Jainster’S
आने और भी हैं…
आपकी कूदी से…
यदि आपके हाथों में है सर है कूची का, तो आप अपने चित्रों को हमारे साथ साझा कर सकते हैं और सर्वश्रेष्ठ चित्रों को पत्रिका में स्थान मिलेगा।
आपकी कलम से…
इस पत्रिका में आपके लेखों, कविताओं और कहानियों के लिए भी स्थान है। भेजिएगा जरूर।
सवागत आपके…
यदि आपके मन में है कोई सवाल तो हमसे पूछिए और हम आपको समाधान दिलवाएंगे उस विषय के विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा।
अनसुनी गाथाएं…
आइए, अब हम जानते हैं जैन इतिहास के महापुरुषों/विद्वानों को, ताकि उन्हें जानकर हम उन पर तथा अपने जैन धर्म पर गर्व कर सकें।
अब मुझे मिली प्रेरणा…
आप हमसे साझा कर सकते हैं अपने जीवन के उस अनुभव को, जो आपको प्रेरणा दे गया हो और बन गया हो जीवन का टर्निंग प्वाइंट।
अटवी खबर…
हम आपको समय-समय पर अपडेट भी करते रहेंगे कुछ अच्छी खबरों के द्वारा।
Hey Jainsters!
Come and look into this magzine and you will find yourself in a new era of Jain world. Yes friends, this one is for you.
- Parinati Jain
हमें इंतज़ार रहेगा आपके महत्वपूर्ण सुझावों का…
संपादिका
प्रणिति जैन पाटील
- 91 88907 52452
प्रकाशन सहयोगी -
श्रीमती रिधि-अंकित जैन, मुम्बई
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सर्वोदय अहिंसा चौ. 180 ए, 2 मंगल मार्ग,
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संपादिका - प्रणिति जैन पाटील
अंकुर पढ़िए
| क्र. सं. | विषय | पेज नं. |
|---|---|---|
| 1. | अन्तर्दृष्टि | 1-3 |
| 2. | स्टेप बाय स्टेप जानें जैन धर्म | 4 |
| 3. | आत्मबुध | 5 |
| 4. | उलझे सवालों के सुलझे जवाब | 6 |
| 5. | अच्छे दिन आने वाले हैं | 7 |
| 6. | क्योंकि हेल्थ भी जरूरी है | 8 |
| 7. | लाइफ मंत्रा / बिखरे मोती | 9 |
| 8. | जैन एम | 10 |
| 9. | फंडा जैन धर्म का | 11 |
| 10. | वाणी सर्वज्ञ की / छोटी-सी बड़ी कहानी | 12 |
आशीर्वाद के हाथ
पंडित शांतिमुनि महाराज
जयपुर
सहयोग के हाथ
श्रीमती प्रणिति जैन
वडोदरा
श्रीमती प्रीति जैन, जयपुर
रज्जा के हाथ
श्री हरीओम वैष्णव, जयपुर
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संपादकीय
पहला कदम, अपनी ओर…
जय जिनेंद्र, जैनस्टर्स!
