कुमार जीवंधर (जीवन्धर) की प्रसिद्ध जैन कथा पर आधारित पद्यमय नाटक। सत्यंधर, विजया आदि पात्रों के छंदबद्ध संवादों के माध्यम से पराक्रम, त्याग व वैराग्य की कथा का चित्रण। जीवन्धर चम्पू / क्षत्रचूड़ामणि परंपरा की लोकप्रिय कथा।
A verse-form Jain drama based on the celebrated story of Prince Jeevandhar. Through the metrical dialogues of Satyandhar, Vijaya and others, it portrays valour, renunciation and detachment — drawn from the popular Jeevandhar Champu / Kshatrachudamani tradition.
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नाटक का आरंभिक अंश
नाटकके पात्र ।
सत्यन्धर… राजपुरीके राजा
जीवन्धर… सत्यन्धर के पुत्र राजकुमार
काष्ठांगार … सत्यन्धरका विश्वासी मन्त्रो, और अन्तमें
उन्हींक मारने वाला शत्रु
गोविंदराज … धरणीनिक्षकके राजा यानी जीवंधरके मामा
गधोत्कट…राजपुरीका नगरसेठ यानी जीवंधरका
धर्मपिता
नन्दगोप…राजपुरोका एक मुख्य एवं धनाढ्य ग्वाला
नन्दाढ्य…गंधात्कटा पुत्र यानी जीचंधरका भाई
पद्मास्य… जीवंधरका मित्र
भवदत्त… एक मूर्ख विद्याधर
श्रोदन
राजपुरोका सेठ
विदूषक, मन्त्री, द्वारपाल, साधु, रसोइया, ग्वाले, पथिक
राजपुत्र, सैनापति, ज्यं ढीवान सेठ आदि ।
नाटककी पात्रायें ।
विनया… सत्यन्धरकी स्त्री यानी जीवंधर की मा
गंधर्वदत्ता… जीवंधरकी पटरानी। गुणमाला, सुरमंजरी
कनकमाना, विमला आदि जीवन्धरकी
सामान्य स्त्रियां
मदनवेगा… एक दुश्चरित्रा विद्याधरी
नटी, परियां, देवी, सेठानी, सखी और स्त्री वगैरः ।
श्रीजीवंधर-नाटक
रंगभूमि
( सूत्रधारका प्रवेश )
सूत्रधार - अहा ! आज कैसा सुहावना, मन प्रसन्न करने-
वाला समय है। दिलमें आनंदकी लहरें स्वाभाविक वह रही हैं,
मनमें खुशीका समाव पूरा जम चुका है, समय अनुकूज है ।
अतः दिल चाहता है कि कोई ऐसा खेल खेलूं जो सबको आनंद
दायक हो । अच्छा अभी जाता हूं और नटीसे सलाह कर यह
आनंदकार्य शुरू कराता हूं। (सूत्रधारका चला जाना )
( सूत्रधार और नटीका प्रवेश )
सूत्रधार- प्रिये ! देखो आज कैसा सुहावना समय मनोहारी
और खुशदिल प्रतीत होता है। मेरी इच्छा है कि आज इस
आगन्तुक सभाके समक्ष कोई हर्षमयी चित्र खींचा जाय, जिससे
सभीका दिल प्रसन्न हो और साथमे अपना मनोरथ भी
सफल हो ।
जीवंधर-नाटक
-नटी - प्रियतम ! आपका यह प्रस्ताव समयानुकूल है। मैं
इसमें तन मनने सहमत हूं’ थाप आज्ञा कीजिये जिमसे कार्य
शीघ्र शुरू कर दिया जाय ।
सूत्रधार- है मुग्धे ! प्रथम तो तू यह बता कि कोनसा दृश्य
मनोज्ञ-सरस और धार्मिक है, जिसके खेलनेसे अपना मनारथ
सफल हो सकेगा।
नटी- प्रियवर ! जीवंधर-नाटक खेलिये, जो सरस और
आनन्दका खजाना है, तथा साथमे शिक्षाप्रद भी है, खेलकर
सबके चित्तोंको प्रमन कीजिये ।
सूत्रधार-ठीक है प्रिये ! तुमने बहुत ठीक कहा, यह समय
भी ठीक ‘जीवघर नाटक’ ही खेलने का है। चलो और सभी को
आज्ञा दो कि तुम समी पात्र भरना २ पार्ट वडी मुस्तैदी और
दिलचस्पीसे करो । प्रथम मङ्गल गान करने के लिये पाग्योंको
भेजा जाय वाद जिसका जो कार्य होगा कराया जायगा ।
(दोनोंका चला जाना )
( परियोंका प्रवेश-मङ्गल गान )
श्री ऋषभ गुरुवरा, युग आदि अवतरा
तारि भव्य जीव कर्म काटि खुद तरा ॥ टेक ॥
आदिनाथ तुव नाम इसीसे दिया आदि उपदेश रसाल ।
धर्म कर्मकी करी व्यवस्था भबिजन तारन तरन विशाल ॥
लखि परंपरा ॥ श्री ऋषभ गुरुवरा ॥ १ ॥
गर्भ जन्म तप ज्ञान और निर्वाण पंच बुव भवि सुखदाय ।
यह केवल आरंभिक अंश है — पूरा नाटक ऊपर दी गई PDF में उपलब्ध है