जातिधर्म की कहानियाँ (भाग ११)
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जैनधर्म की कहानियाँ
(भाग ११)
श्रीमती धुड़ीबाई खेमराज गिड़िया ग्रन्थमाला का १७वाँ पुष्प
जैनधर्म की कहानियाँ
(भाग ११)
लेखक :
ब्र० हरिभाई, सोनगढ़
सम्पादक :
पण्डित रमेशचन्द जैन शास्त्री, जयपुर
प्रकाशक :
अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन
महावीर चौक, खैरागढ़ - ४९१ ८८१ (मध्यप्रदेश)
और
श्री कहान स्मृति प्रकाशन
सन्त सान्निध्य, सोनगढ़ - ३६४२५० (सौराष्ट्र)
प्रथम आवृत्ति - ५,२०० प्रतियाँ
दिनांक - २५ दिसम्बर, १९९८
न्योछावर - छह रुपये मात्र
© सर्वाधिकार सुरक्षित
प्राप्ति स्थान -
-
अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन, शाखा- खैरागढ़
श्री खेमराज प्रेमचंद जैन, ‘कहान-निकेतन’
खैरागढ़-४९१८८१, जि. राजनांदगाँव (म.प्र.) -
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट
ए-४, बापू नगर, जयपुर-३०२०२५ (राज.) -
ब्र. ताराबेन मैनाबेन जैन
‘कहान रश्मि’, सोनगढ़-३६४२५०,
जि. भावनगर (सौराष्ट्र)
टाइपसेटिंग एवं मुद्रण व्यवस्था -
जैन कम्प्यूटर,
श्री टोडरमल स्मारक भवन, मंगलधाम,
ए-४, बापू नगर, जयपुर-३०२०२५
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प्रकाशकीय
पूज्य गुरुदेव श्री कानजीस्वामी द्वारा प्रभावित आध्यात्मिक क्रान्ति को जन-जन तक पहुँचाने में पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर के डॉ. हुकमचन्दजी भारिल्ल का योगदान अविस्मरणीय है, उन्हीं के मार्गदर्शन में अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन की स्थापना की गई है। फैडरेशन की खैरागढ़ शाखा का गठन २६ दिसम्बर, १९८० को पण्डित ज्ञानचन्दजी विदिशा के शुभ हस्ते किया गया था। तब से आज तक फैडरेशन के सभी उद्देश्यों की पूर्ति इस शाखा के माध्यम से अनवरत हो रही है।
इसके अन्तर्गत सामूहिक स्वाध्याय, पूजन, भक्ति आदि दैनिक कार्यक्रमों के साथ-साथ साहित्य प्रकाशन, साहित्य विक्रय, श्री वीतराग विद्यालय, ग्रन्थालय, कैसेट लायब्रेरी, साप्ताहिक गोष्ठी आदि गतिविधियाँ उल्लेखनीय हैं; साहित्य प्रकाशन के कार्य को गति एवं निरंतरता प्रदान करने के उद्देश्य से सन् १९८८ में श्रीमती घुड़ीबाई खेमराज गिड़िया ग्रन्थमाला की स्थापना की गई साथ ही इसके आजीवन ग्रन्थमाला परम संरक्षक सदस्य ५००१/- में तथा संरक्षक सदस्य १०००१/- में भी बनाये जाते हैं, जिनके नाम प्रत्येक प्रकाशन में दिये जाते हैं।
पूज्य गुरुदेव के अत्यन्त निकटस्थ अन्तेवासी एवं जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन उनकी वाणी को आत्मसात करने एवं लिपिबद्ध करने में लगा दिया – ऐसे ब्र. हरिबाई का हृदय पूज्य गुरुदेवश्री का चिर-वियोग (वीर सं. २५०६ में) स्वीकार नहीं कर पा रहा था, ऐसे समय में उन्होंने पूज्य गुरुदेवश्री की मृत देह के समीप बैठे-बैठे संकल्प लिया कि जीवन की सम्पूर्ण शक्ति एवं सम्पत्ति का उपयोग गुरुदेवश्री के स्मरणार्थ ही खर्च करूँगा। तब श्री कहान स्मृति प्रकाशन का जन्म हुआ और एक के बाद एक गुजराती भाषा में सत्साहित्य का प्रकाशन होने लगा, लेकिन अब हिन्दी, गुजराती दोनों भाषा के प्रकाशनों में श्री कहान स्मृति प्रकाशन का सहयोग प्राप्त हो रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप नये-नये प्रकाशन आपके सामने हैं।
साहित्य प्रकाशन के अन्तर्गत जैनधर्म की कहानियाँ भाग १,२,३,४,५,६,७,८,९,१० लघु जिनवाणी संग्रह : अनुपम संकलन, चौबीस तीर्थंकर महापुराण (हिन्दी-गुजराती), पाहुड़ दोहा-भय्याभूत शतक-आत्मसाधना सूत्र, विराग सरिता तथा लघुतत्त्वस्फोट – इसप्रकार सोलह पुष्प प्रकाशित किये जा चुके हैं। अब यह सत्तरहवाँ पुष्प प्रकाशित करते हुए हमें अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।
जैनधर्म की कहानियाँ भाग ११ के रूप में पौराणिक कहानियाँ, नाटक एवं पहेलियाँ प्रकाशित की जा रही हैं। आशा है, जिन्हें पढ़कर पाठकगण अवश्य ही सन्मार्ग प्राप्त करेंगे।
जैन बाल साहित्य अधिक से अधिक संख्या में प्रकाशित हो। ऐसी भावी योजना में शान्तिनाथ पुराण, आदिनाथ पुराण, यशोधर चरित्र, बालि मुनिराज आदि प्रकाशित करने की योजना है।
इस कृति का सम्पादन कार्य पण्डित रमेशचन्द शास्त्री, जयपुर द्वारा बड़े ही सुन्दर ढंग से किया गया है। अतः हम उनके आभारी हैं।
साहित्य प्रकाशन फण्ड, आजीवन ग्रन्थमाला परम संरक्षक एवं संरक्षक सदस्यों के रूप में जिन दातार महानुभावों का सहयोग मिला है, हम उन सबका भी हार्दिक आभार प्रकट करते हैं, आशा करते हैं कि भविष्य में भी सभी इसी प्रकार सहयोग प्रदान करते रहेंगे।
विनितः
मोतीलाल जैन
अध्यक्ष
प्रेमचन्द जैन
साहित्य प्रकाशन प्रमुख
आवश्यक सूचना
पुस्तक प्राप्ति अथवा सहयोग हेतु राशि ड्राफ्ट द्वारा “अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन, खैरागढ़” के नाम से भेजे। हमारा बैंक खाता स्टेट बैंक आफ इण्डिया की खैरागढ़ शाखा में है।
स्व० भँवरीलालजी स्मृ० हो शोभाबाई चौधरी, यवतमाल
श्री झालेरी भाई, दादर
वसुधा बेन बटाविया, रायपुर
श्री विमलाबाई ज्ञानचन्दजी, जबलपुर
श्री पंकजभाई गोसरभाई, देवलाली
सी० रणभूरा, भिलाई
सी चंदाबेन प्रेमचंदजी भूरा, भिलाई
सी० रेखापुरा स्व० राजेन्द्र भूरा, भिलाई
श्रीमती विमला छाबड़, जयपुर
श्री प्रेमचन्दजी जैन, जयपुर
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विशेष- श्री सूरज बेन अमूलख भाई सेठ स्मृति ट्रस्ट, मुम्बई ह० सौ० कनक बेन अन्तरराय सेठ मुम्बई की ओर से पुस्तक की कीमत लागत मूल्य से कम में विक्रय हेतु १० प्रतिशत राशि प्रदान की गई है।
– आभार
अनुक्रमणिका
कं. नाम
१. वैराग्य और पुरुषार्थ प्रेरक कथा
२. रानी चेलना का धर्मप्रेम
३. वैराग्य और वैराग्य का भ्रम
४. वीर का मार्ग
५. आर्यिका माताजी के साथ में
६. श्वास-श्वास में सुमिरन करले
७. बाहिर नारककृत दुःख भोगें, अंदर सुख गटागटी
८. चिन्मूर्त द्रव्यधारी को
९. निर्विवाद तथ्य बना विवाद का विषय
१०. ज्ञानवर्द्धक पहेलियाँ/प्रश्न
पेज नं.