आज आपके हाथों में जैनस्टर्स की पहली प्रति देकर बहुत खुशी हो रही है। जैनस्टर्स अर्थात् जैन जैनस्टर्स।
यदि आप जैनधर्म में श्रद्धा रखते हैं और युवा हैं तो आप भी जैनस्टर्स की श्रेणी में आते हैं। ये अभी युवा, जिन्हें अपने जैन होने पर गर्व है, वे जैनस्टर्स हैं। पर कहते हैं कि व्यक्ति अपनी उम्र से बड़ा-छोटा या युवा नहीं होता, बल्कि अपने कार्यों से होता है। और कहो तो ये भी जाता है कि जिसके जीवन में जब तक धर्म की शुरुआत नहीं होती, तब तक वह बालक ही रहता है। यदि आप युवा नहीं हैं, परन्तु धर्मक्षेत्र में कदम रख चुके हैं और इसी मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं तो आप भी धर्मक्षेत्र में अभी युवा ही हैं और इसलिए ये मैगजीन आपके लिए भी उतनी ही उपयोगी है, जितनी कि किसी यंग जैन के लिए।
इस मैगजीन का उद्देश्य है आपको अपने जैनत्व से परिचय कराना। आपको गर्व का अनुभव कराना कि हम जैन हैं। अपने यह विश्वास जगाना कि हमने विश्व के सबसे सच्चे और सबसे अच्छे कुल में जन्म लिया है और हम मात्र नाम से ही नहीं, आचरण से भी जैन हैं।
जैन इस शब्द में दो मात्राएं हैं, जो कि सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र की प्रतीक मानी जाती हैं, पर हम जैन युवा इन दो मात्राओं को अपने जोश और होश का प्रतीक बनाएंगे। हम बता देंगे सबको कि यदि हमने जैनधर्म के ध्वज को ऊँचा फहराया है और जैनधर्म को पूरी दुनिया में फैला देने का जोश है तो साथ-ही-साथ जैन धर्म द्वारा प्रतिपादित अहिंसा, शाकाहार और सदाचरण को पालन करने का होश भी है।
इसी जोश और होश के साथ यह पत्रिका प्रकाशित की जा रही है।
आइए, हम सब मिलकर इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए अपने कदम बढ़ाते हैं… कहीं और नहीं, बल्कि अपनी ओर। अन्त में बस इतना ही कि…
किस्सा जो शुरू हुआ है तो दूर तलक जायेगा…
- प्रणिति जैन
अन्तर्दृष्टि
(साक्षात्कार)
आज, हम मिलवाते हैं श्री दौलतराम दिगम्बर जैन सिद्धांत महाविद्यालय के प्रणेता/मार्गदर्शक, निदेशक डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल से और जानते हैं उनके धर्म और संबंधित विचारों को, साथ ही जानेंगे उनके जीवन की कुछ अनकही बातों को। प्रस्तुत अंश प्रणिति जैन द्वारा लिये गये उनके इंटरव्यू से -
प्रणिति - आपकी आयु कितनी होनी ही, जब आपकी धर्म में रुचि हुई?
डॉ. भारिल्ल - सामान्य धर्म की रुचि तो 7-8 वर्ष की आयु में ही हो गई थी। हम लोग जिसे लौकिक भाषा में धर्म मानते हैं। जैसे मंदिर जाना, पूजा-पाठ करना, पानी छान कर पीना, प्याज-लहसुन नहीं खाना। ये सब तो छोटी उम्र में ही करने लगे थे; लेकिन आध्यात्मिक धर्म की रुचि 19-20 वर्ष की आयु से हुई, जब हम शास्त्री करने लगे और पूज्य गुरुदेवश्री के सान्निध्य में आये।
प्रणिति - अपने कब निर्णय लिया कि धर्मक्षेत्र को ही आपको अपना कार्यक्षेत्र बनाना है?
डॉ. भारिल्ल - किसी अन्य क्षेत्र की तो ज्यादा जानकारी नहीं थी, इसलिए हमारे सामने दो ही रास्ते थे - राजनीति और धार्मिक क्षेत्र। मुंगा में पहले समय राजनीतिक हलचल बहुत तेज थी। गाँधीजी के आंदोलन हुआ करते थे, सभाएँ होती थी। नेताओं के भाषण हुआ करते थे। हम भी उसमें जाया करते थे।
हमारे गाँव के ग्राम पंचायत और ग्राम सभा के चुनावों में खड़े भी हुए और जीते भी; लेकिन हम समय राजनीति के हिसाब से कम थी और जिस गाँव से संबंधित था, वह भी छोटा ही था। बाद में हमारी क्षमता संसदीय की हो गई। विद्वत्ता भाव के बाद जयकाराम आदि खरीदकर मैं काम करते थे, उसी में मैं भी शामिल हो गया। फिर धीरे-धीरे धार्मिक क्षेत्र की तरफ मन में जग गई, मुंगा में पहले समय ही निश्चित कर लिया था कि धर्मक्षेत्र को ही अपना कार्यक्षेत्र बनाना है।
प्रणिति - धार्मिक लेखन कार्य में आगे बढ़ना कैसा हुआ?
