जैन पोएम्स - बाल काव्य
अनुक्रमणिका
| क्र. | विवरण |
|---|---|
| 1 | बाल काव्य |
| 2 | सिद्ध प्रभु |
| 3 | मंदिर जी आओ |
| 4 | आइसक्रीम |
| 5 | 5.पाप |
| 6 | सात तत्व |
| 7 | जीव के भेद |
| 8 | रत्नत्रय |
| 9 | जय जिनेंद्र |
बाल काव्य
सिद्ध प्रभु
सुन सुन चेतन जल्दी सुन,
सिद्ध प्रभु के जानो गुण।
गुण अनंत के धारी हैं,
तीन लोक के स्वामी हैं।
कर्म आठ का नाश किया,
अष्ट गुणों को प्रगट किया।
सिद्धों के गुण गाना हैं,
उन सम ही बन जाना हैं।
मंदिर जी आओ
आओ जी आओ, मंदिर जी आओ
प्रभु को निहारो, उनको पहचानो।
हम उनको लखते, वे निज को लखते।
हम हैं सरागी, प्रभुजी वैरागी।
दुःख हम बताते, वे सुख दिखाते।
सुख है अपने में, न बस सपने में।
हम निज को जाने प्रभु सम बन जाएं।
आइसक्रीम
छोटा सा बच्चा घूमने गया, आइसक्रीम की एक दुकान में
रुका।
आइसक्रीम को देखा, रोने लगा, मम्मी ने उसको डांट के
कहा
कभी न कभी न कभी न
वो छोटा बच्चा पूछने लगा, आइसक्रीम को क्यों मना करती
हो माँ?
माँ ने बताई उसकी दशा, कितनी बुरी है ये भी कहा.
कभी न कभी न कभी न
आइसक्रीम में कितने जीव हैं पड़े, MSG पाउडर उसमें डले।
नाली के पानी से वो हैं बने। इसीलिए मैं तो उसको खाऊँ ही
न
कभी न कभी न कभी न …
5.पाप
पांच पाप को जाने क्यों?
ये जग में ही होते क्यों?
हिंसा से सब जीव दुखी,
न हिंसा तो परम सुखी।
झूठ बोलने बालों को,
हम अपने घर लाएँ क्यों।
चोरी जो जन करते हैं,
बुरा उन्हें हम कहते हैं।
है कुशील जग में निंदा,
न साथी कोई रहता।
परिग्रह करना पाप है,
बुरे लोग की शान है।
सात तत्व
जीव राजा आते नखरे बहुत दिखाते।
निज को नहीं लखते, बुरी संगत में पड़ते।
ये तो सबको जाने, सबको ही पहचाने।
इनके दोस्त अजीवा, सदा अचेतन रीता।
इन दोनों की दोस्ती, सदा जीव को कोसती।
जब ये घर को आता, आश्रव तब कहलाता।
है आश्रव दुखकारी, नहीं माने अज्ञानी।
तभी बंध है होता, दुख का बीज है बोता।
ये तो सदा मलिन है, अरु विपरीत वतन है।
जब ये सजन जाने ज्ञानी वो कहलाए।
संवर तब हो जाता, तोड़ अजीव से नाता।
फिर अजीव घर आए, अरु व्यवहार जताए।
राजा न अपना माने, संवर तब कहलाए।
जब जीव न हंसता, जोने लगता।
निर्जरा वह कहलाते, एक देश खिर जाएं।
कर्म भागने लगते अपनी हार समझते।
पूर्ण नाश जब होता, मोक्ष तभी हो सकता।
Let’s make puzzle of तीन लोक।
how do we make तीन लोक।
Please collect that pieces six.
Then we can it’s method fix.
1st Piece is jeeva, तीन लोक में होता,
2nd पुद्गल Visible, अनंत इसके पार्टिकल्स।
धर्म द्रव्य फिर जोड़ो, अधर्म कहे कि रोको।
आकाश इसका base है, जगह सभी को देत है।
Last part is काल द्रव्य, यह जानो छहों द्रव्य ॥
जीव के भेद
चेतन धारी चेतन धारी जो जो जो…,
उनको जाने आज हम ओ हो हो…।
संसारी और मुक्त जीव हैं दो दो…,
इन दोनों के भेद कहे हैं दो दो…।
प्रभु अरहंता सिद्ध महंता ओ हो हो…,
मुक्त जीव का ध्यान करें हम ओ हो हो…।
संसारी में त्रस स्थावर ओ हो हो…,
दु ति चौ पां इन्द्रि वाले त्रस ओ हो हो…।
पृथ्वी जल वायु अग्नि स्थावर हो…
वनस्पति हमको बनना है नो नो नो…।
पंच इंदी हम जैसे हैं जो जो जो…,
कुछ मन वाले, बिना है मन के वो वो वो…।
इन जीवों के भेद जानना है हमको…
इनमें श्रेष्ठ सिद्ध पद पाना है हमको… ॥
रत्नत्रय
चलो चलो चलो चलो मोक्ष महल को जाना है।
काल अनंत वहां पर हमको सिद्ध परम पद पाना है॥
सम्यक् दर्शन पहली सीढ़ी पहले उसको पाना है।
ज्ञान प्राप्त कर निज आतम का मुक्ति बधु को पाना है॥
सम्यक् चारित्र सीढ़ी पर जो जल्दी से चढ़ जाता है।
मोक्ष महल में वो बस जाता जग स्वामी कहलाता है॥
आतम भैया आतम भैया कौन है?
कौने में बैठे भैया जी मौन हैं।
देख जगत् की चका चौंध को रो रहे,
पर द्रव्यों के अहम भाव में खो गए।
करना करना दिखता भाई तुझे,
एक बार तो निज वैभव को लख सही।
गुण अनंत हैं, उनका स्वामी तू ही है,
सबसे अच्छा सुख का धारी तू ही है।
एक बार बस जानो खुद को आत्मा,
खुश हो जाओ तज के जग की वासना॥
(तर्ज अहा टमाटर बड़े मजेदार)
मोक्ष मार्ग में बढ़ चल भाई - 2
चार गति में बहुत भ्रमाया,
चौरासी चक्कर को काटा,
पर में ही एकत्व लगाया,
कर्तापन का बोझ उठाया,
इन सबको तू तज मेरे भाई।
मोक्ष मार्ग में बढ़ चल भाई॥
बड़े भाग्य से नर तन पाया,
उसमें भी जिन शासन पाया,
वीतराग का पथ है भाया,
जिनवाणी का मिला सहारा,
जिनवाणी को पढ़ मेरे भाई।
मोक्ष मार्ग में बढ़ चल भाई॥
जिनवाणी में ने बतलाया,
निज को जिन का ज्ञान कराया,
पथ निर्ग्रन्थ सहज बतलाता,
मुनिपद पाने योग्य बनाया,
उसी मार्ग में बढ़ चल भाई।
मोक्ष मार्ग में बढ़ चल भाई॥
Thank you
for listening!
जय जिनेंद्र
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3437.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है