जैन तीर्थ विज्ञान — जैन स्वाध्याय सामग्री | Jain Teerth Vigyan

जैन तीर्थ विज्ञान

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अनुक्रमणिका

क्र. विवरण
1 प्रथम संस्करण :
2 क्या/कहाँ
3 प्रकाशकीय
4 सम्पादकीय
5 मंगलाष्टक
6 भजन
7 मंगल पंचक
8 विधान प्रारम्भ करने की विधि :-
9 जाप्य स्थापना
10 (त) अंगन्यास
11 (द) जाप संकल्प :-
12 संकल्प लेने का मंत्र
13 ध्वजारोहण विधि
14 निम्न मंत्र द्वारा ध्वजदण्ड की शुद्धि करावें-
15 निम्न मन्त्र द्वारा ध्वजदण्ड में रक्षा सूत्र बंधावे-
16 जैन ध्वज गीत
17 नादी विधान (मंगल कलश स्थापना)
18 मंगल कलश स्थापना मंत्र
19 इन्द्र प्रतिष्ठा
20 इंद्र-इंद्रणियों को उत्तम पीत वस्त्र धारण करावें। मुकुट बांधे तथा निम्नानुसार मंत्रोच्चारणपूर्वक क्रिया करावें।
21 अभिषेक पाठ
22 निम्न श्लोक पढ़कर चारों कोनों में चार कलश रखें—
23 निम्न श्लोक पढ़कर अर्घ्य चढ़ावें, वादिन नाद करावें तथा जय-जय शब्द का उच्चारण करें—
24 निम्न श्लोक पढ़कर चारों कलशों से अभिषेक करें—
25 निम्न श्लोक पढ़कर गन्धोदक माथे पर चढ़ावें—
26 निम्न श्लोक पढ़कर अर्घ्य चढ़ावें—
27 निम्न श्लोक पढ़कर शान्ति के लिए पुष्पांजलि छोड़ें—
28 निम्न श्लोक पढ़कर गन्धोदक मस्तक पर चढ़ावें—
29 निम्न श्लोक पढ़कर प्रतिमाजी को शुद्ध और स्वच्छ वस्त्र से पोंछें—
30 निम्न श्लोक पढ़कर प्रतिमा को सिंहासन पर विराजमान करें—
31 निम्न श्लोक पढ़कर अर्घ्य चढ़ावें—
32 निम्न श्लोक पढ़कर करपुष्प क्षेपण करें—
33 जलाभिषेक पाठ
34 दोहा
35 अष्टक और गीता
36 प्रतिमा प्रक्षाल पाठ
37 दोहा
38 रोला
39 दोहा

प्रथम संस्करण :

3000

(26 जनवरी, 1996)

मूल्य : आठ रुपये

टाइप सेटिंग :
प्रिन्टोमेटिक्स
लालकोठी, जयपुर
फोन 515480

मुद्रक :
सेठी ग्राफिक ऑफसेट प्रिन्टर्स प्रा. लि.
जयपुर, फोन - 568700

क्या/कहाँ

मंगलष्टक
मंगल पंचक
विधान प्रारम्भ करने की विधि
अभिषेक पाठ (संस्कृत)
जलाभिषेक पाठ (हिन्दी)
प्रतिमा प्रक्षाल पाठ
पूजा पीठिका
पञ्चपरमेष्ठी पूजन
विधान की समापन विधि
विभिन्न अवसरों पर उपयोगी
मन्त्रों की सूची
मन्दिर शुद्धि वेदी शुद्धि, एवं कलश
शुद्धि के ८९ मन्त्र
भक्ति पाठ
जिन मन्दिर शिलान्यास एवं वेदी तथा
शिखर निर्माण शुभारम्भ विधि
नूतन गृह प्रवेश विधि
जैन विवाह विधि
जैन धर्म में हवन : एक स्पष्टीकरण
शान्ति पाठ

प्रकाशकीय

धर्म प्रभावना के बाह्य अनुष्ठानों को सम्पन्न कराने में सहयोगी कृति ‘जैन विधि-विधान’ प्रकाशित करते हुए हम अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं। यह तो सर्वविदित ही है कि पूजन एवं विधानों के अनेक संकलन प्रकाशित करके समाज को उपलब्ध कराने का गौरव “अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन” को ही है। बहुश्रुतज्ञानीसमूह, सिद्धचक्रविधान, इन्द्रध्वजविधान, शान्तिविधान, चौंसठऋद्धि विधान, जिनेन्द्र अर्चना आदि अनेक महत्वपूर्ण कृतियाँ प्रकाशित करके इस संस्था ने समाज को महती आवश्यकता की पूर्ति हेतु सराहनीय प्रयास किये हैं।

समाज में जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव, वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव तथा अनेक प्रकार के पूजन-विधान के आयोजन प्रायः होते ही रहते हैं, जो धार्मिक रूप उत्पन्न करने तथा पुष्ट करने का सशक्त निमित्त हैं।

इन आयोजनों को सम्पन्न कराने के लिए एक सुनिश्चित विधि अनेक प्रतिष्ठा पाठों में उपलब्ध है। इस विधि को जानकारी अधिक से अधिक लोगों को हो तथा वे उसे समझकर स्वयं धार्मिक आयोजन सम्पन्न करा सकें और ऐसे आयोजन सम्पन्न कराने वाले तत्परिश्रमिक पुरोधाचार्य भी अधिक से अधिक तैयार हो सकें- इस उद्देश्य से यह कृति प्रकाशित की जा रही है। यद्यपि इससे पूर्व हमने विधान आरम्भ एवं समापन करने की विधि सिद्धचक्रविधान एवं इन्द्रध्वजविधान पुस्तकों में ही प्रकाशित की थी परन्तु इस पुस्तक का आकार २०-२५ पृष्ठों का बढ़ जाता तथा कीमत भी बढ़ जाती है, इसलिए यह उचित समझा गया कि विधान की पुस्तक में उक्त सामग्री प्रकाशित करने के बदले सभी अनुष्ठानों में काम में आने वाली जैनविधि अलग से संकलित करके प्रकाशित की जाय तो इस क्षेत्र में रुचि रखने वाले लोगों को सहज ही सामग्री उपलब्ध हो जायेगी तथा प्रत्येक पाठक के ऊपर अनावश्यक भार भी न पड़ेगा।

हमारे सहयोगी विद्वान ब्र.पं. अभिनन्दनकुमारजी शास्त्री द्वारा लिखित सिद्धचक्रविधान की प्रस्तावना एवं अन्य अनेक पुस्तकों के आधार से पण्डित अभयकुमारजी शास्त्री, जैनेन्द्रनाथचार्य ने अत्यन्त श्रम करके यह संकलन तैयार किया है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अलावा प्रायः सभी धार्मिक अनुष्ठान ज्ञान इसी संकलन के द्वारा सम्पन्न कराये जा सकते हैं। उन्होंने इसके प्रकाशन में गहरी रुचि लेते हुए सम्पादन एवं प्रूफरीडिंग स्वयं की है; अतः वे धन्यवाद के पात्र हैं।

इस संकलन को प्रकाशन व्यवस्था में हमारे साहित्य प्रकाशन एवं प्रचार विभाग के प्रभारी श्री अखिल बंसल भी धन्यवाद के पात्र हैं जिनका सहयोग प्रकाशन एवं बाइन्डिंग व्यवस्था को प्राप्त हुआ है।

प्रस्तुत प्रकाशन की कीमत कम करते हुए ३०००/- रु. गुप्तदान स्वरूप श्री गुण्डीलाल सत्यव्रत उदयपुर से प्राप्त हुए हैं। हम उक्त सहयोग कर्ता के हृदय से आभारी हैं।

मुझे आशा है कि यह संकलन धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न करने में रुचि रखने वाले विद्वानों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा।

अ. सतीश चन्द्र शास्त्री
अध्यक्ष अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन

सम्पादकीय

वीतरागी देव-गुरु-धर्म के प्रति भक्तिभाव के पोषण एवं उनकी अभिव्यक्ति हेतु दिगम्बर जैन समाज में सैकड़ों वर्षों से अनेक व्यवहारिक अनुष्ठान प्रचलित हैं। नित्य-नियम जिन पूजन, अष्टाह्निका, दशलक्षण आदि नैसर्गिक पूजन तो धर्मानागी श्रावकों की दिनचर्या में ही सम्मिलित है। वृहद स्तर पर आयोजित जिनबिम्ब-पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव, वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव, सिद्धचक्र विधान, इन्द्रध्वज विधान आदि धार्मिक उत्सवों के आयोजन भी समाज में निरन्तर होते ही रहते हैं।

आध्यात्मिक सत्पुरुष श्री कानजीस्वामी कृत आध्यात्मिक क्रान्ति के फलस्वरूप आज ये अनुष्ठान जीवन्त हो गये हैं। पूजन-विधान आदि भक्ति प्रधान कार्यक्रमों के साथ-साथ आध्यात्मिक प्रवचनों, शिक्षण कक्षाओं तथा तात्विक विचार गोष्ठियों के आयोजनों से अब ये कार्यक्रम मात्र बाह्य क्रियाकाण्ड न रहकर वीतरागी तत्वज्ञान के प्रचार-प्रसार के सशक्त माध्यम बन गये हैं। मुमुक्षु समाज में प्रत्येक कार्यक्रम में प्रवचन आदि ज्ञानप्रधान कार्यक्रम अनिवार्य हो गये हैं, अतः पूजन-विधान के साथ-साथ आध्यात्मिक शिक्षण शिविरों का आयोजन भी होने लगा है। साहित्य एवं कैसेट विक्रय के माध्यम से भी ये कार्यक्रम जिनवाणी के प्रचार-प्रसार में अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं। अनेक सामाजिक संस्थाओं के सम्मेलनों के आयोजनों से इन कार्यक्रमों की सामाजिक उपयोगिता भी सिद्ध होती है।

उक्त अनुष्ठानों में जाच्य स्थापना, इन्द्र प्रतिष्ठा आदि अनेक कार्यक्रम सम्पन्न कराये जाते हैं, जिनके आवश्यक निर्देश, मंत्र आदि प्रायः प्रतिष्ठा पाठों में उपलब्ध होने से ये प्रत्येक प्रतिष्ठाचार्य को सुलभ नहीं हो पाते। समाज में ऐसे कार्यक्रमों की बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए यह आवश्यकता महसूस की गई कि जैन विधि-विधान का एक ऐसा संकलन तैयार किया जाये जिसमें प्रत्येक कार्यक्रम के नियम, मंत्र आदि व्यवस्थित क्रम में हों तथा उन्हें सम्पन्न कराने की स्पष्ट प्रक्रिया दी गई हो ताकि साधारण अध्ययनशील विद्वान भी इन कार्यक्रमों को सम्पन्न करा सकें।

इस आवश्यकता को ध्यान में रखकर पंडित नाथूलालजी कृत प्रतिष्ठा प्रदीप एवं पण्डित पन्नालाल जी साहित्याचार्य द्वारा सम्पादित कृति वेदी प्रतिष्ठा एवं कलशारोहण विधि के आधार से इस जैन विधि-विधान का संकलन किया गया है। हमारे विशेष सहयोगी प्रतिष्थाचार्य बाल ब्र. अभिनन्दनकुमारजी शास्त्री ने सिद्धचक्रविधान की प्रस्तावना विधान में प्रारम्भ करने एवं समापन करने की विधियाँ दी हैं जिनका विशेष आधार इस संकलन में लिया गया है। उन्होंने जैन धर्म में हवनःएक स्पष्टीकरण शीर्षक से एक लेख में शुद्धान्नय का समभाव स्पष्टीकरण किया है, जिसे इस संकलन में सम्मिलित किया गया है। अतः इन सभी विद्वानोंका हार्दिक आभार है।

आशा है विधि-विधान सम्पन्न कराने में रुचि रखने वाले विद्वानों को यह संकलन एक मार्गदर्शक के रूप में सहायक सिद्ध होगा।

पण्डित अभयकुमार जैन
एम.कॉम. जैन दर्शनाचार्य

मंगलाष्टक

शार्दूल विक्रीडित

श्री संजीब गोधा

अरिहन्तो भगवन्त इन्द्रमहिताः सिद्धाश्च सिद्धीश्वरा,
आचार्या जिनशासनोन्नतिकराः पूज्या उपाध्यायाकाः।
श्रीसिद्धांऽसुतपाढोकाः मुनिवराः रत्नत्रयाराधकाः,
पञ्चैते परमेष्ठिनः प्रतिदिनं कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ १ ॥

श्रीमन्नम्रसुरेन्द्रमुकुटप्रद्योतप्रभाभास्वरम्
भास्वत्पाद-नखेन्दवः प्रवचनाम्भोधीन्दवः स्थायिनः।
ये सर्वे जिनसिद्ध सुरनगतास्ते पाठकाः साधवः,
स्तुत्या योगिनिजेष्ट पंचगुरुवः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ २ ॥

सम्यग्दर्शन-बोध-वृत्तममलं रत्नत्रयं पावनम्,
मुक्तिश्री नगराधिनाथ-जिनपत्युक्तोऽपवर्गप्रदः।
धर्मः सूक्तिसुधा च चैत्यमखिलं चैत्यालयं श्रयालयं,
प्रोक्तं च त्रिविधं चतुर्विधममी कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ३ ॥

नाभेयादि-जिनाधिपास्त्रिभुवनख्याताः चतुर्विंशतिः,
श्रीमद् भरतेश्वरप्रभृतयो ये चक्रिणो द्वादश।
ये विष्णु प्रतिविष्णु-नागलधराः सप्नोत्तरा विंशतिः,
त्रैकाल्ये प्रथितास्त्रिषष्ठिपुरुषाः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ४ ॥

ये सर्वौषधऋद्धयः सुतपसो वृद्धागता पंच ये,
ये चारणैण महानिमित्तकुशला येऽष्टाविधचारणाः।
पंचज्ञानधरास्त्रयोऽपिबलिमो ये बुद्धि-ऋद्धीश्वराः,
सप्तैते सकलाचिता गणभृतः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ५ ॥

कैलासे वृषभस्य निवृतिहिमही वीरस्य पावापुरे,
चम्पायां वसुपूज्य सज्जनपदे सममेदशेऽर्हताम्।
शेषाणामपि चोर्जयन्तशिखरे नेमीश्वरस्यार्हतो,
निर्वाणावनयः प्रसिद्धिभववाः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ६ ॥

जैन विधि विधान ५

ज्योतिर्वन-भावनारम्यै मेरुं कुलाद्रौ स्थिता,
जम्बू-शाल्मलि-चैत्यशाखिषु तथा वक्षार-रौप्याद्रिषु।
इष्वाकारगिरौ च कुण्डलगे द्वीपे च नंदीश्वरे,
शैले ये मनुजोत्तरे जिनगृहाः कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ७ ॥

यो गर्भावतरणोत्सवो भगवतां जन्माभिषेकोत्सवो,
यो जातः परिनिष्क्रमण विभवो यः केवलज्ञानभाक्।
यः कैवल्यपुप्रवेशमहिमा संभावितः स्वर्गिभिः,
कल्याणानि च तानि पंच सततं कुर्वन्तु ते मंगलम् ॥ ८ ॥

इत्थं श्री जिनमंगलाष्टकमिदं सौभाग्यसंपत्प्रदं करं,
कल्याणेषु महोत्सवेषु सुधियस्तीर्थीकरणो मुदकरं।
ये श्रुण्वन्ति पठन्ति तैश्च सुजनैर्धर्मायकामाऽन्विता,
लक्ष्मीराश्रयते व्यापराहिता निर्वाणलक्ष्मीरपि ॥ ९ ॥

भजन

तर्ज :- ए मेरे वतन के लोगो…

तू जाग रे चेतन प्राणी, कर आतम की अगवानी।
जो आतम को लखते हैं उनको है अमर कहानी ॥टेक॥
है ज्ञान मात्र निज ज्ञायक, जिसमें है ज्ञेय झलकते।
यह झलकन भी ज्ञायक है, इसमें नहीं ज्ञेय महकते ॥
यह दर्शन - ज्ञान स्वरूपी, मेरी चैतन्य निशानी ॥ १ ॥
है भीगा है कण-कण मेरा, हो गई अखण्ड सरसता।
समकित की मधु चितवन में झलकती है मुक्ति निशानी ॥ २ ॥
ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शांति बरसती इनमें।
मानों आया सिद्धालय, मेरी बस्ती हो उसमें ॥
मैं हूं शिवपुर का वासी, भव भव की खतम कहानी ॥ ३ ॥

जैन विधि विधान ६

मंगल पंचक

हरिगीतिका

गुणरत्नभूषा विगतदुषाः सौम्यभावानिशाकराः।
सद्रोध-भानुविभा-विभाषितदिव्यया विदुषांवराः।
निःसीमसोख्यसमूह मण्डित योगखण्डित्तरांवराः।
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते श्री वीरनाथ जिनेश्वराः ॥ १ ॥

सद्ध्यानतीक्ष्ण-कृपाणधारा निहतकर्मकदम्वकाः।
देवेन्द्रवृन्दनेन्द्रवन्द्याः प्राप्तसुखिनिरुत्क्रम्वकाः।
योगीन्द्रयोगनिरूपणीयाः प्राप्तबोधकलापकाः।
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते सिद्धाः सदा सुखदायकाः ॥ २ ॥

आचारपंचकचरणचारुचंचवः समताधराः।
नानांतपोभरहेतिहापितकर्मकाः सुखिताकराः।
गुप्तित्रयीपरिशीलनादिविभूषिता वदतांवराः।
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते श्री सूरयोऽजितशंभराः ॥ ३ ॥

