जैन तीर्थ विज्ञान — जैन स्वाध्याय सामग्री | Jain Teerth Vigyan

जैन तीर्थ विज्ञान

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

प्रथम संस्करण :

3000

(26 जनवरी, 1996)

मूल्य : आठ रुपये

टाइप सेटिंग :
प्रिन्टोमेटिक्स
लालकोठी, जयपुर
फोन 515480

मुद्रक :
सेठी ग्राफिक ऑफसेट प्रिन्टर्स प्रा. लि.
जयपुर, फोन - 568700

क्या/कहाँ

मंगलष्टक
मंगल पंचक
विधान प्रारम्भ करने की विधि
अभिषेक पाठ (संस्कृत)
जलाभिषेक पाठ (हिन्दी)
प्रतिमा प्रक्षाल पाठ
पूजा पीठिका
पञ्चपरमेष्ठी पूजन
विधान की समापन विधि
विभिन्न अवसरों पर उपयोगी
मन्त्रों की सूची
मन्दिर शुद्धि वेदी शुद्धि, एवं कलश
शुद्धि के ८९ मन्त्र
भक्ति पाठ
जिन मन्दिर शिलान्यास एवं वेदी तथा
शिखर निर्माण शुभारम्भ विधि
नूतन गृह प्रवेश विधि
जैन विवाह विधि
जैन धर्म में हवन : एक स्पष्टीकरण
शान्ति पाठ

प्रकाशकीय

धर्म प्रभावना के बाह्य अनुष्ठानों को सम्पन्न कराने में सहयोगी कृति ‘जैन विधि-विधान’ प्रकाशित करते हुए हम अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं। यह तो सर्वविदित ही है कि पूजन एवं विधानों के अनेक संकलन प्रकाशित करके समाज को उपलब्ध कराने का गौरव “अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन” को ही है। बहुश्रुतज्ञानीसमूह, सिद्धचक्रविधान, इन्द्रध्वजविधान, शान्तिविधान, चौंसठऋद्धि विधान, जिनेन्द्र अर्चना आदि अनेक महत्वपूर्ण कृतियाँ प्रकाशित करके इस संस्था ने समाज को महती आवश्यकता की पूर्ति हेतु सराहनीय प्रयास किये हैं।

समाज में जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव, वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव तथा अनेक प्रकार के पूजन-विधान के आयोजन प्रायः होते ही रहते हैं, जो धार्मिक रूप उत्पन्न करने तथा पुष्ट करने का सशक्त निमित्त हैं।

इन आयोजनों को सम्पन्न कराने के लिए एक सुनिश्चित विधि अनेक प्रतिष्ठा पाठों में उपलब्ध है। इस विधि को जानकारी अधिक से अधिक लोगों को हो तथा वे उसे समझकर स्वयं धार्मिक आयोजन सम्पन्न करा सकें और ऐसे आयोजन सम्पन्न कराने वाले तत्परिश्रमिक पुरोधाचार्य भी अधिक से अधिक तैयार हो सकें- इस उद्देश्य से यह कृति प्रकाशित की जा रही है। यद्यपि इससे पूर्व हमने विधान आरम्भ एवं समापन करने की विधि सिद्धचक्रविधान एवं इन्द्रध्वजविधान पुस्तकों में ही प्रकाशित की थी परन्तु इस पुस्तक का आकार २०-२५ पृष्ठों का बढ़ जाता तथा कीमत भी बढ़ जाती है, इसलिए यह उचित समझा गया कि विधान की पुस्तक में उक्त सामग्री प्रकाशित करने के बदले सभी अनुष्ठानों में काम में आने वाली जैनविधि अलग से संकलित करके प्रकाशित की जाय तो इस क्षेत्र में रुचि रखने वाले लोगों को सहज ही सामग्री उपलब्ध हो जायेगी तथा प्रत्येक पाठक के ऊपर अनावश्यक भार भी न पड़ेगा।

हमारे सहयोगी विद्वान ब्र.पं. अभिनन्दनकुमारजी शास्त्री द्वारा लिखित सिद्धचक्रविधान की प्रस्तावना एवं अन्य अनेक पुस्तकों के आधार से पण्डित अभयकुमारजी शास्त्री, जैनेन्द्रनाथचार्य ने अत्यन्त श्रम करके यह संकलन तैयार किया है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अलावा प्रायः सभी धार्मिक अनुष्ठान ज्ञान इसी संकलन के द्वारा सम्पन्न कराये जा सकते हैं। उन्होंने इसके प्रकाशन में गहरी रुचि लेते हुए सम्पादन एवं प्रूफरीडिंग स्वयं की है; अतः वे धन्यवाद के पात्र हैं।

इस संकलन को प्रकाशन व्यवस्था में हमारे साहित्य प्रकाशन एवं प्रचार विभाग के प्रभारी श्री अखिल बंसल भी धन्यवाद के पात्र हैं जिनका सहयोग प्रकाशन एवं बाइन्डिंग व्यवस्था को प्राप्त हुआ है।

प्रस्तुत प्रकाशन की कीमत कम करते हुए ३०००/- रु. गुप्तदान स्वरूप श्री गुण्डीलाल सत्यव्रत उदयपुर से प्राप्त हुए हैं। हम उक्त सहयोग कर्ता के हृदय से आभारी हैं।

मुझे आशा है कि यह संकलन धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करने में रुचि रखने वाले विद्वानों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा।

अ. सतीश चन्द्र शास्त्री
अध्यक्ष अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन

सम्पादकीय

वीतरागी देव-गुरु-धर्म के प्रति भक्तिभाव के पोषण एवं उनकी अभिव्यक्ति हेतु दिगम्बर जैन समाज में सैकड़ों वर्षों से अनेक व्यवहारिक अनुष्ठान प्रचलित हैं। नित्य-नियम जिन पूजन, अष्टाह्निका, दशलक्षण आदि नैसर्गिक पूजन तो धर्मानागी श्रावकों की दिनचर्या में ही सम्मिलित है। वृहद स्तर पर आयोजित जिनबिम्ब-पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव, वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव, सिद्धचक्र विधान, इन्द्रध्वज विधान आदि धार्मिक उत्सवों के आयोजन भी समाज में निरन्तर होते ही रहते हैं।

आध्यात्मिक सत्पुरुष श्री कानजीस्वामी कृत आध्यात्मिक क्रान्ति के फलस्वरूप आज ये अनुष्ठान जीवन्त हो गये हैं। पूजन-विधान आदि भक्ति प्रधान कार्यक्रमों के साथ-साथ आध्यात्मिक प्रवचनों, शिक्षण कक्षाओं तथा तात्विक विचार गोष्ठियों के आयोजनों से अब ये कार्यक्रम मात्र बाह्य क्रियाकाण्ड न रहकर वीतरागी तत्वज्ञान के प्रचार-प्रसार के सशक्त माध्यम बन गये हैं। मुमुक्षु समाज में प्रत्येक कार्यक्रम में प्रवचन आदि ज्ञानप्रधान कार्यक्रम अनिवार्य हो गये हैं, अतः पूजन-विधान के साथ-साथ आध्यात्मिक शिक्षण शिविरों का आयोजन भी होने लगा है। साहित्य एवं कैसेट विक्रय के माध्यम से भी ये कार्यक्रम जिनवाणी के प्रचार-प्रसार में अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं। अनेक सामाजिक संस्थाओं के सम्मेलनों के आयोजनों से इन कार्यक्रमों की सामाजिक उपयोगिता भी सिद्ध होती है।

