जिम्बुकुमार की वैराग्यगाथा
Notes
[जम्बुकुमार का
वैराग्य नाटक]
Notes
(पहला दृश्य)
संचालन :-
बोलिए देवाधिदेव श्री आदिनाथ भगवान् की
जय हो ।
आज यहाँ बनी सुन्दरी बालिका मुख्त
एवं वीतराग विज्ञान पाठशाला के बच्चों
द्वारा छोटा सा नाटक आप सबके
सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। कृपया
शांति बनाये रखे और नाटक का
आनंद लेवे ।
संचालन:
यह कथा जम्बूदीप के भरतक्षेत्र की
है । वहाँ राजगृह नामक धर्म
नगरी थी वहाँ के राजा श्रेणिक एवं
सारी प्रजा धर्मपरायण थी वहाँ
वह जिनेद्र की पूजा, स्वाध्याय, पंयुम.
ब्या. एवं पशुमदानादि के बिना जहाँ
आवक भोजन तक नहीं करते थे
और ऐसी धर्मपरायण प्रष्षा में
सुख शांति स्वयमेव थी क्योंकि
कारण जैसा कार्य होता है और
नगर के • राजा श्रेणिक शशुओं
Notes
Date
Notes
Date
Notes
के मान मर्दन में हमेशा तत्पर रहते थे।
उनकी रानी का नाम चेलना था।
नगर में अर्हदास और जिनमती
नाम के सेठ - जेठानी रहते हैं।
उनक
को पराजित करने
वाला जम्बूकुमार नाम का पुत्र
उत्पन्न हुआ। जम्बूकुमार जन्म
ही वैरागी और धर्म परायण थे।
आइए देखते हैं उनका वैराग्य।
संचालनः
राजगृही नगरी में अर्हदास एवं जिनमती
सेठ - सेठानी के पूर्व दिशा में
उदित सूर्य के समान फाल्गुन मास
के शुक्ल पक्ष में पूर्णिमा के
शुभ दिन का प्रभाव जम्बूकुमार
के जन्म से चमक उठा।
सेठजी
के आनंद का कुछ पारा
रहा। उन्होंने धूम-धाम
से बन्मोत्सव मनाया। और
घर-घर में मंगल गान कराये।
सेठजी ने इतना दान दिया किलेने
वाली की कमी पड़ गयी और
धन का क्षय नहीं हुआ।
आइए देखते हैं बालक जम्बूकुमार की
अपने मित्रों के साथ क्या खेलते हुए
चर्चा करते हैं -
Notes
पहला मित्र :-
मित्रों! यह गेंद का खेल खेलने से हमें
कितना सुख मिला ?
दूसरा मित्र :-
इसमें से हमकी सुख नहीं मिल
सकता।
T.O.
3 तीसरा मित्र :-
लेकिन मित्र, खेलने में हमको
आनंद तो आया ?
6. दूसरा मित्र :- (जम्बूकुमार)
वह तो राग का आनंद था। झात्मा
का सच्चा आनंद वह नहीं था।
2. दूसरा मित्र :-
गेंद में से सुख क्यों नहीं
आता।
Notes
चौथा मित्र :- (जम्बूकुमार)
गेंद में से सुख क्योंकि उसमें सुख है
ही नहीं।
तीसरा मित्र :- क्यों, ऐसा क्यों उसमें सुख क्यों नहीं है?
दूसरा मित्र (जम्बू) कुमरा
क्योंकि वह अजीव है, अजीव में सुख नहीं
होता।
पहला मित्र :- तो फिर सुख किसमें है?
तीसरा मित्र : (जम्बू) कुमार
सुख जीव में है।
दूसरा मित्र :- जीव और गेंद में क्या अंतर है?
तीसरा
चौथा मित्र (जम्बू कुमार)
जीव में ज्ञान है, गेंद में ज्ञान नहीं
है।
Notes
पहला मित्र :-
तो क्या इस जगत् में दो तरह की
वस्तुएँ है?
दूसरा मित्र (जम्बू) कुमार):-
हाँ, एक सानू सहित, दूसरी ज्ञानरहित,
ऐसी दो प्रकार की वस्तुएँ है।
संचालनः-
देखो तो सही छोटे-छोटे बालक खेलते हुए भी
कितनी सुंदर भावना भाते है धन्य हूँ ऐसे
बालकों को उनके माता-पिता को धन्य
है। जिसमें एक राजकुमार कवि था और वह
क्या कहता है।
तीसरा मित्र :-
जीव समझना उसको जिसमें होता सान।
अजीव जानो उसको होय न जिसमें सान।
जीव-अजीव को जानू के कर तो आतमज्ञान
होगी आत्मज्ञान से पदवी मोक्ष महान्।
मित्र :-
जीव वस्तु में ज्ञान के सिवा और कुछ भी
(जम्बूकुमार)
जी हाँ, जीव में ज्ञान के साथ सुख है,
सत्व है, शक्ति है, चारित्र है ऐसे चार
गुण जीव में है।
मित्र :-
यह गेंद तो अजीव वस्तु है, इसमें ज्ञान
तो दूसरा कुछ इसमें होगा की
?
मित्र :-
हाँ, इसमें भी इसके गुण होते है
क्योंकि -
जीव अजीव प्रत्येक वस्तु में गुणों का समूह होता है,
गुणों के समूह को ही वस्तु कहते है।
इस प्रकार जीव अजीव की चचिसभी राजकुमारों को
खुशी हुई और वे विचार करते हुए अपने घर की
और चले गए।
संचालन :-
धन्य ये ऐसे बालकों को जो जन्म से ही
ऐसी भावना रखते है और संसार समुद्र
से पार हो जाते है।
चौथे
[ दूसरा दृश्य ]
संचालन :-
बाल्य अवस्था के बाद अब जम्बूकुमार ने
कुमार अवस्था में प्रवेश किया।
एक और जम्बूकुमार ध्यान में बैठे हुए है
दूसरी और उनके माता-पिता उनके विवाह
के संबंध में चर्चा कर रहे है।
जम्बूकुमार ध्यान में बैठे है मंत्र णमोकार
का चिंतन कर रहे है।
अम्बूकुमार:-
(विचार करते हैं कि) इस असार
संसार में जिनधर्म जीवों को अयो
मार्ग बताने वाला है ज्ञानीजन हमेशा
ज्ञान मार्ग पर चलकर इस संसार
रूपी समुद्र को पार कर लेते हैं
अतः मुझे भी उन ज्ञानियों की
तरह उसे संसार से पार उत्तासा
है भव भोगो को छोड़कर विषय
सुख को छोड़कर अतीन्द्रिय
आनंद का पान करना है।
जिससे में भी उस मुक्ति सुंदरी
का वस्क वरण कर सकू।
जेनमती:-
: है खामी हमारा पुत्र जग्बू, कुमार
विवाह के योग्य हो गया है हमें उसके
योग्य कन्या देख विवाह कर
देना चाहिए ।
अध्दास:-
प्रिये, मुझे भी रखी
चिंता के मारे आजकल नीद नहीं आती सम
मगर किया बया जाए। हमारे पुन के भी
योग्य वधु भी भी होनी चाहिए।
संचालन !-
इतने में ही अर्हदास के मित्र सागरला
अपनी कन्याओं के विवाद का प्रस्ताव लेका
उनके पास आए ।
सागरदत :-
हे मित्र तुम्हारा पुत्र विवाह के
योग्य हो गया है जो अनेको गुणों
से सम्पन्नू है। वह मेरी पुत्रियों के
लिए योग्य वर है क्योंकि धर्म से
सम्पन्न वही सम्पन्न है धर्म रहित
धनवान कोई दरिद्री से कम नहीं,
और धन रहित धूमतिमा कोई चक्रवर्ती
से कम कम नहीं. मेरी पुत्रियों के लिए
तुम्हारा पुत्र ही श्रेष्ठ वर है।
नहीं आती
Yotes
श्रध्दास:-
हे सेठ मित्र तुमने तो मेरी,
समस्या का हल ही कर दिया। मैं
नारे पुत्र को भी अभी सेठानी से इसी विषय
में
संचालन:-
चर्चा कर
रहा था
इस प्रकार माता-पिता व
की चर्चा
यत्र सागत
सभी लोग,
प्रस्ताव लेकर
जगूबकुमार की
की विवाह
करते है।
इधर
महाराजा
श्रेणिक के
राज्य
में
होता
आइए
देखते है।
विवाह के.