द्रव्यार्थ भेदविभिन्नश्रुतभरपूर्ण तत्त्वनिशालिनो
दुर्योगयोगनिरोधदक्षाः सकलवरगुणशालिनः।
कर्तव्यदेशनतत्परा विज्ञानगौरवशालिनः
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते गुरुदेवदीधितिमालिनाः ॥ ४ ॥

संयमसमितिलावश्यका-परिहाणगुप्तिविभूषिताः
पंचाक्षदांन्तिसमुद्यताः समतासुधापरिपूषिताः।
भूपुष्पिविहरसायिनो विविधवृन्दविभूषिता
कुर्वन्तु मंगलमत्र ते मुनयः सदा शंभूषिताः ॥ ५ ॥


जैन विधि विधान /७

विधान प्रारम्भ करने की विधि :-

जाप्य स्थापना

१. जाप्य में बैठने वालों के लिए आवश्यक नियम :-
(विद्यालयार्थ द्वारा निम्न जाप्य में बैठने वाले भाइयों को बता दिये जावें)
(१) इन्द्रध्वज मंडल विधान में अपनी शक्ति व समय का विचार कर ११ हजार, ५१ हजार, ७१ हजार या सवा लाख तक जप प्रतिष्ठाचार्य द्वारा निर्दिष्ट मंत्र का किया जाना चाहिए।
(२) जप करनेवाले व्यक्ति गृहीतमिथ्यात्व, लोकनिंद्यकार्य, अन्याय व अभक्ष्य के त्यागी अवश्य हो।
(३) अनुष्ठान के दिनों में पूर्ण संयम, ब्रह्मचर्य से रहें।
(४) रात्रि में चारों प्रकार के आहार (खाद्य, पान, लेह, स्वाद्य) ग्रहण नहीं करें। बाजार (होटलादि) का भोजन न लें। दिन में दो बार शुद्ध भोजन करें। बीच में पान, सुपारी, गुटका आदि का सेवन न करें।
(५) मंत्र का शुद्ध उच्चारण करें एवं परस्पर बातें न करें।
(६) शारीरिक व मानसिक व्याधिमुक्त न हो।
(७) जप के समय शुद्ध धोती-दुपट्टे पहने।
(८) मंत्र का जाप प्रतिदिन करें तथा अपना संकल्प पूरा करें।
(९) जप के पूर्ण होने पर्यंत यज्ञोपवीत धारण करें तथा सभी नियमों का पालन करें।
(१०) महोत्सव की अवधि तक चमड़े की वस्तुओं के प्रयोग का त्याग करें।
(११) सूर्योदय के पश्चात् एवं सूर्यास्त से पूर्व दिन में ही जप करें।
२. जाप्य स्थापना विधि में निम्न कार्य सम्पन्न होंगे :-

  • (क) प्रारम्भिक तैयारी (ख) मंगल कलश स्थापना (ग) यन्त्र्याभिषेक (घ) अमृत स्नान (ङ) मंगलाचरण (च) अंगाभ्यास (छ) पंचपरमेष्ठी पूजन (ज) जाप संकल्प।
    (क) प्रारम्भिक तैयारी :-
    विधान प्रारम्भ करने वाले दिन प्रातःकाल सूर्योदय के बाद जाप प्रारम्भ करें। जाप का स्थान एकान्त में हो, जहाँ बालक या अन्य जन जाप में व्यवधान न कर सकें। कमरा शुद्ध जल से धोकर साफ कर लिया जाए।
    पूर्व या उत्तर दिशा में सम्मुख शुद्ध जल से धोकर टेबिल, चौकी एवं सिंहासन रखे। टेबिल के ऊपर चंदोवा बाँधे तथा चंदोवे के बीच में सिंहासन के ऊपर छत्र बाँधे। टेबिल पर यंत्राभिषेक के लिए थाली, शुद्ध जल के दो कलश एवं शुद्ध वस्त्र रखे।

जैन विधि विधान /८

टेबिल के दोनों ओर जाप में बैठनेवाले व्यक्तियों की संख्यानुसार शुद्धजल से धुले हुए पाटे लगा दिये जावें जिनपर निम्न सामग्री रखी जाए-
[पूजन की सामग्री, पूजन की पुस्तक, माला, लोंग, एक कटोरी में संकल्प की सामग्री (हल्दी, सुपारी, पीली सरसों) एवं कागज पर लिखा हुआ जाप का मंत्र]
सर्व प्रथम सिंहासन पर विनायकचन्द्र विराजमान करें।
(ख) मंगल कलश स्थापना :-
मंगल कलश में हल्दी, सुपारी, सवा रुपया, पुष्प, पीली सरसों आदि डालकर उसके मुँह पर नारियल रखकर केशरिया कपड़े से ऐसी बंधन के धागे से अच्छी तरह पहिले से बंद कर चंदन, गोला, कागज आदि की माला तैयार रखें। विधानाचार्य निम्न मंत्र बोलकर विधान कराने वाले या अन्य प्रमुख व्यक्ति द्वारा यन्त्रजी के बायें तरफ पुष्पों से स्वस्तिक बनाकर मंगल कलश स्थापित करायें।
अहं भगवतो महापुरुषस्य श्रीमदादि ब्रह्मणो मतेऽस्मिन्मासेपक्षेतिथौवासरेवर्षे इहनगरेमन्दिरेकार्यस्य निर्विघ्नसमर्थाय पद्मपद्मविशुद्धयर्थ पात्रशुद्धयर्थ शान्त्यर्थ पुष्प्याह्वानार्थ पंचरत्न-गंधपुष्पाक्षतादीबीजपरोपभित मंगलकलशस्थापनं करोभ्यहम ह्रीं ह्रौं हं सः स्वाहा
(ग) यन्त्र्याभिषेक :-
यन्त्र जी थाली में विराजमान करके विधानाचार्य निम्न मंत्र बोलते हुए दो प्रमुख व्यक्तियों से यन्त्रजी का अभिषेक करावें।
ह्रीं भूर्भुवः स्वर्विह विघ्नोत्थावनार्थ यन्त्र मं परिषंचयः
(अभिषेक के पश्चात् शुद्ध वस्त्र से यन्त्रजी को पोंछकर पुनः सिंहासन पर विराजमान करें।)
(द) अमृतस्नान :-
विधानाचार्य, जाप में सम्मिलित होनेवाले सभी व्यक्तियों को हाथ धोकर दाहिने हाथ में जल लेने का निर्देश देते हुए निम्न मंत्र बोलकर जल के छोटे मर्तक पर डालने को कहें।
अमृते अमृतोदभवे अमृतवर्षिणि अमृत द्रावय द्रावय सं वसंती क्लीं ब्लूं द्रों द्रों द्रावय द्रावय हं सः ह्रीं ह्रौं हं सः स्वाहा
(ङ) मंगलाचरण के लिए :-
प्रारम्भ में दिये गये मंगलाष्टक/मंगल पंचक पढ़ते समय प्रत्येक छन्द के अन्त में थाली में पुष्प क्षेपण करें।

जैन विधि विधान /९

(त) अंगन्यास

मंगलाष्टक के बाद शरीर की रक्षा और तसद् दिशाओं से आनेवाले विघ्नों की निवृत्ति के लिए नीचे लिखे अनुसार अंगन्यास करें। दोनों हाथों से अंगूठे से लेकर कनिष्ठिका पर्यन्त पाँचों अंगुलियों में क्रम से अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी की स्थापना करें।
सर्वप्रथम दोनों हाथों के अंगूठों को बराबरी से मिलाकर सामने करें। इस मंत्र का उच्चारण कर सिर झुकावें।
ॐ ह्रीं णमो अरहंताणं ह्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें और दोनों हाथों की तर्जनियों (अंगूठे के पास की अंगुलियाँ) को बराबरी से मिलाकर सामने करें।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें फिर बीच की दोनों अंगुलियों को मिलाकर सामने करके-
ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं मध्यमाभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर दोनों अनामिकाओं को सामने करें, और-
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें फिर दोनों छिंगुलियों को मिलाकर सामने करें और-
ॐ ह्रीं णमो लोए सव्वसाहूणं ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें फिर दोनों हथेलियों को बराबर सामने फैलाकर
ॐ ह्रीं ह्रीं हूं हूं हः करतलाभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें फिर दोनों करपृष्ठों को बराबर सामने फैलाकर-
ॐ ह्रीं ह्रीं हूं हूं हः करपृष्ठाभ्यां नमः
निम्न मंत्र पढ़कर सिर झुकावें और निम्न मंत्र पढ़कर अपने सिर का स्पर्श करें।
ॐ ह्रीं णमो अरहंताणं ह्रीं मम शीर्ष रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर अपने मुख का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं मम वदनं रक्ष रक्ष स्वाहा।

जैन विधि विधान /१०

निम्न मंत्र पढ़कर हृदय का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं मम हृदयं रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मंत्र पढ़कर नाभि का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ह्रीं मम नाभिं रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मंत्र पढ़कर पैरों का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो लोएसव्वसाहूणं ह्रीं मम पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा
निम्न मंत्र पढ़कर शरीर पर जल सिंचन करें-
ॐ ह्रीं ह्रीं हूं हूं हः मम सर्वांग शुद्धिं कुरु कुरु स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर प्रतिवार्य पूर्व दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों श्रेपण करें।
ॐ ह्रीं णमो अरहंताणं ह्रीं पूर्वदिशः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर दक्षिण दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों श्रेपण करें।
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं दक्षिणदिशः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर पश्चिम दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों श्रेपण करें।
ॐ ह्रीं ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं पश्चिमदिशः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर उत्तर दिशा में पुष्प अथवा पीली सरसों श्रेपण करें।
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ह्रीं उत्तरदिशः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर दशों दिशाओं में पुष्प या पीली सरसों श्रेपण करें।
ॐ ह्रीं ह्रीं णमो लोएसव्वसाहूणं ह्रीं सर्वदिशभ्यः आगतविघ्नान् निवारय निवारय मां रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर अपने शरीर का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो अरहंताणं ह्रीं मम गात्रं रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर अपने वस्त्रों का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं ह्रीं मम वसनं रक्ष रक्ष स्वाहा।

जैन विधि विधान /११

निम्न मंत्र पढ़कर अपने पूजन सामग्री का स्पर्श करें-
ॐ ह्रीं णमो आइरियाणं ह्रीं मम पूजा द्रव्यं रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर अपने खड़े होने की जगह की ओर देखें।
ॐ ह्रीं णमो उवज्झायाणं मम पूजा स्थलं रक्ष रक्ष स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर चुल्लू में जल लेकर सब ओर श्रेपण करें।
ॐ ह्रीं णमो लोएसव्वसाहूणं ह्रीं सर्वं जगत् रक्ष रक्ष स्वाहा।
मंत्र से चुल्लू के जल को मंत्रित कर अपने सिर पर सींचे।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं श्रीं सर्वदिशासु, ह्रां ह्रीं हूं हः सर्वदिशासु ॐ ह्रीं अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणी अमृत स्रावयं सं सं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय ठः ठः स्वाहा।
तदनंतर प्रतिष्ठाचार्य पुष्प अथवा पीली सरसों को सात बार निम्न मंत्र पढ़कर परिचारकों के सिर पर डालें।
ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा।
तत्पश्चात निम्न मंत्र से पुष्प अथवा पीली सरसों को मंत्रित कर सब दिशाओं में फेंकें।
ॐ ह्रीं फट् किरि किरि किरीट किरीट घातय घातय परिविघ्नान् स्फोटय स्फोटय सहस्रखण्डान् कुरु कुरु परमृद्रां छिन्द छिन्द परमन्रान् भिन्द भिन्द वाः वाः हूं फट् स्वाहा।
निम्न मंत्र पढ़कर जप करनेवाले महाशयों के दाहिने मणिबन्ध (कलाई) में रक्षासूत्र बांधें।
ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा।
तदनंतर निम्नोक्त श्लोक पढ़कर जप करनेवाले अपने ललाट पर केशर का तिलक लगावें-
मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥
निम्न मंत्र का सबसे उच्चारण कराकर यज्ञोपवीत धारण करावें।
ॐ नमः परम्शान्ताय शान्तिकराय पवित्रिकरणाय अर्ह रत्नत्रयस्वरूपं यज्ञोपवीतं दधामि मम गात्रं पवित्रं भवतु अर्ह नमः स्वाहा।
(च) पंच परमेष्ठी पूजन :-
पृष्ठ क्रमांक २९ पर दी गई पूजन पीठिका को पढ़कर पंचपरमेष्ठी पूजन करें।

जैन विधि विधान /१२

(द) जाप संकल्प :-

जिस मंत्र का जाप करना हो वह मंत्र जाप करने वाले प्रत्येक व्यक्ति से सुन लिया जाए, तथा शुद्ध उच्चारण का अभ्यास करा दिया जाए।
जाप में बैठनेवाले व्यक्तियों की संख्या के आधार पर जाप की कुल संख्या का परिणाम इस प्रकार निर्धारित करें कि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन अधिकतम ७ या ९ मालाओं का जाप करे।
जाप करनेवाले व्यक्ति खड़े होकर दाहिने हाथ में संकल्प की सामग्री ले ले। विधानाचार्य द्वारा निम्न मंत्र छोटे-छोटे हिस्सों में पढ़ा जाए जिसे सभी लोग दोहराएँ। संकल्प करने के बाद संकल्प की सामग्री पादे के दायें कोने पर रख दी जाए। यह सामग्री पूरे विधान पर्यन्त इसी स्थान पर रखी रहे।

संकल्प लेने का मंत्र

अंगूठा दबाकर
“ॐ जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे देश प्रांत नगर ऋतौ मासे तिथौ संवत्सरे जैन मन्दिरे कार्यस्य निर्विघ्नसमाप्त्यर्थं इति प्रमितस्य जापस्य संकल्पं कुर्मः, निर्विघ्न समाप्तिर्भवतु अहं नमः स्वाहा।”
जाप के मंत्र - निम्न में से प्रसंगानुसार किसी एक मंत्र के जाप का संकल्प करायें।

(१) ॐ ह्रीं अर्हं अ सि आ उ सा सर्वशान्ति कुरु कुरु स्वाहा।
(२) ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ सि आ उ सा सर्वशान्ति कुरु कुरु स्वाहा।
(३) ॐ ह्रां ह्रीं श्री क्लीं अर्हं अ सि आ उ सा अनाहत विद्याये णमो अरहंताणं सर्व शान्ति कुरु कुरु स्वाहा।
(४) ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ सि आ उ सा मध्यलोकसम्बन्धी चतुशताषंचाशीज्जन चैत्यचैत्यालयेभ्यो नमः।
(५) ॐ ह्रीं मध्यलोकसम्बन्धी शाश्वतजिनालयजिनबिम्बेभ्यो नमः।


जैन विधि विधान . १३

ध्वजारोहण विधि

मण्डप की अग्रभूमि में व्यवस्थानानुसार ध्वजदण्ड के पास ऊँची टेबुल पर सिंहासन में विनायक यंत्र विराजमान कर पंचपरमेष्ठी की पूजन करें। पूजनोपरांत मन्त्रोच्चार करते हुये ध्वजारोहणकर्ता द्वारा ध्वजदण्ड की शुद्धि कराके उस पर रक्षा सूत्र बंधवा दे।

निम्न मंत्र द्वारा ध्वजदण्ड की शुद्धि करावें-

ॐ ह्रीं श्री नमोऽर्हते पवित्र जलेन ध्वजदण्डं शुद्धिं करोमि।

निम्न मन्त्र द्वारा ध्वजदण्ड में रक्षा सूत्र बंधावे-

ॐ ह्रीं त्रिवर्णेन ध्वजदण्डं परिवेषयामि।
ध्वजदण्ड एवं ध्वज पर केसर से स्वस्तिक बनाकर धर्मात्मा, ज्ञानी आदि प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा ध्वजारोहण कराया जावे। ध्वजारोहण के समय निम्न श्लोक एवं मन्त्रोच्चार करें-
तद्देशेो ध्वजदण्डमुल्लैर्भवदिमानं गमनादिस्थत्।
निवेशयत्नेन शुभभोपदेशर्य महत्तताच्छोच्छ्रयणं विदध्यात्॥
ॐ ह्रीं अर्हं जिनशासनपताके स्तोच्छ्रिता तिलोठ्ठ भव ववद्ध स्वाहा।
ध्वजारोहण के पश्चात् सावधान होकर निम्न गीत बोला जाय

जैन ध्वज गीत

तर्ज- जन-गण-मन अधिनायक जय हे …।
मंगलमय अरु मंगलकारी, शासन ध्वज लहराता॥
अनेकान्तमय वस्तु व्यवस्था, का यह बोध कराता॥
स्याद्वाद शैली से जग का, संशय तिमिर मिटाता।
चहुँगति दुःख नशाता, जन-गण-मन हरषाता॥
जिन शासन सुखदाता॥
सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चरणमय मुक्ति, मार्ग दरशाता।
जय हे… जय हे… जय हे… जय जय जय हे॥
शासन ध्वज लहराता॥


जैन विधि विधान /१४

नादी विधान (मंगल कलश स्थापना)