१३-१७
१७
१८-२६
२७-३१
३२-३९
३९
४०-४१
४१
४२-६९
७०-८०
बन जाना भगवान
पलना के ललना सुनो ! हंस के माँ के बैन।
शुद्ध निरंजन बुद्ध तुम, क्यों राते बेचैन।।
तुम हो वारिस वीर के श्री जिनवर के नन्द।
अन्तर आतम साधना होगा परमानन्द।।
मात झुलाती बाल को देती है आशीष।
चल कर वीर के पंथ पर बन जाना जगदीश।।
सुन लो बच्चो प्रेम से जिनवाणी का सार।
स्वानुभूति से पावना भव सागर का पार।।
परमेष्ठी प्रसाद से तुम करना आत्मज्ञान।
मोह छोड़ संसार का बन जाना भगवान।।
वैराग्य और पुरुषार्थ प्रेरक कथा
(पद्मपुराण में समागत)
अजगर सर्प के मुख में अपनी पुत्री को मृत्यु देखकर
२२ हजार पुत्री सहित चक्रवर्ती राजा चक्रधर का वैराग्य
महाविदेह क्षेत्र में स्वर्ग समान पुंडरिक देश में त्रिभुवननन्द नगर में राजा चक्रधर चक्रवर्ती राज करते थे। चक्रवर्ती की एक अनंगरामा नाम की पुत्री थी, जिसके गुण ही उसके आभूषण थे। उसके समान सुन्दर अद्भुत रूपवान कोई दूसरी स्त्री नहीं थी।
प्रतिष्ठितपुर का राजा पुनर्वसु विद्याधर चक्रवर्ती की इस कन्या को देखकर उस पर मोहित हो गया और उसका अपहरण कर उसे विमान में बिठाकर ले गया। चक्रवर्ती ने क्रोध में आकर उसके साथ युद्ध शुरू कर दिया। उसका विमान तोड़ डाला, जिससे पुनर्वसु ने व्याकुल होकर कन्या को आकाश से नीचे फेंक दिया।
शरद ऋतु के चन्द्रमा की ज्योति समान पुनर्वसु की पर्णलघु विद्या से कन्या एक भयानक जंगल में आ गिरी। उस भयानक जंगल में अनेकों दुष्ट वनचर जीव रहते थे। उस जंगल में विद्याधरों का भी प्रवेश नहीं था। जहाँ सूर्य की एक किरण भी प्रवेश न कर सके। ऐसे महा-अंधकारपूर्ण नाना प्रकार की बेलों से घिरे हुए; ऊँचे-ऊँचे वृक्षों से भरे हुए; चीता, बाघ, सिंह, गेंडा, रीछ इत्यादि अनेकों वनचरों से युक्त; ऊँची-नीची भूमि में गहरे-गहरे गड्ढों से युक्त उस महा-भयंकर वन में वह कन्या अत्यन्त दुखी होती हुई चारों दिशाओं में अपने माता-पिता को ढूँढती हुई उन्हें याद कर-करके विलाप करती/रोती है।
हाय मैं इन्द्र समान शक्ति और वैभव से सम्पन्न चक्रवर्ती की पुत्री होकर भी कर्मोदय वशात् ऐसी अवस्था में आ पड़ी। अब मैं क्या करूँ? इस जंगल का तो कोई आदि-अन्त भी दिखाई नहीं देता। इस वन को देखकर मुझे बहुत डर लगता है। मैं इस वन में असहाय पड़ी
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/१४
हूँ, यहाँ से मेरे को कौन बचायेगा? हे पिता! आप महापराक्रमी हो, मेरी रक्षा करो; हे माता! आपने मुझे कल्पनातीत दुःखों को सहन करके अपने गर्भ में धारण किया, जन्म दिया, क्या इसलिये आप मेरी रक्षा नहीं करती। हे भाई! आप मुझे एक क्षण मात्र भी अकेला नहीं छोड़ते थे, अब इस भयानक जंगल में अकेले क्यों छोड़ दिया है। अब किस कारण से इतना भयानक दुःख मेरे ऊपर आ पड़ा है कि जहाँ चाहने पर भी मौत नहीं आती। अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ?
एक लड़की जंगल में बैठी है और एक शेर उसके पास से गुजर रहा है।
इसप्रकार बहुत समय तक विलाप करते हुए वह दुखी होती रही। उसके विलाप को देखकर अत्यन्त दुष्ट पशु भी करुणा से भर गये। वह कन्या भूख से परेशान होकर शोक-सागर में डूबी फल-फूलों से अपना पेट भरने लगी। कर्मयोग से कई शीतकाल के दुःख सहने पड़े। कैसा है शीतकाल? जो कमल के वन की शोभा को नष्ट करने वाला है। अनेक ग्रीष्म ऋतुओं का ताप सहन करना पड़ा। ग्रीष्म का इतना भयंकर आताप कि जिससे जल के समूह सूख गये। तथा दावानल से अनेकों वृक्ष जलकर राख हो गये तथा अनेक जीव-जन्तु जलकर मर गये। वर्षाकाल की भयंकर वर्षा के अंधकार से सूर्य की ज्योति दब गयी। सूर्य की ज्योति को दबाने वाली भयंकर वर्षा से उस कन्या
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/१५
का मलिन शरीर भी चित्राम की भाँति कान्तिराहित, दुर्बल, बिखरे हुए केश, लावण्यरहित ऐसा हो गया कि जैसे सूर्य के प्रकाश से चन्द्रमा का प्रकाश क्षीण हो जाता है। फलों से नमीभूत वृक्षों के नीचे बैठे-बैठे वह पुत्री अपने पिता को याद करती हुई रोती रहती है। विचारती है कि मेरा जन्म चक्रवर्ती के घर में हुआ; परन्तु पूर्व जन्मकृत पाप के उदय से मैं ऐसी भयंकर दुख अवस्था में आ पड़ी। उन दुखों को याद कर-करके ऐसी रोती मानों आँसुओं की धार से बरसात का पानी ही बरस रहा हो।
इसप्रकार वन में रहते हुए वृक्षों से जो फल नीचे गिरते, उनका भक्षण करती। बेला-तेला, उपवास करने से शरीर भी सूख गया, कमजोर हो गया, फिर भी मात्र एक समय जल-फल खाकर पारणा करती है।
पुष्पों की सेज पर सोने वाली चक्रवर्ती की पुत्री जिसे अपने स्वयं के केश भी चुभते थे, वह आज विषम भूमि पर दुखी होकर सोती है। जो अपने पिता तथा परिजनों के साथ आनन्दमयी बातें करती थी, उनकी मधुरवाणी सुनकर प्रसन्न हुआ करती थी, आज वही भयंकर वन में सिंह, सियार आदि भयंकर जानवरों की भयानक और कर्कस आवाजों को सुनकर भयानक रात्रि व्यतीत करती है। इसप्रकार अनेक दुखों के बीच रहकर उस बालिका ने तीन हजार वर्ष तक उस भयानक जंगल में अनशनादि तप किये। सूखे फल-फूलों को खाकर तथा झरनों का प्रासुक जल पीकर अपना जीवन-यापन किया। एक सौ हाथ भूमि से आगे नहीं जाने की प्रतिज्ञा लेकर दिगवंत-देशव्रत आदि का पालन किया और क्रमशः महावैराग्य को प्रकट कर सम्पूर्ण खान-पान का त्याग कर सल्लेखना (समाधिमरण) की तैयारी कर ली।