को गुणों
नयों के
रा
रहित
या नहीं
ई चक्रवर्ती
के लिए
Notes
(तीसरा प्रश्य) (13
संचालन:-
महाराजा श्रेणिक सभा के मध्य में सिहांसन
पर सूर्य के समान शोभित हो रहे
है। उनके समीप अनेक राजा
बैठे हुए है तभी विद्याधर का आगमन
होता है।
तभी विद्याधर विमान से उतरकर
राजा को नमस्कार करते हुए अपने आने
का कारण बतलाता है।
(व्योमगति)
विद्याधर:-
हे प्रिय राजन! सहस्त्रमूंग नामका एक
उत्तम पर्वत है वहाँ विद्याधरों का पास है
उसी पर्वत पूर में रहता हूँ मेरा नाम
व्योमगति है। हे राजन! मैं एक आश्चर्य-
कारी बात कहने आया हूँ।
मलयाचल
पर्वत के दक्षिण भाग में केरल नाम का
गाँव है जिसका राजा मृगांक है
उसकी विशालवती नामकी एक कन्या है जो कि
धर्म परायण व सुन्दरता की मूर्ति है। मुनिराज के
व द्वारा राजगृही के राजा श्रेणिक
को उसका वर घोषित किया गया है।
लेकिन
हे स्वामी हंसद्वीप निवासी रत्नचूल
नामक विधाधर ने उस सुंदर कन्या
को अपने लिए वरण करने की इच्छा प्रकट
की है।
राजा मृगांक ने उसकी बात
स्वीकार नहीं की इस कारण वह
क्रोधित हो गया है उसने अपनी
सेना सजाकर राजा मृगांक का नगर नष्ट
कर दिया है और वह किले के अंदर ही युद्ध की
तैयारी कर रहे हैं।
अब मैंने आपको सारी
जानकारी दे दी। अब आगे क्या करना
है ये आपके हाथ में है। आप ही उनकी
रक्षा करके उनकी पुत्री का वरण कीजिए
अब मुझे जाने की आज्ञा प्रदान करें।
संचालन-
ये सब सुनकर राजा श्रेणिक व
सभासद विचार करने लगे कि हम किस तरह
युद्ध में विद्याधरों का सामना किस
प्रकार करेंगे।
और फिर सभी को चिंतित
देखकर जम्बूकुमार स्वयं ही रत्नचूल का सामना
करने की आज्ञा मांगने लगे।
जम्बूकुमार-
महाराज आप चिंतित न हो मैं रत्नचूल
को हराकर उसे आपके समक्ष प्रस्तुत
कर दूंगा।
विद्याधर :-
योगगति बालक तूने जो कहा वह क्षत्रिय
का धर्म है परंतु यह कार्य असम्भव है।
इसमें तुम्हारी युक्ति नहीं
चल सकती क्योंकि
यहां से सैंकड़ो योजन दूर है वहां
पहुंचना अशक्य है तो फिर, वीर कार्य
करने की बात ही कहां रही
और रत्नपूल को जीतना अति कठिन है।
जा श्रेणिक एवं सभी
कि भूमिगोचरी से
का सामना किस
सभी को चिंतित
रत्नचूल का सामना
मैं रत्नचूल
समक्ष प्रस्तुत
कहा वह क्षत्रिय
र्थ असंभव है
चिंतित नहीं
करलू देशु
है कहा
और वीर कार्य
रही
अति कठिन है
संचालन :-
इस तरह उस विद्याधर ने अनेक प्रकार
से रत्नचूल के बल का प्रताप बताया
सभी जन सुनते रहे कोई कुछ न
बोला परंत यशस्वी कुमार से
रहा नहीं गया। वे वादी प्रतिवादी
समूह अनेक तर्क युक्तियों से
उत्तर देते हुए बोले-
जम्बुकुमार :-
हे विद्याधर किसी को जाने
बिना ऐसे वचन कहना तुम्हें योग्य
नहीं है।
संचालन :-
जम्बुकुमार के वचन सुन व्योमंगति विद्याधर
निरुत्तर रह गया, मानपूर्वक कुमार का
आश्रम देखने ठहर गया। राजा श्रेणिक
संकोच में पड गये। उनसे कुछ
कहते न बना क्योंकि वे
राजकुमार को युद्ध क्षेत्र में भेजने
के लिए सहमत नहीं थे।
जम्बुकुमार :-
हे स्वामी। यह कौन सा बडा
कार्य है यह तो आपके प्रसाद से क्षण
मात्र में सिंह हो सकता है। सूर्य की
बात तो दूर रहो लेकिन उसकी एक
किरण मात्र से अंधकार का अभाव
हो जाता है मेरे समान बालक भी
उस काम को क्षणमात्र में सिंहपरसकता
है तब फिर आपकी बात का क्या कहना?
जिसके पास चारों प्रकार की सेनायें उपलब्ध
है।
संचालन :-
राजा श्रेणिक जम्बूकुमार के वचन
सुन, आनंदित हो उठे, वे कुमार के
वचनों पर विश्वास करते हुए कहने
लगे।
श्रेणिक राजा :-
हे पुत्रों जाओ और रत्नचूल
का मान मर्दन कर कन्या की
रक्षा कर विजय पताका फहरा
कर आओ।
(चौथा दृश्य) (18)
जम्बूकुमार का युद्धार्थ गमन
संचालनः-
राजा की आज्ञा पाकर जम्बूकुमार
आनंद सहित निर्भय हो अकेले ही
केरल देश जाने की तैयार हो गए।
वे साहसी एवं अपूर्व बल के धनी
तो थे ही उन्होंने तत्काल व्योमगति से
कहा।
जम्बूकुमारः-
हे विद्याधर जहाँ रत्नचूल है वहाँ
मुझे ले चलो।
संचालनः-
विद्याधर ने अपने विमान में जम्बूकुमार
को बिठा आकाश मार्ग से शीघ्र
केरल देश पहुंचा दिया। वहीं पहुंचते
ही सेना का कोलाहल सुन कुमार
ने विद्याधर से कोलाहल का
कारण पूछा (आवाज करना है लड़ाई की)
व्योमगति
विद्याधरः- हे कुमार आपके शत्रु रत्नचूल
की सेना डेरा डालकर पड़ी हुई है।
यह उसी का कोलाहल है। रत्नचूल
यहाँ आने के कारण से जम्बूकुमार से
परिचित है ही। हे कुमार इसके
से राजा मृगांक तो किले के भीतर
बैठे हैं अनेक विद्याधर रत्नचूल के साथ
हैं। इसको जीतना दुर्निवार है।
संचालनः- विद्याधर के वचन सुनते ही
कुमार क्रोध में बोले।
जम्बूकुमारः-
हे विद्याधर तुम यहीं विमान
रोक दो में रत्नचूल से मिलकर आ
देखूँ कि रत्नचूल का कैसा बल
बल है।
( परदा गिरता है )
चालनः- तब
कुमार रत्न[[?]]
जम्बूकुमारः- है
मेरा
मृगां[[?]]
पसे कुछ
संचालनः- रपाल अ[[?]]
करके
जम्बूकुमारः- है
आपन
जो
रना
सभाः-
संचालन-
तब. मृगांक राजा का दूत बनकर कुमार रत्नचूल के पास जाते है-
युवकुमार :-
हे द्वारपाल भीतर जाकर रत्नचूल को मेरा यह संदेश दे दो कि मृगांक का दूत आया है वह आपसे कुछ शांतिप्रद बात करना चाहता है।
सुनकरते ही
रपाल अंदर जाकर राजा को नमन करके कहता है-
हे राजन् ! राजा मृगांक का आपसे मिलने हेतू द्वार पर खड़ा जो आपके दर्शन कर कुछ बाते करना चाहता है।
राजाः- आसा है।
संचालन-
इसप्रकार राजा की आज्ञा पाकर द्वारपाल कुमार को शीघ्र ही भीतर ले आया कुमार निर्भय होकर भीतर चले गए और राजा को नमस्कार किए बिना हीः खडे हो गए। रत्नपूल कुमार को आश्चर्य से देखने लगा और अंदर ही अंदर सोचने लगा।
राजा रत्नपूल :-
यह कैसा दूत है जो राजोचित विनय भी नहीं जानता कुछ कहे बिना खड्ग के समान खड़ा है। मालूम पड़ता है कि कोई देव ही मेरे बल को परीक्षा करने आया है।
संचालन :-
कुमार को देखकर रत्नचूल भी दुविधा में पड़ जाता है।
रत्नचूल :-
(सोचना है) यह देव है या दूत, मित्र
है या शत्रु इसके साथ किस प्रकार का व्यवहार
किया जाए चली इसका परिचय पूछते
है।
आप किस देश के रहने वाले हो और
किस काम से मेरे पास आए हो।
संचालन :- तब इत बने जम्बूकुमार बोले -
जम्बूकुमार :- मैं नीतिमार्ग का आश्रय
करके तुम्हें समझाने के लिए यहाँ
आया हूँ।
रत्नचूल :-
आए हो तुम क्या नीतिमार्ग सिखाने
हो सिखाओ।
जम्बूकुमार :-
राजा खोटे छग्राही नहीं
हुआ करते दुराग्रह से राजा इस
लोक एवं परलोक दोनों ही लोको
में निंदा का पात्र और दुख का
भाजन होता है।
इस जगत् में बहुत सी एक से एक सुंदर रहते हुए
कन्याएँ है। तुम्हें इसकी ही हठ क्यों आती
है। किसी इसकी चीज को बलजबरी
से लेना सर्वथा अनुचित है। किसी दूसरी बुझे
चीज को बलजबरी से लेना सर्वथा अनुचि
है।
योग्य राजा मिथ्या अभिमान से नहीं सामना
अपनी न्याय नीति से सफल होते है।
संचालन :-
इस तरह, जम्बूकुमार ने हितकारी वचनों के
पुष्पों से बनी शीतल वाला रत्नचूल को मत
पहनाई परंतु उसे वह तापकारी हो
गई।
रत्नचूल :-
हे दुष्ट बालक मेरे यहाँ इद
बनकर आया है अतः तू मारने योग्य
नहीं परंतु अब तेरी दूसरी अवस्था
भी हो ही नहीं सकती।
स्वामी के कार्य का विनाशको एक अपने
और बैर का बढ़ाने वाले वचनों को
कहते हुए तुझे जरा भी लज्जा नहीं
आती।
तू इतना भी नहीं जानता कि
तुझे क्या कहना चाहिए और क्या नहीं
अरे
उल्लू की शक्ति नहीं है कि वह सूर्य का
सामना कर सके।
मेरे राजा मृगांक
या राजा श्रेणिक कोई भी युद्ध में मेरा
सामना नहीं कर सकता।
जा अधिक
मत बोल मौन रह मेरे साथ, जिसे
युद्ध करना हो वह आ जावे मेरे
सामने। तुम भूमिगोचरी मेरा कुछ नहीं कर
सकते।
पंचालन :-
इतना कहकर रत्नपूल दुष्ट
हृदय होते हुए भी शांति से
बैठ गया।
जम्बुकुमार :-
हे रत्नपूल तेरा यह कथन
तेरा अभिमान है यद्यपि काक भी आकाश
में उड़ता है परंतु जब वह बाणों से
बिद्ध जाता है तब भूमि पर ही आ
गिरता है।
पंचालन :-
कुमार के ऐसे वचन सुनकर रत्नचूल के
क्रोध का ठिकाना न रहा उसने अपने
हाथ में तलवार लेकर योद्धाओं को
चीखते हुए आवाज दी -
रत्नपूल :-
इस दूत को मार डालो टुकड़े-2
कर डालो।
पंचालन २-
जम्बुकुमार के बल से अनभिज्ञ सभी
योद्धा अपने-अपने हथियारों का प्रहार
करने लगे और जम्बुकुमार लड़ने लगे।
(खड्ग युद्ध)
संचालन :-
रत्नचूल और जम्बूकुमार का घमासान
युद्ध होने लगा।
एक तरफ पूरी सेना
दूसरी तरफ जम्बूकुमार।
जम्बूकुमार अकेले
ही उत्तम सहनन के धनी है जिसके
बल पर उन्होंने सारी सेना का
अकेले सामना किया और अंत में
कुमार ने रत्नचूल को परास्त कर उसे
रस्सी से बांध लिया। और फिर
सेना भी इधर-उधर भाग गई।
(परदा गिरता है)
(पाँचवा दृश्य)
इतने में ही एक दूत राजा मृगांक को
बुला ले आता है।
सभी कुमार
का पराक्रम देखकर कुमार का
जयघोष करने लगे। तब राजा
मृगांक क्या बोलते हैं -
राजा मृगांक :-
कुमार आप धन्य है। आप
कामदेव सदृश अद्भुत रूप के धारी हो। आप
महा बुद्धिमान् हो आप की जय हो।
आज आपने क्षत्रिय धर्म के एश्वर्य को भली
अच्छी तरह प्रकट किया।
संचालन :-
केरल नगर के राजा की सेना
में जीत के नगाड़े बजने लगे तब व्योमगति और
राजा मृगांक का जम्बूकुमार का से परिचय
परिचय कराया।
व्योमगति :-
(विद्याधर) राजा मृगांक ये धीर-वीर
जम्बूकुमार है राजा श्रेणिक ने इन्हें
आपकी रक्षा हेतु मेरे साथ भेजा था।
मृगांक :-
हे कुमार आप अतुल बल के धनी
हो। आपकी धीरता एवं वीरता अवर्णनीय
है। आपका शान्त रस गर्भित वीररस
जगत् को आश्चर्य चकित कर रहा है
आप साधुवाद के पात्र हो, आप धन्य हो
आप धन्य हो।
चालन:-
इस प्रकार राजा मृगांक कुमार का
आभार व्यक्त करते हुए उन्हें धन्यवाद
दे रहे है।
मृगांक:-
चलिए कुमार अब महलों में चलिए
और हमें आदर-सत्कार करने का
अवसर प्रदान कीजिए।
(व्योमगति से) व्योमगति तुम कुमार को
लेकर महल में आओ तब तक
हम कुमार के स्वागत की तैयारी
करते है।
चालन:- राजा मृगांक चला जाता है
जम्बुकुमार प्राणीघात व आत्मघात
का दृश्य देखकर पश्चाताप के सागर
में डूब जाते है और क्या सोचते है
जम्बुकुमार:-
अरे रे धिक्कार है मेरी चतुराई
को जो दूसरों को तो उपदेश दे पर
अपने आत्महित का नाश करे!