नंद धातु का प्रयोग आनन्दित होने के अर्थ में किया जाता है। इसमें पंच प्रत्यय लगाने से नादी शब्द बनता है। नादी विधान से आशय अनुष्ठान पर्यंत लोक के आरम्भ तथा इन्द्रियविषयों का त्याग करके आनन्दपूर्वक जिनेन्द्र प्रभु की उपासना करने से है। अनुष्ठान में सम्मिलित होने वाले सभी लोगों को नादी विधान के समय उपस्थित रहना चाहिए। इसके अन्तर्गत मण्डल पर मंगल कलश की स्थापना की जाती है।
जिस व्यक्ति ने मंगल कलश की बोली ली हो अथवा अनुष्ठान में सम्मिलित होने वालों में से प्रमुख व्यक्ति के घर से प्रातःकाल मंगल कलश पर श्रीफल रखकर उसे केसरिया वस्त्र से ढक्कर तथा मंगल कलश में सवा रुपये, हल्दी, सुपारी, पीली सरसों आदि वस्तुएँ डालकर मंगल कलश को सजाना चाहिए। विधानाचार्य को मंगलाष्टक पढ़ते हुए पुष्पक्षेपण करना चाहिए तथा परिवार की सौभाग्यवती बहिनों द्वारा कलश पर स्वास्तिक कराना चाहिए। इसके पश्चात् उत्साहपूर्वक जिनेन्द्र भक्ति करते हुए बाजे-गाजे से जुलूस के रूप में मंगल कलश विधानस्थल तक लाना चाहिए तथा निम्न मंत्र बोलकर सौभाग्यवती बहिनों द्वारा मण्डल पर कलश स्थापित करना चाहिए।

मंगल कलश स्थापना मंत्र

ॐ अद्य भादवतो महापुरुषस्य श्रीमद्दिगंबराणां मतेस्मिन्… मासे… पक्षे… तिथौ… वासरे… वर्षे हं… नगरे… जिनमन्दिरे… मंडलाधिवास पंचविंशत्यामप्यष्टादशदिषु षोडशीमष्टमं पादशषष्ठं शान्त्यर्थं पुष्पावचनार्थं पंचरत्न-पुष्पाक्षतादिबीजं पूजोपभोगितं मंगलकलशस्थापनं करोम्यहं क्षीं क्षीं हं हं सः स्वाहा।

इन्द्र प्रतिष्ठा

इन्द्रों, इन्द्रणियों के लिए आवश्यक निर्देश-
(१) नियमित रूप से विधान में अन्त तक सम्मिलित रहें।
(२) स्वस्थ हों।
(३) विकलांग न हों।
(४) हीन आचरण वाले न हों।
(५) विधान के अन्त तक संयम (ब्रह्मचर्य) से रहें।
(६) गृहस्थोचित शुद्ध भोजन एक या दो बार करें। बीच में पान, सुपारी, गुटका, तम्बाकू आदि न खायें।
(७) विधान पर्यन्त व्यापार आदि लौकिक कार्यों की चिन्ता से मुक्त रहें।
(इन्द्रानी ६ माह से अधिक गर्भवती न हो)
जैन विधि विधान /१५

इंद्र-इंद्रणियों को उत्तम पीत वस्त्र धारण करावें। मुकुट बांधे तथा निम्नानुसार मंत्रोच्चारणपूर्वक क्रिया करावें।

निम्न मंत्र द्वारा रक्षा करावें-
ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष हुं फट् स्वाहा।
निम्न मंत्र द्वारा अमृत स्नान करावें-
ॐ अमृत अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृत स्रवस्य स्रं स्रं क्लीं क्लीं ब्लूं ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं हं क्ष्वीं क्ष्वीं हं हं स्वाहा।

तदनन्तर चंदन, मुकुट, माला, केयूर, हार, कुण्डल आदि उपलब्ध आभूषणों को एक थाली में रखकर मण्डल के सामने रखें और प्रतिष्ठाचार्य निम्नलिखित मंत्र बोलकर उन पर पुष्प तथा पीली सरसों डाले।
ॐ ह्रां ह्रीं अर्हत्त्णां ऊँ ह्रीं णमो सिद्धाणं ऊँ ह्रीं णमो आइरियाणं ऊँ ह्रीं णमो उवज्झायाणं ऊँ ह्रीं णमो लोए सव्वसाहूणं इन्द्र-इन्द्राणीभूपणानि पवित्राणि कुरु कुरु स्वाहा।
निम्न श्लोक और मंत्र बोलकर ललाट, मस्तक, ग्रीवा, हृदय, दोनों भुजाएँ, प्रकोष्ठ, नाभि और पृष्ठ भाग में नौ तिलक लगावें।
पात्रेऽपित्त चन्दनमौषधीशं शुश्रुं सुगन्धात्तचंचरीकम्।
स्थाने नवांके तिलकया चच्र्यं न केवलं देविकारहेतोः॥
ॐ ह्रां ह्रीं हूं हूं हं सवीशगुद्धि कुरु कुरु स्वाहा।
निम्न श्लोक पढ़कर माला पहिनावें-
जिनाधिभूमिसुकृतां सर्जे मे स्वयंवरं यज्ञविधानपत्नी।
करोतु यत्वादचलत्वहेतोरितीव मालामुरीकरोमि॥
निम्न श्लोक पढ़कर अधोवस्त्र का स्पर्श करावें-
धौतान्तरीयं विधुकान्तिसूत्रैः सदग्रथितं धौतनवीनशुद्धम्।
नगन्तलम्भिर्न भवेत्तच यावत् संधार्यते भूषणोन्मभूभ्याः॥
निम्न श्लोक पढ़कर दुपट्टे का स्पर्श करावें-
संयानमंनंदचराया विभातमखण्डधौताभिनवं मृदुत्वम्।
संधार्यते पीत-सितांशवर्णमनोहरिष्ठाद्भुषणोभांकम्॥

जैन विधि विधान / ९६

निम्न श्लोक पढ़कर बन्धावें-
शीर्षेऽशुभभ्युकुटं त्रिलोकीं हर्षात्पराजस्य च पदबन्धम्।
दधामि पापौघिकुलप्रहन्तुं रत्नाढ्यमालाभिरुदन्वितांगम्॥
निम्न श्लोक पढ़कर कंठ में कण्ठभरण पहिनावें-
त्रैवेयकं मौक्तिकदामधाम-विराजितस्वर्णनिबद्धयुक्तम्।
दध्रेऽधरापर्णविसर्पपेच्छु-र्महाधनाभोगनिरूपणाकम्॥
निम्न श्लोक पढ़कर हार धारण करावें-
मुक्तावलीगोस्तनवृद्धमाला विष्पूणतगन्वनमाकभाजाम्।
यमार्हसंर्गगतानि यदु-लक्ष्मी समालिंगानकण्ठहेऽहम्॥
निम्न श्लोक पढ़कर कानों में कर्णभरण करावें-
एकत्र भास्वनपरत्र सामः सर्वां विधातुं जिनपरस्य भक्त्या।
रूपं परावृत्य च कुण्डलस्य मिषादवारते इव कुण्डले द्वे॥
निम्न श्लोक पढ़कर केयूर-बाजुबंद धारण करावें-
भुजासु केयूरमपारतदुष्ट वीर्यस्य सम्यक् जयकृद् ध्याजाकम्।
दधे निधीनां नवकैश्च रत्नै-विमंडितं सदग्रथितं सुवर्णै॥
निम्न श्लोक पढ़कर यज्ञोपवीत पहनावे-
यज्ञार्थमेव सुजातिदचक्रश्वरेण चिन्हं विधिभूषणाम्।
यज्ञोपवीतं विततं हि रत्नमय्यं मार्गं विधाभ्यतोऽहम्॥
निम्न श्लोक पढ़कर कटिसूत्र धारण करावें-
अर्यैश्च दीक्षा यजनस्य गाहैं कुर्वदिभरिष्ठैः कटिसूत्रमुख्यैः।
संभूषणैर्भूषयता शरीरं जिनेंद्रपूजा सुखदां घटैत्॥
निम्न श्लोक पढ़कर घर गृहस्थी के कार्यों से उत्पन्न पर्वत निवृत्त रहने की प्रतिज्ञा करावें-
विविधविघातुर्यजनोत्सवेऽहं गेहादिमुच्छ्र्षणमपनोदयामि।
अनन्यचेताः कृतिमादधामि रवागदितत्त्वसीमीपमं हापयामि॥
निम्न मंत्र २१ बार पढ़कर इंद्रों पर सरसों क्षेपण करें-
ॐ वज्राधिपत्ये आं ह्रीं अः एं ह्रीं हः क्षं क्षः इंद्राय सर्वांपदं।
निम्न मंत्र पढ़कर यजमानादि पर पुष्प क्षेपण करें-
ॐ ह्रीं अर्हं अ सि आ उ सा णमो अरहंताणं सत्तहिं समद्धिं सम्पुण्णणाणधराणं अनाहतपरक्कमले भवतु भवतु हो नमः।

जैन विधि विधान / ९७

अभिषेक पाठ

वसंततिलका
श्रीमन्तमार्हशिरस्तरदीप्तिं घोषावसिंश्चरणाम्बुजुगयुग्ममीशम्।
अर्दहन्तमृत्तनपदप्रदमाभिनम्यं त्वत्पुष्टिहेतुरुदधिमभिषेच्यं करिष्ये॥ १ ॥
अथ पौर्वाह्निकदेववंदनापूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भावपूजास्तव वंदनासमेतं श्रीपंचमहागुरुभक्तिस्तोत्रोत्सर्गं करोम्यहम्।
(१० बार णमोकार मंत्र पढ़े)
निम्न श्लोक पढ़कर पुष्पांजलि क्षेपण करके अभिषेक की प्रतिज्ञा करें-
याः कृत्रिमास्तदितराः प्रतिमा जिनस्य
संस्थापयन्ति पुरहुतमुखादयस्ताः।
सद्भावलक्ष्यिसमयादिनिमित्तयोगा-
स्तत्रैवमुज्ज्वलकुसुमं क्षिपामि॥ २ ॥
इति अभिषेक प्रतिज्ञाय पुष्पांजलिं क्षिपामि।
निम्न श्लोक पढ़कर अभिषेक की थाली में केशर से श्री लिखें-
उपजाति
श्रीपीठोत्कृष्टे विशदाक्षतीषै श्रीप्रस्तवेः पूर्णशांककल्पे।
श्रीवर्तके चन्द्रमसीति वार्तां सत्यापयन्तीं श्रियमालिखामि॥ ३ ॥
ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं श्रीलेखनं करोमि।
निम्न श्लोक पढ़कर सिंहासन स्थापित करें-
अनुष्टुप
कनकादिभिर्मं कर्म पावनं पुण्यकारणम्।
स्थापयामि परं पीठं जिनस्पनय भक्तेः॥ ४ ॥
ॐ ह्रीं श्रीं पीठस्थापनं करोमि।
निम्न श्लोक पढ़कर प्रतिमा विराजमान करें-
भृंगारचामरसुरदीर्णपीठीकुंभ- तालध्वजात्पवनिवारकभूषिताये।
वर्षश्व नन्द जय पाठपावलीभिः सिंहासनं जिनभवत्समहे श्रयामि॥ ५ ॥
ॐ ह्रीं श्रीं धर्मतीर्थाधिनाथ! भगवन्निहपण्डुकशिलापीठे सिंहासने तिष्ठ तिष्ठ।

जैन विधि विधान / ९८

निम्न श्लोक पढ़कर चारों कोनों में चार कलश रखें—

श्रीतीर्थकृत्पनवर्यविधी सुरेन्द्रः
श्रीराभिरुचारिभिरुग्रदयैकमान्।
ताँस्तद्गशान्निविभाय यथार्हणीयान्
संस्थापये कुसुमदनुभूषिताये ॥६॥
ॐ ह्रीं चतुष्कोणेषु चतुर्कलशस्थापनं करोमि।

निम्न श्लोक पढ़कर अर्घ्य चढ़ावें, वादिन नाद करावें तथा जय-जय शब्द का उच्चारण करें—

आनन्दनिर्भरसुप्रददिग्गनादैः
वादित्रपुरजयशब्दकलप्रशस्तैः।
उद्दीयमानजगतीपतिकीर्तिमेनी
पीठस्थली वसुविधाचनर्योलसामि ॥७॥
ॐ ह्रीं स्वपनपीठस्थिताय जिनायर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

निम्न श्लोक पढ़कर चारों कलशों से अभिषेक करें—

कर्मप्रबन्धनिगडेरपि हीनताप्तं ज्ञात्वापि भक्तिशतः परमादिदेवम्।
त्वा स्वीयकल्यपगुणोन्नथनाय देव शुद्धोदकैर्नभियामि नभार्थवत्वम् ॥८॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं वं मं हं सं तं पं वं हं हं सं सं तं तं पं झं झं क्षीं क्षीं ह्राँ ह्रीं ह्रो ह्रो द्रां द्रीं द्रो द्रावय द्रावय नमोऽर्हते भगवते श्रीमते पवित्रजलनेन जिनार्घ्यभिषवयामि स्वाहा।

निम्न श्लोक पढ़कर गन्धोदक माथे पर चढ़ावें—

दूरावनम्रमसुनाथाकिरीटकोटी संसन्नरलकिरणच्छविभूसराणि।
प्रश्वेददामलममुक्तमपिप्रकृष्टै-र्भक्त्या जलेर्जिपतिनपुहृषाभिषिंचे ॥९॥
ॐ ह्रीं श्रीमन्तं भगवन्तं कृपालस्तं वृषभदिमहावीरपर्यन्तं
चतुर्विंशतितीर्थकरपरमदेव आद्यानामोऽर्घ्यं जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे…नाम्नि
नगर मासानामुत्तमे मासे…मासे…पक्षे…शुभ दिने पुण्यार्हका श्रावकादिकानां
सकलकर्मक्षयार्थं जलनेनाभिषिंचयामिः।

निम्न श्लोक पढ़कर अर्घ्य चढ़ावें—

पानीयनन्दनसद्क्षतपुष्पपुंजं,
नैवेद्यदीपकमधूपफलप्रजेन।
जैन विधि विधान / १९

कर्माष्टक-क्रोधनवीरमननशक्ति,
संपूजयामि महसा महसां निधानम् ॥१०॥
ॐ ह्रीं अभिषेकने वृषभादिवीरातेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

निम्न श्लोक पढ़कर शान्ति के लिए पुष्पांजलि छोड़ें—

हे तीर्थपा विजयशोभवलीकृताशाः
सिद्धौपधाश्च भवदुःखमहागदानाम्।
सद्द्रव्यहृज्जनितपंकजस्यकल्पा
पूयं जिनाः सततशान्तिकरा भवन्तु ॥११॥

निम्न श्लोक पढ़कर गन्धोदक मस्तक पर चढ़ावें—

नत्वा परीत्न निजनेत्रललाटयोश्च
व्याप्तं क्षणेन हरताद्यसंचयं मे।
शुद्धोदकं जिनपते तव पादयोगात्
भूयादभवात्पहारं धृतमादरेण ॥१२॥
अनुष्टुप

निर्मल निर्मलीकरणं पवित्रं पापनाशनम्।
जिनगन्धोदकं वन्दे सर्वकर्मविनाशनम् ॥१३॥
शार्दूलविक्रीडित

मुक्ति श्री वनिताकरोदकमिदं पुण्यांकुरोत्पादकं,
नागेन्द्र त्रिदशेन्द्र चक्रपदवी राज्याभिषेकोदकं
सम्यग्ज्ञान चरित्र दर्शनलता संवृद्धि सम्पादकं,
कीर्ति श्रीजय साधकं तव जिन स्नानस्य गंधोदकम् ॥१४॥

निम्न श्लोक पढ़कर प्रतिमाजी को शुद्ध और स्वच्छ वस्त्र से पोंछें—

वसन्ततिलका

नत्वा मुहुर्निज करैरमृतोपमेयैः,
स्वच्छैर्जिनेन्द्र तव चन्द्रकरावदातैः।
शुद्धांशुकेन विमलेन नितान्तरम्यै,
देहे स्थितान् जलकणांस्परिमार्जयामि ॥१५॥
जैन विधि विधान / २०

ॐ अपलाशोकेन जिनबिम्बामार्जनं करोमि।

निम्न श्लोक पढ़कर प्रतिमा को सिंहासन पर विराजमान करें—

स्नानं विधाय भवतोऽष्टसहस्रनाम्ना—
मुच्चारणेन मनसो वचसो विशुद्धिं।
जिघ्रभृत्रिभिन तेऽष्टतयी विधातुं,
सिंहासने विधिवदत्र निवेशयामि ॥१६॥

निम्न श्लोक पढ़कर अर्घ्य चढ़ावें—

अनुष्टुप

जलंगन्धाक्षतैः पुष्पैश्चरुदीपुसुधूपकैः।
फलैर्धर्जिनेमर्चये जन्मदुःखोपहानये ॥१७॥
ॐ ह्रीं श्रीं पीठस्थिताय जिनायर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

निम्न श्लोक पढ़कर करपुष्प क्षेपण करें—

शिखरिणी

इमे नेत्रे जाते सुकृतजलसिंक्ते सफलते,
ममेदं मानुष्यं कृतिजनगणोदेयमभवत्।
दमद्यादालोभादशवसुकर्मटनमभूत्
सदेदक् पुण्योघो मम भवतु ते पूजनविधिौ ॥१८॥
(पुष्पांजलि क्षिप्त करें)


जैन विधि विधान / २१

जलाभिषेक पाठ

दोहा

जय जय भगवते सदा, मंगल मूल महान।
वीतराग सर्वज्ञ प्रभु, नमों जोरि जुगपान ॥

अष्टक और गीता

श्रीजिन जग में ऐसो को बुधवंत जू।
जो तुम गुण वरननि करि पावै अन्त जू॥
इन्द्रादिक सुर चार ज्ञानधारी मुनि।
कहि न सकै तुम गुणगण हे त्रिभुवन धनी॥
अनुपम अमित तुम गुणनि वारिधि ज्यों अलोकाकाश है।
किमि धरे हम उर कोष में सो अकथ गुण-मणिराश है॥
पै जिन ! प्रयोजन सिद्धि की तुम नाम ही में शक्ति है।
यह चित्त में सरधान यातै नाम ही में भक्ति है ॥१॥

