जीवन पथ दर्शन - ब्र. श्री रवीन्द्र जी 'आत्मन्' | Jeevan Path Darshan


10. सामान्य व्यवहार (सार्वजनिक व्यवहार) :arrow_up:

1. प्रातः ब्रह्मबेला में उठकर इष्ट देवादि का स्मरण एवं तत्त्व चिंतन करें। बच्चों को भी जल्दी उठाकर इष्ट देवादि का स्मरण, व्यायाम आदि के संस्कार दें।
2. घर, कमरे, कपड़े एवं अन्य सामग्री स्वच्छ एवं व्यवस्थित रखें। जूते, चप्पल आदि भी नियत स्थान पर रखें। घर में चाहे जहाँ न पहने रहें ।
3. जूते, चप्पल आदि तथा बाथरूम आदि में प्रयुक्त झाडू, वाईपर, मग, बाल्टी आदि का प्रयोग रसोई तथा भोजन करने के स्थान तक न करें।
4. चाहे कहीं न थूकें। घर का कूड़ा, कचरा नियत समय एवं नियत स्थान पर डालें जिससे गली के कूड़े के साथ चला जाए और दिनभर गली में गंदगी न रहे। सब्जी एवं फलों के छिलके अलग ऐसे स्थान पर रख दें, जिससे पशु खा लेवें। कचरा में न मिले और न सड़े। प्लास्टिक थैली में बंद करके कदापि न फेंकें। सर्वत्र स्वच्छता का ध्यान रखें।
5. वाहन रास्ते में अवरोध न हो, ऐसे खड़े करें । स्वयं भी बीच रास्ते में खड़े होकर बातें न करें।
6. बिलासिता की हिंसक सामग्री का बहिष्कार करें। (शैम्पू, चर्बीयुक्त साबुन, डिटर्जेन्ट, तरल नील, टूथपेस्ट, क्रीम, पाउडर, इत्र, नेल पॉलिश आदि) चमड़े, रेशम से बनी वस्तुओं का कृत, कारित, अनुमोदना से त्याग करें।
7. अश्लील पुस्तकें, कैसिट, चित्रादि घरों में न रखें।
8. यदि टी.वी. हटाना सुगम न हो तो शील विरुद्ध कार्यक्रमों (सीरियल तथा फिल्में) के देखने पर दृढ़ता से अंकुश रखें।
9. जल, विद्युत, गाड़ी, स्टेशनरी, कागजादी एवं अन्य उपकरणों का प्रयोग आवश्यकतानुसार न्यूनतम ही करें, दुरुपयोग न करें, जिससे आर्थिक बचत हेतु चोरी न करनी पड़े।
10. बिना मूल्य की वस्तु भी आवश्यकता न होने पर कदापि न लें।
11. बच्चों को संस्कारित करना आपका अनिवार्य कर्तव्य है।
12. बच्चों में मीठी सुपाड़ी, बबलगम, टॉफी, बिस्किट, फ्रूटी आदि शीतल पेय, ब्रेड, बाजारू चाट-पकौड़ी या मिठाईयों की आदत न डालें।
13. शील की मर्यादा का पालन कृत-कारित-अनुमोदना से करें।
14. देव दर्शन यथासंभव प्रातः एवं सायं दोनों बार करें। मंदिरजी के समीप की महिलाएं एवं निवृत्त वृद्धजन दोपहर के समय का सदुपयोग मंदिरजी में स्वाध्याय एवं व्यवस्था में सहयोग करते हुए करें।
15. स्वाध्याय, पूजा, भक्ति एवं अन्य आयोजनों में समय का विशेष ध्यान रखें। ‘प्रमाद से समय की अवहेलना, अक्षम्य अपराध है।’
16. घर में भी कम से कम एक बार सामूहिक पाठ एवं स्वाध्याय अवश्य करें।
17. परिवार के प्रत्येक सदस्य द्वारा दान-फण्ड अवश्य बनायें। मुख्यतः बालकों में दान के संस्कार अवश्य डालें।
18. तत्त्वज्ञान का अभ्यास आत्महित की दृष्टि से करें।
19. अपरिचित एकान्त स्थान में सामायिक या स्वाध्याय करने अकेले न बैठे।
20. लेटे-लेटे (प्रमादपूर्वक) जिनवाणी (ग्रन्थों आदि) का अध्ययन न करें।
21. बड़े पुरुषों के अति समीप, अति दूर एवं सिर की ओर न बैठे। मित्रों के समान हास्यादि न करें।
22. जिनवाणी, धार्मिक पुस्तकों आदि को पंखे की तरह प्रयुक्त न करें, जमीन पर न रखें; पैर, जूते, मोजे आदि अपवित्र वस्तुएँ छू जाने पर हाथ धोकर ही छुयें तथा छोटे (अबोध) बालकों को पढ़ने (फाड़ने या खोलने) के लिए न दें।
23. जिनवाणी (पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं, फोल्डरों, कैसिटों आदि) को पात्र तथा उपयुक्त व्यक्तियों को विनय पूर्वक रखने के अनुरोध पूर्वक उचित मूल्य (या बिना मूल्य) पर उपलब्ध करायें। चाहे किसी को भी मुफ्त बांटकर जिनवाणी की अविनय में भागी न बनें।
24. विवाह आदि का निमंत्रण पत्रिकाओं में णमोकार मंत्र, अन्य श्लोक एवं परमेष्ठी के चित्र आदि न छपायें । जिनमें यह छपे हों, ऐसे निमंत्रण पत्रिकादि प्राप्त होने पर उसकी अविनय न हो, अत: यथाशीघ्र विसर्जित करें या व्यवस्थित रखें।
25. शौच, बिस्तर, बाजारादि में छुए हुए तथा धोबी के यहाँ धुले एवं बच्चों को शौच कराने के बाद उन्हीं वस्त्रों का प्रयोग कम से कम मंदिर, स्वाध्याय, चौका (रसोई कार्य) आदि में न करें।
26. घर या दुकान आदि पर भी जिनवाणी तथा अन्य धार्मिक पत्रिकाओं को उचित एवं उच्च स्थान पर विनय पूर्वक विराजमान करें। यह विशेष रूप से ध्यान रखें कि उसके ऊपर जूते चप्पलादि न रखे जायें।
27. रसोई की स्वच्छता एवं शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।
28. (डबलरोटी, बिस्कुट, आइसक्रीम, पेय, मिठाईयाँ, नमकीन, मसाले, आटा आदि) बाजारू खाद्य-सामग्री घरों में न लाएँ तथा तीर्थों एवं धार्मिक आयोजनों में कदापि न खायें।
29. पानी छानने की प्रक्रिया विवेकपूर्ण हो, छन्ना साफ एवं योग्य हो, पिसी हरड़, सौंफ, इलायची, लोंग या गर्म करके पानी की मर्यादा का ध्यान रखें।
30. रात्रि भोजन, होटल का भोजन, खड़े-खड़े खाना-पीना, गिद्ध (बफर) भोज आदि का त्याग करें।
31. हिंसा के पाप से बचने एवं जैनत्व की रक्षा हेतु आलू, गाजर, मूली, अदरक आदि जमीकंद का त्याग करें।
32. एक ही थाली में दो या दो से अधिक व्यक्ति एक साथ भोजन न करें।
33. घरेलू आटा चक्की आदि मशीनों की ठीक तरह से साफ सफाई भी मर्यादित समयानुसार अवश्य करें।
34. मेहमानों को भोजन वयस्क कन्याएँ या बहुएँ न परोसें। भाई या वृद्ध महिलायें परोसें । युवा संसर्ग का बचाव रखें। लज्जा शील का आभूषण तो है ही, रक्षिका भी है।
35. कुसंग एवं विकथा से बचें।
36. वस्त्रों की सादगी की ओर विशेष ध्यान रखें, भड़कीले एवं मर्यादा विरुद्ध स्लीवलेस, मैक्सी, जीन्स, पारदर्शी तथा अति आधुनिक (एक्टरों जैसे फिल्मी स्टाइल के) वस्त्र न पहनें एवं बच्चों को भी न पहनायें।
37. बच्चों को बचपन से ही सादा वस्त्र पहनायें एवं इसका गौरव समझायें।
38. रात्रि-विवाह, मरण-भोज का बहिष्कार करें। सामूहिक (पंक्ति) भोज में भी जमीकंद आदि अभक्ष्य बनाने का त्याग करें।
39. शादी की वर्षगाँठ मनाने का नियम पूर्वक निषेध करें। बच्चों की वर्षगाँठ का यदि निषेध न हो सके तो पूजन, भक्ति, विधान, दान आदि क्रियाओं पूर्वक मनायें । पाश्चात्य शैली, उपहारों के लेन-देन अथवा विशेष साज-सज्जा, निमन्त्रणकार्ड, बड़े सामूहिक भोज पूर्वक न मनायें । केक कदापि न काटें।
40. स्वास्थ्य के नियमों का ध्यान रखें।
41. महिलायें मासिक अशुद्धि संबंधी नियमों का पालन पूर्ण रूप से करें।
42. गर्भपात जैसे क्रूरतापूर्ण कार्यों का त्याग करें।
43. महिलायें धार्मिक आयोजनों में सम्मिलित होने के लिए भी गोलियों (हार्मोन्स टेबलेट) का उपयोग कदापि न करें।
44. गाली आदि असभ्यतापूर्ण वचनों का प्रयोग नहीं करें।
45. जुआ, मद्य-मांस-मधु, कुशील आदि व्यसनों के उन्मूलन हेतु (व्यक्तिगत या सामूहिक) अभियान चलायें ।
46. ईर्ष्या, दम्भ, तुच्छ स्वार्थ, छल-प्रपंचपूर्ण निंद्य व्यवहार से दूर रहें।
47. लौकिक व्यवहार में प्रामाणिकता एवं नैतिकता का यथाशक्ति ध्यान रखें। किसी के प्रति अन्याय न करें। भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन न दें, अनुमोदना तो कदापि न करें।
48. हम जिन सार्वजनिक स्थलों का उपयोग करें, उसकी स्वच्छता का अपना नैतिक दायित्व अवश्य निभायें।
49. प्राण पीड़ित कर रिश्वत, फीस, वसूली आदि का त्याग करें।
50. अनैतिक रीति से कार्य साधने की अपेक्षा संतोषपूर्वक अभावों की चुनौती को जीवन में स्वीकारने का अभ्यास करें।
51. क्रूरतापूर्ण हिंसक घटनाओं (जैसे- आतंकवादी, साम्प्रदायिक दंगे, समाज एवं देश के लिए हानिकारक कार्यवाही या वैज्ञानिक-परमाणु विस्फोट आदि) की अनुमोदना भी न करें।
52. विदेशी (मल्टीनेशनल) बड़ी कम्पनियों द्वारा निर्मित वस्तुओं का बहिष्कार कर, स्वदेशी कुटीर उद्योगों द्वारा निर्मित सामग्री के प्रयोग को बढ़ावा देकर, भारतीय अहिंसक संस्कृति के संरक्षण में सहयोग करें।
53. अशुद्ध एवं पर्यावरण प्रदूषण के कारण, जीवन घातक हो जाता है। पॉलीथिन, सजावट सामग्री जरी आदि तथा प्लास्टिक फाइवर से बनी वस्तुओं का दुष्प्रयोग एवं अधिक प्रयोग न करें तथा आवश्यक प्रयोग के बाद यत्र-तत्र न फेंके।
54. सहजतापूर्ण जीवन जीने की कला सीखें।
55. प्रतिकूलताओं का धैर्य एवं साहस से सामना करें, जिससे आत्महत्या जैसी जघन्य घटनाएँ न घटें।
56. परदेश (तीर्थादि में) जावें तो जिसप्रकार घर का ध्यान रखते हैं, उसीप्रकार मंदिर की आवश्यक सामग्री का ध्यान रखें।
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11. गुरुजनों के प्रति व्यवहार :arrow_up:

1. धर्म एवं पद के अनुकूल प्रवर्तन करें, जिससे कषायों के प्रसंग न बनें।
2. अभिप्राय को समझें, मात्र शब्दों को न पकड़े।
3. अत्यन्त विनय पूर्वक बोलें । कुतर्क कदापि न करें।
4. उपेक्षा से न सुने । आवश्यकतानुसार नोट करें।
5. कुछ भी करने से पहले आज्ञा अवश्य लें, कार्य हो जाने की सूचना अवश्य दें। न हो पाने पर उचित कारण बतायें । कुछ भी छिपायें नहीं।
6. सेवा आवश्यकतानुसार अवश्य करें। अत्यधिक सेवा करके प्रमादी न बनायें।
7. दोष सरलता से स्वीकार कर लें। बड़े से बड़ा दोष हो जाने पर भी भयभीत होकर भटकें नहीं। क्षमा माँगते हुए समाधान प्राप्त करें।
8. परोक्ष में भी स्वच्छंदता पूर्वक ऐसा कोई कार्य न करें जो उनकी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल हो।
9. सूक्ष्म एवं जाग्रत उपयोग पूर्वक हर्ष सहित शिक्षा ग्रहण करें।
10. ताड़ना को भी वात्सल्य रूप समझें, उस समय कहे शब्दों को भी गम्भीरता से ग्रहण करें, कषाय समझकर उपेक्षा न करें।
11. गुरुजनों से सम्पत्ति, विद्या, अधिकारादि छीनने का प्रयत्न न करें। उनके हृदय में अपना योग्य स्थान बनायें। सेवा को ही लाभ समझे और निस्पृह भाव रखें।
12. स्वार्थपूर्ण व्यवहार न करें।
13. कुछ कहे जाने पर मौन न रह जायें, योग्य उत्तर दें, समझ में न आने पर विनय सहित पूछे।
14. भलीप्रकार समझ लेने पर ही कार्य करने के लिए अग्रसर हों, भावुकता पूर्वक बिना समझे ही करने के लिए तत्पर न हो जावें। बिना समझे अटकलें न लगायें। अनधिकृत या अप्रमाणिक लोगों से चाहे जैसा समझकर, हम सब समझते हैं -ऐसा भ्रम न पालें, न दूसरों को भ्रमित या भयभीत करें।
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12. लघुजनों के प्रति व्यवहार :arrow_up:

1. अन्तरंग स्नेह रखें। उनके उन्नत एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए मंगल कामना एवं समय-समय पर उचित और आवश्यक निर्देश एवं नियम देवें।
2. अच्छे संस्कारों के लिए सक्रिय प्रयत्न करें। पाठशाला, शिविर, गोष्ठी, प्रतियोगिताएं आदि आयोजित करें। इनके लिये प्रेरणा, सहयोग, प्रोत्साहन आदि करें।
3. कुसंग, कुव्यसनों एवं कुत्सित साहित्य से बचायें।
4. उलझनों को सहानुभूति पूर्वक सुलझायें, उचित सलाह दें।
5. उनसे अपनी तुलना करके ईर्ष्यादि कदापि न करें, उनकी उन्नति में प्रसन्नता व्यक्त भी करें।
6. तिरस्कार या ईर्ष्यापूर्वक उपेक्षापूर्ण व्यवहार न करें।
7. उनके द्वारा कुछ पूछने पर योग्य रीति से बतायें और न पूछने पर अपमान न समझे । आवश्यक होने पर सहजता से अपनी ओर से बता देवें। न मानने पर भी क्षोभ न करें।
8. सबसे अत्यधिक निकटता न बनायें। आवश्यक दूरी (आवास, भोजन, अध्ययनादि में) बनाये रखें, जिसस मर्यादा एवं अनुशासन बना रहे।
9. उन्हें अपनी व्यवस्थाओं में अनावश्यक न उलझायें, परन्तु पूर्णत: अनभिज्ञ भी न रखें।
10. उनके दोषों के सम्बन्ध में अन्य प्रकार से जानकारी मिलने पर प्रथम भूमिका में ही निषेध कर दें। प्रतिष्ठा बिन्दु न बनने दें अर्थात् दोषों का उपगूहन पूर्वक निराकरण करें।
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13. पारस्परिक व्यवहार :arrow_up:

1. पद के योग्य आदर एवं स्नेहपूर्ण ही भावना रखें, वचन बोलें एवं चेष्टा करें।
2. चुगली, निन्दा, ईर्ष्यादि कदापि न करें। दूसरों के गुणों एवं अच्छे कार्यों की अनुमोदना तो करें ही, यथायोग्य सहयोग भी करें।
3. विपत्ति में सहयोगी बनें।
4. स्वयं का दोष होने पर विनय पूर्वक क्षमा माँगें और दूसरों के क्षमा माँगने के पहले ही, सहजभाव से क्षमा कर देवें।
5. कदाचित् कषायों का प्रसंग बन भी जावे तो उसे लम्बायें नहीं । समस्या का समाधान खोजें एवं करें, उसे उलझायें या टालें नहीं।
6. सही सलाह दें । छल न करें। आपस में फूट न डालें। चाहे किसी की बातों का विश्वास न करें।
7. उत्तेजित न होवें । उत्तेजना में निर्णय तो कदापि न लें।
8. अधिक से अधिक देने और कम से कम लेने का प्रयत्न करें।
9. महिलाओं में अत्यन्त सीमित एवं प्रमाणीक व्यवहार रखें। मित्रता एवं रिश्ते नाते होने पर भी उनमें निकटता या अमर्यादित व्यवहार न करें, जिससे संदिग्धता की स्थिति बने और अन्तर्कलह से भविष्य क्लेशमय हो जाये।
10. लेन-देन, आय-व्यय का हिसाब अत्यन्त स्पष्ट एवं सूक्ष्म रखें।
11. स्वार्थपूर्ण व्यवहार कदापि न करें।
12. कंजूसी न करें, उदारता रखें। जैसे-किसी कमजोर आर्थिक स्थिति वाले को एडवांस दे देवें, जिससे उसका काम चल जाए, बाद में ले लेवें। सब्जी बेचने वाला, रिक्शा चालक, मजदूर आदि के प्रति प्रसंगानुसार लेन-देन में उदारता वर्ते ।
13. उपकार का अवसर कदापि न चूकें। अपने प्रति किये गये उपकार के प्रति कृतज्ञ बने रहें । स्वयं द्वारा किये उपकार का बखान न करें। वैसे ही व्यवहार की अपेक्षा न रखें।
14. श्रेय दूसरों को ही देते रहें। उन्हें ही आगे बढाएं । हाँ! गलती होने पर तुरन्त अपने ऊपर ले लें।
15. किसी के कहने मात्र से परस्पर अविश्वास न करने लगें, स्वयं निर्णय करें।
16. कोई भी अनुबन्ध लिखित एवं साक्षीपूर्वक ही करें।
17. बिना निर्णय के चाहे किसी का विश्वास न करें। विश्वास भी सीमित करें। विश्वसनीयता कायम रखें । संवैधानिक प्रक्रिया करने को अविश्वास न समझे। जैसे-दी हुई धन राशि को गिन लेना, लेन-देन में लिख लेना, अविश्वास का द्योतक नहीं, अपितु विश्वसनीयता बनाये रखने का उपाय है। कभी-कभी अति विश्वसनीयता भी व्यवहार बिगड़ने का कारण बन जाता है।
18. अपनी सामर्थ्य के अनुसार नुकसान स्वयं झेलें, दूसरों पर न थोपें ।
19. दूसरों के अन्याय को भी अपना कर्मोदय विचारते हुए समता से सहन कर लेवें।
20. अपना निर्णय बिना विशेष कारण के क्षण-क्षण में न बदलें । भूल अवश्य ही शीघ्रता एवं सहजता से सुधार लेवें।
21. जिस विषय की प्रामाणिक जानकारी न हो उस पर मौन ही रहें या स्पष्ट कहें कि मुझे ज्ञात नहीं है।
22. अति संकोच न करें।
23. योग्य उत्तर सहजता से न देना भी कभी-कभी कषाय का निमित्त बन जाता है; अत: योग्य उत्तर देने की सहज वृत्ति बनायें।
24. लघुता से प्रभुता एवं त्याग से शान्ति और प्रतिष्ठा मिलती है; अत: नाम, प्रशंसादि के लिए षड्यंत्र न करें, सावधान रहें।
25. बिना समझे हाँ न करें। विपरीत का भी विनय सहित सीमित शब्दों में निषेध करें।
26. अपनी मनवाने का आग्रह न करें।
27. बाह्य हानि-लाभ की अपेक्षा परिणामों की निर्मलता का अधिक ध्यान रखें।
28. अति राग भी क्षुब्ध करता है, भले ही शुभ ही क्यों न हो; अतः भवितव्य का विचार कर अतिरेक से बचें।
29. अन्तरंग में प्रसन्न रहें और प्रसन्नता की अभिव्यक्ति भी करें। प्रसन्न मुद्रा में ही बातचीत एवं व्यवहार करें।
30. कर्जा, पुस्तक या कोई वस्तु लेकर न देने की वृत्ति कदापि न बनायें।
31. किसी की जमीन, मकान, कमरा या दुकानादि पर कब्जा कदापि न करें।
32. किसी के साथ असभ्यतापूर्ण व्यवहार न करें, जिससे उसे कष्ट हो और स्वयं की निंदा हो।
33. निर्दोष चिकित्सा पद्धति अपनायें, स्वास्थ्य के नियमों को पहले से ही समझे, पालें और पलवायें ।
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14. सामाजिक व्यवहार :arrow_up:

1. अपने व्यापार को सीमित एवं नियमित रखें।
2. साधर्मीजनों के प्रति अत्यंत वात्सल्यपूर्ण व्यवहार करें। बाहर से आये हुए साधर्मी को मात्र व्यवस्था से भार स्वरूप समझकर अपेक्षा से नहीं, अपितु अंतरंग हर्ष पूर्वक यथायोग्य भोजनादि करायें। शिष्टाचारपूर्ण व्यवहार करें। आने पर हर्ष प्रगट करें। उसके लौकिक कार्य में भी यथासंभव सहयोग करें। कोई कष्ट आ जाने पर समर्पण भाव से आत्मीयता पूर्ण वैयावृत्य करें। परस्पर तत्त्वचर्चा करके समय का सदुपयोग तो करें ही, स्वाध्यायादि की प्रेरणा यथासंभव स्वयं भी लें एवं उन्हें भी दें। यदि कोई विद्वानादि हो तो समय निकालकर जिसप्रकार उनकी व्यक्तिगत चर्या में विघ्न न हो, उसप्रकार यथासंभव अधिक से अधिक लाभ लें । जाने के प्रसंग पर व्यवस्था सहित प्रेम पूर्ण विदाई दें एवं पुनः पधारने का आग्रह करें। बच्चों को भी यथायोग्य सेवा आदि की प्रेरणा करें।
3. व्यवहार में पद की मर्यादा का ध्यान रखें, अनर्गल न बोलें । अहंकार पूर्ण चेष्टा न करें। व्यवस्थाओं में मात्र दूसरों पर निर्भर न रहें।
4. ऐसा कोई कार्य न करें जिससे लोगों को उपहास का अवसर मिले। जैसे-अधीन कर्मचारियों, पड़ोसियों से दुर्व्यवहार, अधिकार हनन या धरोहर हड़प करना, अनुचित ब्याजादि लेना। अत्यधिक हिंसापूर्ण, अन्याय, अनीतिपूर्ण व्यापार एवं व्यवहार करना आदि ।
5. शील मर्यादाओं का पालन करें।
6. पूर्ण निवृत्ति की भावना सहित यथासंभव निवृत्ति लेते जायें।
7. धर्मायतनों की व्यवस्थाओं में अधिकाधिक सहयोग करें।
8. आयोजनों एवं कार्यक्रमों में उपेक्षा पूर्ण भाव से मात्र (रेडीमेड) उपस्थिति ही न दें, अपितु समय से पूर्व आकर व्यवस्था देखें एवं पश्चात् भी थोड़ी देर रुककर व्यवस्था में सहयोग करें । तात्पर्य यह है कि वात्सल्य मात्र अंतरंग में ही न रहे, उसकी वचन एवं चेष्टाओं से अभिव्यक्ति भी आवश्यक है।
9. अपने से छोटों को ज्ञानदान दें, दिलावें, प्रोत्साहित करें, अनुमोदना करें आदि।
10. स्थानीय साधर्मीजन एवं विद्वानों को भी समय-समय पर भोजनादि के लिए आमंत्रित करें । बीमारी आदि प्रसंगों में उनकी यथायोग्य वैयावृत्ति एवं अन्य प्रकार से सहयोग करें। यदि आवश्यक हो तो आजीविका आदि में भी उनका सहयोग करें।
11. त्यागी एवं विद्वान, समाज के गौरव हैं एवं गुरुजन हमारे परिवार के आभूषण हैं, उनका योग्य सम्मान, सहयोग एवं सेवा करें।
12. परोपकार का प्रत्युपकार नहीं चाहें ।
13. किसी की आराधना एवं प्रभावना में बाधक नहीं हों।
14. सामर्थ्यानुसार आर्थिक एवं अन्य किसी प्रकार से असमर्थ व्यक्तियों का व्यक्तिगत निस्पृह भाव से सहयोग करें। समाजोत्थान हेतु ट्रस्ट, विद्यालय, औषधालय, वाचनालय अन्य लघु उद्योग केन्द्र आदि बनायें और ऐसी संस्थाओं में यथाशक्ति सहयोग करें।
15. परोपकार के प्रसंगों में यथाशक्ति और यथायोग्य प्रवर्ते ।
16. विषय-कषायों में लिप्त होकर आडम्बर एवं प्रदर्शनपूर्ण, विवेकशून्य रहन-सहन से अत्यंत दूर रहकर, अन्तरंग की विवेकमयी विशुद्धि को वृद्धिंगत करते हुए, आत्मार्थ की साधना एवं जिनधर्म की प्रभावना कर सार्थक सहज जीवन जियें।
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15. अतिथि-सत्कार :arrow_up:

1. अतिथि के आने पर मुद्रा एवं वचनों से हर्ष प्रगट करें। बड़ों को योग्य अभिवादन कर खड़े हों और उनका सामान आदि लेकर रखवाएँ।
2. समय अनुसार स्नान, भोजन, जलपान, औषधि, विश्राम आदि की उचित व्यवस्था करें।
3. कार्य में सहयोग की व्यवस्था करें।
4. मन में कोई भार या दुर्भाव न आने दें। शिष्ट वचनों में अपनी उलझन या असमर्थता हो तो कह दें। कपट पूर्वक ऊपर ऊपर से शिष्टाचार मात्र ही नहीं करते रहें।
5. सहज व्यवहार करें।
6. उनके वात्सल्य को भी सहजता से स्वीकार करें।
7. परिस्थिति के अनुसार उसे अल्प या अधिक समय अवश्य दें।
8. योग्य रीति से विदाई दें।
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16. पारिवारिक सौन्दर्य :arrow_up:

1. ‘मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान में एक। पाले पोषे सकल अंग, तुलसी सहित विवेक।।’ प्रमुख को परिवार के सभी सदस्यों की एक परिचय तालिका बना लेना चाहिए, जिसमें सभी सदस्यों के नाम, आयु, योग्यता, अभिरुचि, क्षमता, प्रकृति आदि की सूक्ष्म जानकारी रहना चाहिए।
2. आय की स्पष्ट जानकारी सभी सदस्यों को रहना चाहिए, जिससे किसी को अनावश्यक अपेक्षा न हो पाये।
3. यथासम्भव सभी के साथ समानता का व्यवहार किया जाये।
4. गृह एवं अन्य निर्माण भी दूरदर्शिता पूर्वक इसप्रकार किए जायें, जिससे बँटवारा उचित रीति से हो सके। विवादों का प्रसंग न बने।
5. बड़ों का आदर एवं छोटों से स्नेह का ध्यान रखा जाये।
6. अनुचित माँगों का निषेध दृढ़ता से हो, परन्तु उचित अपेक्षाओं की उपेक्षा न हो।
7. कार्य विभाजन विवेक पूर्वक हो, उसका पालन सावधानी पूर्वक हो । प्रत्येक सदस्य अपने से अधिक दूसरों का ध्यान रखें।
8. आर्थिक एवं वैचारिक उदारता वर्ते ।
9. परस्पर विश्वास रखें और विश्वासघात कदापि न करें।
10. किसी प्रकार की हानि होने या विपत्ति आने पर सहनशील रहें। व्यक्ति विशेष (आरोपी) को भोगने के लिए अकेला न छोड़ें। धैर्य एवं सहयोग दें। युक्ति पूर्वक समस्या का समाधान करें।
11. दोषों के लिए उचित अवसर देखकर कोमलता पूर्वक सन्तुलित भाषा में ही कहें । तिरस्कार करते हुए कदापि न कहें।
12. गुणों की प्रशंसा एवं प्रोत्साहन अवश्य करें।
13. छोटों से भी सभ्य एवं शुद्ध भाषा में विनय सहित बोलने की प्रवृत्ति विकसित करें।
14. किसी कार्य में छोटों की भी सलाह लेवें। अपने को ही सर्वोपरि न समझते रहें।
15. छोटे कार्यों को स्वयं करने की पहल करें, जिससे दूसरों को उस कार्य के करने में हीनता न लगे।
16. उन्नति एवं विश्राम आदि का सबको उचित अवसर दें।
17. तात्त्विक वातावरण बनायें। स्वाध्याय, प्रतिक्रमण, क्षमा, विनय, सेवा, पाठ, चिंतन की प्रयोगात्मक शिक्षा दें। त्याग का आदर्श दें।
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17. संयुक्त परिवार के लाभ :arrow_up:

1. बड़ों के अनुशासन में प्रमाद नहीं हो पाता । दिनचर्या व्यवस्थित बनी रहती है।
2. शील एवं मर्यादाओं की सुरक्षा रहती है। पहले तो बन्धन-सा लगता है, परन्तु बाद में समझ आने पर, सहज सुरक्षा कवच जैसा लगने लगता है।
3. अनेक प्रंसगों पर सुशिक्षा एवं संस्कार मिलते हैं, जो भविष्य में हमारी समस्याओं के समाधान में सहायक होते हैं।
4. लज्जा एवं संकोच से दुष्प्रवृत्तियाँ या दुर्व्यसनों से सहज ही बचे रहते हैं।
5. बड़ों की विनय, सेवा आदि के संस्कार रहने से अभिमान आदि नहीं आ पाते।
6. माता-पिता, भाई-भावजादि के बीच में सन्तान का पालन पोषण भलीप्रकार से हो जाता है। स्वयं के अनुभव न होने के कारण, होने वाले टेंशन से मुक्त रहते हैं।
7. पारिवारिक संगठन होने से समाज में प्रतिष्ठा रहती है।
8. सामाजिक व्यवहार निभाने में सुविधा रहती है।
9. आपत्ति के समय असहायपना नहीं लगता।
10. व्यवहार से देखें तो सुख बँटता रहने से बढ़ता है और दु:ख घटता रहता है।
11. धर्म साधन एवं समाधि में सरलता होती है।
12. परन्तु ये सब तभी सम्भव है, जब हृदय में विवेक और उदारता हो। वाणी में मधुरता हो । सहनशीलता हो। आक्षेप कटाक्षादि न हों। सहयोग की वात्सल्यपूर्ण भावना हो। समस्या का समाधान शान्तिपूर्वक निकाला जाये। त्याग और समर्पण के भाव रहें । पक्षपात और मिथ्या स्वार्थ न हों।
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18. विनय :arrow_up:

1. विनय, सही समझपूर्वक, उपकृत हृदय से, सहज वर्तनेवाला भाव है। विनय में भय और प्रदर्शन के लिए अवकाश नहीं है।
2. विनय उत्कृष्ट शिष्टाचार है।
3. विनय की प्रकृति पहिचान कर, अनुकूल प्रवर्तन (विचार, वचन एवं चेष्टा) करें।
4. मर्यादा एवं यश के प्रतिकूल कार्य न करना, विनय का पहला चरण है। अज्ञान,अभिमान और प्रमाद को छोड़कर विवेक एवं यत्नाचार पूर्वक उचित समय पर खड़े हों। सामने नीचे बायीं ओर बैठे-चलें । योग्य अभिवादन पूर्वक संतुलित चर्चा करें। ध्यान पूर्वक पूरी बात सुने एवं समझकर उचित प्रक्रिया करें।
5. चर्चा के प्रसंगों में स्वयं आगे-आगे और बीच-बीच में न बोलें। किसी बात या कार्य को छिपाने का प्रयास न करें।
6. बोलने की अपेक्षा सुनने में अधिक उत्साहित रहें। मात्र स्वार्थसिद्धि के लिए अतिरिक्त विनय का प्रदर्शन कदापि न करें।
7. मन में प्रमोदभाव, गुण एवं उपकार चिंतन पूर्वक ही यथायोग्य बाह्य विनय सम्भव है।
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(19) संगति :arrow_up:

1. गति का अर्थ ज्ञान भी है। संगति के अनुसार प्रायः गुण दोष, बिना चाहे भी प्रवृत्ति में आ जाते हैं। अत: कुसंग के त्याग और सत्संग में रहने की प्रेरणा की जाती है।
2. मिथ्या श्रद्धान की प्रबलता वाले; चमत्कारादि में उलझे हुए; मिथ्या मंत्र तंत्रों में फंसे हुए; ज्ञान या क्रियादि एकान्त के पक्षपाती; तीव्र कषायों से युक्त; विषयों में आसक्त; जुआ, नशा, आदि व्यसनों में लीन; (भक्ष्य-अभक्ष्य, न्याय-अन्याय, धर्म-कुधर्म, योग्य-अयोग्य आदि के विवेक से रहित); रूढ़ियों में ग्रस्त; आचरण से भ्रष्ट; शील से रहित; रसनादि इन्द्रियों के लोलुपी; विश्वासघाती (मित्र, गुरु, धर्म, देश आदि के प्रति द्रोह करने वाले हिंसक, क्रूर परिणामी); अपयश आदि के भय रहित; निर्लज्ज, कलह प्रिय, पापों में ग्लानि रहित, कायर, स्वाभिमान से रहित; आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक, धर्म-अधर्म की सत्ता को निषेधने वाले; धर्म-धर्मात्माओं की निंदा करने वाले अथवा दूसरों की निंदा करने वाले; अपनी मिथ्या प्रशंसा करने वाले तीव्रमानी; दूसरों के दुःख अपमान हानि आदि में हर्ष मानने वाले; दूसरों की उन्नति, वैभव, ज्ञान, पद, प्रतिष्ठा आदि से ईर्ष्या करने वाले; प्रमादी, स्वार्थी, संयम नियम में अत्यंत शिथिल - ऐसे जीवों की संगति नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसी संगति में स्वयं के दोषों का पोषण एवं गुणों की हानि होती है।
3. संगति योग्य : सम्यक् श्रद्धानी; विवेकवान, दयायुक्त, पापभीरु; यश की कामना से रहित, परन्तु अपयश के कारणों से विरक्त; सत्यवादी, शीलवान, संतोषी, ईमानदार, निष्पक्ष, न्यायवान; विषयों में अनासक्त या संतोषी, शांत स्वभावी, विनयवान, गंभीर, तीव्र क्रोधादि रहित; क्षमावान; ईर्ष्या, परनिन्दा एवं आत्म प्रशंसा से रहित; देव-गुरु-धर्म-शास्त्रादि के प्रति भक्तिवान; परोपकारी; किसी का अहित चिंतन भी न करने वाले; कोमलता पूर्वक हित-मित-प्रिय वचन बोलने वाले; लोकनिंद्य कार्यों से दूर रहने वाले; कष्टसहिष्णु, ज्ञानाभ्यासी, श्रेष्ठ आचरण वाले; अपने संयम नियम के प्रति दृढ़; गुणग्राही; दूसरों के गुणों एवं अच्छे कार्यों के प्रशंसक एवं अच्छे कार्यों में निस्पृहता पूर्वक सहयोग करने वाले - ऐसे जीव संगति योग्य हैं। ऐसे जीवों की संगति में हमारे दोष निकलते हैं और गुणों का विकास होता है।
4. संगति केवल संग रहने का नाम नहीं। जैसे-दूसरे जलते हुए दीपक का स्पर्श पाकर, दीपक स्वयं अपनी तैलयुक्त बत्ती से प्रकाशमय हो जाता है, वैसे ही ज्ञानी जीवों की संगति में पात्र जीव अपने विवेक, गुणग्राहकता, विनय एवं पुरुषार्थ से स्वयं के गुणों का विकास कर लेते हैं।

समझें -

सत्संगति
कुसंगति
1. कल्पवृक्ष समान है। विषवृक्ष समान है।
2. चंदन समान है। अंगारे समान है।
3. उत्तम वस्त्र जैसी है। जीर्ण वस्त्र जैसी है (यत्न करने पर भी फटने वाला)
4. निरन्तर सुखप्रद है। निरन्तर क्लेशकारी है।
5. उत्तरोत्तर वृद्धिंगत है। पतन का कारण, अन्त में कलह पूर्वक टूटने वाली है।
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20. स्वच्छता निर्देश :arrow_up:

1. स्वच्छता के नाम पर कषाय न करें। फिनाइलादि हिंसक सामग्री का प्रयोग न करें। अनावश्यक पानी, साबुन आदि खर्च न करें। स्वाध्यायादि को गौण न करें।
2. प्रात: उठकर बिस्तर वैसे ही न छोड़े, उठाकर व्यवस्थित रखें। चादर, कवर आदि जो गंदे हों तो धोने के लिए निकालें। झाडू व्यवस्थित यत्नाचार पूर्वक लगावें। अलमारी, तख्त, चौकी, खिड़की, दरवाजे को कपड़े से साफ करें।
3. समय-समय पर दीवालें, छत, उपकरणादि भी साफ करते रहें । झाडू, सूप आदि भी व्यवस्थित रखें।
4. सामान यथास्थान व्यवस्थित ही रखें, चाहें जहाँ नहीं छोड़े, ना विखरायें।
5. स्नान के बाद बाल्टी, तसला, लोटा, साबुन, डिब्बा, ब्रुशादि भी पोंछ कर रखें। बर्तन समय पर माँजें । वस्त्रों, उपकरणों एवं पुस्तकों से गंदे हाथ न लगायें। अनावश्यक निशान न लगायें, चाहे जैसे मोड़े नहीं, कवर चढ़ावें, झाड़ते पोंछते एवं धूप दिखाते रहें।
7. खाद्य सामग्री को भी समय-समय पर धूप दिखाकर शोधन करते रहें।
8. बर्तन जूठे न छोड़े, चाहे कहीं थूकें नहीं, गंदे हाथ धोकर कपड़े से पोछे। जूते आदि भी व्यवस्थित ही उतारें।
9. बरसात में छतों, नाली आदि की सफाई पहले से ही कर दें। अनावश्यक सामग्री खुले स्थान से हटा दें, जिससे जीवों की उत्पत्ति अनावश्यक रूप से न हो सके।
10. मानसिक स्वच्छता- सत्-असत् विवेक, सत्संगति, सद्विचार, स्वाध्याय, तात्त्विक-वस्तुनिष्ठ चिंतन, सात्त्विक आहार-विहार, कर्तव्य पालन, परोपकार, भक्ति, संयम, सेवा और दोष होने पर प्रायश्चित्तादि से मन स्वच्छ, स्वस्थ एवं प्रसन्न रहता है।
11. आत्म साधना से मन स्थिर होता है और सच्ची प्रसन्नता मिलती है।
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21. दान निर्देश :arrow_up:

  1. दान में न्यायोपार्जित धन एवं उपयोगी सामग्री बहुमान पूर्वक दें।
  2. विवेक पूर्वक उपयोगिता एवं पात्रादि का निर्णय करके देखें।
  3. धनादि देने के साथ-साथ आत्मीयता से उचित सलाह अवश्य देवें।
  4. दान हेतु धन तो दें ही, स्वयं विनम्र होकर, आहारादि क्रियाओं में सहभागी भी होवें।
  5. बच्चों को भी दान एवं दया के सम्यक् संस्कार दें । पात्र दान और सेवा कार्य उन्हें देखने भी दें और उन्हें सहभागी भी बनायें। स्वयं करने के लिए निर्देश एवं प्रोत्साहन दें। उनके नाम से अलग-अलग प्रसंगों पर अलग-अलग रसीद बनवायें। बड़ों के नाम से भी दान करें और रसीद उन्हें अवश्य दिखायें, जिससे संतोष हो कि घर में उनका भी सम्मान है।
  6. स्वयं के व्यक्तिगत फण्ड भी बनायें, जिससे गुप्त दान भी किये जा सकें।
  7. त्यागीजनों को श्रद्धा, भक्ति एवं यथायोग्य आदर सहित आवास, शिक्षा, धार्मिक ज्ञानाभ्यास, प्रासुक चिकित्सा एवं अन्य व्यवस्थाओं में उदारता एवं निष्पृहता पूर्वक सहयोग करें; जिससे वे जीवन में भी निश्चिंत एवं स्वस्थ रहकर, स्वयं आराधना कर सकें और समाज को भी उनका लाभ मिल सके।
  8. दान के नाम पर अनावश्यक प्रदर्शन कदापि न करें। महँगे कपड़े या शीघ्र खराब हो जाने वाली घड़ी, टार्च, टेप आदि; हल्की गुणवत्ता की मेवा; बिना मौसम के फल; हल्की पेंसिलें, मंहगी डायरियाँ, बैग आदि न दें।
  9. अभिमान पूर्वक प्रदर्शन न करें। स्वागत, सत्कार, माल्यार्पण न करायें, दृढ़ता पूर्वक इनका निषेध करें।
  10. बार-बार न कहलवायें । स्वयं धन्यवाद दें एवं आभार मानें तथा कहें कि भविष्य में भी इसीप्रकार अवसर देते रहें।
  11. ध्यान रखें - भावुकता या अभिमान के कारण आप पात्र दान से वंचित हो जायेंगे; कार्य तो होंगे ही।
  12. समाजोन्नति, साधर्मीजनों का व्यक्तिगत सहयोग एवं लोकोपकारी कार्य भी विवेक एवं उदारता पूर्वक करें ।
  13. कमजोर वर्ग के लिए निर्दोष शिक्षा, चिकित्सा एवं आजीविका योजनाबद्ध ढंग से करें एवं करायें।
  14. दान देने पर भी, यदि सदुपयोग होता न देखें तो भी निंदा न करें, पछतावा न करें। योग्यता का विचार करते हुए, माध्यस्थ भाव से विरक्त हो जावें।
  15. कान के कच्चे न बनें, परस्थिति समझे। शंका होने पर अधिकृत जानकारी करके, निर्णय करें। हो सकता है कि किन्हीं कारणों, सरकारी उलझनों या अनुभव न होने से अधिक धन लग गया हो। किसी के सीधेपन से या अनजाने कोई भूल हो गई हो। अन्यथा आरोप न करें।
  16. शिकायतें न करते हुए सुझाव एवं सहयोग करने की प्रवृत्ति बनायें।
  17. अच्छे कार्यकर्ताओं का अपवाद करके, न उन्हें हतोत्साहित करें, न स्वयं तीव्र पाप कर्मों का बंध करें ।
  18. किसी विशेष दान का हठ न करते हुए, जहाँ जो आवश्यक दिखे, वह करें। जैसे - मंदिर, मूर्ति, वेदी पहले से हो तो पाठशाला, पुस्तकालय, वाचनालय, साधर्मी निवास में उपकरणादि दें। बड़ी-बड़ी रचनाओं एवं योजनाओं को मुख्य न करके, छोटी-छोटी सादगीपूर्ण उपयोगी योजनाओं को मुख्य करें।
  19. दान के प्रभाव का सदुपयोग प्रदर्शन एवं अनावश्यक स्टेशनरी एवं अन्य खर्ची को रोकने में करें।
  20. भवन निर्माण में सादगी के निर्देश दें। साज सज्जा पर अधिक खर्च एवं प्रोत्साहन न करें। साधर्मी एवं दीन दुखियों के उपकार हेतु शिविर, धार्मिक, नैतिक एवं चिकित्सा शिविरों एवं संस्थानों में वात्सल्य भोज दें एवं अन्य प्रकार सहयोग दें।
  21. विशेष धनी दातार एक मीटिंग करके धर्म प्रभावना एवं समाजोत्थान की प्रतिष्ठापूर्ण राष्ट्रव्यापी योजनायें बनायें।
  22. दान के नाम वाले पाटिया पहले तो लगायें ही नहीं और यदि लगायें तो गुरुजनों के नाम को उर्ध्व रखें। भाषा अत्यंत संक्षिप्त एवं विनयपूर्ण रहे।
  23. छोटी-छोटी राशियों की नाम-सूचि से भरे पाटिया, धर्मायतनों में अत्यंत अशोभनीय लगते हैं। दातारों को नाम का लोभ संवरण कर, स्वयं निषेध करना ही योग्य है। पाटियों पर तो स्तुतियाँ, पाठ, सूक्तियाँ लिखवाना ही श्रेयस्कर है।