ऐसे नेत्रों
से क्या जिनके होते हुए व्यक्ति गड्डे
में गिर जाए।
अरे रे मैं तो ज्ञानी
मेरे ऊपर तो राज्य का भी भार
नहीं था, फिर भी मैंने यह क्या किया
परोपकार हेतु कषाय में स्वयं जला
और हजारों प्राणियों का जीवन नष्ट कर
दिया।
धिक्कार है ऐसे यश को जो
इतने हिंसा कर्म से प्राप्त हो। धिक्कार हो
हे चैतन्य प्रभु तुम अपनी प्रभुता को क्यों भूल
गये। तुमने कषाय का स्वाद क्यों
चखा। धिक्कार हो इस ग्रहस्थ दशा को।
चालन:-
इस प्रकार कुमार मन ही मन अपनी
Notes
खूब निंदा गर्दा करते है।
इस प्रकार, सभी जम्बूकुमार का गुणगान करने
लगे और फिर व्योमगति कुमार को
राजा मृगांक के पास ले जाता है।
राजा मृगांक ने अति हर्ष के साथ नाना
प्रकार के मणि, रत्नों के आभूषण एवं
सम्मान किया और व्योमगति को आज्ञा
दी कि-
राजा मृगांक:- है कुमार आपने हमारी बहुत
सहायता की अब हम अपनी पुत्री का
विवाह आपके राजा श्रेणिक के साथ
कर सकते है। इसके लिए हम
आपके जीवन भर आभारी रहेगे।
जम्बूकुमार:- नहीं राजन, रस्म में मैंने
क्या किया मैंने तो सिर्फ महाराज
की आसा का पालन किया कर आपकी
कुछ, सहायता का अच्छा तो अब आप
मुझे जाने कि अनुमति दे (वरदा गिरता है)।
Notes
(छठा दृश्य)
संचालन:-
जम्बूकुमार व्योमगति विद्याधर के साथ
राजगृह आ जाते है राजा श्रेणिक
दरबार में
सभी प्रजा जन जम्बूकुमार की जय हो, जय
करते हुए जयनाद करते हैं।
राजा श्रेणिक:-
(जम्बूकुमार को हृदय से लगाना है)
हा कुमार बहुत दिनों जाने से मेरा हृदय ने
और मेरी आंखे तुम्हें देखने को
तरस गई थी अब बहुत दिनों बाद
तुम्हें देखकर मेरा हृदय हर्ष से
फूला नहीं समा रहा।
संचालन:
राजा ने कुमार को अपने निकट
सिहासन पर बैठा लिया और संपूर्ण
Notes
गर्ता पूछने
जम्बूकुमार:-
इस
कर्ता पूछने लगे ।
जम्बुकुमार :-
महाराजा, राजा मृगांक कुछ समय
के साथ
बाद यहाँ आकर उनकी पुत्री का विवाह
प्रैतिक
आप से करेंगे ऐसा उन्होंने संदेश
जय हो, जय
पहुँचाया है।
ठिक राजा:-
ठीक है कुमार ।
एलन:-
इस प्रकार जम्बुकुमार ने अपने
वीरता
साहस का
परिचय
दिया
अब
आगे वे
सुरत पूर्वक
मेरा हृदय
होने लगे तब
क्या होते है।
ने को
नों बाद
पर्व से
संचालन :-
कुछ दिन बीत जाने पर राजग्रही
नगर के उपवन में श्री सुधर्माचार्य
संत का आगमन हुआ। जैसे ही
यह सभी को ज्ञात हुआ तो राजा:
शाहत, जग्दुकुमार आदि सभी समिवर के
दर्शनार्थ जंगल में पधारे और वहाँ
पुण्य गुरुवरों को अंजुलि जोड़कर नमस्कार
करके तीन प्रदक्षिणा देकर वहीं बैठकर
धर्मामृत का पान करने लगे ।
मुनिराज का उपेदश:-
हे भत्यों। तुम सानानंद मृमी शाश्वत चैतन्यतत्व
में ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य, प्रभुता, विभुता
आदि अनन्त शक्तियों के भण्डार हो । हे
धार्मिक तत्सों यह तुम्हारी पूर्व आशानाओं का
फल है जो तुम्हें परम पवित्र जिनधर्म मिला
रास्टो धर्म की पोजक जिनवाणी और परम्
पूज्य वीतरागी संत मिले। निजस्वरूप की
आराधना से निश्चय रत्नश्रय प्राप्त कर
जगत् का ज्ञाता द्रष्टा रहनाही तुम्हारा स्वरूप
है। अपनी शाश्वत प्रभुता का संवेदन करना हो तुम्हारा काम है
भिकट,
और संपूर्ण
राजा श्रेणिकः-
"अहो ! मुझे राजलक्ष्मी, जयलक्ष्मी के
साथ-साथ धर्मलक्ष्मी का भी लाभ
प्राप्त हुआ है। धन्य हो गया आज मैं,
धन्य हो गया। (प्रणाम करने लगते हैं)
संचालक-
राजा श्रेणिक तो अपने राजमहल में
वापस आ गये। परन्तु विरक्त जम्बुकुमार
पुष्प गुरुवरों की चरण शरण में बैठे हुए
हैं। वे मुनिवरों की आनंद झरती शांत,
प्रशांत वीतरागी मुख मुद्रा को टकटकी लगाकर
निरखते जा रहे हैं और कुछ देर बाद
चैतन्यतत्व को मानो स्पर्श करते हुए मुनिराज
की स्तुति करने लगे।
(दोहा)
जब मुनिवर आते हैं, वैराग्य जगाते हैं।
परद्रव्यों, परभावों से हमको भिन्न बताते हैं।।
जब मुनिवर आते हैं
मुनिराज रहें वन में, नहीं राग करें तन में।
बारह भावना रहें बस जिनके चितवन में।।
सिद्धों जैसा बनने का मार्ग बताते हैं।
परद्रव्यों स्वभावों से हमको वो भिन्न-भिन्न बताते हैं।
जम्बु कुमार :-
हे मलयागिरि के चंदन की
समान शांत प्रभो। हे समदर्शी गुरु
हे वीतरागी विभु। आपको शत शत वंदन
हो। नमन हो। हे प्रभु! मैं कौन हूँ।
मैं कहाँ से आया हूँ? मेरा क्या स्वरूप है
यह कौन सा पुण्योदय है इत्यादि
प्रश्न मेरे मन में उठ रहे हैं इसलिए
अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी विभु! आपसे इनका समाधान
जानने की मेरी प्रबल भावना हुयी है।
सुधर्माचार्य गुरुवर :-
(भजन)
गव्य। तुम और मैं पूर्व भव के भवदेव
ब्राह्मण नामक दो ब्राह्मण पुत्र
थे। इस भव में मैंने और आपने जिन दीक्षा अंगीकार
की पर पुषित का वरण नहीं
आराधना
की
था। तब भवदेव का जीव में मेरे
रत का वरण नहीं
ठा है। और तुम भवदेव के जीव ही नो
स्वर्ग से विधेमाली देव पचाय से
कर सेठ अर्हदास के पुत्र हुए
जम्बुकुमार का वैराग्य
(मुख से अपने पूर्व भव का)
जम्बुकुमार पहले से ही तो आराधक थे
पूज्यू मुनिराज का उपदेश
क्या स्वरुप है? परम
संसार का जड़ विसव को खड हुए
इत्यादि अनेक
है इसलिए है
के समान और मदिरा काया को
गान की राख के समान पिअनुभव करने
। उनका स्वरूप ।। उन्हे जगत् असार भामित
हुयी है।
लगा। उनका मनः मिनूदीक्षा
लिए तैयार हो गया। और वे पून्य
रूवर के समक्ष हाथ जोड़कर जिन-
दीक्षा की प्रार्थना करने लगते हैं !