ज्ञानावरणी दर्शन-आवरणी भनें।
कर्म मोहनी अन्तराय चारों हनें॥
लोकालोक विलोक्यो केवलज्ञान में।
इन्द्रादिक के मुकुट नये सुरथान में॥
तब इन्द्र जान्यो अवधि तैं, उठि सुरनयुत वंदत भयो।
तुम पुण्य को प्रेरयो हरि है मुदित धनपति सौं कह्यो॥
अब वेगि जाय रचो समवसूति सफल सुरपद को करो।
साक्षात् श्री अरहत के दर्शन करो कलमष हरो ॥२॥
ऐसे वचन सुने सुरपति के धनपति।
चल आयो तत्काल मोद धारै अति॥
वीतराग छबि देखि शब्द जय-जय कहो।
देय प्रदक्षिणा बार-बार वंदत भयो॥
अति भक्ति भीनी नभचित्त है सवशरण रच्यो सही।
ताकी अनुपम शुभ गति को कहन समरथ कोउ नहीं ॥

प्राकार तोरण सभामंडप कनक भूमियम छाजहीं।
नगजड़ित गंधकुटी मनोहर मध्यभाग विराजहीं ॥३॥
सिंहासन तामय बन्यो अद्भुत दिये।
तापर वाजि रच्चो प्रभा दिनकर छिपै॥
तीन छत्र सिर शोभित चौंसठ चमरजी।
महाभक्तियुत दोरत हैं तहाँ अमरजी॥
प्रभु तरनतारन कमल ऊपर, अन्तरीक्ष विराजिया।
यह वीतराग दशा प्रत्यक्ष बिलोकि, भविजन सुख लिया॥
मुनि आदिद्वाश सभा के भवि जीव मस्तकनायके।
बहुभाँति बारम्बार पूजें, नम्रै गुणगण गायके ॥४॥
परमोदारिक दिव्य देह पावन सही।
क्षुधा तृषा चिन्ताभय गद दूषण नहीं॥
जन्मजरा मृत्यु अरतिशोक विस्मय नसै।
राग रोष निद्रा मद मोह सबै खसै॥
श्रम बिना श्रमजरलरहित पावन, अमल ज्योति स्वरूपजी।
शरणागतिनि की अशुचिता हरि, करत विमल अनूपजी॥
ऐसे प्रभु की शांतमुद्रा को नहन जलतैं करें।
‘जस’ भक्तिवश मन उदित तैं, हम भानु द्विगु दीपक धरै ॥५॥
तुम तो सहज पवित्र यही निश्चय भयो।
तुम पवित्रता हेत नहीं मज्जन ठयो॥
मैं मलीन रागादिक मलतैं है रह्यो।
महामलिन तन में वसुविधवश दुख सह्यो॥
प्रीत्यो अनंतो काल यह, मेरी अशुचिता ना गई।
तिस अशुचिताहर एक तुम ही, भरहु बांछा चित्त उठई॥
अब अष्टकर्म विनाश सब मल, दोष-रागादिक हरो।
तनरूप कारागेह तैं, उद्धार शिववासा करो ॥६॥
मैं जानत तुम अष्टकर्म हरि शिव गये।
आवागमन विमुक्त रागवर्जित भये॥

पर तथापि मेरो मनरथ पूरत सही।
नय-प्रमाण तैं जानि महा साता लही॥
पापाचरण तजि नहन करता चित्त में ऐसे धरूँ।
साक्षात् श्री अरहत का मानों नहन परसन करूँ॥
ऐसे विमल परिणाम होते अशुभ नशि शुभबन्ध तैं।
विधि अशुभ नसि शुभ बन्धते हैं शर्म, सवविधि नासतैं ॥७॥
पावन मेरे नयन भये तुम दरस तैं।
पावन पाणि भये तुम चरननि परस तैं॥
पावन मन है गयो तिहारे ध्यान तैं।
पावन रसना मानी, तुम गुण गान तैं॥
पावन भई परजाय मेरी, भयो मैं पूरण धनी।
मैं शक्तिपूर्वक भक्ति कीनी, पूर्णभक्ति नहीं बनी॥
धनि धन्य ते बड़भागि भवि तिन नीव शिवघर की धरी।
वर क्षीरसागर आदि जत मनि-कुम्भभरी भक्ति करी ॥८॥
विघन-सहन-वन-दाहन दहन प्रचण्ड हो।
मोह-महातम-दलन प्रबल मार्तण्ड हो॥
ब्रह्मा विष्णु महेश आदि संज्ञा धरो।
जगविजयी जमराज नाश ताको करो॥
आनन्दकारण दुख निवारण, परममंगलमय सही।
मोसो पतित नहि और तुमसो, पतित-तार सुन्यो नहीं॥
चिंतामणि पारस कल्पतरु, एक भव सुखकार हो।
तुम भक्ति-नौका जे चढ़े; ते भये भवदधि पार हो ॥९॥
तुम भवदधि तैं तरि गये, भये निकल अविकार।
तारतम्य इस भक्ति को, हमें उतारो पार ॥१०॥
निर्मललवक्ष से प्रतिमाजी को साफ कर निम्न श्लोक बोलकर गन्धोदक ग्रहण करें।
निर्मलीकरणं, पावनम् पापनाशनम्।
जिनचरणोदकं वन्दे, अष्टकर्म विनाशम् ॥

जैन विधि विधान / २२
जैन विधि विधान / २३
जैन विधि विधान / २४

प्रतिमा प्रक्षाल पाठ

दोहा

परिणामों की स्वच्छता के निमित्त जिनबिम्ब।
इसीलिए मैं निरखता, इनमें निज प्रतिबिंब ॥
पञ्च प्रभु के चरण में, वन्दन करूँ त्रिकाल।
निर्मल जल से कर रहा, प्रतिमा का प्रक्षाल ॥
अद्य पौर्वाह्निक देववन्दनायां पुण्यार्जनुकमेण सकलकर्मक्षयार्थ भावपूजा
स्तवनादिसमेतं श्री पंचमहागुरुभक्तिपूर्वककायोत्सर्गं करोम्यहम् ।
(नी बार णमोकार मंत्र पढ़ें)
(छप्पय)
तीन लोक के कृत्रिम और अकृत्रिम सारे।
जिनबिम्बों को नित प्रति अगणित नमन हमारे ॥
श्री जिनवर की अन्तर्मुख छवि उर में धारूँ।
जिन में निज का,निज में जिन-प्रतिबिम्ब निहारूँ ॥
मैं करूँ आज संकल्प शुभ, जिन प्रतिमा प्रक्षाल का।
यह भाव सुमन अर्पण करूँ फल चाहूँ गुणमाल का ॥
ॐ ह्रीं प्रक्षाल प्रतिज्ञायै पुण्यांजलिं क्षिपामि।
(प्रक्षाल की प्रतिज्ञा हेतु पुष्प क्षेपण करे)

रोला

अन्तरंग बहिरंग सुलक्खी से जो शोभित।
जिनकी मंगल वाणी पर है त्रिभुवन मोहित ॥
श्री जिनवर सेवा से क्षय मोहादि विपत्ति।
हे जिन ! श्री लिख पाऊँगा निज-गुण सम्पति ॥
ॐ ह्रीं श्री तेरहत्नं करोमि।
(थाली की चौकी पर केशर से श्री लिखे)

दोहा

अन्तर्मुख मुद्रा सहित शोभित श्री जिनराज।
प्रतिमा प्रक्षालन करूँ, धरूँ पीठ यह आज ॥
ॐ ह्रीं श्री पीठस्थापनं करोमि।
(प्रक्षाल हेतु थाली स्थापित करें)
जैन विधि विधान / २५

कर्माष्टक- क्रथनवीरमनन्तशक्ति,

संपूजयामि महसा महसां निधानम् ॥ १० ॥

ॐ ह्रीं अभिषेकान्ते वृषभादिवीरान्तेभ्योर्ध्वं निर्वपामीति स्वाहा । निम्न श्लोक पढ़कर शान्ति के लिए पुष्पांजलि छोड़ें- हे तीर्थपा निजयशोधवलीकृताशाः

सिद्धौषधाश्च भवदुःखमहागदानाम् ।

सद्रव्यहृज्जनितपंकजबन्धकल्पा

यूयं जिनाः सततशान्तिकरा भवन्तु ॥ ११ ॥ निम्न श्लोक पढ़कर गन्धोदक मस्तक पर चढावें- नत्वा परीत्य निजनेत्रललाटयोश्च

व्याप्तं क्षणेन हरताघसंचयं मे ।

शुद्धोदकं जिनपते तव पादयोगात्

भूयाद्भवातपहरं धृतमादरेण ॥ १२ ॥

अनुष्टुप

निर्मलं निर्मलीकरणं पवित्रं पापनाशनम् । जिनगन्धोदकं वन्दे सर्वकर्मविनाशनम् ॥ १३ ॥ शार्दूल विक्रीड़ित

नत्वा मुहुर्निज करैरमृतोपमेयै;

ॐ अमलांशुकेन जिनबिम्बमार्जनं करोमि । निम्न श्लोक पढ़कर प्रतिमा को सिंहासन पर विराजमान करें— स्नानं विधाय भवतोऽष्टसहस्रनाम्ना— मुच्चारणेन मनसो वचसो विशुद्धि ।

जलगन्धाक्षतैः पुष्पैश्चरूदीपसुधूपकैः । फलैरर्धेर्जिनमर्चे जन्मदुःखापहानये ॥ १७ ॥ ॐ ह्रीं श्री पीठंस्थिताय जिनयार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । निम्न श्लोक पढ़करपुष्प क्षेपण करें— शिखरिणी

इमे नेत्रे जाते सुकृतजलसिक्ते सफलिते, ममेदं मानुष्यं कृतिजनगणादेयमभवत् । दृमदीयाद्भालादशुभवसुकर्माटनमभूत् सदेदृक् पुण्यौघो मम भवतु ते पूजनविधौ ॥ १८ ॥ (पुष्पांजलि क्षिपेत करें)

जैन विधि विधान / २१

जलाभिषेक पाठ

दोहा

जय जय भगवंते सदा, मंगल मूल महान ।

वीतराग सर्वज्ञ प्रभु, नमौं जोरि जुगपान ॥ अडिल्ल और गीता

श्रीजिन जग में ऐसो को बुधवंत जू।

जो तुम गुण वरननि करि पावै अन्त जू ॥

इन्द्रादिक सुर चार ज्ञानधारी मुनि ।

कर्म मोहनी अन्तराय चारों हने ॥

लोकालोक विलोक्यो केवलज्ञान में।

इन्द्रादिक के मुकुट नये सुरथान में ॥

तब इन्द्र जान्यो अवधि तैं, उठि सुरनयुत वंदत भयौ । तुम पुण्य को प्रेरयो हरि है मुदित धनपति सौं कह्यो ॥ अब वेगि जाय रचौ समवसृति सफल सुरपद को करौ । साक्षात् श्री अरहंत के दर्शन करौ कल्मष हरौ ॥ २ ॥ ऐसे वचन सुने सुरपति के धनपति ।

चल आयो तत्काल मोद धारैं अति ॥

वीतराग छबि देखि शब्द जय-जय कह्यो ।

देय प्रदच्छिना बार-बार वंदत भयौ ॥

अति भक्ति भीनो नम्म्रचित है सवशरण रच्यो सही । ताकी अनूपम शुभ गति को कहन समरध कोउ नहीं ॥ जैन विधि विधान / २२

प्राकार तोरण सभामंडप कनक मणिमय छाजहीं । नगजड़ित गंधकुटी मनोहर मध्यभाग विराजहीं ॥ ३ ॥ सिंहासन तामध्य बन्यौ अद्भुत दिपै ।

तापर वारिज रच्यो प्रभा दिनकर छिपै ॥

तीन छत्र सिर शोभित चौंसठ चमरजी ।

महाभक्तियुत ढोरत हैं तहाँ अमरजी ॥

प्रभु तरनतारन कमल ऊपर, अन्तरीक्ष विराजिया । यह वीतराग दशा प्रतच्छ विलोकि, भविजन सुख लिया ॥ मुनि आदिद्वादश सभा के भवि जीव मस्तकनायकैं । बहुभाँति बारम्बार पूजें, नमैं गुणगण गायकैं ॥ ४ ॥ परमौदारिक दिव्य देह पावन सही ।

क्षुधा तृषा चिन्ता भय गद दूषण नहीं ॥ जन्म जरा मृति अरति शोक विस्मय नसें । राग रोष निद्रा मद मोह सबै खसें ॥

श्रम बिना श्रमजलरहित पावन, अमल ज्योति स्वरूपजी । शरणागतनि की अशुचिता हरि, करतविमल अनूपजी ॥ ऐसे प्रभु की शांतमुद्रा को नह्वन जलतें करें । ‘जस’ भक्तिवश मन उक्ति तैं, हम भानु ढिग दीपक धरै ॥ ५ ॥ तुम तो सहज पवित्र यही निश्चय भयो ।

तुम पवित्रता हेत नहीं मञ्जन ठयो ॥

मैं मलीन रागादिक मलतें है रह्यौ ।

आवागमन विमुक्त रागवर्जित भये ॥

जैन विधि विधान / २३

पर तथापि मेरो मनरथ पूरत सही।

नय-प्रमाण तैं जानि महा साता लही ॥

पापाचरण तजि नह्वन करता चित्त में ऐसे धरूँ। साक्षात् श्री अरहंत का मानों नह्वन परसन करूँ ॥ ऐसे विमल परिणाम होते अशुभ नशि शुभबन्ध तैं। विधि अशुभ नसि शुभ बन्धतें है शर्म, सबविधि नासतें ॥ ७ ॥ पावन मेरे नयन भये तुम दरस तैं।

पावन पाणि भये तुम चरननि परस तैं ॥

पावन मन है गयो तिहारे ध्यान तैं।

पावन रसना मानी, तुम गुण गान तैं ॥

पावन भई परजाय मेरी, भयो मैं पूरण धनी ।

मैं शक्तिपूर्वक भक्ति कीनी, पूर्णभक्ति नहीं बनी ॥ धनि धन्य ते बड़भागि भवि तिन नींव शिवघर की धरी । वर क्षीरसागर आदि जल मणि-कुम्भभरी भक्ति करी ॥ ८ ॥ विघन-सधन-वन-दाहन दहन प्रचण्ड हो।

मोह-महातम-दलन प्रबल मार्तण्ड हो ॥

ब्रह्मा विष्णु नहेश आदि संज्ञा धरो ।

जगविजयी जमराज नाश ताको करो ॥

आनन्दकारण दुख निवारण, परममंगलमय सही ।

मोसो पतित नहिं और तुमसो, पतित-तार सुन्यो नहीं ॥ चिंतामणि पारस कल्पतरु, एक भव सुखकार ही । तुम भक्ति-नौका जे चढ़े, ते भये भवदधि पार ही ॥ ९ ॥ तुम भवदधि तैं तरि गये, भये निकल अविकार । तारतम्य इस भक्ति को, हमें उतारो पार ॥ १० ॥ निर्मलवस्त्र से प्रतिमाजी को साफ कर निम्न श्लोक बोलकर गन्धोदक ग्रहण करें । निर्मलं निर्मलीकरणं, पावनम् पापनाशनम् । जिनचरणोदकं वंदे, अष्टकर्म विनाशनम् ॥ *

जैन विधि विधान / २४

प्रतिमा प्रक्षाल पाठ

दोहा

परिणामों की स्वच्छता के निमित्त जिनबिम्ब । इसीलिए मैं निरखता, इनमें निज प्रतिबिम्ब ॥ पञ्च प्रभु के चरण में, वन्दन करूँ त्रिकाल । निर्मल जल से कर रहा, प्रतिमा का प्रक्षाल ॥ अथ पौर्वान्हिक देववन्दनायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भावपूजा स्तवन्दनासमेतं श्री पंचमहागुरुभक्तिपूर्वककायोत्सर्गं करोम्यहम् । (नौ बार णमोकार मन्त्र पढ़ें)

(छप्पय)

अन्तरंग बहिरंग सुलक्ष्मी से जो शोभित । जिनकी मंगल वाणी पर है त्रिभुवन मोहित ॥ श्री जिनवर सेवा से क्षय मोहादि विपत्ति । हे जिन ! श्री लिख पाऊँगा निज-गुण सम्पत्ति ॥ ॐ ह्रीं श्री लेखन करोमि ।

(थाली की चौकी पर केशर से श्री लिखे)

दोहा

(प्रक्षाल हेतु थाली स्थापित करें)

जैन विधि विधान / २५

(रोला)

भक्ति रत्न से जड़ित आज मंगल सिंहासन । भेद-ज्ञान जल से क्षालित भावों का आसन ॥ स्वागत है ! जिनराज तुम्हारा सिंहासन पर । हे जिनदेव ! पधारो श्रद्धा के आसन पर ॥ ॐ हीं श्री धर्मतीर्थाधिनाथ भगवन्निह सिंहासने तिष्ठतिष्ठ । (थाली में जिनबिम्ब विराजमान करे)

क्षोरोदधि के जल से भरे कलश ले आया । दृग-सुख-वीरजज्ञान स्वरूपी आतम पाया ॥ मंगल कलश विराजित करता हूँ जिनराजा । परिणामों के प्रक्षालन से सुधरें काजा ॥ ॐ हीं अईं कलश स्थापनं करोमि ।

(चारों कोनों में निर्मल जल से भरे कलश स्थापित करे) जल-फल आठों द्रव्य मिलाकर अर्घ्य बनाया । अष्ट अंग युत मानो सम्यग्दर्शन पाया ॥ श्री जिनवर के चरणों में यह अर्घ्य समर्पित । करूँ आज रागादि विकारी भाव विसर्जित ॥ ॐ हीं श्री स्नपनपीठस्थिताय जिनाय अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा । (पीठ स्थित जिन प्रतिमा को अर्घ्य चढ़ायें) मैं रागादि विभावों से कलुषित हे जिनवर । और आप परिपूर्ण वीतरागी हो प्रभुवर ॥ कैसे हो प्रक्षाल, जगत के अघ-क्षालक का। क्या दरिद्र होगा पालक ? त्रिभुवनपालक का ॥ भक्ति भाव के निर्मल जल से अघ-मल धोता । है किसका अभिषेक भ्रान्त चित खाता गोता ॥ नाथ ! भक्तिवश जिनबिम्बों का करूंन्हवन मैं । आज करूँ साक्षात जिनेश्वर का पर्शन मैं ॥ जैन विधि विधान / २६

