जीवन पथ दर्शन - ब्र. श्री रवीन्द्र जी 'आत्मन्' | Jeevan Path Darshan


26. छात्रावास, अधीक्षक निर्देश

  1. छात्रों को पुत्रवत् समझते हुए, अंतरंग वात्सल्य पूर्ण व्यवहार करें।
  2. उचित निर्देश एवं नियमावली, अभिप्राय एवं प्रयोग समझाते हुए कहें और उनको विचारने का अवसर दें।
  3. नियमावली के बिन्दुओं पर अपने-अपने विचार अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान करने के लिए सभा करायें। जिससे नियमावली एवं उसकी उपयोगिता भलीप्रकार भासित हो जाये।
  4. समझ पूर्वक ही स्थाई अनुशासन संभव है। अत: ध्यान रखें कि छात्र भयभीत न हो पायें।
  5. भय का वातावरण न बने इसके लिए अनावश्यक अत्यधिक न डाँटे, जोर से न बोलें। कोई बात जल्दी में न कहे अथवा जल्दी-जल्दी अनेक निर्देश न दें । शारीरिक प्रताड़ना तो करें ही नहीं, कहने के बाद पूछ ले कि भलीप्रकार समझ में आया या नहीं।
  6. दण्ड व्यवस्था ऐसी बनायें जिससे मानसिक विकास हो, भूल का एहसास हो अर्थात् दण्ड के रूप में अतिरिक्त अध्ययन, सफाई, पाठ जपादि करायें। धीठता करने पर सभी से सम्पर्क विच्छेद (अल्प समय के लिए) कर दें।
  7. चित्रकला, लेखन, पठनादि करायें।
  8. गलती एवं सही के नंबर (- एवं +) देते हुए कार्ड बनायें । पश्चात् मासिक, द्विमासिक दण्ड व्यवस्था करें।
  9. पाक्षिक एवं मासिक कोर्स तैयार करें। उसे निर्धारित समय में पूरा कर, उसी के आधार से प्रश्न मंच एवं अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम करायें। ज्ञान एवं अभिव्यक्ति विकास के कार्यक्रम भी करायें।
  10. भोजन एवं चर्या स्वास्थ्य के नियमों के अनुकूल रखें। किसी प्रसंग में असंतोष न बढ़ने दें।
  11. किसी की शिकायत पर सीधे ही विश्वास न करें। पूर्ण जानकारी लेकर, दोनों पक्षों को सुनकर योग्य निर्णय लें। समस्या को सुनने एवं सुलझाने की सहज प्रक्रिया अपनायें।
  12. परस्पर में विश्वास एवं वात्सल्य पूर्ण वातावरण बनायें, जिससे कोई दोष होने पर छात्र निशंकता से कह सके।
  13. छात्र की परेशानी मुद्रा से समझ में आने पर भी उसे सुलझाने की पहल स्वयं करें। उपेक्षा कदापि न करें।
  14. सर्व विषयों सम्बन्धी सत्साहित्य पढ़ने की प्रेरणा, व्यवस्था एवं अवसर दें।
  15. शारीरिक एवं मानसिक दोनों विकास का ध्यान रखें।
  16. दोनों पक्ष (जैसे - दया की प्रेरणा एवं निरर्थक और अनुचित दया का निषेध) समझायें, जिससे छात्र भावुक न बनें अपितु विवेकी बनें।
  17. कष्ट सहिष्णु बनने का अभ्यास करायें, जैसे - कभी एकान्त सेवन, कभी समूह में ही रहना, सोना, कभी देर से भोजन, कभी अव्यवस्थित भोजन, कभी अतिरिक्त कार्य, कभी खेल, कभी विश्राम आदि भी करायें।
  18. तात्कालिक सूझबूझ विकास के लिए प्रयत्न करें।
  19. दुर्घटनाओं से बचने के उपायों पर लेखन एवं भाषण करायें।

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27. ट्रस्ट, समिति, संस्थान निर्देश

  1. मोहवश अयोग्य परिवारी एवं रिश्तेदारों को सदस्य न बनाया जाये।
  2. स्वाध्याय से जुड़े सक्रिय, विवेकी एवं गम्भीर कर्तव्यनिष्ठ साधर्मीजनों को निष्पक्ष रूप से प्रमुखता दें।
  3. सदस्यों के स्थान अधिक समय रिक्त न रखें।
  4. मीटिगें नियमानुसार समय-समय पर अवश्य होती रहें।
  5. आध्यात्मिक संगोष्ठी, तत्त्वज्ञान प्रसार की प्रमुखता रहे।
  6. कुरूढ़ि एवं व्यसनमुक्ति अभियान, नैतिक शिक्षा, चिकित्सा, योग-प्राणायाम आदि शिविर भी अवश्य लगायें ।
  7. शिकायत की प्रवृत्ति छोड़कर, सहयोगात्मक एवं रचनात्मक विचार एवं वृत्ति बनाएँ।
  8. वचन एवं व्यवस्था की प्रामाणिकता रखें।
  9. जो राशि जिस कार्य हेतु आए, उसे यथासम्भव उसी कार्य में लगायें। परिवर्तन की स्थिति में दातार की स्वीकृति अवश्य लें। कार्य हो जाने पर भी दातार को सूचित करें ।
  10. योग्य व्यक्तियों को तैयार करते जायें । भिन्न कार्यों हेतु प्रभारी एवं समितियां बनाकर, प्रशासन का विकेन्द्रीकरण करते जायें। पहले से जुड़े सक्रिय तत्त्वरुचि वाले लोगों को रिक्त स्थान की पूर्ति करते समय प्राथमिकता दें।
  11. धन के लोभ से नये लोगों का शीघ्रता से अति विश्वास न करें। पद योग्य व्यक्ति का निर्णय, विवेक पूर्वक वर्तन के बाद ही करें।

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28. व्यापार निर्देश

  1. लेन-देन में अत्यन्त सावधानी वर्ते । उधार देने से भी बचते रहें। वचन का निर्वाह करें।

  2. वचन के पक्के रहें, परन्तु वचन निर्वाह का टेंशन न करें। कोई मिथ्या अनुबन्ध हो जाने पर, गुरुजनों की मध्यस्थता में सुलझायें।

  3. हिसाब (लेखा) साफ एवं स्पष्ट रखें, इसमें उपयोग सूक्ष्म रखें, विशेष रूप से देने के प्रसंग में स्वयं पहल करें।

  4. भावावेश में कोई अनुबन्ध या व्यापार न करें।

  5. अनावश्यक कर्ज न लें, कर्ज शीघ्र चुकाने की नियत एवं प्रयत्न रखें।

  6. आवश्यकता, सामर्थ्य एवं पूँजी से अधिक व्यापार कदापि न करें।

  7. निवृत्ति की भावना रखें एवं योजनाबद्ध ढंग से निवृत्ति की ओर बढ़े।

  8. व्यापार के (प्रतिदिन) घण्टे भी स्थूल रूप से निश्चित करें, विशेष परिस्थिति में छूट। शेष समय सत्संगति, तीर्थयात्रा आदि सत्कार्यों में लगायें।

  9. व्यापारादि के कारण चर्या को न बिगाड़े। नीति एवं सिद्धान्तों में शिथिलता न करें।

  10. धर्मध्यान, स्वास्थ्य, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों का भी निष्ठापूर्वक निर्वाह करें।

  11. असीमित व्यापार न बढ़ाते जायें। आय का निश्चित अंश, दान एवं परोपकार के कार्यों में अवश्य खर्च करें।

  12. भावुकता पूर्वक अपनी आमदानी से अधिक खर्च न करें। मितव्ययी बने रहें।

  13. सहायता भी अपनी शक्ति देखकर ही करें। कहीं ऐसा न हो कि बाद में अपनी उलझनें बढ़ जायें एवं व्यवहार बिगड़ जाये। मिथ्या उदारता कभी-कभी कंजूसी से भी अधिक कष्टप्रद हो जाती है।