जम्बुकुमार :-
हे जगत्- उद्वारक करुणासिंधु
विभु। मैं इस संसार एवं सांसारिक
भावो से एक चुका है। इसलिए मुझे परम आनंद
दायिनी जैनेश्वरी दीक्षा देकर अनु
गृहीत कीजिए।
सुधर्माचार्य :-
हे भत्यु यदि तुम्हारे मन में जिनदीक्षा
की तीव्र उत्कंठा है तो तुम अपने घर जाकर अपने माता,
पिता, बंधवर्ग से सम्मति लेकर एवं उनके
प्रति अपने अपराधों को समा करके
आओ। तभी तुम कमीक्षयकारी आनन्ददायिनी दीक्षा
के पात्र होओगे।
संचालक :- (जम्बुकुमार मन में विचारते हैं):
जम्बुकुमार :-
पूज्यू आचार्यवर की आज्ञा का
उल्लंघन करना तो योग्य नहीं है। घर
नहीं जाने की हठ करना भी योग्य नहीं।
इसलिए मुझे गुरु-आज्ञा को शिरोधार्य
कर घर जाना चाहिए।
संचालक :- इस प्रकार मन में विचार करके
जम्बुकुमार गुरु को नमस्कार कर
घर की ओर जा रहे हैं परंतु वैरागी,
ज्ञान के धनी विरक्त जम्बुकुमार के मन
में एक ही धुन सवार है कि मैं घर
से शीघ्र वापिस आकर जिनदीक्षा लूँगा।
(पर्दा गिरता है) आठवाँ दृश्य)
संचालक :- घर पहुँचकर विरक्त कुमार उदास
हो एकांत स्थान में बैठ गये।
वहाँ उनकी माता जिनमती तो पुत्र की
विजय सुनकर फूली नहीं समा रही थी,
लेकिन पुत्र को उदास देखा तो वे
कुछ समझ नहीं पायी। माता जिनमती
अपने पुत्र के सिर पर हाथ फेरते
हुए कुमार से पूछती है-
(माता) जिनमती :- बेटा! तुम इतने समय
आज तो तुम विजयश्री प्राप्त करके
तो फिर से प्रसन्नता के बदले उदास
पुत्र?
जम्बुकुमार :- हे माता! अब मुझे
संसार में रहना एक क्षण भी
है। मुझे संसार देह और भोगों
त्यागकर शीघ्र ही जिनदीक्षा
है। अब मैं अपने पाणी पात्र में
हुआ आहार ही ग्रहण करूँगा।
मैं वन खण्डादि में रहूँगा
आनंद से केलि करूँगा। यहीं मुझे
सुखदायिनी है माँ।
माता :- (काँपती हुई आँखों में आँसू
: बेटा! ऐसा वज्रपात-कूरी
अकस्मात् और अप्रासंगिक क्यों कर
हो? क्या किसी ने तुम्हारी आज्ञा
की? या तुमसे कुछ कठोर वचन
है? आखिर ऐसा क्या हुआ
जयश्री की खुशी के बदले सीधे ही
जिनदीक्षा लेने की ठान ली ?
उदास क्यों
के आये बालक :- तब कुमार ने श्रीसुधर्माचार्य
उदासी क्यों
के मुख से सुनाया अपने
भव का वृतांत अपनी माता को कह
सुनाया। पुत्र की पूर्वजन्म की चर्चा सुनकर
माता जिनमती के अंदर भी धर्मवृद्धि
मुझे इस जग उठी। और आज के समय में माता-
नहीं सुहाता छोटे बच्चों को मोबाइल फोन,
भोगो की पी गेम इन चीजों में लगाकर
धारण कर ऐसे में बच्चे धर्म से वंचित
त्र में प्राप्त हो जाते हैं। जम्बुकुमार के
अतीन्द्रियणा दी।
बचपन से उन्हें जैनधर्म की
यही मुझे
आइए आज हम और आप
भी संकल्प करें कि हम भी बच्चों
संस्कार डाले और धर्म का मार्ग
और आगे बढ़ने को प्रेरित करें।
वचैन
रहे घर जिनमती अपने चित्त को शांत कर
शृंगभेठ अर्हद्दास के पास जाकर संपूर्ण समाचार
जो
सुना देती है लेकिन सेठ जी यह समाचार
सुनते ही मूर्छित हो जाते हैं कुमारादि
सभी जनो ने शीतल पर्व एवं
पवनादि से उपचार करते हैं: परंत तीव्र मोहोदय
से मूर्छित दूर हा हा कार के शब्द कहकर
वे विलाप करने लगते हैं उनके आकुलता
पूर्ण विलाप ने सभी के हृदयों को
द्रवित कर दिया परंतु वैरागी जम्बुकुमार
पर उसका कुछ भी असर नहीं पड़ा।
पिता अर्हद्दास अपने पुत्र को समझाते
हुए कहते हैं
पिता अर्हद्दास :- बेटा अभी तुम छोटे बालक
हो। अभी तुम जिनदीक्षा के स्वरूप को
नहीं जानते हो। बेटा तुम्हारा कोमल
शरीर है उसमें नग्न दिगम्बर रहना
भूख व प्यास, सर्दी-गर्मी, मनुष्य,
तिर्यंच और देवो द्वारा किये गये उपसर्गो
को सहन करना और जंगल में
धीरता-वीरता पूर्वक
कंकड़ और काँटों से व्याप्त भूमि में रहना
होता है। ये सब तुमने देखा ही नहीं
तुम इन कष्टों को कैसे सहने
सकोगे? जरा तुम शांति
से विचार तो करो। पुत्र!
मैं तो प्रथम सम्यग्दर्शन सहित पूर्वाचार्यों
को पालने की आज्ञा दी है। जब इसकी
दृढ़ता आजावे फिर महाव्रतों को
अंगीकार करना ऐसा मार्ग बतलाया है।
तुम तो जिनदीक्षा लेने की
कर रहे हो। अभी तो तुम
में ही रह कर साधना करो।
छोड़ दो, पुत्र! छोड़ दो।
जड़
फलक :-
जम्बुकुमार पिता जी के वचनों
शांतिपूर्वक सुन ही रहे थे और विचार
रहे थे जिनदीक्षा धारण करना
असाध्य कार्य नहीं है।
फिर पिताजी को मधुर वचनों से
बोधित करते हुए क्या बोले?
जम्बुकुमार :-
हे पिताजी! बाह्य वस्तुएँ
दुःख की कारण नहीं होती। आत्मिक
इन्द्रिय आनंद में रमने वाले को क्या उपसर्ग
क्या परिषट? इसलिए हे तात! आप मोहा
मेरे वीतरागी मार्ग की अनुमोदना कीजिए
और मुझे आज्ञा दीजिए।
संचालक :- पिता अर्हदास ने कुमार को इसारं में
जानकर अपने मन को शांत किया
और एक चतुर सेवक को एकांत में
बुलाते हैं और उससे कहते हैं।
पिता :- सेवक तुम शीघ्र ही जाकर सारा
दत्त आदि श्रेष्ठियों को समाचार दो
कि जम्बुकुमार संसार से विरक्त होने
के कारण जिनदीक्षा लेने को तैयार है।
सेवक :-
अरे रे! ऐसा समाचार मुझे देना पड़ेगा।
मैं कैसे कहूँगा? अरे से धिक्कार है को
पराधीनता को।
चालक:- सेवक घबराये हुए चित्त से
सागरदत्त के सन्मुख पहुँचा
और नीचा मुँह करके निश्चेष्ट खड़ा
गया। श्रेष्ठी ने आने का कारण
पूछने पर सेवक के मुख से कुछ भी शब्द
नहीं निकल पा रहे हैं। खेद पुनः श्रेष्ठी
के पूछने पर सेवक खिन्जता
के साथ कुछ धीरे-२ स्वर में बोलना
प्रारंभ करता है
सेवक:- "अरे रे! आप जैसो सुज्जनो
का समागम बड़े भाग्य से मिलता
परंतु रे देव! तसे मंजूर नहीं हुआ
बड़ा दुर्भाग्य है कि अकस्मात
शुभ कार्य में विघ्न आ पड़ा।
सागरदत्त:- अरे सेवक! ये क्या कह रहे हो?
और कैसा विघ्न? बोलो शीघ्र
मुझे देना पड़े। हम तुम्हारे गूढ़ रहस्य
कुछ समझे नहीं पा रहे हैं।
सेवक:- अरे रे! इन कन्याओ के दुर्भाग्य
की बात मुझे कहनी पड़ रही है। श्रेष्ठी।
कुमार का मन जिनदीक्षा लेने को तैयार
है। अतः उन्होंने विवाह करने से इंकार
कर दिया है। उनके माता-पिता ने उन्हें
बहुत समझाया पर वे किसी भी तरह से
विवाह को तैयार नहीं हुए है।
सेठानी:- स्वामी क्यों न हम सभी जम्बुकुमार
के पास चलकर अननय-विनय करके
उन्हें मनाने का प्रयत्न करें?
सागरदत्त:- प्रिये, "जब माता-पिता के ही सब
प्रयास विफल हो गये। तब हम जाकर क्या
करेंगे। क्या चश्म शरीरी कुमार के वैराग्य
को भी बदला जा सकता है? मुझे, तो यह
असंभव लगता है फिर इस मंगलमयी
परिणाम की तो हमें अनुमोदना करनी चाहिए।
सेठानी :- (दुखी होकर ) यदि कुमार कुछ
कालू, संसार में रुककर हमारी
पुत्रियों के सौभाग्य तिलक बनते तो कितना
अच्छा होता । अब इस लोकसे उन
जैसा वर-हम कहाँ से लायेंगे। हाय!