उक्त अनुष्ठानों में जाच्य स्थापना, इन्द्र प्रतिष्ठा आदि अनेक कार्यक्रम सम्पन्न कराये जाते हैं, जिनके आवश्यक निर्देश, मंत्र आदि प्रायः प्रतिष्ठा पाठों में उपलब्ध होने से ये प्रत्येक प्रतिष्ठाचार्य को सुलभ नहीं हो पाते। समाज में ऐसे कार्यक्रमों की बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए यह आवश्यकता महसूस की गई कि जैन विधि-विधान का एक ऐसा संकलन तैयार किया जाये जिसमें प्रत्येक कार्यक्रम के नियम, मंत्र आदि व्यवस्थित क्रम में हों तथा उन्हें सम्पन्न कराने की स्पष्ट प्रक्रिया दी गई हो ताकि साधारण अध्ययनशील विद्वान भी इन कार्यक्रमों को सम्पन्न करा सकें।

इस आवश्यकता को ध्यान में रखकर पंडित नाथूलालजी कृत प्रतिष्ठा प्रदीप एवं पण्डित पन्नालाल जी साहित्याचार्य द्वारा सम्पादित कृति वेदी प्रतिष्ठा एवं कलशारोहण विधि के आधार से इस जैन विधि-विधान का संकलन किया गया है। हमारे विशेष सहयोगी प्रतिष्थाचार्य बाल ब्र. अभिनन्दनकुमारजी शास्त्री ने सिद्धचक्रविधान की प्रस्तावना विधान में प्रारम्भ करने एवं समापन करने की विधियाँ दी हैं जिनका विशेष आधार इस संकलन में लिया गया है। उन्होंने जैन धर्म में हवनःएक स्पष्टीकरण शीर्षक से एक लेख में शुद्धान्नय का समभाव स्पष्टीकरण किया है, जिसे इस संकलन में सम्मिलित किया गया है। अतः इन सभी विद्वानोंका हार्दिक आभार है।

आशा है विधि-विधान सम्पन्न कराने में रुचि रखने वाले विद्वानों को यह संकलन एक मार्गदर्शक के रूप में सहायक सिद्ध होगा।

पण्डित अभयकुमार जैन
एम.कॉम. जैन दर्शनाचार्य

मंगलाष्टक

शार्दूल विक्रीडित

श्री संजीब गोधा

अरिहन्तो भगवन्त इन्द्रमहिताः सिद्धाश्च सिद्धीश्वरा,
आचार्या जिनशासनोन्नतिकराः पूज्या उपाध्यायाकाः।
श्रीसिद्धांऽसुतपाढोकाः मुनिवराः रत्नत्रयाराधकाः,
पञ्चैते परमेष्ठिनः प्रतिदिनं कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ १ ॥

श्रीमन्नम्रसुरेन्द्रमुकुटप्रद्योतप्रभाभास्वरम्
भास्वत्पाद-नखेन्दवः प्रवचनाम्भोधीन्दवः स्थायिनः।
ये सर्वे जिनसिद्ध सुरनगतास्ते पाठकाः साधवः,
स्तुत्या योगिनिजेष्ट पंचगुरुवः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ २ ॥

सम्यग्दर्शन-बोध-वृत्तममलं रत्नत्रयं पावनम्,
मुक्तिश्री नगराधिनाथ-जिनपत्युक्तोऽपवर्गप्रदः।
धर्मः सूक्तिसुधा च चैत्यमखिलं चैत्यालयं श्रयालयं,
प्रोक्तं च त्रिविधं चतुर्विधममी कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ३ ॥

नाभेयादि-जिनाधिपास्त्रिभुवनख्याताः चतुर्विंशतिः,
श्रीमद् भरतेश्वरप्रभृतयो ये चक्रिणो द्वादश।
ये विष्णु प्रतिविष्णु-नागलधराः सप्नोत्तरा विंशतिः,
त्रैकाल्ये प्रथितास्त्रिषष्ठिपुरुषाः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ४ ॥

ये सर्वौषधऋद्धयः सुतपसो वृद्धागता पंच ये,
ये चारणैण महानिमित्तकुशला येऽष्टाविधचारणाः।
पंचज्ञानधरास्त्रयोऽपिबलिमो ये बुद्धि-ऋद्धीश्वराः,
सप्तैते सकलाचिता गणभृतः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ५ ॥

कैलासे वृषभस्य निवृतिहिमही वीरस्य पावापुरे,
चम्पायां वसुपूज्य सज्जनपदे सममेदशेऽर्हताम्।
शेषाणामपि चोर्जयन्तशिखरे नेमीश्वरस्यार्हतो,
निर्वाणावनयः प्रसिद्धिभववाः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ६ ॥

जैन विधि विधान ५

ज्योतिर्वन-भावनारम्यै मेरुं कुलाद्रौ स्थिता,
जम्बू-शाल्मलि-चैत्यशाखिषु तथा वक्षार-रौप्याद्रिषु।
इष्वाकारगिरौ च कुण्डलगे द्वीपे च नंदीश्वरे,
शैले ये मनुजोत्तरे जिनगृहाः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ७ ॥

यो गर्भावतरणोत्सवो भगवतां जन्माभिषेकोत्सवो,
यो जातः परिनिष्क्रमण विभवो यः केवलज्ञानभाक्।
यः कैवल्यपुप्रवेशमहिमा संभावितः स्वर्गिभिः,
कल्याणानि च तानि पंच सततं कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ८ ॥

इत्थं श्री जिनमंगलाष्टकमिदं सौभाग्यसंपत्प्रदं करं,
कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियस्तीर्थीकरणो मुदकरं।
ये श्रुण्वन्ति पठन्ति तैश्च सुजनैर्धर्मायकामाऽन्विता,
लक्ष्मीराश्रयते व्यापराहिता निर्वाणलक्ष्मीरपि ॥ ९ ॥

भजन

तर्ज :- ए मेरे वतन के लोगो…

तू जाग रे चेतन प्राणी, कर आतम की अगवानी।
जो आतम को लखते हैं उनको है अमर कहानी ॥टेक॥
है ज्ञान मात्र निज ज्ञायक, जिसमें है ज्ञेय झलकते।
यह झलकन भी ज्ञायक है, इसमें नहीं ज्ञेय महकते ॥
यह दर्शन - ज्ञान स्वरूपी, मेरी चैतन्य निशानी ॥ १ ॥
है भीगा है कण-कण मेरा, हो गई अखण्ड सरसता।
समकित की मधु चितवन में झलकती है मुक्ति निशानी ॥ २ ॥
ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शांति बरसती इनमें।
मानों आया सिद्धालय, मेरी बस्ती हो उसमें ॥
मैं हूं शिवपुर का वासी, भव भव की खतम कहानी ॥ ३ ॥

जैन विधि विधान ६

मंगल पंचक

हरिगीतिका

गुणरत्नभूषा विगतदुषाः सौम्यभावानिशाकराः।
सद्रोध-भानुविभा-विभाषितदिव्यया विदुषांवराः।
निःसीमसोख्यसमूह मण्डित योगखण्डित्तरांवराः।
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते श्री वीरनाथ जिनेश्वराः ॥ १ ॥