डॉ. भारिल्ल - शुरू से ही अध्ययन बहुत अच्छा था। जिस समय पढ़ाई कर रहा था, तब गाँधीवादी साहित्य बहुत चलता था। प्रेमचन्दजी के उपन्यास आदि। ये सब सबको पढ़कर बहुत प्रभावित होता था। उस समय की कविताएँ बहुत प्रभावित करती थी। उन सबसे प्रभावित होकर लेखन में रुचि लगी और फिर चिंतन तो स्वयं का था ही। बस, इस तरह लेखन कार्य शुरू हुआ।
प्रणिति - आपकी पहली रचना कौन-सी थी?
डॉ. भारिल्ल - वैसे तो प्रारंभ में छोटी-मोटी बहुत-सी कविताएँ लिखी थी, लेकिन पहली बड़ी कविता पंचाचार लिखी थी। गद्य में भी प्रारंभ में कई कहानियाँ लिखी थी। धार्मिक साहित्य में सबसे पहले देव-शास्त्र-गुरु पूजन लिखी थी। फिर टोडरमल स्मारक भवन में आने के बाद बालवोध पाठमालाएँ, सच की खोज, क्रमबद्धपर्याय आदि लिखी।
प्रणिति - आपको अपनी सर्वोत्कृष्ट कृति कौन-सी लगती है?
डॉ. भारिल्ल - सिद्धांत की दृष्टि से जिसने अपनी क्रांतिकारी प्रभाव दिखलाया - ऐसी ‘क्रमबद्धपर्याय’ और ‘नयचक्र’ है। दैनिक जीवन में उपयोगिता के हिसाब से ‘धर्म के दशलक्षण’, ‘इसके अलावा’ ‘आप कुछ भी कहो’ की कुछ कहानियाँ भी मुझे पसंद है।
प्रणिति - आपकी अपनी माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चों में बचपन से ही धार्मिक संस्कार आयें। आप उन्हें क्या सलाह देंगे?
डॉ. भारिल्ल - बच्चों में सब कुछ सुनने की सहज ही जिज्ञासा होती है। उसी समय यदि उन्हें सही तरीके से समझाया जाये, सही गाइडेंस दी जाये, सही रास्ते पर लगाया जाये तो शरीर से वे धर्म को ग्रहण करेंगे।
ये मेरा खुद का अनुभव है कि बचपन में मैं पाठशाला और प्रवचनों में जाता था तो इनका इतना प्रभाव पड़ता था कि मैं बड़ी दो-चार प्रतिमाएँ ले लेता था। इसलिए ऐसा
स्टेप बाय स्टेप जानें जैन धर्म
प्रश्नोत्तर
प्रश्न - हम जैन क्यों कहलाते हैं?
उत्तर - हम जैन कहलाते हैं, क्योंकि हम जिन के भक्त हैं। जैसे - विष्णु को मानने वाले वैष्णव, ईसामसीह को मानने वाले ईसाई, बुद्ध को मानने वाले बौद्ध कहलाते हैं, वैसे ही जो जिन की आज्ञा माने, उनमें ही पूर्ण श्रद्धा रखे, वे ही जैन कहलाते हैं।
प्रश्न - जिन किसे कहते हैं?
उत्तर - जिन अर्थात् जितेन्द्रिय भगवान्। जिन्होंने अपने समस्त आन्तरिक विकारों क्रोध-मान-माया-लोभ इत्यादि पर विजय प्राप्त कर ली है तथा कर्म-शत्रु को नष्ट कर दिया है, ऐसे आत्मजयी पुरुष ही जिन कहलाते हैं।
प्रश्न - क्या जिन किसी व्यक्ति-विशेष का नाम है?
उत्तर - नहीं, जिन व्यक्ति-विशेष का नहीं, अपितु पद-विशेष का नाम है। जो भी जीव अपने समस्त कर्मों को नष्ट कर स्वयंपर विजय प्राप्त कर लेते हैं, वे ही जिन पद प्राप्त करने से जिन कहलाते हैं।
प्रश्न - क्या जिनेन्द्र जन्म से ही भगवान होते हैं?
उत्तर - भगवान जन्मते नहीं, बल्कि बनते हैं। जब जीव स्वयं पुरुषार्थ पूर्वक मुनि अवस्था धारण कर, कठोर तप द्वारा अपने समस्त कर्मों को जला देते हैं, तब वे जीव जिनेन्द्र भगवान बन जाते हैं।
प्रश्न - जैन धर्म किसे कहते हैं?