एक दिन उसी जंगल मार्ग से एक अरहदास नामक निष्थाधर सुमेरुपर्वत को वंदना करके वापस जा रहा था कि वह उसे चक्रवर्ती की पुत्री उस भयानक जंगल में दिखाई दी, तब उसने उस पुत्री को यह कहते हुए कि "आप हमारे साथ चलो हम तुम्हें तुम्हारे पिता
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/१६
चक्रवर्ती महाराज चक्रधर के पास पहुंचा देते हैं" चलने का अनुरोध किया; परन्तु एक सौ हाथ के बाहर नहीं जाने की प्रतिज्ञा बताते हुए उस कन्या ने उनके इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। तब उस विद्याधर ने शीघ्र ही चक्रवर्ती महाराज चक्रधर के पास जाकर उनको उनकी पुत्री के समाचार सुनाये और सुनते ही चक्रवर्ती अपने २२ हजार पुत्रों सहित वहाँ आ पहुंचे।
चित्र में एक स्त्री, एक धनुषधारी पुरुष और अन्य पुरुष खड़े हैं। पेड़ और पहाड़ भी दिख रहे हैं।
चक्रवर्ती चक्रधर वहाँ पहुँचकर क्या देखते हैं कि उसकी पुत्री को एक अजगर सर्प खा रहा है, पुत्री अजगर सर्प के मुख में पड़ी है और शांतभाव से समाधिमरण के लिए तैयार है। पुत्री ने अपने पिता से अजगर को अभयदान दिलाया और स्वयं समाधिमरण पूर्वक देह त्याग कर तीसरे स्वर्ग में गई।
इसप्रकार पुत्री द्वारा पुरुषार्थ पूर्वक देह छोड़कर देखकर चक्रवर्ती अपने २२ हजार पुत्रों के साथ वैराग्य को प्राप्त हुए और उन्होंने वीतरागी दिगम्बरी दीक्षा धारण कर ली।
यहाँ जिस पुनर्वसु विद्याधर ने अनंगसरा का अपहरण किया था, वह उसे खोजते-खोजते अत्यन्त दुखी हुआ और पश्चाताप करते
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/१७
हुए संसार से विरक्त होकर दुर्मसेन मुनिराज के पास मुनिदीक्षा धारण कर महातप करते हुए अन्त में समाधिपूर्वक मरण कर स्वर्ग में देव हुआ और वहाँ से चय कर राजा दशरथ का पुत्र लक्ष्मण हुआ और अनंगशरा भी स्वर्ग से चय कर द्रोणमेघ की पुत्री विशाला हुई। तथा पुनर्वसु ने अनंगशरा को प्राप्त करने का निदंबन्ध किया था, अतः लक्ष्मण की विशाला से शादी हुई।
जैन शासन की श्रद्धा-भक्ति से भविष्य में दोनों ही जीव मोक्ष प्राप्त करेंगे।
रानी चेलना का धर्मप्रेम
भगवान महावीर के समय में महाराजा श्रेणिक का विवाह चेटक राजा की सुपुत्री चेलना के साथ हुआ। रानी चेलना त्रिशला माता की सगी बहिन तथा महावीर की मौसी थी।
मगधदेश की महारानी चेलना को वहाँ तनिक भी चैन नहीं मिलता था, क्योंकि श्रेणिक राजा तो दूसरे धर्म को मानता था तथा जैनधर्म के ऊपर उसकी किंचित भी श्रद्धा न थी। जैनधर्म के संस्कारों के बीच पली हुई इस चेलना को जैनधर्म के बिना राज्य में चैन कहाँ से मिले? वह राजा को कहती है कि हे राजन्! जैनधर्म रहित इस राज्य को धिक्कार है। राजा उन्हें जैनधर्म के पालन करने की और जिनमंदिर बनवाने आदि की अनुमति प्रदान करता है। पश्चात् चेलना रानी परमजिन-भक्ति पूर्वक महान जिनालय बनवाती है, आनन्द से पूजन-भक्ति करती है… और धीरे-धीरे राजा का हृदय परिवर्तन भी कर देती है।
राजा भी अन्त में जैनधर्म का दृढ़ श्रद्धालु बन जाता है और जब राजगृह में विपुलाचल पर्वत पर भगवान महावीर का समवशरण आता है, तब भगवान के पादमूल में क्षायिक सम्यक्त्व प्राप्त कर तीर्थंकर नामकर्म का बंध बांधता है और जैनधर्म के जय जयकार से भारत गूंज उठता है—
वैराग्य और वैराग्य का भ्रम
(शुभचन्द्राचार्य तथा भर्तहरि का एक प्रसंग)
यहाँ “ज्ञानार्णव” नामक महान ज्ञान-वैराग्य दर्शक ग्रन्थ के प्रणेता के बारे में कथा है। जो परम वीर थे, जिनको चैतन्यस्वरूप में विश्रांति द्वारा मुनिपद सुखस्वरूप था, कायर को मिथ्या प्रतिभाम वास जैन मुनि का पद कठिन दुःख़दाता भासित होता है; किन्तु अक्षय-अनन्त सुखस्वरूप मोक्ष एवं मोक्षमार्ग कभी भी दुःख़रूप एवं दुःख़दाता नहीं हो सकता।
वैराग्य कई प्रकार के होते हैं—
१. राग-गर्भित, २. द्वेष-गर्भित, ३. मोह-दुःख़-गर्भित और ४. नित्यभूताथ ज्ञायक स्वभावाश्रित ज्ञान-गर्भित।
ज्ञान-गर्भित वैराग्य को हमारा नित्य नमस्कार है।
अब यहाँ ऐसे ही ज्ञान-गर्भित वैराग्य सम्पन्न महा-मुनिराज शुभचन्द्राचार्य का संक्षिप्त कथा का वर्णन करते हैं।
शुभचन्द्र बड़े भाई थे और भर्तृहरि छोटे भाई।
उनके पिता को अपनी नव-परणीता पत्नि तथा उसका पुत्र अत्यधिक प्रिय था, किन्तु वह पुत्र इतना शूरवीर नहीं था, फिर भी उनकी इच्छा उसी पुत्र को राज्य देकर रानी को सन्तुष्ट करने की थी। इस कारण वे निरन्तर इस चिन्ता में रहते थे कि ये दोनों पुत्र परम पराक्रमी, तेजस्वी, शूरवीर है, अतः इनके होते हुए उस तीसरे पुत्र को राज्य कैसे दिया जा सकता है?