सद्ध्यानतीक्ष्ण-कृपाणधारा निहतकर्मकदम्वकाः।
देवेन्द्रवृन्दनेन्द्रवन्द्याः प्राप्तसुखिनिरुत्क्रम्वकाः।
योगीन्द्रयोगनिरूपणीयाः प्राप्तबोधकलापकाः।
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते सिद्धाः सदा सुखदायकाः ॥ २ ॥

आचारपंचकचरणचारुचंचवः समताधराः।
नानांतपोभरहेतिहापितकर्मकाः सुखिताकराः।
गुप्तित्रयीपरिशीलनादिविभूषिता वदतांवराः।
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते श्री सूरयोऽजितशंभराः ॥ ३ ॥

द्रव्यार्थ भेदविभिन्नश्रुतभरपूर्ण तत्त्वनिशालिनो
दुर्योगयोगनिरोधदक्षाः सकलवरगुणशालिनः।
कर्तव्यदेशनतत्परा विज्ञानगौरवशालिनः
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते गुरुदेवदीधितिमालिनाः ॥ ४ ॥

संयमसमितिलावश्यका-परिहाणगुप्तिविभूषिताः
पंचाक्षदांन्तिसमुद्यताः समतासुधापरिपूषिताः।
भूपुष्पिविहरसायिनो विविधवृन्दविभूषिता
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते मुनयः सदा शंभूषिताः ॥ ५ ॥


जैन विधि विधान /७

विधान प्रारम्भ करने की विधि :-

जाप्य स्थापना

१. जाप्य में बैठने वालों के लिए आवश्यक नियम :-
(विद्यालयार्थ द्वारा निम्न जाप्य में बैठने वाले भाइयों को बता दिये जावें)
(१) इन्द्रध्वज मंडल विधान में अपनी शक्ति व समय का विचार कर ११ हजार, ५१ हजार, ७१ हजार या सवा लाख तक जप प्रतिष्ठाचार्य द्वारा निर्दिष्ट मंत्र का किया जाना चाहिए।
(२) जप करनेवाले व्यक्ति गृहीतमिथ्यात्व, लोकनिंद्यकार्य, अन्याय व अभक्ष्य के त्यागी अवश्य हो।
(३) अनुष्ठान के दिनों में पूर्ण संयम, ब्रह्मचर्य से रहें।
(४) रात्रि में चारों प्रकार के आहार (खाद्य, पान, लेह, स्वाद्य) ग्रहण नहीं करें। बाजार (होटलादि) का भोजन न लें। दिन में दो बार शुद्ध भोजन करें। बीच में पान, सुपारी, गुटका आदि का सेवन न करें।
(५) मंत्र का शुद्ध उच्चारण करें एवं परस्पर बातें न करें।
(६) शारीरिक व मानसिक व्याधिमुक्त न हो।
(७) जप के समय शुद्ध धोती-दुपट्टे पहने।
(८) मंत्र का जाप प्रतिदिन करें तथा अपना संकल्प पूरा करें।
(९) जप के पूर्ण होने पर्यंत यज्ञोपवीत धारण करें तथा सभी नियमों का पालन करें।
(१०) महोत्सव की अवधि तक चमड़े की वस्तुओं के प्रयोग का त्याग करें।
(११) सूर्योदय के पश्चात् एवं सूर्यास्त से पूर्व दिन में ही जप करें।
२. जाप्य स्थापना विधि में निम्न कार्य सम्पन्न होंगे :-

  • (क) प्रारम्भिक तैयारी (ख) मंगल कलश स्थापना (ग) यन्त्र्याभिषेक (घ) अमृत स्नान (ङ) मंगलाचरण (च) अंगाभ्यास (छ) पंचपरमेष्ठी पूजन (ज) जाप संकल्प।
    (क) प्रारम्भिक तैयारी :-
    विधान प्रारम्भ करने वाले दिन प्रातःकाल सूर्योदय के बाद जाप प्रारम्भ करें। जाप का स्थान एकान्त में हो, जहाँ बालक या अन्य जन जाप में व्यवधान न कर सकें। कमरा शुद्ध जल से धोकर साफ कर लिया जाए।
    पूर्व या उत्तर दिशा में सम्मुख शुद्ध जल से धोकर टेबिल, चौकी एवं सिंहासन रखे। टेबिल के ऊपर चंदोवा बाँधे तथा चंदोवे के बीच में सिंहासन के ऊपर छत्र बाँधे। टेबिल पर यंत्राभिषेक के लिए थाली, शुद्ध जल के दो कलश एवं शुद्ध वस्त्र रखे।

जैन विधि विधान /८

टेबिल के दोनों ओर जाप में बैठनेवाले व्यक्तियों की संख्यानुसार शुद्धजल से धुले हुए पाटे लगा दिये जावें जिनपर निम्न सामग्री रखी जाए-
[पूजन की सामग्री, पूजन की पुस्तक, माला, लोंग, एक कटोरी में संकल्प की सामग्री (हल्दी, सुपारी, पीली सरसों) एवं कागज पर लिखा हुआ जाप का मंत्र]
सर्व प्रथम सिंहासन पर विनायकचन्द्र विराजमान करें।
(ख) मंगल कलश स्थापना :-
मंगल कलश में हल्दी, सुपारी, सवा रुपया, पुष्प, पीली सरसों आदि डालकर उसके मुँह पर नारियल रखकर केशरिया कपड़े से ऐसी बंधन के धागे से अच्छी तरह पहिले से बंद कर चंदन, गोला, कागज आदि की माला तैयार रखें। विधानाचार्य निम्न मंत्र बोलकर विधान कराने वाले या अन्य प्रमुख व्यक्ति द्वारा यन्त्रजी के बायें तरफ पुष्पों से स्वस्तिक बनाकर मंगल कलश स्थापित करायें।
अहं भगवतो महापुरुषस्य श्रीमदादि ब्रह्मणो मतेऽस्मिन्मासेपक्षेतिथौवासरेवर्षे इहनगरेमन्दिरेकार्यस्य निर्विघ्नसमर्थाय पद्मपद्मविशुद्धयर्थ पात्रशुद्धयर्थ शान्त्यर्थ पुष्प्याह्वानार्थ पंचरत्न-गंधपुष्पाक्षतादीबीजपरोपभित मंगलकलशस्थापनं करोभ्यहम ह्रीं ह्रौं हं सः स्वाहा
(ग) यन्त्र्याभिषेक :-
यन्त्र जी थाली में विराजमान करके विधानाचार्य निम्न मंत्र बोलते हुए दो प्रमुख व्यक्तियों से यन्त्रजी का अभिषेक करावें।
ह्रीं भूर्भुवः स्वर्विह विघ्नोत्थावनार्थ यन्त्र मं परिषंचयः
(अभिषेक के पश्चात् शुद्ध वस्त्र से यन्त्रजी को पोंछकर पुनः सिंहासन पर विराजमान करें।)
(द) अमृतस्नान :-
विधानाचार्य, जाप में सम्मिलित होनेवाले सभी व्यक्तियों को हाथ धोकर दाहिने हाथ में जल लेने का निर्देश देते हुए निम्न मंत्र बोलकर जल के छोटे मर्तक पर डालने को कहें।
अमृते अमृतोदभवे अमृतवर्षिणि अमृत द्रावय द्रावय सं वसंती क्लीं ब्लूं द्रों द्रों द्रावय द्रावय हं सः ह्रीं ह्रौं हं सः स्वाहा
(ङ) मंगलाचरण के लिए :-
प्रारम्भ में दिये गये मंगलाष्टक/मंगल पंचक पढ़ते समय प्रत्येक छन्द के अन्त में थाली में पुष्प क्षेपण करें।