उत्तर - जिनेन्द्र भगवान द्वारा जिस धर्म का प्रतिपादन किया जाता है, वही धर्म जैन धर्म कहलाता है।
प्रश्न - जैन धर्म की स्थापना किसने की?
उत्तर - जैन धर्म की स्थापना किसी व्यक्ति ने नहीं की। किसी तीर्थंकर ने भी जैन धर्म को नहीं बनाया, अपितु धर्म ने तीर्थंकरों को बनाया है। जैन धर्म अनादि-निधन धर्म है; अतः इसकी स्थापना अथवा निर्माण किसी ने नहीं किया है और किसी व्यक्ति द्वारा स्थापित न होने से यह धर्म किसी विशेष काल का भी नहीं है, अतः अनादि-निधन धर्म है।
प्रश्न - क्या ऋषभदेव भी जैन धर्म के संस्थापक नहीं हैं?
उत्तर - नहीं, भगवान ऋषभदेव जैन धर्म के संस्थापक नहीं, अपितु प्रथम प्रवर्तक हैं। वर्तमान युग के प्रारंभ में जैन धर्म को पुनरुज्जीवित करने के कारण चौबीस तीर्थंकर ऋषभदेव को जैन धर्म का संस्थापक कह दिया जाता है। वास्तव में ऋषभदेव से लेकर तीर्थंकर महावीर तक सभी चौबीस तीर्थंकर जैन धर्म के प्रवर्तक हैं, संस्थापक नहीं।
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जंगल-अरण्य में दूर दूर तक अपनी कल्पना को फैलाओ। कितना मुश्किल है सब करना खुद से खुद की दूरी को।
जानी-अनजानी बातें…
हमारे देश का नाम भारतवर्ष है। इससे पहले इस देश का नाम अजनाभखण्ड हुआ करता था, जो कि ऋषभदेव के पिता राजा नाभिराय के नाम से कहलाता था। जब ऋषभदेव के पुत्र भरत ने चक्रवर्ती पद धारण कर संपूर्ण राष्ट्र को सुसंगठित किया था, इसी अवसर पर इस देश का नाम अजनाभखण्ड के स्थान पर भारतवर्ष घोषित किया था।
प्राचीन काल में जैनधर्म को ब्रह्म-धर्म (ब्रह्म को धारण करने के कारण), श्रमण-धर्म (श्रम-तप की मुख्यता होने से) अर्हन्त-धर्म (अर्हन्त भगवान का धर्म होने से) इत्यादि नामान्तरों से भी जाना जाता था।
मन का कार्य हित-अहित का विचार करना होता है। इसलिए इष्ट-अनिष्ट बुद्धि तो एकेन्द्रिय से लेकर सभी जीवों तक सभी को होती है, परंतु हित-अहित बुद्धि मात्र मनसहित संज्ञी जीवों के ही होती है।
महापुरुष कहलाने वाले जो 63 शलाका पुरुषों में से किसी की भी वृद्धावस्था नहीं आती। उन्हें आहारा तो होता है, परंतु निहारा नहीं होता।
उलझे सवालों के सुलझे जवाब
प्रश्न - भवनान्तर संसार इत्यादि के पाठ से क्या इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट का परिहार संभव है?
उत्तर - अच्छा या बुरा होना हमारे पुण्य-पाप के उदय के अनुसार तथा कर्मों के फलानुसार ही होता है। अर्हन्त, धर्माचार्य, मंत्राक्षर स्तोत्र इत्यादि में अतुल्य शक्ति है; परन्तु इष्ट प्राप्ति-अनिष्ट परिहार तो स्वयं के पुण्य-पाप के अनुसार ही संभव है।
प्रश्न - मन को नोइन्द्रिय अथवा किंचित इन्द्रिय क्यों कहते हैं? क्या मन वास्तव में इन्द्रिय नहीं है?
उत्तर - यद्यपि मन भी अन्य पाँच इन्द्रियों की तरह पुद्गल कर्म की होने से इन्द्रिय ही है, परंतु आदि इन्द्रियों का विषय नहीं होता है तथा इन्द्रियों को आँख, नाक, बाहरी आकार से देख-को जान पाना संभव नहीं नोइन्द्रिय अथवा किंचित इन्द्रिय कहा जाता है।
प्रश्न - क्या अध्यात्म और आगम परम भिन्न हैं?