एक दिन ऐसा प्रसंग बना कि राजपुत्र शुभचन्द्र तथा भर्तृहरि खेल रहे थे, मंडप में लगे लोहे के स्तम्भ को उन्होंने गन्ने के समान मोड़ दिया। यह अतिशय शरीर बल धारी पुत्रों को देखकर राजा को भय लगा कि ये दोनों पुत्रों का अस्तित्व भविष्य में मेरी इच्छापूर्ति में
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/१९
बाधक हो सकता है। अतः उस राजा ने मंत्री को आज्ञा दी कि इन दोनों बड़े राज पुत्रों को जंगल में ले जा कर मार डालो। मंत्री ने राजा को बहुत समझाया, परन्तु राजा ने मंत्री की कोई बात नहीं मानी और कहा कि राज्य की नीति में ऐसा होता है। मंत्री इस अनुचित बात को मन में धिक्कारते हुए बड़े दुःखी होकर राजपुत्रों को संसार की विषमता समझाते है कि भैया! आप तो बड़े समझदार एवं शूरवीर है, किन्तु धिक्कार है इस मोह को, जो आपके पिता आपकी महानता-शूरवीरता को देखकर स्वार्थी हो जल रहे है, अतः उन्होंने आपकी हत्या करने की मुझे आज्ञा दी है, किन्तु मेरे द्वारा ऐसा नहीं होगा, अतः आप शीघ्र कहीं दूर चले जाओ और गुप्त भेष में ही रहना।
संसार की विषमता का अनुभव करते ही दोनों भाईयों को वैराग्य हो गया, दोनों भाई अपनी-अपनी रुचि के अनुसार सुख की शोध में अलग-अलग निकल पड़े।
भर्तृहरि को उस आत्मिक सुख और उनके साधन की श्रद्धा भी नहीं थी, अतः वह देह और पांच इन्द्रियों के विषयों में सुख मानने के भ्रम में था। “जैन साधु परमेष्ठी पद में तो दुःखी होते हैं” ऐसे
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/२०
में हिंसा न मानकर धर्म माननेवाले थे, उनकी संगति पाकर, उनका अनुयायी बनकर वहाँ सुख-सुविधा प्राप्त की इच्छा से उनका भक्त बन गया।
तथा शुभचन्द्र को तो लोकोत्तर और पवित्र संयमित जीवन ही प्रिय था, किसी द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव को इष्ट-अनिष्ट मानना या किसी से भय या आशा रखना उन्हें जरा भी सम्मत नहीं था, वे तो निरन्तर-नित्य निरञ्जन ज्ञानमय निजस्वरूप के आदर/आश्रय/चिन्तन सहित सोचते जा रहे थे। वे अपने त्रैकालिक तत्व को ही दृष्टिपथ रखकर संसार की विषमता, अस्थिरता जानकर संसार से उदास और मोक्षस्वरूप सच्चे सुख के अभिलाषी एकत्व-विभक्त निज-आत्मा को ही मंगल, उत्तम और शरणभूत मानते थे।
अन्तरंग-बहिरंग परिग्रह से रहित जैन मुनियों में तो भेदविज्ञान की प्रवीणता से प्राप्त नित्य ज्ञानानंदमयी अन्तरंग में प्रगट अतिसूक्ष्म चैतन्य-स्वभाव के अवलम्बन से जितेन्द्रियता और अतीन्द्रिय आत्मिक सुख ही होता है, जिसे शास्त्रीय भाषा में शुद्धोपयोगरूप-साधकदशारूप मुनिधर्म कहते हैं।
“स्वयंम् अपनी आत्मा” —इसप्रकार सच्चे सुख के शोधक
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/२२
शुभचन्द्र की निशक्तता के बल से इतनी तैयारी हो चुकी थी कि जो यथाजातरूपधर जिन मुद्राधारी निस्पृह जिन-मुनि को पा लिया। एकाकी आरमरूप में मग्न दिगम्बर जैनमुनि को देखा तो हृदय गद्गद आनन्द विभोर हो गया। जैसे तृषातुर को पवित्र जल की प्राप्ति, मोती बनने योग्य सीप को स्वाति नक्षत्र में जलवर्षा मिल गई हो, उसी प्रकार शुभचन्द्र को एक निर्जंतु स्थान पर ध्यानमुद्रा में स्थित वासना-विजयी, तत्वज्ञानी और विवेकमुर्ति जैन साधु मिल गये। जिन का नाम था वन्दनीय श्रुतसागर।
शुभचन्द्र की आध्यात्मिकता को एक मौका मिल गया, उन्होंने एक विवेकी बुद्धिमान की तरह गुरु-उपासना द्वारा आत्माभिमानी बनकर निज आत्महित का भरपूर लाभ उठाया।
शुभचन्द्र ने श्रीगुरु के समीप श्रद्धा, ज्ञान और आनरण का बल विशेष प्रगट करने के लिये प्रार्थना की, भगवन्। मुझे सब विषमताओं को नष्ट करने वाली निर्ग्रन्थ मुनिदीक्षा देने का अनुग्रह कीजिये…फिर थोड़े ही समय में शुभचन्द्र राजपुत्र न रहकर, परमशांत, वैराग्य-मंडित, निर्लिप्त, निर्ग्रन्थ साधु परमेष्ठी की श्रेणी में जा बैठे।
“विध्याशावशातीतो निराख्योऽपरिग्रहः।
ज्ञान-ध्यान-तपोवक्तः तपस्वी सः प्रशस्यते।।”
बस, अब अखंड ज्ञान-चेतना के स्वामित्त्व उपरान्त स्वरूप में विश्रान्ति रूप विशेष स्वरूपाचरण चारित्र के धारक हमारे आराध्य योगिराज शुभचन्द्र अखण्ड प्रतावंत ज्ञान-वैराग्यमय उज्जवल आराधना में लवलीन रहते, उन्हें कितनी ही ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त हो गई; परन्तु उन्होंने उन ऋद्धियों का कभी उपयोग नहीं किया।
ऋद्धि-सिद्धियाँ दासी हो रहीं
ब्रह्मानंद हृदय न समाव, जीवन धन्य उन्हीं का।
प्रतिबम्ब रहित मुनिराज हैं,
नहि कायर का काम, जीवन धन्य उन्हीं का।।
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/२२
इसप्रकार शुभचन्द्रजी तो अब स्वरूप सम्पदा से सम्पन्न ऋद्धिधारक दिगम्बर जैन मुनि थे।
और भर्तृहरि जिसको अनित्य मोह-गर्भित वैराग्य था। वह दुनियाँ के अरुचिकर-संघर्षमय विषयों में इष्ट-अनिष्ट प्रतिभामय और विषादमय घटनाओं के बारे में सोचता-विचारता बहुत जगह घुमा। खान-पान, थकान, स्नान, आराम, विश्राम को याद करने लगा, देह के प्रति ममता विशेषरूप से जाग उठी, क्षुधा आदि के प्रश्न हल करने में व्यथित हो उठा, कंदमूल-फल जो हाथ लगे उनका भक्षण करने लगा, अनछना पानी जो जल-जंतु से परिपूर्ण होता है पीने लगा, फिर भी तृष्णा ज्यों की त्यों बनी रही।
एक दिन सघन वन में घूमते हुए भर्तृहरि ने मस्तक पर बड़ी-बड़ी जटाओं को धारण करने वाले तपस्वी को देखा, जो चारों ओर आग जलाकर बीच में बैठा हुआ पंचाग्नि-तप तप रहा था। भर्तृहरि ने उसे नमस्कार करके आश्रय देने की प्रार्थना की, तापसी ने भी राजकुमार है ऐसा जानकर प्रसन्नता पूर्वक उसे स्वीकार किया।
कई वर्षों के पश्चात् भर्तृहरि यंत्र-मंत्रादि वनस्पति रसायन विद्या का जानकार होकर गुरु से पृथक हो गया और सुवर्ण बनाने की रसकुप्पी तैयार की, जनरंजन के लिये भक्त समाज जुट गया।
एक दिन अपने भ्राता श्री शुभचन्द्र की याद आई तो अपने शिष्यों को उनकी खोज में भेज दिया, बहुत खोज के पश्चात् समाचार आया कि भैया तो नग्न दिगम्बर ही है। घोर दरिद्रता दिख रही है, वस्त्र का टुकड़ा भी नहीं है, भोजन के भी कोई साधन नहीं है, भक्तगण भी उनकी व्यवस्था में नहीं है। बड़े कष्ट में है शिष्य ने आकर इत्यादि प्रकार से भर्तृहरि को बताया और कहा कि मैं उनकी यह दशा प्रत्यक्ष देखकर आया हूँ।
देखो! संयोग में, निमित्त में एकत्वबुद्धि से जीव देह और आत्मा को एक मान रहे है, उसे निर्ग्रन्थ वीतरागता क्या होती है, इसका
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/२३
जरा भी पता नहीं होता। जैन मुनि अशरण, अनाथ, दुःखी कभी नहीं होते है; इच्छा ही दुःख है, दुःख का अभाव ही सुख है, मुनिराज को तो अपने अन्तरंग में प्रगट अतिसूक्ष्म चैतन्यस्वभाव में एकाग्रता के बल से परम अतीन्द्रिय सुख है, जो अनदृष्टि ग्राह्य है, अज्ञानी ऐसा न मानकर अपनी देह में आत्मबुद्धि द्वारा बाह्य वस्तु के संयोग-वियोग में इष्ट-अनिष्ट मानकर अपने को सुखी मानता है, अतः वह मिथ्या प्रतिभास ही संसार है, दुःख है।
जब भर्तृहरि ने अपने शिष्य के द्वारा ऐसा समाचार सुना कि शुभचन्द्र बहुत दुःख-दशा में है, तब भर्तृहरि ने उनका दुःख दारिद्र मिटाने के लिये अपनी आधी स्वर्णरस-तुंबी उनके पास भेज दी और कहा कि भैया को दे आना, समझाना कि यह दुर्लभ वस्तु है, स्पर्श मात्र से तांबा सोना बन जाता है। आपकी दरिद्रता को देखकर सुखी करने के लिये आपके लघु बन्धु ने यह कठिन साध्य वस्तु आपके लिये भेजी है, इसका उपयोग करके सुख सुविधा में रहें…!