जैन विधि विधान /९

(त) अंगन्यास

मंगलाष्टक के बाद शरीर की रक्षा और तसद् दिशाओं से आनेवाले विघ्नों की निवृत्ति के लिए नीचे लिखे अनुसार अंगन्यास करें। दोनों हाथों से अंगूठे से लेकर कनिष्ठिका पर्यन्त पाँचों अंगुलियों में क्रम से अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी की स्थापना करें।
सर्वप्रथम दोनों हाथों के अंगूठों को बराबरी से मिलाकर सामने करें। इस मंत्र का उच्चारण कर सिर झुकावें।
ॐ ह्रीं णमो अरहंताणं ह्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें और दोनों हाथों की तर्जनियों (अंगूठे के पास की अंगुलियाँ) को बराबरी से मिलाकर सामने करें।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें फिर बीच की दोनों अंगुलियों को मिलाकर सामने करके-
ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं मध्यमाभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर दोनों अनामिकाओं को सामने करें, और-
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें फिर दोनों छिंगुलियों को मिलाकर सामने करें और-
ॐ ह्रीं णमो लोए सव्वसाहूणं ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें फिर दोनों हथेलियों को बराबर सामने फैलाकर
ॐ ह्रीं ह्रीं हूं हूं हः करतलाभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें फिर दोनों करपृष्ठों को बराबर सामने फैलाकर-
ॐ ह्रीं ह्रीं हूं हूं हः करपृष्ठाभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें और निम्न मंत्र पढ़कर अपने सिर का स्पर्श करें।
ॐ ह्रीं णमो अरहंताणं ह्रीं मम शीर्ष रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर अपने मुख का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं मम वदनं रक्ष रक्ष स्वाहा।

जैन विधि विधान /१०

निम्न मंत्र पढ़कर हृदय का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं मम हृदयं रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मंत्र पढ़कर नाभि का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ह्रीं मम नाभिं रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मंत्र पढ़कर पैरों का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो लोएसव्वसाहूणं ह्रीं मम पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मंत्र पढ़कर शरीर पर जल सिंचन करें-
ॐ ह्रीं ह्रीं हूं हूं हः मम सर्वांग शुद्धिं कुरु कुरु स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर प्रतिवार्य पूर्व दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों श्रेपण करें।
ॐ ह्रीं णमो अरहंताणं ह्रीं पूर्वदिशः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर दक्षिण दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों श्रेपण करें।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं दक्षिणदिशः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर पश्चिम दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों श्रेपण करें।
ॐ ह्रीं ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं पश्चिमदिशः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर उत्तर दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों श्रेपण करें।
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ह्रीं उत्तरदिशः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर दशों दिशाओं में पुष्प या पीली सरसों श्रेपण करें।
ॐ ह्रीं ह्रीं णमो लोएसव्वसाहूणं ह्रीं सर्वदिशभ्यः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर अपने शरीर का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो अरहंताणं ह्रीं मम गात्रं रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर अपने वस्त्रों का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं मम वसनं रक्ष रक्ष स्वाहा।

जैन विधि विधान /११

निम्न मंत्र पढ़कर अपने पूजन सामग्री का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं मम पूजा द्रव्यं रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर अपने खड़े होने की जगह की ओर देखें।
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं मम पूजा स्थलं रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर चुल्लू में जल लेकर सब ओर श्रेपण करें।
ॐ ह्रीं णमो लोएसव्वसाहूणं ह्रीं सर्वं जगत् रक्ष रक्ष स्वाहा।
मंत्र से चुल्लू के जल को मंत्रित कर अपने सिर पर सींचे।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं श्रीं सर्वदिशासु, ह्रां ह्रीं हूं हः सर्वदिशासु ॐ ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणी अमृत स्रावयं सं सं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय ठः ठः स्वाहा।
तदनंतर प्रतिष्ठाचार्य पुष्प अथवा पीली सरसों को सात बार निम्न मंत्र पढ़कर परिचारकों के सिर पर डालें।
ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा।
तत्पश्चात निम्न मंत्र से पुष्प अथवा पीली सरसों को मंत्रित कर सब दिशाओं में फेंकें।
ॐ ह्रीं फट् किरि किरि किरीट किरीट घातय घातय परिविघ्नान् स्फोटय स्फोटय सहस्रखण्डान् कुरु कुरु परमृद्रां छिन्द छिन्द परमन्रान् भिन्द भिन्द वाः वाः हूं फट् स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर जप करनेवाले महाशयों के दाहिने मणिबन्ध (कलाई) में रक्षासूत्र बांधें।
ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा।
तदनंतर निम्नोक्त श्लोक पढ़कर जप करनेवाले अपने ललाट पर केशर का तिलक लगावें-
मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥
निम्न मंत्र का सबसे उच्चारण कराकर यज्ञोपवीत धारण करावें।
ॐ नमः परम्शान्ताय शान्तिकराय पवित्रिकरणाय अर्ह रत्नत्रयस्वरूपं यज्ञोपवीतं दधामि मम गात्रं पवित्रं भवतु अर्ह नमः स्वाहा।
(च) पंच परमेष्ठी पूजन :-
पृष्ठ क्रमांक २९ पर दी गई पूजन पीठिका को पढ़कर पंचपरमेष्ठी पूजन करें।

जैन विधि विधान /१२

(द) जाप संकल्प :-

जिस मंत्र का जाप करना हो वह मंत्र जाप करने वाले प्रत्येक व्यक्ति से सुन लिया जाए, तथा शुद्ध उच्चारण का अभ्यास करा दिया जाए।
जाप में बैठनेवाले व्यक्तियों की संख्या के आधार पर जाप की कुल संख्या का परिणाम इस प्रकार निर्धारित करें कि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन अधिकतम ७ या ९ मालाओं का जाप करे।
जाप करनेवाले व्यक्ति खड़े होकर दाहिने हाथ में संकल्प की सामग्री ले ले। विधानाचार्य द्वारा निम्न मंत्र छोटे-छोटे हिस्सों में पढ़ा जाए जिसे सभी लोग दोहराएँ। संकल्प करने के बाद संकल्प की सामग्री पादे के दायें कोने पर रख दी जाए। यह सामग्री पूरे विधान पर्यन्त इसी स्थान पर रखी रहे।

संकल्प लेने का मंत्र

अंगूठा दबाकर
“ॐ जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे देश प्रांत नगर ऋतौ मासे तिथौ संवत्सरे जैन मन्दिरे कार्यस्य निर्विघ्नसमाप्त्यर्थं इति प्रमितस्य जापस्य संकल्पं कुर्मः, निर्विघ्न समाप्तिर्भवतु अहं नमः स्वाहा।”
जाप के मंत्र - निम्न में से प्रसंगानुसार किसी एक मंत्र के जाप का संकल्प करायें।