दोहा

क्षीरोदधि सम नीर से करूँ बिम्ब प्रक्षाल । श्री जिनवर की भक्ति से जानूँ निज पर चाल ॥ तीर्थंकर का न्हवन शुभ सुरपति करें महान । पंचमेरु भी हो गए महातीर्थ सुखदान ॥

करता हूँ शुभ भाव से प्रतिमा का अभिषेक । बचूँ शुभाशुभ भाव से यही कामना एक ॥

ॐ ह्रीं श्रीमन्तं भगवन्तं कृपालसन्तं वृषभादि महावीरपर्यन्तं चतुर्विंशतितीर्थंकर परमदेवम्‌आद्यानामाद्ये जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्य खण्डे…नाम्निनगरे मासा नामुत्तमे…मासे…पक्षे…दिने मुन्यार्यिकाश्रावकश्राविकाणां सकुलकर्म- क्षयार्थ पवित्रतरजलेन जिनमभिषेचयामि ।

(चारों कलशों से अभिषेक करें तथा वादित्र नाद करावें एवं जय-जय शब्दोच्चारणकरें) दोहा

जिन संस्पर्शित नीर यह, गन्धोदक गुण खान । मस्तक पर धारूँ सदा, बनूँ स्वयं भगवान ॥ (मस्तक पर गन्धोदक चढ़ावें । अन्य किसी अंग से गन्धोदक का स्पर्श वर्जित है) जल-फलादि वसु द्रव्य ले, मैं पूजूँ जिनराज । हुआ बिम्ब अभिषेक अब, पाऊँ निज पदराज ॥

ॐ ह्रीं अभिषेकान्ते वृषभादिवीरान्तेभ्योऽर्घ्यनिर्वपामीति स्वाहा । श्री जिनवर का धवल यश त्रिभुवन में है व्याप्त । शान्ति करें मम चित्त में, हे परमेश्वर आप्त ॥ (पुष्पांजलिं क्षिपेत्)

रोला

जिन प्रतिमा पर अमृत सम जल कण अति शोभित । आत्म-गगन में गुण अनन्त तारे, भवि मोहित ॥ हो अभेद का लक्ष्य, भेद का करता वर्जन । शुद्ध वस्त्र से जल कण का करता परिमार्जन ॥ ॐ अमलांशुकेन जिनबिम्बमार्जन करोमि ।

(प्रतिमा को शुद्ध वस्त्र से पोंछे)

जैन विधि विधान / २७

दोहा

श्री जिनवर की भक्ति से, दूर होय भव-भार ।

उर-सिंहासन थापिये, प्रिय चैतन्य कुमार ॥

(जिन-प्रतिमा को सिंहासन पर विराजमान करें तथा निम्न छन्द बोलकर अर्घ्य चढ़ायें ।)

जल गन्धादिक द्रव्य से, पूजूँ श्री जिनराज । पूर्ण अर्घ्य अर्पित करूँ, पाऊँ चेतनराज ॥

ॐ ह्री श्री पीठस्थितजिनाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

प्रक्षाल के सम्बन्ध में प्रमुख विचारणीय बिन्दु : १. अर्हन्त भगवान का अभिषेक नहीं होता, जिनबिम्ब का प्रक्षाल किया जाता है, जो अभिषेक के नाम से प्रचलित है।

२. जिनबिम्ब का प्रक्षाल मात्र शुद्ध जल से शुद्ध वस्त्र पहनकर किया जाए।

३. प्रक्षाल मात्र पुरुषों द्वारा ही किया जाए। महिलायें जिनबिम्ब को स्पर्श न करें।

४. जिनबिम्ब का प्रक्षाल प्रतिदिन एक बार हो जाने के पश्चात् बार- बार न करें।

जैन विधि विधान /२८

पूजा पीठिका

ॐ जय जय जय। नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु । णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं । णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ॥

ॐ ह्रीं अनादिमूलमन्त्रेभ्यो नमः, पुष्पांजलिं क्षिपामि । चत्तारि मंगलं—अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं । चत्तारि लोगुत्तमा—अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो । चत्तारि सरणं पव्वज्जामि—अरिहंते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि ।

ॐ नमोऽर्हते स्वाहा, पुष्पांजलिं क्षिपामि । मंगल विधान

अपवित्रः पवित्रो वा सुस्थितो दुःस्थितोऽपि वा । ध्यायेत्पञ्चनमस्कारं सर्व पापैः प्रमुच्यते ॥ १ ॥ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत्परमात्मानं स बाह्याभ्यन्तरे शुचिः ॥ २ ॥ अपराजितमन्त्रोऽयं सर्व विघ्नविनाशनः ।

मङ्गलेषु च सर्वेषु प्रथमं मङ्गलं मतः ॥ ३ ॥ एसो पंच णमोयारो सव्व पावप्पणासणो ।

मंगलाणं च सव्वेसिं पढमं होई मंगलं ॥ ४ ॥ अर्हमित्यक्षरं ब्रह्मवाचकं परमेष्ठिनः । सिद्धचक्रस्य सद्बीजं सर्वतः प्रणमाम्यहम् ॥ ५ ॥ जैन विधि विधान / २९

कर्माष्टक – विनिर्मुक्तं मोक्ष-लक्ष्मी निकेतनम् । सम्यक्त्वादि-गुणोपेतं सिद्धचक्रं नमाम्यहम् ॥ ६ ॥ विघ्नौघाः प्रलयं यान्ति शाकिनी-भूत-पन्नगाः । विषं निर्विषतां याति स्तूयमाने जिनेश्वरे ॥ ७ ॥ पुष्पांजलि क्षिपेत्

जिनसहस्त्रनाम अर्घ्य

उदक-चन्दन-तन्दुलपुष्पकैश्चरु-सुदीप-सुधूप-फलार्घ्यकैः । धवल-मङ्गल-गान-रवाकुले जिन-गृहे जिननाथमहं यजे ॥ ॐ ह्रीं श्रीभगवज्जिनसहस्त्रनामेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा । पूजा प्रतिज्ञा पाठ

श्रीमज्जिनेन्द्र-मभिवन्द्य जगत्त्रयेशं, स्याद्वाद-नायकमनन्त-चतुष्टयार्हम् ।

श्रीमूलसंघ-सुदृशां सुकृतैकहेतु,

जैनेन्द्र-यज्ञ-विधिरेष मयाऽभ्यधायि ॥ १ ॥ स्वस्ति त्रिलोक-गुरवे जिन-पुंङ्गवाय,

स्वस्ति स्वभाव-महिमोदय-सुस्थिताय ।

स्वस्ति प्रकाश-सहजोज्जि-दृङ् मयाय,

स्वस्ति प्रसन्न-ललिताद्भुत-वैभवाय ॥ २ ॥ स्वस्त्युच्छलद्विमल-बोधसुधा प्लवाय,

स्वस्ति स्वभाव-परभाव-विभासकाय ।

स्वस्ति त्रिलोकविततैक-चिदुद्गमाय

स्वस्ति त्रिकाल-सकलायत-विस्तृताय ॥ ३ ॥ द्रव्यस्य शुद्धिमधिगम्य यथानुरूपं,

भावस्य शुद्धिमधिकामधिगन्तुकामः ।

आलम्बनानि विविधान्यवलम्ब्य वल्लान्,

भूतार्थ-यज्ञ-पुरुषस्य करोमि यज्ञम् ॥ ४ ॥ जैन विधि विधान / ३०

अर्हन् पुराणपुरुषोत्तम पावनानि,

वस्तून्यनूनमखिलान्ययमेक एव ।

अस्मिन्ज्वलद्विमल- केवल- बोधवह्नौ,

पुण्यं समग्रमहमेकमना जुहोमि ॥ ५ ॥

ॐ विधियज्ञ प्रतिज्ञायें जिनप्रतिमाग्रे पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि । स्वस्ति मंगलपाठ

श्रीवृषभो नः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअजितः ।

श्रीसम्भवः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअभिनन्दनः । श्रीसुमतिः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीपद्मप्रभः । श्रीसुपार्श्वः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीचन्द्रप्रभः । श्रीपुष्पदन्तः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीशीतलः । श्रीश्रेयान्सः स्वस्ति, स्वस्ति श्री वासुपूज्यः । श्रीविमलः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीअनन्तः ।

श्रीधर्मः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीशान्तिः ।

श्रीकुन्थुः स्वस्ति, स्वस्ति श्री अरनाथः ।

श्रीमल्लिः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीमुनिसुव्रतः । श्रीनमिः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीनेमिनाथः ।

श्रीपार्श्वः स्वस्ति, स्वस्ति श्रीवर्द्धमानः । पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्

परमर्षि स्वस्ति मंगलपाठ

( प्रत्येक श्लोक के बाद पुष्प क्षेपण करें)

नित्याप्रकम्पाद्भुत-केवलौघाः स्फुरन्मनः पर्यय-शुद्धबोधाः । दिव्यावधिज्ञान-बलप्रबोधाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥ १ ॥ कोष्ठस्थ-धान्योपममेकबीजं संभिन्न-संश्रोतृ-पदानुसारि । चतुर्विधं बुद्धिबलं दधानाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥ २ ॥ संस्पर्शनं संश्रवणं च दूरादास्वादन-घ्राण-विलोकनानि । दिव्यान्मतिज्ञान-बलाद्वहन्तः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥ ३ ॥ जैन विधि विधान / ३१

प्रज्ञाप्रधानाः श्रमणाः समृद्धाः प्रत्येकबुद्धा दशसर्वपूर्वैः । प्रवादिनोऽष्टाङ्गनिमित्तविज्ञाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥ ४ ॥ ज‌ङ्घावलि-श्रेणि-फलाम्बु-तन्तु-प्रसून-बीजांकुर-चारणाह्वाः । नभोऽङ्गणस्वैर - विहारिणश्च स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥ ५ ॥ अणिम्निदक्षाः कुशलामहिम्नि लघिम्निशक्ताः कृतिनो गरिम्णि, मनो-वपुर्वाग्बलिनश्च नित्यं स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥ ६ ॥ सकामरूपित्व-वशित्वमैश्यं प्रकाम्यमन्तर्द्विमथाप्तिमाप्ताः । तथाऽप्रतीघातगुणप्रधानाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥ ७ ॥ दीप्तं च तप्तं च तथा महोमं घोरं तपो घोरपराक्रमस्थाः । ब्रह्मापरं घोर गुणाश्चरन्तः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥ ८ ॥ आमर्ष – सर्वोषधयस्तथाशीर्विषा - विषा दृष्टिविषंविषाश्च । सखिल्ल-विजल्ल-मलौषधीशाः स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥९ ॥ क्षीरं स्रवन्तोऽत्र घृतं स्रवन्तो मधुस्रवन्तोऽप्यमृतं स्रवन्तः । अक्षीणसंवास-महानसाश्च स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ॥ १० ॥ ( इति परमर्षिस्वस्तिमङ्गलविधानम् ।)

भजन

हे प्रभो ! चरणों में तेरे आ गये।

भावना अपनी का फल हम पा गये ॥ टेक ॥

वीतरागी हो तुम्हीं सर्वज्ञ हो ।

सप्त तत्वों के तुम्हीं मर्मज्ञ हो ।।

मुक्ति का मार्ग तुम्हीं से पा गये ॥१ ॥

विश्व सारा है झलकता ज्ञान में।

किन्तु प्रभुवर लीन है निज ध्यान में ॥

ध्यान में निज ज्ञान को हम पा गये ॥ २ ॥

तुमने बताया जगत के सब आत्मा ।

द्रव्य-दृष्टि से सदा परमात्मा ।।

आज निज परमात्मा पद पा गये ॥ ३ ॥

जैन विधि विधान / ३२

श्री पंच परमेष्ठी पूजन

अरहंत सिद्ध आचार्य नमन, हे उपाध्याय हे साधु नमन । जय पंच परम परमेष्ठी जय, भव सागर-तारणहार नमन ॥

मन-वच-काया पूर्वक करता हूँ, शुद्ध हृदय से आह्वानन । मम हृदय विराजो तिष्ठ तिष्ठ सन्निकट होहु मेरे भगवन ॥ निज आत्मतत्त्व की प्राप्ति हेतु, ले अष्ट द्रव्य करता पूजन । तुम चरणों की पूजन से प्रभु निज सिद्ध रूप का हो दर्शन ॥ ॐ ह्रीं श्री अरहंत-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय-सर्वसाधुपंचपरमेष्ठिनः ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधिकरणम् ।

मैं तो अनादि से रोगी हूँ, उपचार कराने आया हूँ।

तुम सम उज्ज्वलता पाने को, उज्ज्वल जल भरकर लाया हूँ ॥ मैं जन्म-जरा-मृतु नाश करूँ, ऐसी दो शक्ति हृदय स्वामी । हे पंच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ॥ ॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलम् निर्वपामीति स्वाहा । संसार ताप में जल-जल कर, मैंने अगणित दुःख पाये हैं। निज शान्त स्वभाव नहीं भाया, पर के ही गीत सुहाए हैं ॥ शीतल चंदन है भेंट तुम्हें, अंसार ताप नाशो स्वामी । हे पंच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ॥ ॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो संसारतापविनाशनाय चन्दनम् निर्वपामीति स्वाहा । दुःखमय अथाह रुभवसागर में, मेरी यह नौका भटक रही ।

शुभ-अशुभ भाव की भँवरों में, चैतन्य शक्ति निज अटक रही ॥ तन्दुल है धवल तुम्हें अर्पित, अक्षयपद प्राप्त करूँ स्वामी । हे पंच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ॥ ॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा । मैं काम व्यथा से घायल हूँ, सुख की न मिली किंचित् छाया । चरणों में पुष्प चढ़ाता हूँ तुम को पाकर मन हर्षाया ॥ जैन विधि विधान / ३३

मैं काम भाव विध्वंस करूँ, ऐसा दो शील हृदय स्वामी । हे पंच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ॥ ॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पम् निर्वपामीति स्वाहा। मैं क्षुधा रोग से व्याकुल हूँ, चारों गति में भरमाया हूँ। जग के सारे पदार्थ पाकर भी, तृप्त नहीं हो पाया हूँ ॥ नैवेद्य समर्पित करता हूँ, यह क्षुधा रोग मेटो स्वामी । हे पंच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ॥ ॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यम् निर्वपामीति स्वाहा । मोहान्ध महा अज्ञानी मैं, निज को पर का कर्ता माना। मिथ्यातम के कारण मैंने, निज आत्मस्वरूप न पहिचाना ॥ मैं दीप समर्पण करता हूँ, मोहान्धकार क्षय हो स्वामी । हे पंच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ॥ ॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीपम् निर्वपामीति स्वाहा । कर्मों की ज्वाला धधक रही, संसार बढ़ रहा है प्रतिपल । संवर से आस्त्रव को रोकूँ, निर्जरा सुरभि महके पल-पल ॥ मैं धूप चढ़ाकर अब आठों, कर्मों का हनन करूँ स्वामी । हे पंच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ॥ ॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपम् निर्वपामीति स्वाहा । निज आत्मतत्त्व का मनन करूँ, चितवन करूँ निज चेतन का । दो श्रद्धा-ज्ञान-चरित्र श्रेष्ठ, सच्चा पथ मोक्ष निकेतन का ॥ उत्तम फल चरण चढ़ाता हूँ निर्वाण महाफल हो स्वामी । हे पंच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ॥ ॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलम् निर्वपामीति स्वाहा । जल चन्दन अक्षत पुष्प दीप, नैवेद्य धूप फल लाया हूँ। अब तक के संचित कर्मों का, मैं पुंज जलाने आया हूँ ॥ यह अर्घ्य समर्पित करता हूँ, अविचल अनर्घ्य पद दो स्वामी । हे पंच परम परमेष्ठी प्रभु, भव-दुख मेटो अन्तर्यामी ॥ ॐ ह्रीं श्री पंचपरमेष्ठिभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यम् निर्वपामीति स्वाहा । जैन विधि विधान / ३४

पंचपरमेष्ठी एवं चार मंगल, उत्तम, शरण के अर्घ्य

उपजाति

अनादिसन्तानभवान् जिनेन्द्रान् अर्हत्पदेष्टानुपदिष्टधर्मान् । द्वेधाश्रियालिगितपादपद्मान् यजामि भक्त्या प्रकृतिप्रसर्क्स ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं अनन्तचतुष्टयसमवसरणलक्ष्मी विभ्रतेऽर्हत्परमेष्ठिनेऽर्घ्यं । कर्माष्टनाशाच्युतभावकर्मोद्धतीन् निजात्मस्वविलासभूपान् । सिद्धानन्तांस्त्रिक्कालमध्ये गीतान् यजामीष्टविधिप्रसक्त्यै ॥ २ ॥ ॐ ह्रीं अष्टकर्मकाष्ठगणं भस्मीकुर्वते सिद्धपरमेष्ठिनेऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा । ये पंचधाचारपरायणानाम् अग्रे सरादक्षिणशिक्षिकासु ।

