इससे लाभ मिलेंगे?
सब की सुन पर क्या निज की अब तक मानी?।।2।।
क्या मिला और क्या मिलता आया अब तक,
क्या चुक रहा जो खोता आया अब तक,
अब सुनूं वही जो बात रही अनजानी।।3।।
जग घूम घूम कर घूमा थमा न तब तक,
गंतव्य मिला न मुझे हे स्वामी जब तक,
गंतव्य यहां है पर मैं व्यर्थ पिछलानी।।4।।
मैं स्वयं स्वयं का कर्ता कर्म करन हूं,
निज में स्थित, निज को, पर से पूर्ण रहित हूं,
निज को पा जाऊँ करे यही जिनवाणी।।5।।
29. श्रीनाथ की वाणी
श्रीनाथ की वाणी, जग कल्याणी, शिवसुख दाई है।
ये मेरी माँ जिनवाणी है ।। टेक ।।
नव पदार्थ छह द्रव्य और जो तत्व सात दिखलाए।
बहिरातम अंतर आतम परमात्मा जीव बताए।
सकल ज्ञेय दर्शक जिन आतम रूप दिखाती है।।1।।
जीवन कैसे सुखमय हो यह कला तुम्हीं सिखाए।
जनम मरण का नाश कराने का यह मार्ग दिखाए।
अहो अजन्मे ज्ञायक प्रभु का ज्ञान कराती है।।2।।
सकल नयों से पार निजातम को नय से समझाए।
नय पर्यायाश्रित समय का सार सहज बतलाए।
हैं मेरी माँ हर दम मेरी ही बात सुनाती हैं।।
धर्मी है निर्वाण पथिक
धर्मी है निर्वाण पथिक क्यों, बंधन चाहे कर्मों का?
शुभ से स्वर्ग नरक का, बंधन पाप भाव से होता है।
दोनों ही संसार मार्ग हैं, मोक्ष न इनसे होता है।।
दुनिया के सब पंथ मजहब में, पाप कर्म की निन्दा हो।
पुण्य कर्म भी बंध सत्य वह, त्याज्य योग्य इसे जो कहता हो।।
भाव शुभाशुभ तो ज्ञानी के, यथायोग्य ही होते हैं।
पर दृष्टि में इन इन्हें वह, त्याग अहित ही कहते हैं।।
मान रहा था कि केवल, शुभ से शुभकर्म बंध होता।
पर ज्ञानावरणादिक में, शुभ का स्थान नहीं होता।।
बंधते हैं वह भी तो कैसे, पुण्य मात्र सुख का दाता।
बंध हेतु है कारणगृह है, चाहे सोने से बांधा।।
न चाहूं वह पुण्य कर्म जो इन्द्रिय सुख वैभव देता।
पाकर उसके आगम हीन फिर पाप कर्म ही तो होता।।
अतः त्याग शुभ और अशुभ की चिदानंद में रम जाऊं।
श्री अशरीरी निकलकर परमपद सिद्ध प्रभु सम हो जाऊं।।
श्री मुनिराज वे वन में सोहें।
बदले वायुमंडल शीतल से क्षण में हो भीषण भयंकर,
पर चित्त डिग न जिनका होवे श्री मुनिराज वे वन में सोहें।
ठिठुरती पवन चले बर्फानी, हल्का हल्का गिरता पानी।
तप्त रवि क्षण में उगता होवे, श्री मुनिराज वे वन में सोहें।।
चहकती कुहकूहू कहे कोयल, दिखती मोर हुई फिर ओझला।
क्षणिक पर मग्न न इन इनमें होते, श्री मुनिराज वे वन में सोहें।।
गरजते मेघ भयंकर ऊपर, रहती शांत तथापि मुरता।
हवा कितनी तूफानी होवे, श्री मुनिराज वे वन में सोहें।।
तरु उन्मूल अनिल से होते, भरी माँ को लख मृग शिशु रोतो।
धूसर तन मुनिवर का होवे, श्री मुनिराज वे वन में सोहें।।
केशरी मुख हो लाल रुधिर से, भयंकर शोर गरज स्वर ऊँचो।
शांत मुनिमुद्रा को लख होवे, श्री मुनिराज वे वन में सोहें।।
बड़े हम मोक्ष महल की ओर.
त्याग संसार विकल्पों को और मन टाली से।
बढ़े हम मोक्ष महल की ओर…।। टेक।।
जहाँ न बाधा है कण कण सभी स्वाधीन रहें।
मुक्त भगवंत निजानंद में सदा ही लीन रहें।।
न चलती मोक्षमार्ग में अरे कोई मनमानी हो।।
रजत सिद्धालय के ऊपर विराजें हैं जिनवर।
एक में बसते अनेक अनंतो सिद्ध भगवन्त।।
वहां न सर्दी गर्मी भूख प्यास न व्याधि हो।।
यदि पा जाएं सम्यक् दर्शन ज्ञान वरण सुंदरा।
मुनि भगवंत बने और कर आएं श्रेणी मोहना।।
बने अरहन्त नाश यहीं ये जग कहानी हो।।
आज प्रभु दर्श मिला
अंतर्मन पुलकित हुआ,
आज प्रभु दर्श मिला ।। टेक ॥
मन हर्षाएं मंगल गाएं,
श्रद्धा सुमन सब खिल खिल जाएं।
सविनय मस्तक को झुका… आज प्रभु दर्श मिला ।॥1॥
भामंडल सिंहासन सोहे,
छत्र चवर दिव्यध्वनि मोहे ।।
दुंदुभी अशोक रत्न वर्षा… आज प्रभु दर्श मिला ।।2।।
भक्त नहीं भगवान् बनाएं,
प्रभु गुण सम निज गुण को बताएं
देखी निज में अनंत प्रभुता… आज प्रभु दर्श मिला।॥3॥
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3456.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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