  14. लघुजनों को उदारता पूर्वक सहयोग करें। दूसरों को भी आजीविका प्रदान करें।

  15. अपने से कमजोर लोगों का ध्यान रखें, आवश्यकतानुसार एडवांस भी दे देवें, अपने कारण उन्हें हानि न हो पाये। उनका उदारता एवं युक्ति पूर्वक सहयोग करें।

  16. अन्याय एवं शोषण कदापि न करें।

  17. दूसरों से ईर्ष्या न करें। उनकी हानि कभी न सोचें ।

  18. ऐसा व्यापार प्रारंभ ही न करें जिसका सीधा सम्बन्ध (कच्चा माल आदि) कत्लखानों आदि से प्राप्त होता हो।

  19. ऐसा व्यापार न करें, जिससे अन्य बहुत से लोगों का व्यापार छिन जाये।

  20. नकली या मिलावट पूर्ण ऐसी सामग्री न बेचें जिससे दूसरों को हानि हो।

  21. लोभवश अनैतिक या अनिश्चितता पूर्ण (अत्यधिक उतार चढ़ाव वाले) व्यापार न करें । सिनेमा, नशा, मेडिकल, जुआ, सट्टा, लॉटरी, शेयरादि के व्यापारों का त्याग ही कर दें।

  22. हिंसक एवं विलासिता की सामग्री न बेचें, दीपावली पर पटाखे आदि न बेचें। ईमानदारी, प्रामाणिकता एवं सौहार्दपूर्ण व्यवहार रखें।

  23. वैभव का मिथ्या प्रदर्शन न करें। प्रदर्शन पूर्ण आयोजनों से भी दूर रहें। आमदनी अधिक होने पर भी आवास, वेशभूषा, खान-पान में विवेक पूर्वक सादगी एवं संतोष रखें।

  24. राज्य के नियमों का पालन करें, टेक्स आदि भी उचित रीति से समय पर जमा करायें।

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29. सर्विस निर्देश

1. ऐसी सर्विस न करें, जिसमें नैतिकता का हनन हो । कुशील, हिंसादि का पोषण हो। अपने सामान्य नियमों का भी पालन न हो पावे। मन खिन्न तथा बोझिल रहे। पराधीनता एवं दीनता लगे। सामर्थ्य से अधिक कार्यभार हो, जिससे स्वास्थ्य बिगड़े या पारिवारिक व्यवस्थाएं बिगड़ें।
2. स्वच्छ छवि की प्रतिष्ठा बनाए रखें। रिश्वत लेकर अनैतिक कार्य न करें।
3. समय का ध्यान रखें, विलम्ब से आने या मनमाने ढंग से चाहे जब चले जाने की आदत न बनायें।
4. अपने विषय की प्रमाणिक एवं पर्याप्त जानकारी रखें। उचित सलाह दें।
5. सौहार्दता पूर्ण व्यवहार रखें। कार्य न कर पाने पर भी संतोष जनक उत्तर अवश्य दें।
6. दायित्व एवं अनुशासन का दृढ़ता से पालन करते हुए भी मानवता का ध्यान रखें ।
7. उत्तेजित न होवें । सत्याग्रह भी अनुशासन पूर्वक करें।
8. निर्दयता पूर्वक कठोर दण्ड न दें।
9. लोभवश अतिरिक्त समय काम, यथासम्भव न करें।
10. अत्यावश्यक न होने पर, अतिरिक्त कार्य, अधीनस्थ कर्मचारियों से न करायें।
11. एक का काम पक्षपात वश दूसरे पर न डालें।
12. चापलूसी करने वालों से सावधान रहें।

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30. अल्प बचत निर्देश

1. घर में प्रत्येक सदस्य के मन में स्वयं के धन की लालसा होती है । अत: प्रत्येक सदस्य की एक एक गोलक रखें। उनके एक-एक खाते पोस्ट ऑफिस, बैंक, बीमा में भी चलायें जो उन्हीं की गोलक की राशि से भरें।
2. उसी संग्रहीत राशि में से, दान एवं खर्च के भी संस्कार दें। ऐसा न करें कि वे आय-व्यय के सम्बन्ध में कुछ सीखें ही नहीं। मात्र खर्च के सम्बन्ध में बड़े लोगों से माँगते ही न रहें।
3. समयानुसार उचित रीति से उन्हें गृहकार्यों एवं पाठशाला आदि सम्बन्धी कार्यों, घर की व्यवस्थाओं में भी लगाएँ , रद्दी, पुटठा, प्लास्टिक, काँच, लोहा, पुराने कपड़े, अनुपयोगी वस्तुओं का संग्रह एवं स्वयं के निर्देशन में विक्रय करावें। एक दो घण्टे उनसे व्यापारादि में सहयोग लें, पैकिंग, शिल्प कला आदि सिखायें, जिससे जीवन में वे कभी बेरोजगारी के शिकार न हों। स्वतंत्र आजीविका भी चाहे जब कर सकें। पढ़ाना, कम्प्यूटरादि, खाते उतारना आदि सिखायें।
4. बच्चों को भी आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बनायें। छोटे काम करने में भी उनकी शर्म छुड़ायें।

धन का सदुपयोग

1. न्याय एवं श्रमपूर्वक सीमित कमाएँ।
2. आय-व्यय का हिसाब सूक्ष्मता से रखें।
3. व्यय के विषय लिखकर उपयोगितानुसार उनके लिए राशि निश्चित करें। जैसे - भोजन, घी, सब्जी, फल, अनाज, मसालें।
4. अनावश्यक मिष्ठान पकवानों से बचें।
5. कपड़ों, आवास, उपकरणों में सादगी रखें, परन्तु लोभवश हल्की क्वालिटी का सामान या खाद्य सामग्री नहीं लें।
6. विलासिता एवं प्रदर्शन से दूर रहें।
7. दान भी मान के वशीभूत होकर उपयोगी न होने पर नहीं दें। उपयोगी होने पर अच्छे लोगों को विवेक पूर्वक दें। बड़ी संस्थाओं और बड़े आयोजनों की अपेक्षा छोटी संस्थाओं और ज्ञान प्रधान छोटे आयोजनों को प्राथमिकता दें।
8. लोकोपकारी कार्य स्वयं करें एवं उनमें सहयोग करें।

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31. विवाह निर्देश

(सामाजिक आयोजन समझें)
1. उद्देश्य :- सामाजिक मर्यादायें, संस्कृति संरक्षण एवं संवर्धन, व्यवहार धर्म का योग्य रीति से परिपालन । समान धार्मिक विचारधारा एवं कुलपरम्परा, योग्य वय, स्वास्थ्य (शारीरिक एवं मानसिक) समझ, शील, विनय, सेवा भावना, सादगी, संतोष आदि गुणों को अवश्य देखें।
2. सम्बन्धों का चयन गुरुजन, लड़के एवं लड़की की रुचि आदि का ध्यान रखते हुए करें। दहेज आदि को मुख्य न करें।
3. चयन प्रक्रिया को प्रदर्शन न बनायें। अन्य लोगों से पूर्ण जानकारी लेने के बाद ही वार्ता प्रारम्भ करें। देखना-दिखाना यात्रा या आयोजनों में इस भाँति करें, जिससे निषेध रूप निर्णय होने पर, प्रतिष्ठा को ठेस न लगे। मितव्ययता एवं सादगी का पूर्ण ध्यान रखें। आडम्बर, विलासिता तथा मिथ्या शान से बचें।
4. उदारता, विवाहोपलक्ष्य में, लोकोपकारी, नैतिक एवं धार्मिक आयोजनों में दिखायें।
5. भोजन शुद्ध एवं स्वास्थ्य अनुकूल बनायें। वनस्पति घी, केमीकल रंग, जमीकंद, आचार, बाजारू खाद्य आदि से दूर रहें।
6. भोजन सम्मान पूर्ण विधि से स्वयं परोसें, गिद्ध भोजन पद्धति से दूर रहें।
7. मँहगे कार्ड आदि न छपवायें। मँहगी वाटिका, सजावट, बैण्ड आदि न करें।
8. अनावश्यक फोटो-वीडियो न बनवायें। किसीप्रकार का भारारोपण या खींचतान न करें।
9. संस्कृति के विरुद्ध रात्रि भोजन, रात्रि कार्यक्रम न करें।
10. दिन में, सीमित समय में, साधर्मी एवं सामाजिक प्रतिष्ठित वयोवृद्ध लोगों की उपस्थिति में, मर्यादा सहित योग्य सम्मान, दान, करुणा आदि का उदारता से निर्वाह करते हुए विधि सम्पन्न करें।
11. विवाह प्रक्रिया जैन विवाह विधि से सम्पन्न करें।
12. वर्षगाँठ या तो मनायें ही नहीं अथवा लोकोपकारी आयोजन करें।