प्रमाणनिर्णीतपदार्थसार्थानाचार्यवर्यान् परिपूजयामि ॥ ३ ॥ ॐ ह्रीं पंचाचारपरायणाचार्यपरमेष्ठिनेऽर्घ्यं निर्वापामीति स्वाहा । अर्थश्रुतं सत्यविबोधनेन द्रव्यश्रुतं ग्रन्थविदर्भणेन । येऽध्यापयन्ति प्रवरानुभावास्तेऽध्यापका मे र्हणया दुहन्तु ॥ ४ ॥ ॐ ह्रीं द्वादशांगपठनपाठनोद्यतोपाध्यायपरमेष्ठिनेऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा । द्विधा तपोभावनया प्रवीणान् स्वकर्मभूवीघ्रविखण्डनेषु । विविक्तशय्यासनहर्म्यपीठ स्थितान् तपस्विप्रवरान् यजामि ॥ ५ ॥ ॐ ह्रीं त्रयोदशप्रकारचारित्राराधकसाधुपरमेष्ठिनेऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा। आर्या

अर्हन्मंगलमर्चे सुरनर- विद्याधरैकपूज्यपदम् ।

तोयप्रभृतिभिरध्यै-र्विनीतमूर्धा शिवाप्तये नित्यम् ॥ ६ ॥ ॐ ह्रीं अर्हन्मंगलायार्घ्यं…।

धौव्योत्पादविनाश रूपाखिलवस्तुबोधनार्थकरम् ।

सिद्धं मंगलमिति वा मत्वाच चाष्टविधवस्तुभिः ॥ ७ ॥

ॐ ह्रीं सिद्धमंगलायार्घ्यं…।

यद्दर्शनकृतविभवाद् रोगोपद्रवगणा मृग इव मृगेन्द्रात् । दूरं भजन्ति देशं साधुभ्योऽर्च्यते विधिना ॥ ८ ॥

ॐ ह्रीं साधुमंगलायार्घ्यं…।

जैन विधि विधान / ३५

केवलिमुखावगतया वाण्या निर्दिष्टभेदधर्मगणम् । मत्वा भवसिन्धुतरीं प्रयजे तन्मंगलं शुद्धथै ॥ ९ ॥ ॐ ह्रीं केवलिप्रज्ञप्तधर्ममंगलायार्घ्य… । लोकोत्तममथ जिनराट् पदाब्जसेवनयामितदोषविलयाय । शक्तं मत्वा घृतजलगन्धैरर्चे समीहितं प्रभवैः ॥ १० ॥ ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तमायार्घ्य… ।

सिद्धाश्च्युतदोषमला लोकाग्र प्राप्य शिवसुखं व्रजिताः । उत्तमपथगा लोके तानच वसुविधार्चनया ॥ ११ ॥

ॐ ह्रीं सिद्धलोकोत्तमायार्घ्य… ।

इन्द्रनरेन्द्रसुरेन्द्रैरर्थिततपसां व्रतैषिणां सुधियाम् । उत्तममध्वानम-सावर्चेऽहं सलिलगन्धमुखैः ॥ १२ ॥ ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमायार्घ्यं… ।

रागपिशाचविमर्दनमत्र भव धैर्यधारिणामतुलम् । उत्तममपगतकामो वृषमर्चे शुचितर कुसुमैः ॥ १३ ॥ ॐ ह्रीं केवलिप्रज्ञप्तधर्मोत्तमायार्घ्य…। अर्हच्छरणमथार्चेनन्तजनुष्यपि न जातु सम्प्राप्तम् । नर्तनगानादिविधि- मुद्दिश्याष्टकर्मणां शान्त्यै ॥ १४ ॥ ॐ ह्रीं अर्हच्छरणायार्घ्य…।

निर्व्याबाधगुणादिकप्रागयं शरणं समेतचिदमनन्तम् । सिद्धानाममृतानां भूत्यै पूजेयमशुभहान्यर्थम् ॥ १५ ॥ ॐ ह्रीं सिद्धशरणायार्घ्य…।

चिदचिद्भदं शरणंलौकिकमाप्यं प्रयोजनातीतम् । त्यक्त्वा साधुजनानां शरणं भूत्यै यजामि परमार्थम् ॥ १६ ॥ ॐ ह्रीं साधुशरणायार्घ्य…।

केवलिनाथ मुखोद्गतधर्मः प्राणिसुखहितार्थमुद्दिष्टः । तत्प्राप्त्यै तद्यजनं कुर्वे मखविघ्ननाशाय ॥ १७ ॥ ॐ ह्रीं केवलिप्रज्ञप्तधर्मशरणायार्घ्य… । जैन विधि विधान / ३६

वसन्ततिलका

संसारदुःखहनने निपुणं जनानां नाद्यकन्तचकमिति सप्तदशप्रमाणम् । संपूजये विविधभक्तिभरावनम्रः शान्तिप्रदं भुवनमुख्यपदार्थसार्थैः ॥ १८ ॥ ॐ ह्रीं अर्हदादिसप्तदशमन्त्रेभ्यः समुदायार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। जयमाला

जय वीतराग सर्वज्ञ प्रभो, निज ध्यान लीन गुणमय अपार । अष्टादश दोष रहित जिनवर, अर्हन्त देव को नमस्कार ॥ अविकल अविकारी अविनाशी, निजरूप निरंजन निराकार । जय अजर अमर हे मुक्तिकंत, भगवंत सिद्ध को नमस्कार ॥ छत्तीस सुगुण से तुम मण्डित, निश्चय रत्नत्रय हृदय धार। हे मुक्तिवधू के अनुरागी, आचार्य सुगुरु को नमस्कार ॥ एकादर्श अंग पूर्व चौदह के, पाठी गुण पच्चीस धार। बाह्यान्तर मुनि मुद्रा महान, श्री उपाध्याय को नमस्कार ॥ व्रत समिति गुप्ति चारित्र धर्म, वैराग्य भावना हृदय धार। हे द्रव्य-भाव संयममय मुनिवर, सर्व साधु को नमस्कार ॥ बहु पुण्य संयोग मिला नरतन, जिनश्रुत जिनदेव चरण दर्शन । हो सम्यग्दर्शन प्राप्त मुझे, तो सफल बने मानव जीवन ॥ निज-पर का भेद जानकर मैं, निज को ही निज में लीन करूँ। अब भेदज्ञान के द्वारा मैं, निज आत्म स्वयं स्वाधीन करूँ ॥ निज में रत्नत्रय धारण कर, निज परिणति को ही पहचानूँ । पर-परिणति से हो विमुख सदा, निज ज्ञानतत्त्व को ही जानूँ ॥ जब ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता विकल्प तज, शुक्लध्यान मैं ध्याऊँगा। तब चार घातिया क्षय करके, अर्हत महापद पाऊँगा ॥

जैन विधि विधान / ३७

है निश्चित सिद्ध स्वपद मेरा, हे प्रभु ! कब इसको पाऊँगा। सम्यक् पूजा फल पाने को, अब निजस्वभाव में आऊँगा ॥ अपने स्वरूप की प्राप्ति हेतु, हे प्रभु ! मैंने की है पूजन। तब तक चरणों में ध्यान रहे, जब तक न प्राप्त हो मुक्ति सदन ॥ ॐ ह्रीं श्री अर्हत-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय सर्वसाधुपंचरमेष्ठिभ्यो महार्घ्यम्…। हे मंगल रूप अमंगल हर, मंगलमय मंगल गान करूँ ।

मंगल में प्रथम श्रेष्ठ मंगल, नवकार मन्त्र का ध्यान करूँ ॥ पुष्पांजलि क्षिपेत्

परमेष्ठी - वन्दना

पंच परम परमेष्ठी देखे . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . 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शान्तियज्ञ :- यह शान्ति और यज्ञ का सामासिक शब्द है । “शान्ति” का अर्थ (शम, वितन) प्रशमन, संसार एवं शरीर भोगों के प्रति उदासीनता, प्रायश्चितरूप अनुष्ठान आदि है । तथा ‘यज्ञ’ का अर्थ (यज भावे नड्ङ्ग) याग, पूजा, पूजन समापन, उपसंहार आदि । शांतियज्ञ का अर्थ – प्रशम भावों सहित संसार, शरीर एवं भागों से विरक्त होकर जिनेन्द्रोपासना करना है । प्रतिदिन पूजन के समापन में समस्त पूजनों के समावेशित महार्घ्य पढ़ते हैं । पश्चात् शांतिभक्ति और समाधिभक्ति पढ़ते हैं । उसीप्रकार विशेष पूजन विधानों के समापन में शांतियज्ञ करते हैं । शांतियज्ञ में उच्चरित मंत्रों में जिनेन्द्राराधना ही समाविष्ट है । वह आर्ष यज्ञ निश्चय-व्यवहार अपेक्षा दो प्रकार का है । निश्चययज्ञ की प्रधानता मुनियों के होती है और व्यवहारयज्ञ की प्रधानता गृहस्थों के होती है ।

निश्चययज्ञ :- जो यज्वन, यज्ञ, राजि, यजुस और यज्ञफल के विकल्परहित निरालम्बनपूर्वक शुद्ध भावों द्वारा निरुपाधित सहज स्वभाव का यज्ञ/पूजा/उपासना करता है उसे निश्चययज्ञ है ।

व्यवहारयज्ञ :- अपने भावो की परम शुद्धता को पाने की अभिलाषा से शुद्ध प्रासुक द्रव्यों के द्वारा जिनस्तवन, जिनबिम्बदर्शन आदि के आलम्बन से अर्हतादिकों का पूजन करना तथा एकाग्रचित्त होकर अपने समस्त पुण्य को इस दैदीप्यमान केवलज्ञान रूपी अग्नि में हवन करना व्यवहारयज्ञ है ।

अतः ज्ञानी पुरुष निश्चय और व्यवहारयज्ञ दोनों को यथावत् करता हुआ संसार समुद्र को पार कर परिनिर्वाण पद को प्राप्त करता है ।

मण्डप में वेदी के सन्मुख चौकोर, गोल और त्रिकोण ऐसे थाली में चन्दन से स्वस्तिक व ॐ बनावें । समापन विधि में बैठनेवालों की संख्या अधिक हो तो अलग से थाली रख लेना चाहिये । प्रारम्भ में सब लोग अपने स्थान पर खड़े होकर मंगलाष्टक पढ़ते हुए पुष्पक्षेपण करें ।

निम्न मन्त्र पढ़कर भूमि में पुष्पक्षेपण करें ।

‘ॐ ह्रीं क्ष्वीं भूः स्वाहा’ ।

निम्न मंत्र पढ़कर भूमि पर जल सींचे–

ॐ ह्रीं मेघकुमार धरां प्रक्षालय प्रक्षालय अं हं सं तं पं स्वं झं यं क्षः फट् स्वाहा- निम्न पढ़कर पश्चिम में पीठ स्थापन करें-

‘ॐ ह्रीं अर्ह क्षं वं वं श्री पीठस्थापनं करोमीति स्वाहा’ ।

जैन विधि विधान /३९

निम्न मन्त्र पढकर पीठ पर विनायक यन्त्र विराजमान करें। तदनन्तर नीचे लिखे मन्त्रों से यन्त्र की पूजा करें व अर्घ्य चढावें-

‘ॐ ह्रीं श्री क्लीं ऐं अर्ह जगतां सर्वशान्ति कुर्वन्तु श्रीपीठयन्त्रस्थापनं करोमीति स्वाहा’।

निम्न मन्त्र पढ़कर धर्मचक्र को अर्घ्य दें-

ॐ ह्रीं अर्ह नमः परमेष्ठिभ्यः स्वाहा।

ॐ ह्रीं नमः परमात्मेभ्यः स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्ह नमोऽनादिनिधनेभ्य स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्ह नमो नृसुरासुरपूजितेभ्यः स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्ह नमोऽनन्तदर्शनेभ्यः स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्ह नमोऽनन्तवीर्येभ्यः स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्ह नमोऽनन्तसुखेभ्यः स्वाहा ।

ॐ ह्रीं धर्मचक्रायाप्रतिहततेजसे स्वाहा

निम्न मंत्र पढ़कर छत्रत्रय को अर्थ देवें-

ॐ ह्रीं श्वेतछत्रत्रयाश्रिये स्वाहा।

निम्न मंत्र पढ़कर सरस्वती का आह्वान करें-

ॐ ह्रीं श्री क्लीं ऐं सौ हौ सर्वशास्त्रप्रकाशिनि वद वद वाग्वादिनि अवतर अवतर, तिष्ठ तिष्ठ सन्निहिता भव भव वषट् ।

निम्न मंत्र पढ़कर सरस्वती/जिनवाणी को अर्घ्य देवें-

ॐ ह्रीं श्री जिनमुखोद्भूतस्याद्वादनयगर्भितद्वादशांगश्रुतज्ञानायार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।

निम्न मन्त्र पढ़कर गुरु को अर्घ्य चढ़ावें-

ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रादिगुणविराजमानाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्योऽर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।

निम्न मन्त्र पढ़कर चावलों पर जल से भरा हुआ एवं श्रीफल आदि से सुशोभित कलश स्थापित करें-

ॐ ह्रीं स्वस्तिविधानाय पुण्याहवाचनार्थज्व कलशं स्थापयामीति स्वाहा। जैन विधि विधान /४०

निम्न मन्त्र पढकर कलश में थोड़ा प्रासुक जल डालें-

ॐ ह्रीं ह्रों हूं ह्रौं ह्रः नमोऽहते भगवते पद्ममहापद्मतिणिच्छ- केसरिपुण्डरीकमहापुण्डरीकगंगासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तासीता- सीतोदानारीनरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारक्तारक्तोदापयोधिशुद्धजलसुवर्णघट- प्रक्षालितवरत्नगन्धाक्षतपुष्योर्जिता-मादकं पवित्रं कुरु कुरु झं झं झों झों व वं मं मं हं हं संसं तं तं पं पंद्रां द्रां द्रीं द्रीं हं सः स्वाहा। निम्न मंत्र पढकर क्रमशः जल आदि आठ द्रव्य चढ़ावें –

ॐ ह्रीं नीरजसे नमः (जलम्)

ॐ ह्रीं शीलगन्धाय नमः (चन्दनम्)

ॐ ह्रीं अक्षताय नमः (अक्षतम्)

ॐ ह्रीं विमलाय नमः (पुष्यम्)

ॐ ह्रीं दर्पमथनाय नमः (नैवेद्यम्)

ॐ ह्रीं ज्ञानद्योतनाय नमः (दीपम्)

ॐ ह्रीं श्रुतधूपाय नमः (धूपम्)

ॐ ह्रीं अभीष्टफलदाय नमः (फलम्)

ॐ ह्रीं परमसिद्धाय नमः (अर्घ्यम्)

निम्नलिखित मन्त्रों को पढते हुए थाली में पुष्प क्षेपण करें: - ॐ ह्रीं अर्हद्भ्यः स्वाहा। ॐ ह्रीं सिद्धेभ्यः स्वाहा। ॐ ह्रीं सूरिभ्यः स्वाहा। ॐ ह्रीं पाठकेभ्यः स्वाहा। ॐ ह्रीं साधुभ्यः स्वाहा। ॐ ह्रीं जिनधर्मेभ्यः स्वाहा। ॐ ह्रीं जिनागमेभ्यः स्वाहा। ॐ ह्रीं जिनबिम्बेभ्यः स्वाहा। ॐ ह्रीं जिनचैत्यालयेभ्यः स्वाहा। ॐ ह्रीं सम्यक्चारित्राय स्वाहा।

निम्नलिखित प्रत्येक मन्त्र के बाद ‘स्वाहा’ शब्द का स्पष्ट उच्चारण करते हुए प्रत्येक मन्त्र पर अर्घ्य या पुष्प स्थंडिल (चबूतरे) पर रखी थाली में चढ़ावें- पीठिकामन्त्रा :

ॐ सत्यजाताय नमः स्वाहा। ॐ अर्हज्जाताय नमः स्वाहा। ॐ अनुपमजाताय नमः स्वाहा। ॐ स्वप्रधानाय नमः स्वाहा। ॐ अचलाय नमः स्वाहा। ॐ अक्षयाय नमः स्वाहा। ॐ अव्याबाधाय नमः स्वाहा। ॐ अनन्तज्ञानाय नमः स्वाहा। ॐ अनन्तदर्शनाय नमः स्वाहा। ॐ अनन्तवीर्याय नमः स्वाहा। ॐ अनन्तसुखाय नमः स्वाहा। ॐ नीरजसे नमः स्वाहा। ॐ निर्मलाय नमः स्वाहा। ॐ अच्छेद्याय नमः स्वाहा। ॐ अभेद्याय नमः स्वाहा। ॐ अजराय नमः स्वाहा। ॐ अमराय नमः स्वाहा। ॐ अप्रमेयाय नमः स्वाहा। ॐ अगर्भवासाय नमः स्वाहा। ॐ अक्षोभाय जैन विधि विधान /४१

नमः स्वाहा। ॐ अविलीनाय नमः स्वाहा। ॐ परमधनाय नमः स्वाहा। ॐ

परमकाष्ठायोगरूपाय नमः स्वाहा। ॐ लोकाग्रनिवासिने नमः स्वाहा। ॐ परमसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा। ॐ अर्हत्सिद्धेभ्यो नमः स्वाहा। ॐ केवलिसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा। ॐ अन्तःकृतसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा। ॐ परम्परासिद्धेभ्यो नमः स्वाहा। ॐ अनादिपरम्परासिद्धेभ्यो नमः स्वाहा। ॐ अनाद्यनुपमसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा। ॐ सम्यग्दृ‌ष्टि आसन्नभव्यनिर्वाणपूजाईं अग्नीन्द्राय स्वाहा।

सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु अपमृत्युविनाशनं भवतु समाधिमरणं भवतु स्वाहा ।

यह काम्यमन्त्र पढ़कर प्रतिष्ठाचार्य इन्द्र-इन्द्राणियों पर पुष्प फैंके अथवा जल के छीटे देवें । इसोप्रकार प्रत्येक मन्त्र के पश्चात करें ।

जातिमन्त्रा :