उत्तर - अध्यात्म और आगम दोनों ही मूल उद्देश्य जीव को मोक्षमार्ग में ले जाना है, परंतु जहाँ अध्यात्म मोक्षमार्ग का प्रतिपादन मात्र आत्मतत्त्व के वर्णन द्वारा करता है, वहीं आगम में सभी द्रव्यों का सविस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।
प्रश्न - कराओ और पाप में अंतर है?
उत्तर - ये तो हम जानते ही हैं कि क्रोध, मान, माया और लोभ - ये चार कषायें हैं तथा हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह - ये पाँच पाप हैं। पाप और कषाय में अंतर यह है कि कषायें कारण हैं और पाप कार्य हैं। अर्थात् मनुष्य कषायों के कारण ही पाप-कार्य करता है।
अच्छे दिन आने वाले हैं -
वीक्षाज्ञान जयन्ती -
1 अगस्त 2015 श्रावण कृष्णा प्रतिपदा, वीर निर्वाण संवत् 2541
इसी पावन दिवस पर भगवान महावीर की दिव्यध्वनि केवलज्ञान होने के पश्चात् 66 दिन के लंबे अंतराल के बाद मुनि गौतम गणधर की उपस्थिति में खिली थी। उन्हीं भगवान महावीर के धर्मतीर्थ का प्रवर्तन वर्तमान में चल रहा है। हम जैन धर्म को धारण करने वाले वीर प्रभु के शासन में रह रहे हैं। अतः यह दिन जैन समुदाय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मास इतना ही नहीं, जैन प्रथमानुसर श्रावण कृष्णा एकादशी का प्रथम मास और युग का आदि - प्रथम दिवस है। अर्थात् प्रत्येक सुषमा-सुषमा आदि कालों का प्रारंभिक दिवस से होता है। वर्तमान युग में इस दिन वीर प्रभु की दिव्यध्वनि खिलने से यह दिवस और भी महानतम एवं पूज्य हो गया है।
इस पावन अवसर पर हमें चाहिए कि हम नए युग की बजाय इस दिन संकल्प लें कि हम वीर शासन को और भी उन्नति के पथ पर लेकर जावें तथा वीर के द्वारा बताए गए पथ पर चलकर स्वयं भी वीर बन जावें।
रक्षाबन्धन पर्व -
29 अगस्त, 2015
श्रावण शुक्ल पूर्णिमा, वीर निर्वाण संवत् 2541
आपको ज्ञात होना चाहिए कि रक्षाबंधन पर्व विष्णुकुमार मुनि द्वारा अकाममरणाय आदि 700 मुनियों का उपसर्ग दूर करने और उनकी रक्षा करने के कारण मनाया जाता है। यदि इस दिन हम जैन समाज को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास करें तथा जैनशासन की रक्षा के साथ-साथ प्राणिमात्र की रक्षा का संकल्प लें तो यही सही मायने में रक्षाबंधन पर्व मनाना होगा।
दशलक्षण पर्व -
18 सितम्बर से 27 सितम्बर 2015
भाद्रपद शुक्ल सप्तमी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी, वीर निर्वाण संवत् 2541
पर्यूषण दशलक्षण मनाने का पवित्र अवसर आ रहा है। आत्माराधना, व्रतपालन व नियम-संयम धारण करके इस महापर्व की उत्कृष्टता को बनाए रखें तथा दशलक्षण
क्योंकि हेल्थ भी जरूरी है…
(मानव शरीर का मंत्रिमंडल)
प्रधानमंत्री हृदय
रक्षा मंत्री चर्म
सूचना मंत्री कान
खाद्य मंत्री पेट
उद्यम मंत्री मन
सिंचाई मंत्री किडनी
संसाधन मंत्री खून
गृह मंत्री फेफड़े
कृषि मंत्री बाल
जल मंत्री ब्लैडर
वित्त मंत्री जिगर
शिक्षा मंत्री दिमाग
प्रचार मंत्री जुबान