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32. शिशुपालन निर्देश

1. शिशु गर्भ में आने पर ब्रह्मचर्य से रहें । सदैव प्रसन्न रहें। उत्तम विचार करें । सत्साहित्य पढ़ें। भक्ति, स्वाध्याय, सामायिकादि करें।
2. अधिक उपवासादि न करें।
3. लोह, कैल्शियम, विटामिनयुक्त पोषक आहार लें। लोहे की कढ़ाई में सब्जी आदि बनायें। चना, गुड़, मूंग, जौ, संतरा, आँवला, नारियल, अनार, दूधादि का आवश्यकतानुसार प्रयोग करें।
4. गिलोय, चंदन, इलायची, सौंफ, मुलहठी आदि का प्रयोग करें।
5. आवश्यक सौम्य औषधियाँ वैद्य की सलाह अनुसार लें।
6. गरिष्ठ, वासी, बाजारू भोजन, रिफाइन्ड तेल, चाय, तीक्ष्ण औषधियों से बचें।
7. उचित रीति से गृहकार्य श्रम (चक्की चलाना आदि) व्यायाम एवं प्राणायामादि उचित ढंग से करें। लड़ाई, अश्लील हँसी-मजाक, शील विरुद्ध ड्रेस-श्रृंगार आदि करें तो नहीं, देखें भी नहीं।
8. भगवन्तों, संतो एवं महापुरुषों की सौम्य प्रभावक तेजमय मुद्रा को निहारें एवं विचारें ।
9. वस्त्र ढीले पहनें, संयत चाल से चलें।
10. भक्ति, दान, सेवा, परोपकार आदि के कार्य अवश्य करें।
11. मन में भयभीत न रहें, कुढ़े नहीं।
12. शिशु को योग्य वात्सल्य तो दें, परन्तु अनियमित चर्या या दुष्प्रवृत्तियों से बचायें।
13. बच्चों को हीन आचरण वाले लोगों से दूर रखे। प्रारम्भ से ही अच्छी-अच्छी बातें एवं चेष्टाएँ सिखायें।
14. आलस्यवश उसे अकेला न छोड़ें।
15. अभक्ष्य, गरिष्ठ या अयोग्य खान-पान एवं फैशनेविल ड्रेस/प्रसाधनों से बचायें। पौष्टिक आहारादि नियमित समय पर, चिकित्सक की सलाह से दें।
16. शिक्षाप्रद चित्र खिलौने, पुस्तकें दिखायें । धार्मिक, नैतिक, दैनिक उपयोगी अच्छे शब्दों का परिचय करायें।
17. अनुचित ताड़नादि द्वारा भयभीत न करें।
18. अश्लील हास्य या चेष्टायें कदापि न करें।
19. बच्चा समझता नहीं, ऐसा न समझें, उसे उसकी भाषा में ज्ञान करायें।
20. गुनगुनाने के बहाने, अच्छे गीत एवं अच्छी चेष्टाएं सिखायें।
21. मालिश स्नानादि में सावधानी रखें।

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33. बाल एवं किशोर निर्देश

1. बड़ों का यथायोग्य आदर करें, परन्तु भयभीत न रहें।
2. चाहे किसी से मित्रता न करें। जो अध्ययनशील, सुशील, गम्भीर, उत्साही, साहसी, अनुशासित, अच्छे विचार वाले हों, उन्हीं की संगति करें।
3. अश्लील या निम्नस्तरीय साहित्य न पढ़े। अखबारादि में भी अच्छे विषय ही अल्प समय में देखें। रुचि पूर्वक उनमें समय न खोयें। इसीप्रकार टी.वी., मोबाईल, कम्प्यूटर (फिल्मों) आदि में विवेक रखें।
4. अध्ययन, गृहकार्य (होमवर्क) आदि किसी भी कार्य में आलस्य कदापि न करें।
5. धार्मिक, नैतिक एवं स्वास्थ्यादि सम्बन्धी साहित्य अवश्य पढ़ें।
6. सर्वत्र नियम एवं अनुशासन का यथासंभव पालन करें।
7. जुआ, नशा, अश्लील हँसी, चेष्टाओं एवं फिजूलखर्चे से दूर रहें।
8. सभी के प्रति सहयोगात्मक शैली अपनायें, परन्तु अपनी चर्या की उपेक्षा करते हुए, भावुकता पूर्वक नहीं।
9. सादा एवं शील युक्त वस्त्र पहनें। अपने घर की आय एवं मर्यादाओं का ध्यान रखें।
10. उधार लेने की प्रवृत्ति न बनायें ।
11. किसी की अनुचित नकल या किसी से ईर्ष्या न करें।
12. भोजन समय पर, प्रसन्नता पूर्वक, सात्विक एवं पौष्टिक करें।
13. अत्यंत मँहगी विलासिता की सामग्री का उपयोग कदापि न करें।
14. स्वच्छता की आदत बनायें। शरीर, स्थान, वस्त्र, कॉपी, पुस्तकें अथवा कोई भी सामग्री गंदी न रखें। चाहे जहाँ न रखें।
15. स्नान, मालिश, प्राणायाम, व्यायाम आदि नियम पूर्वक, उचित ढंग से करें।
16. अयोग्य विचार ही न करें, तब वचन और चेष्टायें स्वयं प्रशंसनीय होगी।
17. विनय एवं सेवा भावना रखें।
18. आत्म प्रशंसा एवं पराई निंदा न करें और न उत्साह पूर्वक सुनें।
19. छिपाकर कार्य करने की प्रवृत्ति न बनायें।
20. अपनी परिस्थिति, योग्यता और क्षमता के अनुसार ही निर्णय लें । हवाई किले न बनाते रहें।
21. किसी कार्य को छोटा न समझें । बड़ी-बड़ी योजना बनाते हुए छोटे कार्य को न निषेधे ।
22. सहनशील बनें। क्रोध की प्रवृति न बनायें। अल्प एवं मिष्ठभाषी बनें।
23. सदाचार, शील निर्देशिका, सामाजिक व्यवहारादि को समझें, पालें एवं उनका प्रसार करें।
24. विनम्रता एवं निष्पृहता पूर्वक सहयोग दें और श्रेय देते हुए दूसरों से युक्ति पूर्वक सहयोग लें।
25. याद रखें - धन, समय, बुद्धि आदि का दुरुपयोग पतन का द्वार खोलता है।
26. अपने साथ किसी भी प्रकार का अनैतिक व्यवहार होने पर घर आकर गुरुजन या अभिभावकों को शीघ्र ही अवगत करावें जिससे उसकी पुनरावृत्ति न हो पावे।
27. बड़ी से बड़ी गलती हो जाने पर भी, गुरुजनों से छिपाकर टेंशन (तनावग्रस्त) न करें, न घर छोड़कर कहीं भागें और आत्मघात की तो सोचें ही नहीं। धैर्य पूर्वक समस्या का समाधान करें।