ॐ सत्यजन्मनः शरणं प्रपद्ये स्वाहा। ॐ अर्हज्जन्मनः शरणं प्रपद्ये स्वाहा । ॐ अर्हन्मातुः शरणं प्रपद्ये स्वाहा। ॐ अर्हत्सुतस्य शरणं प्रपद्ये स्वाहा। ॐ अनादिगमनस्य शरणं प्रपद्ये स्वाहा। ॐ अनुपमजन्मनः शरणं प्रपद्ये स्वाहा। ॐ रत्नत्रयस्य शरणं प्रपद्ये स्वाहा। ॐ सम्यग्दृष्टये, सम्यग्दृष्टये, ज्ञानमूर्तये सरस्वत्यै सरस्वत्यै स्वाहा ।

सेवाफलं षट्‌परमस्थानं भवतु अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु स्वाहा ।

निस्तारकमन्त्रा :

ॐ सत्यजाताय स्वाहा। ॐ अर्हज्जाताय स्वाहा। ॐ षटकर्मणे स्वाहा। ॐ ग्रामपतये स्वाहा । ॐ अनादिश्रोजियाय स्वाहा। ॐ स्नातकाय स्वाहा। ॐ श्रावकाय स्वाहा। ॐ देवब्राह्मणाय स्वाहा। ॐ सुब्राह्मणाय स्वाहा। ॐ अनुपमाय स्वाहा। ॐ सम्यग्दृष्टये निधिपतये निधिपतये वैश्रवणाय वैश्रवणाय स्वाहा। सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु स्वाहा ।

ऋऋषिमन्त्रा :

ॐ सत्यजाताय नमः स्वाहा। ॐ अर्हज्जाताय नमः स्वाहा। ॐ निर्ग्रन्थाय नमः स्वाहा । ॐ वीतरागाय नमः स्वाहा। ॐ महाव्रताय नमः स्वाहा। ॐ त्रिगुप्ताय नमः स्वाहा । ॐ महायोगाय नमः स्वाहा। ॐ विविधयोगाय नमः स्वाहा। ॐ विवर्द्धये नमः स्वाहा । ॐ अंगधराय नमः स्वाहा। ॐ पूर्वधराय नमः स्वाहा। ॐ गणधराय नमः स्वाहा। ॐ पर्मर्षिभ्यो नमः स्वाहा। ॐ अनुपमजाताय नमः स्वाहा। ॐ सम्यग्दृष्टये सम्यग्दृष्टये भूपतये नगरपतये नगरपतये कालश्रमणाय कालश्रमणाय स्वाहा ।

जैन विधि विधान /४२

सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु स्वाहा ।

सुरेन्द्रमन्त्रा :

ॐ सत्यजाताय स्वाहा । ॐ अर्हज्जाताय स्वाहा। ॐ दिव्यजाताय स्वाहा। ॐ दिव्यार्चिजाताय स्वाहा। ॐ नेमिनाथाय स्वाहा। ॐ सौधर्माय स्वाहा। ॐ कल्पाधिपतये स्वाहा। ॐ अनुचराय स्वाहा। ॐ परम्परेन्द्राय स्वाहा। ॐ अहमिन्द्राय स्वाहा । ॐ परमाहते स्वाहा। ॐ अनुपमाय स्वाहा। ॐ सम्यगृष्टये सम्यग्दृष्टये कल्पपतये कल्पपतये दिव्यमूर्तये वज्रनामने स्वाहा। सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु स्वाहा।

परमराजादिमन्त्रा :

ॐ संत्यजाताय स्वाहा। ॐ अर्हज्जाताय स्वाहा। ॐ अनुपमेन्द्राय स्वाहा। ॐ विजयार्घ्यजाताय स्वाहा। ॐ नेमिनाथाय स्वाहा। ॐ परमजाताय स्वाहा। ॐ परमार्हते स्वाहा। ॐ सम्यग्दृष्टये सम्यग्दृष्टये उग्रतेजसे उग्रतेजसे दिशांजननेमिविजयाय स्वाहा।

सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु समाधिमरणं भवतु स्वाहा ।

परमेष्ठिमन्त्रा :

ॐ सत्यजाताय नमः स्वाहा। ॐ अर्हज्जाताय नमः स्वाहा। ॐ परमजाताय नमः स्वाहा। ॐ परमार्हते नमः स्वाहा। ॐ परमरूपाय नमः स्वाहा। ॐ परमतेजसे नमः स्वाहा। ॐ परमगुणाय नमः स्वाहा। ॐ परमस्थानाय नमः स्वाहा। ॐ परमयोगिने नमः स्वाहा। ॐ परमभाग्याय नमः स्वाहा। ॐ परमर्द्धये नमः स्वाहा। ॐ परमप्रसादाय नमः स्वाहा। ॐ परमविज्ञानाय नमः स्वाहा। ॐ परमदर्शनाय नमः स्वाहा । ॐ परमवीर्याय नमः स्वाहा। ॐ परमसुखाय नमः स्वाहा। ॐ परमसर्वज्ञाय नमः स्वाहा । । ॐ अर्हते नमः स्वाहा। ॐ परमेष्ठिने नमः स्वाहा। ॐ परमनेत्रे नमः स्वाहा। ॐ सम्यग्दृष्टये सम्यग्दृष्टये त्रैलोक्यविजयाय त्रैलोक्यविजयाय धर्ममूर्तये धर्ममूर्तये धर्मनेमे स्वाहा।

सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु स्वाहा।

तदनन्तर जिस मन्त्र का जितना जाप किया हो, उसकी दशांश पुष्पों द्वारा आहूतियाँ देना चाहिए। यह मन्त्र प्रतिष्ठाचार्य मन में बोलकर स्वाहा शब्द का उच्चारण करें और जाप में बैठे हुए सब महाशय स्वाहा बोलकर पुष्प क्षेपण करें। समापन विधि समाप्त होने पर जो घट स्थापित किया था, उसे हाथ में लेकर इन्द्र बृहच्छान्तिधारा दें।

जैन विधि विधान /४३

बृहच्छान्तिमन्त्राः

ॐ णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो

लोए सव्वसाहूणं । चत्तारि मंगलं-अरहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं । चत्तारि लोगुत्तमा, अरहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगूत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो। चत्तारि शरणं पव्वज्जामि-अरहंते शरणं पव्वज्जामि, सिद्धे शरणं पव्वज्जामि, साहू शरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णतं धम्मं शरणं पव्वज्जामि हौं, अनादिसिद्धमहामंत्रपूजनभक्तिप्रसादात् सर्वशान्तिर्भवतु स्वाहा ।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्ह असि आ उ सा अनाहतविद्यायै णमो अरहंताणं ह्रौं सर्वशान्तिर्भवतु स्वाहा ।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्ह वं मं हं सं तं पं वं वं में मं हं हं संसं तं तं पं पंझं झं इवीं इवीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं नमोऽर्हते भगवते स्वाहा । ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राधिपतये अष्टगुणसमृद्धाय फट् स्वाहा।

ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलनिवासिनि पापमलक्षयंकरि श्रुतज्वालासहस्त्रप्रज्वलिते सरस्वति तव भक्तिप्रसादात् मम पापविनाशनं भवतु क्षां क्षीं क्ष क्षः क्षीरवरधवले अमृतसम्भवे बं बं हू हू स्वाहा। सरस्वतीभक्तिप्रसादात् सुज्ञानं भवतु । ॐ णमो भयवदो वड्डूमाणरिसहस्स जस्स चक्कं जलं तं गच्छइ आयासं पायलं

भूयलं जुए वा विवादे वा रणांगणे वा थंभणे वा मोहणे वा सव्वजीवसताणं अपराजिदो भवदु मे रक्ख रक्ख स्वाहा। वर्द्धमानमन्त्रेण सर्वरक्षा भवतु ।

ॐ श्रीं क्षां क्ष क्ष क्षै क्षों क्षौं क्षं क्षः नमोऽर्हते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा। सर्वरक्षा भवतु ।

ॐ उसहाइजिणं पणमामि सया अमलो विमलो विरजो वरया, कल्पतरु

सव्वकामदुहा माम् रक्ख सहापुरुविज्जणिही ।

अहेव य अदुसया अठसहस्सा य अठकोडीओ ।

रक्खं तुम्म सरीरं देवासुरपणमिया सिद्धा ।।

ॐ ह्रीं श्री अर्ह नमः स्वाहा स्वधा। ॐ ह्रां ह्रीं हूं ह्रौं ह्रः असि आउसा नमः एतन्मन्त्रप्रसादात् सर्वभूतव्यन्तरादिबाधाविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः । ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष हूं फट् स्वाहा। ॐ ह्रां ह्रीं हूं ह्रौं ह्रः सर्वदिशागतविघ्नविनाशनं भवतु । ॐ क्षां क्षीं हूं क्षौं क्षः सर्वदिशागतविघ्नविनाशनं भवतु ।

जैन विधि विधान /४४

ॐ सम्प्रतिकालश्रेयस्करस्वर्गावतरण-जन्माभिषेक-परिनिष्क्रमण-केवलज्ञान निर्वाणकल्याणविभूषितमहाभ्युदयाः

श्रीऋषभाजित-सम्भवाभिनन्दन-

समतिपद्मप्रभ- सुपार्श्व-चन्द्रप्रभ-पुष्पदन्त-शीतल-श्रेयो-वासुपूज्य-विमलानंत-धर्म- शान्ति-कुन्थ्वर-मल्लि-मुनिसुव्रत-नमि-नेमि-पार्श्व-वर्धमान-परमदेवपूजनभक्ति- प्रसादात् सर्वशान्तिर्भवतु तुष्टिः पुष्टिश्च भवतु ।

ॐ ह्रीं लोकोद्योतनकरा अतीतकालसंजाता निर्वाणसागर महासाधु-

विमलप्रभ-शुद्धाभ-श्रीधर-सुदत्तामलप्रभोद्धाराग्नि-सन्मति-शिव-कुसुमांजलि- शिवगणोत्साह-ज्ञानेश्वर-परमेश्वर-विमलेश्वर-यशोधर-कृष्णज्ञानमति-शुद्धमति- श्रीभद्रशान्ताश्वेति चतुर्विशतिभूतपरमदेवपूजनभक्तिप्रसादात्सर्वशान्तिर्भवतु । ॐ भविष्यत्कालाभ्युदयप्रभवाः महापद्म-देव-सुप्रभ-स्वयम्प्रभ-सर्वायुध- नयनदेवोयदेव-प्रभादेवोदंकदेव-प्रश्नकीर्ति-जयकीर्ति-पूर्णवृद्धि-निष्कषाय-विमल- प्रभ-वहल-निर्मल-चित्रगुप्त-स्वयम्भू-कन्दर्प-जयनाथ-विमलनाथ-दिव्यवागनन्तवी- र्याश्चेति चतुर्विंशतिभविष्यत्परमदेवपूजनभक्तिप्रसादात् सर्वशान्तिर्भवतु । ॐ त्रिकालवर्तिपरमधर्माभ्युदयाः सीमन्धर-युगमंधर-बाहु-सुबाहु-संजातक- स्वयम्प्रभ-वज्रधर-चन्द्रानन-चन्द्रबाहु-भुजंगेश्वर-नेमिप्रभु-वीरसेन-महाभद्रजयदेव- अजितवीर्याश्वेति पंचविदेह क्षेत्र विद्यमानविंशतिपरमदेव-पूजनभक्तिप्रसादात्सर्व- शान्तिर्भवतु तुष्टि पुष्टिश्च भवतु ।

पूजिता भरताद्यैश्च भूपेन्द्रैर्भूरिभूतिभिः ।

चतुर्विधस्य संघस्य शान्ति कुर्वन्तु शाश्वतीम् ॥ १ ॥

विघ्नौघाः प्रलयं यान्ति शाकिनीभूतपन्नगाः ।

विषं निर्विषतां याति स्तूयमाने जिनेश्वरे ॥ २ ॥

दुर्भिक्षादि महादोष निवारणपरम्पराः ।

कुर्वन्तु जगतः शान्ति जिन-श्रुत-मुनीश्वराः ॥ ३ ॥

यत्संस्मरणमात्रेण

विघ्नाः नश्यन्ति मूलतः ।

कुर्वन्तु जगतः शान्ति जिन-श्रुत-मुनीश्वराः ॥ ४ ॥

पदार्थान् लभंते प्राणी यत्प्रसादात्प्रसादतः ।

कुर्वन्तु जगतः शान्ति जिन-श्रुत-मुनीश्वरा ॥ ५ ॥

जैन विधि विधान /४५

ॐ ह्रीं णमो अरहंताणं णमो जिणाणं ह्रां ह्रीं हूं ह्रौं ह्रः अप्रतिचक्रे फट् विचक्राय झौं झौं स्वाहा । ऋद्धिमन्त्रभक्तिप्रसादात्सर्वेषां शान्तिर्भवतु । विसूचिकाज्वरादिरोगविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो ओहिजिणाणं

परमोहिजिणाणं शिरोरोगविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो सव्वोहिजिणाणं अक्षिरोगविनाशं भवतु । ओं ह्रीं अर्ह णमो अणंतोहिजिणाणं कर्णरोगविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो कोट्ठबुद्धीणं बीजबुद्धीणं ममात्मनि विवेकज्ञानं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो पदानुसारीणं परस्परविरोधविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो संभिण्णसोदाराणं श्वासरोगविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो पत्तेयबुद्धाणं प्रतिवादिविद्याविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो सयंबुद्धाणं कवित्वं पाण्डित्यं च भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो बोहियबुद्धाणं अन्यगृहीतं श्रतुज्ञानं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो उजुमदीणं सर्वशान्तिर्भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो विउलमदीणं बहुश्रुतज्ञानं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो दसपुव्वीण सर्ववेदिनो भवन्तु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो चउदसमुव्वीणं स्वसमय-परसप्रयवेदिनो भवन्तु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो अटुंगमहाणिमित्तकुसलाणं जीवितमरणादिज्ञानं भवन्तु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो वियणयट्टिपस्ताणं

कामितवस्तुप्राप्तिर्भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो विज्जाहराणं उपदेशप्रदेशमात्रज्ञानं भवतु । ओं ह्रीं अर्ह णमो चारणाणं नष्टपदार्थचिन्ताज्ञानं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो पण्णसमणाणं आयुष्यावसानज्ञानं भवन्तु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो आगासगामिणं अन्तरीक्षगमनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो आसीविसाणं विद्वेषप्रतिहतं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो दिट्ठीविसाणं स्थावरजंगमकृतविघ्नविनाशानं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो उग्गतवाणं वचः स्तम्भनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो तत्ततवाणं अग्निस्तम्भनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो महातवाणं जलस्तम्भनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो घोरतवाणं विषरोगादिविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो घोरगुणाणं दुष्टमृगादिभयविनाशो भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो घोरगुणपरक्कमाणं लूतागर्भान्तिकावर्लिविनाशो भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो घोरगुणचारिणं भूतप्रेतादिभयविनाशो भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो खिल्लोसहिपत्ताणं सर्वापमृत्युविनाशो भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो विप्पोसहियपत्ताणं गजमारीविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो सववीसहिपत्ताणं मनुष्यामरोपसर्गविनाशो भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो मणबलीणं वचबलीणं कायबलीणं

अपस्मारिगोअजमारीविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो खीरसवीणं

जैन विधि विधान /४६

अष्टादशकुष्ठगण्डमालादिकविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो सप्पिसवीणं सर्वव्याधि-विनाशनं भवतु। ॐ ह्रीं अर्ह णमो महुरसवीणं समस्तोपसर्गविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो अक्खीणमहाणसाणं अक्षीणऋद्धिर्भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो वड्डामाणाणं राजपुरुषादिभयविनाशनं भवतु । ॐ ह्रीं अर्ह णमो अभिषसवीणं सव्वसाहूणं सर्वशान्तिर्भवतु ।

ॐ ह्रीं अर्ह णमो भयवदो महदि महावीरवड्डमाणबुद्धरिसीणं समाधिसुख भवतु चतुःषष्टिक्रऋद्धिमन्त्रपूजनभक्तिप्रसादात् चतुःसंघानां सर्वशान्तिर्भवतु तुष्टिः पुष्टिश्व भवतु धनधान्यसमृद्धिर्भवतु रत्नत्रयं भवतु ।

ॐ नमोऽर्हते भगवते श्रीमते श्रीमत्पार्श्वतीर्थंकराय श्रीमद्रत्नत्रयरूपाय दिव्यतेजोमूर्तये प्रभामण्डलमण्डिताय द्वादशगणसहिताय अनन्तचतुष्टयसहिताय समवसरणकेवलज्ञानलक्ष्मीशोभिताय अष्टादशदोषरहिताय षट्चत्वारिंशद्वण- संयुक्ताय परमेष्ठिपवित्राय सम्यग्ज्ञानाय स्वयम्भुवे सिद्धाय बुद्धाय परमात्मने परमसुखाय त्रैलोक्यमहिताय अनन्तसंसारचक्रपरिर्मदनाय अनन्तज्ञानदर्शनवीर्य- सुखास्पदाय त्रैलोक्यवंशकराय सत्यब्रह्मणे उपसर्गविनाशकराय घातिकर्मक्षयंकराय अजराय अभवाय ऋष्यार्यिकाश्रावकश्राविकाप्रमुखचतुः संघोपर्सविनाशकाय अघातिकर्मविनाशकाय देवाधिदेवाय नमो नमः । पूर्वोक्तमन्त्राणां