(१) ॐ ह्रीं अर्हं अ सि आ उ सा सर्वशान्ति कुरु कुरु स्वाहा।
(२) ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ सि आ उ सा सर्वशान्ति कुरु कुरु स्वाहा।
(३) ॐ ह्रां ह्रीं श्री क्लीं अर्हं अ सि आ उ सा अनाहत विद्याये णमो अरहंताणं सर्व शान्ति कुरु कुरु स्वाहा।
(४) ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ सि आ उ सा मध्यलोकसम्बन्धी चतुशताषंचाशीज्जन चैत्यचैत्यालयेभ्यो नमः।
(५) ॐ ह्रीं मध्यलोकसम्बन्धी शाश्वतजिनालयजिनबिम्बेभ्यो नमः।


जैन विधि विधान . १३

ध्वजारोहण विधि

मण्डप की अग्रभूमि में व्यवस्थानानुसार ध्वजदण्ड के पास ऊँची टेबुल पर सिंहासन में विनायक यंत्र विराजमान कर पंचपरमेष्ठी की पूजन करें। पूजनोपरांत मन्त्रोच्चार करते हुये ध्वजारोहणकर्ता द्वारा ध्वजदण्ड की शुद्धि कराके उस पर रक्षा सूत्र बंधवा दे।

निम्न मंत्र द्वारा ध्वजदण्ड की शुद्धि करावें-

ॐ ह्रीं श्री नमोऽर्हते पवित्र जलेन ध्वजदण्डं शुद्धिं करोमि।

निम्न मन्त्र द्वारा ध्वजदण्ड में रक्षा सूत्र बंधावे-

ॐ ह्रीं त्रिवर्णेन ध्वजदण्डं परिवेषयामि।
ध्वजदण्ड एवं ध्वज पर केसर से स्वस्तिक बनाकर धर्मात्मा, ज्ञानी आदि प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा ध्वजारोहण कराया जावे। ध्वजारोहण के समय निम्न श्लोक एवं मन्त्रोच्चार करें-
तद्देशेो ध्वजदण्डमुल्लैर्भवदिमानं गमनादिस्थत्।
निवेशयत्नेन शुभभोपदेशर्य महत्तताच्छोच्छ्रयणं विदध्यात्॥
ॐ ह्रीं अर्हं जिनशासनपताके स्तोच्छ्रिता तिलोठ्ठ भव ववद्ध स्वाहा।
ध्वजारोहण के पश्चात् सावधान होकर निम्न गीत बोला जाय

जैन ध्वज गीत

तर्ज- जन-गण-मन अधिनायक जय हे …।
मंगलमय अरु मंगलकारी, शासन ध्वज लहराता॥
अनेकान्तमय वस्तु व्यवस्था, का यह बोध कराता॥
स्याद्वाद शैली से जग का, संशय तिमिर मिटाता।
चहुँगति दुःख नशाता, जन-गण-मन हरषाता॥
जिन शासन सुखदाता॥
सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चरणमय मुक्ति, मार्ग दरशाता।
जय हे… जय हे… जय हे… जय जय जय हे॥
शासन ध्वज लहराता॥


जैन विधि विधान /१४

नादी विधान (मंगल कलश स्थापना)

नंद धातु का प्रयोग आनन्दित होने के अर्थ में किया जाता है। इसमें पंच प्रत्यय लगाने से नादी शब्द बनता है। नादी विधान से आशय अनुष्ठान पर्यंत लोक के आरम्भ तथा इन्द्रियविषयों का त्याग करके आनन्दपूर्वक जिनेन्द्र प्रभु की उपासना करने से है। अनुष्ठान में सम्मिलित होने वाले सभी लोगों को नादी विधान के समय उपस्थित रहना चाहिए। इसके अन्तर्गत मण्डल पर मंगल कलश की स्थापना की जाती है।
जिस व्यक्ति ने मंगल कलश की बोली ली हो अथवा अनुष्ठान में सम्मिलित होने वालों में से प्रमुख व्यक्ति के घर से प्रातःकाल मंगल कलश पर श्रीफल रखकर उसे केसरिया वस्त्र से ढक्कर तथा मंगल कलश में सवा रुपये, हल्दी, सुपारी, पीली सरसों आदि वस्तुएँ डालकर मंगल कलश को सजाना चाहिए। विधानाचार्य को मंगलाष्टक पढ़ते हुए पुष्पक्षेपण करना चाहिए तथा परिवार की सौभाग्यवती बहिनों द्वारा कलश पर स्वास्तिक कराना चाहिए। इसके पश्चात् उत्साहपूर्वक जिनेन्द्र भक्ति करते हुए बाजे-गाजे से जुलूस के रूप में मंगल कलश विधानस्थल तक लाना चाहिए तथा निम्न मंत्र बोलकर सौभाग्यवती बहिनों द्वारा मण्डल पर कलश स्थापित करना चाहिए।

मंगल कलश स्थापना मंत्र

ॐ अद्य भादवतो महापुरुषस्य श्रीमद्दिगंबराणां मतेस्मिन्… मासे… पक्षे… तिथौ… वासरे… वर्षे हं… नगरे… जिनमन्दिरे… मंडलाधिवास पंचविंशत्यामप्यष्टादशदिषु षोडशीमष्टमं पादशषष्ठं शान्त्यर्थं पुष्पावचनार्थं पंचरत्न-पुष्पाक्षतादिबीजं पूजोपभोगितं मंगलकलशस्थापनं करोम्यहं क्षीं क्षीं हं हं सः स्वाहा।

इन्द्र प्रतिष्ठा

इन्द्रों, इन्द्रणियों के लिए आवश्यक निर्देश-
(१) नियमित रूप से विधान में अन्त तक सम्मिलित रहें।
(२) स्वस्थ हों।
(३) विकलांग न हों।
(४) हीन आचरण वाले न हों।
(५) विधान के अन्त तक संयम (ब्रह्मचर्य) से रहें।
(६) गृहस्थोचित शुद्ध भोजन एक या दो बार करें। बीच में पान, सुपारी, गुटका, तम्बाकू आदि न खायें।
(७) विधान पर्यन्त व्यापार आदि लौकिक कार्यों की चिन्ता से मुक्त रहें।
(इन्द्रानी ६ माह से अधिक गर्भवती न हो)
जैन विधि विधान /१५

इंद्र-इंद्रणियों को उत्तम पीत वस्त्र धारण करावें। मुकुट बांधे तथा निम्नानुसार मंत्रोच्चारणपूर्वक क्रिया करावें।

निम्न मंत्र द्वारा रक्षा करावें-
ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष हुं फट् स्वाहा।
निम्न मंत्र द्वारा अमृत स्नान करावें-
ॐ अमृत अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृत स्रवस्य स्रं स्रं क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं हं क्ष्वीं क्ष्वीं हं हं स्वाहा।