कैरनी भाग्य विडम्बना है।
सागरदत्त :-
होनहार के आगे किसका
वृश है ? अतः शोक छोड़कर पुत्रियों के
हित का विचार करो। जब उन्हें
यह समाचार मिलेगा तब उन पर क्या
बीतेगी । अतः चलो, प्रथम तो हम
उन्हें सात्वना देने हुए उन्हें इस
समाचार से अवगत करायें।
संचालक :- माता-पिता अब पुत्रियों के
→ (पर्दा गिरता है)
कक्ष में जाते है और उन्हें इस
समाचार के बारे में बताते है।
सागरदत्त :- हे पुत्रियो ! तुम सभी ने
सेठानी:- पूज्य सुप्रभा औधिका जी
के सानिध्य में वस्तुस्वभाव को मममा हे अपने मात
सायेक वस्तु नित्य रहकर भी पलटती है। पारिकार, स
स्वभावा में विचित्रता हीदी है कभी मंदता,
ती माता कभी रागरूप तो कभी वीतरागकगीत.
फरसना
कितरागता.
परिणमन होदा है विवेकीजन इष्ट निर्णय ले
संयोग वियोग रूप परिणामों में क्षेत्रय, पुनि
विचार नहीं करते ।
पुत्री पद्मश्री:-
हे माता । अकस्मात इसता
होओ
नमंगल
मे
जाक
जेलगती है
वस्तस्वरूप के प्रतिपादन करने का दया।लिक :
आशूय है? अभी कोई स्वाध्याय था तन्न
चर्चा का प्रसँग तो है नहीं ? क्या ओपनर
सिद्धांतों हुत कैस्थ साथ कोई पीतरागी ए
ने
का
संदेश भेजा।
आपके प्रतिबोधन का मर्म नहीं सममगरदन्त:-
ब्रा रही हूँ पिताजी ।
सागरदत्त:-
माताजी
उ
कि निवारणार्थ हे पुत्रियो ! तुम्हारी शंका एवं पुि
पड़ा रहा है कि मुझे जबरक्स करती १०
जम्बुकुमार जी ने सरे
अपने माता-पिता आदि के द्वारा अनेक
समझा है। परिणत्रकार से समझाये जाने पर भी संसार
ममता, काम फरसना योग्य नहीं समझा। और
वीतराग रूप विरागता के पथ पर चलने का
अल्ट-अनिष्ट निर्णय ले लिया है इसलिए हे
में हर्ष-प्रय, पुत्रियो! तुम इस मंगलगर्भित
ममंगल समाचार को समकर व्यथित
होओ। हम सभी जब कुमार
से जाकर मिलेंगे।
का क्या चालक :- उतना सुनते ही पुत्रियों की
क्या है पगती है माँ पद्मावती रुदन करने
वीतरागी सागरदन्त उन्हें समझाते
कहते हैं।
नहीं समम गरदन्त :-
न छोटा हे प्रिये! पद्मावती! तुम अपना
म्हे न करो। तुम हो माताहो।
रीि शंका एवं पुत्रियों को होय लेना चाहिए
वर क्रस कहना जगत् में बहुत सुयोग्य लड़के हम
सरे, सुंदर, सुयोग्य वरो के साथ
अपनी पुत्रियों का धूमधाम से विवाह करेंगे।
हे पुत्रियो! तुम सूब चिंतित मत होओ।
हम प्रथम प्रयास तो कुमार को ही मनाने
करते है। हमें विश्वास है कि जम्बु
कुमार मानू जाऐंगे। यदि उन्होंने दृढ़
निर्णय ले ही लिया होगा तो हम तुम
और दूसरे सुंदर सुयोग्य वर के साथ
तुम्हारा विवाह कर देंगे।
संचालक :- पिता के वचनो को सुनते ही
चारो कन्याएँ एकदम बोल उठती है।
कन्यायें :- (चारो)
हे तात! हे माता! आपने
ऐसी उच्च कुल के अयोग्य बात का विचार
कैसे कर लिया। हम सभी ने मन ही मन
यह निश्चय कर लिया है कि हमारे पति
तो जम्बुकुमार ही है। अन्य का तो हम
स्वान में भी विचार नहीं कर सकते है
क्योंकि शीलवान स्त्री का स्वामी तीनो लोको
में एक ही होता है।
(पदा गिरता है)
संचालक :- पिता सागरदत्त अपनी चारो
पुत्रियों के दृढ निश्चय को
जानकर श्रेष्ठ श्री जम्बकुमार के पिम
अहंददास जी जम्बकुमार के। यहाँ पुटुचे और
जम्बकुमार के संबंध में संपूर्ण जान
कारी जानने हेतु उनसे पूछने लगे।
सागरदन्त :-
हे मित्र। कुमार को अचानक
ऐसा विचार आने का क्या कारण है?
उन्होने लघुवयन मे उतना कठोर कदम
उठाने की कैसे सोची ?
अर्हद्दास :-
हे मित्र कुमार जुब केरल
युद्ध से वापिस अपने नगरे को आये,
तो नगर के उद्यान मे प्रन्य श्री सूर्य-
मर्माचार्यजी से अपने पूर्वभवों का हतांत
श्रमण करते हो उनका हट्टय वैराग्य
के लिए उछल पड़ा है।
सागरदन्त :-
हे मित्र। आप एक बार
कुमार को समझाए कि वे मात्र शादी
कर ले बस उसके बाद संपुर्ण जीवन
ही दिन वीतरागी पूथ की और पर इष्टजने
जारे हमारी सहर्ष स्वीकृति है।
संचालक :- वैराग्य रस से सराबोर मुदि
कांता के अभिलाषी को संसार
देह भोगो की आकांक्षा लेशमात्र न होने
पर भी माता - पिता के अति संचालन
आग्रहपूर्वक बारम्बार समझाने पर जग्ग
कुमार ने इस बात पर के लिए अपने
मौन स्वीकृति प्रदान कर दी और इधर रत है
अहंददास की को कुमार के विवाह से प्रभा में
वैराग्य दिख रहा था। दूसरी ओर को
उन्हे कन्याओं के सौन्दर्य एवं व्यवहा
कुशलता पर पूर्ण विश्वास था अत: कक्ष
प्रसन्नता पूर्वक लक्षण विवाहोत्सव देखती
का आयोजन किया गया। समस्त गस्टो
एवं पंचपरमेष्टीयो की साक्षीपूर्वक कुमार (कुमार
का चारो सुकन्याओं के साथ विवाह संपन (चारो.
करा दिया गया। चारो श्रेष्ठीयो ने वर-
वधू का रत्नमयी अलंकारों से यथोचित
आप एक बार पु सम्मान किया। उसके बाद कुमार की
कि वे मात्र शाद बारात अपने महल को लौटीन द्वार
बाद आईगल अगले पर बारात आने पर माता-पिता एवं
की और चले इष्टजना ने वर वधू का अंगलगान एवं
न द्वीपा द्वारा स्वागत करते हुये तिह
स्वीकृति है।
प्रवेश कराया।
रस से सरबोर मुधि
अभिलाषी को संसार,
(पर्दा गिरता है) खुला है।
क्षा लेशमात्र न होन
पिता के अति- संचालन :- इधर महल मे बारात झाने के
पर जम्बु
अपने कृक्ष में एकांत
समझाने के लिए अपने स्थान मे बाद कुमार
स्वरुपेयार आराधना के लिए प्रयत्न
कर दी और इहारात हो गये और उधर चारों वधुर कक्ष
कुमार के विवाह से प्रभा में
वे कुमार के
सौन्दर्य
ने आता देख वि
वह कक्ष में प्रवेश करती है और क्या
विश्वास थ
दिखती है। आइए देखते है।
तत्क्षण
कुमार का वैराग्य चितवनमा
चारो, वधुओ का कुमार को प्रणाम करना)
पद्यमश्री:-
प्रनाम स्वामी। हे देवराज आज
के ऐसे अवसर पर कटने का व्याकारण
है
विनय है
आँप जरा नेत्रो को खोलिए,
आपके चरणों में भावपूर्ण
प्रनकश्री :-
बोलिये स्वामी कुछ तो बोलिये
हम चारों आपके वचन श्रवण कर अपने
कूर्ण एवं मन को पवित्र करना चाहती
है
विनयत्री :-
इतनी प्रतिक्षा न कराए। करराइए। बोलिये
स्वामी कुछ तो बोलिए। अपने नेत्रो को
संचालक :-
अत्यंत आग्रह करने पर कुमार
श्री अहन्मिीलित नेत्रो से चारो वधुओ को
Notes
रुपती :-
देखा मेरी धर्मगुरु अपने शिष्यो को
देखता है और वे भ्रमण में विचार करते
कि समभावकाल में फलीभूत होने वाली
मेरी भावनाओं से ये चारों अपरिचित
ऐसा जानते हुये कुमार अकस्मात
बोले।
जम्बुकुमार :-
हे भद्धागो ! मैं आप लोगो
से कहा नहीं है और अपरिचित
व्यक्तियों से कहने का कुछ कारणभी
तो नहीं होता।
पद्यमश्री :-
हे नाथ। तो फिर ऐसे अवसर
पर आपके इस प्रकार के व्यवहार का
क्या कारण है
संचालक :-
कुमार विरक्त हो मौन योगी
की तरह बैठ गये। पुनः पधुरें
बोली।
Notes
रुपती :-
हे स्वामी ! हम सभी आपकी भार को
जानना चाहते हैं
जम्बुकुमार :-
हे देवियो ! यह तो मानव भी हमारी
वीतराग के पथ पर चलकर अतीन्द्रिय
आनंद का अनुभव व स्वसंवेदन कर मुक्ति प्राप्त
करने का मंगल अवसर है अतः मैं तो
जैनश्वरी दीक्षा से भानु उदय कर मंगल
मयी प्रभात करना चाहता है यही मेरी स्वामी
भावनन है
संचालन :-
पगी हुई बुद्धिमती एवं रूप लावव्यण की
मेरी बातें हुई की।
किसी ने हाथो को किसी ने उन्हें हिलाते
हुए एवं किसी ने नाना प्रकार की
करते हुए उनसे कहा।
अध्य
के साथ, आप हमारे रूप लावण्य
पूर्वक, देखो तो सही। हमारे
कोमल हाथों को स्पर्श करो तो सही।
अपने नेत्रों को तो खोलिये और
हमारी वाणी को सुनिये !