पूजन-भक्तिप्रसादात् ऋष्यार्यिका-श्रावक-श्राविकाणां सर्वक्रोधमानमाया- लोभहास्यरत्यरति-शोकभय-जुगुप्सास्त्रीपुरुषनपुंसकवेदविनाशनं भवतु । मिथ्यात्वरागद्वेषमोह-मत्सरासूयेष्र्ष्याविभाव-विकार-विषाद-प्रमाद-कषाय-विकथा- विनाशनं भवतु । सर्वपंचेन्द्रियविषयेच्छास्नेहाशारौद्राकुलताव्याधिदीनतापापदोष विरोधविनाशनं भवतु । सर्वममकरी विकल्प निद्रातृष्णधिताप दुःख वैराहंकार संकल्प विमशो भवतु । सर्वाहारभयमैथुनपरिग्रहसंज्ञाविनाशो भवतु ।

सर्वोपसर्गाविघ्नराजचोरदुष्टम्गेहलोकपरलोकाकस्मान्मरणवेदनाशरणात्राण भयविनाशो भवतु । सर्वक्षयरोगकुष्टरोगज्वरातिसारादिरोगविनाशो भवतु । सर्वनरगजगोमहिषधान्यवृक्षगुल्मपत्रफलमारीराष्ट्रदेशमारीविश्वमारीविनाशो भवतु । सर्वमोहनीयज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयवेदनीयनामगोत्रायुरन्तरायकर्मविनाशनं भवतु ।

जैन विधि विधान /४७

पुण्याहवाचन

शान्तियज्ञ में बैठे हुए महानुभावों द्वारा शान्तिधारा कराते हुए निम्नानुसार पुण्याहवाचन करावें :-

ॐ पुण्याहं पुण्याहं लोकोद्योतनकरा अतीतकालसंजाता

निर्वाण-सागरप्रभृतयश्वतुर्विंशतिपरमदेवाः वः प्रीयन्ताम् प्रीयन्ताम् । (धारा) ॐ सम्प्रतिकालसंभवा वृषभादिवीरान्ताश्चतुर्विंशतिपरमजिनेन्द्राः वः प्रीयन्ताम् प्रीयन्ताम् । (धारा)

ॐ भविष्यत्कालाभ्युदयप्रभवा महापद्मादिचतुर्विशतिभविष्यपरमदेवाः वः प्रीयन्ताम् प्रीयन्ताम् । (धारा)

ॐ विंशति परमदेवाः वः प्रीयन्ताम् प्रीयन्ताम्। (धारा)

ॐ वृषभसेनादिगणधरदेवा वः प्रीयन्ताम् प्रीयन्ताम् । (धारा)

ॐ सप्तर्द्धिविशोभिताः कुन्दकुन्दाद्यनेकदिगम्बरसाधुचरणाः वः प्रीयन्तां प्रीयन्ताम् । (धारा)

इह वान्यनगरग्रामदेवतामनुजाः सर्वे गुरुभक्ताः जिनधर्मपरायणा भवन्तु । दानतपोवीर्यानुष्ठानं नित्यमेवास्तु । सर्वजिनधर्मभक्तानां धनधान्यैश्वर्यबलद्युतियशः प्रमोदोत्सवाः प्रवर्तन्ताम् ।

तुष्टिरस्तु, पुष्टिरस्तु, वृद्धिरस्तु, कल्याणमस्तु, अविघ्नमस्तु, आयष्यमस्तु आरोग्यमस्तु कर्मसिद्धिरस्तु, इष्टसम्पतिरस्तु काममांगल्योत्सवाः सन्तु, पापानि शाम्यन्तु घोराणि शाम्यन्तु पुण्यं वर्धताम् धर्मोवर्धताम् श्रीवर्धताम्, कुलं गोत्रं चाभिवर्धेताम्, स्वस्ति भद्रं चास्तु, आयुष्यमस्तु, क्ष्वीं ह्वीं हं सः स्वाहा। श्रीमज्जिनेन्द्रचरणारविन्देष्वानन्दभक्तिः सदास्तु ।

तदनन्तर शान्तिपाठ और विसर्जनपाठ पढ़ें ।

भजन

ऊँचे ऊँचे शिखरों वाले रे, यह तीरथ हमारा।

तीरथ हमारा हमें लागे प्यारा ॥ टेक ॥

श्री जिनवर से भेंट करावें।

जग को मुक्ति मार्ग दिखावें ॥

मोह का नाश करावे रे, यह तीरथ हमारा ॥ १ ॥

जड़-चेतन को भिन्न बतावे ।

चेतन की महिमा दरशावे ॥

भेद-विज्ञान करावे रे, यह तीरथ हमारा ॥ २ ॥

जैन विधि विधान /४८

विभिन्न अवसरों पर उपयोगी मन्त्रों की सूची

१. अमृत स्नान का मन्त्र :-

ॐ अमृते अमृतोद्भवे अमृतवर्षिणि अमृतं द्रावय द्रावय सं सं क्लीं क्लीं ब्लू ब्लूं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय द्रावय हं सं क्ष्वीं क्ष्वीं हं सं स्वाहा। २. यन्त्राभिषेक का मन्त्र :-

ॐ ह्रीं भूर्भुवः स्वरिह विघ्नौघवारकं यन्त्रं वयं परिषेचयामः ।

३. मंगल कलश स्थापना का मन्त्र :-

ॐ अद्य भगवतो महापुरुषस्य श्रीमदादि ब्रह्मणो

मतेऽस्मिन्… मासे… पक्षे… तिथौ… वासरे… वर्षे इह… नगरे… मन्दिरे… कार्यस्य निर्विघ्नसमाप्त्यर्थ मण्डपभूमिशुद्धयर्थं पात्रशुद्धयर्थं शान्त्यर्थं पुण्याहवाचनार्थं पंचरत्न-गंधपुष्पाक्षतादिबीजपूर शोभितमंगल कलश स्थापनं करोम्यहम् क्ष्वीं क्ष्वीं हं सः स्वाहा ।

४. रक्षासूत्र बांधने का मन्त्र :-

ॐ नमोऽर्हते सर्व रक्ष रक्ष हूं फट् स्वाहा।

५. यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र :-

ॐ नमः परमशान्ताय शान्तिकराय पवित्रीकरणाय अहं रत्नत्रयस्वरूपं

६. जाप्य संकल्प का मन्त्र :-

(२) ॐ ह्रां ह्रीं हूं ह्रौं ह्रः असि आ उ सा सर्वशान्ति कुरु कुरु स्वाहा। (३) ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्ह अ सि आ उ सा अनाहतविद्यायै णमो अरहंताणं ह्रौं सर्व शान्ति कुरु कुरु स्वाहा।

(४) ॐ ह्रां ह्रीं हूं ह्रौं ह्रः असि आ उ सा मध्यलोकसम्बन्धी चतुशताष्टपंचाशज्जिन चैत्यचैत्यालयेभ्यो नमः ।

जैन विधि विधान /४९

मन्दिर शुद्धि, वेदी शुद्धि एवं कलश शुद्धि के ८१ मन्त्र अनुष्टुप

कुम्भमिन्द्राह्वयं दिव्यमिन्द्रशस्त्रसमप्रभम् । ऐन्द्रपुष्पैः समर्चामि नवार्हद्भवनोत्सवे ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं इन्द्रकलशेन मन्दिर (वेदिका / कलश जिसकी शुद्धि का प्रसंग हो तदनुसार मन्दिर/वेदिका/कलश शब्द का उच्चारण करें) शुद्धिं करोमीति स्वाहा ।।

अग्निज्वालासमानाभमग्न्याख्यं बहुलाक्षतैः । पूजयामि जिनागारस्नानाय सुखहेतवे ॥ २ ॥

ॐ ह्रीं अग्निकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। यमदण्डसमानःभमलौकिकमणि श्रितम् ।

यमाख्ययमदिक्षालमान्यं संचर्चयेऽनघम् ॥ ३ ॥ ॐ ह्रीं यमककलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। नैऋत्याख्यं महाकुम्भं नेऋत्याधिपरक्षितम् । संशब्दये जिनागारं स्नानाय मधुरस्तवैः ॥ ४ ॥ ॐ ह्रीं नैऋत्यकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। वरुणाख्यं घटं दिव्यं वरुणासुररक्षितम् ।

संशब्दये जिनेन्द्रस्य वेश्मस्नानाय चम्पकैः ॥ ५ ॥ ॐ ह्रीं वरुणकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। पवनामरसंसेव्यं पवनामरसुरक्षितम् ।

पवनाख्यं घटं नीर-गन्धप्रसूनशालिजैः ॥ ६ ॥ ॐ ह्रीं पवनकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। कुबेराख्यं घटं दिव्यं कुबेरगृहशोभितम् ।

जिनवेश्मप्लवायात्र समाह्वये कदम्बकैः ॥ ७ ॥ ॐ ह्रीं कुबेरकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा । ईशानाख्यमदाधारमीशादिदिग्विभासितम् ।

ओं ह्रीं तिष्ठेद्विधानेन काश्मीरैस्तन्महे मुदा ॥ ८ ॥ जैन विधि विधान /५०

ॐ ह्रीं ईशानकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। कुम्भं गारुन्मताह्वानं गरुन्मणिविनिर्मितम् । सरसैर्दिव्यपूजाघैः श्रये जैनमहोत्सवे ॥ ९ ॥ ॐ ह्रीं गारुन्मतकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। कलशं सुन्दराकारं वैडूर्यमणिनिर्मितम् ।

दिव्यं मरकताभिख्यं स्थापयेऽर्हद्गृहोत्सवे ॥ १० ॥ ॐ ह्रीं मरकतमणिकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा । गङ्गानिर्मितं कुम्भं गाङ्गेयाख्यं महोन्नतम् । गङ्गावनरसापूर्ण पूजयेऽर्हत्सुवेश्मनि ॥ ११ ॥ ॐ ह्रीं गाङ्गेयकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा । प्रतप्तहाटकैः स्पष्टं श्रीमद्धाटकसंज्ञकम् । कुम्भं तीर्थजलापूर्णमर्चयामि यथाविधि ॥ १२ ॥ ॐ ह्रीं हाटककलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। हिरण्याख्यं महाकुम्भ हिरण्येन समर्जितम् । लसत्पङ्कजमालाढयं यजेऽर्हत्सद्मसंमहे ॥ १३ ॥ ॐ ह्रीं हिरण्यकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। कनत्कनकसंकाशं नानामणिविमण्डितम् ।

यजेऽर्हन्मन्दिरे कुम्भं शुद्धनीरसमाश्रितम् ॥ १४ ॥ ॐ ह्रीं कनककलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। अष्टापदाख्यं सत्कुम्भं हेमस्त्रक्प्रविराजितम् । क्षीरोदवारिसंपूर्ण - मर्चयेऽर्हद्गृहोत्सवे ॥ १५ ॥ ॐ ह्रीं अष्टापदकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। महारजतनामाढ्यं महारजतनिर्मितम् ।

तीर्थाम्बूपूरनिभृतमहद्गहेऽर्चये मुदा ॥ १६ ॥ ॐ ह्रीं महारजतकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। आनन्ददायकं दिव्यं सानन्दाख्यं मनोहरम् ।

नित्यं तीर्थजलैः पूर्ण स्थापये चैत्यसंमहे ॥ १७ ॥ जैन विधि विधान /५१

ॐ ह्रीं आनन्दकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। नन्दाख्यं नन्दनोत्कृष्टं प्रणन्दितगमं जितम् । कुम्भं समर्चये दिव्यं नानामणिविनिर्मितम् ॥ १८ ॥ ॐ ह्रीं नन्दकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। कुम्भं विजयनामानं विजयोर्जितविश्वकम् ।

पूर्ण तीर्थजलैर्दिव्यमर्चयेऽर्हद्गृहोत्सवे ॥ १९ ॥ ॐ ह्रीं विजयकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। नानातीर्थजलाकीर्णं कुम्भं त्वजितनामकम् ।

मानये विविधार्हाभिः स्मरजिनमन्दिरोत्सवे ॥ २० ॥ ॐ ह्रीं अजितकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। अपराजितनामानं घटं काञ्चनसंनिभम् ।

संप्रतिष्ठापये चैत्यमहे जलसुमाक्षतैः ॥ २१ ॥ ॐ ह्रीं अपराजितकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। महोदरं शतानन्दनामधेयं प्रभास्वरम् ।

कलशं कमलैः पूर्ण प्रार्चयेऽर्हद्गृहोत्सवे ॥ २२ ॥ ॐ ह्रीं शतानन्दकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा ॥ सह स्नानदसत्ख्यातिं पद्मादितीर्थसंभृतम् । पुष्पमालावृतं कुम्भं महाम्यर्हद्गृहक्षणे ॥ २३ ॥ ॐ ह्रीं स्नानदकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। कुन्दाख्यं कुन्दपुष्पाढ्यं कुन्दस्त्रक्प्रविराजितम् । प्रार्चये कुन्दपुष्पौधैः कुम्भं भव्यजिनालये ॥ २४ ॥ ॐ ह्रीं कुन्दकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। प्रस्फुटन्मल्लिका- पुष्पसमूहामोदवासितैः । नीरैः पूर्ण यजे हेममल्लिकाख्यं महाघटम् ॥ २५ ॥ ॐ ह्रीं मल्लिकाख्यकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा । अपूर्वचम्पकामोद- प्रवासिमजलैर्भूतम् ।

चम्पकाख्यं घटं दिव्यं सूत्रितं सम्यगर्चये ॥ २६ ॥ जैन विधि विधान /५२

ॐ ह्रीं चम्पककलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। कदम्बरजसाव्याप्तकदम्बाख्यं महाघटम् ।

उपाक्षिप्तविधानेनार्चाये जैनगृहालये ॥ २७ ॥ ॐ ह्रीं कदम्बकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। मन्दाराख्यं महाकुम्भं मन्दारस्त्रग्विभूषितम् । दिव्यैरर्चामि मन्दारैः प्रत्यग्रजिनमन्दिरे ॥ २८ ॥ ॐ ह्रीं मन्दारकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। प्रत्यग्रपारिजातौघ समर्पितजलैर्भूतम् ।

पारिजातामिधं कुम्भमर्चयामि पयोभरैः ॥ २९ ॥ ॐ ह्रीं पारिजातकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। संतानपल्लवोत्फुल्लप्रसूननिकरार्चितम् ।

संतानाख्यं जलैः पूर्ण संस्थाप्यापूजयेऽनिशम् ॥ ३० ॥ ॐ ह्रीं सन्तानकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा ।। हरिचन्दनपुष्पाभं हरिचन्दनसंज्ञकम् ।

हरिचन्दनकर्पूरैः कुम्भं संप्रार्चये मुदा ॥ ३१ ॥ ॐ ह्रीं हरिचन्दनकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा । कल्पवृक्षमहापुष्पप्रकरेण प्रसाधितम् ।

कल्पवृक्षाभिधं कुम्भं पूजनाय प्रकल्पये ॥ ३२ ॥ ॐ ह्रीं कल्पवृक्षकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा । जपाख्यं जपदामाभं जपापुष्पाख्यबालकम् ।

यजे जगत्प्रभोर्नव्यचैत्यस्नानाय केवलम् ॥ ३३ ॥ ॐ ह्रीं जपाकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। विशालाख्यं घटं दिव्यं विशालं रत्ननिर्मितम् । विशालयामि पुष्पौधैः कुन्दमन्दारसंभवैः ॥ ३४ ॥ ॐ ह्रीं विशालकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। कुम्भं श्रीभद्रकुम्भाख्यं भद्रेभकुम्भसुन्दरम् । पारिभद्रप्रसूनौघैः शोभयामि मनोहरैः ॥ ३५ ॥ जैन विधि विधान / १५३

ॐ ह्रीं भद्रकुम्भकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। घटं श्रीपूर्णकुम्भाख्यं पूर्णकुम्भमिवोन्नतम् । क्षीरोदनीरसंपूर्णैः सुरत्नैर्वर्णयाम्यहम् ॥ ३६ ॥ ॐ ह्रीं पूर्णकुम्भकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। जयन्तं सर्वकुम्भानां जयन्ताख्यं महाघटम् । विकसञ्जयपुष्पौधैः संयजामि तदुत्सवे ॥ ३७ ॥ ॐ ह्रीं जयन्तकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। वैजयन्ताभिधं कुम्भं सत्यं विजयदायकम् ।

नव्यप्रासादचर्यार्थैश्चर्चयेऽहं बनादिभिः ॥ ३८ ॥ ॐ ह्रीं वैजयन्तकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। चन्द्रकान्तमहारत्नविनिर्मित- महाघटम् ।

चन्द्राख्यं जगदुत्कुष्टं पूजये विविधार्चनैः ॥ ३९ ॥ ॐ ह्रीं चन्द्रकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा । सूर्यकान्ताश्मसन्दोहविराजितं महोदयम् ।

सूर्याख्यं कुम्भमुत्कृष्टैः प्रयजे तन्महार्घकैः ॥ ४० ॥ ॐ ह्रीं सूर्यकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। लोकालोकप्रविख्यातं लोकालोकविधानकम् ।

कुम्भं संस्थापयाम्यत्र संपूज्य विविधार्चनैः ॥ ४१ ॥ ॐ ह्रीं लोकालोककलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा। त्रिकूटनामकं कुम्भं त्रिकूटाद्रिसमानकम् । समर्च्य विविधार्घ्यण स्थापये तन्महोत्सवे ॥ ४२ ॥ ॐ ह्रीं त्रिकूटकलशेन मन्दिर शुद्धिं करोमीति स्वाहा। उदयाख्यं महाकुम्भमुदयाचलसन्निभम् ।

स्थापयामि जिनागारेऽभिषवाय महोन्नतिम् ॥ ४३ ॥ ॐ ह्रीं उदयाचलकलशेन मन्दिरशुद्धिं करोमीति स्वाहा । हिमवत्पर्वताभिख्यं हिमाचलसमुन्नतिम् ।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


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स्रोत: Gyata संग्रह।

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