तदनन्तर चंदन, मुकुट, माला, केयूर, हार, कुण्डल आदि उपलब्ध आभूषणों को एक थाली में रखकर मण्डल के सामने रखें और प्रतिष्ठाचार्य निम्नलिखित मंत्र बोलकर उन पर पुष्प तथा पीली सरसों डाले।
ॐ ह्रां ह्रीं अर्हत्त्णां ऊँ ह्रीं णमो सिद्धाणं ऊँ ह्रीं णमो आइरियाणं ऊँ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ऊँ ह्रीं णमो लोए सव्वसाहूणं इन्द्र-इन्द्राणीभूपणानि पवित्राणि कुरु कुरु स्वाहा।
निम्न श्लोक और मंत्र बोलकर ललाट, मस्तक, ग्रीवा, हृदय, दोनों भुजाएँ, प्रकोष्ठ, नाभि और पृष्ठ भाग में नौ तिलक लगावें।
पात्रेऽपित्त चन्दनमौषधीशं शुश्रुं सुगन्धात्तचंचरीकम्।
स्थाने नवांके तिलकया चच्र्यं न केवलं देविकारहेतोः॥
ॐ ह्रां ह्रीं हूं हूं हं सवीशगुद्धि कुरु कुरु स्वाहा।
निम्न श्लोक पढ़कर माला पहिनावें-
जिनाधिभूमिसुकृतां सर्जे मे स्वयंवरं यज्ञविधानपत्नी।
करोतु यत्वादचलत्वहेतोरितीव मालामुरीकरोमि॥
निम्न श्लोक पढ़कर अधोवस्त्र का स्पर्श करावें-
धौतान्तरीयं विधुकान्तिसूत्रैः सदग्रथितं धौतनवीनशुद्धम्।
नगन्तलम्भिर्न भवेत्तच यावत् संधार्यते भूषणोन्मभूभ्याः॥
निम्न श्लोक पढ़कर दुपट्टे का स्पर्श करावें-
संयानमंनंदचराया विभातमखण्डधौताभिनवं मृदुत्वम्।
संधार्यते पीत-सितांशवर्णमनोहरिष्ठाद्भुषणोभांकम्॥

जैन विधि विधान / ९६

निम्न श्लोक पढ़कर बन्धावें-
शीर्षेऽशुभभ्युकुटं त्रिलोकीं हर्षात्पराजस्य च पदबन्धम्।
दधामि पापौघिकुलप्रहन्तुं रत्नाढ्यमालाभिरुदन्वितांगम्॥
निम्न श्लोक पढ़कर कंठ में कण्ठभरण पहिनावें-
त्रैवेयकं मौक्तिकदामधाम-विराजितस्वर्णनिबद्धयुक्तम्।
दध्रेऽधरापर्णविसर्पपेच्छु-र्महाधनाभोगनिरूपणाकम्॥
निम्न श्लोक पढ़कर हार धारण करावें-
मुक्तावलीगोस्तनवृद्धमाला विष्पूणतगन्वनमाकभाजाम्।
यमार्हसंर्गगतानि यदु-लक्ष्मी समालिंगानकण्ठहेऽहम्॥
निम्न श्लोक पढ़कर कानों में कर्णभरण करावें-
एकत्र भास्वनपरत्र सामः सर्वां विधातुं जिनपरस्य भक्त्या।
रूपं परावृत्य च कुण्डलस्य मिषादवारते इव कुण्डले द्वे॥
निम्न श्लोक पढ़कर केयूर-बाजुबंद धारण करावें-
भुजासु केयूरमपारतदुष्ट वीर्यस्य सम्यक् जयकृद् ध्याजाकम्।
दधे निधीनां नवकैश्च रत्नै-विमंडितं सदग्रथितं सुवर्णै॥
निम्न श्लोक पढ़कर यज्ञोपवीत पहनावे-
यज्ञार्थमेव सुजातिदचक्रश्वरेण चिन्हं विधिभूषणाम्।
यज्ञोपवीतं विततं हि रत्नमय्यं मार्गं विधाभ्यतोऽहम्॥
निम्न श्लोक पढ़कर कटिसूत्र धारण करावें-
अर्यैश्च दीक्षा यजनस्य गाहैं कुर्वदिभरिष्ठैः कटिसूत्रमुख्यैः।
संभूषणैर्भूषयता शरीरं जिनेंद्रपूजा सुखदां घटैत्॥
निम्न श्लोक पढ़कर घर गृहस्थी के कार्यों से उत्पन्न पर्वत निवृत्त रहने की प्रतिज्ञा करावें-
विविधविघातुर्यजनोत्सवेऽहं गेहादिमुच्छ्र्षणमपनोदयामि।
अनन्यचेताः कृतिमादधामि रवागदितत्त्वसीमीपमं हापयामि॥
निम्न मंत्र २१ बार पढ़कर इंद्रों पर सरसों क्षेपण करें-
ॐ वज्राधिपत्ये आं ह्रीं अः एं ह्रीं हः क्षं क्षः इंद्राय सर्वांपदं।
निम्न मंत्र पढ़कर यजमानादि पर पुष्प क्षेपण करें-
ॐ ह्रीं अर्हं अ सि आ उ सा णमो अरहंताणं सत्तहिं समद्धिं सम्पुण्णणाणधराणं अनाहतपरक्कमले भवतु भवतु हो नमः।

जैन विधि विधान / ९७

अभिषेक पाठ

वसंततिलका
श्रीमन्तमार्हशिरस्तरदीप्तिं घोषावसिंश्चरणाम्बुजुगयुग्ममीशम्।
अर्दहन्तमृत्तनपदप्रदमाभिनम्यं त्वत्पुष्टिहेतुरुदधिमभिषेच्यं करिष्ये॥ १ ॥
अथ पौर्वाह्निकदेववंदनापूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भावपूजास्तव वंदनासमेतं श्रीपंचमहागुरुभक्तिस्तोत्रोत्सर्गं करोम्यहम्।
(१० बार णमोकार मंत्र पढ़े)
निम्न श्लोक पढ़कर पुष्पांजलि क्षेपण करके अभिषेक की प्रतिज्ञा करें-
याः कृत्रिमास्तदितराः प्रतिमा जिनस्य
संस्थापयन्ति पुरहुतमुखादयस्ताः।
सद्भावलक्ष्यिसमयादिनिमित्तयोगा-
स्तत्रैवमुज्ज्वलकुसुमं क्षिपामि॥ २ ॥
इति अभिषेक प्रतिज्ञाय पुष्पांजलिं क्षिपामि।
निम्न श्लोक पढ़कर अभिषेक की थाली में केशर से श्री लिखें-
उपजाति
श्रीपीठोत्कृष्टे विशदाक्षतीषै श्रीप्रस्तवेः पूर्णशांककल्पे।
श्रीवर्तके चन्द्रमसीति वार्तां सत्यापयन्तीं श्रियमालिखामि॥ ३ ॥
ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं श्रीलेखनं करोमि।
निम्न श्लोक पढ़कर सिंहासन स्थापित करें-
अनुष्टुप
कनकादिभिर्मं कर्म पावनं पुण्यकारणम्।
स्थापयामि परं पीठं जिनस्पनय भक्तेः॥ ४ ॥
ॐ ह्रीं श्रीं पीठस्थापनं करोमि।
निम्न श्लोक पढ़कर प्रतिमा विराजमान करें-
भृंगारचामरसुरदीर्णपीठीकुंभ- तालध्वजात्पवनिवारकभूषिताये।
वर्षश्व नन्द जय पाठपावलीभिः सिंहासनं जिनभवत्समहे श्रयामि॥ ५ ॥
ॐ ह्रीं श्रीं धर्मतीर्थाधिनाथ! भगवन्निहपण्डुकशिलापीठे सिंहासने तिष्ठ तिष्ठ।