हम सभी आपकी भावना
यह तो मानव भव
चलकर अतीन्द्रिय
है अतः मैं तो
उत्पन्न कर मंगल
चाहता हूँ यही मेरी
जी :-
हे स्वामी ! हम सभी ने आप को
निहार कर ऐसा अनुभव किया है कि मानो
स्वामी के विशाल नेत्रों में चंचलता
अत्यंत गंभीर समुद्र लहरा रहा है।
हे मुक्तिपती हम चारों अनाथ पालियों
नाथ हमें अपने सत्संग से कृतार्थ
एवं रूप लावण्य में कीजिए।
वधुओं ने पुनाराग
उनके पैरों को पकड़ा। जम्बुकुमार पद्मासन लगाकर बैठ गये
की :-
हे ! चरमशरीरी नाथ! आप जैसे
में रंगपगे साक्षात् इष्ट भगवान्
को अपने पति के रूप में पाकर हम चारों
प्रमुदित हैं हमारी स्त्री पर्याय सार्थक हो गयी।
विनयश्री :-
हम सब भी एक दिन सिद्धशिला
के अधिकारी हो। हम सभी आपके चरणा-
सिंध का दासत्व स्वीकार करती है हमें
अंगीकार करके कृतार्थ कीजिए।
जम्बुकुमार :-
हे भद्रो। हे भत्यो आप
स्वामी के विरक्त एवं आत्मसाधना के परिणामों
को देखकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई।
आप चारों
धन्य हो कि जगत् में जिस
समय विषय भोगों एवं राग-रंग की
वार्ता चलती है। उस अवसर में तुम्हारा चित्त
अध्यात्म चर्चा को चाहता है। मेरा परिणाम
भी इन विषय भोगों एवं संसार के दुखों
से उदास
है और मैं प्रातः काल की
पावन वेला में ही पूज्य श्री सुधर्माचार्य
जी के चरणारविंद में जाकर पावन जैनेश्वरी
दीक्षा धारण करूंगा !
संचालक :-
कुमार के इस प्रकार कहते
ही चारों वधुओं के मुख से सहल
ही.. निकल पड़ा। हे स्वामिन आपकी
मंगलमयी परिणति जयवंत हलवते।
हम आपके वैराग्य को जानकर हर्षित
है।
तब
कनकश्री :-
हे स्वामिन हम सब भी
आपके सानिध्य में आत्महित के
अभिलाषी हैं। परन्तु हम अबोध
बालायें कुछ समय तक आपका सत्
समागम चाहती हैं। आप कुछ समय
उहरकर हमें प्रतिबोधित करने के
बाद दीक्षा धारण करे।
बबकुमार :-
हे भद्रे! तुम्हारा विचार
कथंचित उचित है। परन्तु आत्मार्थी
कभी भी निमित्तों की प्रतीक्षा नहीं कभार :
उन्हें एक-एक समय रत्नों से अधि
कीमती लगता है इसलिए हमें एक बार उचित
काम भी विलम्ब नहीं करना चाहिए एव अन
रही बात विषय: भोगों और गृहस्थी में किया
रहने की तो इस संदर्भ में महापुरुष मोह क्र
कहते है-
कीचड़ को लगाकर धोना क्या
और कूद आग में रोना क्या ?
विनयश्री :-
है नाथ। आपका कहना ठीक है नएक
परन्तु अभी तक हम सभी कोमलांगों गति
ने समस्त इन्द्रियों की अनुकूलता देखी
(भोगी) है।
आत्मसाधना करना अत्यंत
दुर्द्धर कार्य है। हम आप के साथ
वन में जाकर कठोर तप कैसे
कर सकते है। पहले हम अणुव्रत
धारण करेंगे। फिर साथ दीक्षा ग्रहण
तब तक रुकना उचित है।
मोह ए
परिणाम
हो
एलए
तैयार र
देखा दरव
खुला
चुका
बहुत अ
उदार
भले ही तुम्हारा कहना
है वद्धिमते।
समुचित नहीं है। सीताजी
अंजना जी ने कहाँ धीरे-धीरे अभ्यास
किया था। यह बात सत्य है कि पारित
मोह क्रम-क्रम से जाता है परंतु दर्शन
मोह एक साथ जाता है।
इसलिए जिसके
परिणाम धीरे-धीरे आत्म अभ्यास करने
हो तो करे परंतु मेरा युक्त तो
मात्र भी रुकने को
एक क्षण
नहीं है। उरे हे धिक्कार
जिसका कस
ऐसे भोगों
नरक निगोद है।
और इन चार
सभी कर्मों के पति, चौरासी लाख योनियों के
अनुकूलता देखी दूर से
चुका है।
भूयंत
प के साथ दुखी है-
तप कैसे
उदासीनता तो
मेरा आत्मा थक
स्वामिन्।
उसका
सच्ची
नाम है
जहाँ वीतरागी होकर पर पदार्थ इष्ट-अनिष्ट
भावित न हो।
यदि स्वर्ग मोक्ष के लोभ से
पर नरक निगोदी के भय से विषय
भोगों से उदासीन हो जाओगे तो यह
दंभ गर्भित उदासीनता होगी। वो कि
अकार्यकारी है अतः कुछ समय ठहर
कर जिन दीक्षा धारण करोगे तो उचित
ही होगा नाथ।
जंबुकुमार:- (मुस्कुराते हुए) हे आगम कुशले।
यह बात सही है कि कोई पदार्थ इष्ट-अनिष्ट
नहीं है और द्वेष रूप उदासीनता सच्ची
उदासीनता नहीं है, परन्तु मैं तुमसे अथवा
भोग सामग्री से द्वेष करके, माक्षादि
के लोभ से उदासीन नहीं हुआ हूँ। मेरा
मन आत्मा के अतीन्द्रिय आनंद का
भरपूर स्वसंवेदन करने के लिए
तड़प उठा है।
विनयश्री :-
ने नीतिज्ञ ज्ञाथ क्षमा करें इस
अल्प वय में भोगों को छोड़कर ज्ञान में
तो आपकी भावभुत भावुकता भाषित होती
है और भावुकता में जीव का उत्कर्ष
होता है उससे भी जल्दी पतन हो
जाता है।
धर्मज्ञ हो. मैं इसलिए है स्वामिन आप
आपको क्या नीति सिखा
सकती हूँ। आप मुझे क्षमा करें।
भावुकता या जल्दबाजी के कारण
हमारे आचरण में किंचित् भी
शिथिलता हुई तो. यह परम पवित्र
जिन शासन कलंकित हो जाएगा।
जन्बुकुमार :-
है गंभीर चिन्ते ! तुम्हारा
गंभीरतापूषी विचार प्रशंसनीय है
परंतु भावुकता की क्या पहचान है
जिनके पास सचमुच आत्म प्रतीति
है उनके जीवन में शिथिलता
नहीं होती।
एक 8 वर्ष का बालक यदि आत्मानुभवी
हो तो वह भी गंभीर है और 60 वर्ष
का व्यक्ति यदि आत्मज्ञानी नहीं है तो
वह भी भावुक है।
सखी :- (तुनककर) (अन्य रानियों से बोली)
तुम लोगों को क्या हो गया है क्या
तुमने तटस्थता करने के लिए विवाह किया
है ?
अरी सखी। इस निर्दयी पुरुष की
खुशामद से क्या लाभ.
अंधे के सामने
नाचने से क्या, बहरे के आगे गाने से
क्या ?
इस तरह तो यह अवश्य ही दीक्षा
ग्रहण कर लेंगे।
नहीं नहीं जरा स्वामी को दृष्टि उठाकर
हमारे रूप सौंदर्य को तो देखने दो।
अरे
धिक्कार है देखते तो कैसे बात:
द आत्मानुभवी है। ब्रह्मचारी यतीश्वर की तरह नासाग्र दृष्टि
भीर 60 वर्ष के बढ़ है।
नहीं है तो
रानियों से बोली
गया है क्या
लिए विवाह किय में।
नर्दयी घुरन्त की
अंधे के सामने
आगे गाने से
अवश्य ही दीक्षा
को इन्टि उगत
देखने
अरे रे ! धिक्कार है। तुम्हारे
पत्नीत्व को क्या तुम भूल गई गृहस्थ
कार्य के विवेक को। उन्हें आत्मा आत्मा
और वैराग्य की बातें छोड़ी।
स्वामिन् वैराग्य की बातें भूल जाइए
सभी आपको पून में नहीं जाने
। दीक्षा नहीं लेने देंगें।
सुकुमार:-
है, विहल चित्ते है
विजय भोगों में इंजायमान बुद्धि को
वारक, तुमहेद लीव मोद का उदय
मासित होता है जो चाहे आनंदमयी
आप की बात नहीं सुहाती।
नरक निगोद
विषय - भोगों से दूर ले जाने
ली साक्षात् मुक्तिदाता ऐसी चर्चा
तो: रत्नत्रय का कारण है। क्या यह
चर्चा तुम्हें नहीं सुहाती।
जैसे आव्य प्रतीति से शून्य वह राजा मरकर
विष्ठा का कीड़ा हुआ इसीतरह तुम भी
कीड़े मकोड़े की तरह अनंत कन्टी को
भोगने के लिए तैयार हो जाओ।
क्या
तुम अब भी उन दुखों को उठाना
पसंद करोगी।
तीनों रानियाँ :-
(विरक्त होकर) नहीं
स्वामिन् कुहीं हम से तो ये दुख
नहीं सह जायेंगे।
स्पश्रीः
(लज्जित होकर) हे नाथ! क्षमा करें,
मेरा अभिप्राय आपको ठेस पहुंचाना नहीं है
लेकिन
एक बात अवश्य पूछना चाहती हूँ।
कि तीर्थकरों एवं चक्रवर्ती आदि ने
भी गे विवाह किया था। इस
प्रकार हम भी गृहस्थ धर्म अपनाकर
आत्महित करें। तो क्या अनुचित
होगा।
जम्बूकुमार:-
हे नम्र चिते। उनके परिणामों
से तो वे ही अनुभव कर सकते
है।
लेकिन मेरा मन अब उन विषय-भोगों
को स्वीकार नहीं कर पा रहा है।
अतः मैं तो वन में जाकर जैनेश्वरी
दीक्षा धारण करना
चाहता हूँ।
संचालन:-
इस प्रकार जम्बूकुमार ने शुभलग्ण
में सभी पत्नियों को समाधान
करते हुए संतुष्ट कर दिया।
कुमार:-
हे भद्रे। धन्य वे नहीं
है जिन्हें ग्रहस्थी बनानी पड़े। अपितु
धन्य वे है जिन्हें ग्रहस्थी की
आवश्यकता ही न हो।
रानियाँ-
(आँखो में आसू भरकर)
हे नाथ! अब आप ही बताइए कि अब
हम क्या करे।
जम्बूकुमार:-
हे आर्याओ! तुम्हारे परिणामों
व्यर्थ में ही खेदू-रिखन्न हो रहे है। हुमू
व्याकुल मत होझो। अपनी विश्वित
वृथा न छुपाओ।
शान्द होओ। शान्त होओ। तत्व विचार जब
करो!