श्रम मंत्री हाथ
औद्योगिक मंत्री आँत
वितरण मंत्री गला
प्रसार मंत्री आँखें
रेल मंत्री पैर
राजस्व मंत्री रीढ़ की हड्डी
लोकनिर्माण मंत्री रीढ़ की हड्डी
सूचना - यदि हमारी शरीर का मंत्रिमंडल भ्रष्टाचार रहित और सदाचार युक्त जीवन शैली अपनाये तो निश्चित रूप से अच्छे दिन आने वाले हैं।
शब्द शक्ति
निर्जरा - धन-धान्य आदि परिग्रह को ग्रहण करते हैं और जो समस्त बाह्य और अन्तरंग परिग्रह से रहित हैं, वे निर्ग्रन्थ साधु कहलाते हैं।
अन्तर्मुहूर्त - जो उपरान्त जिन्हें केवलज्ञान होने वाला है, वे निर्ग्रन्थ कहलाते हैं।
लाइफ मंत्रा
अपने विचार
सकारात्मक रखें,
क्योंकि आपके विचार आपके शब्दों में ढल जाते हैं।
अपने शब्द
सकारात्मक रखें,
क्योंकि आपके कार्य आपकी आदत बन जाते हैं।
अपनी आदतें
सकारात्मक रखें,
क्योंकि आपकी आदतें जीवन शैली बन जाती है।
अपनी जीवन शैली
सकारात्मक रखें,
क्योंकि आपकी जीवन शैली आपकी तकदीर बन जाती है।
सकारात्मक विचार…
स्वस्थ, सुखी व सफल जीवन की कुंजी।
बिखरे मोती
हजारों मंजिलें मिलती हैं राहें जिंदगानी में
मगर इक आखिरी मंजिल वही मुश्किल से मिलती है।
जिन्हें शक है वे करें और खुदाओं की बेलाग,
हम तो हर ईसा को ही दुनिया का खुदा कहते हैं।
मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है,
वही होता है, जो होना होता है।
अशरफें औकात में फेंकें हुए दुअत पत्थर के समान है
जो लौटकर उसी पर गिरता है, जिसने उसे फेंका है।
Jain’s App
online
JAY JINENDRA 05:55
JULY 17, 2015
गलतियों से जुदा
तू भी नहीं, मैं भी नहीं।
दोनों इंसान हैं,
खुदा तू भी नहीं, मैं भी नहीं…!
तू मुझे और मैं तुझे इल्जाम देते हैं मगर
अपने अंदर झाँकना, तू भी नहीं, मैं भी नहीं…!
गलतफहमियों ने कर दी
दोनों में दूरियाँ, वरना फितरत का बुरा
तू भी नहीं, मैं भी नहीं…! 06:45
कितनी अजीब बात है न…!
एक पत्थर सिर्फ एक बार मंदिर जाता है
और भगवान बन जाता है…
इंसान हर रोज मंदिर जाते हैं,
फिर भी पत्थर ही रहते हैं।
इस कदर बद गए हैं अपने में सभी…
अगर भगवान भी आकर कहें कि मैं भगवान हूँ,
तो लोग पूछेंगे, किसके…? 07:05
फंडा जैन धर्म का
सब सच, मगर प्यार से…
‘सत्यमेव जयते’ अर्थात् सचाई की सदैव जीत होती है। सचाई की इस
ताकत के बावजूद इंसान के लिए सच बोलना सबसे ज्यादा मुश्किल होता है। सच
कड़वा भी होता है, चुभता भी है और झुलसाता भी है।
अंग्रेजी के मशहूर लेखक जादु इलियट सत्य के संदर्भ में कहते हैं कि यथार्थ में
सच बोलना मुश्किल है, लेकिन इससे भी ज्यादा मुश्किल है सच को उन शब्दों के सहारे
बोलना जो वास्तव में सच नहीं हैं। आप भले ही सच को आसानी से लपेट कर पेश न
करें, लेकिन इसे इस तरह कुछ अलग ढंग से बोल सकते हैं, जिससे वह दूसरों को चुभने
के बजाय, राहत पहुँचावे।
इस बात को हम एक कहानी के माध्यम से समझ सकते हैं। एक राजा था, जो
एक आँख से काना था। एक बार उसे सूझा कि वह चित्रकारों से अपना एक चित्र