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34. युवा निर्देश

1. जीवन का स्वर्णिम समय, उत्साह पूर्वक आराधना एवं प्रभावना करने का अवसर युवावस्था है।
2. जोश में होश न खोयें। किसी प्रसंग में गुरुजनों की उपेक्षा न करें। गुरुजनों से कुछ न छिपायें।
3. दूसरों को गिराकर स्वयं ऊपर उठने का प्रयत्न कदापि न करें।
4. ईर्ष्या, उत्तेजना, तृष्णा, विषयासक्ति से बचें, प्रदर्शनादि की भावना से दूर रहें।
5. अत्यधिक संकोची प्रवृत्ति न बनायें।
6. छोटे काम करने में हीनता न समझें।
7. योग्यता एवं क्षमता हो तो नेतृत्व दें, अन्यथा अनुशासन में रहकर कार्य करें।
8. व्यसनों, विकथा, मिथ्या प्रशंसकों एवं स्वार्थीवृत्ति वाले लोगों से दूर रहें।
9. प्रत्येक क्षेत्र में नियम अवश्य बनायें और उनका विवेक पूर्वक पालन करें।
10. क्षण-क्षण में निर्णय न बदलें । अप्रामाणिक सिद्ध न हों।
11. निरंतर अध्ययनशील रहें। उपयोगी सामान्य जानकारी हर क्षेत्र में रखें और अपने विषय की अधिकृत जानकारी रखें।
12. समय, शक्ति, धन और सभी साधनों एवं सुविधाओं का सदुपयोग करें।
13. भावुकता छोड़कर, विचार एवं योग्य सलाह पूर्वक निर्णय करके ही कोई कार्य करने की आदत बनायें।
14. अल्प एवं योग्य वचन उचित समय पर बोलें।
15. योग्य के साथ व्यवहार कुशल, सेवाभावी, विनम्र, संतोषी एवं सरल भी बनें।
16. अनैतिकता से धन न कमायें। तृष्णा से दूर रहें।
17. दूसरों को आजीविका मिले, ऐसी लोकोपकारमय आजीविका चुनें।
18. आमदानी का अंश एवं अपना समय अच्छे कार्यों में अवश्य लगायें।
19. गुरुजनों की अवहेलना कदापि न करें। उनसे स्वयं को श्रेष्ठ समझने की भूल न करें। उनके अनुभवों का लाभ उठायें।
20. न प्रमादी बनें, न अत्यधिक श्रम करें। स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
21. सम्यक् अभिप्राय, व्यवस्थित चर्या, सूक्ष्म उपयोग रखते हुए प्रशंसनीय बनें।
22. आत्म निरीक्षण करते हुए आध्यात्मिक उन्नति का भी पुरुषार्थ करें।
23. सहजता एवं सहनशीलता कभी न छोड़े।
24. अच्छे कार्यों की अनुमोदना एवं दूसरों के सद्गुणों की प्रशंसा अवश्य करें।
25. धार्मिक एवं अन्य विषयों की श्रेष्ठ पुस्तकें अवश्य पढ़े और पढ़ायें।
26. नैतिकता एवं धार्मिकता का प्रसार करें और करायें।

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35. बच्चों को छोटी उम्र में बाहर भेज देने के दुष्परिणाम

1. बच्चे पारिवारिक वात्सल्य एवं संस्कारों से वंचित रह जाते हैं।
2. भलीप्रकार से पोषण न हो पाने से जीवन पर्यन्त के लिए स्वास्थ्य कमजोर हो जाता है।
3. शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाने से रोग का आक्रमण जल्दी-जल्दी होने की सम्भावना रहती है।
4. माता-पिता केवल आवश्यकता पूर्ति के साधन रह जाते हैं। बच्चों का सहयोग मिलना नगण्य हो जाता है।
5. कुसंगति में नशा, जुआ, कुशील, स्वार्थ, महत्वाकांक्षा आदि दुर्गुणों की सम्भावना रहती है।
6. आधुनिक सुविधाओं और निश्चित व्यवस्था में रहने के अभ्यस्त हो जाने से पारिवारिक वातावरण रहन-सहन के प्रति उपेक्षा हो जाती है।
7. प्रेम विवाहों की सम्भावना कई गुनी बढ़ जाती है।
8. संयुक्त परिवार टूटते हैं।

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36. नारी निर्देश

1. कन्या को देहरी दीपक कहा है, अत: उसके पालन पोषण एवं संस्कारों के प्रति उपेक्षित व्यवहार न करें।
2. दूषित सौन्दर्य प्रसाधन, दर्द निवारक, मासिक धर्म रोकने हेतु गोलियाँ, गर्भनिरोधक गोलियाँ, शीलविरुद्ध साहित्य या अन्य सामग्री घर पर न लायें । गर्भपात आदि न करायें।
3. सत्साहित्य, चित्रादि अवश्य रखें।
4. स्वास्थ्य घातक खाद्य सामग्री घर में न लायें। मासिक अशुद्धि के समय मर्यादाओं का सावधानी पूर्वक पालन करें।
5. व्यापार या सर्विस अति आवश्यक होने पर ही करें।
6. अपना समय, शक्ति एवं बुद्धि पारिवारिक एवं सामाजिक उत्थान में लगायें।
7. महिलाओं के विकास के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, घरेलू कर्तव्य शिक्षा, सिलाई, कढ़ाई आदि के शिविर आयोजित करें। रचनात्मक कार्य करें।
8. सच्चरित्र नौकरों का सहयोग भले लें, परन्तु उनका अन्तरंग प्रवेश वर्जित रखें। उनका अति विश्वास न करें। उनके सामने अपनी व्यक्तिगत एवं आर्थिक स्थिति न कहें।
9. बच्चों को भी पूर्णत: उन्हीं के भरोसे न छोड़े, विशेषतः लड़कियों को।
10. बच्चों के भोजन, अध्ययन, खेल, संगति, शयन, बोलचाल आदि का सूक्ष्म निरीक्षण करती रहें। इन कार्यों के समय उपस्थित भी रहें।
11. आय-व्यय का हिसाब अपना तो रखें ही, बच्चों को भी आय-व्यय का हिसाब रखने की आदत डालें।
12. अपने जीवन से सभ्यता एवं नैतिकता की शिक्षा दें अर्थात् कहें कम, प्रवृत्ति से अधिक दिखावें । सभ्य भाषा बोलें, मर्यादा से बोलें, बैठे, खायें, पियें, सोयें, पहनें, । बड़ों की विनय एवं सेवा करें, जिससे बच्चे स्वयं सीखेंगे।
13. बच्चों को उचित ढंग से समझायें, अधिक डाँटें या मारे नहीं।
14. स्वच्छता एवं शुद्धता का ध्यान रखें, जिससे घर अनुशासित एवं स्वच्छ दिखे।
15. सामान्यतः प्रमादवश मल-मूत्र सोखने वाले वस्त्र, चड्डी (डायपर) आदि न स्वयं पहिने, न बच्चों को पहिनायें।
16. सर्वप्रकार की खाद्य सामग्री घर में यत्नाचार एवं विवेक पूर्वक शुद्ध स्वयं तैयार करें और करायें। ऐसे केन्द्र भी बनायें जहाँ दूसरों की आजीविका चले और शुद्ध सामग्री स्वयं तथा दूसरों को उपलब्ध हो सके। इसमें लोभ त्याग अनिवार्य है।
17. आधुनिक साधनों टी.वी., कम्प्यूटरादि का अति विवेक पूर्वक ही उपयोग करें।
18. शील निर्देशिका का भलीप्रकार अध्ययन कर शील संरक्षण में सावधान रहें।
19. सदाचार नियमावली एवं अन्य निर्देशिकाओं को समय समय पढ़ती-पढ़ाती रहें। उनका पालन करें और यथाशक्ति करायें, परन्तु उनके कारण क्रोध, तिरस्कार, घृणा आदि कदापि न करें।

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37. प्रौढ़ एवं वृद्धजन निर्देश