22. ईमानदारी :arrow_up:

1. संतोष, सादगी, मितव्ययता, स्वावलम्बन और कष्ट सहिष्णुता पूर्वक ही व्यक्ति ईमानदार रह सकता है।
2. आवश्यकता एवं श्रम के अनुसार ही धन, वस्तु आदि ग्रहण करें। अनावश्यक होने पर कुछ भी न लें। बिना मूल्य मिलने पर भी ललचावें नहीं।
3. किसी से अधिक वस्तु या धनादि लेने का प्रयत्न न करें। सामूहिक कार्य का भी समस्त श्रेय, स्वयं ही लेने की आदत न डालें। व्यवहार में भी व्यक्तिगत कार्य भी, सहयोग से ही सम्पन्न होते हैं; अत: दूसरों के सहयोग एवं अंश को न नकारें, न कम करें।
4. किसी को न कम तौलें, न कम नापें, न कम समझें । सह अस्तित्व की भावना उर्ध्व रखें।
5. लोभवश अनुचित मिलावट न करें। अहं प्रदर्शन से बचें। सम्मान की अतिरिक्त चाह, ईर्ष्या, विषयों की आसक्ति भी व्यक्ति को बेईमान बना देती है। नशा, जुआ, कुशीलादि व्यसनों एवं प्रमाद से दूर रहें।
6. वस्त्र, खान-पान, घर और फर्नीचरादि सादा होने से विलासिता की सामग्री न होने से, अपना कार्य स्वयं करने से - हीनता नहीं, गौरव का अनुभव करें।
7. कर्तव्य, अनुशासन, नियम, वचन एवं समयबद्धता का पालन करने में उपहास या मिथ्या आलोचना एवं कष्टों की परवाह न करें।
8. अच्छी संगति करें एवं अच्छा साहित्य पढ़ें।
9. स्वार्थी और मिथ्या प्रशंसकों से सावधान रहें।
10. परमार्थ से स्व को स्व और पर को पर समझकर, पर से विरक्त हो, स्व में संतुष्ट रहने का पुरुषार्थ करें।
11. ज्ञेयों को मात्र ज्ञेय ही समझें, उनमें इष्ट-अनिष्ट की कल्पना करते हुए राग-द्वेष न करें।
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23. स्वास्थ्य :arrow_up:

  1. प्रात: शीघ्र उठे । इष्ट स्मरण, तत्त्वविचारादि के पश्चात् दिन भर के विशेष कार्य के सम्बन्ध में भी विचार कर लें। रात्रि में देर तक न जागें।
  2. विश्राम, व्यायाम, प्राणायाम का भी ध्यान रखें।
  3. तपश्चरण, जप, संयमादि, अपने पाप कर्मों की निर्जरा हेतु एवं परिणामों की विशुद्धि हेतु अवश्य करें।
  4. तले हुए व्यंजन, मिठाई, नमकीन आदि न खायें।
  5. रिफाइन्ड तेल, शक्कर, बिना मौसम के फल, इन्जेक्शन या घोल आदि से पके फल न खायें। इन्जेक्शन से निकाला दूध न पियें।
  6. उपवास और लंघन के पहले तथा बाद में ठोस एवं पूर्ण आहार न करें।
  7. रोग-अवस्था में भोजन का आग्रह न करें, आवश्यक होने पर पेय-आदि चिकित्सक की सलाह से लें।
  8. संतुलित भोजन के भी सुपाचन हेतु पर्याप्त शारीरिक श्रम आवश्यक है। संतोषी एवं सादा जीवन का सूत्र अपनाते हुए विचारों की निर्मलता, प्रसन्नता एवं निश्चिंतता का विशेष ध्यान रखें।
  9. विषयों में आसक्त न हों।

  10. धर्म के नाम पर भी अविवेक पूर्वक ऊँची-नीची क्रियाएँ एवं नियम न करें। प्रयोजन पर दृष्टि रखते हुए, योग्य चर्या पालें, जिससे स्वयं या अन्य को आकुलता न हो और परिणाम निर्मल रहें।
  11. चिकित्सक के उचित परामर्श पर ध्यान देते हुए, उसे सहयोग करें; अन्यथा अयोग्य व्यवस्थाओं में फंसकर समस्त नियमादि टूटेगें।
  12. चलने-बैठने-लेटने एवं काम करने के सही तरीके अपनायें। कपड़े आदि भी ऋतु आदि के अनुकूल उचित तरीके से पहनें।
  13. शरीर पर अति भारारोपण किसी तरह न करें। न अधिक भोजन, न अधिक काम और न प्रमादी और विलासी बनाएं।
  14. सभी के प्रति सद्भावना एवं सद्-व्यवहार रखें।
  15. समस्या को उलझायें नहीं । विवेक एवं त्याग पूर्वक समाधान निकालें ।
  16. मानसिक घुटन (टेंशन), ईर्ष्या, तृष्णा, क्रोध, मान, भय, प्रमादादि दुर्भाव स्वास्थ्य के अंतरंग शत्रु हैं, इन्हें समझ पूर्वक अवश्य छोड़ें।
  17. अन्य निर्देशिकाओं का पालन करें।
  18. रोग की प्रथम अवस्था में ही योग्य चिकित्सक के अनुसार पथ्य-कुपथ्य, निर्दोष औषधि एवं चर्या का ध्यान रखें।
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24. भोजन निर्देश :arrow_up:

  1. स्वास्थ्यकारक, सात्त्विक भोजन बनाना सीखें। समझे - कब, कितना, कैसा भोजन किसे एवं कैसे करना चाहिए।
  2. बाजारों में बिकने वाली अशुद्ध, हानिकारक, मंहगी खाद्य सामग्री से दूर रहें।
  3. अभक्ष्य पदार्थों को त्यागें।
  4. भोजन से चिकित्सा को समझें। भोजन के औषधीय गुणों का यथार्थ ज्ञान करके उनका प्रयोग करें, जिससे रोग उत्पन्न ही न हों।
  5. मिथ्यानुकरण करते हुए अपनी भोजन-संस्कृति को विकृत ना करें।
  6. भोजन के समय प्रसन्नता एवं निश्चिंतता रखें । विचारें - यह भोजन संयम का निमित्त बने और कब अनाहारी दशा होवे।
  7. बिना हाथ धोये किसीप्रकार की भोजन सामग्री न खावें।
  8. भोजन धीरे-धीरे चबाते हुए करें। पानी भी घुट-घुट पियें।
  9. भोजन के समय दुश्चिंतन, विकथा, शोरगुल, तीव्र कर्कश स्वर में बोलना वर्जित रहे।
  10. भोजन टी.वी. या कम्प्यूटर पर बैठे-बैठे न करें । उस समय मोबाइल बंद रखें। भोजन में उतावलापन न करें।
  11. खड़े-खड़े, जूते पहने, जूठे हाथों से उठाते हुए, प्रदर्शन पूर्वक भोजन न करें।
  12. भोजन हाथ-पैर धोकर, वस्त्र शुद्धि पूर्वक करें । तदुपरांत वज्रासन से बैठकर कायोत्सर्ग करें। धीरे-धीरे चलें । बायीं करवट थोड़ी देर लेटें । न सोयें, न दौड़े, न बैठकर निरंतर कार्य करते रहें। शरीर का उचित हलन-चलन पाचन के लिए आवश्यक है। थोड़ी देर बाद आवश्यकतानुसार हरड़, लौंग, इलायची, सौंफ आदि चूसते हुए पानी पी लें। पेट साफ रखने का निरंतर प्रयत्न रखें।
  13. अल्पाहारी बने, आसक्त होकर गरिष्ठ, तामसिक भोजन तो करें ही नहीं, योग्य भोजन भी अधिक और जल्दी न करें।
  14. चिकित्सक के परामर्श बिना एक ही पदार्थ दूध, फल, सब्जी आदि अत्यधिक मात्रा में सेवन न करें। भोजन में सभी विटामिन एवं खनिजादि पोषक तत्त्वों का समावेश एवं संतुलन रखें।
  15. देशी बीज के खाद्यान्न एवं सब्जियाँ खरीदने का प्रयत्न करें, जिनमें जहरीले, कीटनाशक एवं वृद्धिकारक रसायनों का प्रयोग न हो।
  16. चावल, दालें आदि भी बिना पॉलिश की खरीदें।
  17. समस्त सामग्री - खाद्यान्न, मसाले, सब्जियाँ आदि धोकर ही उपयोग करें।
  18. एल्यूमीनियम के कुकर, बर्तन आदि का प्रयोग रसोई में न करें । लोहे की एक कढ़ाई का प्रयोग रसोई में नित्य ही करें।
  19. भोजन में एक साथ अनेक पदार्थ न खावें । तली हुई वस्तुएँ मात्र स्वाद के लिए अधिक न खावें।
  20. बेसन, मेंदा एवं मिठाईयों से बचें।
  21. मौसम के अच्छे फल उचित मात्रा में ( अधिक नहीं) लेवें। भलीप्रकार से दो या तीन बार धोकर ही लें।
  22. रासायनिक घोल के पके केला, आम तथा बहुत बड़े फलों से बचें।
  23. चाय, काफी की जगह आयुर्वेदिक पेय आवश्यकतानुसार पियें।
  24. प्रात: खाली पेट दूध-आदि भारी नाश्ता न करें।
  25. दलिया, खिचड़ी, सब्जी के साथ घी मिलाकर खाते रहें ।
  26. चना, उड़द, मसूर, सेम आदि का प्रयोग भी आवश्यकता अनुसार करें।
  27. आटा थोड़ा मोटा रखें।
  28. दूध का प्रयोग भी अधिक नहीं, परन्तु पर्याप्त मात्रा में करें । छाछ भी आवश्यकतानुसार लें।
  29. शक्कर के स्थान पर बिना केमिकल का गुड़, खांड़, मीठे फलादि का उपयोग करें।
  30. भोजन, पानी नियम पूर्वक पियें, अनर्गल नहीं।
  31. शारीरिक श्रम भी पर्याप्त करें। स्वावलम्बी चर्या रखें। मशीन एवं सेवकों के सर्वथा आधीन होकर आलसी न बनें।
  32. किसी कार्य को अहसान या अभिमान की भावना से रहित होकर कर्तव्य एवं सौभाग्य समझते हुए करें। इससे प्रशंसनीय भी होंगे और प्रसन्नता भी रहेगी, तब स्वास्थ्य स्वयं ठीक रहेगा।
  33. समय-समय पर यथाशक्ति उपवास, एकाशन, ऊनोदर आदि भी करें।

25. आश्रम, विद्यालय निर्देश :arrow_up:

  1. समस्त चयन अत्यन्त विवेक पूर्वक ही करें।
  2. नियमावली का पालन सम्यक् प्रकार से करायें । समय-समय पर निरीक्षण आवश्यक है कि किसी नियम में शिथिलता तो नहीं हो रही।
  3. प्रत्येक अधिकारी, कर्मचारी एवं सदस्य का संवैधानिक रूप से प्रामाणिक परिचय एवं उसकी सम्पत्ति और सामान की सूची रजिस्टर में रखें।
  4. समस्त गतिविधियों पर सूक्ष्मता से नजर रखें।
  5. समय-समय पर मीटिंग आवश्यक है।
  6. विशिष्ट समागम अवश्य करवायें । शिविर एवं गोष्ठियाँ करायें।
  7. अधिष्ठाता एवं अध्यापक विद्यार्थियों से पुत्र-पुत्रीवत् व्यवहार करें । उनके सर्वांगीण विकास एवं श्रेष्ठ संस्कारों के लिए तुच्छ स्वार्थ, प्रमादादि को त्यागें । पाठ्य पुस्तकों का मनोयोग पूर्वक अध्ययन करायें।
  8. नियमों का पालन करने के लिये संकल्पित करें।
  9. व्यसन, नकल, ईर्ष्या आदि का त्याग करायें।
  10. स्वच्छता, मितव्ययता, विनम्रता, सरलता, सौहार्द आदि मानवीय गुणों के प्रति निष्ठावान बनायें।
  11. साधक एवं विद्यार्थी गुरुजनों का यथायोग्य सम्मान एवं सेवा करें। अनुशासन पालें। अधिक से अधिक लाभ लेते हुए अपनी योग्यता बढ़ावें ।
  12. पंक्तिबद्ध व्यवस्थित बैठने, धीरे चलने, खड़े-खड़े बातें न करने की आदत डालें।
  13. कार्य के पश्चात् सामान ढंग (उचित तरीके) से यथास्थान रखे जाने के बाद ही अध्यापक या व्यवस्थापक वहाँ से जावें। अतिआवश्यक होने पर अतिशीघ्र व्यवस्थित करें और करायें । व्यवस्था मात्र बच्चों पर कभी न छोड़े।
  14. गंदी एवं हल्की आदतों को छोड़ने का संकल्प पूर्वक उग्र पुरुषार्थ करें । टोकने पर हल्केपन से न लें और न टालें।

26. छात्रावास, अधीक्षक निर्देश :arrow_up:

  1. छात्रों को पुत्रवत् समझते हुए, अंतरंग वात्सल्य पूर्ण व्यवहार करें।
  2. उचित निर्देश एवं नियमावली, अभिप्राय एवं प्रयोग समझाते हुए कहें और उनको विचारने का अवसर दें।
  3. नियमावली के बिन्दुओं पर अपने-अपने विचार अभिव्यक्त करने का अवसर प्रदान करने के लिए सभा करायें। जिससे नियमावली एवं उसकी उपयोगिता भलीप्रकार भासित हो जाये।
  4. समझ पूर्वक ही स्थाई अनुशासन संभव है। अत: ध्यान रखें कि छात्र भयभीत न हो पायें।
  5. भय का वातावरण न बने इसके लिए अनावश्यक अत्यधिक न डाँटे, जोर से न बोलें। कोई बात जल्दी में न कहे अथवा जल्दी-जल्दी अनेक निर्देश न दें । शारीरिक प्रताड़ना तो करें ही नहीं, कहने के बाद पूछ ले कि भलीप्रकार समझ में आया या नहीं।
  6. दण्ड व्यवस्था ऐसी बनायें जिससे मानसिक विकास हो, भूल का एहसास हो अर्थात् दण्ड के रूप में अतिरिक्त अध्ययन, सफाई, पाठ जपादि करायें। धीठता करने पर सभी से सम्पर्क विच्छेद (अल्प समय के लिए) कर दें।
  7. चित्रकला, लेखन, पठनादि करायें।
  8. गलती एवं सही के नंबर (- एवं +) देते हुए कार्ड बनायें । पश्चात् मासिक, द्विमासिक दण्ड व्यवस्था करें।
  9. पाक्षिक एवं मासिक कोर्स तैयार करें। उसे निर्धारित समय में पूरा कर, उसी के आधार से प्रश्न मंच एवं अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम करायें। ज्ञान एवं अभिव्यक्ति विकास के कार्यक्रम भी करायें।
  10. भोजन एवं चर्या स्वास्थ्य के नियमों के अनुकूल रखें। किसी प्रसंग में असंतोष न बढ़ने दें।
  11. किसी की शिकायत पर सीधे ही विश्वास न करें। पूर्ण जानकारी लेकर, दोनों पक्षों को सुनकर योग्य निर्णय लें। समस्या को सुनने एवं सुलझाने की सहज प्रक्रिया अपनायें।
  12. परस्पर में विश्वास एवं वात्सल्य पूर्ण वातावरण बनायें, जिससे कोई दोष होने पर छात्र निशंकता से कह सके।
  13. छात्र की परेशानी मुद्रा से समझ में आने पर भी उसे सुलझाने की पहल स्वयं करें। उपेक्षा कदापि न करें।
  14. सर्व विषयों सम्बन्धी सत्साहित्य पढ़ने की प्रेरणा, व्यवस्था एवं अवसर दें।
  15. शारीरिक एवं मानसिक दोनों विकास का ध्यान रखें।
  16. दोनों पक्ष (जैसे - दया की प्रेरणा एवं निरर्थक और अनुचित दया का निषेध) समझायें, जिससे छात्र भावुक न बनें अपितु विवेकी बनें।
  17. कष्ट सहिष्णु बनने का अभ्यास करायें, जैसे - कभी एकान्त सेवन, कभी समूह में ही रहना, सोना, कभी देर से भोजन, कभी अव्यवस्थित भोजन, कभी अतिरिक्त कार्य, कभी खेल, कभी विश्राम आदि भी करायें।
  18. तात्कालिक सूझबूझ विकास के लिए प्रयत्न करें।
  19. दुर्घटनाओं से बचने के उपायों पर लेखन एवं भाषण करायें।