देखो, यह जीव संयोग में एकताबुद्धि से सुख-दुःख दुःख मानता है, मनवाना चाहता है, सब को अपनी देहाश्रित ममता दृष्टि से देखता रहता है, वह मिथ्या प्रतिभास ही सबसे बड़ा पाप है; दुःख है, संसार है।
जो निरन्तर आत्मिक सुख में तृप्त है, सुखी ही है, –ऐसे शुभचन्द्राचार्य के पास पहुंचकर शिष्य ने वह रस-तुम्बी उनके सामने रखकर भर्तृहरि के बताये अनुसार निवेदन किया, उन्होंने उसे उपेक्षाबुद्धि से देखा और जवाब दिया कि इसे पत्थर पर पटको…शिष्य दुविधा में पड़ गया, अरे…कितनी वनस्पति-धातुओं का कष्टसाध्य रस पत्थर पर कैसे पटका जाय? शुभचन्द्र ने फिर कहा– त्याग की हुई वस्तु के प्रति इतना ममत्व क्या? पटक दो…दुःख के साथ आज्ञा का पालन किया और लौटकर भर्तृहरि को यह सब हाल सुनाया कि बड़े भाई ने ऐसा कहा, उनकी आज्ञानुसार वह सिद्ध किया गया रसायन मैंने पत्थर पर फेंक दिया।
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/२४
भर्तृहरि को जिनता मोह अपने शरीर के प्रति था, उतना ही मोह सुवर्णसिद्धि रस के ऊपर था, समाचार सुनकर सन्न हो गया, हृदय में बहुत बड़ा आघातस्वरूप वेदना का अनुभव करने लगा, रात भर चिन्तित रहा, हाय मैंने गलती की, कही इतनी बहुमूल्य वस्तु यों भेजी जाती है? अब मैं स्वयं ही जाकर उन्हे समझाऊँगा, पुनः ऐसी भूल नहीं होने दूँगा, इत्यादि संकल्प-विकल्प रूप आर्तध्यान करता रहा और सोचता रहा कि हो सकता है शिष्य ने मेरे भैया को इस दुर्लभ रसायन रस की ठीक-ठीक महत्ता ही न बताई हो। इसप्रकार अनेक चिन्ताओं में चिन्तित हो बिस्तर पर पड़ा रहा, रातभर सो नहीं पाया।
सुबह उठा, और अपनी इच्छामूर्ति हेतु जो आधी रसकुप्पी स्वयं के लिये बचा कर रखी थी, उसे लेकर चल पड़ा भैया को देखने के लिये।
संयोगदृष्टि तो थी ही, दूर से देखा, चमड़े को, कि ओह… भैया का शरीर कृश है, एकाकी असहाय है, अनाथ है। “तपोबल से उद्दीप्त शांत सौम्यमुद्रा से दृढ़ पद्मासन पर आसीन है” ऐसे उनके अनरंग स्वरूप ज्ञानानन्दमय तत्व को न पहिचानकर चर्मचक्षु द्वारा बाह्य देह को ही देखा- “कि अहो! यही मेरा बड़ा भैया है” और वह गद्गद हो उठा, चरणों में गिरकर अभिवादन किया- “सप्रेम वंदना।”
सच्चे योगिराज शुभचन्द्र तो उत्तम क्षमा, संतोष, अकिंचन भावना से अलंकृत थे, सहज अपनी आत्मलक्ष्मी से सदा तृप्त ही थे। कोई खड़ा है, नजर उठाकर देखा तो भर्तृहरि,… गेरुआ वस्त्र, माला, जटा आदि से मण्डित, मृगचर्म सहित परिग्रहहारी छोटा भैया था… धर्मवृद्ध दी।
भर्तृहरि बोला- “भैया! जैसे ही सुना कि तुम अनाथ हो, संकट में हो, आधी तुंबी कंचन रस भेज दिया था, लेकिन व्यर्थ गया। अब शेष आधी तुंबी भी लेकर आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ।”
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/२५
“हँ भैया! सोना बनाया जाता है इससे, बड़ी बेशकीमती चीज है यह।”
सोना; शुभचन्द्र ने पूछा और तुंबी उठाकर पत्थर पर पटक दी।
यह देख भर्तृहरि सन्न रह गया।
शुभचन्द्र बोले- कहाँ हुआ सोना?
रूंधे हुए गले से कहा- भैया! पत्थर नहीं, तांबा सोना बनता है। तुमने यह क्या किया…? उफ! बारह वर्ष गुरु की सेवा करने पर इसे पा सका था मैं। ओह! यह अतिदुर्लभ वस्तु न तुम्हारे काम आई, न मेरे रही।
शुभचन्द्र मुस्कुराये- भर्तृहरि की सरलता और भोलेपन पर, फिर बोले- भर्तृहरि तुम घर छोड़कर विराग के लिये यहाँ आये थे; धन, दौलत, मान-सम्मान और राज्यलक्ष्मी को ठुकराकर। मैं देख रहा हूँ सोने के लोभ को यहाँ आकर भी तुम नहीं छोड़ सके हो, आज भी तुम में कलंक बाकी है। इतने वर्ष बिताकर भी मिथ्या प्रतिभास- अज्ञानता के वश में रहे, इसे विराग नहीं, दम्भ कहते है। भोले प्राणी धर्म के नाम पर अनंत भव में ऐसे कई ढोंग कर चुके…
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/२६
पवित्र होने का उपाय अपूर्व है… जैसे सूर्य सदा प्रकाशमय ही है, वह कभी भी अन्धकार का ग्रहण या त्याग कर सकता है? नहीं। उसी प्रकार यह आत्मा चाहे अशुद्ध रूप परिणमे या शुद्धरूप, किन्तु परद्रव्य को किसी भी प्रकार ग्रहण या त्याग नहीं कर सकता। हाँ रागी जीव उनकी भूमिका के अनुसार ये करना, ये न करना, -ऐसा रागभाव अवश्य करता रहता है। परन्तु यदि वह चाहे तो अपने वैकल्पिक निर्मल पूर्ण विज्ञानघन स्वत्व के अवलम्बन के बल द्वारा भेदविज्ञान की प्रवीणता रूप स्वसमुख ज्ञाता बनकर अपूर्व धैर्य को धारण कर सकता है।
स्वाधीनता को छोड़ना, पराधीनता मोल लेना कहाँ तक ठीक है? प्रथम तो सबसे बड़ा पाप मिथ्यात्व है। तथा सर्वज्ञ वीतराग कथित तत्वाथों को और निजरूप को विपरीतता रहित और भावभासन सहित जानना ही तत्वविचार के उद्भमरूप प्रथम नम्बर का धर्म है। वीतरागता रूप चारित्र धर्म ऊँचे नम्बर का धर्म है, जो सम्यग्दर्शन के पश्चात् ही हो सकता है। कुछ समझे भैया!