जैन विधि विधान / ९८

निम्न श्लोक पढ़कर चारों कोनों में चार कलश रखें—

श्रीतीर्थकृत्पनवर्यविधी सुरेन्द्रः
श्रीराभिरुचारिभिरुग्रदयैकमान्।
ताँस्तद्गशान्निविभाय यथार्हणीयान्
संस्थापये कुसुमदनुभूषिताये ॥६॥
ॐ ह्रीं चतुष्कोणेषु चतुर्कलशस्थापनं करोमि।

निम्न श्लोक पढ़कर अर्घ्य चढ़ावें, वादिन नाद करावें तथा जय-जय शब्द का उच्चारण करें—

आनन्दनिर्भरसुप्रददिग्गनादैः
वादित्रपुरजयशब्दकलप्रशस्तैः।
उद्दीयमानजगतीपतिकीर्तिमेनी
पीठस्थली वसुविधाचनर्योलसामि ॥७॥
ॐ ह्रीं स्वपनपीठस्थिताय जिनायर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

निम्न श्लोक पढ़कर चारों कलशों से अभिषेक करें—

कर्मप्रबन्धनिगडेरपि हीनताप्तं ज्ञात्वापि भक्तिशतः परमादिदेवम्।
त्वा स्वीयकल्यपगुणोन्नथनाय देव शुद्धोदकैर्नभियामि नभार्थवत्वम् ॥८॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं वं मं हं सं तं पं वं हं हं सं सं तं तं पं झं झं क्षीं क्षीं ह्राँ ह्रीं ह्रो ह्रो द्रां द्रीं द्रो द्रावय द्रावय नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रजलनेन जिनार्घ्यभिषवयामि स्वाहा।

निम्न श्लोक पढ़कर गन्धोदक माथे पर चढ़ावें—

दूरावनम्रमसुनाथाकिरीटकोटी संसन्नरलकिरणच्छविभूसराणि।
प्रश्वेददामलममुक्तमपिप्रकृष्टै-र्भक्त्या जलेर्जिपतिनपुहृषाभिषिंचे ॥९॥
ॐ ह्रीं श्रीमन्तं भगवन्तं कृपालस्तं वृषभदिमहावीरपर्यन्तं
चतुर्विंशतितीर्थकरपरमदेव आद्यानामोऽर्घ्यं जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे…नाम्नि
नगर मासानामुत्तमे मासे…मासे…पक्षे…शुभ दिने पुण्यार्हका श्रावकादिकानां
सकलकर्मक्षयार्थं जलनेनाभिषिंचयामिः।

निम्न श्लोक पढ़कर अर्घ्य चढ़ावें—

पानीयनन्दनसद्क्षतपुष्पपुंजं,
नैवेद्यदीपकमधूपफलप्रजेन।
जैन विधि विधान / १९

कर्माष्टक-क्रोधनवीरमननशक्ति,
संपूजयामि महसा महसां निधानम् ॥१०॥
ॐ ह्रीं अभिषेकने वृषभादिवीरातेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

निम्न श्लोक पढ़कर शान्ति के लिए पुष्पांजलि छोड़ें—

हे तीर्थपा विजयशोभवलीकृताशाः
सिद्धौपधाश्च भवदुःखमहागदानाम्।
सद्द्रव्यहृज्जनितपंकजस्यकल्पा
पूयं जिनाः सततशान्तिकरा भवन्तु ॥११॥

निम्न श्लोक पढ़कर गन्धोदक मस्तक पर चढ़ावें—

नत्वा परीत्न निजनेत्रललाटयोश्च
व्याप्तं क्षणेन हरताद्यसंचयं मे।
शुद्धोदकं जिनपते तव पादयोगात्
भूयादभवात्पहारं धृतमादरेण ॥१२॥
अनुष्टुप

निर्मल निर्मलीकरणं पवित्रं पापनाशनम्।
जिनगन्धोदकं वन्दे सर्वकर्मविनाशनम् ॥१३॥
शार्दूलविक्रीडित

मुक्ति श्री वनिताकरोदकमिदं पुण्यांकुरोत्पादकं,
नागेन्द्र त्रिदशेन्द्र चक्रपदवी राज्याभिषेकोदकं
सम्यग्ज्ञान चरित्र दर्शनलता संवृद्धि सम्पादकं,
कीर्ति श्रीजय साधकं तव जिन स्नानस्य गंधोदकम् ॥१४॥

निम्न श्लोक पढ़कर प्रतिमाजी को शुद्ध और स्वच्छ वस्त्र से पोंछें—

वसन्ततिलका

नत्वा मुहुर्निज करैरमृतोपमेयैः,
स्वच्छैर्जिनेन्द्र तव चन्द्रकरावदातैः।
शुद्धांशुकेन विमलेन नितान्तरम्यै,
देहे स्थितान् जलकणांस्परिमार्जयामि ॥१५॥
जैन विधि विधान / २०

ॐ अपलाशोकेन जिनबिम्बामार्जनं करोमि।

निम्न श्लोक पढ़कर प्रतिमा को सिंहासन पर विराजमान करें—

स्नानं विधाय भवतोऽष्टसहस्रनाम्ना—
मुच्चारणेन मनसो वचसो विशुद्धिं।
जिघ्रभृत्रिभिन तेऽष्टतयी विधातुं,
सिंहासने विधिवदत्र निवेशयामि ॥१६॥

निम्न श्लोक पढ़कर अर्घ्य चढ़ावें—

अनुष्टुप

जलंगन्धाक्षतैः पुष्पैश्चरुदीपुसुधूपकैः।
फलैर्धर्जिनेमर्चये जन्मदुःखोपहानये ॥१७॥
ॐ ह्रीं श्रीं पीठस्थिताय जिनायर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

निम्न श्लोक पढ़कर करपुष्प क्षेपण करें—

शिखरिणी

इमे नेत्रे जाते सुकृतजलसिंक्ते सफलते,
ममेदं मानुष्यं कृतिजनगणोदेयमभवत्।
दमद्यादालोभादशवसुकर्मटनमभूत्
सदेदक् पुण्योघो मम भवतु ते पूजनविधिौ ॥१८॥
(पुष्पांजलि क्षिप्त करें)


जैन विधि विधान / २१

जलाभिषेक पाठ

दोहा

जय जय भगवते सदा, मंगल मूल महान।
वीतराग सर्वज्ञ प्रभु, नमों जोरि जुगपान ॥

अष्टक और गीता

श्रीजिन जग में ऐसो को बुधवंत जू।
जो तुम गुण वरननि करि पावै अन्त जू॥
इन्द्रादिक सुर चार ज्ञानधारी मुनि।
कहि न सकै तुम गुणगण हे त्रिभुवन धनी॥
अनुपम अमित तुम गुणनि वारिधि ज्यों अलोकाकाश है।
किमि धरे हम उर कोष में सो अकथ गुण-मणिराश है॥
पै जिन ! प्रयोजन सिद्धि की तुम नाम ही में शक्ति है।
यह चित्त में सरधान यातै नाम ही में भक्ति है ॥१॥