1. बाह्य उपाधियों को सीमित करते जायें।
2. व्यापार एवं व्यवहार सम्बंधी उत्तरदायित्व बच्चों पर छोड़ें।
3. बच्चों को योग्य निर्देशन दें। समय-समय पर निरीक्षण करते रहें एवं किसी बिगड़ते हुए कार्य को भी ऐसे सम्हालें जिससे बच्चों की प्रतिष्ठा बढ़े और उनके हृदय में आपके प्रति आदर भी बढ़े। इसके लिए पूर्व से अनुभव, पूर्व तैयारी, सूक्ष्म उपयोग, उदारता, क्षमादि गुण, प्रभावशाली (समाज, शासन प्रशासन सम्बन्धी) व्यक्तियों से सम्पर्क रखें।
4. दानादि भी न अंतिम समय के लिये छोड़ें और न भावुकतावश सब पहले ही छोड़ दें। दूसरों की बातों को सुनते हुए भी निर्णय विवेक पूर्वक स्वयं लें।
5. बाह्य त्याग परिस्थिति अनुसार करें । देह से भी निर्मम होते हुए अयोग्य व्यवस्थाओं, चिकित्सा आदि को नियमपूर्वक निषेधे । समाधि के लिए अंतरंग से तैयार एवं उत्साहित रहें।
6. विशेषतः अध्ययन एवं स्वाध्याय में लगे रहें।
7. धर्मायतनों की यथाशक्ति सेवा करें और करायें। समाज सेवा के कार्यों में योग्य सलाह दें एवं अपने प्रभाव का सदुपयोग करें। चमत्कारों, तांत्रिकों एवं ठगों के चक्कर में प्रलोभन या भयवश न फंसे और न किसी को फसायें।
8. स्वास्थ्य एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहें।
9. संयम के पथ पर यथाशक्ति बढ़ें। द्रव्य संयम के साथ ही भाव संयम विशुद्धि (अहिंसा क्षमादि गुणों) को प्रमुखता दें।
10. प्रपंचों या विरोधों में न उलझें। निस्पृह एवं मध्यस्थ रहें। अल्प एवं योग्य वचन के अतिरिक्त अधिक से अधिक समय मौन रहकर साधना में लगायें।
11. परिग्रह के साथ-साथ व्यवहार भी सीमित करते जायें। जीवन को सार्थक करें, मात्र पूरा नहीं।

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38. सेवा निर्देश

  1. सेवा करने से पहले सेवा का स्वरूप एवं प्रक्रिया अवश्य पढ़ें, सुनें एवं समझें।
  2. सेवा निष्पृह भाव से, सौभाग्य मानते हुए करें, अंतरंग में वात्सल्य भाव रखें, किसी प्रसंग में अहसान न जतायें।
  3. सेवा, विवेक और यत्नाचार पूर्वक ही करना चाहिए, सेवा करते समय विकथा या असावधानी कदापि न करें।
  4. योग्य काल में धैर्य एवं साधना में सहयोगी उचित सेवा ही कार्यकारी है।
  5. सेव्य की संतुष्टि का ध्यान रखें। जागृत उपयोग पूर्वक उसकी बात सुनें, प्रसन्न करने वाला योग्य उत्तर दें। अयोग्य इच्छा का भी निषेध इसप्रकार करें जिससे उसे क्षोभ न हो। तीव्र कर्मोदय में उसके द्वारा अयोग्य व्यवहार भी हो तो उसे शांति से सहन करते हुए, उसकी उपेक्षा कदापि न करें।
  6. धार्मिक सम्बोधन भी कोमलता पूर्वक प्रसंग के अनुसार करें। भक्ति, पाठ, प्रवचन आदि की कैसिट, रुचि के अनुसार लगायें।
  7. उसके संयम-नियम को मोह, मानादिवश मायाचार करते हुए बिगाड़ें नहीं। प्रत्येक परिचर्या उसके संयम के अनुकूल ही करें। जैसे - त्याज्य वस्तु खाने को औषधि में भी न दें। मर्यादा भंग न करें। कपड़े धोने हों तो अनछने पानी से अथवा अधिक साबुनादि लगाकर न धोवें या छिपाकर धोबी आदि से न धुलवायें।
  8. उसके स्थान पर गंदगी न रखें । ग्लानि छोड़कर सफाई रखें। सभी कार्य समय पर करें। कार्य दूसरों से कह कर भूल न जायें, यह भी देखें कि कार्य हुआ है या नहीं। किसीप्रकार बहाने बनाते हुए बचने का प्रयत्न न करें।
  9. मात्र इच्छापूर्ति में ही सहायक न हों, उसके धर्मध्यान में सहायक हों।
  10. अनजान बने रहने का नाटक करते हुए कुतर्क न करें। किसी प्रकार कषाय के प्रसंग उपस्थित न होने दें। हर प्रकार से योग्य व्यवहार करते हुए, उसकी प्रतिभा एवं क्षमता का सदुपयोग करायें। अयोग्य व्यवहार से उसे थकायें नहीं। वातावरण अच्छा रखें।
  11. सामने विनय और मिष्ट वचन बोलें, परन्तु पीछे निंदा करें यह ठीक नहीं है।
  12. दूसरों के कहने मात्र से ही शंका करना कदापि उचित नहीं। स्वयं निर्णय करें।
  13. अनावश्यक सेवा प्रमाद या अभिमान की पोषक होने से त्याज्य है।
  14. सेवा पुण्य प्रमाण ही होती है,अधिक सेवा की चाह सर्वथा अनुचित है। सेवा को हस्तावलम्बन समझकर, शीघ्र ही स्वावलम्बी होना उचित है। सर्वथा पराश्रित हो जाना क्लेशकारक ही समझें।
  15. सेवा कराने के लिए भी संतोष, क्षमा, सहनशीलता, विवेक, तत्त्वविचार आवश्यक है। क्षण-क्षण में झुंझलाने, चिल्लाने, टोंकने (विशेषत: दूसरों के सामने तिरस्कृत करने) से सेवा करने वाले में श्रद्धा एवं आदर भाव नहीं रह पायेगा, वह हतोत्साहित होकर हट जायेगा, आपका निंदक हो जायेगा।
  16. व्यक्ति के समक्ष दूसरे की अत्यधिक प्रशंसा करते रहने से भी उसमें हीन भावना अथवा ईर्ष्याभाव जग जाता है, जिससे वह दूर हो जाता है।

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39. रोगी सेवा निर्देश

  1. रोगी से आन्तरिक स्नेहपूर्ण व्यवहार करें।
  2. मृदुभाषा में अल्प बोलें।
  3. शारीरिक एवं मानसिक विश्राम एवं सन्तुष्टि का विशेष ध्यान रखें।
  4. रोगी को अनावश्यक अकेला न छोड़ें। उसकी परिचर्या उसके नियत समय के अनुसार ही करें। किसी प्रकार का छल या प्रमाद न करें।
  5. सेवा का प्रदर्शन एवं कमरे में भीड़ या विकथा न होने दें।
  6. रोगी के औदायिक भावों एवं चेष्टाओं को सहन भी करें, उपगूहन भी करें।
  7. भोजन का न आग्रह करें, न अति करें। विवेक पूर्वक ही व्यवहार करें। धैर्य एवं सन्तुलन न खोयें।
  8. पानी औषधि का विशेष ध्यान रखें। बर्तन वैसे ही न पड़े रहने दें। व्यवस्थित एवं साफ करके ही रखें।
  9. थूकने, वमन, पट्टी आदि के बर्तन, कपड़े अलग रखें, उन्हें भी स्वच्छ रखें।
  10. वस्त्र पहनने, बिछाने, ओढ़ने, पोंछने के स्वच्छ एवं छोटे बड़े सुविधानुसार रखें। पुराने कपड़े भी धुले हुए रखे रहें, जिससे पट्टी, पसीना पोंछने में परेशानी एवं अपव्यय न हो।
  11. व्यवस्था दूसरों पर ही न छोड़ें और दूसरों से कहकर निश्चिंत तो कदापि न होवें । जानकारी अवश्य रखें।
  12. चिकित्सा एवं सेवा योग्य वैद्य के परामर्शानुसार ही करें। चाहे किसी की सलाह-अनुसार, चाहे कुछ न करने लगे।
  13. आयुर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति को भलीप्रकार समझकर सुमेल रखें। कभी कुछ काढ़े आदि आयुर्वेदानुसार और कभी रस एवं फल प्राकृतिक अनुसार न दें। पट्टी, एनीमा आदि का प्रयोग भी चिकित्सक से पूछकर ही करें।
  14. एक्यूप्रेशर, चुम्बकीयादि पद्धतियों का अवलम्बन विवेक पूर्वक लेवें।