भर्तृहरि टकटकी लगाकर सुन रहा था, उसे अपने भीतर कुछ उजाला-सा होता मालूम दिया; किन्तु मन में दुविधा का दुःख दूर नहीं हुआ था। शुभचन्द्र बोले- भर्तृहरि, यदि आपको सुवर्ण की ही चाह है? तो लो कितना सोना चाहते हो? विशाल पत्थर पर अपनी चरण रज छोड़ दी, आश्चर्य…! तपोबल की पवित्रता और पुण्य की अविनाश्य शक्ति, वह सारा पत्थर सोना बन गया। भर्तृहरि आँखें फाड़े देखता बन गया, अचम्भित-सा।
हृदय भर आया उसका, भैया की सम्यक् रत्नत्रयरूप तपस्या ने मोह लिया। पैरों में गिरकर बोला- “मुझ डूबते को उबारिए महाराज! मैं अपने को आपके चरण-शरण में अर्पण करता हूँ।”
चाह गई चिन्ता गई, मनुवा बेपरवाह।
जिन्हें कछु न चाहिए, सो शाहनपति शाह।।
वीर का मार्ग
मोक्ष के साधक शूरवीर होते हैं, वे राग की प्रीति में नहीं रुकते। भगवान तीर्थंकर देव का उपदेश-जो कि निर्विषरूप से शुद्धात्मा की प्राप्ति कराने वाला है, उस उपदेश को झेलकर जो जीव चिदानन्द-स्वभाव की साधने के लिये निकला है, उसके पुरुषार्थ का वेग स्वभाव की ओर होता है। वह परमभाव के सामने नहीं देखता, वह परमभाव की प्रीति में नहीं अटकता।
राग का यह कण शुभ है, इससे मुझे कुछ लाभ होगा, यह कुछ सहायक होगा- इसप्रकार राग के समक्ष देखने के लिये मोक्षार्थी जीव खड़ा नहीं रहता।…वह तो निरपेक्ष वीतरागरूप से वीतराग-स्वभाव की श्रेणी पर चढ़ता है। तीर्थंकरों और वीर सन्तों की वाणी जीव का पुरुषार्थ जागृत करनेवाली है।
वे कहते हैं कि अरे जीव! तू वीतराग मार्ग को साधने के लिये चला है और बीच में मुड़कर राग की ओर देखने को खड़ा रहता है? तो क्या तू मोक्षमार्ग साध सकेगा? अरे कायर! क्या वीतराग मार्ग की साधना इसी तरह होती है? तू वीतराग मार्ग को साधने चला है और अभी तुझे राग की प्रीति है। क्या शुभराग भला है - हितकर है? - छोड़ दे यह राग की रुचि और राग का अवलम्बन, छोड़ दे उसका प्रेम; और वीर होकर उपयोग को झुका अपने स्वभाव की ओर! वीतराग-मार्ग का साधक शूरवीर होता है, वह ऐसा कायर नहीं होता कि क्षणिक राग की वृत्ति के कारण अपना वीतरागी मार्ग भूल कर राग के मार्ग पर चला जाये। वीर का मार्ग है शूरों का…कायर का नहि काम रे…।
इस बात को विशेष रूप से समझाने के लिये यहाँ एक राजपूत का दृष्टान्त दिया है-
एक राजपूत अपना विवाह करके लौट ही रहा था कि उसके राज्य पर शत्रु ने चढ़ाई कर दी। युद्ध की नौबत बज उठी, वीरों की गर्जना होने लगी, राजपूत को लड़ाई में जाना था…राजपूत की माता ने हँसकर तिलक करके अपने पुत्र को विदा किया…बहादुर राजपुतानी ने भी साहसपूर्वक पति को तलवार देकर विदा किया…;
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/२८
किन्तु राजपूत युद्ध में जाते हुए नवविवाहिता अपनी पत्नि के मुख को स्नेह के कारण बारम्बार पीछे मुड़कर देखने लगा…। उसके पाँव आगे नहीं बढ़ रहे थे…। युद्ध के ठीक समय पर उसके इस चित्त को दो स्थानों पर बांट देने वाली इस अन्तरंग वृत्ति को देखकर वीर राजपुतानी से न रहा गया। उसने गरज कर कहा- ठहर जाओ, मेरा यह चेहरा भी अपने साथ लेते जाओ, ताकि तुम्हारा मन युद्ध में लग सके…। इतना कहकर उसने अपना सिर काटकर राजपूत के सामने रख दिया। राजपूत अचम्भे में पड़ गया।
उसकी माता कहने लगी- अरे कायर! तूने राजपुतानी का दूध पिया है…। युद्ध में जाते समय, वीरता दिखाने के समय तू पत्नी का मुंह देखने के लिये रुक रहा है? छोड़ इस वृत्ति को! क्या यह राग की वृत्ति में रुकने का अवसर है? अरे, यह तो शूरवीर बनकर शत्रु को जीतने का समय है, अब राग की वृत्ति में नहीं रुका जाता।
इसी प्रकार जो जीव चैतन्य को साधने के लिये निकला हो और वह कहे कि राग से कुछ तो लाभ होगा, राग के अवलम्बन से कभी तो किंचित् लाभ हो सकता है - इसप्रकार राग की वृत्ति में रुककर तो तू शुभराग के सन्मुख देख रहा है, कायर होकर उसी में अटक रहा है और अंतर में चैतन्य की ओर नहीं झुकता - ऐसे कायर जीवों से जिनवाणी माता कहती है कि- अरे जीव! तू शूरवीर होकर चैतन्य को साधने के लिये निकला है, तू वीरमार्ग में मोह को जीतने के लिये चला है, तो राग की रुचि तुझे नहीं रह सकती। राग की ओर देखने रुकने का यह समय नहीं है, यह तो राग की रुचि तोड़कर शूरवीरता से मोह-शत्रु को मारने तथा चैतन्य को साधने का अवसर है। वीरमार्ग के साधक शूरवीर ही होते हैं, वे ऐसे कायर नहीं होते कि राग की वृत्ति में अटक जाये। वीर का मार्ग शूरवीर का मार्ग है…। वह राग का बन्धन तोड़कर शूरवीरता से मोह-शत्रु को मारता है और चैतन्य को साधता है।
इसी बात को बतानेवाली चित्रकथा पृष्ठ २९ पर पढ़िए।
वीर का मार्ग
एक चित्रकथा
चित्र में एक व्यक्ति एक स्त्री को छोड़कर आगे बढ़ रहा है। स्त्री उसे पीछे से बुला रही है। व्यक्ति के आगे एक रास्ता है जो एक मंदिर की ओर जा रहा है।
जो वीरमार्ग को साधने के लिये निकला है, वह राग की ओर देखने के लिये नहीं रुकता…।
चित्र में एक राजकुमार अपनी पत्नी के साथ खड़ा है। उसकी पत्नी उसे तलवार दे रही है। एक अन्य स्त्री राजकुमार को तिलक लगा रही है। राजकुमार के पीछे एक घोड़ा खड़ा है।
अभी राजकुमार विवाह करके लौटा ही था कि युद्ध की नौबत बज उठी…माता ने तिलक करके विदा किया, राजपुतानी ने भी साहसपूर्वक तलवार देकर विदा किया।
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/३०
लेकिन…! राजपूत मुड़कर पत्नी की ओर देखता है।…
यहाँ इस चित्रकथा में स्त्री राग का प्रतीक है, उसको रुचि रखकर रागों-मुख होकर मोक्षमार्ग को साधने के लिये नहीं जाया जा सकता, राग की रुचि छोड़कर ही मोक्षमार्ग की साधना होती है -ऐसे मार्ग की प्रेरणा जिनवाणी माता जागृत करती है।
राजपुतानी कहती है- इस चेहरे का मोह तुम्हें युद्ध में जाने से रोक रहा है न! लो, यह सिर भी अपने साथ लेते जाओ।
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/३१
माता कहती है- अरे कायर! शूरवीरता दिखाने के इस अवसर पर तू स्त्री के राग में रुक रहा है?
