जीवन पथ दर्शन - ब्र. श्री रवीन्द्र जी 'आत्मन्' | Jeevan Path Darshan


40. समाधिमरण निर्देश :arrow_up:

साधक निर्देश :-

  1. प्रयोजन परक स्वाध्याय करते हुए, आधि-व्याधि-उपाधियों से रहित सहज समाधि स्वरूप शुद्धात्मा को समझें एवं बारम्बार शुद्धात्म भावना भाएं।
  2. परिग्रह एवं पदों का त्याग कर दें।
  3. समस्त प्रकार के लौकिक व्यवहारों से विरक्त हों।
  4. विषयों से विरक्त होकर संयम धारण करें।
  5. लौकिक दृष्टि वाले जीवों की संगति से दूर रहें।
  6. साधर्मीजनों से सीमित चर्चा करें। विकथा को कदापि प्रोत्साहित न करें।
  7. तीर्थयात्रा, दानादि सम्बन्धी प्रशस्त विकल्पों से भी निवृत होकर निशल्य हो जायें। सर्वत्र राग एवं बैरादि का विसर्जन अनिवार्य है। सर्वप्रकार के हस्ताक्षरों, चाबी, जानकारी से मुक्त हो जायें।
  8. चिरपरिचितों के मध्य में सामान्यतः नहीं रहें।
  9. निर्यापक का चयन कर उसी के निर्देशन में रहें।
  10. वस्त्र, भोजनादि भी सीमित कर लें।
  11. देह छूटने के समय का आयुर्वेद एवं ज्योतिष सम्बन्धी लक्षणों से अनुमान करते हुए, विवेक पूर्वक समय सीमा सहित त्याग करते हुए, परिणामों में समता का विशेष ध्यान रखें।
  12. कोई असाध्य रोगादि होने पर भी कुशल चिकित्सकों के परामर्शानुसार विशेष संक्लेशकारी वेदना न हो पाये, ऐसे बाह्य संयम के अनुकूल उपचारों को सहजता से स्वीकार कर लें, हठ न करें।

परिचारक निर्देश :-

  1. उचित सेवा, योग्य संबोधन, अनुमोदन एवं स्वयं समाधि की भावना करते हुए, उत्साह पूर्वक समाधि करायें।
  2. साधक को सर्वथा अकेला न छोड़ें। इतने समीप ही दूसरा व्यक्ति बैठा रहे कि उसके इशारे से तुरन्त आ जाये। रात्रि में भी एक व्यक्ति जागता रहे।
  3. सामान्यतः भी चर्या के लिए सूक्ष्म उपयोग एवं सावधानी रखें। स्वयं ही यथा समय सहयोग करें। उसे कहना न पड़े।
  4. यदि कहीं जाना पड़े तो मात्र दूसरे से ही न कह जाऐं, साधक को भी कहकर जायें और दूसरे व्यक्ति को अपने सामने ही प्रशिक्षित करके जायें।
  5. भोजन, पानी, औषधि आदि के त्याग में शीघ्रता न करें, क्रमशः थोड़े-थोड़े समय के लिए ही करायें। ऊपरी योग्य उपचार करते रहें, जिससे तीव्र वेदना भी न हो पाये और कषाय का प्रसंग भी न बने।
  6. धर्म के और साधक के प्रतिकूल न तो वचन बोलें, न चेष्टा ही करें। मन में भी न विचारें क्योंकि मन के विचारों का निमित्त-नैमित्तिक रूप से प्रभाव देखने में आता है।
  7. साधक के समीप विकथा न करें और न प्रमाद सहित अयत्नाचार सहित प्रवृत्ति करें। स्वच्छता एवं व्यवस्था बनाये रखें।
  8. मोह के निमित्तों को दूर ही रखें।
  9. वैराग्य एवं भेदज्ञान पोषक ही पाठ एवं स्वाध्याय करें। स्वर्गों या भोग-श्रृंगार, युद्धादि के आगम प्रसंगों को भी न पढ़ें। यदि सुनकर निदानादिरूप परिणाम हो गये तो समाधि नहीं हो सकेगी।
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41. जिनमंदिर निर्माण निर्देश :arrow_up:

  1. जिनमंदिर आवश्यक होने पर ही बनायें।
  2. स्थान का चयन अत्यंत विचार पूर्वक करें, जहाँ का वातावरण शान्त हो एवं श्रावकों के समीप हो । स्थान विवादास्पद न हो,जबरन कब्जा न करें।
  3. शक्ति अनुसार स्थान अत्यन्त बड़ा लें, जिससे वहाँ मंदिर, कॉलोनी, बाल-वृद्ध-महिला आश्रम, धर्मशाला, छात्रावास, मुमुक्षु निवास, अतिथिगृह आदि बनाये जा सकें। साधनों के अभाव में अस्थाई व्यवस्था बना लेवें।
  4. व्यवस्था एवं सुरक्षा की दृष्टि से मंदिरजी से जुड़ी एक संस्था अत्यन्त आवश्यक है, जहाँ दो चार साधर्मी रह सकें। आवास व्यवस्थित एवं स्वच्छ बनायें।
  5. नक्शा ऐसा बनायें, जिससे स्वाध्याय, पाठशाला, पूजन विधान निराकुलता से हो सके।
  6. सांस्कृतिक कार्यक्रम, सामूहिक बैठक (मीटिंग) आदि के लिए अलग स्थान हो। स्नान, पूजन-सामग्री, धोती-दुपट्टा आदि का स्थान ऐसा हो जो वेदी, प्रवचन लांघकर न निकलना पड़े।
  7. वेदी पूरी तरह से बंद हो, जिससे छिपकली, चूहे आदि जीव जन्तु श्री जी को स्पर्श न कर सकें, वहाँ गंदगी न कर सकें।
  8. मंदिर जी की दीवाल से लगाकर बाथरूम, लेटरिन या इनसे सहित कमरे न बनायें।
  9. त्यागी, विद्वानों हेतु मंदिर से हटकर कक्ष बनावें।
  10. पुजारी, माली आदि कर्मचारी-सदाचारी हों, यदि मंदिर परिसर में उनके निवास हों तो ध्यान रखें वह बीड़ी, जर्दा, गुटखा, आलू-प्याज आदि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन न करते हों और न ही टी. व्ही. आदि की आवाजों से वहाँ का वातावरण दूषित करते हों।
  11. धोती-दुपट्टा सुखाने का स्थान सुरक्षित छायादार हो।
  12. वाहन खड़े करने एवं जूता-चप्पल उतारने हेतु पर्याप्त सुरक्षित स्थान हो।
  13. ऐसी मजबूत व्यवस्था करें कि मंदिरजी में चिड़िया आदि पक्षी प्रवेश न कर पावें। खुले स्थानों पर द्रव्य चढ़ाने के लिए अच्छी जालीदार पेटियाँ रखें।
  14. वेदी में श्रीजी विराजमान हों और वहाँ कोई निर्माण कार्य चल रहा हो तो पर्दा अवश्य डाल दें।
  15. पानी एवं अन्य घोल खुले न छोड़े। सीमेंट, चूने, रंग, पेंट के दाग तुरंत साफ करा देवें।
  16. मंदिरजी में हिंसक सामग्री से उत्पन्न अशुद्ध वस्तुओं (जैसे सनमाइका, स्वर्ण वर्क, अगरबत्ती, सरेस तथा चिकना चमकदार कागज आदि) का प्रयोग न करें।
  17. जीना (सीढ़ियाँ) एवं द्वार कम से कम दो हों।
  18. हरियाली एवं अधिक लाइट कदापि न लगायें।
  19. पालिशादि में हिंसात्मक पद्धतियों का प्रयोग केवल सौन्दर्य के लिए न किया जाये।
  20. हवा एवं प्रकाश के लिए खिड़की, रोशनदान एवं जाल आवश्यकतानुसार पर्याप्त हों।
  21. जैन संस्कृति एवं पानी के जीवों की रक्षा हेतु कुआँ अवश्य हो। जिससे श्री जी के प्रक्षाल व मुनिराजों, व्रतियों के लिए शुद्ध जल प्राप्त हो सकेगा।
  22. वेदियों में रंग स्वर्ण चित्रकारी न करें, स्वर्ण वर्कों का प्रयोग कलशों पर भी न करें।
  23. वेदियाँ एक या तीन हो, वेदियों के अनुपात से ही द्वारादि हों।
  24. प्रतिमा सर्वांगीण शुद्ध एवं सुन्दर हो। बिना पालिश की देखें और देखने के बाद पालिश करायें।
  25. प्रतिष्ठापाठ एवं वास्तु विज्ञान का उपहास पूर्वक निषेध न किया जावे। निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध मात्र को मिथ्यात्व मान लेना ठीक नहीं।
  26. पानी छानने की व्यवस्था हेतु एक मजदूर लगायें, उसे समझाकर दया पालन करावें।
  27. किसी मजदूर या व्यापारी को लेन-देन में परेशान न करें। किसी व्यक्ति का शोषण न हो पाये-ऐसा ध्यान रखें।
  28. चित्रकारी एवं लिखाई अत्यधिक न करायें । रंग गहरे न भरें। चित्रों में मुद्रा सादा एवं शीलयुक्त हो । वस्त्र पदों की मर्यादा के उपयुक्त हों।
  29. खिड़की, दरवाजे, फर्श गहरे रंग के डिजायनदार न बनायें, क्योंकि उनमें सफाई करते समय जीव दिखाई नहीं देते एवं सफाई में समय अधिक बर्बाद होता है।
  30. मंदिर निर्माण के साथ ही स्वयं की निवृत्ति का संकल्प कर लेना अथवा उसकी संभाल के लिए एक निवृत्त व्यक्ति खोजकर रख लेना अति आवश्यक है।
  31. मंदिरजी में पूजन, पाठशाला, स्वाध्याय, सत्समागम, आयोजन, साधर्मी व्यवस्थाओं में कंजूसी पूर्वक उपेक्षा कदापि न करें।
  32. अलग-अलग व्यवस्थाओं के लिये अलग-अलग फण्ड एवं सैद्धांतिक दृढ़ता एवं व्यवहारिक उदारवृत्ति वाले प्रभारी बनायें।
  33. मूर्तियाँ अधिक विराजमान न करें। अनावश्यक रचनाएँ (समवशरण, नंदीश्वरादि) न बनायें।
  34. निर्माण में यत्नाचार, विवेक, दया, क्षमा आदि का ध्यान रखें।
  35. विस्तृत लक्ष्य भले रखें, परन्तु अनावश्यक दबाव पूर्वक चन्दादि करके आयोजनों में मिथ्याप्रदर्शन, धन, कागज, फ्लैक्स आदि बर्बाद न करें।
  36. मंदिर जी में दैनिक उपयोगी, नैमित्तिक उपयोगी, मासिक पत्र-पत्रिकाओं तथा दुर्लभ ग्रंथों को यथास्थान अलग अलग विराजमान किये जाने की उचित व्यवस्था करें।
  37. पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के सभी पात्र व्यसन एवं लोकनिंद्य कार्यों के त्यागी हों। प्रतिदिन या कम से कम सप्ताह में एक या दो दिन पूजन, मंदिरजी की वैयावृत्ति का नियम अवश्य करें।
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42. गृह निर्माण निर्देश :arrow_up:

  1. गृह जिनमंदिर के समीप बनायें। पड़ोसी अच्छे आचार-विचार वाले हों। बाजार, बैंक, विद्यालय आदि भी समीप ही देखें।
  2. पर्याप्त कमरें हों। एक कमरा ऐसा भी बनायें जिसमें लैट-बाथ, रास्ता, खुली छत अलग से हो, जहाँ कोई साधर्मी रुक सके। उसकी एवं घर की मर्यादा बनी रहे।
  3. रसोई में पर्याप्त स्थान हो, स्वाभाविक प्रकाश हो, जहाँ बनाने एवं भोजन करने का पृथक-पृथक एवं जुड़ा हुआ स्थान हो; जिसमें त्यागी भी भोजन कर सकें । उनको भोजन बनता हुआ भी दिखता रहे । प्रातः एवं सायं दोनों समय सूर्य का प्रकाश आता रहे, ऐसी खिड़की या छत में जाल बनायें।
  4. रसोई के समीप शौचालय कदापि न बनायें।
  5. स्नानागार में गीजर या फुब्बारा न लगायें।
  6. एक कक्ष स्वाध्यायादि के लिए अलग से बनायें, जिससे जिनवाणी की विनय, भावों की विशुद्धता एवं मर्यादा बनी रहे।
  7. प्रदर्शन की भावना से अतिरिक्त साज सज्जा, विद्युत-बल्ब, पंखादि न लगायें।
  8. गहरे रंग की पुताई, डिजायनदार फर्श, खिड़की, रेलिंग आदि न लगायें।
  9. छत पर बाउण्ड्री पर्याप्त ऊँची, छोटी जाली या झरोखों सहित बनायें जिससे आड़ भी रहे और हवा भी रहे।
  10. सुरक्षा, सुविधा, एवं स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। कमरों में आवश्यक अलमारी, टांड, रैक भी लगावें, जिससे सामान रखने में सुविधा रहे।
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43. यात्रा, धर्मशाला, विश्राम स्थल निर्देश :arrow_up:

  1. स्वच्छता का ध्यान रखें। सार्वजनिक सम्पत्ति को न चुराएँ, न खराब करें।
  2. सुविधाओं का सदुपयोग सावधानी पूर्वक ही करें। आगे आने वाले लोगों का भी ध्यान रखें। ऐसा न हो कि उन्हें ऐसा लगे कि कौन असभ्य इस स्थान को गंदा कर गया या वस्तु खराब कर गया।
  3. चाहे कहीं न थूकें । गंदगी, छिलके, कूड़ा चाहे कहीं न डालें।
  4. लैट्रिन, बाथरूम, वॉशवेसन में पानी अवश्य डालें।
  5. शुल्क एवं टिकिट चोरी न करें।
  6. असभ्यता पूर्ण बातचीत (गाली आदि, अनावश्यक बोलना, अकड़ना, उपहास करना, कुदृष्टि से देखना) न करें एवं दूसरों को असुविधाकारक धूम्रपानादि क्रियाएं न करें। ताश आदि न खेलें, पैर फैलाकर गलत ढंग से न बैठें, न खड़े हों, न लेटें, न चढ़ें, न उतरें आदि।
  7. अनावश्यक कर्जा कभी न लें एवं कर्जा लेकर न देने की नियत कदापि न बनायें।
  8. पुस्तकालय आदि से पुस्तक या कहीं से कोई वस्तु लाकर सदुपयोग के बाद नियत समय पर व्यवस्थित रूप से लौटाएँ।
  9. सरकारी टैक्स, यातायात, प्रवासादि सम्बन्धी नियमों का यथाशक्ति पालन करें। भ्रष्टाचार को छोड़कर शिष्टाचार अपनायें।
  10. स्थान छोड़ने से पहले ही अपना सामान देखें एवं सम्हालें। जिससे पीछे से शिकायत एवं शंका का अवकाश न रहे।
  11. स्थान ग्रहण करने से पूर्व वहाँ की समस्त सामग्री-कमरा, अलमारी आदि देख लें। यदि दूसरों की कोई वस्तु मिले तो अधिकृत स्थान पर जमा करायें।
  12. कमरों में लगे गुप्त कैमरों को भी जाँच लें एवं उनसे सावधान रहें।
  13. चाहे जहाँ, चाहे जैसे, चाहे कुछ न खायें, निंद्य वृत्ति न करें। अनुशासन का पालन करें। अपने कारण दूसरों को प्रतीक्षा न करना पड़े।
  14. अपने बिस्तर और बर्तन साथ रखें जिससे चाहे जैसे बिस्तर और बर्तनों से बचा जा सके।
  15. यात्रा में विद्वान, माइक, बड़ी टार्च साथ में ले जावें। भक्ति, प्रवचन, चर्चा कार्यक्रम व्यवस्थित रूप से होते जायें।
  16. यात्रा से पहले ही तीर्थों का परिचय, अध्ययन आदि कर लें।
  17. तीर्थयात्रा पवित्र भावना पूर्वक नियम लेकर करें । यात्रा के बीच समय का पूर्ण सदुपयोग करें।
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44. आयोजन निर्देश :arrow_up:

  1. आयोजन आवश्यक होने पर ही किये जावें।
  2. आयोजन मैत्रीभाव, दया, प्रमोदादि भावना सहित सरल एवं समर्पण भाव पूर्वक करें।
  3. नानाप्रकार से दबाव पूर्वक चन्दा करके धन संग्रह उचित नहीं है।
  4. धनार्जन के लिए न धार्मिक क्रियाओं को विकृत या गौण करें और न शिथिलाचार का पोषण करें।
  5. अन्याय, हिंसात्मक, अयोग्य व्यापार एवं भ्रष्टाचार से उपार्जित धन से बचें।
  6. नीति एवं धर्म से विरूद्ध व्यक्तियों को प्रमुखता न दें। उनका सम्मान तो कदापि न करें।
  7. तत्त्वज्ञान एवं धर्माचरण से रहित व्यक्तियों को भी धर्म मार्ग में लगाने की पवित्र भावना से ग्लानि एवं तिरस्कार न करते हुए, यथायोग्य रीति से सम्मिलित करना अलग बात है।
  8. अभिमान के वशीभूत होकर आडम्बरपूर्ण कार्य या धर्म विरुद्ध रात्रिभोजनादि न करें।
  9. आवश्यकतानुसार विद्यालय, छात्रावास, चिकित्सालय, शुद्ध भोजनालय, समाजोपयोगी उद्योग केन्द्र आदि बनायें।
  10. सादगी, मितव्यता, यत्नाचार, अहिंसा, शील की मर्यादाओं, वेशभूषा, जैन संस्कृति संरक्षण का विशेष ध्यान रखें।
  11. कार्यक्रमों में फिल्मी तर्ज पर संगीत, वेशभूषा, नृत्य, अभिनय आदि का मर्यादा के विरुद्ध प्रदर्शन न करें।
  12. कार्यक्रम से अधिक से अधिक जैन लोगों को आजीविका मिले और जैन समाज आर्थिक रूप से भी सम्पन्न बने, ऐसा प्रयत्न करें।
  13. जैन शिल्पकार, मूर्तिकार, टेन्ट, टेलर, गाडियाँ, ठेकेदार, डेकोरेशन, भोजन स्टाफ आदि तैयार करें।
  14. आयोजन समितियां, ट्रस्ट- इनके लिये पूर्व से ही जैनों को प्रेरित करें एवं आर्थिक सहयोग जुटावें। कहीं ऐसा न हो कि हमारे समाज से इन कार्यक्रमों के माध्यम से पैसा निकलता जाऐ और समाज का मध्यम वर्ग आर्थिक दृष्टि से कमजोर होता जाऐ।
  15. समाज के कमजोर वर्ग को आजीविका देने का दायित्व समाज के प्रमुख लोग सम्हालें। इसके लिये जैन बैंक, फाइनेंस कम्पनी, लघु-उद्योग केन्द्र, चिकित्सालय, विद्यालयों की राष्ट्रव्यापी शाखायें उनका सरकारी प्रारूप, जैसे-संचालन की व्यवस्थायें बनाने में धनी लोगों को प्रेरित एवं नियोजित करें।
  16. जैन संस्थाओं में साम्प्रदायिक भावना से योग्य व्यक्तियों की उपेक्षा न करते हुए भी जैन ईमानदार एवं सदाचारी लोगों को प्रमुखता दें।
  17. अनुष्ठानात्मक आयोजनों की अपेक्षा ज्ञान प्रधान आयोजन अधिक करें, जिससे समाज का बौद्धिक स्तर ऊँचा हो।
  18. धार्मिक, नैतिक, चिकित्सा, योग, शिक्षा, व्यापार, सर्विस एवं अन्य समस्याओं के निराकरण हेतु सलाह प्रकोष्ठ बनायें।
  19. जैनों की सामाजिक प्रतिष्ठा की वृद्धि के लिए लोकोपकारी कार्य भी करें। हमारी पहिचान बने कि जैन भ्रष्टाचारी नहीं होते।व्यापार, सर्विस, मिशन आदि में ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग, सेवा के आदर्श स्थापित करें, जिनसे प्रभावित होकर दूसरे लोग जैनधर्म के प्रति हृदय से आकर्षित हों।
  20. शोषण, अन्याय, रूढ़ियों एवं कुरीतियों के विरुद्ध अभियान चलायें।
  21. जो वास्तव में आराधना एवं साधना में लगे हैं, उनकी अनुमोदना एवं सर्वप्रकार से सहयोग करें, उन्हें बाह्य आरम्भपूर्ण व्यवस्थाओं में न उलझायें। उनकी भूमिका के योग्य उचित विकल्पों की पूर्ति के लिए स्वयं दायित्व सम्हालें एवं अनुचित विकल्पों का विनय पूर्वक दृढ़ता से निषेध करें और न कर सकें तो कम से कम मध्यस्थ तो अवश्य रहें।
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45. कार्यक्रम उद्घाटन निर्देश :arrow_up:

  1. ज्ञानवृद्धि, परिणाम विशुद्धि, परस्पर वात्सल्य ही कार्यक्रम का प्रयोजन रखें।
  2. निस्पृहता, अनुशासन एवं उत्साहपूर्वक कार्यक्रम संपन्न करें।
  3. किसी प्रसंग में उत्तेजित, खिन्न और हतोत्साहित न हों।
  4. अपने कार्य को निष्ठापूर्वक करते हुए, दूसरों के कार्य में भी सहयोग करें।
  5. प्रतिकूल प्रसंगों में दूसरों पर दोषारोपण न करें। प्रतिष्ठा बिन्दु बनाकर कार्यक्रम में विघ्न न करें।
  6. विशेष प्रतिकूलता आने पर भी माध्यस्थ ही रहें, परन्तु अंतरंग प्रीति पूर्वक परोक्षरूप से ऐसा सहयोग करें कि किसीप्रकार आयोजक को ठेस न पहुँचे एवं सामाजिक वातावरण विकृत न हो पावे।
  7. किसी प्रसंग में स्वयं ही श्रेय, प्रशंसा एवं पुरस्कार लेने के लिए लालायित एवं अग्रसर न हों। दूसरों को अवसर दें।
  8. नये सहयोगीजनों को उत्साहित करते हुए तैयार करें। उनका यथायोग्य सहयोग करें। दोषों का उपगूहन करें।
  9. किसी की कमियों को कदापि न उछालें।
  10. समस्त जानकारी प्रमाणिक रूप से संग्रह कर संक्षिप्त एवं स्पष्ट संचालन विनयपूर्वक करें। संचालन सफलता का प्रमुख कारण समझें।
  11. अतिरिक्त प्रदर्शन किसी प्रसंग में न करें।
  12. अनैतिक व्यक्तियों को सामाजिक सम्मान न दें, परन्तु तिरस्कार कदापि न करें। उन्हें भी जुड़ने एवं सुधरने का अवसर प्रदान करें।
  13. त्यागियों एवं विद्वानों से, धनवानों एवं नेताओं का सम्मान न करवायें।
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46. धार्मिक कार्यक्रम से शिक्षायें लें :arrow_up:

  1. अपने को ध्रुव ज्ञानानंदमय आत्मा ही समझें।
  2. भयभीत कभी न हों, सावधान सदैव रहें।
  3. अपने समान ही सर्व जीवों को समझें और सबके प्रति वात्सल्यपूर्ण व्यवहार करें।
  4. मोह, क्रोध, मान, माया, लोभ, ईर्ष्या, काम, हास्यादि दुर्भावों के वश होकर दुर्वचन न बोलें। दुष्चेष्टाऐं न करें।
  5. प्रशंसा की चाह न रखते हुए भी सदैव प्रशंसनीय कार्य करें। निंदा की परवाह न करते हुए भी निंदनीय कार्य कभी न करें।
  6. सम्यक्त्व को कभी मलिन न होने दें।
  7. देव-शास्त्र-गुरु के प्रति निष्काम भक्ति एवं हेय-उपादेय के सांगोपांग विचार पूर्वक, अंतरंग एवं बाह्यप्रवृत्ति को निर्मल रखें।
  8. अर्जित विद्या का दैनिक जीवन एवं परोपकार में सदुपयोग करें। मूढ़ताओं एवं कषायों में न उलझें।
  9. जीवनपर्यन्त श्रेष्ठ साहित्य एवं धार्मिक ग्रन्थों के अध्ययनशील रहें। नवीन ज्ञान के लिए जिज्ञासु एवं प्रयत्नशील रहें।
  10. समय-समय पर होने वाली गोष्ठियों में सम्मिलित होवें और स्वयं भी ज्ञानवर्द्धक गोष्ठियों का आयोजन करें।
  11. भ्रष्टाचार में सहयोगी भी न बनें।
  12. अन्याय से धन न कमायें, आय का निश्चित अंश दान में अवश्य खर्च करें।
  13. शील की मर्यादाओं के पालन में सतर्क रहें।
  14. कर्तव्य का पालन ईमानदारी एवं निष्ठापूर्वक करें।
  15. निंद्य कार्यों - नशा, तामसिक भोजन, मांसाहारादि से सर्वथा दूर रहें।
  16. गुरुजनों का सम्मान रखें एवं योग्य सेवा व्यवहार करें।
  17. समाज एवं देश के हित में ही सोचें।
  18. किसी प्रसंग में उत्तेजित न हों। उत्तेजना में निर्णय तो कदापि न लें।
  19. कठोरता एवं क्रूरता पूर्वक दण्ड भी न दें।
  20. भौतिकता की चकाचौंध में फँसकर धर्म, सादगी एवं संतोष को कभी न छोड़ें।
  21. अपने दोष को सहजता से स्वीकार करें। कभी कुतर्कों के द्वारा अपने दोष छिपाने का प्रयत्न न करें।
  22. प्रत्येक कार्य विवेक, विनय, यत्नाचार एवं उत्साहपूर्वक करें । प्रमाद, अहंकार, कुतर्क सर्वत्र त्याज्य हैं।
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