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40. समाधिमरण निर्देश

साधक निर्देश :-

  1. प्रयोजन परक स्वाध्याय करते हुए, आधि-व्याधि-उपाधियों से रहित सहज समाधि स्वरूप शुद्धात्मा को समझें एवं बारम्बार शुद्धात्म भावना भाएं।
  2. परिग्रह एवं पदों का त्याग कर दें।
  3. समस्त प्रकार के लौकिक व्यवहारों से विरक्त हों।
  4. विषयों से विरक्त होकर संयम धारण करें।
  5. लौकिक दृष्टि वाले जीवों की संगति से दूर रहें।
  6. साधर्मीजनों से सीमित चर्चा करें। विकथा को कदापि प्रोत्साहित न करें।
  7. तीर्थयात्रा, दानादि सम्बन्धी प्रशस्त विकल्पों से भी निवृत होकर निशल्य हो जायें। सर्वत्र राग एवं बैरादि का विसर्जन अनिवार्य है। सर्वप्रकार के हस्ताक्षरों, चाबी, जानकारी से मुक्त हो जायें।
  8. चिरपरिचितों के मध्य में सामान्यतः नहीं रहें।
  9. निर्यापक का चयन कर उसी के निर्देशन में रहें।
  10. वस्त्र, भोजनादि भी सीमित कर लें।
  11. देह छूटने के समय का आयुर्वेद एवं ज्योतिष सम्बन्धी लक्षणों से अनुमान करते हुए, विवेक पूर्वक समय सीमा सहित त्याग करते हुए, परिणामों में समता का विशेष ध्यान रखें।
  12. कोई असाध्य रोगादि होने पर भी कुशल चिकित्सकों के परामर्शानुसार विशेष संक्लेशकारी वेदना न हो पाये, ऐसे बाह्य संयम के अनुकूल उपचारों को सहजता से स्वीकार कर लें, हठ न करें।

परिचारक निर्देश :-

  1. उचित सेवा, योग्य संबोधन, अनुमोदन एवं स्वयं समाधि की भावना करते हुए, उत्साह पूर्वक समाधि करायें।
  2. साधक को सर्वथा अकेला न छोड़ें। इतने समीप ही दूसरा व्यक्ति बैठा रहे कि उसके इशारे से तुरन्त आ जाये। रात्रि में भी एक व्यक्ति जागता रहे।
  3. सामान्यतः भी चर्या के लिए सूक्ष्म उपयोग एवं सावधानी रखें। स्वयं ही यथा समय सहयोग करें। उसे कहना न पड़े।
  4. यदि कहीं जाना पड़े तो मात्र दूसरे से ही न कह जाऐं, साधक को भी कहकर जायें और दूसरे व्यक्ति को अपने सामने ही प्रशिक्षित करके जायें।
  5. भोजन, पानी, औषधि आदि के त्याग में शीघ्रता न करें, क्रमशः थोड़े-थोड़े समय के लिए ही करायें। ऊपरी योग्य उपचार करते रहें, जिससे तीव्र वेदना भी न हो पाये और कषाय का प्रसंग भी न बने।
  6. धर्म के और साधक के प्रतिकूल न तो वचन बोलें, न चेष्टा ही करें। मन में भी न विचारें क्योंकि मन के विचारों का निमित्त-नैमित्तिक रूप से प्रभाव देखने में आता है।
  7. साधक के समीप विकथा न करें और न प्रमाद सहित अयत्नाचार सहित प्रवृत्ति करें। स्वच्छता एवं व्यवस्था बनाये रखें।
  8. मोह के निमित्तों को दूर ही रखें।
  9. वैराग्य एवं भेदज्ञान पोषक ही पाठ एवं स्वाध्याय करें। स्वर्गों या भोग-श्रृंगार, युद्धादि के आगम प्रसंगों को भी न पढ़ें। यदि सुनकर निदानादिरूप परिणाम हो गये तो समाधि नहीं हो सकेगी।

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41. जिनमंदिर निर्माण निर्देश