यह सुनते ही वह राग के बंधन तोड़कर वीरतापूर्वक विजय करने के लिये चल पड़ा। शत्रु मैदान छोड़कर भागते है, राजपूत तलवार उठाकर, घोड़ा दौड़ाकर आगे बढ़ता है।
वीरमार्ग को साधने के लिये निकले हुए परमार्थ रसिक जीव भी ऐसे ही पुरुषार्थी होते है।
आर्यिका माताजी के साथ में
वैत्री पूर्णिमा का संध्याकाल सुनहरे किरणों से खिल उठा था। रोज ही की भाँति मैं अपने कमरे की गैलरी में खड़ी होकर सामने बने मन्दिर के तीन भव्य और विशाल शिखरों को देख रही थी, जो कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के प्रतीक है और जो मुझे मोक्षमार्ग की राह दर्शाते है। मैंने रोज ही की भाँति आँखें बन्द करके पंच-परमेष्ठी का स्मरण किया। फिर आँखें खोल दीं; किन्तु आज कोई अपूर्व दृश्य देखने में आ रहा था।
अहा! सारे शरीर में झनझनी फैल गई। मन गदगद हो उठा। खुशी के दो आँसू गालों पर लुढ़क गये। सामने ही आर्यिका माताजी अपने संघ सहित चली आ रही है। अहा! मेरा सौभाग्य, मोक्ष की साधक माताजी के साक्षात् दर्शन हुए। श्रद्धा से मस्तक झुक गया। दोनों हाथ जोड़कर वही से शुद्धात्म-नमस्कार किया। फिर आकाश की ओर देखा। आकाश से मानों रत्नों की वर्षा हो रही है, बहारें फूल बरसा रही है और पवन मधुर-मधुर राग सुना रहा है। आज पूज्य आर्यिका माताजी के शुभागमन से छिन्दवाड़ा शहर पवित्र हुआ है, धन्य हुआ है। उनके चरण-कमल के स्पर्श से यहाँ की भूमि भी निर्मल हो गई है। अहा! पेड़-पौधे के पत्ते भी एक-दूसरे से मिल कर तालियाँ बजाने लगे, मन-मयूर नाच उठा। पूज्य आर्यिका माताजी की जय से आकाश गुंज उठा।
मैं शीघ्र ही माताजी की ओर चली, किन्तु जब तक मैं उनके पास पहुँची, तब तक वे ध्यान में लीन हो गई थी। अहा! कितनी शान्त और गम्भीर मुद्रा थी उनकी, साक्षात् वीतरागता की मूर्ति को देखकर मैं अपनी आत्मप्यास बुझाऊँगी और मोक्ष के पथ पर चलूँगी। मुझे ऐसी प्रबल भावना जागृत होने लगी।
धीरे-धीरे कुछ क्षणों के पश्चात् वह गोधूली की बेला पर रात्रि ने अधिकार कर लिया। चन्द्रमा भी प्रसन्न हो अपनी और
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/३३
अधिक दूधिया चाँदनी छिड़कर माताजी का स्वागत करने लगा। माताजी ने मौन धारण किया। मैं भी उनके निर्मल पैरों में नतमस्तक हो अपने घर लौट आई। रात भर वही शान्त-गम्भीर व वैराग्योत्पादक छवि चलचित्र की तरह आँखों में घूमती रही।
प्रातः उनके दर्शन को सभी लोग गये। माताजी का प्रवचन हुआ और प्रश्न-उत्तर भी। एक सूर्य गगन-पथ पर अग्रसर हो जगत की वस्तुओं को प्रकाशित कर रहा था और दूसरा सूर्य अपने ज्ञानालोक से मिथ्या-अंधकार को भगाकर आत्मा में ज्ञान-ज्योति जगा रहा था। मैंने भी कहा माताजी से, “माताजी! आपको देखकर मेरा जीवन धन्य हुआ, मुझे संसार से विरक्तता उत्पन्न हो गई है। संसार में मेरा मन नहीं लगता है। मुझे दीक्षा दीजिये। आपकी छत्रछाया में रहकर मैं भी अपना आत्मकल्याण करना चाहती हूँ”।
माताजी ने अत्यन्त सरल मुद्रा में कहा- “बहन, इस समय तुम्हारा दीक्षा लेना योग्य नहीं है। तुम भावावेश में आकर ऐसा कह रही हो।”
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/३४
मैं नहीं माताजी, मैं भावावेश में बहकर ऐसा नहीं कह रही हूँ-मैंने कहा।
माताजी कहने लगी- हे भव्य आत्मा! सुनो, केवल बाह्य दीक्षा लेने से ही आत्मा का कल्याण नहीं होता। अगर ऐसी दीक्षा लेने से ही मोक्ष होता, तो ऐसी दीक्षा तो तुमने अनन्तों बार ली है और स्वर्गादि पद प्राप्त किया है। फिर भी अभीतक मोक्ष क्यों नहीं हुआ? इसका कारण है कि मोक्षमार्ग की सीढ़ी पर गलत तरीके से नहीं चढ़ा जाता। मोक्षमार्ग की प्रथम सीढ़ी सम्यग्दर्शन है। सम्यक्त्व के बिना जीव चारों गतियों में भटकता रहता है। अगर वह सीधे तरीके से प्रथम सम्यग्दर्शन और ज्ञान फिर चारित्ररूपी सीढ़ी पर चढ़े तो अवश्य ही मोक्ष में पहुँच जाय। अतः तुम भी सर्वप्रथम सम्यग्दर्शन प्राप्त करो। जैनधर्म का प्रारम्भ सम्यग्दर्शन से ही होता है।
मैं लेकिन माताजी, मैंने तो आजतक ऐसा सुना है कि व्रत, तप, दान, पूजा आदि प्रशस्त राग करो, वे ही मोक्ष के कारण है। इससे हमें आगे उत्तम कुल मिलेगा सच्चे देव-गुरु-शास्त्र का निमित्त मिलेगा, और फिर हम मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं’- मैंने कहा।
माताजी अहो! मात्र प्रशस्त राग का उपदेश देकर और उसको मोक्ष का साधन दिखाकर वे बहुत बड़ी भूल करते हैं, क्योंकि ऐसा प्रशस्त राग तो हमने अनन्तबार किया है, और स्वर्गादि पद भी प्राप्त किया है। पूर्व में भी ऐसा प्रशस्त राग किया था, जिसके कारण आज तुम्हें पांचों इन्द्रियों व मन मिला, मनुष्य पर्याय मिली, उत्तम जैन कुल मिला, सच्चे देव-गुरु-शास्त्र का निमित्त भी मिल गया। सभी कुछ तो मिल गया है। शुभराग की भूमिका पर तो तुम पहुँचे हुए ही हो और पहले भी कई बार पहुँच चुके हो।
अब इसके आगे क्या करना है, सो समझो। अगर अभी भी शुभराग को ही मोक्षमार्ग मानकर, इसे अच्छा समझकर, इसी
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/३५
में अटक जाओगे तो मिथ्यात्व का सेवन करके संसार में ही भटकते रहोगे, क्योंकि प्रशस्त राग भी तो कषाय है न! कषाय आत्मा का विकार है। अगर आत्मा कषाय से भिन्न अपने ज्ञानस्वभाव को भूलकर इसी राग में रस लेने लगेगा तो उसके भीतर का अपूर्व अध्यात्मतत्व छिपा ही रह जायगा। तब फिर उसे मोक्ष कैसे मिल सकेगा?
