जानने के लिए दर्शन और ज्ञान दो गुण क्यों कहे हैं? | Janne Ke Liye Darshan Aur Gyan Do Gun Kyon Kahe Hain?

यहाँ, यह प्रश्न ऐसा भी हो सकता हैं की जब ज्ञान चेतना से ही जानना हो रहा हैं तो दर्शन चेतना की क्या आवश्यकता /उपयोगिता हैं? या फिर क्या मात्र छद्मस्थ के लिए दर्शन चेतना और ज्ञान चेतना की आवश्यकता हैं, सर्वज्ञ के लिए नही? इसी प्रश्न को ऐसा भी कहा जा सकता हैं जब केवलज्ञान हैं तो केवलदर्शन की क्या आवश्यकता /उपयोगिता हैं?

मैं यह प्रश्न इसलिए भी पूँछ रहा हूँ की द्रव्य में रहने वाले प्रत्येक गुण की अपनी एक महत्ता हैं, वह किसी अन्य गुण के कारण कम नहीं होती है। पर दर्शन गुण की महत्ता /उपयोगिता बिना ज्ञान गुण के समझ नहीं आती है। ज्ञान आधारित दर्शन गुण का वर्णन करने से, दर्शन गुण की अपनी विशेषता/आवश्यकता समझ नहीं आती है। इसलिए दर्शन गुण और ज्ञान गुण इन दो पृथक गुणों का पृथक महत्व समझना आवश्यक हैं।

बहुत सही प्रश्न है आपका ,
लेकिन ये विषय ही स्वयं में बहुत असमंजस वाला है कि ज्ञान-दर्शन गुण अलग-अलग है या एक ही गुण की पर्याय ( चेतना गुण ) ।

● हाल ही मैन प्रमेयरत्नमाला के 6th समुद्देश का अध्ययन किया , वहां दूसरे सूत्र की व्याख्या में कहा कि
निर्विकल्प जानने का नाम ही दर्शन है । ,
इससे इस बात का संतोष हुआ कि यदि चेतना यह एक गुण माने तो बहुत हद तक ठीक बैठ जाता है , क्योंकि धवला पुस्तक 9 में भी चेतना गुण की ही बात कज और ज्ञान - दर्शन कन दोनो को उसी में शामिल किया ।

किसी भी वस्तु की आवश्यकता और उपयोगिता का निश्चय उसका कार्य ही सिद्ध कर देता है , अगर हम दर्शन गुण के कार्य की बात करें , तो वह वस्तु के अस्तित्त्व को ज्ञान में सिद्ध करता है ।

आपके इन प्रश्नों का उत्तर मैंने कहना क्या चाहतें है ? , इस प्रकरण में दिए हैं ।-

https://drive.google.com/file/d/0Bx1igAOsnv3hSUozSDluaGNXUG9ndU1udllWRC1xeGZuNlBZ/view?usp=drivesdk

अवश्य पढ़ें ।

धन्यवाद आपका, आपके द्वारा दिए हुए समाधान मुझे अच्छे लगे। इस विषय में रूचि होने से मैंने भी थोड़ा चिंतन किया हैं, जिसको मैंने इस फाइल में प्रस्तुत किया हैं । कृपया, इसे जीव द्रव्य में दर्शन गुण - ज्ञान गुण एक बार पढ़ कर अपने विचार अवगत कराये।

Samaysaar- Gatha 298-299 ki tika se

यहाँ, चेतनता की द्विरूपता (ज्ञान दर्शन ) की सिद्धि के लिए पदार्थ के सामान्यविशेषात्मकरूप होने का तर्क दिया है।