  1. जिनमंदिर आवश्यक होने पर ही बनायें।
  2. स्थान का चयन अत्यंत विचार पूर्वक करें, जहाँ का वातावरण शान्त हो एवं श्रावकों के समीप हो । स्थान विवादास्पद न हो,जबरन कब्जा न करें।
  3. शक्ति अनुसार स्थान अत्यन्त बड़ा लें, जिससे वहाँ मंदिर, कॉलोनी, बाल-वृद्ध-महिला आश्रम, धर्मशाला, छात्रावास, मुमुक्षु निवास, अतिथिगृह आदि बनाये जा सकें। साधनों के अभाव में अस्थाई व्यवस्था बना लेवें।
  4. व्यवस्था एवं सुरक्षा की दृष्टि से मंदिरजी से जुड़ी एक संस्था अत्यन्त आवश्यक है, जहाँ दो चार साधर्मी रह सकें। आवास व्यवस्थित एवं स्वच्छ बनायें।
  5. नक्शा ऐसा बनायें, जिससे स्वाध्याय, पाठशाला, पूजन विधान निराकुलता से हो सके।
  6. सांस्कृतिक कार्यक्रम, सामूहिक बैठक (मीटिंग) आदि के लिए अलग स्थान हो। स्नान, पूजन-सामग्री, धोती-दुपट्टा आदि का स्थान ऐसा हो जो वेदी, प्रवचन लांघकर न निकलना पड़े।
  7. वेदी पूरी तरह से बंद हो, जिससे छिपकली, चूहे आदि जीव जन्तु श्री जी को स्पर्श न कर सकें, वहाँ गंदगी न कर सकें।
  8. मंदिर जी की दीवाल से लगाकर बाथरूम, लेटरिन या इनसे सहित कमरे न बनायें।
  9. त्यागी, विद्वानों हेतु मंदिर से हटकर कक्ष बनावें।
  10. पुजारी, माली आदि कर्मचारी-सदाचारी हों, यदि मंदिर परिसर में उनके निवास हों तो ध्यान रखें वह बीड़ी, जर्दा, गुटखा, आलू-प्याज आदि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन न करते हों और न ही टी. व्ही. आदि की आवाजों से वहाँ का वातावरण दूषित करते हों।
  11. धोती-दुपट्टा सुखाने का स्थान सुरक्षित छायादार हो।
  12. वाहन खड़े करने एवं जूता-चप्पल उतारने हेतु पर्याप्त सुरक्षित स्थान हो।
  13. ऐसी मजबूत व्यवस्था करें कि मंदिरजी में चिड़िया आदि पक्षी प्रवेश न कर पावें। खुले स्थानों पर द्रव्य चढ़ाने के लिए अच्छी जालीदार पेटियाँ रखें।
  14. वेदी में श्रीजी विराजमान हों और वहाँ कोई निर्माण कार्य चल रहा हो तो पर्दा अवश्य डाल दें।
  15. पानी एवं अन्य घोल खुले न छोड़े। सीमेंट, चूने, रंग, पेंट के दाग तुरंत साफ करा देवें।
  16. मंदिरजी में हिंसक सामग्री से उत्पन्न अशुद्ध वस्तुओं (जैसे सनमाइका, स्वर्ण वर्क, अगरबत्ती, सरेस तथा चिकना चमकदार कागज आदि) का प्रयोग न करें।
  17. जीना (सीढ़ियाँ) एवं द्वार कम से कम दो हों।
  18. हरियाली एवं अधिक लाइट कदापि न लगायें।
  19. पालिशादि में हिंसात्मक पद्धतियों का प्रयोग केवल सौन्दर्य के लिए न किया जाये।
  20. हवा एवं प्रकाश के लिए खिड़की, रोशनदान एवं जाल आवश्यकतानुसार पर्याप्त हों।
  21. जैन संस्कृति एवं पानी के जीवों की रक्षा हेतु कुआँ अवश्य हो। जिससे श्री जी के प्रक्षाल व मुनिराजों, व्रतियों के लिए शुद्ध जल प्राप्त हो सकेगा।
  22. वेदियों में रंग स्वर्ण चित्रकारी न करें, स्वर्ण वर्कों का प्रयोग कलशों पर भी न करें।
  23. वेदियाँ एक या तीन हो, वेदियों के अनुपात से ही द्वारादि हों।
  24. प्रतिमा सर्वांगीण शुद्ध एवं सुन्दर हो। बिना पालिश की देखें और देखने के बाद पालिश करायें।
  25. प्रतिष्ठापाठ एवं वास्तु विज्ञान का उपहास पूर्वक निषेध न किया जावे। निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध मात्र को मिथ्यात्व मान लेना ठीक नहीं।
  26. पानी छानने की व्यवस्था हेतु एक मजदूर लगायें, उसे समझाकर दया पालन करावें।
  27. किसी मजदूर या व्यापारी को लेन-देन में परेशान न करें। किसी व्यक्ति का शोषण न हो पाये-ऐसा ध्यान रखें।
  28. चित्रकारी एवं लिखाई अत्यधिक न करायें । रंग गहरे न भरें। चित्रों में मुद्रा सादा एवं शीलयुक्त हो । वस्त्र पदों की मर्यादा के उपयुक्त हों।
  29. खिड़की, दरवाजे, फर्श गहरे रंग के डिजायनदार न बनायें, क्योंकि उनमें सफाई करते समय जीव दिखाई नहीं देते एवं सफाई में समय अधिक बर्बाद होता है।
  30. मंदिर निर्माण के साथ ही स्वयं की निवृत्ति का संकल्प कर लेना अथवा उसकी संभाल के लिए एक निवृत्त व्यक्ति खोजकर रख लेना अति आवश्यक है।
  31. मंदिरजी में पूजन, पाठशाला, स्वाध्याय, सत्समागम, आयोजन, साधर्मी व्यवस्थाओं में कंजूसी पूर्वक उपेक्षा कदापि न करें।
  32. अलग-अलग व्यवस्थाओं के लिये अलग-अलग फण्ड एवं सैद्धांतिक दृढ़ता एवं व्यवहारिक उदारवृत्ति वाले प्रभारी बनायें।
  33. मूर्तियाँ अधिक विराजमान न करें। अनावश्यक रचनाएँ (समवशरण, नंदीश्वरादि) न बनायें।
  34. निर्माण में यत्नाचार, विवेक, दया, क्षमा आदि का ध्यान रखें।
  35. विस्तृत लक्ष्य भले रखें, परन्तु अनावश्यक दबाव पूर्वक चन्दादि करके आयोजनों में मिथ्याप्रदर्शन, धन, कागज, फ्लैक्स आदि बर्बाद न करें।
  36. मंदिर जी में दैनिक उपयोगी, नैमित्तिक उपयोगी, मासिक पत्र-पत्रिकाओं तथा दुर्लभ ग्रंथों को यथास्थान अलग अलग विराजमान किये जाने की उचित व्यवस्था करें।
  37. पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के सभी पात्र व्यसन एवं लोकनिंद्य कार्यों के त्यागी हों। प्रतिदिन या कम से कम सप्ताह में एक या दो दिन पूजन, मंदिरजी की वैयावृत्ति का नियम अवश्य करें।

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42. गृह निर्माण निर्देश

  1. गृह जिनमंदिर के समीप बनायें। पड़ोसी अच्छे आचार-विचार वाले हों। बाजार, बैंक, विद्यालय आदि भी समीप ही देखें।
  2. पर्याप्त कमरें हों। एक कमरा ऐसा भी बनायें जिसमें लैट-बाथ, रास्ता, खुली छत अलग से हो, जहाँ कोई साधर्मी रुक सके। उसकी एवं घर की मर्यादा बनी रहे।
  3. रसोई में पर्याप्त स्थान हो, स्वाभाविक प्रकाश हो, जहाँ बनाने एवं भोजन करने का पृथक-पृथक एवं जुड़ा हुआ स्थान हो; जिसमें त्यागी भी भोजन कर सकें । उनको भोजन बनता हुआ भी दिखता रहे । प्रातः एवं सायं दोनों समय सूर्य का प्रकाश आता रहे, ऐसी खिड़की या छत में जाल बनायें।
  4. रसोई के समीप शौचालय कदापि न बनायें।
  5. स्नानागार में गीजर या फुब्बारा न लगायें।
  6. एक कक्ष स्वाध्यायादि के लिए अलग से बनायें, जिससे जिनवाणी की विनय, भावों की विशुद्धता एवं मर्यादा बनी रहे।
  7. प्रदर्शन की भावना से अतिरिक्त साज सज्जा, विद्युत-बल्ब, पंखादि न लगायें।
  8. गहरे रंग की पुताई, डिजायनदार फर्श, खिड़की, रेलिंग आदि न लगायें।
  9. छत पर बाउण्ड्री पर्याप्त ऊँची, छोटी जाली या झरोखों सहित बनायें जिससे आड़ भी रहे और हवा भी रहे।
  10. सुरक्षा, सुविधा, एवं स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। कमरों में आवश्यक अलमारी, टांड, रैक भी लगावें, जिससे सामान रखने में सुविधा रहे।

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43. यात्रा, धर्मशाला, विश्राम स्थल निर्देश

  1. स्वच्छता का ध्यान रखें। सार्वजनिक सम्पत्ति को न चुराएँ, न खराब करें।
  2. सुविधाओं का सदुपयोग सावधानी पूर्वक ही करें। आगे आने वाले लोगों का भी ध्यान रखें। ऐसा न हो कि उन्हें ऐसा लगे कि कौन असभ्य इस स्थान को गंदा कर गया या वस्तु खराब कर गया।
  3. चाहे कहीं न थूकें । गंदगी, छिलके, कूड़ा चाहे कहीं न डालें।
  4. लैट्रिन, बाथरूम, वॉशवेसन में पानी अवश्य डालें।
  5. शुल्क एवं टिकिट चोरी न करें।
  6. असभ्यता पूर्ण बातचीत (गाली आदि, अनावश्यक बोलना, अकड़ना, उपहास करना, कुदृष्टि से देखना) न करें एवं दूसरों को असुविधाकारक धूम्रपानादि क्रियाएं न करें। ताश आदि न खेलें, पैर फैलाकर गलत ढंग से न बैठें, न खड़े हों, न लेटें, न चढ़ें, न उतरें आदि।
  7. अनावश्यक कर्जा कभी न लें एवं कर्जा लेकर न देने की नियत कदापि न बनायें।
  8. पुस्तकालय आदि से पुस्तक या कहीं से कोई वस्तु लाकर सदुपयोग के बाद नियत समय पर व्यवस्थित रूप से लौटाएँ।
  9. सरकारी टैक्स, यातायात, प्रवासादि सम्बन्धी नियमों का यथाशक्ति पालन करें। भ्रष्टाचार को छोड़कर शिष्टाचार अपनायें।
  10. स्थान छोड़ने से पहले ही अपना सामान देखें एवं सम्हालें। जिससे पीछे से शिकायत एवं शंका का अवकाश न रहे।
  11. स्थान ग्रहण करने से पूर्व वहाँ की समस्त सामग्री-कमरा, अलमारी आदि देख लें। यदि दूसरों की कोई वस्तु मिले तो अधिकृत स्थान पर जमा करायें।
  12. कमरों में लगे गुप्त कैमरों को भी जाँच लें एवं उनसे सावधान रहें।
  13. चाहे जहाँ, चाहे जैसे, चाहे कुछ न खायें, निंद्य वृत्ति न करें। अनुशासन का पालन करें। अपने कारण दूसरों को प्रतीक्षा न करना पड़े।
  14. अपने बिस्तर और बर्तन साथ रखें जिससे चाहे जैसे बिस्तर और बर्तनों से बचा जा सके।
  15. यात्रा में विद्वान, माइक, बड़ी टार्च साथ में ले जावें। भक्ति, प्रवचन, चर्चा कार्यक्रम व्यवस्थित रूप से होते जायें।
  16. यात्रा से पहले ही तीर्थों का परिचय, अध्ययन आदि कर लें।
  17. तीर्थयात्रा पवित्र भावना पूर्वक नियम लेकर करें । यात्रा के बीच समय का पूर्ण सदुपयोग करें।