पहले हम कह चुके है कि सम्यग्दर्शन मोक्ष का बीज है और इस बीज की प्राप्ति किसी भी प्रकार के राग से कभी होती नहीं। मोक्षमार्ग और राग दोनों बिल्कुल विपरीत है। हाँ, जो कुदेव आदि को पूजते है, भक्ष्य-अभक्ष्य का कुछ भी विचार नहीं करते है, पाप से धर्म मानते है इत्यादि। ऐसे जीव को प्रशस्त राग का उपदेश देकर और सत्यमार्ग दिखाकर पाप कार्य से छुड़वाना चाहिए। अशुभ की अपेक्षा शुभ अच्छा है लेकिन शुद्ध की अपेक्षा दोनों ही हेय है। आग चाहे चंदन की लकड़ी की ही हो या नीम की लकड़ी की, वह तो जलाने का ही काम करती है, इसी प्रकार शुभ और अशुभ दोनों प्रकार का राग तो त्याज्य ही है। सर्व राग रहित चैतन्यभाव है उस में ही शान्ति व सुख है।"
मैं मैंने कहा- हाँ, माताजी आप बिल्कुल सही कहती हो। अतः आप ही बताइये कि मुझे अब क्या करना चाहिए?
माताजी पहले तुम्हें तत्व का सत्य निर्णय करना चाहिए, क्योंकि सर्वप्रथम वस्तुस्वरूप की यथार्थ पहचान करके सम्यग्दर्शन प्राप्त करना है -माताजी ने कहा।
मैं धन्य हो माताजी, भाग्योदय से आज आपका दर्शन हुआ और सच्चा आत्महित का उपदेश प्राप्त हुआ। आपने सूखे हुए खेत को अमृत-जल से सींचकर हरा-भरा कर दिया है। माताजी, सम्यक्त्व के लिए आप के साथ ही रहकर वैराग्यपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करुँगी, और आपकी सेवा करके कृतकृत्य होऊँगी। तथा आपके
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/३७
सत्यमार्ग में से जरूर भद्रज्ञान की कला सीखूँगी – मैंने कहा।
माताजी के आहार का समय हो गया था। बहुत उमंग और उत्साह से मैंने पड़गाहा और आहार दिया। मेरे ये हाथ भी आहार देकर पवित्र हुए। हृदय सुख-सागर में डुबकियाँ लगाने लगा। अब तो चित्त संसार के विषय-भोग से हटकर मात्र चैतन्य की ओर झुक रहा था।
जब माताजी का विहार हुआ तब स्वतः ही मेरे पैर घर को छोड़कर माताजी के साथ-साथ चलने लगे। और कुछ ही समय में मन्दिर के शिखर भी दृष्टि से ओझल हो गये। एक स्थान से दूसरे स्थान और दूसरे से तीसरे स्थान पर चलते रहते। चलते समय ऐसा लगता जैसे मैं भी भव-समुद्र से पार होने के लिये सत्समगमरूपी नौका पर बैठ कर तिर रही हूँ। जब भी चर्चा होती है तब अपने ज्ञायकस्वभावी आत्मा की, चैतन्य की, वीतरागता की, वस्तु-स्वरूप आदि की अत्यन्त ही मीठी मधुर व रसीली चर्चा होती है।
अहा! जब चैतन्य की चर्चा में ही इतना आनन्द आता है, तब उसकी अनुभूति होने पर और उसे प्राप्त करने पर कितना आनन्द आयेगा, उसकी कल्पना से भी मन भर जाता है। इस आर्यिका संघ में मुझे जो सुख का आभास होता है उसे किसी कीमत पर छोड़ने को जी नहीं चाहता। जब माताजी अपने संघ के साथ में चलती है तब ऐसा दिखाई देता है कि कई टिमटिमाते तारों के मध्य में चन्द्रमा सुशोभित होता हुआ अपने लक्ष्यबिन्दु पर चला जा रहा है। जब आत्मा की चर्चा होती है तब मुझे रोमांच हो आता है। हृदय में आनन्द की तरंग चलने लगती है।
वैराग्यपूर्वक माताजी के साथ रहते हुए मुझे किसी भी प्रकार की सांसारिक बात की चिन्ता या दुःख नहीं सताता है। कौन कहाँ है, किसका क्या हो रहा है, सब लोग मेरे प्रति कैसे भाव रखते है आदि किसी भी बात का यहाँ तो विकल्प ही नहीं है। हाँ कभी-
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/३७
कभी न जाने कहाँ खो जाती हूँ वैराग्य भावना के चिन्तन में और माताजी की वैयावृत्ति करने में! माताजी की सेवा करना मुझे बड़ा भला लगता है। और ऐसा यह महा-सौभाग्य से प्राप्त हुआ सुनहरा अवसर कितना सुन्दर है, कितना सुखकर है, कितना मधुर है, कितना मीठा है, कितना रसीला है। अहा…
माताजी का संयमित जीवन देखकर मुझे भी संयम धारण करने की हलचल मचा करती और कई बार तो मैं उनके समीप ध्यान में एकाग्रता लाने का अभ्यास करती। आरम्भ में कभी डाँस-मच्छर काटते थे तो मेरा उपयोग टूट जाता था। और तब मुझे ख्याल आता कि जब मुनियों ने बड़े से बड़े उपसर्गों पर विजय प्राप्त की है तो क्या मैं इन मच्छरों के आगे हार मानूँ? नहीं… और फिर ध्यान में एकाग्रता लाने का प्रयास करती। माताजी के साथ-साथ चलने पर मैं भी जीव-रक्षा का ख्याल रखा करती। और कभी-कभी शक्ति अनुसार एकासन या उपवास भी करती। हालाँकि इन सब बातों की मुझे कोई प्रतिज्ञा नहीं है, किन्तु अप्परूप में बहुत सी क्रियाएँ माताजी के सदृश करती हूँ। इतना सब होने पर भी मन में मात्र एक यही भावना प्रबल हो उठती है कि कब मुझे सम्यग्दर्शन हो और कब संसार बन्धन से छूटूँ। माताजी भी जानती है मेरे हृदय की भावना! और इसलिये निरन्तर स्वच्छ और निर्मल अमृत जल की बूँदों को उछालती रहती है और कभी-कभी तो चैतन्यरस का फव्वारा भी छोड़ देती है, जिसमें मैं अच्छी तरह स्नान करके अपनी आत्मा को स्वच्छ करती रहती हूँ कैसी-कैसी बूँदें उछलती है, देखिये…
आत्मा ज्ञानमूर्ति है। ज्ञान-आनन्द ही उसका स्वभाव है। आत्मा में अभेद हो वही सच्चा ज्ञान है।
राग और ज्ञान भिन्न भिन्न है। स्व और पर को भिन्न जानकर स्व का आश्रय करना, वह भेदविज्ञान का सार है। भेदविज्ञान से ही मुक्ति होती है। सच्चे देव-गुरु-शास्त्र आत्मा के स्वाश्रय से ही मुक्ति
जैनधर्म की कहानियाँ भाग-११/३८
होना कहते है। पर का ग्रहण-त्याग किसी का नहीं है। सत्यस्वरूप को समझना ही वीतरागता का कारण है।
और मैं भी माताजी से प्रश्न करती रहती हूँ। कैसे प्रश्न? – “माताजी! सम्यक्त्व होने पर ज्ञानी को कैसा आनन्द आता है? तब वे कहतीं – अहाहा! उस आनन्द का तो क्या कहना! ऐसा अपूर्व और अतीन्द्रिय आनन्द आता है कि न तो उसे वचनों से प्रगट कर सकते है और न शब्दों से अंकित कर सकते है। उस आनन्द को तो वही जान सकता है, जिसने उसका अनुभव किया, ऐसे धर्मात्मा का चित्त अन्यत्र कहीं भी नहीं लगता है। बार-बार आत्मा की ही ओर झुकता है।
“माताजी! सत्यधर्म के श्रवण के पश्चात् भी मुझे अभी तक सम्यक्त्व क्यों नहीं होता?”
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 1752.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है