तीनो रानियाँ:-
अभ्यास करने के परन्तु स्वामिन्। हमको आ
दीजिए।
पड़ै। अपितु
रडर)
ही बताइए कि अब
अनुप कुमार:-
अभ्यास कैसा अभ्यास ?
हमने तुम्हें सुकुमाल जी बात
थी। उनने कैसा अभ्यास किया
क्या माता, के पेट में नौ-नौ
उलदे मुँह लटके रहकर वहाँ की
को सहने का अभ्यास
क्या था? क्या तुमने सहायक होने
का तसार अभ्यास किया भारवया,
विधवा होने का अभ्यास करोति
इसलिए सावधान होकर अपने परिणामो
पवित्रता बढाओ विरक्ति बढ़ाओ
तुम्हारा हित अवश्य ही होगा।
संचालक :-
इतना समझाने को बाद भी
जम्बुकुमार नहीं माने सब मान
सर्वप्रयास के बाहर और ये
अपने कुल की माता कक्षा के घूम
भी माता कक्षा के घूम
और सुन रही थी
ही एक घटना घटती
है आइए देखते है।
ग्यांइश्य
(पर्दा गिरता है)
संचालक:-
इधर कुमार के साथ स्त्रियाँ
वार्तालाप कर रही थी उधर विद्युच्चर
नाम का चोर 500 चोरी का
सरदार था। करने निकला
था। कोतवालो ने अपनी रक्षा करते हुए
वह सेठ अट्टाराम के घर चोरी
करने आया जत कुमार का शयनालय
था वहाँ आ पहुंचा।
कुमार का स्त्रियों से
वार्तालाप हो रहा था, उसको सुनकर
विन्चारता है कि पहले उस कौहस्ते को
देख कि रत्नों को चुराऊ।
यही निश्चय कर लिया पहले सब संबना
चाहिए फिर धन को चुराना चाहिए।
Notes
चोर :- यह कैसा आश्चर्य है कि कुमार
तो भोग के समय योग कर रहा
है, राग के बदले वीतरागता की धारा
हो रही है। ये राज्य वैभव, भोग
सामग्री, चार-चार रानियाँ, उनकी
चेष्टाएँ भी इस कुमार को
डिगा नहीं पा रही। अहा
गुहा आश्चर्य उसका क्या कारण है
में अवश्य जानकर रहूँगा।
संचालक :-
इस प्रकार, चोर स्वामी
व रानियों की चर्चा को सुनकर
स्वयं को कैसे धिक्कारता है।
चोर :-
अरे! जिसके पास न्याय-
नीति से उपार्जित धन संपदा एवं
भोग है वह तो उसकी ओर
आँख उठाकर नहीं देखता, और मैं
अन्याय से व चोरी से धन चुराना
चाहता हूँ मुझे धिक्कार है।
Notes
संचालक :- ऐसे विचारों में मग्न
जम्बुकुमार के कान की ओर खिड़की
बंठा हुआ है। माता भी व्याकुल चित्त
घूम रही है और वह देखती है
कि कोई व्यक्ति बढ़ा हुआ है
उसके पास पहुँचती है और इसे देख
घबरा जाती है एवं चोर उनसे दया
कहता है।
चोर :- (माता को प्रणाम करता है)
हे माता! मैं विद्युपुर चोर हूँ
चोरी करने आपके यहाँ आया
मगर आज कुमार एवं रानियों की चर्चा
सुनकर मैंने चोरी कर्म त्याग दिया है
अब तो मेरी कुमार से मिलने की
भावना है।
माता :- हे वत्सू! तुझे जो चाहिए सो
मेरे घर से ले जा।
चोर :- हे माता! मुझे आज दान लेने की
चिंता
कौतुक
कहे।
अ
माय
हुआ
वेष
हो। र
की चर्चा
संचाल
विद्यु
चोर
लिया
कुमार
में
चिंता नहीं है। मैं बहुत देर से यह
कौतुक देख रहा हूँ।
इसका कारण क्या है? सो
अब तू मेरी धर्म बहन है, मैं तेरा
माता :- (धैर्य धारणकर) मेरा यह कुल
दीपक है जिसका आज ही विवाह
हुआ है, परन्तु यह पिरवत है और
रूप लेना चाहता है। सूर्य उदय होते
ही यह नियम से तम ग्रहण करेगा।
संचालक :-
माँ जिनमती के वचन सुनकर
विधुच्चर के मन में दया पैदा हो गई।
चोर :- हे माता। मैंने सर्व हाल जान
लिया है भय न कर मुझसे इस
में जो हो सकेगा वह कहूँगा।
मैं वशीकरण मंत्र तंत्र सब जानता हूँ।
मैं अवश्य ही उन्हे समझाकर घर रहने
को तैयार कर लूंगा।
संचालक :-
माता जिनमती तो यह चाहती
थी कि किसी प्रकार से पुत्र घर में
रह जाये। और उन्होने तैरत एक सुविन
बनाई कि ये हमारे भागा है जो कि
बहुत दिनों से पुडदेश गये हुए थे।
अतूले ही पे, शागे है और तैमसे
मिलना चाहते हैं। इसप्रकार माता पिहा-
चचूर चोर को गाया बनाकर नम्ब
स्वामी से मिलाने वे राजी है।
जम्बुकुमार :-
हे माता (विनय से) यहाँ
इस समय आने का क्या कारण है?
माता :-
तुम्हारे विवाह का उत्सव सुनकर
मामाश्री यहाँ पधारे है और वे तमसे
और तुम्हारी रानियों से शेर करना चाहते
है।
जम्बुकुमार :- हे माता मेरे मामा को
शीघ्र यहाँ बुलाओ।
संचालक :-
जम्बुकुमार मामाश्री को देखकर
उठ जाते हैं और आदर सहित
उन्हें पूर्ण होकर गले मिलते हैं
अब विद्युच्चर चोर किस प्रकार कुमार
को समझाते हैं
मामा :- (चोर)
हे कुमार तुम बड़े भाग्यवान्,
ऐश्वर्य वान हो कामदेव के समान तुम्हारा
रूप है तुम शांत हो, सूर्य के समान
तेजस्वी हो।
तुम्हारे पूर्व पुण्य के उदय
से संपूर्ण भोग सामग्री तुम्हें
प्राप्त हुई है इसलिए तुम इसको दीर्घ
काल तक उपयोग करो।
जम्बुकुमार :- हे मामा। मैं इस पापी
इन्द्रिय सुख के लिए तिर्यंच आदि
में जाकर दुःख नहीं उठाना चाहता हूँ।
कदापि इन्द्रिय सुख नहीं चाहता हूँ।
(चोर) मामा :-
हे कुमार! आपने श्री
प्रभु की दिव्य देशना तो सुनी ही है
जिसमें दो धर्म का वर्णन है। गृहस्थ
मुनिधर्म। तो तुम गृहस्थ धर्म का पालन
क्यों नहीं करते हो। मुनिधर्म का
बहुत कठिन है। अभी तो तुम्हारी आयु
भी बाकी है जब आपकी वृद्धावस्था
हो भी तब आत्म साधना करना। महाकठिन
मुनिधर्म की साधना करना।
जम्बुकुमार :- हे मातृल। संसारी जीवों
दशा को देखकर उसका निरूपण इस
प्रकार से किया गया है। जो जीव
विषय - भोगों में रचे-पचे हैं उन जीवों
आत्महित
उपदेश दिया
हूँ मेरे
कल संयम
होऊ
(चोर) मामा
सहित
भी
ऐसा
जम्बुकुमार
को
कि
ही
आत्महित के लिए अणुव्रत आदि का
उपदेश दिया गया है। मैं तो चरमशरीरी
हूँ मेरे तो इस भव में संपूर्ण कर्मों
का क्षय होना है तो क्यों न मैं सभी
संयम धारण कर प्रचुर स्वसंवेदना को प्राप्त
होऊँ।
मामा :- हे बेटे! शिवकुमार भी एक वस्त्र
सहित अपने ही उद्यान में रह रहे थे वे
भी भिक्षा भोजन करते थे।
जिससे सभी सुखी थे, आप भी
ऐसा ही करिये।
जम्बुकुमार :- हे भ्रातुल, जब मैं सकल संयम
को धारण करने में समर्थ हूँ, तब
फिर एक था आधे वस्त्र की जरूरत
ही क्या है?