बनवाये। पूरे राज्य में मुनादी करवा दी गई कि राजा साहब अपना चित्र बनवाना चाहते
हैं। सभी जानते थे कि राजा काना है तो किसप्रकार उन्हें चित्र में काना दिखा सकते
हैं। फिर भी तीन चित्रकार दरबार में उपस्थित होते हैं और राजा का चित्र बनाना शुरू
करते हैं।
पहला चित्रकार सोचता है कि मुझे तो सुंदर चित्र ही बनाना है और इसलिए वह
चित्र में राजा की दोनों आँखें बना देता है। चित्र सुंदर तो बन जाता है, परंतु वह चित्र झूठा
होने से राजा को पसंद नहीं आता।
दूसरा चित्रकार सोचता है कि मुझे तो राजा का असत् चित्र बनाना है और
इसलिए वह चित्र में राजा को एक आँख से काना दिखाता है। यद्यपि वह चित्र सच्चा था,
परंतु सुंदर नहीं होने के कारण अस्वीकृत हो जाता है।
तीसरा चित्रकार सोचता है कि मुझे चित्र सुंदर भी बनाना है और सच्चा भी,
इसलिए वह राजा का धनुष चलाते समय का चित्र बनाता है, जिससे प्रतीत होता है कि
मानो राजा ने निशाना साधने के लिए अपनी एक आँख बंद कर रखी है। और इस तरह
से तीसरा चित्रकार का चित्र सुंदर भी था और सच्चा भी, अतः सभी को पसंद आता है।
फंडा जैन धर्म का - सच बोलो, प्रिय बोलो। प्रिय झूठ मत बोलो, अप्रिय
सत्य भी मत बोलो।
वाणी… सर्वज्ञ की!
- तुच्छकेवली ने कहा है कि तीर्थों में, देवालयों में देव नहीं है। जिनदेव तो देव के
देवालय में विराजमान है, ऐसा निश्चित जानो। - योगसार - हे जीव ! जब तक वद्धावस्था नहीं आती, तब तक रोग रूपी अग्नि तेरी शरीर रूपी
झोपड़ी को नहीं जलाती, जब तक इन्द्रियों की शक्ति कम नहीं होती, तब तक अपना
आत्म हित कर ले। - भावपाहुड़ - आत्मनीतिं विनात्मज्ञानं न हि विद्यते।
वास्तविक सत्य मात्र इतना ही है कि स्वर्ग की छोड़कर अन्य कोई भी हमारा हित
करने वाला नहीं है। - श्रवणधर्मामृत 10/31 - क्षमापि देवोऽपि देवाः सया जाते धर्मकिरिणाम्।
कापि नाम भवेन्ध्याम्यमीधर्मकिरिणाम्।।
धर्म का ऐसा अद्भुत प्रभाव है कि स्वान (कुत्ता) भी स्वर्ग में जाकर देव होता है और
पाप के प्रभाव से स्वर्ग का देव भी स्वान हो जाता है। प्राणियों को धर्म के प्रभाव से और
भी अनिर्वचनीय अष्टमृद्धि की सम्पदा तथा अविनाशी मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
- रत्नकरंड श्रावकाचार
छोटी-सी बड़ी कहानी
मेहमान को भेजने गए थे
एक धर्मीनी सज्जन प्रतिदिन बिना अनुप्रेक्षित हुए स्वाध्याय में जाया करते थे। एक
दिन पुत्र की आकस्मिक मृत्यु के कारण वे उस दिन प्रवचन कार्यक्रम में शामिल नहीं हो
सके।
अगले दिन आने पर पंडिजी ने पूछा - क्या बात हुई? कल प्रवचन में नहीं आये?
उत्तर मिला - कल एक मेहमान को भेजने गये थे।
ठोकर ठीक से लगी थी या नहीं
एक साधु प्रतिदिन प्रवचन में कहते थे - मैं अपनी अमृत संपत्ति, धन-दौलत,
घर-परिवार सबको छोड़ कर आ आया हूँ। प्रतिदिन एक ही बात सुनाते सुनते-सुनते
गया एक श्रोता ने कहा - महाराज! वह ठोकर ठीक से लगी थी या नहीं।
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है