ज्ञानावरणी दर्शन-आवरणी भनें।
कर्म मोहनी अन्तराय चारों हनें॥
लोकालोक विलोक्यो केवलज्ञान में।
इन्द्रादिक के मुकुट नये सुरथान में॥
तब इन्द्र जान्यो अवधि तैं, उठि सुरनयुत वंदत भयो।
तुम पुण्य को प्रेरयो हरि है मुदित धनपति सौं कह्यो॥
अब वेगि जाय रचो समवसूति सफल सुरपद को करो।
साक्षात् श्री अरहत के दर्शन करो कलमष हरो ॥२॥
ऐसे वचन सुने सुरपति के धनपति।
चल आयो तत्काल मोद धारै अति॥
वीतराग छबि देखि शब्द जय-जय कहो।
देय प्रदक्षिणा बार-बार वंदत भयो॥
अति भक्ति भीनी नभचित्त है सवशरण रच्यो सही।
ताकी अनुपम शुभ गति को कहन समरथ कोउ नहीं ॥

प्राकार तोरण सभामंडप कनक भूमियम छाजहीं।
नगजड़ित गंधकुटी मनोहर मध्यभाग विराजहीं ॥३॥
सिंहासन तामय बन्यो अद्भुत दिये।
तापर वाजि रच्चो प्रभा दिनकर छिपै॥
तीन छत्र सिर शोभित चौंसठ चमरजी।
महाभक्तियुत दोरत हैं तहाँ अमरजी॥
प्रभु तरनतारन कमल ऊपर, अन्तरीक्ष विराजिया।
यह वीतराग दशा प्रत्यक्ष बिलोकि, भविजन सुख लिया॥
मुनि आदिद्वाश सभा के भवि जीव मस्तकनायके।
बहुभाँति बारम्बार पूजें, नम्रै गुणगण गायके ॥४॥
परमोदारिक दिव्य देह पावन सही।
क्षुधा तृषा चिन्ताभय गद दूषण नहीं॥
जन्मजरा मृत्यु अरतिशोक विस्मय नसै।
राग रोष निद्रा मद मोह सबै खसै॥
श्रम बिना श्रमजरलरहित पावन, अमल ज्योति स्वरूपजी।
शरणागतिनि की अशुचिता हरि, करत विमल अनूपजी॥
ऐसे प्रभु की शांतमुद्रा को नहन जलतैं करें।
‘जस’ भक्तिवश मन उदित तैं, हम भानु द्विगु दीपक धरै ॥५॥
तुम तो सहज पवित्र यही निश्चय भयो।
तुम पवित्रता हेत नहीं मज्जन ठयो॥
मैं मलीन रागादिक मलतैं है रह्यो।
महामलिन तन में वसुविधवश दुख सह्यो॥
प्रीत्यो अनंतो काल यह, मेरी अशुचिता ना गई।
तिस अशुचिताहर एक तुम ही, भरहु बांछा चित्त उठई॥
अब अष्टकर्म विनाश सब मल, दोष-रागादिक हरो।
तनरूप कारागेह तैं, उद्धार शिववासा करो ॥६॥
मैं जानत तुम अष्टकर्म हरि शिव गये।
आवागमन विमुक्त रागवर्जित भये॥

पर तथापि मेरो मनरथ पूरत सही।
नय-प्रमाण तैं जानि महा साता लही॥
पापाचरण तजि नहन करता चित्त में ऐसे धरूँ।
साक्षात् श्री अरहत का मानों नहन परसन करूँ॥
ऐसे विमल परिणाम होते अशुभ नशि शुभबन्ध तैं।
विधि अशुभ नसि शुभ बन्धते हैं शर्म, सवविधि नासतैं ॥७॥
पावन मेरे नयन भये तुम दरस तैं।
पावन पाणि भये तुम चरननि परस तैं॥
पावन मन है गयो तिहारे ध्यान तैं।
पावन रसना मानी, तुम गुण गान तैं॥
पावन भई परजाय मेरी, भयो मैं पूरण धनी।
मैं शक्तिपूर्वक भक्ति कीनी, पूर्णभक्ति नहीं बनी॥
धनि धन्य ते बड़भागि भवि तिन नीव शिवघर की धरी।
वर क्षीरसागर आदि जत मनि-कुम्भभरी भक्ति करी ॥८॥
विघन-सहन-वन-दाहन दहन प्रचण्ड हो।
मोह-महातम-दलन प्रबल मार्तण्ड हो॥
ब्रह्मा विष्णु महेश आदि संज्ञा धरो।
जगविजयी जमराज नाश ताको करो॥
आनन्दकारण दुख निवारण, परममंगलमय सही।
मोसो पतित नहि और तुमसो, पतित-तार सुन्यो नहीं॥
चिंतामणि पारस कल्पतरु, एक भव सुखकार हो।
तुम भक्ति-नौका जे चढ़े; ते भये भवदधि पार हो ॥९॥
तुम भवदधि तैं तरि गये, भये निकल अविकार।
तारतम्य इस भक्ति को, हमें उतारो पार ॥१०॥
निर्मललवक्ष से प्रतिमाजी को साफ कर निम्न श्लोक बोलकर गन्धोदक ग्रहण करें।
निर्मलीकरणं, पावनम् पापनाशनम्।
जिनचरणोदकं वन्दे, अष्टकर्म विनाशम् ॥

जैन विधि विधान / २२
जैन विधि विधान / २३
जैन विधि विधान / २४

प्रतिमा प्रक्षाल पाठ

दोहा

परिणामों की स्वच्छता के निमित्त जिनबिम्ब।
इसीलिए मैं निरखता, इनमें निज प्रतिबिंब ॥
पञ्च प्रभु के चरण में, वन्दन करूँ त्रिकाल।
निर्मल जल से कर रहा, प्रतिमा का प्रक्षाल ॥
अद्य पौर्वाह्निक देववन्दनायां पुण्यार्जनुकमेण सकलकर्मक्षयार्थ भावपूजा
स्तवनादिसमेतं श्री पंचमहागुरुभक्तिपूर्वककायोत्सर्गं करोम्यहम् ।
(नी बार णमोकार मंत्र पढ़ें)
(छप्पय)
तीन लोक के कृत्रिम और अकृत्रिम सारे।
जिनबिम्बों को नित प्रति अगणित नमन हमारे ॥
श्री जिनवर की अन्तर्मुख छवि उर में धारूँ।
जिन में निज का,निज में जिन-प्रतिबिम्ब निहारूँ ॥
मैं करूँ आज संकल्प शुभ, जिन प्रतिमा प्रक्षाल का।
यह भाव सुमन अर्पण करूँ फल चाहूँ गुणमाल का ॥
ॐ ह्रीं प्रक्षाल प्रतिज्ञायै पुण्यांजलिं क्षिपामि।
(प्रक्षाल की प्रतिज्ञा हेतु पुष्प क्षेपण करे)

रोला

अन्तरंग बहिरंग सुलक्खी से जो शोभित।
जिनकी मंगल वाणी पर है त्रिभुवन मोहित ॥
श्री जिनवर सेवा से क्षय मोहादि विपत्ति।
हे जिन ! श्री लिख पाऊँगा निज-गुण सम्पति ॥
ॐ ह्रीं श्री तेरहत्नं करोमि।
(थाली की चौकी पर केशर से श्री लिखे)

दोहा

अन्तर्मुख मुद्रा सहित शोभित श्री जिनराज।
प्रतिमा प्रक्षालन करूँ, धरूँ पीठ यह आज ॥
ॐ ह्रीं श्री पीठस्थापनं करोमि।
(प्रक्षाल हेतु थाली स्थापित करें)
जैन विधि विधान / २५

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स्रोत: Gyata संग्रह।

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