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44. आयोजन निर्देश

  1. आयोजन आवश्यक होने पर ही किये जावें।
  2. आयोजन मैत्रीभाव, दया, प्रमोदादि भावना सहित सरल एवं समर्पण भाव पूर्वक करें।
  3. नानाप्रकार से दबाव पूर्वक चन्दा करके धन संग्रह उचित नहीं है।
  4. धनार्जन के लिए न धार्मिक क्रियाओं को विकृत या गौण करें और न शिथिलाचार का पोषण करें।
  5. अन्याय, हिंसात्मक, अयोग्य व्यापार एवं भ्रष्टाचार से उपार्जित धन से बचें।
  6. नीति एवं धर्म से विरूद्ध व्यक्तियों को प्रमुखता न दें। उनका सम्मान तो कदापि न करें।
  7. तत्त्वज्ञान एवं धर्माचरण से रहित व्यक्तियों को भी धर्म मार्ग में लगाने की पवित्र भावना से ग्लानि एवं तिरस्कार न करते हुए, यथायोग्य रीति से सम्मिलित करना अलग बात है।
  8. अभिमान के वशीभूत होकर आडम्बरपूर्ण कार्य या धर्म विरुद्ध रात्रिभोजनादि न करें।
  9. आवश्यकतानुसार विद्यालय, छात्रावास, चिकित्सालय, शुद्ध भोजनालय, समाजोपयोगी उद्योग केन्द्र आदि बनायें।
  10. सादगी, मितव्यता, यत्नाचार, अहिंसा, शील की मर्यादाओं, वेशभूषा, जैन संस्कृति संरक्षण का विशेष ध्यान रखें।
  11. कार्यक्रमों में फिल्मी तर्ज पर संगीत, वेशभूषा, नृत्य, अभिनय आदि का मर्यादा के विरुद्ध प्रदर्शन न करें।
  12. कार्यक्रम से अधिक से अधिक जैन लोगों को आजीविका मिले और जैन समाज आर्थिक रूप से भी सम्पन्न बने, ऐसा प्रयत्न करें।
  13. जैन शिल्पकार, मूर्तिकार, टेन्ट, टेलर, गाडियाँ, ठेकेदार, डेकोरेशन, भोजन स्टाफ आदि तैयार करें।
  14. आयोजन समितियां, ट्रस्ट- इनके लिये पूर्व से ही जैनों को प्रेरित करें एवं आर्थिक सहयोग जुटावें। कहीं ऐसा न हो कि हमारे समाज से इन कार्यक्रमों के माध्यम से पैसा निकलता जाऐ और समाज का मध्यम वर्ग आर्थिक दृष्टि से कमजोर होता जाऐ।
  15. समाज के कमजोर वर्ग को आजीविका देने का दायित्व समाज के प्रमुख लोग सम्हालें। इसके लिये जैन बैंक, फाइनेंस कम्पनी, लघु-उद्योग केन्द्र, चिकित्सालय, विद्यालयों की राष्ट्रव्यापी शाखायें उनका सरकारी प्रारूप, जैसे-संचालन की व्यवस्थायें बनाने में धनी लोगों को प्रेरित एवं नियोजित करें।
  16. जैन संस्थाओं में साम्प्रदायिक भावना से योग्य व्यक्तियों की उपेक्षा न करते हुए भी जैन ईमानदार एवं सदाचारी लोगों को प्रमुखता दें।
  17. अनुष्ठानात्मक आयोजनों की अपेक्षा ज्ञान प्रधान आयोजन अधिक करें, जिससे समाज का बौद्धिक स्तर ऊँचा हो।
  18. धार्मिक, नैतिक, चिकित्सा, योग, शिक्षा, व्यापार, सर्विस एवं अन्य समस्याओं के निराकरण हेतु सलाह प्रकोष्ठ बनायें।
  19. जैनों की सामाजिक प्रतिष्ठा की वृद्धि के लिए लोकोपकारी कार्य भी करें। हमारी पहिचान बने कि जैन भ्रष्टाचारी नहीं होते।व्यापार, सर्विस, मिशन आदि में ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, त्याग, सेवा के आदर्श स्थापित करें, जिनसे प्रभावित होकर दूसरे लोग जैनधर्म के प्रति हृदय से आकर्षित हों।
  20. शोषण, अन्याय, रूढ़ियों एवं कुरीतियों के विरुद्ध अभियान चलायें।
  21. जो वास्तव में आराधना एवं साधना में लगे हैं, उनकी अनुमोदना एवं सर्वप्रकार से सहयोग करें, उन्हें बाह्य आरम्भपूर्ण व्यवस्थाओं में न उलझायें। उनकी भूमिका के योग्य उचित विकल्पों की पूर्ति के लिए स्वयं दायित्व सम्हालें एवं अनुचित विकल्पों का विनय पूर्वक दृढ़ता से निषेध करें और न कर सकें तो कम से कम मध्यस्थ तो अवश्य रहें।

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45. कार्यक्रम उद्घाटन निर्देश

  1. ज्ञानवृद्धि, परिणाम विशुद्धि, परस्पर वात्सल्य ही कार्यक्रम का प्रयोजन रखें।
  2. निस्पृहता, अनुशासन एवं उत्साहपूर्वक कार्यक्रम संपन्न करें।
  3. किसी प्रसंग में उत्तेजित, खिन्न और हतोत्साहित न हों।
  4. अपने कार्य को निष्ठापूर्वक करते हुए, दूसरों के कार्य में भी सहयोग करें।
  5. प्रतिकूल प्रसंगों में दूसरों पर दोषारोपण न करें। प्रतिष्ठा बिन्दु बनाकर कार्यक्रम में विघ्न न करें।
  6. विशेष प्रतिकूलता आने पर भी माध्यस्थ ही रहें, परन्तु अंतरंग प्रीति पूर्वक परोक्षरूप से ऐसा सहयोग करें कि किसीप्रकार आयोजक को ठेस न पहुँचे एवं सामाजिक वातावरण विकृत न हो पावे।
  7. किसी प्रसंग में स्वयं ही श्रेय, प्रशंसा एवं पुरस्कार लेने के लिए लालायित एवं अग्रसर न हों। दूसरों को अवसर दें।
  8. नये सहयोगीजनों को उत्साहित करते हुए तैयार करें। उनका यथायोग्य सहयोग करें। दोषों का उपगूहन करें।
  9. किसी की कमियों को कदापि न उछालें।
  10. समस्त जानकारी प्रमाणिक रूप से संग्रह कर संक्षिप्त एवं स्पष्ट संचालन विनयपूर्वक करें। संचालन सफलता का प्रमुख कारण समझें।
  11. अतिरिक्त प्रदर्शन किसी प्रसंग में न करें।
  12. अनैतिक व्यक्तियों को सामाजिक सम्मान न दें, परन्तु तिरस्कार कदापि न करें। उन्हें भी जुड़ने एवं सुधरने का अवसर प्रदान करें।
  13. त्यागियों एवं विद्वानों से, धनवानों एवं नेताओं का सम्मान न करवायें।

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