27. ट्रस्ट, समिति, संस्थान निर्देश :arrow_up:

  1. मोहवश अयोग्य परिवारी एवं रिश्तेदारों को सदस्य न बनाया जाये।
  2. स्वाध्याय से जुड़े सक्रिय, विवेकी एवं गम्भीर कर्तव्यनिष्ठ साधर्मीजनों को निष्पक्ष रूप से प्रमुखता दें।
  3. सदस्यों के स्थान अधिक समय रिक्त न रखें।
  4. मीटिगें नियमानुसार समय-समय पर अवश्य होती रहें।
  5. आध्यात्मिक संगोष्ठी, तत्त्वज्ञान प्रसार की प्रमुखता रहे।
  6. कुरूढ़ि एवं व्यसनमुक्ति अभियान, नैतिक शिक्षा, चिकित्सा, योग-प्राणायाम आदि शिविर भी अवश्य लगायें ।
  7. शिकायत की प्रवृत्ति छोड़कर, सहयोगात्मक एवं रचनात्मक विचार एवं वृत्ति बनाएँ।
  8. वचन एवं व्यवस्था की प्रामाणिकता रखें।
  9. जो राशि जिस कार्य हेतु आए, उसे यथासम्भव उसी कार्य में लगायें। परिवर्तन की स्थिति में दातार की स्वीकृति अवश्य लें। कार्य हो जाने पर भी दातार को सूचित करें ।
  10. योग्य व्यक्तियों को तैयार करते जायें । भिन्न कार्यों हेतु प्रभारी एवं समितियां बनाकर, प्रशासन का विकेन्द्रीकरण करते जायें। पहले से जुड़े सक्रिय तत्त्वरुचि वाले लोगों को रिक्त स्थान की पूर्ति करते समय प्राथमिकता दें।
  11. धन के लोभ से नये लोगों का शीघ्रता से अति विश्वास न करें। पद योग्य व्यक्ति का निर्णय, विवेक पूर्वक वर्तन के बाद ही करें।

28. व्यापार निर्देश :arrow_up:

  1. लेन-देन में अत्यन्त सावधानी वर्ते । उधार देने से भी बचते रहें। वचन का निर्वाह करें।

  2. वचन के पक्के रहें, परन्तु वचन निर्वाह का टेंशन न करें। कोई मिथ्या अनुबन्ध हो जाने पर, गुरुजनों की मध्यस्थता में सुलझायें।

  3. हिसाब (लेखा) साफ एवं स्पष्ट रखें, इसमें उपयोग सूक्ष्म रखें, विशेष रूप से देने के प्रसंग में स्वयं पहल करें।

  4. भावावेश में कोई अनुबन्ध या व्यापार न करें।

  5. अनावश्यक कर्ज न लें, कर्ज शीघ्र चुकाने की नियत एवं प्रयत्न रखें।

  6. आवश्यकता, सामर्थ्य एवं पूँजी से अधिक व्यापार कदापि न करें।

  7. निवृत्ति की भावना रखें एवं योजनाबद्ध ढंग से निवृत्ति की ओर बढ़े।

  8. व्यापार के (प्रतिदिन) घण्टे भी स्थूल रूप से निश्चित करें, विशेष परिस्थिति में छूट। शेष समय सत्संगति, तीर्थयात्रा आदि सत्कार्यों में लगायें।

  9. व्यापारादि के कारण चर्या को न बिगाड़े। नीति एवं सिद्धान्तों में शिथिलता न करें।

  10. धर्मध्यान, स्वास्थ्य, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों का भी निष्ठापूर्वक निर्वाह करें।

  11. असीमित व्यापार न बढ़ाते जायें। आय का निश्चित अंश, दान एवं परोपकार के कार्यों में अवश्य खर्च करें।

  12. भावुकता पूर्वक अपनी आमदानी से अधिक खर्च न करें। मितव्ययी बने रहें।

  13. सहायता भी अपनी शक्ति देखकर ही करें। कहीं ऐसा न हो कि बाद में अपनी उलझनें बढ़ जायें एवं व्यवहार बिगड़ जाये। मिथ्या उदारता कभी-कभी कंजूसी से भी अधिक कष्टप्रद हो जाती है।

  14. लघुजनों को उदारता पूर्वक सहयोग करें। दूसरों को भी आजीविका प्रदान करें।

  15. अपने से कमजोर लोगों का ध्यान रखें, आवश्यकतानुसार एडवांस भी दे देवें, अपने कारण उन्हें हानि न हो पाये। उनका उदारता एवं युक्ति पूर्वक सहयोग करें।

  16. अन्याय एवं शोषण कदापि न करें।

  17. दूसरों से ईर्ष्या न करें। उनकी हानि कभी न सोचें ।

  18. ऐसा व्यापार प्रारंभ ही न करें जिसका सीधा सम्बन्ध (कच्चा माल आदि) कत्लखानों आदि से प्राप्त होता हो।

  19. ऐसा व्यापार न करें, जिससे अन्य बहुत से लोगों का व्यापार छिन जाये।

  20. नकली या मिलावट पूर्ण ऐसी सामग्री न बेचें जिससे दूसरों को हानि हो।

  21. लोभवश अनैतिक या अनिश्चितता पूर्ण (अत्यधिक उतार चढ़ाव वाले) व्यापार न करें । सिनेमा, नशा, मेडिकल, जुआ, सट्टा, लॉटरी, शेयरादि के व्यापारों का त्याग ही कर दें।

  22. हिंसक एवं विलासिता की सामग्री न बेचें, दीपावली पर पटाखे आदि न बेचें। ईमानदारी, प्रामाणिकता एवं सौहार्दपूर्ण व्यवहार रखें।

  23. वैभव का मिथ्या प्रदर्शन न करें। प्रदर्शन पूर्ण आयोजनों से भी दूर रहें। आमदनी अधिक होने पर भी आवास, वेशभूषा, खान-पान में विवेक पूर्वक सादगी एवं संतोष रखें।

  24. राज्य के नियमों का पालन करें, टेक्स आदि भी उचित रीति से समय पर जमा करायें।

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29. सर्विस निर्देश :arrow_up:

1. ऐसी सर्विस न करें, जिसमें नैतिकता का हनन हो । कुशील, हिंसादि का पोषण हो। अपने सामान्य नियमों का भी पालन न हो पावे। मन खिन्न तथा बोझिल रहे। पराधीनता एवं दीनता लगे। सामर्थ्य से अधिक कार्यभार हो, जिससे स्वास्थ्य बिगड़े या पारिवारिक व्यवस्थाएं बिगड़ें।
2. स्वच्छ छवि की प्रतिष्ठा बनाए रखें। रिश्वत लेकर अनैतिक कार्य न करें।
3. समय का ध्यान रखें, विलम्ब से आने या मनमाने ढंग से चाहे जब चले जाने की आदत न बनायें।
4. अपने विषय की प्रमाणिक एवं पर्याप्त जानकारी रखें। उचित सलाह दें।
5. सौहार्दता पूर्ण व्यवहार रखें। कार्य न कर पाने पर भी संतोष जनक उत्तर अवश्य दें।
6. दायित्व एवं अनुशासन का दृढ़ता से पालन करते हुए भी मानवता का ध्यान रखें ।
7. उत्तेजित न होवें । सत्याग्रह भी अनुशासन पूर्वक करें।
8. निर्दयता पूर्वक कठोर दण्ड न दें।
9. लोभवश अतिरिक्त समय काम, यथासम्भव न करें।
10. अत्यावश्यक न होने पर, अतिरिक्त कार्य, अधीनस्थ कर्मचारियों से न करायें।
11. एक का काम पक्षपात वश दूसरे पर न डालें।
12. चापलूसी करने वालों से सावधान रहें।