वास्तव में गृहस्थी जो जंजाल
है, अनंत दुखों की भट्टी है, यहाँ निरन्तर
संकल्प-विकल्पों की ज्वालायें धावका करती है।
उसमे यह जीव आत्मा के भान रहित होकर
झुलसता है।
संचालक :-
इस प्रकार मामा विद्युच्चर ने जम्बु
कुमार को कई कथाओं के माध्यम से
संसार में रहने के लिए बहुत प्रयत्न किया
पर कुमार ने भी उन्हें कई कथाओं के
माध्यम से संसार के दुखों को बताया
और कहा
जम्बुकुमार :-
जो संसार विषय सुख होता
तीर्थकर क्यों त्यागे।
काहे को शिवसाधन करते
संयम सो अनुरागे।।
[आर्यक छंद]
संचालक :-
अहो धन्य है वे वैरागी जम्बु
कुमार जिनके सत्संग से एवं चर्चा में
चारों बहुओं का और विद्युत्बर का
रागरंग भी उतर गया एवं वे भी सोख
को तजकर, विखत चित्त होती हुई
अपने को कृन्हाय अनुभव कर
रही थी।
वैराग्यमयी चर्चा में रात्रि का अंधकार
कहाँ नष्ट हो जाता है इधर सूर्य की
पहली किरण फूटती है और चारो
वधुऐ किस प्रकार वैराग्य को धारण
करती है
कनकती :-
(हाथ जोड़कर) हे स्वामिन् ।
हमने साई फेरे, खाकर आपके साधु
चलने की, जो प्रतिज्ञा की थी उसे
मुक्ति पर्यंत निभाना चाहते है
विनयश्री :-
हमें भी आज्ञा दीजिए कि
हम भी, ती जिनेंद्र देप द्वारा बताये
हुए मार्ग पर चल अपनी आत्मा का
कल्याण करे ।
रूपती :-
हम अब उस मार्ग परचले
की उत्कृष्ट अभिलाषी है आप
आज्ञा देकर हतार्थ कीजिए।
जम्बुकुमार :-
(प्रसन्नचित होकर ) तुमदेखी
के मंगलमय परिणाम जयवंद
हे भद्र , हे विश्वत चित्ताओं तम
सबके अंदर यह मंगलमयी दो
सादि अनंत काल के लिए शोभायमान
हो।
[बारहवां दृश्य]
संचालन :-
जब पुत्र वधुऐ भी कुमार
भी इस पथ पर चलने लगी हमी
माता जिनमती का क्या हाल ही स
माता:- (रोनु है फटकर)
"हाये रे हाय । रो मैंने क्या।
मुझे इन चारो कन्याओं पर जरा भी इ
नहीं आयी। हाय हाय। इन चारों हैं
ग्स मार्ग पर चलने
लापी है आप
। कीजिए।
चत्र होकर) तुमसर्थ
जयवंद हो,
तम
- मंगलमयी रत्नार
• लिए शोभायमान
पधारे श्री कुमार को
की और सूवय
से लगी इसी बीच की
क्या हाल
कर)
मैंने क्या
पर जरा भी त्या
२) क्या किया
य। इन चारों
की उम्र अब कैसे बीतेगी ? मैंने
अपने हठग्ग्रह में इन चारों का
जीवन बंबदि कर दिया।
हे पुत्रियो। तुम्हारी असली
अपराधिन में है।
सारा अपराध
मेरो है।
हे तुम ! मेरे,
खण्डादि मे तप को कैसे धारण
करेंगी !
संचालक :-
उतना कहकर माता सुपनी
सुद्ध भूल जाती है तव पुत्र, वधुरै माता
किस्त प्रकार को संबोधित और
करती है।
पद्मश्री :- (माता को आसन पर बिदासा है)
(अनु पोंछना है)
है माताश्री ! हमारा सौभाग्य है कि हमे
ऐसे ज्ञानी हयांनी पुरुष का समागमथिला
है। यदि किसी विषयासक्त पुरुष को
समागम मिल गया होता तो विषय
श्रीगो में हम अपना फीगती भव हार
गयी होती ।
कनकश्री :-
हमे झर्नत भवो मे सच्चे देव-
शास्त्र गर्न मिले थे हमने बाध्य इत्यविंग
भी धारण किया, ग्यारह अंग का ज्ञान
भी किया परहमासुराज जैसी विरहित, आज
पैसा मंगलमय परिणाम कभी नहीं पाया।
हमारा जिनशासन का पाना, सच्चे देवा
शास्त्र-गुरु का और हमारे अनंत भवो
पाना यो ही त्यर्थ चला गया।
विनयश्री :-
आज हम सभी धन्य हो गयी
है, हमारा यह विशह सफल हो गया
है, मात्र एक रात्रि के समागम से उनकी
आत्मा के तेज के प्रभाव से हम चारो
का चिन्त विषय भोगो से होकर
आत्म आराधना में लग गया है।
रूपश्री :-
हें माता जी। ये विवाह
हमारे लिए वरदान साबित हुमा है।
अब हम शीघ्र ही स्त्री देहपयोगका देदकर,
सकल सूयम को धारण कर मोक्ष
प्राप्त करेगी। हे माता आपका किंचित
भी कोई अपराध नहीं है।
पद्मश्री :-
हमारा तो पहले से ही,
नियोग था। कुमार के साथ हमभी
यह जानते थे और सभी जानते थे,
कि हमने उनकी वैराग्य बोधक च्चो
से अपनी विषय वासना से विखत
होने के लिए ही उनसे विवाह किया
था।
कनकश्री :-
हम चारों दासियां आपक
चरणों की अधिक सेवा न कर सकी
इसका हमे खेद है हम आपसे समा
मांगते है परन्त आत्महित के सिवाय
और कोई उत्तम मार्ग नहीं है।
संचालक :-
इतना सुनते ही मात्रा थिए।
होकर रोने लगती है और चारों वदन
को दीक्षा लेने से रोकने का प्रयत
करती है।
माना :-
हे बेटा कम से कम तमने
दीक्षा घारणु न करो। मैं अब मिले
सहारे रहूंगी। तम्हारे ही साथ तत्वचाज
और तुम भी घर में रहकर आए
आराधना करना।
चालक :-
इस बरह माता जिनमती नाम
प्रकार से चारों वधुओं को सममय
Notes
पसेसर है लेकि
बोलती
रूप
हमे
रख
महतो
कनक
भवद
पद्
रि
नह
है
सं
करू सभी
आपसे क्षमा
है।
हे माता।
चारों वधुएं माता से क्या
आप ही कहो हुआ
हमें शोभा देगा कि, हमारे स्वामी
खण्डादि में वास करे और हम
चारा वधुएं महलों में।
कनकश्री :-
आप शोक छोड़कर हमें
तुम भी भूवधि तारक, जिनशासन की शरण
अब किसके में जाने हो।
पद्मश्री :-
हम स्त्रीलिंग हैकर सिंह-
शिला में हमारे स्वामी के मध्य ही
नहीं अनंत, सिद्धि के सहय
है माते। हमें आज्ञा दो।
संचालक :-
इस प्रकार सभी के चित्त में
वैराग्य व जाग्रत होता है माता का
मोह भी धीरे धीरे कुछ नाश है
उदित हो गया। जिसकी
चिर प्रतीक्षा थी, सिंगल प्रभाव
का मौन खुली
जम्बुकुमार :- (माता से)
हे मेरे शरीर की जन्मदात्री
की आत्मा। अब मैं अपनी काली
पारा ऐसी निजात्मा के पास जाता हूँ
जैसे आज्ञा हो।
(पिग से) :-
हे इस शरीर के जनक की
आत्मा अब मैं, अपने शाडादर जनक के
पास जाता हूँ मुझे आज्ञा दीजिए।
(हिमयों से) :- हे उस शरीर को सामने
Notes
•वाली रमणियों अब मैं अपनी त्रिकाली
रमणी के पास जाता हूँ। मुझे आसा
दो।
संचालक :-
उत्स जम्बुकुमार ने माता-
पिता एवं पत्नियों से जिमदीक्षा की
आज्ञा माँगी।
पिताजी :-
हे कुमार तुम धन्य हो
तुम्हारा राग अब असादि अनंत
काल के लिए अस्त हो चुका है।
लेकिन हे पुत्र ठहरिये हम तुम्हें
मना नही करते, यथा-योग्य
विधि के साथ राजा सहित संपूर्ण
नगरवासी तुम्हारे साथ वन को चले।
संचालक :-
अहो। यह वीतरागियों का
पूथ कितना अलौकिक अनादिकाल
से अनंत भत्य आत्माओ में अपने
Notes
जीवनू का ध्येय या लक्ष्यबिंदु इसी
पथको बनाया होगा।
इस असंयमी, असंगी निरालंबी व
स्वालंबी मार्गा की, केल्पना मोहियो
की कैसे हो सकती है कदापि नहीं।
परन्तु वैराश्य रस से ओत-प्रोत जम्बु
स्वामी की दीक्षा की घड़ी आ ही
जाती है और यह सूचना राजा
श्रेणिक को दी जाती है तब राग
श्रेणिक नगर मे मेरी बजबाते है और
नगरवासी सहित राजा श्रेणिक कुमार
की उत्तम भावना की अनुमोदना करते हुए
अर्हतदास के महल में पालकी लेकर
आते हैं और जम्बुकुमार को वस्त्रादि
अलंकृत कर दीक्षा के लिए
पालकी में बैठाकर वन की ओर ले
जाते है।
सभी जम्बुकुमार की वैराग्य
अनुमोदना करते हुए वन में
है और पहाँ विराजमान
Notes
सुधुर
जम्बु
अशर
से
प्रभुव
को
जै
संचा
अब
पर
कुमार
तय
मा
सुधर्माचार्य के निकट जिन दीक्षा अंगी
उनकी आज्ञा माँगते हैं।
अम्बुस्वामी :-
हे स्वामिन् ! हे नाथ!
हे गुरुवर मेरा चित्तु संसार की
अशरणता में, आस्त्रवों की अशुचिता
से शकु चुका है इसलिए
प्रभुपरमै शीघ्र ही, आतिमुक
अतीन्द्रिय प्रचुर स्वसंवेदन से जात्या
को विभूषित करने के लिए
जैनेश्वरी दीक्षा अंगीकार करना चाहता
हूँ। अग्रहे नाथ! मुझ पर कृपर कर
अनुग्रहित कीजिए।
संचालक :-
इस प्रकार जम्बु कुमार ने
उन रह मूलगुणों को ग्रहण करते हुए
परम दिगम्बर दशा को प्राप्त किया
जम्बूस्वामी मुनिराज को अनेक कार
तम करते हुए वर्षों बीत गये तब
माघ सुदी सामी के दिन आधा
प्रहर दिन बाकी था तब श्री जम्बु
स्वामी मनिराज को केवलज्ञान उत्पन्न
हो गयी।
मगध से लेकर मथुरा तक
अन्य देशों में विहार करते हुए
फिर केवली महाराज मथुरा पधारे
और आदी कर्मों से रहित होकर
निर्वाण दशा को प्राप्त हुए।
बोलिए महावीर भगवान् की जय।
जम्बूस्वामी जी के निर्वाण
की जय!
मूल दस्तावेज़ (PDF): 133_small.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है